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बकरी पालन

इस भाग में बकरी पालन के महत्व को बताते हुए कम पूँजी में किस तरह एक अतिरिक्त आय (ए. टी. एम.) की तरह है इससे संबंधित जानकारी दी जा रही है।

परिचय

उत्पादन के हर साधन का पूरा – पूरा इस्तेमाल किए बिना राज्य को खुशहाल नहीं बनाया जा सकता है। बकरियों से भी हमें बहुत सारी उपयोगी चीजें मिलती हैं जो हमारी खेती, तंदुरूस्ती तथा उद्योग – धंधो के लिए जरूरी है। इस प्रकार बकरी - पालन भी बहुत सारे उपयोग पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने वाला सस्ता एवं अनमोल साधन है। चूंकि हमारे यहाँ यह धंधा  सुनियोजित नहीं हो सका है, इसलिए इसके लाभ प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखलाई देते। संसार के दुसरे कई प्रगतिशील देशों के खास कर स्विटजरलैंड में बकरी – पालन एक लाभदायक धंधा के रूप में विकसित हो चुका है।

बिहार का ग्रामीण जीवन बकरी – पालन

बिहार के गांवों में आम तौर पर दो प्रकार के लोग रहते हैं खेतिहर और खेतिहर – मजदूर। इन लोगों का खेती – बारी के अलावा काफी समय बचा रहता है। इस बचे हुए समय का सदुपयोग करते हुए बकरी पालन का धंधा अपनाया जा सकता है। बकरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी भी स्थान में बिना पर्याप्त साधन के रखी जा सकती है। आमतौर पर बेकार समझी जाने वाली चीजों को खाकर भी वह दूध और मांस उत्पादित करती है। उद्योग धंधों के लिए भी बकरियों से चमड़ा और मिल जाती है। इस प्रकार राज्य के ग्रामीण अपना अतिरिक्त समय का उपयोग कर कम पूँजी से अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं। वर्तमान खाद्य – संकट के समय बकरी पालन का धंधा विकसित कर राज्य की मांसाहारी आबादी को सन्तुलित तथा पौष्टिक आहार उपलब्ध करा पाने में बकरी – पालन की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन सारी बातों पर विचार करने से पता चलता है कि हमारे गांवों के विकास के लिए बकरी पालन किया जा रहा है। लेकिन हमारे गांवों में काफी अर्से से बकरी पालन किया जा रहा है।। वे इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर कतई विचार नहीं कर सकते है। इस कारण धीरे – धीरे हमारी बकरियों की नस्ल में ह्रास गया है। उनकी उत्पादन क्षमता कम हो गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा बकरियों के नस्ल में सुधार पर ध्यान दिया गया है और इस कार्य में प्रगति जारी है

नये- नये उद्योग – धंधों की स्थापना एवं उसके फलस्वरूप शहरी के कारण राज्य में क्षेत्रों के  बकरियों के मांस की मांग भी बराबर बढ़ती जा रही है। बकरी मांस की मांग आपूर्ति पर निर्भर करता है इसलिए बकरी – पालन, व्यवसाय का भविष्य भी उज्ज्वल मालूम पड़ता है। बस, जरूरत इस बात की है कि बकरी – पालन का धंधा वैज्ञानिक एवं आधुनिक ढंग से किया जाए। अत: अब बकरी – पालन के वैज्ञानिक एवं आधुनिक तौर तरीकों पर प्रकाश डाला जा रहा है, जिन पर अमल करते हुए बकरी- पालन से अधिक - से - अधिक आमदनी हासिल कर सकते हैं।

बकरी पालन कैसे करें

हमारे यहाँ देशी बकरियां की नस्ल अच्छी नहीं है। इस कारण उनसे अधिक पैदावार को उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके अलावा बकरी – पालन का धंधा भी परम्परागत ढंग से किया जा रहा है। परम्परागत तरीके से बकरी - पालन करने वले न तो बकरियों के लिए अच्छे घर – बथान का इंतजाम करते हैं और न सन्तुलित चारा – दाना ही जुटा पाते हैं। प्रजनन और रोगों की रोग थम की व्यवस्था भी न के बराबर होती है। इसलिए हमारे यहाँ के बकरी – पालकों  के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना जरूरी है –

