सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

होम (घर) / कृषि / पशुपालन / मवेशी और भैंस / मवेशी / दूध जनित जूनोटिक रोग
शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

दूध जनित जूनोटिक रोग

इस पृष्ठ में दूध जनित जूनोटिक रोग क्या है, इसकी जानकारी दी गयी है।

परिचय

दूध जनित जूनोटिक रोग वह पशु रोग है जो संक्रमित दूध पीने से मानव में होते हैं। संक्रमित दूध पीने से होने वाले कुछ महत्वपूर्ण जूनोटिक रोग इस प्रकार हैं:

  • ब्रूसिलोसिस
  • तपेदिक
  • क्लास्ट्रीडियल संक्रमण
  • बोटसूलिज्म
  • क्रिप्टोस्पोरिडियोसिस
  • कैम्पायलो बैक्टिरियोसिस

बूसिलोसिस

ब्रूसिलोसिस सामान्यतः ब्रूसिला अबोर्टस और ब्रू. मैलिटिन्सिस जीवाणु द्वारा होता है। यह एक प्रणालीगत संक्रामक रोग है जो ब्रू. मेलिटिन्सिस(बकरी, भेड़, उंट), बू. सुइस (शूकर), ब्रू. अबोर्टस (गाय, भैंस, याक, उंट) और बू. केनिस (कुत्तों) द्वारा पशुओं में पाया जाता है। हालांकि मानव में ब्रूसिलोसिस संकमण इन चारों प्रजातियों के द्वारा होता है, फिर भी ब्रू.मेलिटिन्सिस दुनिया में सबसे अधिक प्रचलित है तथा गंभीर मामलों में रोग का कारक पाया गया है।

प्रसारण

संक्रमित भेड़, बकरी या गाय के कच्चे दूध या पनीर के सेवन से होता है। संक्रमित पशु के अपाश्चिकृत दूध में ब्रूसिला जीवाणु पाए जाते हैं जिनके सेवन से यह जीवाणु मानव में ब्रूसिलोसिस विकसित कर देते हैं। ये बैक्टिरिया एरोसीलाइज्ड़ स्त्राव में सांस लेने से, त्वचा में चोट के द्वारा,कंजाक्टिवा के संपर्क में आने से भी शरीर में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। इन प्रवेश के तरीकों के कारण यह एक व्यवसायिक रोग है जो पशु चिकित्सकों, पशु वधगृह श्रमिकों, प्रयोगशाला कर्मियों, किसानों, चरवाहों और ग्वालों को प्रभावित कर सकता है।

लक्षण

इस रोग के लक्षण प्रारंभिक संक्रमण से उष्मायन अवधि तक (दिन से महीनें तक) विकसित होते रहते हैं। हालांकि कुछ व्यक्तियों में हल्के लक्षण विकसित हो सकते हैं, दूसरों में लंबी अवधि के जीर्ण लक्षण विकसित हो सकते हैं। सामान्यत: बुखार (सबसे आम, आंतरयिक और रिलेप्सिंग) पसीना आना, शरीर तथा जोड़ों में दर्द, थकान, कमजोरी, चक्कर आना, सांस लेने में कठिनाईं, सीने तथा पेट में दर्द, बढ़ा हुआ जिगर और तिल्ली इत्यादि लक्षण इस रोग में देखे जाते हैं।

रोकथाम

पशु टीकाकरण, पशु परीक्षण तथा संकमित पशु उन्मूलन द्वारा रोकथाम संभव है। इस रोग के लिए वर्तमान में कोई. मानव टीका उपलब्ध नहीं है। वह क्षेत्र जहां रोग उन्मूलन संभव नहीं है वहां मनुष्य के प्रति जोखिम को कम करने निवारक उपाय अपनाए जाते हैं। इनमें डेयरी उत्पादों का पाश्चिकरण करना तथा अपाश्चिकृत उत्पादों के उपयोग से परहेज सम्मिलित हैं।

