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मधुमक्खी पालन उद्योग में बाधाओं का विश्लेषण

इस पृष्ठ में मधुमक्खी पालन उद्योग में बाधाओं का विश्लेषण की जानकारी दी गयी है I

सामान्य बाधाएं

नामकरण

नाम हमारे आदर्शों, विचारों, सोच तथा प्रयासों को प्रदर्शित करता है। खाद्य एवं ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) जो भारत में मधुमक्खी पालन को संरक्षण देता है ने इसे ग्रामीण उद्योग को आत्म निर्भर बनाने के लिए ग्रामीण समुदायों के सशक्तीकरण के महात्मा गांधी के स्वप्न को साकार करने की दृष्टि से इसे मधुमक्खी पालन उद्योग का नाम दिया है। शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर इसे राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (एसएयू) में एपीकल्चर कहा जाता है जिसमें मधुमक्खी पालन के व्यापक विषय को मुख्यतः कीटविज्ञान के घटक में रखा गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) तथा कृषि मंत्रालय के परिप्रेक्ष्य में इसे परागकों की उप शाखा तक सीमित कर दिया गया है जैसे परागण स्वयं मधुमक्खी पालन की मूल संकल्पना के बिना स्वतः प्राप्त किया जा सकता है। मधुमक्खी पालकों के लिए मधुमक्खी पालन वास्तव में अल्प वैज्ञानिक निवेशों से मधुमक्खी पालन की एक कला है जिसका एकमात्र उद्देश्य शहद उत्पन्न करना है। निर्यातकों के लिए यह सर्वोच्च लाभ प्राप्त करने के लिए शहद (एक जिंस) को खरीदने की एक शुद्धतः वाणिज्यिक गतिविधि है। शहद जो संश्लेषण का एक प्रतीक है, उसे भौतिक, भौगोलिक या विचारों की संकरी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। भारत में, हम मधुमक्खियों तथा मधुमक्खी पालन के क्षेत्र को सीमित करने में लगे हुए हैं। वास्तव में हम मधुमक्खियों के लिए नहीं, बल्कि उनसे लड़ रहे हैं। अतः यही समय है जब न हम केवल अपने दृष्टिकोण को सही नाम दें बल्कि अपने सोच की प्रक्रिया तथा क्रियाविधि को भी सही दिशा उपलब्ध कराएं।

उपयोग में न लाई गई अपार क्षमता

भारत में मधुमक्खी पालन की वृद्धि में अपार संभावनाएं हैं। मधुमक्खियों का बोई गई फसलों के उत्पादन पर सीधा-सीधा प्रभाव पड़ता है जो भारत के लगभग 48.5 प्रतिशत क्षेत्र को प्रभावित करता है। इसका परागण सहायता में अत्यधिक परोक्ष प्रभाव भी है। संयोग से अभी तक मधुमक्खी पालन की 98.3 प्रतिशत क्षमता का दोहन नहीं हो पाया है तथा यह विशाल राष्ट्रीय संसाधन बर्बाद हो रहा है।

भारत में मधुमक्खी पालन में लगी तकनीकी जनशक्ति

केन्द्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (केबीआरटीआई), पुणे तथा केवीआईसी की तकनीकी शक्ति जो 1980 के दशक में 2000 से घटकर लगभग 50 रह गई (केवल कुछ तकनीकी कर्मी और शेष विस्तार स्टाफ)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने प्रशासनिक तथा समन्वयन गतिविधियों में मात्र एक वैज्ञानिक (पीसी) है । हरियाणा में केवल 2 वैज्ञानिक इससे संबंधित अनुसंधान से जुड़े हैं तथा 2 एडीओ विकासात्मक पहलुओं से सम्बद्ध हैं। यह दयनीय है कि भारत में 1.25 बिलियन लोग तथा 1.3 मिलियन मधुमक्खी कालोनियां हैं, लेकिन यहां 30 से अधिक वैज्ञानिक (कीटविज्ञानी) नहीं हैं तथा विकास से जुड़े स्टाफ की संख्या भी मात्र 85 है जिसका अर्थ यह है कि 40,625 कालोनियों के लिए एक वैज्ञानिक तथा 15,662 कालोनियों के लिए एक विकास स्टाफ है। अतः इस जनशक्ति को अपेक्षा के अनुरूप बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।

निम्न प्राथमिकता, अव्यवस्थित उद्योग और क्षेत्र प्रबंध संगठनों की नगण्य भूमिका

सरकारी प्राथमिकता तथा संसाधन आबंटन के संदर्भ में मधुमक्खी पालन में 2.42 लाख मधुमक्खी पालक 13 लाख कालोनियों का रखरखाव कर रहे हैं तथा लगभग 52,000 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन कर रहे हैं। सशक्त समर्थनकारी समूह तथा क्षेत्र प्रबंधात्मक संगठनों (एसोसिएशनों/ फेडरेशनों) की परम कमी के कारण मधुमक्खी पालकों को राष्ट्रीय स्तर पर उनका सही स्थान नहीं प्राप्त हुआ है। इसके विपरीत अमेरिकी,यूरोपीय यूनियन आदि जैसे कृषि की दृष्टि से विकसित देशों में इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

मधुमक्खी पालन उद्यम के लाभ का विश्लेषण

मधुमक्खी पालन एक समय अत्यधिक लाभदायक गतिविधि थी लेकिन उत्पादन (श्रम, प्रवासन, औषधियों, आहार, किराये आदि) उत्पादन लागत में हुई वृद्धि के कारण यह अब गैर-टिकाऊ उद्योग हो गया है। शहद उत्पादन की लागत इसकी उत्पादकता के संदर्भ में चरघातांकी ऋणात्मक है। उच्चतर उत्पादकता स्तर (25 कि.ग्रा./छत्ता/वर्ष) पर उत्पादन की लागत का घटक 2.72 है तथा मध्यम स्तर (20 कि.ग्रा.) पर यह 4.25 की तुलना में 1.6 गुना बढ़ता है। तथापि, 12 कि. ग्रा. के निम्न उत्पादकता स्तर पर, जैसा कि वर्ष 2013-14 के दौरान रिकॉर्ड किया गया था, यह उत्पादन लागत का 4.3 गुना (11.75) चरघातांकी हो जाता है। इसमें कुछ और नकारात्मक विशेषताएं भी जुड़ जाती हैं। इस प्रकार, विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए प्रबंध संबंधी पहलुओं, प्रौद्योगिकीय नई खोजों तथा विविधीकरण को अपनाकर लाभ को सुधारने की तत्काल आवश्यकता है।

मधुमक्खी पालन क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का अपरदन

पिछली शताब्दी के 1980 के दशक तक मधुमक्खी पालन वैज्ञानिक रूप से संचालित था लेकिन 1990 के दशक के अंत में यह तब निर्यातक केन्द्रित हो गया जब सरसों की फसल से प्राप्त शहद को यूरोपीय यूनियन तथा अमेरिका में निर्यात करने की शुरूआत हुई । निर्यातक अधिक शहद चाहते थे तथा उन्होंने इसके लिए अनैतिक साधन अपनाए और यहां तक कि मधुमक्खियों को भी बिना सुपर के कच्चे शहद को निकालने की गलत विधियां अपनाने के प्रति प्रोत्साहित किया। वर्ष 2004-05 में वैरोरा डिस्ट्रक्टर महामारी फैलने के पश्चात् अपनी ऊर्जा उत्पादन की लागत कम करने में लगाने लगे ताकि औषधियों की अत्यधिक महंगी लागत की क्षतिपूर्ति की जा सके। वैज्ञानिक भी अत्यंत नाजूक समय में निवेश उपलब्ध कराने तथा किसी आपदा के पूर्वानुमान को लगाने में असफल रहे। तथापि, निर्यातकों व मधुमक्खी पालकों का गठजोड़ भारतीय शहद के लिए विनाशक सिद्ध हुआ क्योंकि शहद की खराब गुणवत्ता और उसमें मिलावट के कारण यूरोपीय यूनियन ने भारतीय शहद पर प्रतिबंध लगा दिया। वर्ष 2011 में प्रतिबंध हटने के पश्चात नीति-निर्माता अनुकूल नियम बनाने व उन्हें लागू करने में असफल रहे। पूर्व की गलतियों से सीखने के बजाय शहद का व्यापार सबके लिए मुक्त कर दिया गया। निर्यातकों ने श्रेष्ठ मधुमक्खी पालन की विधियों में बिना कुछ निवेश किए मधुमक्खी पालकों का शोषण किया। ये निर्यातक अधिक लाभ चाहते थे, मधुमक्खी पालक अधिक धन चाहते थे तथा श्रमिक अतिरिक्त काम नहीं करना चाहते थे। इन सब कारणों से शहद उत्पादन और उत्पादकता न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए तथा शहद की गुणवत्ता में चिंताजनक गिरावट आ गई । वर्तमान में उद्योग के ये लगभग सभी घटक दोषी हैं।

