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झारखंड राज्य के लिए संकर नस्ल का बकरी पालन व उपयोगिता

इस भाग में प्रजनन हेतु नर के चयन, गर्भवती बकरी की देख-रेख, मांस उत्पादन हेतु बकरी पालन, बकरियों में होने वाले रोग एवं रोग के लक्षणों तथा रोकथाम के विषय में जानकारी प्रस्तुत है।

झारखंड राज्य के लिए संकर नस्ल का बकरी पालन व उसकी उपयोगिता

किन्हीं दो जातियों के बकरा तथा बकरी के संयोग से जन्म लेने वाली बकरी को संकर बकरी कहते हैं। झारखंड में राज्य के पशुपालन विभाग तथा अन्य संस्थाओं द्वारा बकरी के नस्ल सुधार हेतु किसानों के बीच काफी संख्या में जमुनापारी बकरों का वितरण किया गया जिसका वांछित लाभ नहीं मिल पाया। इसका मुख्य कारण जमुनापारी नस्ल के विषय में समुचित ज्ञान का अभाव था।

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के अन्तर्गत राँची पशुचिकित्सा महाविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा इस क्षेत्र में पायी जाने वाली ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन जमुनापारी तथा बीटल बकरों से कराकर काफी संख्या में संकर नस्ल के बकरी, प्रक्षेत्र तथा बकरी पालकों के यहाँ जन्म दिया गया। बकरी के विभिन्न आर्थिक पहलुओं पर गहन अध्ययन से पता चला कि मांस तथा दूध उत्पादन में वृद्धि के लिए बीटल नस्ल उपयुक्त है। अतः ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल बकरा से कराकर इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त संकर नस्ल की बकरी का उत्पादन किया जा सकता है। यह संकर नस्ल की बकरी, बिहार की (झारखंड के अतिरिक्त) के लिए भी उपयुक्त है।

बीटल नस्ल के संयोग से उत्पादित संकर नस्ल के नर का वजन छः माह की उम्र में औसतन 12-15 किलो ग्राम हो जाता है। जबकि देशी (ब्लैक बंगाल) के नर का वजन केवल 7-8 किलो ग्राम रहता है। इस प्रकार बकरी पालन से होने वाली आय में डेढ़ से दोगुणी वृद्धि संभव है। संकर बकरियों के दूध उत्पादन में देशी की तुलना में करीब तिगुनी वृद्धि होती है। राँची पशुचिकत्सा महाविद्यालय के आस-पास के गाँवों में करीब 90 प्रतिशत बकरियाँ संकर नस्ल की उपलब्ध है।

बकरी प्रजनन - इस क्षेत्र में पायी जानेवाली ब्लैक बंगाल नस्ल के मादा बच्चे करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क हो जाते हैं। अगर शारीरिक वजन ठीक हो तो मादा मेमना (पाठी) को 8-10 माह की उम्र में पाल दिलाना चाहिए अन्यथा 12 महीने की उम्र में पाठी में ऋतुचक्र एवं ऋतुकाल छोटा होता है। वैसे बकरी में ऋतुचक्र करीब 18-20 दिनों का होता है एवं ऋतुकाल 36 घंटों का। बकरियाँ सालों भर गर्म होती है लेकिन अधिकांश बकरियाँ मध्य सितम्बर से मध्य अक्तूबर तथा मध्य मई से मध्य जून के बीच गर्म होती है। अन्य समय में कम बकरियाँ गर्म होती है। ऋतुकाल शुरू होने के 10-12 तथा 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलाने से गर्भ ठहरने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक रहती है। इसे आप इस प्रकार समझ सकते है कि अगर बकरी या पाठी सुबह में गर्म हुई हो तब उसे उसी दीन शाम में एवं दूसरे दिन सुबह में पाल दिलाएं। अगर शाम को गर्म हुई हो  तो दूसरे दिन सुबह में पाल दिलावें।