बकरियों के नस्ल का चुनाव

मुनाफा के ख्याल से बकरी – पालन करने वालों को उन्नत नस्ल की बकरियों का चुनाव करना होगा। इसके लिए उन्हें उन्नत नस्ल की प्रमुख भारतीय बकरियों के संबंध में थोड़ी बहुत जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए।

भारत वर्ष में जमनापरी, बीटल, बरबेरी, कच्छी, उस्मानावादी, ब्लैक बंगाल, सुरती, मालवारी तथा गुजराती आदि विभिन्न नस्लों की बकरियां पैदावार के ख्याल से अच्छी नस्ल की समझी जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ ऐसी भी बकरियां पाई जाती है, जिनके बालों से अच्छे कपड़े बनाए जाते हैं, लेकिन उपर्युक्त सभी नस्लों में दूध मांस और खाद्य उत्पादन के लिए जमनापारी, बीटल और बरबेरी बकरियों काफी उपयोगी साबित हुई है। इन तीनों नस्लों में भी जमनापारी नस्ल की की बकरियां बिहार की जलवायु में अच्छी तरह से पनप सकती है। इसलिए बिहार में बकरी – पालन करने के लिए जमनापारी नस्ल की बकरियां पालन ज्यादा उचित होगा। इस नस्ल की बकरियां ऊँचे कद की होती है। इसकी औसत लंबाई 46 से 50 इंच तक होती है। तथा वजन 100 से 140 पौंड तक होता है। प्रति बकरी औसत उत्पादन से कम नहीं है। पशु प्रदर्शनियों में से यह नस्ल की कतिपय बकरियों ने 13 पौंड तक दूध दिया है। चूंकि अभी भी जमनापारी नस्ल की बकरियां पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हो सकती है, इसलिए बकरी – पालन करने वालों को चाहिए कि वे जमनापारी और उत्तम देशी नस्ल के संयोग से तैयार संकर बकरियों का चुनाव करें जो अपेक्षाकृत सस्ती होंगी और आसानी से मिल भी जाएगी।

बकरियों के लिए घर

हमारे यहाँ आमतौर पर बकरियों के लिए घर बनाने की प्रथा नहीं है। देहातों में पाली जा रही बकरियां अपना ज्यादा समय घूम – फिर कर चरने में व्यतीत करती है और उन्हें चराई से लौटने पर घर की किसी कोने, ओसारे या मशी के बथान के एक हिस्से में ही खंभा या खूँटी के सहारे बांध दिया जाता है। लेकिन बकरी पालकर अधिक फायदा उठाने के लिए एक साफ, हवादार और सस्ता बकरी – घर बना लेना उचित है। बकरियां जिसे स्थान पर जैसे वातावरण में रहती हैं, उसका उसर उनकी पैदावार पर पड़ता हैं। गंदे स्थान में किसी प्रकार समय व्यतीत करने वाली बकरियां न तो अधिक दूध दे सकती है। और न उनके बच्चों की बढ़ोत्तरी ही अच्छी हो सकती है इसलिए बकरियों के लिए घर का इंतजाम जरूर करें।

