सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

बीज संग्रहण मार्गदर्शिका

इस पृष्ठ में बीज संग्रहण मार्गदर्शिका की जानकारी दी गयी है I

प्रस्तावना

मध्यप्रदेश वन विभाग के द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 1.25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जाता है इसके साथ ही निजी क्षेत्र में आजकल बड़ी मात्रा में वृक्षारोपण किया जा रहा है। इसलिये विभिन्न वृक्ष प्रजातियों के बीजों का संग्रहण विभाग का प्रमुख कार्य हो गया है।

विश्व बैंक योजना के अंतर्गत 13 विस्तार एवं अनुसंधान केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं। इन केन्द्रों का एक मुख्य कार्य आनुवांशिक रूप में अच्छे गुण श्रेणी के बीज एकत्र करके विभाग,किसानों तथा नर्सरी धारकों को प्रदाय करना है। इसलिये इन केन्द्रों में कार्यरत कर्मचारियों को बीज संग्रहण के बारे में समुचित जानकारी होना आवश्यक है। बीज संग्रहण में निम्नलिखित क्रियायें सम्मिलित है -

  1. वृक्षों से फलों/बीजों का एकत्रीकरण (Collection of fruits/seeds)
  2. बीजों का उपचार (Processing of seeds)
  3. बीजों का भण्डारण (Storage of seeds)
  4. बीजों का परीक्षण (Testing of seeds)

बीजों का एकत्रीकरण

  1. वन विभाग में विभिन्न वृक्ष प्रजातियों एवं दूसरी प्रजातियों के बीजों की बड़ी मात्रा में आवश्यकता पड़ती है। वृक्षारोपण, बिगड़े वनों के सुधार, पड़त भूमि विकास आदि कार्यक्रमों के अंतर्गत किये जाने वाले रोपणों के लिये बड़ी मात्रा में बीज प्रतिवर्ष एकत्र किये जाते है। बीजों की गुणवत्ता मुख्य रूप से वृक्षों के आनुवंशिक गुण पर निर्भर होती है। इसलिये यह आवश्यक है कि बीज उन्हीं वृक्षों से एकत्र किये जायें जो आनुवंशिकीय रूप से श्रेष्ठ हों।
  2. आनुवंशिकीय रूप से श्रेष्ठ गुण श्रेणी के वृक्षों की पहचान करना नितांत कठिन कार्य है, इसलिए प्राकृतिक वनों में बीज उत्पादन क्षेत्र और बीज उद्यान की स्थापना की जाती है ताकि आनुवंशिकीय रूप से अच्छी गुण श्रेणी के वृक्षों से ही बीज एकत्र किये जायें। बीज उत्पादन क्षेत्र एवं बीज उद्यान के निर्माण में समय, धन आदि की आवश्यकता होती है और सभी प्रजातियों के लिये बीज उद्यान एवं बीज उत्पादन क्षेत्र का निर्माण करना भी कठिन है। इसलिए अनेक प्रजातियों के बीज प्राकृतिक वनों से ही एकत्र किये जाते रहेंगे।
  3. बीज एकत्रीकरण से संबंधित निम्नलिखित मुद्दे महत्वपूर्ण हैं -

1. बीज कितना एकत्र किया जाये ?

2.  बीज कब एकत्र किये जायें ?

3. बीज किन वृक्षों से एकत्र किये जायें ?

4. बीज कैसे एकत्र किये जायें ?

बीज कितना एकत्र किया जाये ?

  • बीज कितना एकत्र किय जाना है, इसकी जानकारी होना आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक बीज एकत्र करने पर उसके खराब हो जाने का खतरा रहता है क्योंकि पुराने बीजों की अंकुरण क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। यदि बीज कम मात्रा में एकत्र किया गया तो जितने क्षेत्र में रोपण किया जाना था उसे प्राप्त करने में कठिनाई होगी।
  • बीज की मात्रा निम्निलखित बातों पर निर्भर करेगी

(1) प्रजाति

  • प्रति किलों बीजों की संख्या
  • अंकुरण प्रतिशत

(2) रोपण का लक्ष्य

(3) रोपण में अंतराल

(4) वितरण या विक्रय के लिये आवश्यकता

  • जिस प्रजाति का रोपण किया जाना है उसके बारे में, बीजों का आकार, अंकुरण क्षमता, प्रति किलोग्राम बीजों की संख्या आदि बातों की जानकारी होना चाहिये। उदाहरण के लिये सागौन के 2250 बीज एक किलोग्राम में होते हैं। जबकि यूकेलिप्टस के बीज बहुत ही छोटे होते हैं, और प्रतिकिलों उनकी संख्या लगभग 3,50,000 होती है। हल्दू के बीज तो और छोटे होते हैं और प्रति किलो उनकी संख्या 10 लाख तक होती है। इस तरह यह स्पष्ट होगा कि यदि बीज बड़े और भारी हो तो अधिक बीज (वजन में) एकत्र करना होगा।
  • विभिन्न प्रजातियों के बीजों की अंकुरण क्षमता भी अलग-अलग होती है। सागौन की अंकुरण क्षमता लगभग 30-40 प्रतिशत होती है। कुछ प्रजातियां जैसे बबूल, सुबबूल आदि इनकी अंकुरण क्षमता 70-90 प्रतिशत तक पायी जाती है इसलिए जिन प्रजातियों की अंकुरण क्षमता कम होती है, उनके लिए अधिक बीज की आवश्यकता होगी।
  • रोपण का लक्ष्य क्या है तथा कितने अंतराल पर रोपण किया जाना है यह भी जानना आवश्यक है क्योंकि इन्हीं के आधार पर निर्धारित होगा कि वस्तुतः बीज की आवश्यकता कितनी है ? इसके साथ ही बीज एकत्र करने वाले को भी यह भी जानकारी होना चाहिये कि किसानों और दूसरे नर्सरी धारकों के लिये कितने बीज की आवश्यकता होगी ?
  • उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए प्रति हेक्टे० रोपण के लिए विभिन्न प्रजातियों के बीज की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये तथा इसी के आधार पर बीज एकत्र करना चाहिए । उदाहरण के लिए तालिका-1 में सागौन, बॉस, शीशम तथा यूकेलिप्टस के लिए प्रति हेक्टे० रोपण हेतु बीज की आवश्यकता का आंकलन किया गया है -

तालिका 1 -एक हेक्टेयर में रोपण के लिये बीज की आवश्यकता का निर्धारण

क्र.

