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दुधारू पशुओं की देखभाल हेतु महत्वपूर्ण जानकारी

इस पृष्ठ में दुधारू पशुओं की देखभाल हेतु महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है।

गर्मियों में गर्भाधान के लिए भैंसों का रखरखाव कैसे करें?

  1. भारत एक  उष्णकटिबंधीय देश है ततः उत्तरी भारत में कुछ समय के दौरान अत्याधिक गर्मी होती है। भैंसों की त्वचा का रंग काल होने के कारण शरीर से ऊष्मा (गर्मी) निकलने में गायों की अपेक्षा मुशिकल होती है। भैंसों में त्वचा व अघस्त्व्क वसा कि सतह भी मोटी होती है तथा स्वेद (पसीने की) ग्रंथियां कम होती है। अतः भैंसों में त्वचा की अपेक्षा श्वसन तंत्र (साँस) द्वारा अधिक ऊष्मा (गर्मी) निकलती है। भैंसों में शांत मंद्काल (हीट) की समस्या आमतौर पर पाई गई है।
  2. इस्ट्रोजन हार्मोन जो कि पशु के मद के व्यवहार को प्रभावित करता है, गर्मियों में तापमान अधिक होने के कारण इस हार्मोन की मात्रा कम हो जाती है। यदि मद के लक्षणों का पता चल भी जाता है तो पशु के शरीर का तापमान अधिक होने के करण गर्भाधान के बाद गर्भ नहीं ठहर पाता। क्योंकि वातावरण का तापमान बढ़ने से निषेचन की क्रिया तथा भ्रूण को भी क्षति पहुँच सकती है। ऐसा देखा गया है कि यदि गाय के शरीर का तापमान सामान्य से 0.9 डिग्री फारेनाईट अधिक हो तो गर्भाधान की दर में 13% तक कमी हो सकती है।
  3. भैंसों मद की अवधि 21 दिन है तथा मद 10-12 घंटे तक रहता है। यदि मादा को मद समाप्त होने के 6 घंटे पहले या समाप्त होने के कुछ देर बाद गर्भधान कराया जाए तो गर्भधारण की संभावना काफी बढ़ जाती है।
  4. भैंसों के मद का प्रदर्शन गर्मियों में कम समय के लिए होता है। कभी-कभी लक्षण दिखाई ही नहीं देते। मद के लक्षण अधिकतर दिन में कम तथा रात में अधिक दिखाई देते हैं। अतः मद के लक्षणों की पहचान के लिए भैंसों का ध्यान रखना चाहिए। शेल्ष्मा स्त्राव कम मात्रा में होता है या होता ही नहीं। भैंस  तेज आवाज में रंभाती है। भैंसों में टीजर सांड का प्रयोग काफी प्रभावशाली रहता है। पशु बेचैन रहता है तथा शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  5. ब्यौने के बाद गर्भाशय को सामान्य अवस्था में आने में डेढ़ से दो माह का समय लग जाता है। अतः व्यौने के 60-90 दिनों के अंदर भैंस का गर्भाधान करना चाहिए} व्यौने के 45 दिनों तक मद के लक्षणों को देखना चाहिए। मद के लक्षण दिखाई देने पर गर्भाधान कराना चाहिए। यदि भैंस 90 दिन तक मद में न आये तो तो उसका इलाज कराना चाहिए। यदि तीन बार गर्भाधान कराने पर भी पशु गर्भित न हो तो उसे रिपीट ब्रीडर कहते हैं। पशु को मड में न आना या गर्भ न ठहरना, या गर्भ ठहरने के बाद गर्भपात हो जाना भी रिपीट ब्रीडिंग है।
  6. गर्मियों में भैंसों को गर्म हवा से बचाना चाहिए। भैंसों के लिए गर्मियों में तालाब की व्यवस्था होनी चाहिए जोकि भैंसों से बचाने का सबसे अच्छा उपाय है। यदि तालाब की व्यवस्था न हो तो गर्मियों में भैंसों को तीन चार दिन बाद पानी नहलाना चाहिए तथा छायादार स्थान पर रखना चाहिए। पशुशाला में गर्म हवाओं से बचाव के लिए कीटनाशक घोल (मैलाथियान 0. 5-1%) का पशु तथा पशु आवास में 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव् करें। 6 महीने से कम उम्र के पशुओं पर छिड़काव् न हो तथा ध्यान रखे की कीटनाशक पशु आहार या पीने के पानी में न मिले।
  7. गर्मियों में भैंसों के खान-पान का ख्याल रखें क्योंकि तापमान बढ़ने पर पशु कम चारा खाता है। हर चारा खिलाएं। अधिक उर्जायुक्त पदार्थ देने चाहिए क्योंकि गर्म के दौरान शुष्क पदार्थ अंतर्ग्रहण की क्षतिपूर्ति हो सके।
  8. इसके लिए दाने की मात्रा बढ़ा सके। लेकिन दाना शुष्क पदार्थ के 55-60% से अधिक नहीं होना चाहिए। नहीं तो दूध में वसा में कमी, अम्लरक्तता, पशु द्वारा कम चारा खाने आदि की समस्या हो सकती है। चारा सुबह व शाम के समय दें। दिन में जब तापमान अधिक हो तो चारा नहीं देना चाहिए। आहार में रेशें की मात्रा गर्मी बढ़ाती है लेकिन पर्याप्त मात्रा में रेशा भोजन को आमाशय में पचाने के लिए जरुरी है। कुल अपक्व (क्रूड) प्रोटीन की मात्रा 17% से अधिक नहीं नहीं चाहिए।
  9. गर्मियों में भैंसों में पीने की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। ओआबू साफ व ठंडा होना चाहिए। गर्मी से तनाव में भैंसों के शरीर में पानी का संतुलन, आयन-संतुलन तथा अम्ल व क्षार का संतुलन बनाए रखने में खनिज तत्व सोडियम व् पोटेशियम महत्वपूर्ण हैं। दैनिक आहार में पोटेशियम की मात्रा 1.2-1.5% तथा सोडियम 0.45 से 0.55% तक होना चाहिए।
  10. भैंसों को प्रतिरोधक (बफर) का घोल भी देना चाहिए जिससे अम्लरक्तता (एसिडोसिस) से भैंसों का बचाव होता है। ऐसा देखा गया है कि यदि भैंसों को ब्योने से पहले 60 दिन तथा 90 दिन ब्यौने के बाद तक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन ई, विटामिन ए, जिंक, कॉपर आयद संपूरक के रूप में दिए जाएँ तो प्रजनन क्षमता बेहतर होती है तथा बीमारियों के होने की संभावना भी बेहतर दिखाई देते हैं तथा गर्मी का गर्भाधान पर असर भी कम होता है। गर्मियों में नियासिन  ६ ग्राम प्रतिदिन देने से भी उत्पादन पर अच्छा प्रभाव देखा गया है।
  11. नियतकालीन कृत्रिम गर्भाधान की विधि का प्रयोग किया जा सकता है। इसमें मद के लक्षणों को देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस विधि में पशु को निश्चित समय पर हार्मोन  के टीके लगाकर निशिचत समय पर गर्भाधान किया जाता है। वीर्य हमेशा सही जगह से ही लेना चाहिए। गर्मियों में भैंसों को ऐसे वीर्य से गर्भित कराएँ जो ठंडे तापमान में संरक्षित किया गया हो। गर्भाधान हमेशा प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा ही करवाना चाहिए।