अगर आप दो – तीन बकरियां ही पालना चाहते हों, तो ज्यादा तूल करने की जरूरत कतई नहीं होती। अपने मकान की किसी दिवार के सहारे एक ओसरा गिरा कर ही मजे में दो – तीन बकरियों पाली जा सकती है। दो बकरियों और उनके बच्चों के लिए 5 फीट चौड़े और 10 फीट लंबे ओसारे से कम चला जाएगा। दोनों बकरियों के लिए ओसारे की 5 फीट चौड़ाई ही काफी है। शेष 5 फीट में छौनें को रखा जा सकता है। इस तरह का मकान बनाने के सामने की ओर यदि दिवार नहीं बनाई जाए तो टाट का पर्दा लटका कर भी काम चलाया जा सकता है। दिवार बनाने पर उस खिड़की लगाना जरूरी है ताकि धुप और हवा आसानी से पहुँच सके। दोनों बकरियों के बीच एक काठ का तख्ता देकर रहने का हिस्सा अलग – अलग कर देना चाहिए। अगर मकान में ओसारा गिरने की सुविधा नहीं हो तो घर के अगल - बगल कर देना चाहिए। अगर मकान में ओसारा गिरने की सुविधा नहीं होती तो घर के अगल – बगल या बथान के आस – पास थोड़ी सी जमीन में पलानी गिरा कर झोपड़ीनुमा बकरी घर बहुत कम खर्च में ही तैयार कर लिया जा सकता है। ऐसे बकरी घर तैयार करने के लिए सामान के नाम पर फूस और बांस का इंतजाम कर लेना ही काफी होता है। बीच में बांस के तीन खंभे गाड़ कर ऊपर बांस का ही बल्ला लगा दिया जाता है। उसके ऊपर बांस के फट्टों और फूस से तैयार किया गया छप्पर डाल कर उसके दोनों सिरों को झूका दिया जाता है और अपेक्षाकृत छोटे- छोटे खंभों के सहारे बांध दिया जाता है। अधिक गर्मी, कड़ी ठंड या बरसात के मौसम में ऐसे घरों के चारों और टाट का घेरा लगा कर बकरियों की हिफाजत की जाती है। ऐसी जगहों में, जहाँ बकरियों की चोरी होने की संभावना हो या जहाँ हिंसक पशुओं का डर हों, वहाँ पर चारों ओर से फट्टे लकड़ी की दिवार भी ऐसे  घर में लगाईं जा सकती है। दीवारों की मिट्टी और गोबर मिला कर लेप देने से यह घर भी टिकाऊ बन जाता है। नगर या गाँव में छोटे पैमाने पर बकरी- पालन कर थोड़ी बहुत आमदनी हासिल करने या अपनी जरूरत पूरी करने के ख्याल से बकरी – पालन करने वालों के लिए से घर बना लेना ही उचित है। लेकिन व्यवसायिक तौर पर बकरी – पालन करने वालों को एक स्थायी बकरी – घर बनाना होगा।

स्थायी बकरी – घर

स्थायी बकरी – घर पक्की ईंट से बनाया जाता है। जिस स्थान पर लकड़ी की बहुतायता हो, वहीं लकड़ी से भी स्थायी बकरी – घर बनाया जा सकता है। घर इस प्रकार बनाएं कि उसमें साफ और सूरज की रोशनी पहुँचने की पूरी – पूरी गूंजाइश रहे। मकान का आकार – प्रकार बकरियां की संख्या के अनुसार निर्धारित किया जाता है। आमतौर पर दो बकरियों के लिए 4 फीट चौड़ी और साढ़े तीन फीट लंबी जगह काफी समझी जाती है। बड़े पैमाने पर बकरी – पालन करने के लिए प्रत्येक घर में दो बकरियों का एक बाड़ा या बथान बनाना पड़ता है। बकरियां की संख्या के अनुसार थान की संख्या घटाई – बढ़ाई जा सकती है। प्रत्येक थान में बकरियों को आहार देने के लिए लकड़ी का पटरा लगा देना सस्ता होगा। थान में बकरियों के आराम करने या उठने-बैठने के लिए पर्याप्त जगह रखनी चाहिए।

थन कतारों में बनाए जाते हैं। हर थन में बकरियों के बांधने का प्रबंध रहता है। थानों की दो कतारों के बीच सुविधा पूर्वक आने – जाने का रास्ता छोड़ दिया जाता है। बीच में खाने के बर्तन और घास – पात रखने की जगह भी बहना दी जाती है। दिवार के ऊपर थोड़े भाग तार की जाली लगा दी जाती है। थानों की कतार के पीछे नाली बना देना भी आवश्यक होता है।

स्थाई बकरी – घर बनाने वालों को प्रजनन के लिए बकरा भी रखना पड़ता है। बकरा को बराबर अलग रखना चाहिए, क्योंकी उससे तजे गंध आती है। इस गंध के कारण कभी - कभार दूध और दुसरे समान से भी गंध आने लगती है। एक बकरा के लिए आठ वर्ग फीट के आकार घर बनाना चाहिए।

