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मधुमक्खी पालन नीति

इस पृष्ठ में मधुमक्खी पालन नीति को बताया गया है I

पृष्ठभूमि

प्रस्तावना मधुमक्खी पालन खेती प्रणालियों का महत्वपूर्ण संसाधन आधार है जो भारत के ग्रामीण समुदाय को आर्थिक, पोषणिक और पारिस्थितिक सुरक्षा प्रदान करता है। यह कृषि के वाणिज्यीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के वर्तमान संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला सिद्ध हो सकता है। मधुमक्खियां तथा मधुमक्खी पालन फसल परागण के रूप में पारिस्थितिक प्रणाली को अपनी निशुल्क सेवाएं प्रदान करते हैं और इस प्रकार वन तथा चरागाह पारिस्थितिक प्रणालियों के संरक्षण में सहायता पहुंचाते हैं। मधुमक्खी पालन की भूमिका किसानों की आर्थिक दशा को सुधारने में महत्वपूर्ण है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है क्योंकि यह सदैव ग्रामीण भारत के सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा सामुदायिक रहन-सहन की प्राकृतिक विरासत से। जुड़ी हुई है। अतः यह जैविक खेती संबंधी कार्यक्रमों में तेजी से विकास की दृष्टि से वर्तमान कार्यनीतियों का एक महत्वपूर्ण घटक बनता जा रहा है।

भारत में मधुमक्खी पालन की क्षमता का लाभ अभी भी उठाया जाना बाकी है और एक कच्चे अनुमान के अनुसार वर्तमान में हम मधुमक्खी पालन की कुल क्षमता का केवल 10 प्रतिशत लाभ ही उठा पा रहे हैं। इस तथ्य के भी लिखित प्रमाण कि हमारे देश में इस विषय पर उपलब्ध वैज्ञानिक और प्रयोगात्मक ज्ञान का अभी तक उल्लेखनीय उपयोग नहीं हो पाया है। यद्यपि अनेक पहलुओं का विस्तार से अध्ययन किया गया है लेकिन इससे संबंधित ज्ञान का अभी तक व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है। सामान्यतः अनुसंधान, प्रशिक्षण तथा विस्तार प्रणालियों की सकल स्थिति के बारे में हमारा ज्ञान कम है और इसका कारण विभिन्न कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच तालमेल में कमी, विभिन्न पहलुओं, विशेष रूप से जैविक मधुमक्खी पालन पर डेटाबेस का उपलब्ध न होना है। परागण तथा इसका व्यवहारिक उपयोग केवल इस विषय का अध्ययन करने वाले विद्वानों तक ही सीमित है और इसके संबंध में व्यापक प्रचार-प्रसार अभी कम है। अतः स्पष्ट है। कि मधुमक्खी पालन उद्योग के पुनरोद्धार के लिए देश में नीतियों तथा कार्यक्रमों को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है जिसके परिणामस्वरूप और अधिक उत्पादक व टिकाऊ मधुमक्खी पालन को अपनाया जा सके।  विभिन्न स्रोतों/संगठनों द्वारा लगाए गए अनुमानों के अनुसार हमारे देश में देसी एपिस केराना एफ. तथा विदेशी एपिस मेलीफेरा एल. की लगभग 2.0 मिलियन क्लोनियाँ वर्तमान में हैं। जिन्हें यहां परंपरागत और देसी छत्तों में रखा जाता है तथा प्रति वर्ष 80,000 मीट्रिक टन से अधिक शहद का उत्पादन होता है। लगभग 25,000–27,000 मीट्रिक टन 42 से अधिक देशों को निर्यात किया जाता है जिसका मूल्य लगभग एक हजार करोड़ रुपये है। हरियाणा में मधुमक्खी पालन 5,000 से अधिक गांवों में किया जाता है तथा इससे 3,00,000 से अधिक लोगों को पूर्णकालिक/अंशकालिक रोजगार उपलब्ध होता है। हरियाणा में वर्तमान में 2,50,000 से अधिक मधुमक्खी क्लोनियाँ हैं। जिनसे 3,000 मीट्रिक टन से अधिक शहद का उत्पादन होता है। इसे ध्यान में रखते हुए हरियाणा में मधुमक्खी पालन की क्षमता को ए. मेलिफेरा की 4.0 लाख से अधिक मधुमक्खी क्लोनियों  को बनाए रखकर प्राप्त किया जा सकता है और इससे प्रति वर्ष 15,000 मीट्रिक टन से अधिक शहद का उत्पादन हो सकता है। इससे राज्य में 4,000 से अधिक बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने में सहायता मिलेगी। हरियाणा राज्य में लक्ष्यों को प्राप्त करने में ये जरूरी है कि इसके टिकाऊ विकास के लिए मधुमक्खी पालन उद्योग की वर्तमान स्थिति का मात्रात्मक निर्धारण किया जाए। इसके अतिरिक्त राज्य के विभिन्न कृषि भौगोलिक क्षेत्रों में शहद के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण की आवश्यकता है।