लेखन: अंजलि अग्रवाल व आर.सी.उपाध्याय

एकीकृत खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली में डेरी व्यवसाय की भूमिका

एकीकृत कृषि प्रणाली क्या है?

एकीकृत कृषि प्रणाली खेती के एक रूप है, जिसके अंतर्गत पशुधन, बागवानी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, कृषि वानिकी आदि और सस्य एवं फसलों की प्रणालियों को टिकाऊ आजीविका सुरक्षा, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्यों हेतु एकीकृत किया जाता है। आम तौर पर, एकीकृत कृषि प्रणाली में नेक उद्यम  के जैविक अपशिष्ट को अन्य उद्यम के निवेश के रूप में प्रयोग किया जाता है, उदाहण के लिए, पोल्ट्री के अपशिष्ट को मछली पालन व्यवसाय में प्रयोग किया जा सकता है, जिससे निवेश का कुशल उपयोग सुनिश्चित हो जाता है।

एकीकृत कृषि प्रणाली के प्रमुख घटक

  1. फसलें- धान गेहूँ आदि अनाज की फसलें, दलहन फसलें, तिलहन आदि।
  2. पशुधन- डेयरी पशु, कुक्कट, बकरी, सूअर आदि।
  3. बागवानी- फल, सब्जियां और फूल आदि।
  4. मछली पालन- स्वदेशी और विदेशी कार्य के विभिन्न प्रकार
  5. कृषि वानिकी – इमारती लकड़ी संयंत्र, आदि ।
  6. मधुमक्खी पालन

