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मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण एवं विस्तार

इस पृष्ठ में मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण एवं विस्तार की जानकारी दी गयी है I

भूमिका

कई वर्षों से हरियाणा में मधुमक्खी पालन किया जा रहा है। यह हरियाणा के हजारों परिवारों की आमदनी का स्रोत रहा है। मधुमक्खी पालन का विकास हरियाणा में वैज्ञानिकों, विस्तार अधिकारियों व कर्मियों और वस्तुतः मधुमक्खी पालकों के अथक प्रयासों के कारण संभव हुआ है। तथापि, नए क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन के विकास की अभी बहुत संभावना है तथा अभी तक इसका मधुमक्खी पालन के लिए या तो बिल्कुल ही दोहन नहीं हुआ है या क्षमता से कम दोहन हुआ है। मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में तीव्र वृद्धि मधुमक्खी पालन की ठोस प्रबंध विधियों के विकास व मधुमक्खी पालकों के बीच उनके उचित प्रचार व प्रसार के माध्यम से हो सकती है। राज्य के माध्यम से मधुमक्खी पालन से संबंधित प्रौद्योगिकियों के प्रभावी व उचित प्रसार-प्रचार के लिए भली प्रकार प्रशिक्षित विस्तार कार्मिकों से युक्त गहन प्रशिक्षण केन्द्रों के विकसित किए जाने की तत्काल आवश्यकता है। प्रभावी तथा प्रयोगात्मक प्रशिक्षणों के लिए अपनाई जा सकने वाली कुछ कार्यनीतियों पर नीचे चर्चा की गई है।

प्रशिक्षण इकाइयों की स्थापना/उनका सबलीकरण

जिला स्तर के प्रशिक्षण केन्द्र

क) कृषि विज्ञान केन्द्रों में प्रशिक्षण की सुविधा

कृषि विज्ञान केन्द्रों में मधुमक्खी पालन पर दिए जाने वाले प्रशिक्षण में शामिल संकाय सदस्यों के मधुमक्खी पालन संबंधी ज्ञान को नवीनतम किया जाना चाहिए तथा उन्हें मधुमक्खियों के कालोनियों की साज-संभाल करने व उनका प्रबंध करने में सक्षम होना चाहिए। इससे प्रशिक्षणार्थियों में विश्वास पैदा करने में सहायता मिलेगी। यदि संभव हो तो विशेषज्ञता के इस क्षेत्र में संकाय सदस्यों को लंबे समय तक सेवारत रखना चाहिए। इससे इन प्रशिक्षणों पर प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा और परिणामस्वरूप मधुमक्खी पालन को अपनाने व उसमें सफलता प्राप्त करने में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।

ख)सहायक स्टाफ

सहायक स्टाफ को कालोनी प्रबंध की सभी विधियों में भली प्रकार प्रशिक्षित होना चाहिए। मधुमक्खी पालन में कुछ मौसमों में प्रशिक्षित होने के पश्चात् नियमित सहायक स्टाफ प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा मधुमक्खी कालोनियों के वर्षभर प्रबंध की दृष्टि से प्रयोगात्मक प्रशिक्षण देने की दृष्टि से एक मूल्यवान संपत्ति सिद्ध हो सकता है। इन व्यक्तियों को इनके कार्य से जल्दी-जल्दी हटाने की प्रथा से बचना चाहिए।

ग)आदर्श मधुमक्खी पालन शाला

किसी प्रशिक्षण संस्थान की मधुमक्खी पालन शाला प्रशिक्षणार्थियों पर पहला प्रभाव डालने की दृष्टि से प्रथम तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है। अतः मधुमक्खी पालन शाला विकास में निम्न बिंदुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए-

  • किसी मधुमक्खी पालन शाला में मधुमक्खियों की कम से कम 50 कालोनियां होनी चाहिए।
  • कालोनियों की संख्या ही नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन कालोनियों का प्रबंध सशक्त व सुव्यवस्थित होना चाहिए।
  • मधुमक्खी पालन शाला भली प्रकार नियोजित हो तथा उसकी अच्छी साज-संभाल की जानी चाहिए।
  • कालोनी की उचित वृद्धि व उत्पादकता के लिए मधुमक्खियों के लिए अनुकूल वनस्पतियां उगाने हेतु पर्याप्त फार्म क्षेत्र उपलब्ध होना चाहिए।
  • छत्ते तथा अन्य उपकरण निश्चित रूप से मानक माप और गुणवत्ता वाले होने चाहिए। किसी प्रशिक्षण केन्द्र में अति श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले उपकरण का उपयोग किसानों व मधुमक्खी पालकों के लिए इन उपकरणों को अपनाने की दिशा में राजी करने की दृष्टि से बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। मानव उपकरणों के उपयोग से कालोनियों का प्रबंध अधिक कारगर ढंग से किया जा सकता है।

मधुमक्खी पालन प्रदर्शन गैलरी

मधुमक्खी पालन की प्रौद्योगिकियों, कार्यनीतियों, निधि प्रदान करने संबंधी योजनाओं और क्षमता का प्रदर्शन