प्रशासनिक बाधाएं

मधुमक्खी पालन के गैर तकनीकी शीर्ष अधिकारी

कोई भी उद्योग इससे संबंधित नेताओं के विचारों और गतिविधियों से अपना स्वरूप ग्रहण करता है। गांधी जी का विचार स्वरोजगार आंदोलन में मधुमक्खी पालन को शामिल करना था तथा इसकी नींव खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग के अंतर्गत एक सम्पूर्ण मधुमक्खी पालन उद्योग के रूप में रखी गई। मधुमक्खी पालन निदेशालय ने विकास तथा विपणन का कार्य संभाला जबकि सीबीआरटीआई, पुणे के प्रमुख एक जाने-माने व प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे जिन्होंने सम्पूर्ण अनुसंधान से इसका नेतृत्व किया था। केवीआईसी द्वारा मधुमक्खीपालन को एक क्रोडहीन उद्योग के रूप में घोषित किया जाना तथा आगे चलकर इसका नेतृत्व गैर-तकनीकी प्रमुखों के हाथ में आ जाना, इसके पतन का कारण बना।

मधुमक्खी पालन पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) का मुख्य ध्यान फसलों के परागण पर है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (एसएयू) में मधुमक्खी पालन को कीटविज्ञानियों की न्यूनतम प्राथमिकता होती है। राष्ट्रीय मधुमक्खी मंडल (पूर्व में मधुमक्खी पालन विकास मंडल) की स्थापना 1993 में केवीआईसी के संयुक्त प्रयासों से हुई थी। तथापि, केन्द्रीय कृषि एवं सहकारिता मंत्रालय में अखिल भारतीय मधुमक्खी पालकों की एसोसिएशन (एआईबीए) पूर्णतः स्वायतशासी निकाय बनने में असफल रही। इसे आगे चलकर एक निजी इकाई में परिवर्तित कर दिया गया जिसका संचालन निर्यातकों द्वारा अपने लाभ के लिए किया जाने लगा और अंततः इसका प्रमुख एक गैर मधुमक्खी पालक कार्यपालक निदेशक बना और इस प्रकार, यह संगठन दिशाहीन हो गया। राष्ट्रीय बागवानी मंडल (एनएचबी) और बाद में राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम) को केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं के कार्यान्वयन का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

हरियाणा का बागवानी विभाग मधुमक्खी पालकों को अति उच्च तकनीकी व विशेषज्ञ सेवाएं प्रदान करने के लिए भारतीय इज़राइल परियोजना के अंतर्गत मधुमक्खी पालन पर श्रेष्ठता का केन्द्र स्थापित करने जा रहा है। ऐसी आशा है कि इसका प्रमुख कोई ऐसा तकनीकी व्यक्ति होगा जिसे वैज्ञानिक ढंग से मधुमक्खी पालन का व्यापक अनुभव होगा।

मधुमक्खी पालन संस्थाओं के उत्थान और पतन से हमारे नेताओं की धुंधली और संकीर्ण दृष्टि का पता चलता है। अतः इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि इन निकायों में वास्तविक मधुमक्खी पालन से संबंधित व्यक्तियों को शामिल किया जाए।

समेकित तथा समग्र दृष्टिकोण की कमी

मधुमक्खी पालन एक बहुविषयी विज्ञान है जिसमें मधुमक्खी पालन, मधुमक्खियों का वनस्पति शास्त्र, मेलिसोपेलिनोलॉजी, परागण, आनुवंशिकी, मधुमक्खी प्रजनन, शहद रसायनविज्ञान, शहद तथा छत्ता उत्पादों का गुणवत्ता नियंत्रण, वन्य मधुमक्खियां, कीटविज्ञान, प्राणीविज्ञान, रोगविज्ञान, अभियांत्रिकी, विस्तार, प्रशिक्षण, सूचना-प्रौद्योगिकी, शहद का प्रसंस्करण और वितरण आदि जैसे विभिन्न व्यापक विषय शामिल हैं। इसे गलत ढंग से कीटविज्ञान का एक भाग माना जाता है। अब यही समय है कि मधुमक्खी पालन को सम्पूर्ण, समग्र तथा व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए उचित रूप से मान्यता दी जाए।

अलग-थलग काम करने वाली एजेंसियों के कार्यान्वयन का प्रभाव

मधुमक्खियां बहुत समन्वित जीव हैं और इनके नीति-निर्माताओं व कार्यान्वयन करने वाले व्यक्तियों को भी यह कला सीखनी चाहिए। राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर अनेक संगठन हैं लेकिन एक संगठन को यह ज्ञात नहीं है कि अन्य संगठन क्या कर रहे हैं। व्यापक संसाधनों, जनशक्ति तथा प्रयासों को एक साथ लाने व उनका समन्वयन करने से बड़े पैमाने पर उपलब्धि करने तथा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए सक्षम एक विशाल निकाय सृजित करने में सहायता मिलेगी।

शहद तथा अन्य उपकरणों पर शुल्क को समाप्त करना

यह आश्चर्य का विषय है कि हरियाणा जैसा कृषि प्रधान व प्रगतिशील राज्य शहद पर 4 प्रतिशत शुल्क लगाता है जो अंततः राज्य को बहुत थोड़ा राजस्व प्रदान करता है तथा यह घाटे का सौदा भी हो सकता है। राज्य में उत्पन्न होने वाले शहद इसके उत्पादन के रूप में नहीं किया जाता है, बल्कि यह पड़ोस के राज्य में व्यापारियों को बेच दिया जाता है। यह शुल्क तत्काल प्रभाव से समाप्त किए जाने की आवश्यकता है। इसी प्रकार, मधुमक्खी पालन के अन्य उपकरणों पर भी लगाये जाने वाले शुल्कको समाप्त किया जाना चाहिए।

आपदाओं के कारण कालोनियों को होने वाली क्षति की पूर्ति

मधुमक्खी पालकों को अब शहद के मौसम में उत्पादन असफल हो जाने तथा वर्षा, ओला वृष्टि, आग, बाढ़ और चोरी आदि जैसी आपदाओं के कारण बहुत क्षति हो रही है। सरकार किसानों को उनकी फसल को होने वाली हानि के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करती है, अतः मधुमक्खी पालकों को भी इसके अंतर्गत लाया जाना चाहिए। उपज में हुए नुकसान के संदर्भ में उत्पादकता को हुई क्षति की भी मधुमक्खी पालकों के लिए क्षतिपूर्ति की जानी चाहिए जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई अन्य देशों में किया जा रहा है। अमेरिका में ऐसा क्रांतिकारी फार्म बिल 2014 लाकर किया गया था।

मधुमक्खी पालकों का अनिवार्य पंजीकरण और बीमा

आग, चोरी, आदि जैसी आपदाओं से मधुमक्खी पालकों को राहत पहुंचाने के लिए उनका राज्य एसोसिएशन के साथ पंजीकरण किया जाना चाहिए तथा बीमा करना भी अनिवार्य होना चाहिए। सरकार को मधुमक्खी पालकों के लिए विशेष बीमा योजनाएं सुनिश्चित करनी चाहिए।