घर की सफाई

घर चाहे स्थायी हो या अस्थायी, उसकी प्रतिदिन सफाई आवश्यक है। अगर फर्श पक्का हो तो प्रतिदिन पानी से धो देना चाहिए। अगर कच्चा फर्श हो तो उसे ठीक-पीट कर मजबूत बना लेना चाहिए और प्रतिदिन साफ करना चाहिए। बकरी- घर की नालियों और सकों की सफाई भी अच्छी तरह होनी चाहिए। समय – समय पर डेटोल, सेवलौन, फिनाइल या ऐसी ही दूसरी दवा से फर्श और बकरी – घर के अंदर के हर भाग को रोगाणुनाशित भी कर लेना चहिए।

बकरियों की खुराक

आमतौर पर गांवों की बकरियां चराई पर ही निर्भर करती है। यदि चरागाह या प्रति मैदान की सुविधा मौजूद हो तो बकरियों को चरा कर भी पाला जा सकता है। लेकिन एजी चरागाह और परती जमीन ने के बराबर है। ऐसी आवस्था में बकरियों को थन पर खिलाने का इंतजाम ही करना होगा।

बकरियों से अच्छी पैदावार हासिल करने और उनकी तंदुरूस्ती कायम रखने के लिए उन्हें पौष्टिक खुराक जरूरी खिलाएं। बकरी पत्ते और हरा चारा बड़े चाव से खाती है। इनकी खुराक के संबंध में एक बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये प्रतिदिन एक ही प्रकार का चारा खाना पसंद करती। इसलिए चारा बदल – बदल कर देना चाहिए। तंदुरूस्ती कायम रखने और दूध की पैदावार या मोटापा  बढ़ाने के लिए बकरियों के आहार में दाना भी जरूर शामिल रहे।

खुराक की मात्रा बकरियों की उत्पादन क्षमता या वजन के अनुसार घटाई – बढ़ाई जा सकती है। आमतौर पर एक बकरी को 2 किलो चारा तथा आधा किलो दाना देना मुनासिब समझा जाता है। उसके अलावा प्रत्येक दूध के उत्पादन पर 200 ग्राम दाना अलग से देना चाहिए। गेहूं की भूसी, दालों का चुरा या चूना और मक्का आदि तीन-चार चीजों को मिला कर दाना  तैयार करना चाहिए। दाने के रूप में उबाला हुआ गेहूं भी दिया जा सकता है। प्रतिदिन दाना में एक चुटकी नमक भी मिला देना चाहिए (दाना का एक प्रतिशत)।

बकरियों को खुराक देने के संबंध में निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है –

  1. बकरियों को खिलाने – पिलाने का समय निश्चित कर लेना चाहिए। इससे बकरियों की भूख अच्छी रहती है।
  2. बकरी एक बार में जितना खाना खा सकती है, उतना ही चारा दें या बकरी के सामने थोड़ा – थोड़ा करके चारा रखें।
  3. सूखा चारा के साथ – साथ बकरियों को हरा चारा भी जरूर खिलाएं।
  4. चारा खिलाने की नाद या बाल्टी की प्रतिदिन सफाई आवश्यक है।
  5. बकरियों को साफ बर्तन में ताजा पानी ही पीने की लिए दें।
  6. बाली या फफूंदीवाली चीजों से बकरियों को बचाना चाहिए।
  7. बकरियों को भींगी हुई घास या वर्षा ऋतू की नई घास अच्छी तरह साफ करने के बाद ही खिलाई जाए।

प्रजनन के लिए पाले जा रहे बकरों को भी वही आहार मिलना चाहिए जो दुधारू बकरियों को दिया जाता है। इसी प्रकार मांस उत्पादन के लिए पीला जा रहे बकरों को भी दुधारू बकरियों को मुकाबले का आहार मिलना चाहिए। हाँ, बकरी के नवजात छौनों के आहार देने में काफी सावधानी बरतने की जरूरत होती है। छौनों को कुछ समय तक केवल माँ के दूध पर ही पलना चाहिए। छौने थन से भी दूध पी सकते हैं और उन्हें दूध निकला कर किसी बर्तन के द्वारा भी पिलाया जा सकता है। दो सप्ताह के बाद ही छौनों को कोमल घास खाने को देना चाहिए।