  1. मधुमक्खियों की प्रजातियां, जातियां तथा विकास की अवस्थाएं - विभिन्न छत्तों तथा वन्य मधुमक्खियों की प्रजातियों व उनकी जातियों के नमूनों तथा चित्रात्मक चार्टी से विभिन्न प्रजातियों व जातियों में शरीर के आकार व रंग में विविधताओं के बारे में तेजी से और प्रभावी ढंग से सीखने में सहायता मिलती है। प्रशिक्षण के पहले दिन ही इन नमूनों तथा चित्रात्मक चार्टी से प्रशिक्षणार्थी मधुमक्खियों के काटे जाने के भय के बिना इन लक्षणों को अधिक निकट से देख सकते हैं।
  2. मधुमक्खियों के रोग व शत्रु - जब मधुमक्खी पालन शालाओं में मधुमक्खियों के रोग व शत्रु नहीं होते हैं तो उस मौसम में मधुमक्खियों के रोगों व शत्रुओं के चित्रात्मक चार्टी से इनकी पहचान करने में बहुत मदद मिलती है।
  3. छत्ता उत्पाद - शहद के अतिरिक्त छत्ते के अन्य उत्पादों के प्रदर्शन से प्रशिक्षणार्थी आरंभ में ही मधुमक्खी पालन को पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में अपनाने हेतु प्रोत्साहित होंगे क्योंकि उन्हें मधुमक्खियों से अनेक उत्पादों के उत्पादन हेतु अवसर उपलब्ध होने का ज्ञान हो जाएगा।
  4. अर्थशास्त्र - मधुमक्खी पालन को अपनाकर कोई व्यक्ति कितनी आमदनी ले सकता है, यह पहला प्रश्न है जो प्रशिक्षणार्थियों के मस्तिष्क में आता है। अतः लाभ पर अधिक बल देते हुए मधुमक्खी पालन के विस्तृत अर्थशास्त्र से प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी पालन उद्यम को अपनाने हेतु प्रेरित किया जा सकता है।
  5. सरकारी सुविधाएं या निधिकरण संबंधी योजनाएं - मधुमक्खी पालन भूमिहीन, छोटे तथा सीमांत किसानों, अशिक्षित ग्रामीण युवाओं व समाज के कमजोर वर्गों के लिए अत्यधिक अनुकूल व्यवसाय है। अतः विभिन्न सरकारी योजनाओं के विवरण व अनुदान प्राप्त करने के प्रावधानों व क्रियाविधियों के साथ-साथ बैंक से ऋण प्राप्त करने के तरीकों का ब्यौरा प्रदर्शित किए जाने से प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी पालन व्यवसाय शुरू करने की दिशा में और अधिक प्रेरित किया जा सकेगा।
  6. शहद का विपणन - किसी छत्ता उत्पाद को बेचने के लिए किस प्रकार प्रस्तुत किया जाना है, इसका मधुमक्खी पालन की लाभप्रदता पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए मधुमक्खी पालन को शहद व अन्य उत्पादों को बोतल बंद करने हेतु प्रोत्साहित करने की दृष्टि से आकर्षक लेबल की डिज़ाइन को प्रदर्शित किया जाना चाहिए तथा पैकिंग या बोतलों पर वांछित सूचना मुद्रित की जानी चाहिए, ऐसा ज्ञात होने से प्रशिक्षणार्थी इस दिशा में और प्रेरित होंगे।
  7. मधुमक्खी पालन की क्षमता - प्रशिक्षणार्थी आरंभ में यह सोचते हैं कि केवल शहद ही मधुमक्खियों के छत्तों से प्राप्त होने वाला उत्पाद है लेकिन रानी मक्खियों के उत्पादन, मधुमक्खियों के मोम, पराग, प्रापलिस, मधुमक्खी के विष आदि के उत्पादन की क्षमता को दर्शाकर प्रशिक्षणार्थियों के समक्ष उसके अतिरिक्त लाभ दर्शाई जा सकता है।
  8. मानक विशिष्टताओं से युक्त उपकरण - विशिष्ट लकड़ी, आयामों तथा फिनिशिंग वाले मधुमक्खी छत्तों का उपयोग किया जाना चाहिए। शहद निचोड़ने का उपकरण, ड्रिप ट्रे, शहद छानने की छननियां, शहद को निथारने के पात्र सदैव उच्च गुणवत्ता वाले स्टेनलेस इस्पात के बने होने चाहिए। घटिया गुणवत्ता के उपकरणों का प्रदर्शन करने से श्रेष्ठ उपकरणों व विधियों को अपनाना निश्चित रूप से प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगा।
  9. प्रवासी मधुमक्खी पालन - प्रशिक्षण केन्द्रों द्वारा प्रवासी मधुमक्खी पालन को अपनाने के परिणामस्वरूप वर्ष भर कालोनियों की शक्ति को बेहतर बनाए रखने में सहायता मिलेगी।