नीति संबंधी बाधाएं

क्षेत्रीय नीति का निर्धारण लक्षित समूहों को शामिल किए बिना किया जाता है तथा इसमें निर्यातकों के समूह का प्रभुत्व बहुत प्रभाव डालता है। इस क्षेत्र के लिए एक बृहत नीति बनाने की आवश्यकता है।

मधुमक्खी पालन को एक कानूनी कृषि गतिविधि मानना

मधुमक्खी पालन शत-प्रतिशत कृषिवानिकी आधारित गतिविधि है लेकिन इसे गलत रूप से अन्य व्यवसाय माना जाता है। कहा जाए तो यह उद्योग मंत्रालय द्वारा निष्कासित अनाथ तथा कृषि मंत्रालय द्वारा दुत्कारा गया व्यवसाय है जबकि वास्तव में यह इन्हीं दोनों संगठनों के अंतर्गत आता है। इसे सभी कानूनी उद्देश्यों से कृषि व्यवसाय घोषित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शहद या मधुमक्खी पालन नीति का अभाव

राज्य नीतियों द्वारा अपनाई जाने वाली राष्ट्रीय शहद/मधुमक्खी पालन नीति बनाने की तत्काल आवश्यकता है। यह मधुमक्खी पालक समुदाय द्वारा की जाने वाली लम्बे समय से लम्बित मांग है और इसका भावी स्वरूप मधुमक्खी पालन पर प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान केन्द्रीय कृषि मंत्रालय को 1993 में सुझाया गया था और इसके बाद अनेक अवसरों पर भी इसे बार-बार सुझाया गया है। यही समय है कि ऐसी समग्र नीति तैयार की जाए जिसमें उद्योग के सभी मार्गदर्शक सिद्धांत हों तथा वास्तविक कार्य योजना को शामिल किया गया हो। इसमें निम्न घटक भी होने चाहिए।

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन औषधि नीति

मधुमक्खियों के कीटनाशकजीवों तथा रोगों के उपचार के लिए कोई समरूप नीति न होने के कारण मधुमक्खी पालक सस्ती तथा गैर-अनुशंसित व अनैतिक उपचार की विधियां अपनाते हैं। इससे उत्पादन में औषधियों की लागत बढ़ जाती है और मिलावट शहद का उत्पादन होता है। उद्देश्यपूर्ण औषधि नीति को सभी पहलुओं जैसे संगरोध, अनुशंसित रसायनों के उपयोग, उनके समय व अनुप्रयोग की विधियों, प्रतीक्षा काल, पर्यवेक्षण प्राधिकारी आदि में शामिल किया जाना चाहिए।

जैविक शहद उत्पादन पर राष्ट्रीय नीति

हरियाणा को जैविक क्षेत्रों के रूप में चिहनित किया गया है और यहां प्रीमियम जैविक शहद उत्पन्न करने की बहुत क्षमता है जिसका नीति के अभाव में उपयोग नहीं हो पा रहा है।

हरियाणा के लिए वृहत तथा समेकित मधुमक्खी पालन योजना

हरियाणा के लिए वास्तविक तथा कार्यशील कार्य योजना के साथ समेकित मधुमक्खी पालन योजना आईबीपी तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है।

सरकार द्वारा मधुमक्खी पालन को प्राथमिकता का क्षेत्र घोषित करना

फसलों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने में मधुमक्खियों द्वारा की जाने वाली निस्वार्थ सेवा को महत्व देते हुए इसे देश का शीर्ष प्राथमिकता वाला क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए, परंतु दुर्भाग्य से मधुमक्खियां कृषि के निवेश के रूप में जैसी उक्ति का प्रयोग करने के अलावा सरकार द्वारा इस दिशा में बहुत कम प्रयास किए जा रहे हैं। हमारी सरकारों को इस दिशा में अधिक संवेदनशील होना चाहिए क्योंकि मधुमक्खी पालन सीधे-सीधे कृषि समुदाय से संबंधित है तथा यह कृषि आधारित उद्योगों को प्रभावित करता है।

विशेषज्ञों के संवर्ग  का सृजन

मधुमक्खी पालन के विभिन्न विषयों में रुचियों व क्षमता की पहचान करके तथा प्रगत प्रशिक्षणों व अनुभवों को शामिल करते हुए वैज्ञानिकों का एक संवर्ग  बनाने की तत्काल आवश्यकता है। इसी प्रकार का संवर्ग  अधिकारियों व मधुमक्खी पालकों के मामले में भी बनाया जाना चाहिए।

राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मधुमक्खी पालन पर अलग विभाग

जैसी कि चर्चा की जा चुकी है, कोई कीटविज्ञानी एक आदर्श मधुमक्खी पालन विशेषज्ञ नहीं हो सकता है, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों से लिए गए वैज्ञानिकों को शामिल करते हुए एक अलग कार्यशील मधुमक्खी पालन विभाग सृजित करने की आवश्यकता है।

विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना

चूंकि मधुमक्खियां हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष से संबंधित हैं अतः उन्हें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के विषयों में शामिल करना महत्वपूर्ण है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में भी पूर्व स्नातक स्तर पर मधुमक्खी पालन पाठ्यक्रमों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भी और अधिक पाठ्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।

जागरूकता में वृद्धि

मधुमक्खी पालन से यद्यपि मानवता को बहुत लाभ होता है लेकिन यह एक निम्न श्रेणी का उद्योग माना गया है। समाज के सभी वर्गों को, विशेष रूप से नेताओं, योजनाकारों तथा किसानों को परागण के लाभों के प्रति सजग किया जाना चाहिए तथा उपभोक्ताओं को शहद तथा इससे संबंधित अन्य उत्पादों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। ऐसा इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया, शहद उत्सवों व दिवसों, कार्यशालाओं, प्रवर्धनात्मक आयोजनों आदि द्वारा किया जा सकता है।

अनुसंधान संबंधी बाधाएं

अनुसंधान का प्राथमिकीकरण

राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मधुमक्खी पालन वैज्ञानिकों तथा अन्य सरकारी संगठनों के अथक और निस्वार्थ कार्य से भारत में मधुमक्खी पालन अपने शीर्ष पर पहुंच गया है। वर्तमान में, अनुसंधान प्राथमिकताएं शैक्षणिक रूप की अधिक हैं तथा मधुमक्खी पालकों तथा इस उद्योग के प्रति कम अभिमुख हैं। इस प्रकार, इनके पूर्ण पुनराभिमुखन की बहुत आवश्यकता है। कीटविज्ञानी परागण अनुसंधान में मुख्यत । व्यस्थ हैं (वनस्पतिविज्ञानी के बिना) लेकिन सस्यविज्ञानी विधियों के रूप में किसी भी फसल (सेब को छोड़कर) के मामले में उनके अनुसंधानों को खेतों में उचित रूप से नहीं अपनाया गया है। इससे संबंधित अर्थशास्त्र व कालोनी संबंधी आवश्यकताओं का अध्ययन करके उनकी स्थिति का पता लगाया जाना चाहिए। यहां तक कि परागण संबंधी अध्ययन पर भी अभी कम ध्यान दिया जा रहा है। इससे संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलू हैं : मधुमक्खियों व परागकों पर वैश्विक ऊष्मन का प्रभाव; यंत्रीकरण; छत्तों तथा मूल्यवर्धित उत्पादों पर अध्ययन, मधुमक्खियों का रोगोपचार, अपशिष्ट; रोग प्रतिरोध, मधुमक्खी प्रजनन, उचित उपकरणों का विकास आदि ।