एकीकृत कृषि प्रणाली के लाभ

  1. विभिन्न अनुसन्धान संगठनों द्वारा किये गये शोध प्रयास्यों ने साबित कर दिया है कि प्रति इकाई उत्पादकता एकीकृत कृषि प्रणाली में मोनोकल्चर प्रणाली से अधिक है।
  2. एक उद्यम के जैविक अपशिष्ट उत्पाद अन्य उद्यम की निवेश  के रूप में  प्रयोग किया जाता है जो निवेश की बर्बादी कम करता ही।
  3. एकीकृत कृषि प्रणाली के घटक के रूप में फसलें ( दोनों अनाज आदि) डेयरी, मछली, मुर्गी पालन, फल और सब्जियां आदि हैं, जो देश की पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  4. एकीकृत कृषि प्रणाली में मुख्य रूप से जैविक निवेशों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह कृषि प्रणाली अनुकूल पर्यावरण के संरक्षण में मदद करता है।
  5. एकीकृत कृषि प्रणाली में विविध घटक साल भी आय के स्रोत को सुनिश्चित करता है और बेरोजगारी के जोखिम को कम करता है।
  6. एक उद्यम के असफल हो जाने पर किसान भाई दुसरे उद्यम से अपन नुकसान के भरपाई कर सकते हैं जो आजीविका की सुरक्षा में मदद करता है।

एकीकृत कृषि प्रणाली में डेयरी की भूमिका

  1. दूध का उत्पादन एक सतत आधार पर साल भर में आय प्रदान करता है।
  2. दूध संतुलित आहार है, तो देश के लिए पोषक तत्वों की सुरक्षा प्रदान करता हा।
  3. विभिन्न मूल्य वर्द्धक उत्पाद जैसे घी, छेना, दही, मिठाई, पनीर, लस्सी इत्यादि किसानों को लाभकारी मूल्य का आश्वासन देते हैं।
  4. पशुओं का मूत्र यूरिया का एक समृद्ध स्रोत है,अतः इसे एक उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  5. गोबर जैविक स्वाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  6. गोबर और पोल्ट्री, कूड़े एक साथ मिश्रित कर मछली पालन के लिए निवेश के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  7. पशुओं के कचरे बायोगैस संयंत्र के इनपुट रूप में इस्तमाल किया जा सकता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर परिवारों के उर्जा की आवश्यक को पूरा कर सकते हैं।

संकर नस्ल के पशुओं में थैलिरियोसिस से बचाव के टीके लगवाएं

  • जून के अंतिम सप्ताह तक गलाघोंटू एवं लंगड़ा बुखार बीमारी से बचाव के टीके अवश्य लगवाएं।
  • कुछ मादा पशुओं (मुख्यतः भैसों) में गर्मी के लक्षण कम तथा रात्रि में प्रदर्शित होते हैं। अतः पशुपालक अपने पशुओं का ध्यान रखें।
  • जिन पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान किये हुए 50-60 दिन हो चुके हों उन सभी की गर्भ की जाँच करनी चाहिए।
  • पशुओं को संतुलित आहार दें जिससे उनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता बनी रहे।
  • पशुओं के राशन में मौसमानुसार  आवश्यक बदलाव किया जाना चाहिए गेहूँ के चोकर, सोयाबीन छिलका की मात्रा बढ़ाएं। इस मौसम में रेशेदार आहार कम खिलाएं पानी अधिक पिलायें, भैंसों के नहलाएं की व्यवस्था भी अवश्य करें।
  • चारे के लिए बोई गई चरी, मक्का एवं बहुवर्षीय घासों की कटाई करें। फरवरी में चारे के लिए लिए बोई गयी ज्वार की कटाई 35-40 दिन की अवस्था पर करें।
  • गर्मियों के मौसम में पैदा की गिया ज्वार जिसमें सिंचाई कम की गई हो, में जहरीला पदार्थ हो सकता है, जो पशुओं के लिए हानिकारक है। अप्रैल में बीजाई की गई ज्वार के खिलाने से पहले 2-३ बार पानी अवश्य दें।
  • चिचड़ियों व् पेट के कीड़ों से बचाव का उचित प्रबन्धन करें।
  • गर्मी से बचाव हेतु पशुओं को वृक्षों की छाया में रखें एवं पशुओं का लू से बचाव हेतु पशुओं को वृक्षों की छाया में रखें। विशेषकर प्रातः 11 बजे से सायं 4 बजे तक पशुओं को छाया में ही रखें।
  • जहाँ तक संभव हो रात्रि के समय पशुओं को खुले स्थान पर रखें। जिससे कि पशु के शरीर का तापक्रम बढ़ जाता है।

