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शुक्राणु घारिता: वीर्य उर्वरता का आधार

इस पृष्ठ में शुक्राणु घारिता: वीर्य उर्वरता का आधार की जानकारी दी गयी है।

परिचय

 

भारत की 70 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और पशुपालन उनकी आय का एक मुख्य स्रोत हैं। नवीनतम तकनीकीकरण व औद्योगिकीकरण के बावजूद, आज भी संपूर्ण भारत में पशुओं का उपयोग न सिर्फ दूध बल्कि पारम्परिक विधि द्वारा कृषि में होता है। हांलाकि पशुओं में प्रजनन प्राकृतिक व कृत्रिम दोनों ही तरीके से किया जाता हैं। प्राकृतिक प्रजनन की अपेक्षा कृत्रिम प्रजनन का उपयोग पशुओं में ज्यादा लाभकारी है। कृत्रिम गर्भाधान द्वारा अच्छी नस्ल के चुनिन्दा नर के शुक्राणुओं के ८३ गुबई शुक्राणुओं से थोड़े समय में ज्यादा से ज्यादा मादाओं को गर्भवती किया जा सकता हैं। यही नहीं, इन शुक्राणुओं को किफायती ढंग से लम्बी दूरी तक ले जाना भी संभव है तथा नर की मृत्यु के कई वर्षों बाद तक उसके शुक्राणुओं का उपयोग भी संभव हैं।

भारत में पशुधन की नस्ल सुधार व उत्पादकता बढ़ाने में सहायता प्रजनन का महत्वपूर्ण स्थान है किन्तु सहायता प्रजनन की सफलता कई कारकों पर जैसे की शुक्राणु की उर्वरता, गर्भाधान के लिए सही समय का चुनाव, एवं सहायता प्रजनन में निपुण व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर करती हैं।

शुक्राणुओं की उर्वरता एवं उसकी गुणवत्ता

शुक्राणुओं की उर्वरता ही उसकी गुणवत्ता का सर्वश्रेष्ठ परीक्षण है। प्रायः शुक्राणु की गुणवत्ता के लिए उर्वरता का सीधा आंकलन संभव नहीं हो पाता इसलिए अनेक मानकों जैसे कि शुक्राणुओं की गतिशीलता, जीव्यता, प्लाविका झिल्ली की अखण्डता व संरचना तथा डी.एन.ए. की अखण्डता इत्यादि से शुक्राणु की गुणवत्ता का पता लगाया जाता हैं। यद्यपि ये सभी मानक शुक्राणु की उर्वरता से सहसंबंधित है लेकिन शुक्राणु धारिता ही वास्तविकता में शुक्राणु की उर्वरता से सीधा संबंध रखता हैं। स्तनधारियों में निषेचन जटिल आणविक घटनाओं के फलस्वरूप नर व मादा के जनन कोशिका (अण्डे व शुक्राणु) के संजोग से होता हैं। स्तनधारियों के शुक्राणुओं में अण्डे को निषेचित करने की क्षमता मादा के जननांग में अनेक जैव रासायनिक व दैहिक रूपान्तरण की प्रक्रिया के बाद प्राप्त होती हैं। इस प्रक्रिया को शुक्राणु धारिता'' कहते है।

शुक्राणुओं में अण्डे को निषेचित करने की क्षमता दो जटिल प्रक्रियाओं के फलस्वरूप होती है। पहली प्रक्रिया शुक्राणु धारिता'' में शुक्राणु कोशिका झिल्ली में अनेक बदलाव होते हैं। परिणामस्वरूप ये शुक्राणु दूसरी प्रक्रिया में जाने योग्य बन जाते हैं। दूसरी प्रक्रिया में शुकाग्र प्रक्रिया सम्पन्न होती है जिसमें शुकाग्र द्रव्य का स्रावण होता हैं। ये पाचक द्रव्य अण्डे के बाहर उपस्थित कोशिका दीवार को कमजोर करके उसमें शुक्राणुओं का भेदन सरल करते हैं। इसके बाद ही शुक्राणु अण्डे के सम्पर्क में आ पाता है और उसे निषेचित कर पाता हैं।