बकरी पालकों को बकरी के ऋतुकाल (गर्म होने) के लक्षण के विषय में जानकारी रखना चाहिए। बकरी के गर्म होने के लक्षण निम्नलिखित हैं : -

  • विशेष प्रकार की आवाज निकालना।
  • लगातार पूंछ हिलाना।
  • चरने के समय इधर-उधर भागना।
  • नर के नजदीक जाकर पूंछ हिलाना तथा विशेष प्रकार का आवाज निकालना।
  • घबरायी हुई सी रहना।
  • दूध उत्पादन में कमी
  • भगोष्ठ में सूजन और योनि द्वार का लाल होना
  • योनि से साफ पतला लेसेदार द्रव्य निकलना तथा नर का मादा के उपर चढ़ना या मादा का नर के उपर चढ़ना।

उपरोक्त लक्षणों को पहचानकर बकरी पालक समझ सकते है कि उनकी बकरी गर्म हुई है अथवा नहीं। इन लक्षणों को जानने पर ही समय से गर्म बकरी को पाल दिलाया जा सकता है। बच्चा पैदा करने के 30-31 दिनों के बाद ही गर्म होने पर बकरी को पाल दिलावें।

सामान्यतया 30-40 बकरियों के लिए एक बकरा काफी है। एक बकरा से एक दिन में केवल एक ही बकरी को पाल दिलाना चाहिए एवं एक सप्ताह में अधिक से अधिक पांच बकरियों को। इस बीच बकरों को अधिक पौष्टिक भोजन देना जरूरी है नहीं तो बकरा कमजोर हो जायेगा।

ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल या सिरोही बकरा तथा संकर पाठी या बकरी का प्रजनन संकर बकरा से ही कराएं। एक बात ध्यान देने योग्य है कि नर और मादा के बीच बाप-बेटी, बेटा-माँ एवं भाई-बहन का संबंध न हो। अगर दो गाँवों (‘अ’ और ‘ब’) में बीटल या विराही बकरा उपलब्ध कराया गया है तथा इससे संकर बकरी-बकरा का उत्पादन हुआ है तब 8-10 माह के बाद संकर पाठा-पाठी प्रजनन योग्य हो जायेगा। अगर इन दोनों गाँवों के बकरों तथा प्रजनन हेतु संकर पाठा का आपस में अदला-बदली नहीं किया जाय तब भाई-बहन, बाप-बेटी, बेटा-माँ के बीच प्रजनन होगा। अतः बकरा उपलब्ध कराने के 14-16 माह के बीच ‘अ’ गाँव के बकरा को ‘ब’ गाँव में तथा ‘ब’ गाँव के बकरा को ‘अ’ गाँव में अदला-बदला कर देना चाहिए। इसी प्रकार प्रजनन योग्य संकर पाठी का भी अदला-बदला करना चाहिए। संकर पाठी का प्रजनन संकर पाठा से ही कराना लाभप्रद है।

प्रजनन हेतु नर का चयन

  • प्रजनन हेतु नर का चयन निम्नलिखित गुणों के आधार पर करें-
  • जुड़वा उत्पन्न नर का चुनाव करें।
  • नर के माँ का दूध उत्पादन पर ध्यान दें।
  • नर के शारीरिक वजन एवं बनावट पर ध्यान दें।
  • नर के अंडकोश की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए।

गर्भवती बकरी की देख-रेख

गर्भवती बकरियों को गर्भावस्था के अंतिम डेढ़ महीने में अधिक सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके पेट में पल रहे भ्रूण का विकास काफी तेजी से होने लगता है। इस समय गर्भवती बकरी के पोषण एवं रख-रखाव पर ध्यान देने से स्वस्थ्य बच्चा पैदा होगा एवं बकरी अधिक मात्रा में दूध देगी जिससे इनके बच्चों में शारीरिक विकास अच्छा होगी।

बकरियों में गर्भावस्था औसतन 142-148 दिनों का होता है। बच्चा देने के 2-3 दिन पहले से बकरी को साफा-सुथरा एवं अन्य बकरी से अलग रखें।

