অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

कृषि आधारित व्यवसाय

आधुनिक नर्सरी की स्‍थापना और प्रबंधन

किसी भी फलोद्यान की कामयाबी सही रोपण सामग्री की उपलब्‍धता पर निर्भर करती है। शुरुआती रोपण सामग्री पर ही आखिरी फसल की मात्रा और गुणवत्‍ता निर्भर करती है। शुरुआती वर्षों में अगर कोई भी गलती हो जाए, तो इसे बाद के वर्षों में दुरुस्‍त नहीं किया जा सकता और इसके कारण उत्‍पादकता व फलोद्यान मालिकों की आय को स्‍थायी नुकसान पहुंचेगा। फलों में अपेक्षित उत्‍पादकता न हासिल कर पाने में सबसे बड़ी दिक्‍कत असली बीजों और सही रोपण सामग्री की अनुपलब्‍धता है। रोपण सामग्री को लगातार वैज्ञानिक रूप से पैदा किए गए अधिक पैदावार वाले मातृ-पौध से लिया जाना चाहिए जो कीटों और रोगों से मुक्‍त हों।

नर्सरियों की कमियां

  • रोग लगे और संक्रमित पेड़ों से (जैसे आम, खट्टे फल और समशीतोष्‍ण पौधें में विकृतियां) शूट को चुन लिया जाता है।
  • इन्‍हें आम तौर पर नए पौधों से लिया जाता है।
  • वैसे मातृ-पौधों से भी इन्‍हें चुना जाता है, जिनका इतिहास न ज्ञात हो।
  • नर्सरी में पर्याप्‍त रोटेशन नहीं किया जाता और साल दर साल एक ही बेड का प्रयोग होता है।
  • आम तौर पर पौधे बेड में गुणात्‍मक वृद्धि करते हैं। इसलिए हर बार 4-6 किलो मिट्टी अर्थ बॉल के रूप में ट्रांसपोर्ट हो जाती है।मिट्टी के साथ दूर तक पौधों को ले जाना मुश्किल, महंगा और कम प्रभावी होता है।
  • इसके साथ अक्‍सर कई कीट (जड़ों की सड़न, तने की सड़न, विल्‍ट, नेमाटोड) भी चले आते हैं।
  • प्रति इकाई क्षेत्र में कम पौधों की संख्‍या का उत्‍पादन।
  • अधिकतर मामलों में रूटस्‍टॉक के लिए स्रोत का प्रावधान नहीं होता।

मातृ-पौध के बुनियादी लक्षण

  • अच्‍छा प्रदर्शन और 3 से 5 साल में अधिकतम उत्‍पादन।
  • उच्‍च गुणवत्‍ता वाले फल।
  • कीटों और रोगों से मुक्‍त।
  • कलम काटने से पहले पौधे पूरी तरह परिपक्‍व हो जाते हैं।

मातृ-पौध का रखरखाव

  • 4 से 6 मीटर निकट की दूरी रोपे गए पौधों से शुरुआती प्रसार।
  • खाद और उर्वरक का प्रयोग।
  • सिंचाई।
  • खरपतवार हटाना और इंटर-कल्‍चरल काम।
  • प्रशिक्षण और छंटाई।
  • पौधों की सुरक्षा के उपयुक्‍त उपाय।

खेत में प्रसार की सीमाएं

  • मिट्टी के ढोके के लिए लोगों को मिट्ठी की जरूरत पड़ती है।
  • रूटस्‍टॉक और प्रसार वाले पौधों के लिए जल्‍दी-जल्‍दी शिफ्टिंग की जरूरत होती है।
  • प्रभावी तौर पर खरपतवार नियंत्रण के लिए ज्‍यादा मानव संसाधन की जरूरत।
  • हर पौधे के साथ 4 से 6 किलो अच्‍छी मिट्टी का परिवहन हो जाता है।
  • कीटों और पैथोजन के प्रसार के लिए मिट्टी का ढोका एक अच्‍छा स्रोत है।

पॉली/नेट हाउसों का प्रसार

  • साल भर प्रसार
  • बीजों के अंकुरण पर नियंत्रण, बेहतर वृद्धि और कामयाबी।
  • प्रभावी और सस्‍ती तकनीक।
  • स्‍थापना की बेहतर संभावनाएं।
  • तीव्र और सस्‍ता परिवहन।

रूटिंग/पॉटिंग मिश्रण के घटक रूटिंग/पॉटिंग मिश्रण को निम्‍न घटकों से तैयार किया जाता है -