आयटम

सागौन

बांस

शीशम

 

यूकेलिप्टस

1.

रोपण का अंतराल/मीटर में

2 x  2

4 x4

 

3 x 3

2 x 2

2.

आवश्यक पौधों की संख्या प्रति हेक्ट.

1670

625

1111

2500

3.

अतिरिक्त

अ. 50%नर्सरी,परिवहन आदि पर हानि

ब. 30%मृतक पौधों के स्थान पर रोपण हेतु

 

835

557

 

363

209

 

556

371

 

1250

834

4.

प्रति हेक्टेयर आवश्यक पौधों की संख्या

3062

1197

2038

4584

5.

बीजों की संख्या/ प्रति किलोग्राम

2250

50000

30000

350000

6.

पौध प्रतिशत

25

40

40

20

7.

एक किलो बीज से प्राप्त होने वाले पौधों की संख्या

560

20000

12000

70000

8.

बीज की आवश्यकता कि.ग्रा./प्रति हेक्टेयर

5.5

0.06

0.17

0.65

  • इसी प्रकार प्रत्येक प्रजाति के लिये रोपण के क्षेत्रफल के अनुसार बीज की आवश्यक मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है। बीज एकत्र करने की योजना बनाने वाले अधिकारी को अपने क्षेत्र में अपने रोपण की आवश्यकता की पूर्ति के पश्चात कुछ बीज दूसरे वृत्तों या किसानों या नर्सरी धारकों के लिये भी एकत्र करना चाहिये।

बीज कब एकत्र किये जाए ?

  • बीज एकत्र करने का समय महत्वपूर्ण है। बीज एकत्र करने वाले को विभिन्न वृक्ष प्रजातियों के फलने-फूलने तथा फल पकने के समय की जानकारी होना आवश्यक है। अनेक वृक्ष प्रजातियों में प्रतिवर्ष अच्छी मात्रा में बीजन (सीडलिंग) नहीं होता है और 2-3 वर्ष के अन्तराल में अच्छी मात्रा में बीजन होता है।
  • सागौन में प्रति वर्ष अच्छी मात्रा में पुष्पन होता है परन्तु अच्छा बीजन (गुड सीडलिंग) आमतौर पर 3-4 वर्ष के अंतराल में होता है। खमार में अच्छी मात्रा में बीजन लगभग प्रतिवर्ष ही होता है। इसी प्रकार यूकेलिप्टस, बबूल, विलायती बबूल, सुबबूल, खैर, शीशम आदि में पर्याप्त बीज प्रतिवर्ष आता है। जिस वर्ष अच्छी मात्रा में बीजन (गुड सीडलिंग) हो उस वर्ष बीज एकत्र करना अधिक अच्छा रहता है क्योंकि
  1. अच्छे बीजन वर्ष में पर्याप्त बीज कुछ ही वृक्षों से एकत्र हो सकता है। अर्थात प्रति किलोग्राम बीज एकत्र करने का व्यय अपेक्षाकृत कम होता है।
  2. अच्छे बीज वर्ष में एकत्र किये गये बीजों में अंकुरण क्षमता अच्छी होती है और इन बीजों की भण्डारण क्षमता भी अधिक होती है।
  3. कीड़ों-मकोड़ों, चिडियों तथा अन्य बीमारियों द्वारा अपेक्षाकृत कम हानि होती है। खराब बीज वर्ष में इन तत्वों से बीजों को बहुत हानि होती है।
  4. अच्छे बीज वर्ष में लगभग सभी वृक्षों में पुष्पन अच्छी मात्रा में होता है। अतः परागण में लगभग सभी वृक्ष भाग लेते हैं। इस प्रकार बीजों में आनुवांशिकीय विभिन्नता बनी रहती है। जिस वर्ष अच्छा पुष्पन नहीं होता है उस वर्ष कुछ ही वृक्ष परागण में भाग लेते हैं। फलतः प्राप्त बीजों को आनुवंशिकीय विभिन्नता कम रहने की संभावना रहती है।
  • उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट होगा कि बीज एकत्रीकरण का कार्य अच्छे बीज वर्ष में किया जाना श्रेयस्कर है। इसके साथ ही यह जानकारी होना आवश्यक है कि वृक्ष से बीज कब एकत्र किये जायें। बीज एकत्र करते समय यह ध्यान देना आवश्यक है कि बीज परिपक्व होना चाहिये। अपरिपक्व बीज में अंकुरण क्षमता नहीं होती है और बीज एकत्रीकरण का व्यय व्यर्थ चला जाता है।
  • बीज परिपक्व हो गया है,  यह कैसे जाना जाए ? यदि बीज शीघ्र एकत्र कर लिया जाता है तो खतरा रहता है कि बीज अपरिपक्व हो। इसके साथ ही यदि बीज एकत्र करने में देरी की गई तो हो सकता है कि बीज अधिक पक जाए और कीड़े-मकोड़ों द्वारा खा लिया जाये अथवा बीज छिटक कर बिखर जाए ।
  • बीज एकत्रीकरण में अनुभव महत्वपूर्ण है। अनुभव से ही ज्ञात होता है कि बीज कब एकत्र किया जाय। फिर भी बीज एकत्र करने के लिए निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देना उपयोगी होगा-