उन्हें तीन महीने के बाद 200 ग्राम दाना भी दिया जा सकता है।

बकरी की देखभाल

उम्र एवं अवस्था के अनुसार छौना, बकरा या गाभिन बकरी की देखभाल अलग- अलग धंद से करनी पड़ती है।

बकरा की देखभाल

बकरा से प्रजनन कार्य लिया जाता है। इसलिए बकरा के स्वास्थय और नस्ल दोनों पर ध्यान देना पड़ता है। बिहार राज्य के लिए जमनापारी नस्ल का बकरा प्रजनन के लिए उपयुक्त समझा गया है। आमतौर पर एक स्वस्थ और नस्ली बकरा पचास – साथ बकरियों के प्रजनन के लिए काफी है।

प्रजनन के लायक उम्र पूरी करने के बाद ही बकरा से प्रजनन का काम लेना चाहिए। आमतौर पर नौ महीनें की उम्र में ही नर – मेमना परिपक्व माना जाता है। लेकिन 18 महीने की उम्र प्राप्त कर लेने के बाधी बकरा को बकरियों का गर्भाधान कराना ही उचित है। इसी प्रकार इस अवस्था तक के बकरा को एक बकरी के गर्भाधान के बाद डेढ़ सप्ताह तक आराम करने का मौका देना चाहिए। बकरे को बराबर बकरियों के साथ नहीं रखना चाहिए। समय- समय पर उसके शरीर की सफाई भी करनी चाहिए तथा बड़े हुए बालों को करत देना चाहिए।

बकरियों की देखभाल

उचित देखभाल में प्रजनन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है अच्छे प्रजनन द्वारा देशी नस्ल की बकरियां भी सुधर सकती हैं इसलिए अच्छे बकरा का चुनाव करने के साथ – साथ बकरियों पर भी खास ख्याल रखने की जरूरत है। बकरियां वर्ष में दो बार गाभिन हो सकती है। आमतौर पर बच्चा देने के दो महीने के बाद ही बकरियां गर्म होने लगती है। सब कुछ समान्य रहने पर प्रत्येक 27-28 दिनों के अंतर पर बकरी गर्म हो जाती है। इसी प्रकार व्यस्क हो जाने के बाद ही बकरी का प्रजनन होना चाहिए। एक वर्ष की आयु पूरी होने के बाद बकरियों के गर्भाधान के लिए बकरा से संपर्क कराना अच्छा होगा। बकरियों का गर्भाधान इस प्रकार कराया जाए कि बच्चे पैदा होते समय प्राकृतिक प्रकोपों से सुरक्षित रहें। बिहार राज्य में मई- जून में बकरियों को गर्भाधान कराना ज्यादा अच्छा होगा क्योंकी इससे अक्टूबर – नवंबर में पैदा होंगे। यह समय यहाँ के पशुओं के लिए ज्यादा अनुकूल पड़ता है।

गाभिन हो जाने के बाद और प्रसव के पहले बकरियों की देखभाल में काफी मुश्तैदी बरतनी पड़ती है। बकरी के प्रसव – काल से लगभग एक महिना पहले झुंड से अलग कर देना चाहिए। प्रसव काल काफी निकट आ जाने पर बकरी को चराने के लिए बाहर नहीं ले जाएँ, उसे घर के अंदर ही आरामदायक स्थान पर रखना चाहिए। बकरी के योनि भाग का भरी हो जाना बेचैन होना, बार- बार स्थान बदलना और थन का तन जाना प्रसव काल के समीप होने की खास पहचान है। बच्चा देने के तीन - चार  दिन बाद तक बकरी को झुंड से अलग ही रखना चाहिए। अगर एक दो बकरी पलते हों और वे बकरियां चराई पर चलती है तो चार – पांच दिनों तक चरने के लिए भी नहीं भेजें। उसे घर के अंदर ही पौष्टिक खुराक खिलाएं। गाभिन बकरी को हर चारा खिलाना कभी न भूलें।

बकरियों को दूहने का समय तय कर लेना चाहिए। निर्धारित समय पर दूध दूहने से पैदावार पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। दूध दूहने वाले को अपना हाथ अच्छी तरह से धो लेना चाहिए। गंदे  हाथों से बकरी का थन कभी न छूएं।