  • मिट्टी: एक अंश
  • रेत: एक अंश
  • एफवाईएम/वर्मी/बायोडायनमिक कम्‍पोस्‍ट : एक अंशडेढ़ माह के लिए रूटिंग/पॉटिंग मिश्रण को मिट्टी के साथ छोड़ना (अप्रैल-जून) अथवा फॉर्मल्डिहाइड या बास्मिड के साथ स्‍टेनलीकरण।

प्रसार

  • बीज
  • इनार्चिंग
  • बडिंग
  • वेनियर ग्राफ्टिंग
  • सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग
  • अस्‍थायी स्‍थापना

1. बीज

  • पपीता, फालसा, कागजी नींबू और करौंदा के प्रसार के लिए उपयुक्‍त
  • प्राकृतिक फलों से बीज लिए जाने चाहिए।
  • अधिकतर फलों के रूटस्‍टॉक का प्रसार बीजों से होता है।
  • ऐसे पौधे अपनी वृद्धि में भिन्‍न होते हैं और लंबे समय तक जवान रहते हैं इसलिए आम, आंवला, बेल आदि के व्‍यावसायिक प्रसार को प्रोत्‍साहित नहीं किया जाना चाहिए।

2. इनार्चिंग (अप्रोच ग्राफ्टिंग)

  • इस विधि को हतोत्‍साहित किए जाने की जरूरत है।
  • जटिल और थकाऊ विधि।
  • मातृ-पौध में सीमित कलमें उपलब्‍ध होती हैं।
  • रूटस्‍टॉक को कलम के करीब लाया जाना चाहिए।
  • आम में विकृति के प्रसार का यह एक स्रोत है।

3. वेनियर ग्राफ्टिंग

  • एक साल की उम्र वाले (0.5 से 0.75 सेमी व्‍यास वाले) रूटस्‍टॉक का प्रयोग किया जाता है।
  • स्‍टॉक के मुलायम हिस्‍से में अंदर की ओर नीचे की तरफ 30-40 एमएम का कट लगाया जाता है जो तल से 20 सेमी ऊपर होता है।
  • कट के निचले हिस्‍से में एक छोटा कट लगाया जाता है जिससे तने और लकड़ी को अलगाया जा सके।
  • ढाई से 10 सेमी लंबाई के बराबर मोटाई का कलम चुना जाता है जो चार-पांच महीने पुराना हो।
  • यह टर्मिनल शूट होना चाहिए जिसमें फूल नहीं आते।
  • मातृ-पौध से अलग करने से पहले इनसे पत्‍ते 7 से 10 दिन पहले हटा दिए जाते हैं।
  • कलम के आधार पर कोने में एक लंबा कट लगाया जाता है और दूसरी ओर एक छोटा कट लगाया जाता है जो रूटस्‍टॉक पर कट से मैच कर सके।
  • कलम को कटे हुए हिस्‍से में डाला जाता है और दोनों को एक पारदर्शी पॉलीथीन से बांध दिया जाता है और पॉलीहाउस में रख दिया जाता है।
  • इस विधि को मार्च से सितंबर के बीच खेतों में अपनाया जा सकता है।
  • आम, आंवला, काजू, कस्‍टर्ड सेब, वॉलनट आदि में ऐसा करने का चलन है।

4. सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग

  • एक साल पुराने रूटस्‍टॉक के नए स्‍टॉक शूट को क्‍लेफ्ट ग्राफ्टिंग के लिए चुना जाता है, खासकर आम के मामले में ऐसे शूट को जिनके पत्‍तों का रंग कांसे की तरह होता है।
  • ग्राफ्टिंग से सात से दस दिन पहले कलम से पत्‍ते हटा लिए जाते हैं।
  • स्‍टॉक शूट और कलम की मोटाई बराबर होनी चाहिए।
  • ग्राफ्टिंग के बाद इसे 1.5 सेमी चौड़ी, 4.5 सेमी लंबी और 200 गॉज की पॉलीथिन की पट्टी से कस कर बांध दिया जाना चाहिए।
  • इसे खुले खेत या कंटेनर में किया जाना चाहिए।
  • पॉली और नेट हाउस के उपयोग से ग्राफ्टिंग का काम साल भर तक किया जा सकता है।
  • आम, काजू, अमरूद, आंवला, बेल और कटहल में ऐसा करने का चलन है।