1)वृक्ष में जब फल पककर गिरने लगते हैं तो आम तौर पर माना जाता है कि वृक्ष के फल पक चुके हैं और उन्हें तोड़ा जा सकता है, परन्तु अधिकतर यह पाया जाता है कि यह सोच ठीक नहीं है। जो फल या बीज पककर पहले गिरते हैं अधिकांशतः घटिया श्रेणी के होते हैं अतः इन फलों/बीजों को एकत्र नहीं करना चाहिये। कुछ समय तक प्रतीक्षा की जानी चाहिये और जब अधिकांश फल/ बीज पक जायें तब ही बीज एकत्र करना उत्तम रहता है।सागौन में पहले जो बीज पक कर दिसम्बर जनवरी में गिरते हैं वे खराब गुण श्रेणी के होते हैं जो फल बाद में गिरते हैं अर्थात जनवरी-फरवरी में गिरते हैं वे ही अच्छे होते हैं।

2)कुछ प्रजातियों के फलों के रंग में परिवर्तन को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि फल पकने वाला है। नीम में फल हरे रंग का होता है। जब यह फल पीला होने लगता है तो मान लेना चाहिये कि फल पक गया है, और बीज के लिये ऐसे फलों को तोड़ा जा सकता है।

3)यदि फलों के पक जाने पर बीजों के यत्र-तत्र बिखर जाने का खतरा हो अथवा वृक्ष से पककर फल न गिरते हो तो बीज एकत्र करने में कठिनाई आएगी। फील्ड में यह देखा जा सकता है कि फल पका हुआ है अथवा नहीं। इसके लिये वृक्ष से कुछ फल तोड़ें और देखें कि भ्रूण (एम्ब्र्यो) की स्थिति कैसी है ? यदि भ्रूण दूधिया हो तो फल अभी कच्चा है। यदि फल पक गया है तो भ्रूण कठोर तथा सफेद या भूरे रंग का होगा और ऐसी स्थिति में ही बीज के लिये फल तोड़ना ठीक रहेगा।

4)सीजन के प्रारम्भ में या अंत में आये बीजों के बजाय सीजन के मध्यकाल में बीजों को एकत्र करने का कार्य करना चाहिए। विभिन्न प्रजातियों के बीज पकने के सही समय का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। यह ज्ञान इसलिये होना आवश्यक है, कि कुछ वृक्ष प्रजातियों के फल वृक्ष में लगे-लगे ही हवा में उड़ने लगते हैं, या कुछ प्रजातियों के फल केप्सूल पकने पर खुल जाते है जिससे बीज उड़ या गिर न जाये। अतः प्रत्येक प्रजाति के सही बीज एकत्र करने के समय का ध्यान रखना चाहिए , ताकि उत्तम बीज एकत्र किए जा सकें। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार बीजों के एकत्र करने के समय में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है जैसे गरम क्षेत्र में बीज जल्द गिरने लगते है। कुछ प्रजातियों के बीज पकने का समय तालिका में दिया गया है।

तालिका 2 - प्रजातियों के बीज पकने का समय तालिका

प्रजाति

बीज एकत्र करने का समय

आकाश मोनी (accacia auriculiformis)

मार्च से अप्रैल

खैर (acacia catechu)

दिसम्बर से मार्च

बबूल (acacia nilotica)

मार्च से मई

कैस्टार (Albizia amara )

अप्रैल

काला सिरस (Albizia lebbeck )

जनवरी से मार्च

सफेद सिरस (albizia procera )

फरवरी से मार्च

सीताफल (Annona squamosa )

नवम्बर

नीम (Azadirachta indica )

जून से जुलाई

कचनार (bauhinia variegata )

मई से जून

केसिया सायामिया ( cassia siamea )

मार्च से अप्रैल

केजूरिना (Casuarina equisetifolia )

दिसम्बर से जनवरी

कर्रा /गरारी (Cliestantus collinus )

मई से जून

सिस्सू (Dalbergia sissoo)

दिसम्बर से जनवरी

बांस (dendrocalamus strictus )

मार्च से मई

नीलगिरि (Eucalyptus )

दिसम्बर से मई

आंवला (Emblica officinalis )

जनवरी से फरवरी

खमैर (Gmelina arborea )

मई से जून

चिरोल (Holoptelia integrifolia )

अप्रैल से मई

लेंडिया (Lagestroemia parviflora )

फरवरी से अप्रैल, नवम्बर एवं दिसम्बर

सुबबूल (Leucaena leucocphala)

मई से जून

करंज (Pongomia pinnata )

अप्रैल से मई

विलायती बबूल (Prosopis juliflora )

अप्रैल से मई

सागौन(Tectona grandis )

फरवरी से मार्च

अर्जुन (Terminalia arjuna )

अप्रैल से मई

महारुख (Ailanths excelsa )

मई से जून

मुनगा (Moringa olifera )

मई से जून

शेवरी (Sesbania aegyptica )

दिसम्बर से फरवरी

अगस्त (Sesbania grandiflora )

जनवरी से फरवरी

अंजन (Hardwickia binata )

अप्रैल से मई

जामुन (Sygygium cumini )

जून

आम (Mangifera indica )

जून से जुलाई

महुआ (Madhuca latifolia )

जून से जुलाई

बड़ (Ficus bengalensis )

अप्रैल से मई

पीपल (-Ficus religiosa )

अप्रैल से मई

काजू ( Anacardium occidentale )

अप्रैल से मई

बकायत (Melia azadirach )

फरवरी से मई

पर्किन्सोनिया (Parkinsonia aculeata )

दिसम्बर

विलायती इमली (Pithecellobium dulce)

अप्रैल

बेर (Ziziphus jujuba )