इससे अधिक गहनता व दक्षतापूर्ण प्रयोगात्मक प्रशिक्षण देना संभव होगा।

राज्य स्तर का प्रशिक्षण केन्द्र

  1. प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण - कृषि विज्ञान केन्द्रों में प्रशिक्षकों को मधुमक्खी पालन में हुए नवीनतम विकासों की जानकारी दी जानी चाहिए। इस प्रकार, नियमित अंतराल पर प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण आयोजित किए जाने की आवश्यकता है। इससे उन्हें मधुमक्खी पालन के विभिन्न पहलुओं से जुड़े उनकी शंकाओं का समाधान करना भी संभव होगा। उनसे प्राप्त फीडबैक से प्रशिक्षण कार्यक्रमों को तद्नुसार सुधारने व संशोधित करने में सहायता मिलेगी। ये प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र में श्रेष्ठ प्रशिक्षण सुविधाएं होनी चाहिए। ऐसे प्रशिक्षण देने के लिए संकाय सदस्यों को मधुमक्खी पालन से संबंधित प्रगत सैद्धांतिक व प्रयोगात्मक कुशलताओं से युक्त होना चाहिए। उन्हें अनुसंधान वैज्ञानिकों, अधिकारियों व विस्तार कर्मियों से समय पर समन्वयन स्थापित करते हुए वर्तमान समस्याओं के कोई न कोई हल भी तैयार करने चाहिए।
  2. प्रगत प्रशिक्षण - कृषि विज्ञान केन्द्रों में न केवल प्रशिक्षकों के मधुमक्खी कालोनियों के प्रबंध संबंधी ज्ञान को नवीनतम किया जाना चाहिए बल्कि उन्हें मधुमक्खी पालन में विविधीकरण को बढ़ावा देने की दृष्टि से रॉयल जैली, पराग, प्रापलिस, मधुमक्खी के विष तथा रानी मधुमक्खियों के उत्पादन से संबंधित प्रगत जानकारी उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है। नाशकजीवों और रोगों के प्रबंध में हुई प्रगतियों, विशेष रूप से गैर-रासायनिक उपायों को अपनाने से गुणवत्तापूर्ण शहद उत्पादन में सहायता मिलेगी क्योंकि इससे शहद तथा छत्ते के अन्य उत्पादों में रासायनिक अपशिष्टों से जुड़ी समस्याएं कम होंगीं। छत्ता उत्पादों के घरेलू व निर्यात बाजार के लिए नवीनतम गुणवत्ता संबंधी प्राचलों के बारे में कृषि विज्ञान केन्द्र के संकाय सदस्यों को प्रशिक्षण देने से वे गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के उत्पादन हेतु इस महत्वपूर्ण सूचना का अधिक प्रभावी ढंग से प्रचार-प्रसार करने में सक्षम होंगे। और अधिक सुधार के लिए बैंचमार्क : सभी प्रशिक्षणों में भली प्रकार तैयार की गई प्रशिक्षण अनुसूची से कार्य योजना तथा प्रशिक्षण में शामिल किए जाने वाले विषयों के लिए न्यूनतम मानदंड या बैंचमार्क स्थापित होगा। जिला स्तर पर सभी प्रशिक्षणार्थियों और प्रशिक्षकों से प्रशिक्षणों में और सुधार हेतु सुझाव आमंत्रित किए जाने चाहिए। सफलता के लिए बैंचमार्क प्रशिक्षणार्थियों द्वारा मधुमक्खी पालन को अपनाने के प्रतिशत के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।

प्रशिक्षण के लिए योजना

प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण(कृषि विज्ञान केन्द्र के संकाय सदस्य, एडीओ तथा एचडीओ)

  1. पुनश्चर्या प्रशिक्षण पाठ्यक्रम - प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी कालोनियों के प्रबंध, फसलों के परागण, उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण शहद के प्रसंस्करण व विपणन व पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के पश्चात् कालोनी के प्रगुणन पर नवीनतम सूचना उपलब्ध कराने में सक्षम होना चाहिए।
  2. मधुमक्खी पालन के विविधीकरण पर विशेषज्ञतापूर्ण प्रशिक्षण - मधुमक्खी पालन में विविधीकरण को बढ़ावा देने तथा मधुमक्खी पालन में होने वाले लाभ को बढ़ाने के लिए जिला स्तर पर प्रशिक्षणार्थियों को रानी मक्खियों, मधुमक्खी के मोम, पराग, प्रोपलिस व मधुमक्खी के शहद आदि पर सम्पूर्ण व नवीनतम सूचना उपलब्ध होनी चाहिए।
  3. मधुमक्खियों के रोगों तथा शत्रुओं के बारे में विविधतापूर्ण प्रशिक्षण - मधुमक्खी कालोनियों में विभिन्न रासायनिकों व प्रति जैविकों के अवांछित उपयोग का एक मुख्य कारण मधुमक्खियों के विभिन्न शत्रुओं व रोगों के आक्रमण के संबंध में उचित निदान से संबंधित ज्ञान तथा क्षमता में कमी है, अतः मधुमक्खी के रोगों तथा शत्रुओं के बारे में विशेषज्ञ प्रशिक्षण से जिला स्तर पर सभी प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी पालन के संबंध में रोगों व शत्रुओं के निदान व मार्गदर्शन से संबंधित प्रशिक्षण में सहायता मिलेगी। इससे शहद तथा छत्ते के अन्य उत्पादों में इन रसायनों के अपशिष्टों की समस्या निश्चित रूप से कम होगी।