मधुमक्खी पालन की विशेषताएं

  • भोजन तथा नकद आमदनी उपलब्ध कराना
  • किसी भूमि की आवश्यकता नहीं होती है।
  • छोटी मझोली और बड़े पैमाने की खेती की स्थितियों के लिए अवसरों का उपलब्ध होना
  • घर के निकट ही लाभदायक रोजगार का उपलब्ध होना
  • परिवार तथा समाज में सहयोग को बढ़ावा मिलना
  • इसे खाली समय, अंशकालिक समय और पूर्ण कालिक पेशे के रूप में अपनाया जा सकता है।
  • इसके लिए अत्यंत कम निवेश और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
  • प्रौद्योगिकी सरल है।
  • स्थानीय दस्तकारों को अतिरिक्त आय प्राप्त करने में सहायता पहुंचाती है।
  • मधुमक्खी छत्ते के उत्पाद कम आयतन वाले लेकिन उच्च मूल्य के होते हैं और उनके भंडारण के लिए विशेष सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती है।
  • इससे आर्थिक आधार व्यापक होता है।
  • विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  • कृषि, बागवानी तथा चारा बीज फसलों की उत्पादकता के स्तर में वृद्धि होती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण तथा मानव स्वास्थ्य की समस्याओं से निपटने में सहायता मिलती है।
  • सामान्य रूप से जैव विविधता के संरक्षण में सहायता प्राप्त होती है।
  • सामाजिक तथा पर्यावरणीय समस्याएं हल होती हैं।
  • जैविक खेती की अन्य प्रणालियों से प्रभावी सम्पर्क स्थापित होता है।

मधुमक्खी पालन उद्योग के साझेदार/हितधारी और अन्य घटक

भारत/हरियाणा में मधुमक्खी पालन को 'सदाबहार मधु क्रांति की दिशा में लक्षित नवीन प्रौद्योगिकी तथा व्यापार संबंधी कार्यसूचीमधुमक्खी पालन के एक घटक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इससे भारत/ हरियाणा में उत्पादक एवं टिकाऊ मधुमक्खी पालन की दिशा में प्रगति के मामले में एक बहुत बड़ा बदलाव आने की संभावना है। मधुमक्खी पालन उद्योग के साझेदार/हितधारी तथा अन्य घटक निम्न चार्ट में दर्शाए गए हैं।

हरियाणा में मधुमक्खी पालन उद्योग का षवॉट विश्लेषण

हरियाणा में मधुमक्खी पालन उद्योग के अंतर्गत "मधुमक्खी पालन संसाधन, मधुमक्खी उत्पाद और मधुमक्खी पालन की विधियों के अतिरिक्त व्यापार/आर्थिक प्रणाली के साथ पारस्परिक संबंध व पर्यावरणीय एकीकरण” से जुड़े सभी मुद्दे शामिल होने चाहिए। ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए कि इससे जुड़े सभी अवसरों का लाभ उठाया जा सके और बाधाओं को कम किया जा सके। इनकी सूची नीचे दी जा रही है।

(केवीआईसी/एनबीबीएनएचबी)

अवसरों का लाभ उठाना

 

बाधाओं का न्यूनतम करना

 

मधुमक्खी पालन में विविधता

व्यापक मधुमक्खी पौधा संसाधन

विविधतापूर्ण जलवायु /मधुमक्खी वनस्पति जगत

वाणिज्यीकरण/निर्यात की क्षमता

अनुसंधान, विकास और बुनियादी ढांचे संबंधी सहायता

आकर्षक घरेलू/ विदेशी बाजार

फार्म इतर रोजगार के साथ सम्पर्क

देसी प्रौद्योगिकी और कुशलता की सम्पदा

संसाधन तथा बाजार उन्मुख विविधीकरण

उच्च भुगतान/कम मात्रा

 

सामग्री के खराब होने की संभावना बहुत कम

प्रतियोगिताहीनता और संसाधनों का दोहन नहीं

 

मधुमक्खी कॉलोनी उत्पादन और प्रगुणन की धीमी गति

प्रति कॉलोनी ठहराव/ कमी के कारण उपज में होने वाली कमी

शहद को प्राकृतिक/प्राथमिक खाद्य पदार्थ न माना जाना

अपर्याप्त गुणवत्ता नियंत्रण

ज्ञान और व्यवहार में अंतर

जैविक और अजैविक प्रतिकूल स्थितियों के प्रति संवेदनशीलता

अपर्याप्त अग्रगामी सम्पर्क

परागण के प्रति सुरक्षा न होने के कारण परोक्ष लाभ न होना

अनिश्चित मूल्य नीति

आनुवंशिक शरण/जातियों का विलुप्त होना/प्रजनन की उचित विधियां न विकसित होना

घटिया विस्तार संबंधी ढांचा और मानव संसाधन विकास के घटक

स्रोत: हरियाणा किसान आयोग, हरियाणा सरकार
2.91666666667

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