दिसम्बर से जनवरी

कैथा ( Feronia elephantum )

जनवरी से मार्च

इमली (Tamarindus indica )

मार्च से अप्रैल

भूसरोडा/अंजन घास (Cenchrus ciliaris)

अक्टूबर से फरवरी

पीला अंजन घास (Cenchrus setigerus)

अक्टूबर से फरवरी

सेनघास (Chrysopogon fulvus )

अक्टूबर

छोटी मरबेल घास (dichanthium annulaum)

अक्टूबर

दीनानाथ घास (Pennisetum pedicilatum)

अक्टूबर से नवम्बर

शेड़ा,पुनिया घास (Sehima nervosum)

अक्टूबर

उपर्युक्त तालिका में जो समय दिया गया है वह बड़ा है। प्रदेश में भौगोलिक स्थिति के अनुसार पुष्पन एवं बीजन होता है। यह देखा गया है कि उत्तरी जिलों जैसे सीधी, शहडोल की अपेक्षा बस्तर में उसी प्रजाति में पुष्पन एवं फलन 15-20 दिन पहले हो जाता है। अतः इतने समय का अंतर बीज एकत्र करने में भी हो सकता है।

बीज एकत्र करने के लिये वृक्ष का चयन

  1. यदि बीज एकत्रीकरण का कार्य बीज उद्यान या बीज उत्पादन क्षेत्र से किया जाना है तो उस स्थिति में सभी वृक्ष बीज वृक्ष हैं और ऐसी स्थिति में बीज एकत्रित करने के लिये वृक्षों के चयन का विशेष महत्व नहीं रहता है परन्तु यदि बीज सामान्य वनों से एकत्र किया जाना है तो बीज एकत्रित करने में बीज वृक्ष के चयन का विशेष महत्व रहता है।
  2. बीज वृक्ष के चयन में निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है -

i. बीज ऐसे वृक्षों से एकत्र किया जाये जिनका आकार अच्छा हो, वे स्वस्थ हों और अच्छी वृद्धि कर रहे हों।

ii. अति प्रौढ़ वृक्षों और अल्प वयस्क वृक्षों से बीज एकत्र नही किया जाना चाहिये, क्योंकि ऐसे वृक्षों से प्राप्त बीज कम अंकुरण क्षमता वाले होते हैं।

iii. दूर-दूर खड़े हुये वृक्षों से से बीज एकत्र नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसे वृक्षों से प्राप्त बीज अंतत- आपस में परागण से प्राप्त होते हैं जिनकी अंकुरण क्षमता कम होती है।

iv. बीज हमेशा अच्छे वन क्षेत्रों से ही एकत्र किये जाना चाहिये। जिस वन में खराब, पतले तथा निम्न गुण श्रेणी के वृक्ष हों वहां से बीज एकत्र नहीं किया जाना चाहिये।

v.यदि बीज की आवश्यकता कम है और 2-4 वृक्षों से ही पर्याप्त बीज प्राप्त किया जा सकता हो फिर भी यह उचित रहेगा कि 10-15 वृक्षों से बीज एकत्र किया जाये। यदि बीज उत्पादन क्षेत्र से बीज एकत्र किया जाना है तो भी यही बात ध्यान में रखना उचित होगी।

बीज कैसे एकत्र किया जाए ?

वृक्षों से बीज एकत्र करने के अनेक तरीके प्रचलित हैं, परन्तु किस प्रजाति के लिए कौन सा तरीका उचित होगा, यह निर्धारित करने के लिये निम्न लिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है -

i. जिन प्रजातियों के फल/बीज बड़े आकार के होते हैं और जिनके बीज या फल आसानी से जमीन पर एकत्र किये जा सकते हैं उन प्रजातियों में प्राकृतिक रूप से फलों के गिरने पर उन्हें एकत्र किया जा सकता है। उदाहरण के लिये सागौन,महुआ, साल, अर्जुन आदि के फल बड़े आकार के होते हैं उन्हें जमीन पर गिरने के पश्चात एकत्र किया जा सकता है। इसके विपरीत यूकेलिप्टस, हल्दू जैसी प्रजातियों जिनके बीज बहुत छोटे होते हैं उनके बीज, वृक्ष से ही एकत्र करना आवश्यक होगा।

ii.वृक्ष के गुण - वृक्ष की ऊँचाई, तने की लम्बाई, मोटाई, शाखाओं के गुण, छत्र की ऊँचाई, आकार आदि, वृक्ष पर चढ़ने उतरने में कठिनाई आदि।

iii.फल के गुण - फल का प्रकार, फल के पकने तथा बीज के बिखरने के बीच का  समय, पेड़ को हिलाने से फल के गिरने या न गिरने का गुण।

iv.बीज प्रक्षेत्र का गुण - वृक्षों का घनत्व,  भूमि,  धरातल का स्वरूप आदि।

v.उपर्युक्त कारकों को ध्यान में रखते हुये आमतौर पर बीज एकत्र करने के लिए निम्न लिखित विधियाँ अपनाई जाती है -

  1. भूमि से गिरे हुये फल या बीज एकत्र करना
  2. खड़े वृक्षों से बीज एकत्र करना

(क) भूमि पर खड़े होकर

(ख) वृक्ष पर चढ़कर

<>(ग) दूसरे तरीके अपनाकर

भूमि से गिरे हुये फल या बीज एकत्र करना

2 बीज एकत्र अनेक प्रजातियों जैसे, सागौन, साजा, अर्जुन, महुआ, तेंदू, नीम, बबूल, सिरस,खमार आदि प्रजातियों के फल जमीन से एकत्र किये जा सकते हैं। यह काम निम्न प्रकार से हो सकता है -

  • प्राकृतिक रूप से गिरे हुये बीज एकत्र किये जाए,
  • वृक्ष को हिलाकर फल गिरा लिये जाए,
  • हाथ से हिलाकर
  • मशीन से हिलाकर