आवास - वातावरण के अनुसार बकरियों के लिए आवास की व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ बकरियों को गर्मी, सर्दी, वर्षा तथा जंगली जानवरों से बचाने योग्य आवास की जरूरत है। आवास के लिए सस्ती से सस्ती सामग्री का व्यवहार करना चाहिए ताकि आवास लागत कम रहे। प्रत्येक वयस्क बकरी के परिवार के लिए 10-12 वर्गफीट जमीन की आवश्यकता होती है। प्रत्येक 10 बकरियों के परिवार के लिये 100-120 वर्ग फीट यानि 10'x12' जमीन की आवश्यकता होगी। बकरा-बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए। बकरी के लिए घर के किनारे-किनारे डेढ़ फीट ऊँचा तथा ढ़ाई से तीन फीट चौड़ा मचान बना देना चाहिए। मचान बनाने में यह ध्यान रखना चाहिए कि दो लकड़ी या बांस के टुकड़ों के बीच इतना कम जगह हो कि बकरी या बकरी के बच्चों का पांव उसमें न फंस सके।

अगर सम्भव हो तो घर की दीवाल से सटाकर बकरी गृह का निर्माण करें या किसी चहारदीवारी से। इस प्रकार लागत कम आयेगा। पीछे वाले दीवाल की ऊँचाई 8 फीट तथा आगे वाले का 6 फीट रखें। घर हवादार एवं साफ-सुथरा रहना चाहिए। जमीन मिट्टी एवं बालू से बना होना चाहिए। घर का सतह (जमीन) ढ़ालुआं होना चाहिए ताकि सफाई आसान हो। बकरियों खासकर बच्चों को ठंढ से बचाने का प्रबंध आवास में होना जरूरी है।

पोषण - बकरियाँ चरने के अतिरिक्त हरे पेड़ की पत्तियाँ, हरी घास, दाल चुन्नी, चोकर आदि पसन्द करती है। बकरियों को रोज 6-8 घंटा चराना जरूरी है। यदि बकरी को घर में बांध कर रखना पड़े तब इसे कम से कम दो बार भोजन दें। बकरी हरा चारा (लूसर्न, बरसीम, जई, मकई, नेपियर आदि) और पत्ता (बबूल, बेर, बकाइन, पीपल, बरगद, गुलर कटहल आदि) भी खाती है। एक वयस्क बकरी को औसतन एक किलो ग्राम घास या पत्ता तथा 100-250 ग्राम दाना का मिश्रण (मकई दरों, चोकर, खल्ली, नमक मिलाकर) दिया जा सकता है। उम्र तथा वजन के अनुसार भोजन की मात्रा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। गाय-भैंस की तरह भी कृट्टी/भूसा में दाना का मिश्रण पानी में मिलाकर बकरी को दे सकते है। आदत लग जाने पर बकरियाँ भी गाय-भैंस की तरह खाना खा सकती है। बकरा, दूध देने वाली बकरी एवं गर्भवती बकरी के पोषण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है।

बकरियों के लिए उपयोगी चारा
झाड़ियाँ : बेर, झरबेर
पेड़ की पत्तियाँ : नीम, कटहल, पीपल, बरगद, जामुन, आम, बकेन, गुल्लड, शीशम 
चारा वृक्ष की पत्तियाँ : सू-बबूल, सेसबेनिया
सदाबहार घास : दूब, दीनानाथ, गिनी घास
हरा घास : लोबिया, बरसीम, लूसर्न आदि।