तपेदिक

माइको बैक्टिरियम बौविस जनित क्षय रोग आमतौर पर होने वाले रोग हैं परन्तु आजकल मानव से मानव द्वारा क्षय रोग का प्रसार गोजातीय डेयरी उत्पादों द्वारा क्षय अर्जित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। क्षय रोग आमतौर पर फेफड़ों के उपरी भाग में शुरू होता है। तथापि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बैक्टिरिया के प्रजनन को रोक कर संक्रमण को निष्क्रिय कर सकती है, परन्तु अगर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ जाए तो वह बैक्टिरिया को रोक नहीं पाती तथा वह सक्रिय होकर फेफड़ों में पनपने और शरीर के अन्य स्थानों में फैलने लगते हैं।

प्रसारण

यह रोग अपाश्चिकृत दूध के सेवन से फैलता है। पहले यह बच्चों में टीबी का मुख्य कारण था परन्तु अब दूध पाश्चिकृत किया जाता है अतः दूध से इसके फैलने की संभावना कम हो गई है।

लक्षण

इसके लक्षण विकसित होने में महीनों लग जाते हैं। सामान्य लक्षणों में थकान, कमजोरी, वजन घटना और रात्रि में पसीना आना प्रमुख है। स्थिति बिगड़ने पर खांसी, सीने में दर्द, खांसी के साथ उत्तक कण और रक्त आना इत्यादि लक्षण दिखने लगते हैं। यदि संक्रमण शरीर में फैल जाए तो लक्षण अंगों पर निर्भर करते हैं।

क्लौस्टीडियल संक्रमन

क्लौस्टीडियल प्रजातियां एनएरोबिक जीवाणु है जो खाद्य जनित रोग का कारक हो सकती है। यह जीवाणु पर्यावरण, मानव तथा पशु के जठरात्र के सामान्य निवासी के रूप में बड़े पैमाने में पाया जाता है तथा मल संदूषण के कारण खाद्यों में आ जाता है।

क्लौस्टीडियम जनित अन्य रोगों की तरह यह भी अपने एक्सोटोक्सिन के द्वारा भारी क्षति पहुंचाता है, खासकर जब भोजन में बड़ी मात्रा में पहुंच गया हो।

लक्षण

पेट में ऐंठन, दस्त, बुखार सामान्य तथा शरीर में प्रविष्ट होने के 24 घंटो के अंदर लक्षण दिखाई देने लगते हैं। बुजुर्ग और बच्चे सबसे जल्दी प्रभावित होते हैं।

बोटयूलिज्म

यह रोग क्लौस्टीडियम बोटयूलिनम प्रजाति के जीवाणु द्वारा उत्पन्न न्यूरोटॉक्सिन के संपर्क में आने से होता है। यह न्यरोटॉक्सिन सात प्रकार का है। विषाक्त पदार्थ ही मानव में रोग उत्पन्न करते हैं। मनुष्य और पशु इन जीवाणु के स्पर्शोन्मुख वाहक और एम्पलीफायर हो सकते हैं परन्तु कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र के चलते खुद भी रोगग्रस्त हो सकते हैं। डब्बा बंद तथा एनएरोबिक वातावरण पैक में बंद खाद्य पदार्थों की यह आम समस्या है। इस रोग का कोई विशिष्ट जोखिम समूह नहीं है। यह किसी को भी, कभी भी हो सकता है।

लक्षण

कब्ज, मांसपेशियों में कमजोरी, सिर के हिलाने को नियंत्रित करने में असमर्थता, सुस्ती, मांसपेशियों में टोन तथा समन्वय की कमी, सांस लेने में संकट आदि विशेष हैं।