छौने की देखभाल

पैदा लेने के बाद छौने की सफाई  कर उन्हें खड़ा के देना चाहिए। उनके मुंह में बकरी का थन लगा देने से वे स्वयं ही दूध पीने लग जाएंगे। यदि छौने तुरंत खड़ा नहीं हो न सकें, तो घबड़ायें नहीं। कुछ समय तक दूध नहीं भी पीएं तो भी कुछ चिंता करने की जरूरत नहीं है। थन से थोड़ा – सा दूध निकाल कर छौने को पीने के लिए थन के पास ले जाना अच्छा है। अगर बकरी एक साथ दो तीन या अधिक बच्चें दे तो सबसे अंत में जन्म लेने वाले बच्चे को पहले दूध  पीने का मौका देना चाहिए। यदि छौना स्वयं खड़ा होकर थन से दूध नहीं पी सके तो पहली बार थन में छौना का मुहं लगाकर थोड़ा- सा दूध निचोड़ देना चाहिए उसके बाद कोई कठिनाई नहीं रह जाएगी। छौनों को खीस जरूर पिलाएं। इसका उनकी तंदुरस्ती पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। छौनों को खुली हवा या धुप में अधिक समय तक रखना चाहिए। लेकिन गर्मी और सर्द हवा से उनकी हिफाजत भी करनी चाहिए। ढाई-तीन महीने की उम्र में प्रजनन के काम में नहीं आने वाले नर छौना (खस्सी) को बधिया कर देना चाहिए।

याद रखें – स्वस्थ घर और अच्छा भोजन फिर दवा का क्या प्रायोजन।

सामान्य रोग

आमतौर पर अन्य मवेशियों की अपेक्षा बकरियां कम बीमार पड़ती है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि बहुत कम बीमार होने पर भी इनकी उचित चिकित्सा की ओर से बकरी पालक प्राय: उदासीन रहते हैं और अपनी असावधानी के कारण पूँजी तक गँवा देते हैं। बकरी पालन के समूची फायदा उठाने वाले लोगों को उनके रोगों के लक्षण और उपचार के संबंध में भी थोड़ी बहुत जानकारी रखनी चाहिए ताकि समय पड़ने पर तुरंत ही इलाज का इंतजाम कर सकें। इसलिए  बकरियों की सामान्य बीमारियों के लक्षण और उपचार के संबंध में मोटा – मोटी बातें बतलाई जा रही है।

पी. पी. आर

यह रोग “काटा” या “गोट प्लेग” के नाम से भी जाना जाता है। यह एक संक्रमक बीमारी है जो भेड़ एवं बकरियों में होती है। यह बीमारी भेड़ों की अपेक्षा बकरियों (4 माह से 1 वर्ष के बीच) में ज्यादा जानलेवा होता है। यह एक खास प्रकार के विषाणु (मोरबिली वायरस) के द्वारा होता है जो रिंडरपेस्ट से मिलता – जुलता है।

लक्षण – पी. पी. आर. एक्यूट और सब एक्यूट दो प्रकार का होता है। एक्यूट बीमारी मुख्यत: बकरियों में होता हैं। बीमार पशु को तेज बुखार हो जाता है, पशु सुस्त हो जाता है, बाल खड़ा हो जाता है एवं पशु छींकने लगता है। आँख, मुंह एवं नाक से श्राव होने लगता है जो आगे चलकर गाढ़ा हो जाता है जिसके कारण आँखों से पुतलियाँ सट जाती है तथा साँस लेने में कठिनाई होने लगती हैं। बुखार होने के 2 से 3 दिन बाद मुहं की झिल्ली काफी लाल हो जाती है जो बाद में मुख, मसूढ़ा, जीभ एवं गाल की आन्तरिक त्वचा पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे निकल आते है। 3 से 4 दिन बाद पतला पैखाना लगता है तथा बुखार उतर जाता है और पशु एक हफ्ते के भीतर मर जाते हैं।

यह एक्यूट बीमारी मुख्यत: भेड़ों में होती है। इसके उपर्युक्त लक्षण काफी कम दिखाई देते हैं और जानवरों की मृत्यु एक हफ्ते के अंदर हो जाती है।