प्रगतशील मधुमक्खी पालकों के लिए अग्रिम प्रशिक्षण

  • बड़े पैमाने पर रानी मक्खी के पालन पर अग्रिम प्रशिक्षण - मधुमक्खियों के रोगों व शत्रुओं के न्यूनतम आक्रमण व सर्वश्रेष्ठ निष्पादन देने वाली कालोनियों के चयन को बढ़ावा देने के लिए मधुमक्खी पालकों को बड़े पैमाने पर रानी मक्खी के पालन पर प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। इससे न केवल उनकी कालोनियों की उत्पादकता में सुधार होगा बल्कि अन्य मधुमक्खी पालकों को रानी मधुमक्खियों की बिक्री से उनकी आमदनी भी बढ़ेगी।
  • छत्ता उत्पादों के उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन पर अग्रिम प्रशिक्षण - अभी हाल तक भारत में मधुमक्खी पालन से होने वाली आमदनी मुख्यतः शहद और मधुमक्खियों की बिक्री पर निर्भर थी। मधुमक्खी पालन से होने वाले लाभ को और बढ़ाने के लिए प्रगतशील मधुमक्खी पालकों को रानी मधुमक्खियों, मधुमक्खी के मोम, पराग, प्रापलिस, मधुमक्खी के विष आदि का भी उत्पादन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त छत्ता उत्पादों के प्रसंस्करण, पैकेजिंग, लेबलीकरण व विपणन पर प्रशिक्षण दिए जाने से मधुमक्खी पालकों का तकनीकी आधार मजबूत होगा तथा उनके लिए और अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
  • मधुमक्खी प्रबंध पर अग्रिम प्रशिक्षण - मधुमक्खी पालन में कई वर्षों के अनुभव के बावजूद मधुमक्खी पालकों द्वारा मधुमक्खी कालोनियों के प्रबंध से संबंधित कुछ समस्याएं रह जाती हैं जिन्हें सुलझाने की आवश्यकता है। मधुमक्खी कालोनियों के वैज्ञानिक प्रबंध पर प्रशिक्षण देकर कालोनियों की उत्पादकता सुधारी जा सकती है।

मौलिक प्रशिक्षण

  • व्यवसाय शुरू करने वालों के लिए - मधुमक्खी पालन व्यवसाय शुरू करने के लिए शुरू में व्यवसाय के इच्छुक व्यक्तियों को उचित, प्रयोगात्मक तथा पूर्ण प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही ये इस क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। उन्हें चुनी हुई मधुमक्खी शाला के स्थल के लिए स्वस्थ कालोनियों को खरीदने अथवा वहां कालोनियों को लाने, विभिन्न मौसमों में कालोनियों का प्रबंध करने, मधुमक्खियों के विभिन्न रोगों व शत्रुओं का प्रबंध करने, शहद तथा मधुमक्खी का मोम निकालने पर प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है जो व्यक्ति कालोनियों की साज-संभाल के प्रति आत्मविश्वासी हों उनके द्वारा मधुमक्खी पालन का व्यवसाय आरंभ करने वाले व्यक्तियों को कालोनी की जांच करने में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए - स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को भी वही प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए जो यह व्यवसाय शुरू करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। इसके अतिरिक्त स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को छत्ता उत्पादों के उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन से जुड़ी विभिन्न समन्वयन गतिविधियों तथा कार्यों को बांटने के बारे में भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें सरकार की उन सुविधाओं से अवगत कराया जाना चाहिए जिनका वे समूह के रूप में लाभ उठा सकते हैं। इस प्रकार के प्रशिक्षण ग्राम स्तर पर भी आयोजित किए जाने चाहिए।

सम्पर्क भ्रमण

संबंधित संस्थाओं अथवा उद्योग का भ्रमण कराने से प्रशिक्षणार्थियों के ज्ञान के क्षेत्र को व्यापक बनाने में बहुत सहायता मिलती है। इन भ्रमणों को निम्नानुसार विभाजित किया जा सकता है –