मधुमक्खियों की बड़े पैमाने पर मृत्यु

नियोनैकोटिनॉइड जैसे नाशकजीवनाशियों तथा नए नाशकजीवों के कारण प्राथमिकतः सीसीडी (कालोनी कोलेप्स डिस्ऑर्डर) की वजय से अमेरिका तथा यूरोपीय यूनियन में 50 प्रतिशत से अधिक कालोनियों के नष्ट होने से मधुमक्खियों की मृत्यु चिंताजनक स्तर की एक वैश्विक समस्या बन गई है। वार्षिक शरद तथा ग्रीष्म ऋतु में यह मृत्यु क्रमशः 30 और 12.5 प्रतिशत तक होती है। सीसीडी भारत में पहुंचेगा तथा हम फिर से कम प्राथमिकताओं के कारण इस संबंध में सचेत नहीं हो पाएंगे।

मधुमक्खी पालन एक मिशनरी कार्य के रूप में

मधुमक्खी पालन मात्र प्रातः 9.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक किया जाने वाला कार्य नहीं है। बल्कि यह एक मिशनरी फील्ड कार्य है। यही कारण है कि वैज्ञानिक तथा अन्य फील्ड कर्मी इसे सबसे कम प्राथमिकता देते हैं। उन्हें इसके लिए विशेष प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए और यदि हमें इस संबंध में परिणाम प्राप्त करने हैं तो उन्हें कार्य करने के समय की आजादी भी दी जानी चाहिए।

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन संस्थान (एनबीआई)

किसी देश या उद्योग की सफलता उसके वैज्ञानिक संस्थानों से मापी जाती है। यह चिंता का विषय है कि भारत में अब भी सीबीआरटीआई, पुणे को छोड़कर मधुमक्खी पालन से संबंधित राष्ट्रीय स्तर का कोई अन्य संस्थान नहीं है। जर्मनी में मधुमक्खी पालन के 18 संस्थान हैं।

मधुमक्खी प्रजनन

यह आनुवंशिकी का परम आवश्यक लेकिन पूर्णतः उपेक्षित पहलू है। मधुमक्खी पालन को भारत में मधुमक्खी पालन विशेषज्ञों द्वारा भी प्रायोगिक स्तर पर नहीं अपनाया जा रहा है। तथापि, किसी अन्य प्रयोगशाला में मधुमक्खी प्रजनन पर कार्य आरंभ हो चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को नाशकजीवनाशी प्रतिरोधी नस्लें तथा उच्च उत्पादक वंशक्रम विकसित करने के कार्य को उच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। मधुमक्खी पालकों को मक्खियों के और अधिक प्रगुणन तथा महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अंतर्गत वितरण के लिए नाभिक स्टॉक उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

वन्य मधुमक्खियों पर अनुसंधान

भारत मधुमक्खियों की दो प्रजातियों शैल मधुमक्खियों तथा बौनी मधुमक्खियों का मूल स्थान है। इनमें से पहली शहद व परागण का सबसे बड़ा स्रोत है। भारत में इन प्रजातियों में तेजी से होने वाली कमी के कारणों पर बहुत कम व्यावहारिक अनुसंधान किया जा रहा है।

मधुमक्खी प्रजनकों की दक्षता में सुधार

बड़े पैमाने पर रानी मधुमक्खी के पालन की प्रगत प्रणाली व प्रौद्योगिकी के विकास के लिए इससे संबंधित योजना में सुधार हेतु निम्न बिंदु सुझाए जा रहे हैं

  1. मधुमक्खी प्रजनकों का चयन - जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है, चयन प्रक्रिया पर पुनः कार्य करने की तत्काल आवश्यकता है। वैज्ञानिक मानदंडों के आधार पर सक्षम मधुमक्खी पालकों को फिर से चुना जाना चाहिए।
  2. राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के मधुमक्खी प्रजनकों से उच्च वंशावली सामग्री को प्राप्त करना
  3. विशेषज्ञतापूर्ण उपकरणों तथा बुनियादी ढांचे के लिए अनुदान का प्रावधान - एक बार जब नए प्रजनक का चयन हो जाता है तो उन्हें विशेषज्ञतापूर्ण उपकरण खरीदने तथा बुनियादी ढांचे के लिए एकमुश्त अनुदान दिया जाना चाहिए।
  4. संसाधनों का उचित उपयोग - इसके पहले भी राज्य सरकार ने इन मधुमक्खी पालकों को तकनीकी उन्नयन के लिए एक बार एकमुश्त अनुदान दिया था लेकिन इसमें कोई सुधार नहीं दिखाई पड़ता है। अतः इसके स्थान पर वास्तविक घटकवार अनुदान पैटर्न बनाया जाना चाहिए तथा इसकी निगरानी व कार्यान्वयन की स्थिति पर निरंतर निगरानी रखते हुए उसका पता लगाया जाना चाहिए।
  5. मधुमक्खी पालकों को गहन प्रयोगात्मक प्रशिक्षण - बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन, मधुमक्खी के युग्मन आदि से संबंधित तकनीकों पर प्रशिक्षण देकर मधुमक्खी पालकों के ज्ञान को अद्यतन बनाना चाहिए। ऐसा राज्य सरकार की लागत पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मामलों में आवश्यक है।
  6. योजनाओं की नियमित निगरानी - जिन सेवाओं के लिए उन्हें भुगतान किया जा रहा है, उन सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम व्यक्ति/ दल द्वारा नियमित अंतराल पर मधुमक्खी प्रजनकों तथा उनकी कालोनियों को चिहिनत करने, प्रलेखित करने व सत्यापन करने के संबंध में उचित क्रियाविधियां विकसित की जानी चाहिए।

योजनाओं की उचित निगरानी व मूल्यांकन

उद्योग की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए पुनः वितरण तथा जाली वितरण की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता और इस प्रणाली को अचूक बनाने के लिए तत्काल उचित कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

परियोजना पैटर्न के उन्नयन की आवश्यकता

मधुमक्खी पालक सामान्यतः सीमांत व कमजोर (आर्थिक रूप से) वर्ग के होते हैं और अनेक वित्तीय सरकारी संसाधनों के स्रोत मौजूद हैं (डीआरडीए, एनएचएम व अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष खंड की योजनाएं), जबकि कुछ अन्य संगठन जैसे केवीआईसी, केवीआई मंडल, राष्ट्रीय बागवानी मंडल आदि ऐसे हैं जो परियोजना आधारित हैं। निर्धन तथा कम संसाधनों वाले व्यक्ति के लिए परियोजना बनाना और उसके लिए धनराशि प्राप्त करना बहुत कठिन है। वास्तविक लाभार्थियों की वित्तीय दशाओं को सुधारने के लिए निम्न उपाय सुझाए जाते हैं -

  • योजनाओं के बारे में सूचना को सार्वजनिक रूप से बहुत कम प्रदर्शित किया जाता है और अब भी ये योजनाएं पूर्णतः या आवश्यकता से अधिक अनुदानित हैं।
  • परियोजना के घटकों तथा आवश्यकताओं की समरूपता के बारे में अभी अत्यधिक तथा आवास्तविक विविधताएं हैं।
  • यहां तक कि मधुमक्खी पालन भूमिहीन व्यवसाय है। इसके बावजूद भी भूमि को पट्टे पर देने संबंधी समझौते में अनेक अवास्तविक व अव्यवहारिक शर्ते रखी जाती हैं (एनएचबी में)।
  • परियोजनाओं की सतत निगरानी तथा उन पर अनुवर्ती कार्रवाई की जानी आवश्यक है।
  • पूरे उन्नयन के दौरान परियोजनाओं के लिए वित्तीय पैटर्न की आवश्यकता है।

मानव संसाधन विकास

उद्योग के प्रत्येक क्षेत्र में प्रशिक्षण की आवश्यकता है लेकिन प्रश्न यह है कि यह कहां और किसके द्वारा दिया जाए।