मृत्यु दर – 45 – 85%

बचाव एवं रोकथाम

(i)    रोग फैलने की स्थिति में यथा शीघ्र नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। स्वस्थ पशुओं को बीमार पशुओं  से अलग रखने की व्यवस्था करनी चाहिए।

(ii)  जिस क्षेत्र में बीमार पशुओं की चराई की गई है उस क्षेत्र में स्वस्थ पशुओं को नहीं ले जाना चाहिए ताकि ड्रपलेट इन्फेक्शन से बचाया जा सके।

(iii) वैसे पशुओं को जो बाजार में बिकने के लिए गये परंतु वहां न बिकने पर वापस आने पर कुछ दिनों के लिए अलग रखने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(iv) बीमार पशुओं के आंख, नाक एवं मुहं को साफ करते रहना चाहिए।

(v)  बीमार पशुओं को सब कट या इंट्रा पेरिटोनियल फ्लायूड़ोथेरापी करनी चाहिए, साथ – साथ एंटीबायोटिक देकर सेकेंड्री बैक्टीरियल बीमारी से बचाना चाहिए।

(vi) शेष बचे हुए सभी पशुओं में पी.पी.आर. टीका पशु चिकित्सक की राय से दिलवानी चाहिए।

खुरपका मुहंपका रोग

लक्षण – मुहं के अंदर जीभ, होठ गाल, तालू और मुहं के अन्य भागों में फफोले निकल जाते हैं। केवल खुरपका होने पर खुर के बीच और खुर के ऊपरी भागों में फफोलें निकल आते हैं। ये फफोले फट जाते हैं। कभी – कभी बीमार बकरी को दस्त होने लगता है निमोनिया भी हो जाती है। यह रोग ज्यादातर गर्मी या बरसात में फैलता है।

उपचार – रोगी बकरी को अलग रखकर अगर मुहं में छाले हों तो पोटाशियम परमैंगनेट से धोना चाहिए। खुरों की छालों पर फिनाइल या नीला थोथा लगाना चाहिए।

नियंत्रण – इस रोग से बचाव हेतु टीकाकरण करा लेना चाहिए।

प्लूरों निमोनिया (संक्रामक)

लक्षण – यह बहुत खतरनाक बीमारी है और इसका शिकार किसी आयु की बकरी को हो सकती है। खाँसी आना, लगातार छींकना, नाक बहना और भूख की कमी इस रोग के खास लक्षण है।

उपचार – रोगी पशु को तुरंत ही झुंड से अलग कर देना चाहिए और चिकित्सा के लिए पशु – चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। इसलिए रोग का आगमन होते ही नजदीक के पशु- चिकित्सालय में सूचना भेज देनी चाहिए।

निमोनिया

लक्षण – सर्दी लग जाने या लंबी सफर तय करने के फलस्वरूप यदि बकरी को बुखार हो जाए, उसे भूख नहीं लगे, कभी – कभी खाँसी हो और साँस लेने में कठिनाई हो तो समझ लेना चाहिए की उसे निमोनिया हो गया है।

उपचार – रोगी को सूखे और गर्म स्थान पर रखना चाहिए। हवा की सर्द झोंकी से बचाना चाहिए। काफी मात्रा में ताजा पानी पिलाना चाहिए और जल्दी पच जाने वाला मुलायम चारा खिलाना चाहिए। दवा के लिए पशु चिकित्सक की सलाह लेना ही बेहतर है। तारपीन तेल से भाप देना चाहिए और धूँआ से बचाना चाहिए।

आन्तरिक परजीवी रोग

बकरियां आन्तरिक परजीवी रोग से भी काफी परेशानी होती है। इन परजीवियों में गोल कृमि (राउंड वर्म), फीता कृमि (टेप वर्म), फ्लूक और प्रोतोजोवा प्रमुख हैं। इन परजीवियों के कारण बीमार पशु की उत्पादन क्षमता घट जाती है, शरीर हल्का होने लगता है, दस्त होने लगता है और शरीर में खून की कमी हो जाती है। कभी – कभी पेट काफी बढ़ जाता है और जबड़ों के नीचे हल्का सूजन आ जाती है।