प्राकृतिक रूप से गिरे हुए फल/बीज एकत्र करने का सबसे अधिक नुकसान यह है कि प्राकृतिक रूप से गिरे फल/बीज खराब, कीड़ों-मकोड़ों द्वारा खाये हुये, सड़े हुये और निम्न गुण श्रेणी के होते हैं। वृक्षों की शाखाओं को इंडे या रस्सी या हाथ लगाकर हिलाया जा सकता है जिससे पके फल आसानी से गिर जाते हैं। और इस प्रकार फल/बीज एकत्र किये जा सकते हैं। चित्र 1 में शाखाओं को रस्सी से हिलाने की विधि बताई गई है, भूमि पर फल या बीज गिरने पर तुरंत एकत्र कर लेना चाहिये अन्यथा रोडेन्टस (Rodents) एवं दूसरे प्राणियों द्वारा बीज खा लिये जाने का खतरा रहता है। यदि वृक्ष छोटे आकार के हों तो बीज एकत्र करने के लिये फनेल (Funnel) के आकार का सीड कलेक्टर (Seed collector) बनाया जा सकता है। (चित्र - 2)

खड़े हुये वृक्षों से बीज एकत्र करना

i. छोटे वृक्षों, झाडियों आदि के बीज भूमि पर खड़े होकर श्रमिक एकत्र कर सकते हैं। इन्हें हंसिया (Sicket) में फंसाकर फलदार शाखा/टहनी को तोड़ा या काटा जा सकता है और फिर बीज/फल एकत्र किया जा सकता है। वृक्षों पर चढ़कर बीज निम्न तरीके से एकत्र किये जा सकते हैं -

  • हाथ से तोड़कर
  • शाखाओं को हिलाकर फल/बीज नीचे गिराकर।

ii.खड़े हुये वृक्षों पर चढ़ना आसान काम नहीं है। कुछ श्रमिक जो वृक्षों पर चढ़ने में दक्ष होते हैं वे ही यह कार्य आसानी से कर सकते है। अकुशल श्रमिकों को यह काम नहीं देना चाहिये। वृक्षों पर चढ़ने में सहायता के लिये सीढियों का उपयोग किया जा सकता है । सीढियाँ 10 फीट से लेकर 25-30 फीट की बनाई जा सकती हैं। सीढियों के लिये अल्यूमीनियम का उपयोग होने से सीढियाँ हल्की तथा पोर्टेबल रहेगी। सीढियों के अतिरिक्त, चढ़ने के यंत्र भी उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से बहुत ऊचे वृक्षों पर भी चढ़ा जा सकता है (चित्र स.-4)।

इसके अतिरिक्त दूसरे यंत्र ट्रेक्टर पर लगाये जा सकते हैं जिसकी सहायता से सीधे वृक्ष छत्र से फल या बीज एकत्र किये जा सकते हैं। जितना बीज एकत्र किया जाये उसका रिकार्ड रखना चाहिये। बीज एकत्र करने की डेटाशीट प्रपत्र-1 में वर्णित है।

बीज का उपचार

1)वृक्ष से फल/बीज प्राप्त कर लेने के पश्चात अनेक कार्य करने आवश्यक होते हैं। ये कार्य निम्नलिखित हैं –

i.फल/बीजों की प्राथमिक सफाई

ii.बीजों का पकाना

iii.बीज को फल से निकालना

  • सूखे फलों से बीज निकालना
  • गीले फलों से बीज निकालना

iv.फल/बीजों का सुखाना

छाया में सुखाना धूप में सुखाना

v. बीज तथा भूसा अलग करना

vi. बीजों की ग्रेडिंग

2)फल तथा बीजों की प्राथमिक सफाई

वन क्षेत्र से जब बीज/फल एकत्र किये जाते हैं तो उनके साथ पत्तियाँ, पतली-पतली टहनियाँ भी एकत्र हो जाती है, इसलिए सबसे पहले काम यह किया जाना चाहिए कि फल/बीज के अतिरिक्त जो भी वस्तु हो उसको अलग कर लिया जाये।

3)फलों/बीजों का पकाना

जब फल तोड़े जाते हैं तो पूर्ण पके हुये नहीं रहते। कुछ दिन रखे रहने पर फल पूरी तरह से पक जाते हैं। अतः आवश्यकतानुसार फलों के पूर्ण रूप से पक जाने पर ही बीजों को निकाला जाना चाहिये।

4)फल से बीजों को निकालना

सूखे फलों से बीजों को निकालने की प्रक्रिया और गीले फलों से बीज निकालने की प्रक्रिया अलग-अलग है। सूखे फलों जैसे बबूल, खैर, सुबबूल आदि की फलियों के चटकने से कुछ बीज अलग हो जाते हैं और सूखी फलियों को एकत्र करके इंडे से मारने पर बीज अलग-अलग हो जाते हैं। गीले फलों से बीज निकालने के लिये यह आवश्यक है कि बीज से गूदे को अलग कर दिया जाये। यह काम फलों को हाथ से मसलकर और पानी से धोकर किया जा सकता है। इस विधि से आम, जामून, नीम आदि के फलों के बीज निकाले जाते हैं।

5)बीजों को सुखाना

बीजों को भली-भांति सुखाकर रखना आवश्यक होता है। कुछ बीजों को तेज धूप में सुखाने पर उनकी अंकुरण क्षमता कम हो जाती है इसलियो उन्हें कमरे या छाया में सुखाना अधिक अच्छा है। नीम, साल आदि के बीजों को छाया में सुखाना अधिक अच्छा रहता है। बबूल, खैर, सागौन आदि के बीजों को धूप में सुखाया जा सकता है। सुखाने के लिये सवच्छ प्लेटफार्म का उपयोग किया जा सकता है।