मधुमक्खी पालक

मधुमक्खी पालकों को सामान्यतः राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, एचटीआई आदि द्वारा चलाए जाने वाले 3 दिवसीय सामान्य मधुमक्खी पालन पाठ्यक्रम पर प्रशिक्षण दिया जाता है जहां उन्हें बहुत कम प्रयोगात्मक कार्य कराते हुए मधुमक्खी पालन की मूल अवधारणाओं के बारे में ही सिखाया जाता है। इस पाठ्यक्रम से उन्हें वह प्रमाण-पत्र प्राप्त होता है जो केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के अंतर्गत अनुदानित दरों पर मधुमक्खियों की कालोनियों को खरीदने की एक अनिवार्य पूर्व शर्त है। कुछ श्रेणीकृत प्रशिक्षण पाठ्यक्रम सीवीआरटीआई व कुछ अन्य स्थानों पर चलाए जा रहे हैं। इन आवश्यकता पर आधारित (कस्टमाइज्ड) प्रशिक्षणों को अधिक व्यावहारिक प्रयोगात्मक घटक शामिल करके इनकी अवधि तथा कार्य क्षेत्र को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है। ये कार्य संचालित तथा निजी क्षेत्र द्वारा ग्रहण किए जाने के लिए तैयार होने चाहिए।

वैज्ञानिक

वैज्ञानिक आत्ममुग्ध होते हैं और उन्हें यह विश्वास होता है कि प्रशिक्षक होने के नाते उन्हें सभी कुछ ज्ञात है। आत्म विश्लेषण करने पर कोई भी सच्चा वैज्ञानिक यह जान जाएगा कि उसे वास्तविक मधुमक्खी पालन के बारे में वास्तव में कितना कम ज्ञान है। अतः भारत में वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिकों के कौशल को समय-समय पर अद्यतन करने की तत्काल आवश्यकता है लेकिन यहां मधुमक्खी पालन के लिए श्रेष्ठता का कोई केन्द्र नहीं है।

कार्यान्वयन एजेंसियां

संबंधित व्यक्तियों/मधुमक्खी पालकों को परियोजना तैयार करने, मूल्यांकन, कार्यान्वयन व निगरानी के विभिन्न पहलुओं पर समपूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त करने की आवश्यकता है। उन्हें प्रयोगात्मक मधुमक्खी पालन के बारे में व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत है क्योंकि यह अन्य शाखाओं/उद्योगों से परिचालन की दृष्टि से पूरी तरह भिन्न गतिविधि है।

प्रौद्योगिकी बाधाएं

पश्चिमी देशों तथा भारत में मधुमक्खी पालन बिल्कुल भिन्न है। पश्चिमी देशों के मधुमक्खी पालक वैज्ञानिक तकनीकों तथा मानकीकृत उपकरणों को अपनाते हैं जबकि भारतीय मधुमक्खी पालक लागत को कम करने को प्राथमिकता देते हैं। भारत में शहद प्रसंस्करण व पैकेजिंग को छोड़कर मधुमक्खी पालन में आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग बहुत कम किया जाता है। कुछ तकनीकी बाधाओं का जिक्र यहां किया जा रहा है

मधुमक्खी पालन उद्योग में आने वाली बाधाओं का विश्लेषण

मधुमक्खी पालन सूचना केन्द्र

मधुमक्खी पालन की शुरूआत करने वाले किसी व्यक्ति के लिए सबसे पहला चरण मधुमक्खी पालन, इसके लाभों, अर्थशास्त्र, व्यावहारिकता, परियोजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करना है। इस उच्च प्रौद्योगिकी वाले विश्व में भी समस्त सूचना एक स्थान पर उपलब्ध नहीं है। किसी संभावित मधुमक्खी पालक को अलग-अलग स्थानों से संबंधित सूचनाएं प्राप्त करनी पड़ती हैं।

संचार चैनल

मधुमक्खी पालक गैर परंपरागत संचार साधनों से सूचना प्राप्त करते हैं तथा अपने साथी मधुमक्खी पालकों से वह सूचना छुपाते हैं क्योंकि वांछित सूचना सार्वजनिक डोमेन पर उपलब्ध नहीं है।

वेब साइट

मधुमक्खी पालन पर कोई भारतीय वेबसाइट उपलब्ध नहीं है तथा विदेशी वेबसाइटों पर उपलब्ध विषय-वस्तु भारतीय दशाओं के प्रति पूरी तरह अनुकूल नहीं है। कार्यान्वयन एजेंसियों के पोर्टल में केवल मात्र सूचना दिखाई देती है, जिसका प्रचार-प्रसार तो कम होता है और इसे छिपाया अधिक जाता है।

कालोनियों के स्रोत

मधुमक्खी पालन उद्यम की शुरूआत करने के लिए हमें श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली मधुमक्खी कालोनियों का स्रोत खोजेन की आवश्यकता होती है और ऐसी सूचना किसी स्रोत पर उपलब्ध नहीं है, भले ही सरकार ने इन स्रोतों को स्वीकृति प्रदान कर रखी है।

गुणवत्तापूर्ण उपकरण

यह अत्यंत चिंता का विषय है कि वर्तमान में 99.99 प्रतिशत मधुमक्खी के छत्तों में गैर मानक सामग्री (लकड़ी के बक्सों) तथा अन्य उपकरणों का उपयोग होता है। प्रयुक्त लकड़ी खराब होती है। और छत्तों के लिए बक्सों का निर्माण भी दोषपूर्ण होता है। ये गंदे बक्से मधुमक्खियों की अनेक बीमारियों तथा उनके पाए जाने वाले दोषों का मुख्य कारण हैं।

पुराने छत्तों का नवीकरण न होना

कालोनियों में अधिकांश छत्ते छोटे कोशिका स्थान से युक्त लगभग काले पड़ गए होते हैं। जिससे कामगार मक्खियों का आकार छोटा हो जाता है।

सुपर तथा रानी एक्सक्लुडर

रानी एक्सक्लूडर का उपयोग करके सुपर से शहद निकालने की सर्वश्रेष्ठ विधि अपनाना भारत तथा हरियाणा में लगभग असामान्य है और केवल 0.17 प्रतिशत सुपर ही हैं। सुपर को वास्तव में अतिरिक्त प्रवेश सूची माना जाता है तथा मधुमक्खी पालक उनसे कार्य करना कठिन समझते हैं। सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता का शहद प्राप्त करने के लिए इस प्रक्रिया को पलटने की तत्काल आवश्यकता है।

गुणवत्तापूर्ण रानियों की उपलब्धता

रानी किसी कालोनी की जीवन रेखा है। हरियाणा में श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली व अधिक प्रजनन करने वाली मधुमक्खियों की रानी को बड़े पैमाने पर पालने की संकल्पना की कमी है। मधुमक्खी कालोनियों की उत्पादकता व उत्पादन में सुधार के लिए श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली रानियों की बड़े पैमाने पर उपलब्धता अनिवार्य की जानी चाहिए जिसके लिए अमेरिका से गुणवत्तापूर्ण जननद्रव्य प्राप्त किया जा सकता है।

भावी प्रौद्योगिकियों को अपनाने की आवश्यकता

वास्तविक समय की परागण सेवा का दृष्टिकोण (आरटीपीएसए)

सरकार फसलों/उत्पादों के घटते हुए उत्पादन/उत्पादकता तथा गुणवत्ता के बारे में चिंतित है लेकिन इस दिशा में वास्तव में अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। हिमाचल प्रदेश में सेब की फसल को छोड़कर (वह भी किसान-मधुमक्खी पालकों की पहल पर आधारित है) किसानों तथा मधुमक्खी पालकों के बीच अभी तक कोई ठेके पर परागण सेवा का प्रावधान नहीं किया गया है, जबकि पूरे विश्व में यह एक वैश्विक संकल्पना है।

