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पालतू पशुओं में गर्भ निदान की विभिन्न विधियाँ

इस पृष्ठ में पालतू पशुओं में गर्भ निदान की विभिन्न विधियाँ क्या है, इनकी जानकारी दी गयी है।

परिचय

विभिन्न पालतू पशुओं में गर्भ वाली मादा की पहचान प्रारंभिक अवस्था में किया जाना, एक महत्वपूर्ण कदम है। गर्भ निदान, पशु में विकसित होने वाले लक्षणों, मलाशय व योनि मार्ग आधारित तथा प्रयोगशाला जांच के द्वारा किया जाता है।

गर्भवती के लक्षण

  • मदचक्र बंद हो जाता है।
  • गर्भवती मादा स्वभाव एवं व्यवहार में सीधी हो जाती है।
  • पशु का शारीरिक भार तथा पेट का आकार बढ़ जाता है।
  • गर्भावस्था के अंत तक स्तन में परिवर्तन हो जाता है तथा अंतिम 15 दिनों के दौरान थनों में उभार आ जाता है।

मलाशय आधारित जांच

यह जांच गोपशु, भैंस व घोड़ी में ही संभव होती हैं तथा विश्वसनीयता, सरलता व कम खर्च के आधार पर यह सबसे अच्छी विधि मानी जाती हैं। इस विधि में एक माह के गर्भ से लेकर अंत तक की जांच (अनुभव के आधार पर) के साथ-साथ अंडाशय व गर्भाशय आदि में किसी असामान्य स्थिति का पता भी किया जा सकता है। गोपशुओं में गर्भाशय विकास निम्नानुसार होता है। दो माह की गर्भावस्था में भ्रूण का आकार 4-5 से.मी होता है तथा गर्भाश्य सँग या हार्न में फिसलन का आभास मिलता है।

तीन से चाह माह की गर्भवती में गर्भ धारण करने वाले हार्न का आकार बढ़ जाने का आभास मिलता है जिसकी तुलना खाली हार्न से की जा सकती है। गर्भ के 90 दिन पश्चात् गर्भाशय के आकार में काफी वृद्धि हो जाती है जिसमें अंगुलियों से थपथपाने पर तैरते हुए भ्रूण का आभास किया जा सकता है। चौथे है:माह के प्रारंभिक दिनों में विकसित हो रहे भ्रूण पत्रों का अनुभव होने लगता है जोकि माह के अंत में काफी बड़े हो जाते है। इस अवधि में गर्भाशय रक्तवाहिनी का विकास भी हो जाता है जिसको अंगूठे व अंगुली से स्पर्श करने पर नाड़ी चलने का आभास होता है। पांच माह से अधिक के गर्भ की जांच में यह ध्यान रखें कि पांचवें माह के दौरान गर्भाशय नीचे बैठ जाता है जिसका आभास थोड़ा कठिनाई व अनुभव आधारित है। साढ़े छह माह के गर्भ का निदान गर्भाश्य के आकार, श्रुणपत्रों के स्पर्श, रक्तवाहिनी की नाड़ी गति तथा गर्भाशय मुख तक हुए खिंचाव के साथ-साथ भ्रूण के अंगों के स्पर्श से किया जा सकता है।

इस जांच के दौरान गर्भाशय में रूग्णताजन्य परिवर्तनों के साथ विभेदात्मक बिंदुओं को ध्यान में रखकर गर्भ निदान किया जाना चाहिए। पक्युक्त गर्भाश्य होने पर गर्भाशय के दौन हार्न |सहित गर्भाशय के आकार में समान वृद्धि होती है, उसमें भ्रूणपत्र नहीं होते जबकि गर्भ में एक ही हार्न का विकास होता है तथा भ्रूणपत्र पाए जाते है। पीवयुक्त गर्भाशय में पीव की उपस्थिति योनि मुख पर भी देखी जा सकती है।

योनिमार्ग आधारित जांच

गर्भ के दौरान उपयुक्त आकार के स्मैकुलम को योनि में. डालकर देखने से योनि भित्ति का रूखापन व सिकुड़न देखी जासकती है। गर्भ के 50 दिन होते-होते गर्भाशय मुख पर भूरों व है।मजबूत सी दिखने वाली सील भी देखी जा सकती है।

प्रयोगशाला जांच विधियां

इन विधियों में अल्ट्रासोनिक उपकरण, प्रिगनेंट मेयर सौरम टेस्ट, ओवीस्कैन से परीक्षण, आदि प्रमुख प्रयोगशाला विधियां हैं। इनमें से कुछ उपयोगी विधियों का वर्णन निम्नानुसार है।

  • उपर्युक्त विधियों में अल्ट्रासोनिक उपकरण का प्रयोग शूकर, भेड़ व बकरी में गर्भ निदान हेतु उपयुक्त माना। गया है। यह विधि भ्रूण के लिए सुरक्षित होती हैं तथा 30-50 दिन की गर्भावस्था का 90 प्रतिशत सही-सही निदान किया जा सकता है। इस विधि में मादा के मलाशय में उपकरण डालकर भ्रूण की हृदयगति, नाड़ी व एकत्रित द्रव से उत्पन्न परिवर्तित तरंगों की फ्रीक्वेंसी के आधार पर निदान किया जा सकता है। इस कार्य हेतु प्रशिक्षित तकनीशियन की आवश्यकता होती है।
  • बेरियम क्लोराइड द्वारा 31-200 दिनों की गर्भावस्था का निदान किया जा सकता है तथा जांच से 95-100 प्रतिशत सही निदान नतीजे मिलते हैं। इस जांच के लिए 1 प्रतिशत बेरियम क्लोराइड की 5-6 बूंद गर्भवती मादा के 5 मि.ली. मूत्र में मिलाते हैं एवं दूसरी परखनली में शुष्क मादा के मूत्र में भी बेरियम क्लोराइड की समान मात्रा डालते हैं। देखने पर गर्भवती मादा का मूत्र । यथावत दिखाई पड़ता है जबकि शुष्क मादा के मूत्र में सफेद अवक्षेप बन जाता है। यह जांच केवल उन्हीं पशुओं पर की जानी चाहिए जो चरागाह में चरने के लिए न जाकर बाड़े में ही हार्मोन रहित आहार पर पाले जा रहे | ह क्योंकि चारे के साथ घास में इस्ट्रोजेन की उपस्थिति के कारण शुष्क पशुओं में मूत्र में बेरियम क्लोराइड जांच पर अवक्षेप बनता है।
  • प्रिगनेंट मेयर सीरम जांच केवल घोड़ी में गर्भावस्था के निदान हेतु काम आती है। इस विधि से निषेचन के 50-85 दिनों के बाद गर्भ निदान किया जा सकता है। इस परीक्षण के लिए गर्भवती घोड़ी के 10 मि.ली. सीरम को ऐसी मादा खरगोश जो विगत 30 दिनों से नर से अलग रखी गई हो, के कान की शिरा में इंजेक्शन लगा दिया जाता है। इंजेक्शन के 48 घंटे उपरान्त खरगोश का वध करके या शल्य क्रिया द्वारा अंडाशय में गहरे लाल रंग के पुटक की उपस्थिति देखी जा सकती है।
  • ओबीस्कैन द्वारा भेडू, गाय, घोड़ी व कुत्तौ आदि में गर्भ निदान अत्यन्त सरलता से सही-सहीं किया जा सकता है। इस यंत्र से 30 दिन के गर्भ का पता सरलता से लगाया जा सकता है।

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

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