उपचार – औक्सिक्लोजानाइड, एलबेंडाजोल, फेनबेडाजोल, कार्बन टेट्राक्लोराइड, नीला थोथा आदि औषधियों का उपयोग कर परजीवियों से पैदा होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है। किस दवा से कितनी मात्रा पशु को दी जाए इसका निर्धारण पशु चिकित्सक से करा लेना चाहिए। चारे साफ कर खिलाएं जाएँ और घर – बथान अच्छी तरह से साफ और सूखा रहे तो इन बीमारियों से नुकसान होने की संभावना बहुत ही कम रही है। यकृत कृमि से बचाव के लिए बकरियों को उन स्थानों पर नहीं चरने दें, जहाँ पर बरसात का पानी जमता हो।

पित्ती या गिल्लर

लक्षण – रोगों पशु सुस्त हो जाता है तथा शरीर में रक्त की कमी जो जाती है। रोग बढ़ जाने पर गले में सूजन हो जाती है, जो संध्या काल में बढ़ती है और सुबह में कम हो जाती है। बाद में पशु को आंव और दस्त आने लगते हैं और कभी – कभी पशु की अचानक मृत्यु हो जाती है।

बाह्य कृमि

आंतरिक परजीवियों से पीड़ा होने वाले इन रोगों के अलावा बकरियां जूँ जैसे - बाह्य परजीवियों से भी काफी परेशानी होती है। ये बाह्य परजीवी स्वयं तो बकरियां को कमजोर करते ही हैं अन्य रोगों की भी वृद्धि करते हैं।

प्रस्तावित कार्यक्रम

राज्य सरकार गरीबों के हित में बकरी – पालन को प्रोत्साहित देने के लिए कटिबद्ध है। पशु प्रक्षेत्र पूर्णियां को बकरी- पालन सह प्रजनन प्रक्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। प्रक्षेत्र से उन्नत मेमनों को गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले परिवारों के बीच सरकार द्वारा निर्धारित अनुदानित दर पर उपलब्ध कराया जायगा। उसी प्रकार पंचायत स्तर पर बकरे का वितरण किया जा रहा है ताकि इस उन्नत नस्ल के बकरे का उपयोग से स्थानीय बकरियों की संततियों में धीरे – धीरे सुधार लायी जा सके।

बकरियों की विशेष नस्लें एवं उसका प्रयोजन

मांस

दूध

मांस एवं दूध

ब्लैक बंगाल (बंगाल – उड़ीसा)

बीटल (पंजाब)

बरबरी (यू.पी., दिल्ली, हरियाणा)

कच्छ (कठियाबाढ़)

मालवार (केरल)

जमनापारी (यू.पी.)

गंजम (उड़ीसा, बंगाल)

मेहसाना, सुरती (गुजरात)

मारवारी, सिरोही (राजस्थान)

विभिन्न नस्लों के बकरियों में उम्र के हिसाब से वजन (कि.ग्रा. में)

नस्ल

6 माह

9 माह

12 माह

जमनापारी

11.00

18.6

23.5

ब्लैक बंगाल

7.3

10.0

12.6

जमनापारी ब्लैक बंगाल का क्रोस ब्रीड

9.6

13.4

16.7

 

स्रोत : पशुपालन सूचना एवं प्रसार विभाग, बिहार सरकार

3.19642857143

Sumer douso dia Mar 25, 2018 06:01 PM

Sir mai totapuri bakri palan karna chahta hu pls mera margdarsan Kate no93XXX40

जाहिद अली Feb 17, 2018 09:58 PM

सर हम बकरी पालन करना चाहते है तो आप बताये की हम बकरी कहा से खरीदे । खासकर बरबरी बकरी पालन करना है तो कृपया करके हमे इस नम्बर 87XXX00 पर बताये हमे

जितेन्द्र Nov 18, 2017 01:16 PM

बकरी कहा से खरीदे

sachin prajapat May 19, 2017 11:03 AM

sir jamnapari or black bangal bakriyo ko m.p. palane me koi problem to nhi hogi ..... sir jamnapari or black bangal ki price kya hogi or kha milegi ye nasl ki bakriya sir pls meko mail karna XXXXX@gmail.com PR pls batana

Amir akmal Apr 20, 2017 05:47 PM

hm Bihar me bakri palan karna change h kahan she bakri kariden hme address batye

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