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जैविक दूध उद्योग : भविष्य का सुनहरा विकल्प

इस पृष्ठ में जैविक दूध उद्योग : भविष्य का सुनहरा विकल्प बारे में जानकारी दी गई है।

परिचय

जैविक दुग्ध उद्योग एक ऐसी महत्वपूर्ण विधि है जिसमें किसी तरह के कीटनाशक, उर्वरक, आनुवंशिक रूप में संशोधित जीव, एंटीबायोटिक दवाओं तथा वृद्धि हार्मोन का उपयोग नहीं किया जा जाता है।

जैविक दुग्ध उत्पादक बनाने के लिए लक्ष्यों के आधार पर कुछ नियमों को शामिल किया गया है जो किसानों को उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं। इन नियमों को हम सरल शब्दों में कठोर मानक कह सकते हैं, पर एक जैविक दुग्ध उत्पादक बनने के लिए इन नियमों का पालन आवश्यक है

  • दुधारू पशु एवं उनके बच्चों को 100% शुद्ध उत्पाद खिलाना चाहिए।
  • जैविक फसलों के उपयोग के साथ-साथ घासों और चारागाओ में भी किसी तरह के सिंथेटिक उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल न करें जो जैविक उपयोग के लिए अनुमोदित नहीं किया गया हो।
  • प्राकृतिक फीड एडिटिव जैसे कि विटामिन और खनिज को भी जैविक उत्पादन में उपयोग के लिए अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • अनुवांशिक रूप से संशोधित जीवों का प्रयोग, जैविक फार्म पर वर्जित है।
  • जिस भूमि/फार्म पर जैविक फसलों को उपजाने वाले है, वह कम से कम तीन सालों तक रसायन सामग्री से मुक्त होनी चाहिए।
  • दुधारू पशुओं के बच्चों को जैविक दूध ही पिलाना चाहिए तथा किसी प्रकार के सिंथेटिक दूध का प्रयोग सख्त मना है।
  • मौसम को ध्यान में रखकर, सभी जानवरों को बाहर जाने की अनुमति दें तथा छः महीने से अधिक उम्र के पशुओं को अनुकूल मौसम के दौरान खुले चारागाहों में चरने की अनुमति दें।
  • पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए केवल मान्य स्वास्थ्य उत्पादों का उपयोग करें। एंटीबायोटिक का उपयोग न करें।
  • जैविक दूध उद्योग में उपयोग होने वाले पशुओं को किसी प्रकार का उपचारित चारा जैसे यूरिया या खाद उत्पादों को नहीं खिलाना चाहिए।
  • जानवरों के कल्याण के लिए कुछ प्रक्रियाओं को प्रतिबंधित करना चाहिए, जैसे कि डॉकिंग तथा जानवरों के तनाव को कम करने के लिए कुछ अन्य प्रक्रियाएं जैसे डोहोरनिंग का प्रयोग नहीं  करना चाहिए।
  • किसानों को जैविक मनकों के पालन के साथ-साथ उनका पर्याप्त रिकार्ड रखना होगा।
  • प्रत्येक वर्ष का नरीक्षण किया जाना चाहिए तथा उनमें सुधार आवश्यक है। किसी भी खेत का नरीक्षण बिना किसी सूचना के किया जा सकता है।

जैविक दूध उत्पादन की शुरुआत

  • संक्रमण काल

जैविक उत्पादन में शुरुआत के कुछ वर्षों में थोड़ी कठिनाइयां होती है। जैविक उत्पादन मानकों के अनुसार जिस खेत में फसल उत्पादन करेंगे, वहाँ जैविक विधियों का उपयोग कम से कम 3 सालों तक नहोना चाहिए। जब मिट्टी और मैनेजर दोनों नई प्रणाली के साथ समायोजित होते है, उस को को ‘संक्रमण  काल’ कहते हैं। इस समय कीटों तथा खरपतवारों की आबादी भी समायोजित होती है।

  • जैविक प्रमाणीकरण

के जैविक मानक किसी भी प्रमाणित कार्यालय द्वारा प्रमाणित होती है। ए.पी.डा. (एपेडा) जो इसका मुख्य कार्यलय है जिसके तहत राज्य की सभी एजेंसी जैविक उत्पादों को प्रमाणित करती है व्यापक विनियम जैविक उत्पादों को प्रमाणित करती है। एक व्यापक विनिमय जैविक दूध उत्पादन तथा फसलों की खेती के लिए राष्ट्रीय मानक (2001) में प्रालेखित लेख के अनुसार जैविक उत्पादन करना अनिवार्य है। प्रमाण पत्र में शामिल हुए किसी उच्च लागत वाली प्रमाणीकरण के बजाय प्रमाणीकरण के समूह का विपणन करना जायदा लाभदायक होगा। प्रमाणपत्र मिलने के बाद जैविक किसान स्वयं अपने ब्रांड नाम के तहत पाने उत्पाद को बाजार में बेच सकते हैं।

सफल जैविक खेती

फसल प्रणाली तथा जैविक दूध उत्पादन के संसाधन जैविक उत्पादन में किसानों को अन्य किसानों की तरह रासायनिक पदार्थों का उपयोग करके की अनुमति नहीं होती है। खेती की सफलता के लिए उत्पादन प्रणाली के डिज़ाइन तथा प्रबन्धन की जानकारी महत्वपूर्ण है। ऐसे उद्यमों का चयन करें जो एक-दुसरे के पूरक हो तथा फसलों की समस्या के लिए फसल चक्र तथा जुताई जैसी विधियों का चयन करें।

अजैविक से जैविक बदलाव के दौरान से पारंपरिक स्तर की तुलना में पैदावार कम होती है पर 3-5 साल की अवधि के बाद जैविक पैदावार में आमतौर वृद्धि होती है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश के रूप में उभरा है। लेकिन प्रदुषण और प्रदूषक विभिन्न कीटनाशकों, रसायन, दवाओं तथा हार्मोन के अभीष्ट प्रभाव के सामग्री सहित दूध तथा उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर चिंता में वृद्धि हुई है। जैविक दूध तथा दूध उत्पादों की मांग में तेजी से वृद्धि के साथ-साथ दुनिया भर में इसकी मांग बढ़ी है। भारतीय परिस्थितियों के अनुसार जैविक दूध उत्पादन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसमें किसान स्वदेशी तकनीक ज्ञान और प्रथाओं का इस्तेमाल करते हैं। जैविक दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उपर्युक्त बातों पर हमें ध्यान देना होगा जिससे यह हमारे लिए भविष्य का सुनहरा विकल्प साबित होगा।

लेखन : सैकत माजी, बी.एस.मीणा एवं सौरभ कुमार

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

 

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