मधुमक्खी छत्तों की पहचान तथा उन पर नजर रखना

मधुमक्खी पालन की प्रवासी प्रकृति होने के कारण किसी अनुदानीकृत कालोनी वितरण प्रणाली की मूल आवश्यकता मधुमक्खी छत्तों को चिनित करना, मधुमक्खियों की गतिविधि पर नजर रखना तथा काल और स्थान के अनुसार उनकी निगरानी करना है। यह एक ऐसा पहलू है। जिस पर अब तक कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। ऐसी प्रणाली न होने के कारण जाली छत्तों के वितरण तथा उनके पुनः परिचालन की बहुत संभावना रहती है। न केवल मधुमक्खी के छत्तों की वैज्ञानिक कोडिंग प्रणाली से स्थायी रूप से ब्रांडिंग करने का प्रभावी उपाय विद्यमान है बल्कि मोहर लगाकर इसके भागों का भी स्थायी ब्रांडिंग (स्वयं किसानों के द्वारा) किया जा सकता है। लाभार्थियों तथा मधुमक्खी प्रजनकों के मधुमक्खी के छत्तों पर नजर रखने के उचित उपाय अपनाते हुए नजर रखी जा सकती है।

यंत्रीकरण - भारतीय मधुमक्खी पालन मुख्यतः ऐसे श्रमिकों पर निर्भर है जो अशिक्षित हैं तथा इनकी हमेशा कमी बनी रहती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान श्रम की लागत दुगुनी हो गई है। खंडीकृत यंत्रीकरण के बिना भविष्य में मधुमक्खी पालन उद्यम को चलाना कठिन हो जाएगा। प्रवासन, मधु या शहद निकालने, शहद के परिवहन, औषधियों के उपयोग, भोजन आदि के क्षेत्र में अर्ध या पूर्ण यंत्रीकरण किए जाने की आवश्यकता है।

एचटीआईबीएस दृष्टिकोण के माध्यम से मधुमक्खी पालन को एक उच्च व्यवसाय वाले उद्यम में बदलना

मधुमक्खियां सर्वाधिक विशेषज्ञतापूर्ण व व्यावसायिक जीव हैं लेकिन भारत में यह उद्यम सर्वाधिक अव्यावसायिक विधियों से चलाया जा रहा है। कालोनी के निरीक्षण, औषधियां देने, सर्वेक्षण, मधुमक्खियों पर नजर रखना, प्रमाणीकरण, रानी मधुमक्खी पालने, छत्ते के उत्पादों (पराग, प्रापलिस आदि) के संकलन/परिरक्षण, अनुगमनशीलता या ट्रेसेबिलिटी आदि के क्षेत्र में व्यावसायिक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए उच्च तकनीक की समेकित मधुमक्खी पालन प्रणाली (एचटीआईबीएस) की आवश्यकता है, ताकि समरूपता (समय,विधियों, रसायनों आदि में) तथा दक्षता को बनाए रखा जा सके। केन्द्रीकृत निगरानी प्रणाली में बहुत वाणिज्यिक क्षमता है। कुछ समर्पित व प्रशिक्षित व्यवसायविदों का एक दल हरियाणा जैसे राज्य में शुरू से अंत तक ऐसे सभी प्रकार के कार्यों को प्रभावी ढंग से कर सकता है और यहां तक कि बहुत कम लागत पर यह राष्ट्रीय स्तर पर भी किया जा सकता है।

समेकित प्रणाली का उपयोग करके मधुमक्खी पालन शाला का रिकॉर्ड रखना

मधुमक्खी कालोनियां तथा मधुमक्खी पालन शालाएं इतनी गतिशील हैं कि इनका भाग्य मात्र एक सप्ताह में बदल सकता है। उचित रिकॉर्ड रखने से दैनिक तथा मौसमी योजना बनाने में सहायता मिलती है। मधुमक्खी पालकों द्वारा अभी तक कोई परिचालन संबंधी रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है। आश्चर्यजनक यह है कि यहां तक कि अनुसंधानकर्ताओं व विकसित मधुमक्खी पालन शालाओं के मामले में भी सामान्यतः ऐसे रिकॉर्ड नहीं रखे जा रहे हैं। मुख्यतः वैज्ञानिक कार्य के लिए कालोनी वृद्धि संबंधी प्राचलों के अनेक विवरण बार-बार दोहराए जाते हैं जिससे मधुमक्खी पालकों को बहुत कम मदद मिलती है। लेखक ने स्टॉक लेने, कालोनी के निरीक्षण तथा किसी मधुमक्खी पालन शाला के लिए परामर्शक रिपोर्ट तैयार करने की एक अनोखी प्रणाली विकसित की है जो एसटीसीआईएआरएस कहलाती है जिसमें सम्पूर्ण स्टॉक रिकॉर्ड करने, बेतरतीब नमूना कालोनी निरीक्षण और उसके पश्चात् मूल्यांकन तथा परामर्श रिपोर्ट तैयार करने जैसी क्रियाएं शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तथा मधुमक्खी फसलों का निरंतर असफल होना

वैश्विक ऊष्मन तथा मौसम संबंधी अन्य कारकों का पौधों तथा मधुमक्खियों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है जिसके परिणामस्वरूप सफेदा, रूबिनिया, पहाड़ी कीकर, डलबर्जिया सिसु, लीची, एकेशिया कटेचु, बेर, प्लेक्ट्रेंथस रुगोसस, अरहर, धनिया और सबसे महत्वपूर्ण सरसों जैसी फसलें हाल के वर्षों में या तो पूर्णतः या आंशिक रूप से असफल रही हैं। इससे मधुमक्खी पालन एक हानिप्रद उद्यम बन गया है। एमआईएस आधारित समेकित दो प्रणालियों को मधुमक्खी पालकों द्वारा योजना बनाने तथा उनकी गतिविधियों में समन्वयन लाने के लिए अग्रिम रूप से अपनाया जा सकता है जो इस प्रकार हैं-क्षेत्रवार फसलों तथा घनत्वों की प्रगत सूचना प्रणाली (आईएसएफएमएमपी)

ग्राम स्तर पर मधुमक्खियों के लिए अनुकूल फसलों के फसलन घनत्वों के बारे में वेब आधारित सूचना प्रबंध प्रणाली की तत्काल आवश्यकता है, ताकि फसलों का उपयुक्ततम परागण सुनिश्चित करने के लिए मधुमक्खी पालकों हेतु पहले से प्रवासन की योजना तैयार की जा सके। वर्तमान में फसलों का या तो अत्यधिक कम उपयोग हो रहा है या बहुत अधिक उपयोग हो रहा है। जिसके परिणामस्वरूप दोनों ही स्थितियों में संसाधनों की बर्बादी हो रही है।

मौसम पूर्वानुमान प्रणाली (डब्ल्यूएफबीओएएस)

हाल ही में मधुमक्खी पालन पूरी तरह मौसम पर निर्भर उद्योग बन गया है। राज्य/देश के विभिन्न मधुमक्खी पालन क्षेत्रों के लिए समेकित मौसम पूर्वानुमान व मधुमक्खी पालन संबंधी कार्यों व परामर्श सेवा (डब्ल्यूएफबीओएएस) मधुमक्खी पालकों को समय पर संबंधित कार्य करने के लिए दिशानिर्देश प्रदान कर सकता है ताकि उनकी उत्पादकता सर्वोच्च हो सके और कालोनियों की सुरक्षा भी की जा सके।

रोग सर्वेक्षण, पूर्वानुमान, निदान तथा प्रबंध प्रणाली (डीएसएफडीएमएस)

भारत में मधुमक्खियों के समक्ष अनेक संकट हैं जैसे थाई सैक झुण्ड विषाणु - एपिस कैराना के लिए तथा ए. मेलिफेरा पर वैरोआ डिस्ट्रिक्टर द्वारा फैलने वाली महामारी भारतीय वैज्ञानिकों को सीसीडी (कालोनी कोलेक्स डिस्ऑर्डर), नियोनिकोटिनॉइड कीटनाशियों आदि जैसी आपदाओं के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि ये आपदाएं अन्य कई देशों में रिपोर्ट की जा चुकी हैं। यह सुझाव दिया जाता है कि राज्यवार शाखाओं तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ एक केन्द्रीय समन्वित प्रणाली स्थापित की जाए।