5. पैच बडिंग

  • साइड के शूट को तेजी से हटा कर रूटस्‍टॉक सीडलिंग को तैयार करें।
  • 0.8 से 1.25 सेमी व्‍यास वाले सीधे पौधों को चुनें। इतनी मोटाई पांच से सात महीनों में आ जाती है।
  • कली पैदा होने में कामयाबी के लिए आदर्श तापमान 30 से 32 डिग्री सेंटीग्रेड और आर्द्रता 80 से 90 फीसदी आदर्श है।
  • मातृ-पौध से 6 से 9 माह पुराने शूट चुनें।
  • लीफ ब्‍लेड को हटा दें, पंखुड़ियों को नहीं, पॉलीथीन में लपेट कर ठंडी जगह पर भंडारित करें।
  • चुने हुए पौधों में (0.8 से 1.2 सेमी मोटाई वाले) से एक गुणा तीन सेमी आकार के आयताकार पैच को हटाएं और 15-20 सेमी रूट म‍ीडिया के ऊपर से पॉलीबैग में, एक तेज चाकू की मदद से।
  • कलम से भी एक गुणा तीन सेमी आकार के आयताकार पैच को निकाला जाता है। जिन कलमों में कलियां पूरी तरह उग चुकी हों, लेकिन जिनमें अंकुर नहीं आया हो, उन्‍हें लिया जाता है।
  • इसे रूटस्‍टॉक के बार्क पर सावधानी से रखा जाता है।
  • पॉलीथीन से बांध दें, जिसमें कली का मुंह बाहर हो और हवा के लिए कोई जगह न हो।
  • कली वाले पौधों को पॉलीहाउस में रख दें जिससे अधिकतम आर्द्रता और तापमान का लाभ मिल सके।
  • इनमें 15 से 20 दिनों में अंकुर आने लगते हैं। कलियों के गुच्‍छ के 20 सेमी ऊपर रूटस्‍टॉक को काटें।
  • 15 दिन बाद जब अंकुरण 3 सेमी तक हो जाए, तो कलियों के गुच्‍छ के 5 सेमी ऊपर रूटस्‍टॉक को काटें।
  • सिर्फ अंकुरित कलम को ही बढ़ने दिया जाता है, बाकी को हटा दें।
  • पोस्‍ट प्रोपोगेशन एंड मेंटेनेंस एंड सेल नर्सरी (पीपीएमएस) में ले जाए जाने से पहले इन अंकुरित पौधों को कुछ दिनों तक खुले में रखें।
  • आंवला, अमरूद, बेल, कटहल, टिंडा में आदि में ऐसा किए जाने का चलन है।

6. सॉफ्टवुड कटिंग

  • अंगूर, अमरूद, नींबू, अनार, फिग और मलबरी के प्रसार के लिए उपयुक्‍त।
  • अमरूद में ताजा पौध से ही 8-10 सेमी की कटिंग की जाती है।
  • रूटिंग हार्मोन से उपयुक्‍त मात्रा में उपचार के बाद इसे उपयुक्‍त रूटिंग माध्‍यम में रोपा जाता है।
  • बेहतर जड़ों के फैलने के लिए दो पौधों के बीच पर्याप्‍त जगह छोड़ी जानी चाहिए।
  • डेढ़ महीने बाद जड़ें निकलना शुरू होती हैं।
  • जड़ें निकलने के बाद पौधों को जमने के लिए प्‍लास्टिक के कंटेनरों में शिफ्ट कर दिया जाता है और कुछ दिनों तक इन्‍हें मिस्‍ट चैंबर में रखा जाता है।
  • ठीक से जम जाने के बाद पौधों को कड़ा होने के लिए नेट हाउस में डाल दिया जाता है।

अस्थायी फलोद्यान की स्थापना

  • फलोद्यान की शीघ्र स्‍थापना के लिए उपयुक्‍त।
  • रूटस्‍टॉक को सीधे खेतों में रोप दिया जाता है।
  • एक साल बाद खेतों में ग्राफ्टिंग/बडिंग की जाती है।

 

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें -

सेंट्रल इंस्टिट्यूट फॉर सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्‍चर
रहमनखेड़ा, पीओ काकोरी, लखनऊ - 227107टेलीफोन- (0522) 2841022-24फैक्‍स- (0522) 2841025

मधुमक्खी पालन

मधुमक्खी पालन एक कृषि आधारित उद्यम है, जिसे किसान अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए अपना सकते हैं।

मधुमक्खियां फूलों के रस को शहद में बदल देती हैं और उन्हें अपने छत्तों में जमा करती हैं। जंगलों से मधु एकत्र करने की परंपरा लंबे समय से लुप्त हो रही है। बाजार में शहद और इसके उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक और आकर्षक उद्यम के रूप में स्थापित हो चला है। मधुमक्खी पालन के उत्पाद के रूप में शहद और मोम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

