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भेड़ पालन

इस पृष्ठ में भेड़ पालन संबंधी जानकारी दी गई है।

परिचय

भेड़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक संरचना से जुड़ा है। इससे हमें मांस, ऊन, दूध, जैविक खाद तथा अन्य उपयोगी सामग्री मिलती है। इनके पालन-पोषण से भेड़ पालकों को अनेक फायदे हैं। अत: निम्नलिखित बातों पर उचित ध्यान देना चाहिए।

प्रजनन एवं नस्ल

अच्छी नस्लों की देशी, विदेशी एवं संकर प्रजातियों का चुनाव अपने उद्देश्य के अनुसार करना चाहिए। मांस के लिए मालपुरा, जैसलमेरी, मांडिया, मारवाड़ी, नाली शहावादी एवं छोटानागपुरी तथा अच्छे ऊन के लिए बीकानेरी, मेरीनो, कौरीडेल, रमबुए इत्यादि का चुनाव करना चाहिए। दरी ऊन के लिए मालपुरा, जैसलमेरी, मारवाड़ी, शहावादी, छोटानागपुरी इत्यादि मुख्य हैं।

इनका प्रजनन मौसम के अनुसार कराना चाहिए। 12-18 महीनों की उम्र मादा के प्रजनन के लिए उचित मानी गई है। अधिक गर्मी तथा बरसात के मौसम में प्रजनन तथा भेड़ के बच्चों का जन्म नहीं होना चाहिए। इससे मृत्यु दर बढ़ती है।

रतिकाल एवं रति चक्र

भेड़ में प्राय: 12-48 घंटे रतिकाल होता है। इस काल में ही औसतन 20-30 घंटे के अंदर पाल दिलवाना चाहिए। रति-चक्र 12-24 दिनों का होता है।

ऊन

महीन ऊन बच्चों के लिए उपयोगी है तथा मोटे ऊन दरी तथा कालीन के लिए माने गये हैं। गर्मी तथा बरसात के पहले ही इनके शरीर से ऊन की कटाई कर लेनी चाहिए। शरीर पर ऊन रहने से गर्मी तथा बरसात का बुरा प्रभाव पड़ता है। जाड़ा जाने के पहले ही ऊन की कटाई कर लेनी चाहिए। जाड़े में स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

शरीर के वजन का लगभग 40-45 प्रतिशत मांस के रूप में प्राप्त होता है।

पोषण एवं चराई

सुबह 7 से 10 बजे तथा शाम 3-6 बजे के बीच में भेड़ों को चराना तथा दोपहर में आराम देना चाहिए।

गाभिन भेड़ को 250-300 ग्राम दाना प्रति भेड़ सुबह या शाम में देना चाहिए।

मेमना की देखभाल

भेड़ के बच्चों को पैदा होने के तुरंत बाद फेनसा पिलाना चाहिए। इससे पोषण तथा रोग निरोधक शक्ति प्राप्त होती है। दूध सुबह-शाम पिलाना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा भूखा न रह जाये।

रोग की रोकथाम

समय-समय पर भेड़ों के मल कृमि की जांच करनी चाहिए और पशुचिकित्सक की सलाह के अनुसार कृमि-नाशक दवा पिलानी चाहिए। चर्म रोगों में चर्मरोग निरोधक दवाई देनी चाहिए।

रखने का स्थल

स्वच्छ तथा खुला होना चाहिए। गर्मी, बरसात तथा जाड़े के मौसम में बचाव होना जरूरी है। पीने के लिए स्वच्छ पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहना चाहिए।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखंड सरकार

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