  • सीबीआरटीआई/एसएयू/आईसीएआर के संस्थान - ऐसे संस्थानों के भ्रमण से मधुमक्खी पालकों को नवीनतम तकनीकों को सीखने का अवसर प्राप्त होगा। यहां मधुमक्खी पालक विशेषज्ञों से अपनी समस्याओं तथा अवधारणाओं के बारे में भी चर्चा कर सकते हैं।
  • शहद निर्यात करने वाली इकाइयां -,शहद निर्यात करने वाली इकाइयों का भ्रमण करने से मधुमक्खी पालकों द्वारा निर्यात के लिए बड़े पैमाने पर शहद की साज-संभाल तथा गुणवत्तापूर्ण परीक्षण के बारे में सीखने का अवसर प्राप्त होगा।
  • प्रगतशील मधुमक्खी पालक - प्रगतशील मधुमक्खी पालकों की मधुमक्खी शालाओं का भ्रमण करने से यह व्यवसाय शुरू करने वाले व्यक्तियों को मधुमक्खी पालन को इस व्यवसाय से होने वाले लाभ, शहद के उत्पादन, मूल्य निर्धारण व उनके द्वारा जिन समस्याओं का सामना किया जा रहा है उनसे संबंधित प्राथमिक जानकारी प्राप्त होगी।

प्रशिक्षणों का आयोजन

  • प्रतिभागियों के स्तर के अनुसार -प्रशिक्षण में प्रयुक्त होने वाली भाषा, अनुदेशात्मक सामग्री, व्याख्यानों की गति प्रशिक्षणार्थियों के स्तर के अनुसार होनी चाहिए।
  • आत्मविश्वास बनाने के लिए प्रदर्शन - प्रशिक्षणार्थियों में आत्म विश्वास पैदा करने के लिए प्रशिक्षकों को प्रबंध की सभी विधियों का स्वयं प्रदर्शन करना चाहिए। इससे प्रशिक्षणार्थी स्वयं करते हुए सीखने को प्रेरित होंगे।
  • करते हुए सीखना - कालोनी प्रबंध की विभिन्न विधियों को प्रत्यक्ष रूप से स्वयं करने पर प्रशिक्षणार्थियों को इसके बारे में लम्बे समय तक याद रहता है और इससे प्रशिक्षणार्थियों में मधुमक्खियों की साज-संभाल के बारे में अधिक आत्म विश्वास पैदा होता है।
  • प्रति बैच प्रतिभागियों की उपयुक्त संख्या - प्रत्येक बैच में प्रशिक्षणार्थियों की संख्या लगभग 30 होनी चाहिए। इससे प्रयोगात्मक अभ्यास के दौरान छोटे समूह बनाने में सुविधा होगी जिससे प्रशिक्षणार्थी प्रत्यक्ष अभ्यास कर सकेंगे और उन्हें सीखने का बेहतर अवसर प्राप्त होगा।
  • प्रतिभागिता को प्रोत्साहन - जो प्रशिक्षणार्थी सक्रिय रूप से प्रयोगात्मक कार्य करते हैं उनकी कक्षा में प्रशंसा करने से अन्य प्रशिक्षणार्थी भी स्वयं अभ्यास करने की दिशा में प्रेरित होंगे।
  • संवाद - प्रशिक्षणों को मात्र प्रशिक्षण देकर अथवा प्रदर्शन दिखाकर कक्षा समाप्त नहीं कर देनी चाहिए। प्रत्येक बार कम से कम 10-15 मिनट चर्चा के लिए रखे जाने चाहिए। यह चर्चा प्रश्न पूछकर आरंभ की जा सकती है।

प्रेरणा, सुविधा प्रदान करना और अनुवर्ती कार्रवाई

  • प्रशिक्षणार्थियों को प्रेरित करना - प्रशिक्षण के दौरान तथा इसके पश्चात् प्रशिक्षणार्थियों को मधुमक्खी पालन शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए क्योंकि कुछ समय बाद अनेक प्रशिक्षणार्थियों में इस दिशा में रूचि समाप्त हो जाती है। प्रशिक्षणार्थियों से व्यक्तिगत रूप से या टेलीफोन के माध्यम से सम्पर्क बनाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि उनमें उच्च स्तर की प्रेरणा बनाई रखी जा सके।
  • मधुमक्खी पालन शुरू करने हेतु सुविधा प्रदान करना - मधुमक्खी पालक छत्ते, मधुमक्खियां तथा अन्य उपकरण कहां से प्राप्त करेंगे, इस संबंध में सूचना प्रदान करते हुए इनकी सहायता की जानी चाहिए। उन्हें अनुदान तथा ऋण प्राप्त करने हेतु आवेदन करने में भी सहायता प्रदान की जानी चाहिए। इस प्रकार प्रशिक्षणार्थी यह सोचते रहेंगे कि उनका अगला व्यवसाय मधुमक्खी पालन होगा।
  • स्थापना के लिए अनुवर्ती कार्रवाई - एक बार जब प्रशिक्षणार्थी मधुमक्खी पालन का कार्य आरंभ कर देता है तो उसे समय पर तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराते हुए उसकी मधुमक्खी पालन शाला स्थापित करने में सहायता करनी चाहिए। चूंकि यह प्रारंभिक बहुत ही नाजुक अवस्था होती है, अतः यदि इस अवसर पर असफलता हाथ लगे तो प्रशिक्षणार्थी बहुत निरुत्साहित होते हैं जबकि आपके द्वारा दी जाने वाली सामयिक सहायता व मार्गदर्शन से प्रशिक्षणार्थी इस अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और यह उनके लिए आगे बढ़ने व प्रेरणा का कार्य करेगी।
  • मधुमक्खी पालन पर कार्यशालाएं - मधुमक्खी पालकों के लिए तिमाही कार्यशालाओं के आयोजन से उन्हें एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा जहां वे अपनी समस्याओं व सफलता के बारे में चर्चा कर सकेंगे और मधुमक्खी पालन, शहद की बिक्री तथा गुणवत्ता नियंत्रण के क्षेत्र में विशेषज्ञों से तकनीकी जानकारी उपलब्ध कर सकेंगे। किसी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए कार्यशाला हेतु पूरे वर्ष के लिए तिथियां निर्धारित कर लेनी चाहिए। इससे मधुमक्खी पालकों को पहले से ही योजना बनाने में सहायता मिलेगी।