लेखन: अन्वय सरकार एवं आसिफ मोहम्म्द

सर्दी के मौसम में दुधारू पशुओं की उचित देखभाल

उत्तरी क्षेत्र मेंवर्ष के चार महीने नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी और फरवरी का समय शरद ऋतु  माना जाता है। डेरी व्यवसाय के लिए यह सुनहरा काल होता है क्योंकि अधिकतर गायें एवं भैसें इन्हीं महीनों में व्याती हैं। जो गाय व भैसें अक्तूबर या नवम्बर में ब्याती है, उनके लिए समय अधिकतम दूध उत्पादन का  होता है। यह काल दुधारू पशुओं, विशेषकर भैसों, के प्रजनन कें लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि अमूमन भैंस इसी मौसम में गाभिन होती है।  कड़ी सर्दी के कारण इन दिनों में विभिन्न रोगों से ग्रसित होकर नवजात बच्चों की मृत्युदर भी अधिक हो जाती है। इसलिए दुधारू पशुओं से अधिक उत्पादन व अच्छे प्रजनन क्षमता बनाये रखने के लिए सर्दी के मौसम में पशुओं के रख-रखाव के कुछ विशेष उपाय किये जाने को आवश्यकता होती है, जिनका उल्लेख इस लेख में किया गया है।

आहार एवं जल प्रबन्धन

  • अधिक सर्दी के मौसम में, सर्दी के प्रभाव से बचने हेतु दुहारू पशुओं की उर्जा की आवश्यकता बढ़ जाती है। इसे पूरा करने के लिए दुधारू पशुओं को प्रतिदिन 1 किलोग्राम दाना मिश्रण प्रति पशु, उनकी अन्य पोषण आवश्य्क्तातों के अतिरिक्त खिलाना चाहिए, जिससे दुधारू पशुओं का दुग्ध उत्पादन बना रहता है।
  • दुधारू व गाभिन पशुओं को अच्छी गुणवत्ता के हरे चारे जैसे बरसीम व जई की भरपेट उपलब्धता के साथ-साथ सुखा चारा जैसे गेंहूँ की तुड़ी (कम से कम 2-३ किलोग्राम प्रति पशु प्रतिदिन) भी अवश्य खिलाएं इससे इस मौसम में पशु में अधिक उर्जा बनी रहती है। खनिज-मिश्रण में फास्फोरस की मात्रा बढ़ा दें। पशुओं को गीला चारा बिलकुल न दें, अन्यथा अफरा होने की संभावना बढ़ जाती है। जाड़े के दिनों में पशु को हरा चारा जरुर खिलाएं और कम लागत में अधिक दूध पाएं।
  • अत्यधिक दूध देने वाली गायों व भैसों के राशन में फु-फेंट सोयाबीन या बिनौले का इस्तेमाल करके राशन की ऊष्मा सघनता को बढ़ाया जा सकता है, जिससे इन पशुओं का दुग्ध उत्पादन बना रहता है।
  • इन दोनों पशुओं के पीने का पानी अक्सर अधिक ठंडा होता है, जिसे पशु कम मात्रा में पीते हैं। इसलिए यह ध्यान रखा जाए कि पानी का तापमान बहुत कम न हो। सामान्यतः पशु 15-20 सेंटीग्रेड पानी के तापमान को अधिक पसंद करते हैं। कोशिश करें कि पशुओं के लिए ताजे पानी की व्यवस्था हो एवं ओवरहेड टैंक के ठन्डे पानी को पशुओं को न पिलाएं।