प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से शुक्राणु धारीता को प्रेरित करने के लिए ताजा स्खलित वीर्य, हिमीकृत वीर्य यहां तक की अधिवृषण में उपस्थित शुक्राणुओं का भी प्रयोग किया जा सकता हैं। अनुकूल तापमान व आर्द्रता वाले वातावरण में शुक्राणुओं को अनुकूल माध्यम में, जिसमें ऊर्जा स्रोत, गोजातीय सीरम एलब्यूमिन, कैल्सियम, बायकोर्बोनेट आदि का समावेश हो, रखा जाता है। धारिता प्रेरक, जैसे की हिपेरिन को माध्यम में मिलाने पर कृत्रिम रूप से धारिता प्रेरित हो जाती हैं।

शुक्राणु धारिता की प्रक्रिया में सर्वप्रथम शुक्राणु प्लविका झिल्ली से कोलेस्ट्रोल का बहिस्त्रवण होता है तथा कोलेस्ट्रोल फस्फिकुत वसा का अनुपात घट जाता हैं। परिणामस्वरूप प्लाविका झिल्ली की तरलता बढ़ जाती हैं। प्लाविका झिल्ली की प्रवाहिता में आए बदलाव के कारण शुक्राणु झिल्ली की पारगम्यता भी बढ़ जाती है। फलस्वरूप कैल्सियम व बायकोर्बोनेट अणुओं का अंत: प्रवाह होता है। कोशिका द्रव्य में बढे ये घटक कोशिका झिल्ली के विभव को बदल देते है तथा कोशिकीय संकेतन को प्रारंभ कर देते हैं। इस क्रम में एडीनाईल साइक्लेज का उत्प्रेरण होता है और साइक्लिक ए.एम.पी. की सान्द्रता शुक्राणुओं में बढ़ जाती हैं।

साइक्लिक ए.एम.पी. प्रोटीन काइनेज-ए व सम्भवतः दूसरे काइनेज को सक्रिय करता है। ये काईनेज शुक्राणुओं में उपस्थित प्रोटीनों के टाइरोसिन अमीनो अम्ल को फास्फीकृत करते हैं। ये विशिष्ठ फास्फीकृत प्रोटीन शुक्राणुओं में अनेक जैव रसायनिक व दैहिक क्रियाओं के लिए उत्तरदायी हैं। स्तनधारीयों के शुक्राणु, धारिता के बाद अत्याधिक सक्रिय हो जाते है तथा शुक्राग्न प्रक्रिया के लिए तैयार हो जाते हैं। शुक्राणु प्रक्रिया के बाद शुक्राणु अण्डे को निषेचित करने में सक्षम हो पाते हैं।

प्रयोगशाला में शुक्राणु की उर्वरता के परीक्षण के लिए शुक्राणु धारीता का आंकलन एक सरल व उपयुक्त प्रक्रिया है। सर्वप्रथम ताजा स्खलित/हिमीकृत वीर्य को शुक्राणुओं के लिए निर्मित विशिष्ठ तरल माध्यम एस.पी.टयल्प में विस्तारित करते हैं। विस्तारित वीर्य को 1200 परिक्रमा प्रति मिनट की गति से घुमाकर दो बार साफ किया जाता है तथा शुक्राणु की सघनता 100 x 10°/मिली लीटर तय कर ली जाती हैं। तत्पश्चात शुक्राणुओं के माध्यम में हिपेरिन, जो कि एक मानित शुक्राणु धारिता प्रेरक है, मिलाकर कृत्रिम वातावरण (38.5°c तापमान, 5% कार्बनडाइआक्साइड की सांद्रता तथा 85% तुलनात्मक आर्द्रता) में रखा जाता हैं। हिपेरिन डालने के प्रत्येक घंटे के पश्चात शक्राणुओं की प्रगामी गतिशीलता की जांच सूक्ष्मदर्शी द्वारा की जाती हैं। प्रथम घंटे में ही शुक्राणुओं की गतिशीलता ओजोशपूर्ण हो जाती है जो कि दूसरे घंटे तक कायम रहती हैं। प्रायः यह भी देखा गया है कि 3 घंटे के पश्चात प्रगामी गतिशीलता घूर्णन चाल में बदल जाती हैं। चौथे घंटे के बाद शुक्राणुओं का अग्रभाग एक दूसरे से चिपक कर छोटे-छेटे समुहों का निर्माण करता हैं। पाचवें घंटे के बाद ये गुच्छे बड़े हो जाते हैं और 6 घंटे के अंत तक सभी शुक्राणुओं की प्रगामी गतिशीलता लगभग थम जाती है। यद्यपि भैंसों में शुक्राणु धारिता 6 घंटे में सम्पन्न होती है, यह समय अलग अलग भाति के जानवरों के लिए अलग है। जैसे कि बैलों के शुक्राणुओं में धारिता सिर्फ चार घंटे में ही सम्पन्न हो जाती है। धारिता के आंकलन के लिए शुकाग्र प्रक्रिया प्रेरित की जाती है।