आय बढ़ाने की गतिविधि के रूप में मधुमक्खी पालन के लाभ

  • मधुमक्खी पालन में कम समय, कम लागत और कम ढांचागत पूंजी निवेश की जरूरत होती है,
  • कम उपजवाले खेत से भी शहद और मधुमक्खी के मोम का उत्पादन किया जा सकता है,
  • मधुमक्खियां खेती के किसी अन्य उद्यम से कोई ढांचागत प्रतिस्पर्द्धा नहीं करती हैं,
  • मधुमक्खी पालन का पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मधुमक्खियां कई फूलवाले पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस तरह वे सूर्यमुखी और विभिन्न फलों की उत्पादन मात्रा बढ़ाने में सहायक होती हैं,
  • शहद एक स्वादिष्ट और पोषक खाद्य पदार्थ है। शहद एकत्र करने के पारंपरिक तरीके में मधुमक्खियों के जंगली छत्ते नष्ट कर दिये जाते हैं। इसे मधुमक्खियों को बक्सों में रख कर और घर में शहद उत्पादन कर रोका जा सकता है,
  • मधुमक्खी पालन किसी एक व्यक्ति या समूह द्वारा शुरू किया जा सकता है,
  • बाजार में शहद और मोम की भारी मांग है।

उत्पादन प्रक्रिया

मधुमक्खियां खेत या घर में बक्सों में पाली जा सकती हैं।

1. मधुमक्खी पालन के लिए आवश्यक उपकरण

छत्ता: यह एक साधारण लंबा बक्सा होता है, जिसे ऊपर से कई छड़ों से ढंका जाता है। बक्से का आकार 100 सेंटीमीटर लंबा, 45 सेंटीमीटर चौड़ा और 25 सेंटीमीटर ऊंचा होता है। बक्सा दो सेंटीमीटर मोटा होना चाहिए और उसके भीतर छत्ते को चिपका कर एक सेंटीमीटर के छेद का प्रवेश द्वार बनाया जाना चाहिए। ऊपर की छड़ बक्से की चौड़ाई के बराबर लंबी होनी चाहिए और उसे करीब 1.5 सेंटीमीटर मोटी होनी चाहिए। इतनी मोटी छड़ एक भारी छत्ते को टांगने के लिए पर्याप्त है। दो छड़ों के बीच  3.3 सेंटीमीटर की  खाली जगह होनी चाहिए, ताकि मधुमक्खियों को प्राकृतिक रूप में खाली जगह मिले और वे नया छत्ता बना सकें।

  • स्मोकर या धुआं फेंकनेवाला: यह दूसरा महत्वपूर्ण उपकरण है। इसे छोटे टिन से बनाया जा सकता है। हम धुआं फेंकनेवाले का उपयोग खुद को मधुमक्खियों के डंक से बचाने और उन पर नियंत्रण पाने के लिए करते हैं।
  • कपड़ा: काम के दौरान अपनी आंखों और नाक को मधुमक्खियों के डंक से बचाने के लिए।
  • छुरी: इसका इस्तेमाल उपरी छड़ों को ढीला करने और शहद की छड़ों को काटने के लिए किया जाता है।
  • पंख: मधुमक्खियों को छत्ते से हटाने के लिए।
  • रानी को छोड़नेवाला
  • माचिस की डिब्बी

2. मधुमक्खियों की प्रजातियां

भारत में मधुमक्खियों की चार प्रजातियां पायी जाती हैं ये इस प्रकार से हैं:

  • पहाड़ी मधुमक्खी (एपिस डोरसाटा): ये अच्छी मात्रा में शहद एकत्र करनेवाली होती हैं। इनकी एक कॉलोनी से 50 से 80 किलो तक शहद मिलता है।
  • छोटी मधुमक्खी (एपिस फ्लोरिया): इनसे बहुत कम शहद मिलता है। एक कॉलोनी से मात्र 200 से 900 ग्राम शहद ही ये एकत्र करती हैं।
  • भारतीय मधुमक्खी (एपिस सेराना इंडिका): ये एक साल में एक कॉलोनी से औसतन छह से आठ किलो तक शहद देती हैं।
  • यूरोपियन मधुमक्खी (इटालियन मधुमक्खी)(एपिस मेल्लीफेरा): इनकी एक कॉलोनी से औसतन 25 से 40 किलो तक शहद मिलता है।

डंकहीन मधुमक्खी (ट्राइगोना इरीडीपेन्निस): उपरोक्त के अलावा केरल में एक और प्रजाति है, जिसे डंकहीन मधुमक्खी कहा जाता है। इनके डंक अल्पविकसित होते हैं। ये परागण की विशेषज्ञ होती हैं। ये हर साल 300 से 400 ग्राम शहद उत्पादित करती हैं।