क्रिप्टोस्पोरिडियोसिस

क्रिप्टोस्पोरिडियोसिस एक बिजाणु बनाने वाला परजीवी हैं जो कि पर्यावरण एवं खाद्य पदार्थों, जैसे सलाद, सब्जी, मांस तथा मांस उत्पादों, दूध इत्यादि में व्यापक रूप से पाया जाता है। क्रिप्टोस्पोरिडियम पार्वम बछड़ों, भेड़ और हिरण में रोगजनक के संक्रमित रूप में महत्वपूर्ण माना जाता है तथा यही इसके स्पर्शोमुख पशु है, जो जलाशयों में इस जीवाणुको मल द्वारा प्रसारित करते हैं।

प्रसारण

मानव संक्रमण या तो जानवरों के मल के साथ सीधा संपर्क में आने से दूषित या अपर्याप्त पके हुए भोजन के सेवन, बिना किटाणुशोधन किए गए पानी में तैरने से होता है।

लक्षण

100 से भी कम गर्भित जीव नैदानिक रोग पैदा कर सकते हैं। रोग के लक्षण ज्ञात होने की अवधि (2-14 दिन) के बाद अत्यधिक स्व-सीमित दस्त, पेट दर्द, ऐंठन, हल्का बुखार, सात दिनों तक होते हैं। बाद में भूख की कमी, वजन घटना जोकि कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले मरीजों में ज्यादा देखा गया है। इस रोग में इलाज के बाद भी रोग के दोबारा होने की उच्च संभावना देखी गई है तथा 14 दिनों के अंदर फिर दस्त का दौरा पड़ सकता है।

रोकथाम

इस जीवाणु को अति ठंडे तापमान पर रखने,64 डिग्री से ज्यादा तापमान पर सुखाने तथा विकिरण द्वारा नष्ट किया यह जा सकता है, परन्तु यह उपभोग में लाए जाने वाले आम डिसइन्फस्टनट के लिए प्रतिरोधी है।

कैम्पायलोबैक्टिरियोसिस

पूर्व में इस जीवाणु को भोजन विषाक्ता के लिए बहुत कमतर आंका गया था। इसके मामले अपाशिकृत दूध तथा अनुचित और अपभरित पके मांस के सेवन से जुड़े हैं। यह जीवाणु व्यापक रूप से कई जानवरों में पाया जाता है। साधारणतः पशु में रोग का कोई लक्षण नहीं दिखा परन्तु भेड़ में इस जीवाणु से जुड़े गर्भपात के मामले इस जीवाणु को शूकरों, पक्षिय, कुत्ते, बिल्लियों, सारांश अपाचिकृत दूध तथा संक्रमित जल के नमूनों से भी पृथक किया गया है। इस जीवाणु की दो प्रजातियां, कैम्पायलो-बैक्टर जेन्युनाई और कैम्पायलों बैक्टर कोलाई के 100 से भी कम व्यवहार्य जीव भी मानव में संक्रामक सिध्द हो सकते हैं।

सारांश

इससे हमें यह संदेश मिलता है कि मानव जाति को पाश्चुरीकृत दूध का ही सेवन करना चाहिए और दूध के रख-रखाव पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

लेखन: लक्ष्मी प्रियदर्शिनी एवं अंजली अग्रवाल

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

2.91304347826

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
Back to top

T612019/10/15 01:33:40.540955 GMT+0530

T622019/10/15 01:33:40.570773 GMT+0530

T632019/10/15 01:33:40.808083 GMT+0530

T642019/10/15 01:33:40.808607 GMT+0530

T12019/10/15 01:33:40.517127 GMT+0530

T22019/10/15 01:33:40.517289 GMT+0530

T32019/10/15 01:33:40.517427 GMT+0530

T42019/10/15 01:33:40.517571 GMT+0530

T52019/10/15 01:33:40.517655 GMT+0530

T62019/10/15 01:33:40.517725 GMT+0530

T72019/10/15 01:33:40.518512 GMT+0530

T82019/10/15 01:33:40.518698 GMT+0530

T92019/10/15 01:33:40.518947 GMT+0530

T102019/10/15 01:33:40.519174 GMT+0530

T112019/10/15 01:33:40.519228 GMT+0530

T122019/10/15 01:33:40.519320 GMT+0530