रोग नैदानिक प्रयोगशाला की तत्काल स्थापना करना।

उच्च योग्यता प्राप्त रोग निदानी अधिकारी/निरीक्षक नियुक्त करना।

कालोनी को हुए नुकसान को हुए सर्वेक्षण

हानियों के कारण तथा उसकी मात्रा का पता लगाने के लिए हितधारकों के सम्पर्क में मधुमक्खी कालोनियों का आवधिक सर्वेक्षण किया जाना चाहिए।

प्रशिक्षित व्यक्तियों का संवर्ग

मधुमक्खी पालकों की मधुमक्खी पालन शालाओं की यदि तीन से अधिक इकाइयां हैं तो निष्कर्षों तथा सिफारिशों को लागू करने के लिए व्यवसाय विदों का एक सशक्त तकनीकी संवर्ग  बनाया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन औषधि नीति बनाई जाये।

शहद उत्पादन, मूल्यवर्धन, विविधीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण

शहद की गुणवत्ता में गिरावट

वर्तमान में उत्पन्न होने वाले शहद की गुणवत्ता वास्तव में चिंता का विषय है क्योंकि इसमें एंटीबायोटिक्स, सीसे आदि की मिलावट पायी जा रही है। इसके कुछ कारण झुण्ड कोष्ठों से, न कि सुपर से कच्चे शहद को निकालना (99.99%); टीन के पात्रों में भंडारण (यद्यपि प्लास्टिक की बाल्टियों का उपयोग शुरू किया गया था, लेकिन बाद में इसे लगभग बंद कर दिया गया); गलत विधियों तथा समय का उपयोग करते हुए गैर-अनुशंसित रसायनों का उपयोग; निम्न उत्पादन आदि हैं। यद्यपि नजर रखने की प्रणाली मौजूद है लेकिन अक्सर इसका उपयोग नहीं होता है। अधिकारियों, वैज्ञानिकों तथा विस्तार कर्मियों को सदैव सावधान रहना चाहिए, ताकि भारत से शहद के निर्यात के किसी नकारात्मक प्रभाव से बचा जा सके।

मिलावटी तथा नकली शहद

मधुमक्खी पालक, विशेषकर व्यापारी शहद में चीनी की मिलावट करते हैं, ऐसी रिपोर्टे बड़े पैमाने पर मिलती हैं। इसके परिणामस्वरूप भारतीय बाजारों में नकली/घटिया शहद का आयात भी हो रहा है जो घातक सिद्ध हो सकता है और पूर्णतः निर्यात अभिमुख यह उद्यम पूरी तरह समाप्त हो सकता है। हाल ही में इनवर्ट/कॉर्न चासनी आदि के बड़े पैमाने पर आयात की रिपोर्टें मिली हैं। जिससे यह भय है कि इसका उपयोग शहद उद्योग में हो सकता है। इस दिशा में सरकार द्वारा तत्काल कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।

निर्यात तथा घरेलू बाजार

जो शहद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के मानकों को पूरा करता है उसे मुख्यतः अमेरिका, यूरोपीय यूनियन तथा मध्य पूर्व के देशों में निर्यात किया जाता है और शेष जो शहद घरेलू शहद संबंधी मानकों (अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप) को पूरा करता है उसे घरेलू बाजार में बेचा जाता है। भारतीय उपभोक्ताओं को ऐसे जोखिम में नहीं डाला जा सकता है तथा सरकार को इस दिशा में तेजी से और निर्णायक ढंग से कार्य करना होगा।

शहद परीक्षण प्रयोगशाला

भारतीय शहद में बड़े पैमाने पर होने वाले मिलावट के कारण इसका आयात करने वाले देशों में निर्यात किए जाने पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि इन देशों की मिलावट के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति है। इस प्रकार के मिलावट के विश्लेषण के लिए अत्याधुनिक परीक्षण सुविधाओं का होना आवश्यक है जिनकी लागत लगभग 15 करोड़ रुपये है और इसके अतिरिक्त इनके लिए प्रशिक्षित जनशक्ति व परिचालन लागत आदि का व्यय और करना पड़ता है। भारत में कोई प्रत्यायित शहद परीक्षण प्रयोगशाला नहीं है तथा सभी नमूनों को विश्लेषण व निर्यात प्रमाणीकरण के लिए जर्मनी भेजना पड़ता है। यह न केवल अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है बल्कि आर्थिक रूप से बहुत महंगी भी है जिसमें प्रति नमूना लगभग 20,000/-रु. की लागत आती है। यह परम आवश्यक है कि सरकार द्वारा नाममात्र के प्रभार पर परीक्षण सुविधाओं से युक्त एक केन्द्रीकृत परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की जाए।

विविधीकरण

इसकी अत्यंत संभावना विद्यमान है और यह वर्तमान समय की आवश्यकता भी है क्योंकि इस व्यवसाय में होने वाला लाभ कम होता जा रहा है तथा अब यह जरूरी है कि मधुमक्खी छत्ता उत्पादों (रॉयल जैली, पराग, मधुमक्खी के विष, प्रापलिस आदि), विनिर्माण (उपकरणों व औजार), विपणन (शहद); मूल्यवर्धित उत्पादों (शहद तथा छत्ता उत्पादों), अनुसंधान, परागण (उच्च तकनीकी व उच्च मूल्य वाली फसलों, बाड़ों, सामान्य फसलों), मधुमक्खी पालन (विशेषज्ञीकृत, मधुमक्खियों के उपचार, आयुर्वेदिक/प्राकृतिक चिकित्सा व फार्मेसिटिकल, परिवहन (प्रवासन), खाद्य उद्योग, कांफेक्शनरी/ बेकरी, सौंदर्य प्रसाधन उद्योग आदि से संबंधित पूरे-पूरे अनेक उद्योग स्थापित किए जाएं। किसी अन्य उद्योग में इतने प्रकार के स्वतंत्र विविध उत्पादों को तैयार करने व उनके विविधीकरण की क्षमता नहीं है।

विशेषज्ञतापूर्ण छत्ता उत्पादों का उत्पादन

मधुमक्खी पालन को वास्तव में टिकाऊ और लाभप्रद बनाने के लिए इसके उत्पादन का प्रसंस्करण, भंडारण व विपणन को समीचीन बनाना बहुत जरूरी है। इसके लिए रॉयल जैली, पराग, प्रापलिस, मधुमक्खी विष आदि जैसे छत्ता उत्पादों को उपयोग में लाया जाना चाहिए। ये अत्यंत कौशलपूर्ण पहलें हैं जिनमें निर्यात की बहुत क्षमता है। जैसा कि मधुमक्खी प्रजनकों के लिए पहले प्रस्तावित किया जा चुका है, विशेषज्ञतापूर्ण प्रशिक्षणों, विशेषज्ञतापूर्ण उपकरणों व ढांचे संबंधी पैकेज के अलावा विपणन संबंधी सहायता को उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है।

बाजार संबंधी बाधाएं

मधुमक्खी का बाजार असंगठित है तथा यह मुख्यतः निर्यात पर निर्भर है। यह मुख्यतः विशेषज्ञतापूर्ण क्षेत्र है और इसकी देखभाल व साज-संभाल केवल व्यवसायविदों द्वारा की जानी चाहिए। परंपरागत उत्पादों के लिए उत्पादन का मार्जिन 200 प्रतिशत से अधिक हो सकता है और विशेषज्ञतापूर्ण उत्पादों के लिए तो यह और भी ज्यादा हो सकता है। वर्ष 1993 में इसकी खपत 25.6 ग्रा. प्रति व्यक्ति हुई जो इससे पहले 8.4 ग्रा./व्यक्ति थी। इस प्रकार भारत में शहद की घरेलू खपत में बहुत तेजी से वृद्धि देखी गई है।