नवोन्मेषी तथा सफल मधुमक्खी पालकों का सम्मान

पुरस्कार

श्रेष्ठता हेतु अन्य मधुमक्खी पालकों को प्रोत्साहित करने के लिए नए विचार रखने वाले सफल मधुमक्खी पालकों को राज्य व जिला स्तर पर पुरस्कृत किए जाने का प्रावधान होना चाहिए। तथापि, इन पुरस्कारों के बारे में विस्तृत मानदंड अभी तक नहीं निर्धारित किए गए है जिन्हें निर्धारित किया जाना चाहिए।

सफलता की कहानियां

सफल मधुमक्खी पालकों तथा मधुमक्खी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने हेतु अन्य लोगों को प्रेरित करने वाले मधुमक्खी पालकों की सफलता की कहानियां प्रकाशित करने से इन मधुमक्खी पालकों के साथ-साथ अन्य लोगों का नैतिक बल बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे कई अन्य लोग मधुमक्खी पालन व्यवसाय के प्रति आकर्षित होंगे।

फीडबैक

सफल मधुमक्खी पालकों से नियमित फीडबैक लेने से न केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम को सही दिशा देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होगा बल्कि इससे उनकी प्रेरणा का स्तर भी ऊंचा बना रहेगा।

प्रकाश स्तंभ

अपने संबंधित क्षेत्रों में सफल मधुमक्खी पालकों को प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करने से उनके क्षेत्र में मधुमक्खी पालन के विकास में उन्हें बनाए रखने में बहुत सहायता मिलेगी। इससे अन्य बरोजगार व्यक्तियों को मधुमक्खी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने व उसमें सफल होने के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने में भी सहायता प्राप्त होगी।

शहद उत्सवों का आयोजन

मधुमक्खी पालकों, व्यापारियों, निर्यातकों व उपकरण निर्माताओं को अपने उत्पादों का प्रदर्शन करने व उनका प्रचार-प्रसार करने हेतु अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से शहद उत्सव आयोजित किए जाने चाहिए। शहर या उसके आस-पास ऐसे उत्सवों के आयोजन से स्थानीय जनता को शहद खरीदने के अवसर प्राप्त होंगे। शहद की उपयोगिता के बारे में पम्फलेटों का वितरण करने से शहद की खपत को बढ़ावा मिलेगा।

टेलीफोन पर तथा फार्म पर परामर्श

  1. शहद का प्रवर्धन
  2. प्रिंट माध्यम

समाचार-पत्रों में विज्ञापन देने या पम्फलेट देने से शहद के उपभोग को प्रोत्साहित करने में मदद प्राप्त होती है।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम

इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की व्यापक पहुंच है अतः इन माध्यमों पर विज्ञापन के द्वारा बहुत कम समय में लाखों लोगों तक पहुंचा जा सकता है।

सामाजिक नेटवर्किग

आजकल लगभग सम्पूर्ण युवा वर्ग सामाजिक नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिय है। अतः तेजी से तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए छोटा व प्रभावी संदेश दिया जा सकता है। शहद के स्वास्थ्य संबंधी लाभों को बताने से बुजुर्ग  लोगों को तथा युवाओं को भी शहद का उपभोग करने की दिशा में आकर्षित किया जा सकता है।

उपहार के रूप में

त्यौहारों अथवा विवाहों के अवसर पर मधुमक्खी पालकों तथा अधिकारियों को उपहार के रूप में शहद देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। चूंकि शहद कई सप्ताहों या कई महीनों तक चल सकता है, अतः इस स्वास्थ्यप्रद उपहार से आप लम्बे समय तक लोगों की याद में बने रह सकते हैं।

चीनी का एक स्वस्थ विकल्प

प्रशिक्षणों के दौरान विभिन्न खाद्य सामग्रियों को तैयार करने में शहद के उपयोग व स्वस्थ विकल्प के रूप में चीनी के स्थान पर शहद के उपयोग संबंधी विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। घरों पर विकल्प के रूप में शहद के उपयोग से आपके यहां आने वाले अतिथि भी कुछ हद तक प्रोत्साहित होंगे और वे शहद का उपयोग करना प्रारंभ कर सकते हैं।