आवास प्रबन्धन

  • वातावरण में धुंध व बारिश के कारण अक्सर पशुओं के बाड़ों के फर्श गीले रहते हैं जिससे पशु ठन्डे में बैठने से कतराते हैं। अतः इस मौसम में अच्छी गुणवत्ता का बिछावन तैयार करें, जिससे कि उनका बिछावन 6 इंच मोटा हो जाए। इस बिछावन को प्रतिदिन बदलने की भी आवश्यकता होती है। रेत या मेट्ट्रेस्स का बिछावन पशुओं के लिए सर्वोत्तम माना गया है क्योंकि इसमें पशु दिनभर में 12-14 घंटे से अधिक आराम करते हैं, जिससे पशुओं की उर्जा क्षय कम होती है।
  • नवजात एवं बढ़ते बछड़े-बछबड़ियों को सर्दी व शीट लहर से बचाव की विशेष आवश्यकता होती है। इन्हें रात के समय बंद कमरे या चरों ओर से बंद शेड के अंदर रखना चाहिए पर प्रवेश द्वारा का पर्दा/दरवाजा हल्का खुला रखें जिससे कि हवा आ जा सके। तिरपाल, पौलिथिन शीट या खस की टाट/पर्दा का प्रयोग करके पशुओं को तेज हवा से बचाया जा सकता है।

स्वास्थ्य प्रबन्धन

  • ठण्ड में पैदा वाले बछड़े-बछबड़ियों के शरीर को बोरी, पुआल आदि से रगड़ कर साफ करें, जिससे उनके शरीर को गर्मी मिलती रहें और रक्तसंचार भी बढ़े। ठण्ड में बछड़े-बछबड़ियों का विशेष ध्यान रखे, जिससे  कि उनकी सफेद दस्त, निमोनिया आदि रोगों से बचाया जा सके।
  • याद रहे, कि पशुघर के चारों तरफ से ढक का रखने से अधिक नमी बनती है, जिससे रोग जनक कीटाणु के बढ़ने की संभावना होती है। ध्यान रहे, कि छोटे  बच्चों के बाड़ों के अदंर का तापमान 7-80 सेंटीग्रेड से कम न हो। यदि आवश्यक समझें, तो रात के समय इन शेडों में हीटर का प्रयोग भी किया जा सकता है। बछड़े-बछड़ियों को दिन के समय बाहर धुप में रखना चाहिए तथा कुछ समय के लिए उन्हें खुला छोड़ दें, ताकि वे दौड़-भाग कर स्फ्रुतिवान हो जाएँ।
  • अधिकतर पशु पालक सर्दियों में रात के समय अपने पशुओं को बंद कमरे में बांध का रखते हैं और सभी दरवाजे खिड़कियों बढ़ कर देते हैं, जिससे कमरे के अंदर का तापमान काफी बढ़ जाता है उअर कई दूषित गैसें भी इकट्ठी हो जाती है,जो पशु के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। अतः ध्यान रखें कि दरवाजे-खिड़कियाँ पूर्णतयः बंद न हो।
  • अत्यधिक ठण्ड में पशुओं को नहलाएं नहीं, केवल उनकी ब्रुश से सफाई करे, जिससे की पशुओं के शरीर से गोबर, मिट्टी आदि साफ हो जाएं। सर्दियों के मौसम में पशुओं व छोटे बछड़े-बछबड़ियों को दिन में धुप के समय हो ताजे/गुनगुने पानी से ही नहलाएं।
  • अधिक सर्दी के दिनों में दुधारू पशुओं के दूध निकालने से पहले केवल पशु के पिछवाड़े, अयन व थनों को अच्छी प्रकार ताजे पानी से धोएं। ठंडे पानी से थनों को ढोने से दूध उतरना/लेट-डाउन अच्छी प्रकार से नहीं होता और दूध दोहन पूर्ण रूप से नहीं हो पाता।
  • इस मौसम में अधिकतर दुधारू पशुओं के थनों में दरारें पड़ जाती है, ऐसा होने पर दूध निकालने के बाद पशुओं के थनों पर कोई चिकानी युक्त/एंटीसेप्टिक क्रीम अवश्य लगायें अन्यथा थनैला रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। दूध दुहने के तुरंत बाद पशु का थनछिद्र खुला रहता है जो थनैला रोग का कारक बन सकता है, इसलिए पशु को खाने के लिए कुछ दे देना चाहिए जिससे कि वह लगभग आधे घंटे तक बैठे नहीं, ताकि उनका थनछिद्र बंद हो जाए।

लेखन: मदन लाल कंबोज, एस.पी.लाल, ऋतु चक्रवर्ती एवं जैंसी गुप्ता

 

स्रोत: राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान

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