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झारखण्ड में मछली पालन की समस्याएँ और संभावनाएँ

इस पृष्ठ में झारखण्ड में मछली पालन की समस्याएँ और संभावनाएँ की जानकारी दी गयी है।

परिचय

झारखण्ड में काफी पुराने तथा नये जलक्षेत्र है जो मुख्यतः वर्षा आधारित है। इन जलक्षेत्रों का निर्माण सिंचाई के लिए किया गया तथा ताकि किसान अपने खेतों से दो-तीन फसल ले सकें। अब सभी ने महसूस किया है की जब तक वर्षा जल को संचित नहीं किया जायगा। तबतक कृषि और इनसे जुड़े अन्य कार्यक्रमों का विकास इस राज्य  में संभव  नहीं  है। इसलिए सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थान किसानों को अधिक से अधिक तालाब/पोखर बनाने को प्रोत्साहन दे रही है। आज लगभग 29,000 हे. जलक्षेत्र इस राज्य में उपलब्ध है और लगभग 0.2% की दर से इसमें वृद्धि हो रही है।

इन सभी जलक्षेत्रों में मछली पालन की असीम संभावनाएं है तथा इनका उपयोग मछली पालन के रूप में मच जागरूक किसान का भी रहे हैं। लेकिन यह कुछ क्षेत्रों तक ही सिमित है। बाकी जगहों पर किसान इसे महत्व नहीं देते हैं जिसके अनेक कारण हैं। जिसमें  भौगिलिक एवं तकनीकी कारण हैं, जिसके फलस्वरूप उन्हें मछली उत्पादन 300-500 किलोग्राम/वर्ष/हे.  ही मिल पाता है जबकि हमारे पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश में कुछ किसान 14 टन/वर्ष हे. का उत्पादन ले रहे हैं तथा देश का औसत उत्पादन भी  1200 किलोग्राम/वर्ष/हे. के लगभग है। ऐसे स्थिति में झारखण्ड राज्य में मछली पालन की काफी संभावनाएँ है। जिससे किसान को सालों भर रोजगार  एवं आमदनी में वृद्धि होगी लेकिन संभावनाओं पर चर्चा करने से पूर्व इनकी समस्याओं पर ध्यान देना आवश्यक है

  1. तालाब की मिट्टी अम्लीय है: यह सही है कि मिट्टी अम्लीय होने पर भी तालाब का पानी अम्लीय नहीं होता है। लेकिन तालाब में दी जाने वाली जैविक खाद का पानी में उपलब्धता उतनी नहीं हो पाई है, जिससे मछली का प्राकृतिक भोजन कम तैयार होता है।
  2. तालाब मौसमी है” वर्षा आधारित होने के करण अधिकांश तालाब मौसमी एवं दीर्घ मौसमी है। जिससे  मछलियों को बढ़ने के लिए अधिक समय नहीं मिल पाता है।
  3. शुद्ध एवं सही किस्म के मत्स्य बीज का आभाव: मछली पालन के लिए आवश्यक है कि कि शुद्ध एवं सही किस्म के मत्स्य का बीज (जीरा ) प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। यह सही है कि विगत कुछ वर्षों में काफी हैचरी का निर्माण सरकारी एवं गैर-सरकारी विभागों में हुई है लेकिन अभी भी हक अपने 50-60% आवश्कताओं के लिए दूसरे राज्य पर निर्भर है।
  4. जैविक खाद की कमी: इस राज्य में 80-90% छोटे और मझौले वर्ग के किसान हैं जिनके पास मवेशियों की संख्या काफी कम है तथा जैविक खाद की उपलब्धता भी कम है। इन जैविक खाद का उपयोग किसान पहले अपने खेतों में करते हैं तथा तालाब को प्राथमिकता अंत में दी जाती है।
  5. पूंजी का अभाव: चूँकि मछली पालन में पूंजी की जरूरत तभी पड़ती है जब कृषि कार्य में पड़ती है। मछली पालन किसान के प्राथमिकता में नहीं है, जिसके कारण उसपर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता है।
  6. जागरूकता में कमी: आप सब भी इस बात से सहमत होंगे कि यह के किसान उतने जागरूक नहीं हैं जितने अन्य राज्यों के। इनकी आवश्कताएँ भी काफी कम है इसलिए मछली पालन के व्यवस्था में अधिक रूचि नहीं लेते हैं। साथ ही साथ भाषा एवं इनका अपने गाँव से बाहर न निकलना भी एक प्रमुख कारण है।