सिर्फ उन शुक्राणुओं में जिनमें धारिता सम्पन्न हुई हो शुक्राग्र प्रक्रिया प्रेरित होती है। शुक्राग्र प्रक्रिया प्रयोगशाला में लाइसोफोस्फुटिडिल कोलीन (एल.पी.सी.) जो कि शुकाग्र । क्रिया का मानित प्रेरक है, को शुक्राणु संवर्धन माध्यम से मिलाकर किया जाता है। एल.पी.सी. को शुक्राणु संवर्धन में मिलाकर 15 मिनट तक कृत्रिम वातावरण में रखा जाता है। उर्पयुक्त नमूने का अभिरंजन ट्रिपान बल्यू नामक जीव्यरंजक में किया जाता है। ट्रिपान बल्यू मृत शुक्राणुओं के भीतर जाकर उसे रंजित करता है। ही

जबकि जीवित शुक्राणु इस रंजक को अंदर जाने नहीं देता अतः अरंजित रह जाता है। ट्रिपान बल्यू में जित शुक्राणु की एक बूंद को कांच की स्लाइड पर लेकर उसे फैला लेते है तथा हवा में सुखा लेते है। इसके बाद इन स्लाइडो को कपलिन जार, जिसमें जिमसा रंजक भरा होता है, में डुबो कर 90 मिनट के लिए रख दिया जाता है। जिमसा रिजत स्लाइड्स को पानी में 3-4 बार डुबोकर साफ करने के उपरान्त सूक्ष्मदर्शी द्वारा इनका आंकलन किया जाता है। शुक्राणु जिनमें शुक्राग्न प्रक्रिया नहीं हुई हो, शुक्राग्र झिल्ली मौजूद होती है जो जिमसा से रंजित होने के फलस्वरूप गुलाबी नजर आती है, परन्तु जिन शुक्राणुओं में धारिता सम्पन्न हो जाती है उनमें शुक्राग्र प्रक्रिया के परिणामस्वरूप शुक्राग्र भित्ती अलग हो जाती है अतः रंजित नहीं हो पाते है। रंजित शुक्राणुओं के प्रकार को देखकर जीवित व धारित शुक्राणुओं का प्रतिरक्त निकालना संभव हैं।

प्रयोगशाला में शोध से यह पता चला है कि शुक्राणु धारिता का समय विजातीय पशुओं से भिन्न होता है। यही नही शोध द्वारा ये भी पाया गया है कि हिमीकृत शुक्राणुओं में धारिता के लिए लगने वाला समय लगभग 2 घंटे कम होता है। अतः प्रयोगशाला में धारीता आंकलन करते वक्त इन सभी बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

भविष्य में बढ़ती जनसंख्या के कारण बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सहायता प्रजनन का एक प्रमुख स्थान होगा। हमारा सुझाव है कि कृत्रिम शुक्राणु धारिता तकनीक द्वारा सहायता प्रजनन में प्रयोग आने वाले वीर्य की उर्वरता का निर्धारण अति लाभकारी हैं। ऐसा करने से न सिर्फ गर्भाधान दरों में वृद्धि होगी बल्कि विफल गर्भाधान से होने वाली हानियों में भी कम होगी । समृद्ध भारत का सपना तभी पूरा होगा जब राष्ट्र के किसान खुशाल होगें।

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

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