3. छत्तों की स्थापना

  • सभी बक्से खुली और सूखी जगहों पर होने चाहिए। यदि यह स्थान किसी बगीचे के आसपास हो तो और भी अच्छा होगा। बगीचे में पराग, रस और पानी का पर्याप्त स्रोत हो।
  • छत्तों का तापमान उपयुक्त बनाये रखने के लिए इन्हें सूर्य की किरणों से बचाया जाना जरूरी होता है।
  • छत्तों के आसपास चींटियों के लिए कुआं होना चाहिए। कॉलोनियों का रुख पूर्व की ओर हो और बारिश और सूर्य से बचाने के लिए इसकी दिशा में थोड़ा बहुत बदलाव किया जा सकता है।
  • कॉलोनियों को मवेशियों, अन्य जानवरों, व्यस्त सड़कों और सड़क पर लगी लाइटों से दूर रखें।

4. मधुमक्खियों की कॉलोनी की स्थापना

  • मधुमक्खी कॉलोनी की स्थापना के लिए मधुमक्खी किसी जंगली छत्तों की कॉलोनी से लेकर उसे छत्ते में स्थानांतरित किया जा सकता है या फिर उधर से गुजरनेवाली मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित किया जा सकता है।
  • किसी तैयार छत्ते में मधुमक्खियों के झुंड को आकर्षित करने या स्थानांतरित करने से पहले उस बक्से में परिचित सुगंध देना लाभदायक होता है। इसके लिए बक्से के भीतर छत्तों के टुकड़ों को रगड़ दें या थोड़ा सा मोम लगा दें। यदि संभव हो, तो किसी प्राकृतिक ठिकाने से रानी मक्खी को पकड़ लें और उसे अपने छत्ते में रख दें, ताकि दूसरी मधुमक्खियां वहां आकर्षित हों।
  • छत्ते में जमा की गयी मधुमक्खियों को कुछ सप्ताह के लिए भोजन करायें। इसके लिए आधा कप चीनी को आधा कप गरम पानी में अच्छी तरह घोल लें और उसे बक्से में रख दें। इससे छड़ के साथ तेजी से छत्ता बनाने में भी मदद मिलेगी।
  • बक्से में भीड़ करने से बचें।

5. कॉलोनियों का प्रबंधन

  • मधुमक्खी के छत्तों का शहद टपकने के मौसम में, खासकर सुबह के समय सप्ताह में कम से कम एक बार निरीक्षण करें।
  • निम्नलिखित क्रम में बक्सों की सफाई करें, छत, ऊपरी सतह, छत्तों की जगह और सतह।
  • कॉलोनियों पर नियमित निगाह रखें और देखते रहें कि स्वस्थ रानी, छत्ते का विकास, शहद का भंडारण, पराग कण की मौजूदगी, रानी का घर और मधुमक्खियों की संख्या तथा छत्तों के कोष्ठों का विकास हो रहा है।
  • इनमें से मधुमक्खियों के किसी एक दुश्मन के संक्रमण की भी नियमित जांच करें-
  • मोम का कीड़ा (गैल्लेरिया मेल्लोनेल्ला): इसके लार्वा और सिल्कनुमा कीड़ों को छत्ते से, बक्सों के कोनों से और छत से साफ कर दें।
  • मोम छेदक (प्लैटिबोलियम एसपी): वयस्क छेदकों को एकत्र कर नष्ट कर दें।
  • दीमक: फ्रेम और सतह को रुई से साफ करें। रुई को पोटाशियम परमैंगनेट के घोल में डुबायें। जब तक दीमक खत्म न हो जाये, सतह को पोछते रहें।
  • छड़ों को हटा दें और उपलब्ध स्वस्थ मधुमक्खियों को अच्छी तरह से कोष्ठकों में रखें।
  • यदि संभव हो, तो विभाजक दीवार लगा दें।
  • यदि पता चल जाये, तो रानी के घर और शिशुओं के घर को नष्ट कर दें।
  • भारतीय मधुमक्खियों के लिए प्रति सप्ताह 200 ग्राम चीनी का घोल (एक-एक के अनुपात में) दें।
  • पूरी कॉलोनी को एक ही समय में भोजन दें, ताकि लूटपाट न हो।
  • शहद एकत्र करने का मौसम शुरू होने से पहले कॉलोनी में मधुमक्खियों की संख्या पर्याप्त बढ़ा लें।
  • पहले छत्ते और नये कोष्ठों के बीच पर्याप्त जगह दें, ताकि रानी मधुमक्खी अपने कोष्ठ में रह सके।
  • रानी मधुमक्खी को उसके कोष्ठ में बंद करने के लिए रानी को अलग करनेवाली दीवार लगा दें।
  • कॉलोनी का सप्ताह में एक बार निरीक्षण करें और बक्से के किनारे शहद से भरे छत्तों को तत्काल हटा दें। इससे बक्सा हल्का होता रहेगा और तीन-चौथाई भरे हुए शहद के बरतन को समय-समय पर खाली करना जगह भी बचायेगा।
  • जिस छत्ते को पूरी तरह बंद कर दिया गया हो या शहद निकालने के लिए बाहर निकाला गया हो, उसे बाद में वापस पुराने स्थान पर लगा दिया जाना चाहिए।
  • नरम मौसम में प्रबंधन
  • शहद एकत्र करने के मौसम में प्रबंधन