6)बीज एवं भूसा अलग करना

बीज और भूसा अलग करने के लिये सबसे सरल तरीका यह है कि हवा में भूसा युक्त बीज उड़ाया जाय तो साफ बीज, हल्के बीज और भूसा अलग-अलग गिरेंगे (चित्र-5) यदि बीज की मात्रा कम हो तो सूपे का उपयोग किया जा सकता है (चित्र-6)।

7) बीजों की ग्रेडिंग

बीजों की ग्रेडिंग मुख्य रूप से आकार के आधार पर की जाती है। इसके लिये आवश्यक है कि विभिन्न आकार की छन्नी का प्रयोग किया जाये और छन्नी से छानकर बड़े, मध्यम और छोटे आकार के बीजों को अलग-अलग ग्रेड में रखा जा सकता है। बीज के उपचार का वर्णन भी शीडलाट के साथ दिया जाना आवश्यक है। बीज उपचार शीट प्रपत्र-2 में वर्णित है।

बीज भण्डार

1)बीज एकत्रित तथा उपचारित करने के पश्चात यदि तुरंत उपयोग कर लिया जाता है तो भण्डारण की आवश्यकता नहीं पड़ती है परन्तु यदि पर्याप्त मात्रा में विभिन्न प्रजातियों का बीज एकत्र किया जाता है तो विभिन्न संस्थाओं एवं किसानों को माँग आने पर बीज उपलब्ध कराने के लिये बीज के भण्डारण की समुचित व्यवस्था अनुसंधान तथा विस्तार केन्द्रों पर होना आवश्यक है। भण्डारण की दृष्टि से बीजों को दो श्रेणियों मेंविभक्त किया जाता है -

आर्थोडक्स बीज

  • रिकैलसीट्रेन्ट

2)आर्थोडक्स बीज वे बीज हैं जिनको 5 प्रतिशत जल रहने तक बिना अंकुरण क्षमता को प्रभावित किये सुखाया जा सकता है, और उन्हें दीर्घ अवधि तक कम तापमान में संग्रहित रखा जा सकता है। कुछ ऐसे बीज है। जिन्हें यदि 20-40 प्रतिशत जल की मात्रा से कम तक सुखाया जाता है तो उनकी अंकुरण क्षमता नष्ट हो जाती है साथ ही इन बीजों को दीर्घ अवधि के लिये भण्डारित नहीं किया जा सकता। ऐसे बीजों को रिकैलसीट्रेन्ट कहा जाता है। सागौन, बबूल, खैर, प्रोसोपिस, काला सिरस, सफेद सिरस, सिस्सू इत्यादि प्रजातियों के बीज सुखाकर भण्डारित किये जा सकते हैं परन्तु आम, जामुन, नीम, महुआ, साल, वकायन इत्यादि के बीजों की अंकुरण क्षमता 1-2 सप्ताह के बाद ही कम होने लगती है इसलिये इन बीजों का भण्डारण कठिनाई से ही होता है। इन बीजों को एकत्र करने के तुरंत बाद उपयोग कर लेना चाहिये।

3)अधिकांश वृक्ष प्रजातियों के बीज वर्ष के प्रारम्भ में या कुछ समय पूर्व पकते हैं। कुछ प्रजातियों के बीज सर्दियों में पकते हैं। इन प्रजातियों के बीज वर्षा के आगमन तक आसानी से सुरक्षित रखे जा सकते हैं लेकिन तैलीय बीज ज्यादा समय तक भण्डारण करके नहीं रखे जा सकते है। बीज के भण्डारण में निम्न बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है –

  • बीज भली-भांति सूखे होना चाहिये। यदि बीज सूखे रहते हैं तो कीड़े-मकोड़ों का  आक्रमण नहीं होता है और फफूद और वेक्टेरिया से भी हानि नहीं होती है।
  • बीज भण्डारण यदि लम्बी अवधि के लिये किया जाना हो तो कम तापमान में भण्डारण आवश्यक होगा, इसलिये डीप फ्रिज या कोल्ड स्टोरेज  में भण्डारण किया जाना चाहिये।
  • बीज भण्डारण के पूर्व बीजों को भली-भांति सुखा लेना चाहिये और सुखाने के पश्चात उन्हें फहूँद से बचाने के लिये फफूदनाशक दवा मिला देनी चाहिये। कीड़े मकोड़ों की राकथाम के लिये गमेक्सीन पाउडर या नीम से बनी कीटनाशक दवाई का प्रयोग करना चाहिये।
  • बीज भण्डारण के लिये अलग से बीज भण्डार बनाया जाना चाहिये। बीज भण्डारण के लिये ऐसे बर्तनों का प्रयोग किया जाय कि उनमें हवा प्रवेश न कर सके। बीज भण्डारण के लिये टीन के बने ड्रम जिसमें वायुरोधी ढक्कन हो, का उपयोग करना चाहिये।
  • बीज भण्डार गृह में पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिये। कमरे में बड़े तथा छोटे ड्रमों को रखने के लिये अलग व्यवस्था होनी चाहिये।
  • बीज भण्डार करते समय बीज का पूर्ण विवरण एक टैग में लिखा होना चाहिये जिसमें प्रजाति, एकत्र करने का स्थल, दिनांक, एकत्र करने वाले कर्मचारी का नाम आदि की जानकारी दी जाना चाहिये।

कुछ महत्वपूर्ण प्रजातियों की अंकुरण क्षमता की अधिकतम अवधि की जानकारी तालिका 3 में दी गई है। बीज का वर्णन बीज के स्टाक रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए (प्रपत्र-3)।