वैज्ञानिक साहित्य

प्रपत्र

शहद तथा शहद के रवों के संघटन व स्वास्थ्य संबंधी लाभों पर प्रपत्र छापे जाने चाहिए। विभिन्न व्यंजनों तथा शहद का सेवन करने की विधियों को प्रस्तुत करने से आम लोगों में शहद का उपभोग करने के प्रति अधिक रूचि जागृत होगी क्योंकि अभी भी अधिकांश लोग शहद को केवल औषधि के रूप में उपयोग करते हैं अथवा केवल एक चम्मच शहद का ही सेवन करते हैं।

पुस्तिकाएं

मधुमक्खी पालन शुरू करने, कालोनियों का प्रबंध करने व शहद निकालने से संबंधित गुर देते हुए छोटी पुस्तिकाएं इस क्षेत्र में रूचि रखने वाले व्यक्तियों के बीच वितरित की जानी चाहिए, ताकि वे व्यावसायिक स्तर पर इसमें अपनी रूचि बनाए रखें।

पुस्तकें

स्थानीय भाषाओं अर्थात् हिन्दी व अंग्रेजी में मधुमक्खी पालन पर पुस्तकें प्रकाशित करें। इन पुस्तकों में बेहतर व प्रभावी ढंग से सूचना देने के लिए विशेष रूप से मधुमक्खियों व उनके शत्रुओं के बारे में रंगीन फोटोग्राफ सहित बहुत ही व्यापक व अद्यतन सूचना उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

पत्रिकाएं

मासिक व त्रैमासिक पत्रिकाएं वर्तमान में आने वाले मौसम के संदर्भ में तकनीकी सूचना उपलब्ध कराने में सहायक होंगी। इससे मधुमक्खी पालकों का ज्ञान अद्यतन बना रहेगा तथा वे अपनी कालोनियों का वैज्ञानिक रूप से तथा अधिक लाभ लेने के लिए प्रबंध करने में सक्षम होंगे।

शहद दिवस

विभिन्न दिवसों को मनाने की प्रवृत्ति बन गई है तो क्यों न शहद दिवस मनाया जाए। इससे वर्ष में कम से कम एक दिन हम लोगों को शहद के बारे में सोचने पर मजबूर कर सकते हैं।

शिक्षा एवं अनुसंधान

एचएआईसी की अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संबंधी गतिविधियां

एचएआईसी ने मुरथल में एचएआईसी कृषि अनुसंधान एवं विकास केन्द्र स्थापित किया है। जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि अनुसंधान संबंधी गतिविधियां विकसित करना व उन्हें बढ़ावा देना, फसलों की खेती की नवीनतम प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, सिंचाई संबंधी प्रौद्योगिकियों, प्रसंस्करण तकनीकों, सस्योत्तर प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन, प्रदर्शन फार्म स्थापित करना, ऊतक संवर्धन, मधुमक्खी पालन तथा जैविक खेती आदि को बढ़ावा देना है और इसके साथ ही हरियाणा राज्य में उपरोक्त से संबंधित अनुसंधान व विकास संबंधी कार्यों का प्रवर्धन करना भी इसके मुख्य उद्देश्यों में से एक है।

एचएआईसी कृषि अनुसंधान एवं विकास केन्द्र प्रशिक्षण देता है तथा अनुसंधान कार्यक्रम चलाता है। इसका उद्देश्य हरियाणा राज्य के अन्य भागों में भी ऐसी ही इकाइयां स्थापित करना है।

शहद प्रसंस्करण इकाई

इस केन्द्र ने मुरथल में शहद प्रसंस्करण इकाई स्थापित की है। हरियाणा के मधुमक्खी पालक बहुत कम दरों पर कस्टम आधार पर अपने शहद को प्रसंस्कृत करा सकते हैं।

मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण संबंधी योजना

इस योजना के अंतर्गत एचएआईसी मधुमक्खी पालकों, किसानों, बेरोजगार युवाओं तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जन जाति के मधुमक्खी पालकों को निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान करता है। प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षणार्थियों को रहने तथा भोजन की मुफ्त सुविधा प्रदान की जाती है।

राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से क्या अपेक्षा है

हरियाणा राज्य में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए राज्य कृषि विश्वविद्यालय को निम्न के द्वारा अपने शिक्षण, अनुसंधान एवं विस्तार कार्यक्रमो को मजबूत बनाना चाहिए –

  • मधुमक्खी पालन के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान करने के लिए अलग अनुसंधान इकाइयों का सृजन
  • शिक्षण तथा अनुसंधान करने में प्रशिक्षित वैज्ञानिक स्टाफ की भर्ती ।
  • मधुमक्खी पालन के विभिन्न पहलुओं (प्रबंध, मधुमक्खी का स्वास्थ्य, प्रजनन तथ पैकेजिंग व विपणन सहित शहद निकालना) पर प्रगत प्रशिक्षणों का आयोजन