6. शहद एकत्र करना

  • मधुमक्खियों को धुआं दिखा कर अलग कर दें और सावधानी से छत्तों को छड़ से अलग करें।
  • शहद को अमूमन अक्तूबर-नवंबर और फरवरी-जून के बीच ही एकत्र किया जाना चाहिए, क्योंकि इस मौसम में फूल ज्यादा खिलते हैं।
  • पूरी तरह भरा हुआ छत्ता हल्के रंग का होता है। इसके दोनों ओर के आधे से अधिक कोष्ठ मोम से बंद होते हैं।

ग्रीक टोकरी का छत्ता

ग्रीक टोकरी का छत्ता एक पारम्परिक तकनीक है। यह अब भी प्रासंगिक है, क्योंकि इसे बनाने के लिए स्थानीय सामग्री तथा स्थानीय कौशल की आवश्यकता होती है।

बनावट

  • टोकरी ऊपरी छोर से चौड़ी तथा तले से संकरी होती है।
  • ऊपरी भाग 1.25 इंच चौड़े समानांतर लकड़ी की छड़ों से ढंका होता है, जो पास-पास इस तरह से रखे होते हैं कि मधुमक्खी रोधी कवर बन जाए। लम्बाई की दिशा में प्रत्येक छड़ उत्तल होती है (निचली सतह पर) तथा लगभग एक इंच की दूरी होती है। उत्तलता छड़ के मध्य में आना चाहिए। दोनों सिरों को 2-3 इंच तक चपटा रखा जाना चाहिए ताकि जहां से छड़ें, जो टोकरी की परिधि से लम्बी होती हैं तथा टोकरी के मुंह पर टिकी होती हैं, वहां से मधुमक्खियां निकल न पाएं। (चित्र 1 देखिए)
  • लम्बाई के सहारे, प्रत्येक छड़ के मध्य में, नीचे की ओर पिघले हुए मधुमक्खी के मोम के साथ एक पतला कंघा लगाया जाता है ताकि सीधे कंघी बनाए जा सकें।
  • अन्दर तथा बाहर से टोकरी को दो भाग गोबर तथा एक भाग मिट्टी के मिश्रण से लीपा जाता है। (चित्र 2)। जब पलस्तर सूख जाता है, तो छड़ों को टोकरी के ऊपर रख दिया जाता है जिसे धूप तथा बारिश से बचाने के लिए इसके बाद फूस से बने शंकु के आकार के हैट से ढंका जाता है।  (चित्र 3 देखें)।
  • छत्ते के लिए आगमन बिन्दु तले से कम से कम 3 इंच ऊपर होना ज़रूरी है ताकि यदि कंघी गिर जाता है तो आगमन के मार्ग में रुकावट न हो। (चित्र 4 देखें)
  • जब शहद पक्का हो जाए तथा उसका बहाव पूरा हो जाए, तो कंघी छड़ों से काट दिए जाते हैं लेकिन कंघी की एक पतली छोटी पट्टी, पाव इंच से अधिक नहीं, मधुमक्खियों को सीधे, नए कंघी फिर से बनाने के लिए, छोड़ दी जाती है।

रेशम उत्पादन / रेशमकीट पालन

कैसे उपजाएँ

मलबरी रेशमकीट पालन

मलबरी रेशमकीट को विभिन्न जलवायु स्थितियों और विस्तृत क्षेत्र वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है। बेहतर पद्धतियों को अपनाकर कोकुन की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। लेकिन इसके लिए अधिक ऊपज देने वाली उत्तम किस्म की पत्ती का होना आवश्यक शर्त है। रेशमकीट का पालन लार्वा अवधि के दौरान पाँच विभिन्न चरणों से होते हुए होती है। लार्वा अवधि में उसे विशेष रूप से निर्मित रेशमकीट पालन शेड में रखा जाता है। साथ ही, उच्च कोटि का रेशम प्राप्त करने के लिए उचित समय पर प्रबंध और गहन देखभाल की जाती है।