मांस उत्पादन हेतु बकरी पालन

बाजार में मांस की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जिसके कारण बकरियों की मूल्यों में भी काफी वृद्धि हुई है। ब्लैक बंगाल मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। इसका प्रजनन बीटल या सिरोही नस्ल के बकरों से कराकर अधिक लाभ ले सकते है क्योंकि इससे उत्पन्न नर बच्चे छः माह की उम्र में औसतन 14-15 किलो ग्राम वजन प्राप्त कर लेता है। मांस उत्पादन वजन का 50 प्रतिशत मानकर चलें तब एक पाठा से 7-7.5 किलोग्राम मांस मिलेगा। जिसका बाजार भाव (100 रुपये/ किलो ग्राम) 700 रुपये से 750 रुपये तक आयेगा। इसके अतिरिक्त खाल, सिर, खूड़, आँत आदि से भी लाभ प्राप्त होता है।

अधिक वजन के लिए नर बच्चों का बंध्याकरण 2 माह की उम्र में कराना चाहिए तथा 15 किलोग्राम वजन प्राप्त कर लेने के बाद माँस हेतु उपयोग में लाना चाहिए। इस वजन को प्राप्त कर लेने पर, वजन की तुलना में माँस उत्पादन में वृद्धि होती है।

बकरियों में होने वाले रोग, रोग के लक्षण एवं रोकथाम

अन्य पशुओं की तरह बकरियाँ भी बीमार पड़ती है। बीमार पड़ने पर उसकी मृत्यु भी हो सकती है। बकरियों में मृत्यु दर कम कर बकरी पालन से होने वाली आय में वृद्धि की जा सकती है। बीमारी की अवस्था में पशुचिकित्सक की राय लेनी चाहिए।

बकरियों में होने वाले रोग

(क) परजीवी रोग - बकरी में परजीवी से उत्पन्न रोग अधिक होते है। परजीवी रोग से काफी क्षति पहुँचती है।

बकरी को आंतरिक परजीवी से अधिक हानि पहुँचती है। इसमें गोल कृमि, फीता कृमि, फ्लूक, एमफिस्टोम और प्रोटोजोआ प्रमुख है। इसके प्रकोप के कारण उत्पादन में कमी, वजन कम होना, दस्त लगना, शरीर में खून की कमी होती है। शरीर का बाल तथा चमड़ा रूखा-रूखा दीखता है। इसके कारण पेट भी फूल सकता है तथा जबड़े के नीचे हल्की सूजन भी हो सकती है।

इसके आक्रमण से बचाव तथा उपचार के लिए नियमित रूप से बकरी के मल का जाँच कराकर कृमि नाशक दवा (नीलवर्म, पानाकिआर, वेन्डाजोल, वेनमीन्थ, डिस्टोडीन आदि) देनी चाहिए। कृमि नाशक दवा तीन से चार माह के अंतराल पर खासकर वर्षा ऋतु शुरू होने के पहले और बाद अवश्य दें।

आंतरिक परजीवी के अलावे वाह्य परजीवी से भी बकरी को बहुत हानि पहुँचती है। बकरी में विशेषकर छौनों में जूँ लग जाते है। गेमेक्सीन या मालाथिऑन या साईथिऑन का प्रयोग कर जूँ से बचाना जरूरी है। बकरी में खुजली की बीमारी भी वाह्य परजीवी के कारण ही होती है। बकरी को खुजली से बचाने के लिए प्रत्येक तीन महीने पर 0.25 प्रतिशत (1 लीटर पानी में 5 मिली लीटर दवा) मालाथिऑन या साईथिऑन का घोल से नहलाना चाहिए। नहलाने के पहले बकरी को खासकर गर्दन, नाक, पूँछ जाँघ के अन्दर का भाग तथा छाती के नीचने भाग को सेभलॉन का घोल या कपड़ा धोने वाला साबुन लगा देना चाहिए। इसके बाद मालाथिऑन या साईथिऑन के घोल से बकरी को नहलावें तथा पूरा शरीर को ब्रस से खूब रगड़े। बकरी को दवा का घोल पीने नहीं दें क्योंकि यह जहर है। नहलाने के एक घंटा बाद जहाँ-जहाँ खुजली है करंज का तेल लगा दें। खुजली वाले बकरी को एक दिन बीच कर 4-5 बार नहलाने से खुजली ठीक हो जायेगा। जिस दिन सभी बकरी को नहलाया जाय उसी दिन बकरी घर का छिड़काव भी उसी दवा के 2% घोल (1 लीटर पानी में 40 मिली लीटर दवा मिलाकर) से करें। इस तरह बकरी को खुजली से बचाया जा सकता है। दवा लगाने के बाद हाथ की सफाई अच्छी तरह करें क्योंकि यह जहर है।