मधुमक्खी पालन में जैवप्रौद्योगिकी की भूमिका

मधुमक्खी पालन में जैवप्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप

मधुमक्खी पालन, शहद तथा अन्य उत्पादों पर हमारे देश में अनेक वर्षों से अनुसंधान किए जा रहे हैं। तथापि, उत्पादों की गुणवत्ता व मात्रा को सुधारने में जैवप्रौद्योगिकी की क्षमता का अभी तक इस क्षेत्र में पूरी तरह उपयोग नहीं किया गया है। अतः एक ऐसा नेटवर्क कार्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें जैवप्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों पर ध्यान दिया जाएगा जिससे मधुमक्खियों तथा शहद के उत्पादों, दोनों में सुधार करना संभव होगा। इस संबंध में निम्न प्राथमिकताओं की जांच की जानी

  • आनुवंशिक विविधता - गैर एपिस प्रजातियों सहित सभी मधुमक्खियों की विविधता के अध्ययन के लिए आकृतिविज्ञानी तथा आण्विक विश्लेषण व लक्षण वर्णन
  • परागण संबंधी अध्ययन –

क.हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में सेब के बागों में परागण सेवाओं के लिए मधुमक्खियां किराए पर दी जाती हैं। यही प्रथा देश के अन्य भागों में आवश्यकता के अनुसार अपनाई जानी चाहिए।

ख. छोटे आकार की शहद न उत्पन्न करने वाली मधुमक्खियों सहित इनकी सभी प्रजातियों की परागण क्षमता के लिए अध्ययन आरंभ किए जाने चाहिए।

ग.चुनी हुई फसलों के परागण को बढ़ाने के लिए मधुमक्खियों को आकर्षित करने हेतु फीरोमोन के उपयोग पर अध्ययन किए जाने चाहिए।

  • मधुमक्खियों की प्रजनन तकनीकों/उनके बड़े पैमाने पर पालन की विधियों का विकास किया जाना चाहिए।

क. हमारे देश में वर्तमान में इस क्षेत्र में विशेषज्ञता की कमी है लेकिन संकरीकरण संबंधी अध्ययनों के लिए मधुमक्खियों की विभिन्न प्रजातियों के कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक का मानकीकरण किया जाना चाहिए।

ख. चूंकि पुनसँयोगी डीएनए तकनीक इस मामले में संभव नहीं है अतः रूचि के जीनों को समाहित करने के लिए अन्य तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। उदाहरण के लिए प्रोटीन कोड करने वाले जीन का उपयोग आरंभ करना (सैक्रोपिन जो अनेक नाशकजीवों के विरुद्ध प्रतिरोध प्रदान करता है)।

ग. मधुमक्खियों की विभिन्न प्रजातियों के व्यवहार के अनुसार विभिन्न पारिस्थितिक प्रणालियों में उनका प्रजनन/पालन ।

घ. उच्चतर उपज, बेहतर परागण क्षमता तथा अन्य वांछित गुणों के लिए चुने गए रोग तथा नाशकजीवी प्रतिरोधी और इसके साथ ही नाशकजीवनाशी प्रतिरोधी मधुमक्खियों का प्रजनन ।

ङ.विभिन्न प्रजातियों, डंकहीन, एपिस की अन्य प्रजातियों का प्रजनन व पालन तथा रानी मक्खी का बड़े पैमाने पर पालन ।

च.मधुमक्खियों के सटीक पालन जैसे छत्ते की डिजाइन तैयार करने, निर्देशित पुष्प रस एकत्र करने की दृष्टि से किसी विशेष फसल की प्रबंध संबंधी विधियों/कटाई तथा संरक्षण आदि पर कार्य करना।

छ.रोगरोधी नैदानिक युक्तियों के विकास सहित रोग/नाशकजीव प्रतिरोध पर अध्ययन ।

आण्विक मार्कर

क. एपिस सेराना तथा अन्य एपिस व गैर एपिस प्रजातियों के लिए आण्विक मार्करों का विकास। अभी तक किसी भारतीय प्रजाति के लिए आण्विक मार्करों के विकास पर कोई कार्य नहीं किया गया है। एपिस मेलिफेरा में 200 एमबीपी में संगठित 16 गुणसूत्र होते हैं। मधुमक्खियों में विविधता के अध्ययन के लिए आनुवंशिक मार्करों का नया सैट होना चाहिए। तुलनात्मक जीनोमिक्स जैसे स्वच्छता संबंधी व्यवहार, उनके मंडराने के व्यवहार आदि का विश्लेषण किया जाना चाहिए।

ख. रोग तथा नाशकजीव प्रतिरोध, शहद की उच्चतर उपज व गुणवत्ता, परागण में भूमिका, मंडराने संबंधी व्यवहार, स्वच्छता संबंधी व्यवहार आदि पर विशिष्ट परीक्षणों के लिए मधुमक्खियों की जनसंख्या की छंटाई की जानी चाहिए।

ग. शहद के अतिरिक्त छत्तों के अन्य उत्पादों के उत्पादन के लिए देश में अभी तक प्रौद्योगिकियां विद्यमान नहीं हैं।

 

स्रोत: हरियाणा किसान आयोग, हरियाणा सरकार

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