मलबरी कृषि और रेशमकीट पालन की सर्वोत्तम पद्धतियाँ

पूरे पालन अवधि के दौरान रेशमकीट को काफी सावधानीपूर्वक देखभाल की जाती है और उसके भोजन के लिए उत्तम किस्म के मलबरी पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है। बेहतर वातावरण का निर्माण और कृमि व बीमारियों से रक्षा इनके पालन की अन्य आवश्यक शर्त्ते हैं। रेशमकीट के लिए अनुकूल स्थितियाँ प्रदान करने के लिए एक अलग से पालनघर और पालन उपकरण व साधनों की आवश्यकता होती है। एक साल में 5 से 10 फसलों का पालन किया जा सकता है और प्रत्येक फसल की जीवन अवधि लगभग 70-80 दिनों की होती है।

मलबरी कृषि

1. मलबरी प्रज़ाति

वी-1 और एस-36 उच्च ऊपज़ देने वाली मलबरी प्रजाति है और रेशमकीट पालन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। ये दोनों प्रजाति पोषक पत्ती प्रदान करती है जो रेशमकीट पालन में लार्वा के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन दो प्रजातियों की विशेषताएँ निम्न हैं -

एस - 36 प्रज़ाति -

  • इसकी पत्तियाँ हृदय आकार की मोटी और हल्के हरे रंग के साथ काँतियुक्त होती है।
  • पत्तियों में उच्च आर्द्रता होती है तथा उसमें अधिक पोषक तत्व होते हैं।
  • प्रति वर्ष एक एकड़ में लगभग 15 हज़ार से 18 हज़ार किलो ग्राम मलबरी पत्तियाँ प्राप्त होती हैं।

वी -1 प्रजाति -

  • यह प्रजाति वर्ष 1997 के दौरान जारी की गई और खेती में काफी लोकप्रिय है।
  • पत्तियाँ अण्डाकार, बड़े आकार की, मोटी, आर्द्रता लिए हुए गहरे हरे रंग की होती है।
  • एक वर्ष में लगभग 20-24 हज़ार किलो ग्राम मलबरी पत्तियाँ प्राप्त की जा सकती है।

2. रोपण पद्धति

वृक्षारोपण की व्यवस्था दो कतारों में की जाती है जहाँ (90+150 सें.मी) X 90 सें.मी या 60 सें.मी X 60 सें. मी. की दूरी उपयुक्त होती है। वृक्षारोपण की दोहरी कतार के लाभ इस प्रकार है-

  • दोहरी कतार के बीच जगह होने से अंतर कृषि गतिविधि तथा पत्तियों के परिवहन हेतु पावर टिलर का उपयोग किया जा सकता है। इसके द्वारा ड्रिप सिंचाई सुविधा होती है।
  • प्रति एकड़ अधिक संख्या में वृक्षों को लगाया जा सकता है।
  • आसानी से एवं शीघ्रतापूर्वक पत्तियों को ले जाया जा सकता जो आर्द्रता हानि की संभावना को कम करता है।
  • डंठल कटाई (शूट हार्वेस्टिंग) से 40 प्रतिशत तक श्रम की बचत होती है।

3. गोबर एवं खाद का प्रयोग

  • प्रति हेक्टेयर 8 मीट्रिक टन की दर से साल में दो बार गोबर का प्रयोग करें।
  • मलबरी के वी-1 प्रजाति के लिए एनपीके का प्रयोग 350:140 :140 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से तथा मलबरी के एस-36 प्रजाति के लिए 300 :120:120 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रति वर्ष 5 बराबर भागों में बाँट कर करें।

4. सिंचाई

  • सप्ताह में एक बार 80 से 120 मिली मीटर की दर से सिंचाई
  • पानी की कमी होने की स्थिति में किसान ड्रिप सिंचाई का प्रयोग कर 40 प्रतिशत पानी की बचत कर सकते हैं।

रेशमकीट पालन

1. संकरित रेशमकीट

आईवीएलपी के अंतर्गत सीएसआर-2 X सीएसआर-4 एवं द्विगुण संकरित (कृष्ण राजा) जैसे उन्नत बाइवोल्टाइन संकरित रेशमकीट की सिफारिश की गई है।