(ख) सर्दी-जुकाम (न्यूमोनिया)यह रोग कीटाणु, सर्दी लगने या प्रतिकूल वातावरण के कारण हो सकता है। इस रोग से पीड़ित बकरी को बुखार रहता है, सांस लेने में तकलीफ होती है एवं नाक से पानी या नेटा निकलता रहता है। कभी-कभी न्यूमोनिया के साथ दस्त भी होता है। सर्दी-जुकाम की बीमारी बच्चों में ज्यादा होती है एवं इससे अधिक बच्चे मरते हैं। इस रोग से ग्रसित बकरी या बच्चों को ठंढ़ से बचावें तथा पशुचिकित्सक की सलाह पर उचित एण्टीबायोटिक दवा (ऑक्सी टेट्रासाइकलिन, डाइक्स्ट्रीसिन, पेनसिलीन, जेन्टामाइसिन, इनरोफ्लोक्सासीन, सल्फा आदि) दें। उचित समय पर उपचार करने से बीमारी ठीक हो जायेगी।

(ग) पतला दस्त (छेरा रोग) - यह खासकर पेट की कृमि या अधिक हरा चारा खाने से हो सकता है। यह कीटाणु (बैक्टीरिया या वायरस) के कारण भी होता है।

इसमें पतला दस्त होता है। खून या ऑव मिला हुआ दस्त हो सकता है। सर्वप्रथम उचित दस्त निरोधक दवा (सल्फा, एण्टीबायोटिक, मेट्रान, केओलिन, ऑरीप्रीम, नेवलोन आदि) का प्रयोग कर दस्त को रोकना जरूरी है। दस्त वाले पशु को पानी में ग्लूकोज तथा नमक मिलाकर अवश्य पिलाते रहना चाहिए। कभी-कभी सूई द्वारा पानी चढ़ाने की भी आवश्यकता पड़ सकती है। पतला दस्त ठीक होने (यानि भेनाड़ी आ जाने पर) के बाद मल की जाँच कराकर उचित कृमि नाशक दवा दें। नियमित रूप से कृमि नाशक दवा देते रहने से पतला दस्त की बीमारी कम होगी। इस बीमारी का उचित उपचार पशुचिकित्सक की सलाह से करें।

(घ) सुरहा-चपका यह संक्रामक रोग है। इस रोग में जीभ, ओंठ, तालु तथा खुर में फफोले पड़ जाते हैं। बकरी को तेज बुखार हो सकता है। मुँह से लार गिरता है तथा बकरी लँगड़ाने लगती है।

ऐसी स्थिति में बीमार बकरी को अलग रखें। मुँह तथा खुर को लाल पोटास (पोटाशियम परमेगनेट) के घोल से साफ करें। खुरों के फफोले या घाव को फिनाइल से धोना चाहिए। मुँह पर सुहागा और गंधक के मिश्रण का लेप लगा सकते हैं।

इस रोग से बचाव के लिए मई-जून माह में एफ॰एम॰डी॰ का टीका लगवा दें।

(ङ) आंत ज्वर (इन्टेरोटोक्सिमियां)- इस बीमारी में खाने की रुचि कम हो जाती है। पेट में दर्द होता है, दाँत पीसना भी संभव है, पतला दस्त तथा दस्त के साथ खून आ सकता है।