इन सभी समस्याओं के अलावे भी बहुत दूसरे कारण हैं, लेकिन विकास के काफी संभावनाएँ हैं। यदि आप गाव में उपलब्ध जलक्षेत्रों को देखें तो पायेगें जलक्षेत्र कि व्यक्तिगत/सामूहिक/मौसमी/दीर्घ-मौसमी/वार्षिक इत्यादि है। यहाँ के प्रत्येक गाँव में लगभग दो तालाब अवश्य हैं। एक व्यक्तिगत और दूसरा सामूहिक। व्यक्तिगत तालाब  में तो किसान अपनी मर्जी के अनुसार काम कर सकते अहिं तथा सामूहिक तालाब जो गांववासियों के घरेलू काम में आते हैं, उसमें थोड़ी समस्या है।

मत्स्य बीज उत्पादन

इसके लिए तालाब जिसका क्षेत्रफल 25 से 50 डिसमिल हो और मौसमी हो सबसे उपयुक्त है। इस तकनीक में 3 दिन उम्र के मत्स्य ब्बिज जिसे “स्पान” कहते है तालाब में संचित की जाती है और 15-20 दिनों के बाद जब 1” हो जाता ही तो तालाब वाले किसान को बेच दिया जाता है। यह कम बरसात के दिनों में किया जाता ही, इसलिए मौसमी तालाब इसके लिए उपयुक्त है । ऐसा देखा गया है की 20 डिसमिल वाले एक तालाब से 15-20 दिनों में एक किसान 1000 रूपये का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। बरसात के दिनों में यदि उपलब्ध हो तो 3-4 फसल आसानी से ली जा सकती अहि।

मत्स्य अगुलिकाओं का उत्पादन

आजकल बड़े आकार के मत्स्य बीज जिसे अगुलिकाएँ” कहते हैं तथा जिसका आकार 3-4 होता है उसकी मांग बढ़ रही है। मत्स्य विभाग झारखण्ड सरकार  भी  जलाशय को संचित करने के लिए इसे उचित मूल्य पर खरीदती है। ये कार्यक्रम वैसे तालाब जिसमें 4-6 महिना पानी रहता है, उसमें किया जा सकता है।

दीर्घ मौसमी तालाब में मिश्रित मछली पालन

दीर्घ मौसमी तालाब वैसे तालाब को कहते हैं जिसमें 8-10 महीना पानी रहता है। इस तरह का तालाब यदि व्यक्तिगत हो तो मिश्रित मछली पालन (जिसमें 5-6 प्रकार की मछलियाँ  एक साथ पाई जाती है) की जा सकती है। इसमें जैविक खाद, पूरक आहार एंव चूना की आवश्कता होती है। ऐसा पाया गया है की दीर्घ मौसमी तालाब में  कॉमन कार्प एक कतला के पालन कनरे से बढ़त अच्छी होती है।

कुछ तालाब सामुदायिक भी हो सकते हैं, जो गाँव वाले अपने घरेलू काम जैसे बर्तन धोना, कपड़ा धोना इत्यादी काम में लाते हैं और वैसे तालाब में मछली पालन की अनुमति तो देते हैं लेकिन जैविक खाद की प्रयोग की मनाही करते हैं, ऐसे तालाब में घरेलू उपयोग के कारण तथा प्राकृतिक ढंग से पाने आप ही जैविक खाद आ जाता है। इसके अलावा रासायनिक खाद, डी.ए.पी. यूरिया इत्यादी का प्रयोग कर मछली का प्राकृतिक भोजन एवं मछली का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

सामुदायिक तालाब में मिश्रित मछली पालन

इस तरह के तालाब में गाँव वाले घरेलू कार्य करते हैं जिससे मछली पालन के लिए जैविक खाद के प्रयोग की मनाही करते हैं। लेकिन उनके घरेलू कार्य करने से कुछ जैविक खाद अपने आप तालाब में आ जाता है। इस तरह में मिश्रित मछली पालन किया जा सकता है। इसमें तालाब में जैविक खाद का प्रयोग न कर रसायनिक खाद जैसे डी. ए.पी. यूरिया इत्यादि का प्रयोग किया जाता है इस तरह के तालाब में मछली –सह- बत्तख पालन भी किया जा सकता है।

व्यक्तिगत तालाब में समन्वित मछली पालन

समन्वित मछली पालन वैसे विधि को कहते हैं जिसमें दो-तीन प्रकार के कार्यक्रम को एक साथ जोड़ा जाता है और एक दूसरे के बेकार पदार्थ का समुचित उपयोग किया जाता है। जैसे मछली सह- बत्तख, मछली-सह-सकुर, मछली-सह-मुर्गी पालन इत्यादि।