तालिका 3 - उत्तम भण्डारण होने पर विभिन्न प्रजातियों की अंकुरण क्षमता की अवधि

खैर

30,000 से 40,000

बबूल

7,000 से 9,000

महारुख

8,000 से 10,000

कालासिरस

8,000 से 9,000

नीम

3,000 से 3,500

सफेद सिरस

18,000 से 20,000

सिस्सू

53,000

चिरोल

27,000

सुबबूल

20,000 से 26,000

मुनगा

8,000 से 9,000

करंज

800 से 1,000

खमार

1,000

बांस

32,000

प्रोसपिस जूलीफ्लोरा

25,000

कचनार

2,800 से 3,520

पलास

1,500 से 3,520

कसोंदन

37,040

केजुरिना

7,60,000

कर्रा

8,000 से 9,000

नीलगिरी

3 से 6 लाख (शुद्ध) 15-20000 (हस्कचाफ के साथ )

आंवला

55,000 से 60,000

लेंडिया

28,000 से 30,000

प्रोसोपिस

25,000

काजू

250 से 300

खमेर

1,000

विलायती इमली

6,000

इमली

1,500

बीज परीक्षण

  • विस्तार एवं अनुसंधान केन्द्रों में बीज परीक्षण के लिये एक छोटी सी प्रयोगशाला भी स्थापित की जा रही है। अतः इन केन्द्रों में बीज एकत्रीकरण, उपचार एवं भण्डारण के पश्चात विभाग के विभिन्न वन मण्डलों, नर्सरी धारकों एवं दूसरे विभागों को बीज प्रदाय करना एक प्रमुख कार्य होगा। इसलिये इन केन्द्रों में बीजों के परीक्षण की सुविधा होना आवश्यक है।
  • 7.2 इन केन्द्रों में मुख्य रूप से निम्नलिखित 3 परीक्षण किये जाना आवश्यक हैं -
  1. बीज शुद्धता परीक्षण
  2. जल की मात्रा का परीक्षण
  3. अंकुरण क्षमता संबंधी परीक्षण
  • जब भी इन केन्द्रों से वन मण्डलों या दूसरे विभागों या अन्य किसी को बीज प्रदाय किये जाते हैं तो उनमें उनके साथ इन परीक्षणों का विवरण भी उपलब्ध रहना चाहिये ताकि बीज प्राप्त करने वाले को बीज के संबंध में जानकारी उपलब्ध रहे। बीज परीक्षण हेतु विस्तार एवं अनुसंधान केन्द्र के कम से कम दो लोगों को प्रशिक्षित किया जाना उचित होगा ताकि वे बीज परीक्षण का कार्य सफलतापूर्वक कर सकें। उपर्युक्त परीक्षणों की प्रक्रिया नीचे बतलाई जा रही है।

बीज शुद्धता परीक्षण

इस परीक्षण से यह पता लगाया जाता है कि एकत्रित बीज कितना शुद्ध है। अर्थात् उसमें शुद्ध बीज तथा अन्य पदार्थ जैसे कंकड़, पत्थर, पत्तियाँ या दूसरे पदार्थों की मात्रा कितनी है ? इसके लिये आवश्यक है कि जिस सीडलाट (Seed lot) से परीक्षण किया जाना है, उसमें से विधिवत सेंपल प्राप्त किया जाय। सीडलाट से जो सेंपल निकाला जाय उसका सर्वप्रथम वजन (Weight) ज्ञात कर लेना चाहिये फिर सेंपल के बीजों को फैलाकर शुद्ध बीज, अन्य बीज तथा अन्य पदार्थ इस प्रकार तीन भागों में बाँट लेना चाहिये।

  • अंतरराष्ट्रीय बीज परीक्षण ऐसोसियेशन (ISTA) के नियम के अनुसार यदि सीड लाट से लिया गया सेंपल एक ग्राम से कम है तो तीनों अलग-अलग भागों का वजन दशमलव के 4 अंक तक ज्ञात किया जाना चाहिये। यदि सैंपल का वजन 1 ग्राम और 9.999 ग्राम के बीच है तो विभिन्न भागों का वजन दशमलव के 3 अंक तक निकाला जाना चाहिये। इसी प्रकार यदि सेंपल का वजन 10 ग्राम और 99.99 ग्राम के बीच है तो विभिन्न भागों का वजन दशमलव के 1 अंक तक निकाला जाना पर्याप्त होगा।

निम्न फार्मूले से शुद्धता प्रतिशत ज्ञात किया जा सकता है -

शुद्धता प्रतिशत =   शुद्ध बीज का वजन सेंपल का कुल वजन x 100

  • बीज में पानी की मात्रा ज्ञात करना

बीजों में पानी की मात्रा ज्ञात करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि बीजों की आयु भण्डारण में बहुत कुछ पानी की मात्रा पर निर्भर करती है। विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े आदि का आक्रमण पानी की मात्रा के प्रतिशत पर निर्भर करता है। बीजों को यदि 5-7 प्रतिशत पानी की मात्रा तक सुखा लिया जाय तो कीड़े-मकोड़ों का आक्रमण इन पर बहुत कम होता है। बीजों में पानी की मात्रा इलेक्ट्रोनिक मोइश्चयर मीटर (Electronic moisture metter) से आसानी से ज्ञात की जा सकता है। बड़े आकार के बीज तथा दूसरे बीज जिसमें इलेक्ट्रोनिक मोइश्चयर मीटर काम नहीं कर सकता है वहाँ बीज में पानी की मात्रा ज्ञात करने के लिये ओवन (Oven) की आवश्यकता होगी। भट्टी या ओवन को पहले 105 डिग्री तक गरम किया जाना चाहिये। बीजों का प्रारम्भिक वजन लेकर इनको भट्टी में 16-24 घण्टे तक रखना चाहिये इसके बाद बीजों का वजन लेकर बीज से जल की मात्रा निम्न सूत्र से ज्ञात कर लेना चाहिये -