दस्त होने पर नमक तथा चीनी मिला हुआ पानी देते रहें। एण्टीबायोटिक एवं सल्फा का प्रयोग करें। इस बीमारी से बचाव के लिए इन्टेरोटेक्सिमियां या एम.सी.सी. का टीका बरसात शुरू होने के पहले लगवा दें।

(च) पेट फूलना- इस बीमारी में भूख कम लगती है, पेट फूल जाता है, पेट को बजाने पर ढ़ोल के जैसा आवाज निकलता है।

इस बीमारी में टिमपॉल पाउडर 15-20 ग्राम पानी में मिलाकर 3-3 घंटों पर दें। ब्लोटी सील दवा पिलावें तथा एभील की गोली खिलावें। आप हींग मिलाकर तीसी का तेल भी पिला सकते हैं। कभी-कभी इन्जेक्सन देने वाला सूई को पेट में भोंक कर गैस बाहर निकालना पड़ता है।

(छ) जोन्स रोग - पतला दस्त का बार-बार होना, बदबूदार दस्त आना तथा वजन में क्रमशः गिरावट इस बीमारी का पहचान है।

इससे ग्रसित बकरी को अलग रखें। अगर स्वास्थ्य में गिरावट नहीं हुई हो तो इस तरह के पशु का उपयोग मांस के लिए किया जा सकता है अन्यथा मरने के बाद इसे जमीन में गाड़ दें ताकि बीमारी फैले नहीं।

(ज) थनैल - बकरी के थन में सूजन, दूध में खराबी कभी-कभी बुखार आ जाना इस रोग के लक्षण हैं।

दूध निकालने के बाद थन में पशु चिकित्सक की सलाह से दवा देनी चाहिए। थनैल वाले थन को छूने के बाद हाथ अच्छी तरह साबुन एवं डिटॉल से साफ कर लेना चाहिए।

(झ) कोकसिडिओसिस - यह बकरी के बच्चों में अधिक होता है लेकिन वयस्क बकरी में भी हो सकता है। इसके प्रकोप से पतला दस्त, कभी-कभी खूनी दस्त भी हो सकता है।

इससे बचाव के लिए पशुचिकित्सक की सलाह पर उचित दवा (सल्फा, एम्प्रोसील, नेफटीन आदि) दें। रोग हो जाने पर दस्त का इलाज करें तथा मल की जांच के बाद उचित दवा दें।

(ञ) कन्टेजियस इकथाईमा - इस रोग से ग्रसित बकरी के बच्चों के ओठों पर तथा दोनों जबड़ों के बीच वाली जगह पर छाले पड़ जाते है जो कुछ दिनों के बाद सूख जाता है तथा पपड़ी पड़ जाता है यह संक्रामक रोग है।

इस रोग से ग्रस्त पशु को अलग रखें तथा ओठों को लाल पोटास के घोल से धोकर बोरोग्लिसरिन लगावें।

बकरी की बरबरी नस्ल


बकरी की बरबरी नस्ल पर जानकारी| देखिए यह विडियो
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Ashish Kumar Oct 05, 2017 10:06 AM

Training Santa ka nam batra...

Jitendra nagbanshi Sep 07, 2017 02:33 AM

Jharkhand me bakrA farming wala kaha pay jayga

Ajay das Aug 19, 2017 10:52 PM

Sir. Me bakri palan ka kam suroo karna chahta hun. Mujhe es kam ke liye bakri kaha se milegi. A kam kitni bajt me start kiya ja sakta hai Mujhe jankari de.( mob no.95XXX27)koderma jharkhand

Ahmad ali Jul 11, 2017 12:00 AM

i want to open goat farming in koderma i want the benifit of pasu palan skim in koderma my mob no 70XXX35 i want the information

SARANG KADU Feb 24, 2017 03:38 PM

मई बकरा फार्म खोलना चाहता हूं जिसके लिए मेरा फार्म तैयार हो चूका है मई आप से ये जानना चाहता हु कौन सी नस्ल का बकरा हमारे लिए अच्छा होगा हमारा जिला चंद्रपुर ( मह )

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