मछली सह- बत्तख

यह पालन विधि कुछ राज्यों में काफी लोकप्रिय है। इसमें तालाब में मिश्रित मछली पालन किया जाता है साथ ही साथ तालाब के बाँध पर या आसपास बत्तख पालन किया जाता है ताकि ये बत्तख तालाब में आसानी से जा सकें। दिनभर या बत्तख तालाब से अपना प्राकृतिक भोजन लेती है और रात्रि में घर वापस आ जाती है। इस विधि में खाकी कैम्बल नामक बत्तख पालने की सलाह दी जाती है जिसकी अंडा देने में भोजन देने की आवश्कता नहीं होती है, लेकिन रात्रि में 80 ग्राम प्रति बत्तख के दर से किसान के घर में उपलब्ध भोज्य पदार्थ दिया जाता ही। ऐसा देखा गया है कि किसान के परिस्थिति में यह बत्तख 180-200 अंडे देते हैं जिसका वजन 40-70 ग्राम होता है। इस विधि से मछली उत्पादन लगभग 4500 किलोग्राम/हे./वर्ष होता है तथा एक रुपया के लागत पर लगभग 4-5 रुपया का आमद होता है। प्रति हेक्टेयर तालाब के लि 500-600 बत्तख काफी होता है। इस विधि में कुछ समस्याएँ भी हैं।

  • ये बत्तख अपने अंडे को सेती नहीं है, जिससे चूजे तैयार नहीं होते। ऐसी सलाह दी जाती है कि प्रत्येक २ वर्ष में बत्तख को बदल देनी चाहिए क्योंकि बत्तख के अंडे देने की शक्ति कम हो जाती है।
  • फसल लगाने के महीनों में इन बत्तखों को खेतों में नहीं जाने देना चाहिए क्योंकि कीटनाशक खाने से इनकी मौत हो जाती है।
  • चूँकि ये ज्यादा अंडा देने वाली प्रजाति है, इसलिए इन्हें पौष्टिक आहार देने से अंडा उत्पादन अच्छा होता है।

मछली-सह-सूकर पालन

ये विधि भी उपरोक्त विधि मछली-सह-बत्तख के तरह हैं। इसमें मछली एवं सूकर पालन किया जाता है सूकर पालन तालाब के बाँध पर नजदीक ही किया जाता  है ताकि सूकर का मल-मूत्र नाली द्वारा सीधे तालाब में जाता अहि। ये मल-मूत्र कुछ मछलियों के लिए सीधे भोजन का काम करती है तथा उनका प्राकृतिक भोजन के निर्माण में भी मदद करती है। सूकर का आवास व्यवस्था गाँव में उपलब्ध सामग्री से की जाई है तथा सुकरों को घर में उपलब्ध भोज्य पदार्थ ही दी जाती है जिसकी बढ़त भी अच्छी होती है।यह 6-8 माह में 40-70 किलोग्राम की हो जाती है। इस तरह एक वर्ष में किसान 2 बार सूकर पालन कर सकते हैं। इस विधि में भी लागत एक रुपया पर आमदनी 3-4 रूपये की होती है। इस विधि में 40-60 सूकर/हे. तालाब के दर से रखना चाहिए।  इस विधि में कॉमन कार्प नामक मछली की बढ़त दर अधिक पायी गयी है। सूकरों को 2-4 घंटा चरने के लिए खुला भी छोड़ा जा सकता है। इन्हें चरने के लिए तालाब के किनारे ही छोड़ना उपयुक्त होता है, जिससे उसका मल-मूत्र सीधे तालाब में चला जाता है।

मछली-सह-मुर्गी पालन

इस विधि में मछली-सह-मुर्गी पालन एक साथ किया जाता है। इसमें भी मुर्गी का घर तालाब के ऊपर या बांध पर बनाया जाता है ताकि उसका मल-मूत्र सीधे तालाब में जाए। इस विधि में भी मछलियों को अतिरिक्त खाद एवं पूरक आहार देने की आवश्कता नहीं होती है। मुर्गी  पालन “दीप सीटर” व्यवस्था में भी की जा सकती है, जिसमें ‘सीटर’ की तालाब 25-50 किलोग्राम/हे./दिन सूरज निकलने से पूर्व तालाब में किया जा सकता है। इस विधि में भी 500-600  मुर्गी का खाद एक हेक्टेयर के लिए काफी होता है। इस विधि से मछली पालन का उत्पादन 3000-4500 किलोग्राम/हे./वर्ष प्राप्त किया जा सकता है।

इन सभी प्रकार के तकनीक से किसान के पास उपलब्ध सभी प्रकार के जलक्षेत्रों का समुचित उपयोग हो सकता है।

 

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार

3.07142857143

Sabbir Khan Mar 27, 2018 01:16 PM

I am interested fish & chiken farming

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