विपणन संबंधी उद्यम

अनेक कंपनियों (हनी बी नेचुरल प्रोडक्ट्स, कश्मीर एपाइरीस आदि) द्वारा श्रेष्ठ उत्पादों के विकास के अनेक उदाहरण हैं जो आगे चलकर दोषपूर्ण विपणन नीतियों के कारण असफल हो गए। इसके विपरीत भारत में सीबीआरटीआई पुणे में खोले गए प्रथम शहद पार्लर और केवीआईसी में शहद विपणन नेटवर्क के अंतर्गत हनी हट जैसे प्रयास सफल विपणन के उदाहरण सिद्ध हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए निर्यातकों द्वारा और इसके साथ ही भारतीय विपणन श्रृंखलाओं में निजी लेबलीकरण के द्वारा कई सफल प्रयास किए गए हैं।

बृहत विपणन नीति तथा शहद व मूल्यवर्धित उत्पादों के लिए सहायता

मधुमक्खी पालक गरीब वर्ग के हैं और अनेक कारकों जैसे निम्न उत्पाद बनाए रखने की क्षमता, पूंजी का अभाव, ज्ञान की कमी के कारण वे अपने उत्पाद को बाजार में बेचने में अक्षम रहते हैं। और इस प्रकार अब ये धीरे-धीरे मौसमी उपभोग के पैटर्न की दिशा में मुड़ रहा है। फसल पूर्वानुमान, प्रवृत्तियों, मूल्यों, खरीद, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, विज्ञापन, जागरूकता, बिक्री आदि के स्तर से एक वृहत सहायता प्रणाली की तत्काल आवश्यकता है जिसमें सरकार, मधुमक्खी पालकों, शहद निर्यातकों आदि को शामिल किए जाने की जरूरत है, ताकि मधुमक्खी पालकों के हित की रक्षा की जा सके। इस क्षेत्र में वास्तविक भूमिका निजी उद्यमियों द्वारा निभाई जानी है। सरकार अधिक से अधिक बुनियादी ढांचा व नीतिगत सहायता उपलब्ध करा सकती है। शहद के मूल्य आजकल उत्पादन (घरेलू और अंतरराष्ट्रीय), मांग, निर्यात संबंधी आदेशों, शहद निर्यातकों की पूल करने की कार्यनीतियों आदि द्वारा संचालित होता है।

मधुमक्खियों से संबंधित पौधों, परागकों व उनके आवासों का संरक्षण

विकासशील देशों में अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त करने से संबंधित एक वैश्विक समस्या परागकों की तेजी से घटती हुई संख्या के प्रत्युत्तर में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से युक्त एक सम्पूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की है। इससे शहद की उत्पादकता को संकट उत्पन्न हो रहा है और यहां तक कि अनेक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलों का अस्तित्व बनाए रखना कठिन होता जा रहा है।

वन्य मधुमक्खियों का संरक्षण

सबसे अधिक संकट मधुमक्खियों की शैल मक्खी तथा बौनी मक्खी प्रजातियों को है जिनकी संख्या चिंताजनक स्तर पर कम होती जा रही है तथा इन प्रजातियों के संरक्षण के कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

मधुमक्खियों के पौधों का प्रवर्धन और संरक्षण

वनों (सामाजिक वानिकी), शोभाकारी स्थलों, बंजर भूमियों आदि में पूर्णतः काष्ठीय/ इमारती लकड़ी की प्रजातियों की तुलना में मधुमक्खियों से संबंधित पौधों को अतिरिक्त प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके लिए वन, बंजर भूमि, पर्यावरण, कृषि और ग्रामीण विकास आदि जैसे विभागों के बीच अधिक समन्वयन की आवश्यकता है।

मधुमक्खी पालकों द्वारा सरकारी फार्मों/भूमि के उपयोग की अनुमति

वर्तमान में मधुमक्खी पालन के लिए सरकार के वनों, रोपण व फार्म भूमि के व्यापक क्षेत्र के उपयोग (पुष्पन मौसम के दौरान अस्थायी रूप से) के लिए कोई नीति नहीं है। इससे बहुमूल्य संसाधनों की बर्बादी हो रही है और जैव-विविधता को समृद्ध बनाने में बाधा उत्पन्न हो रही है। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि असीम बाधाओं का सामना करने के बावजूद भी मधुमक्खी पालन में न केवल भारतीय ग्राहकों की मांग को पूरा करने की क्षमता है बल्कि उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाकर इससे विश्व की मांग को भी पूरा किया जा सकता है। तथापि, इसके लिए पोषणिक दृष्टि से सटीक अनुकूल व सुगम मार्ग अपनाना होगा। जो मुख्य वस्तु चाहिए वह इस दिशा में थोड़ा अधिक ध्यान देना है तथा यह देखना है कि मानवता के इस सर्वाधिक श्रेष्ठ मित्र का हम उसकी भलाई के लिए किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।

मधुमक्खी पालन उद्योग के विकास में आने वाली बाधाएं

हरियाणा राज्य में मधुमक्खी पालन उद्योग के विकास में आने वाली प्रमुख बाधाएं निम्नानुसार हैं-

  1. मधुमक्खी पालन की विशाल क्षमता का पर्याप्त दोहन न होना।
  2. निम्न प्राथमिकता का क्षेत्र - मधुमक्खी पालन को शैक्षणिक संस्थाओं तथा सरकारी स्तर पर उचित मान्यता नहीं प्रदान की गई है।
  3. मधुमक्खियों के नाशकजीवों और रोगों के निदान, बचाव व नियंत्रण तथा उनके प्रबंध के लिए पर्याप्त प्रयोगशालाओं की कमी।
  4. निर्वनीकरण तथा पुष्पीय संसाधनों का कम हो जाना।
  5. मधुमक्खी कालोनियों के प्रवासन में आने वाली कठिनाइयां ।
  6. एपिस मेलिफेरा के गुणवत्तापूर्ण नाभिक स्टाक का कमी।
  7. मधुमक्खी पालकों को आपूर्ति के लिए आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ रानी मक्खियों को बड़ी मात्रा में उत्पन्न करने हेतु तृणमूल स्तर पर और इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बुनियादी ढांचे की कमी।
  8. किसानों/मधुमक्खी पालकों को वैज्ञानिक ढंग से मधुमक्खी पालन पर प्रयोगात्मक प्रशिक्षण देने हेतु सुविधाओं की कमी।
  9. शहद की उच्च उपज के लिए मधुमक्खी कालोनियों के कारगर प्रबंध के लिए तकनीकी ज्ञान की कमी।
  10. शहद तथा अन्य छत्ता उत्पादों के उत्पादन के संदर्भ में घटिया गुणवत्ता का नियंत्रण।
  11. छत्ता के अन्य उत्पादों जैसे मधुमक्खियों का मोम, पराग, प्रापलिस, रॉयल जैली और मधुमक्खी के विष की तुलना में शहद के उत्पादन पर अधिक जोर देना।
  12. बैंक ऋणों आदि के संदर्भ में मधुमक्खी पालन हेतु संस्थागत सहायता की कमी।
  13. शहद तथा अन्य छत्ता उत्पादों के लिए विपणन सुविधाओं व उचित मूल्य निर्धारण नीति की कमी।
  14. कीटनाशियों, नाशकजीवनाशियों तथा खरपतवारनाशियों आदि का अविवेकपूर्ण उपयोग।
  15. प्रतिकूल मौसम संबंधी दशाएं तथा पानी और हवा का प्रदूषण ।
  16. उपभोक्ताओं में शहद तथा उसके उत्पादों के बारे में जागरूकता की कमी।
  17. सटीक वैज्ञानिक डेटाबेस अर्थात् क्षमता के बारे में विरोधी आंकड़ों का होना, वर्तमान स्थिति तथा भारत में मधुमक्खी पालन उद्योग की भावी संभावनाओं के बारे में ज्ञान की कमी।
  18. मधुमक्खी पालन के लिए अनुसंधान की पर्याप्त सुविधाओं की कमी।

 

स्रोत: हरियाणा किसान आयोग, हरियाणा सरकार

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