जल की मात्रा =   शुष्क बीजों का वजन बीजों का प्रारम्भिक वजन x 100

अंकुरण परीक्षण

यह परीक्षण बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस परीक्षण से ज्ञात होता है कि कितने पौधे उपलब्ध बीज में बन सकेंगे। अंकुरण संबंधी परीक्षण करने के लिये निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है -

  1. पर्याप्त नमी (आद्रता लगभग 95 प्रतिशत)
  2. समुचित तापमान (20-35)
  3. पर्याप्त हवा
  4. पर्याप्त प्रकाश

अंकुरण परीक्षण करने के लिये कई प्रकार से सीड जरमिनेटर प्रयोग में लाये जाते हैं जहाँ नमी, तापमान, हवा, प्रकाश आदि को प्रजाति की आवश्यकतानुसार नियंत्रित किया जा सकता है। अंकुरण परीक्षण करने के लिये 30 से.मी. x 30 से.मी. तथा 10 से.मी. गहरी ट्रे का उपयोग करना उचित रहेगा। इस ट्रे में बालू या वरमीकुलाइट (Vermiculite) भर लेना चाहिये। बालू की सतह के ऊपर फिल्टर पेपर का प्रयोग किया जा सकता है। परीक्षण करने के शुद्ध 400 बीज लेकर इसे 100-100 बीजों के चार सैम्पल में बाँट लेना चाहिये। ट्रे में बालू या बरमीकुलाईट भरकर लगभग आधा लीटर पानी प्रत्येक ट्रे में डाल देना चाहिये। अब लिए गये बीजों को 2-3 से.मी. के अंतराल में बो देना चाहिये इसके बाद मिस्ट स्प्रेयर (Mist sprayer) से पानी इन ट्रे में ऊपर से दे देना चाहिये। तत्पश्चात पारदर्शी पोलीथिन शीट (Transparent Polythene sheet) से ढक देना चाहिये। पोलीथिन शीट पर पानी के कण दिखेंगे। यदि पानी के कण न दिखाई दें तो मिस्ट स्प्रेयर से और पानी दे देना उचित रहेगा। जब बीजों का अंकुरण प्रारम्भ हो जाय तो पोलीथिन शीट, ट्रे के ऊपर से हटा लेना चाहिये इसके पश्चात अंकुरण के आँकड़े लेना चाहिये।

अंतर्राष्ट्रीय बीज परीक्षण एसोसियेशन (ISTA) के अनुसार बीज अंकुरित तब माना जाता है जब बीजांकुर की ऊँचाई 1.0 से.मी. तथा बीज पत्र खुल गये हैं। 28 दिनों तक अंकुरण के आँकड़े लिये जाने चाहिये। उदाहरण के लिये 400 बीजों में यदि 220 बीज 28 दिवस तक अंकुरित पाये गये शेष 180 बीजों को काट कर देखने पर ज्ञात हुआ कि उनमें 60 बीज स्वस्थ है और शेष 120 बीज खराब हैं तब अंकुरण प्रतिशत तथा अंकुरण क्षमता निम्न प्रकार से ज्ञात की जा सकती है -

अंकुरण प्रतिशत = 220/ 40 x 100

अंकुरण क्षमता = 220+600/ 40 x 100

यदि बीजों का अंकुरण सातवे दिन से प्रारम्भ हुआ और जो बीज सातवे, आठवे, नौवे, दसवे तथा ग्यारहवे दिन अंकुरित हुये उनकी संख्या 20, 60, 80, 70 तथा 55 पाई गई तो अंकुरण शक्ति तथा अंकुरण अवधि निम्नानुसार ज्ञात की जाती है -

अंकुरण शक्ति = 20+60+80/ 400 x  100

अंकुरण अवधि = अधिकतम अंकुरण का दिन अर्थात् 9 दिन

अंकुरण का प्रयोग करके प्रतिवेदन संलग्न प्रपत्र 4 में दिया जाना चाहिये।

अभिलेख-

बीज एकत्रीकरण में निम्नलिखित जानकारी रखी जाना चाहिये -

  1. बीज एकत्रीकरण अभिलेख (प्रपत्र 1)
  2. बीज उपचार अभिलेख (प्रपत्र 2)
  3. बीज संग्रहण अभिलेख (प्रपत्र 3)
  4. बीज परीक्षण अभिलेख (प्रपत्र 4)

प्रपत्र 1 - बीज एकत्र करने की डेटाशीट (प्रत्येक बीज लाट के साथ)

दिनांक

परीक्षण अवधि

अंकुरित बीजों की संख्या

कुल अंकुरित बीज

 

 

अंकुरण क्षमता वाले बीज

 

 

शुद्ध बीजों की संख्या

कुल बीजों की संख्या अंकुरित बीज अंकुरण प्रतिशत

परीक्षण करने वाले अधिकारी का नाम

स्रोत: मध्यप्रदेश सरकार का आधिकारिक वेबसाइट

2.96875

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
Back to top

T612019/10/21 00:05:37.516627 GMT+0530

T622019/10/21 00:05:37.536420 GMT+0530

T632019/10/21 00:05:37.653828 GMT+0530

T642019/10/21 00:05:37.654286 GMT+0530

T12019/10/21 00:05:37.495099 GMT+0530

T22019/10/21 00:05:37.495295 GMT+0530

T32019/10/21 00:05:37.495436 GMT+0530

T42019/10/21 00:05:37.495575 GMT+0530

T52019/10/21 00:05:37.495662 GMT+0530

T62019/10/21 00:05:37.495733 GMT+0530

T72019/10/21 00:05:37.496467 GMT+0530

T82019/10/21 00:05:37.496653 GMT+0530

T92019/10/21 00:05:37.496860 GMT+0530

T102019/10/21 00:05:37.497067 GMT+0530

T112019/10/21 00:05:37.497120 GMT+0530

T122019/10/21 00:05:37.497211 GMT+0530