2. चावकी पालन

अण्डे के फूटने से लेकर परिपक्व अवस्था तक पहुँचने में एक रेशम कीट को पाँच अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। कीटों की दूसरी अवस्था युवा अवस्था या चावकी अवस्था कहलाती है। चूँकि यह प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते और इसके संक्रमित होने की संभावना अधिक रहती इसलिए चावकी पालन हेतु विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अतएव चावकी पालन केन्द्रों में नियंत्रित परिस्थितियों के भीतर पले रेशमकीट प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

3. बड़े उम्र में पालन

बड़े उम्र के कीटों का पालन तीसरे इनस्टार से शुरू होती है। ये कीड़े बहुत अधिक पत्तियाँ खाने वाले होते हैं।

4. पालन घर

मलबरी रेशमकीट पालन एक पूर्णतः घरेलू व्यवसाय है। इसके लिए 24-28 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान और 70-80 प्रतिशत आर्द्रता वाले मौसम की जरूरत होती है। इसलिए किफ़ायती ठंड वातावरण बनाये रखने के लिए दीवार व छत की बनावट के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन, भवन का अभिसरण, निर्माण पद्धतियाँ, डिज़ाइन इत्यादि पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। आगे, पत्तियों की रख-रखाव, चावकी पालन, परिपक्व अवस्था पालन एवं मोल्टिंग के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही, उस स्थान की साफ-सफाई और रोगमुक्तीकरण व्यवस्था भी अच्छी तरह होनी चाहिए।

पालन के प्रकार और मात्रा के अनुसार पालन घर का आकार होनी चाहिए। 100 डीएफएल के लिए 400 वर्ग फीट क्षेत्रफल वाला सतह प्रदान किया जा सकता है (डीएफएल- डिज़िज़ फ्री लेइंग (रोग मुक्त स्थान), 1 डीएफएल = 500 लार्वा )।

5. पालन उपकरण

परिपक्व अवस्था वाले रेशमकीट उच्च तापमान, उच्च आर्द्रता और न्यूनतम स्तर वाले हवा के आवागमन व्यवस्था को सहन नहीं कर पाते हैं। इसलिए कमरे के तापमान को न्यूनतम स्तर पर बनाये रखने के लिए पालन घर में दो ओर से हवा के आने व जाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि रेशमकीट द्वारा छोड़े गये मल से उत्पन्न बड़ी मात्रा में गैस आसानी से बाहर निकल सके। 100 डीएफएल (50 हजार लार्वा) के लिए न्यूनतम उपकरण आवश्यकता को निम्न तालिका में दर्शाया गया है -

सारणी- 100 डीएफएलएस (50 हजार लार्वा) पालन हेतु अपेक्षित पालन उपकरण

क्रम संख्या

सामग्री

मात्रा

1

शूट पालन रैक (40’ गुणे 5) 5 स्तरीय

01

2

रोटरी माउंटेजेज़ या चंड्राइक

35

3

पॉवर स्प्रेयर

01

4

आर्द्रतामापी

01

6. रोगमुक्त करना

पालन घर या उपकरणों को संक्रमणरहित बनाये रखने के लिए इसे दो बार साफ की जानी चाहिए। पहली बार पूर्ववर्ती फसल की तैयारी के तुरंत बाद 5 प्रतिशत ब्लिचिंग पाउडर से तथा दूसरी बार दूसरे फसल के दो दिन पहले 2.5 सैनिटेक (क्लोरीन डाई-ऑक्साइड) के घोल से साफ की जानी चाहिए। रोगमुक्त करने का सुझाव निम्न तालिका में दर्शाया गया है-

पालनघर एवं उपकरणों को संक्रमणरहित करने की तालिका

दिवस

कार्य आदेश

कार्यों का विवरण

पूर्ववर्ती पालन की समाप्ति के बाद

 

01

रोगग्रस्त लार्वा, गले हुए खराब कोकुन को जमा कर जलाना

02

रोटरी माउंटेज़ के फ्लास को जलाना और धुँआ द्वारा रोगमुक्त बनाना

03

पालनघर एवं उपकरणों का पहली बार रोगमुक्तीकरण करना

ब्रशिंग के 5 दिन पहले

04

उपकरणों की धुलाई एवं सफाई

05

उपकरणों को धूप में सुखाना

ब्रशिंग के 4 दिन पहले

06

पोषण को 0.3 प्रतिशत भुने हुए चूने से कीटाणु रहित बनाना (ऐच्छिक)

ब्रशिंग के 3 दिन पहले

07

पालनघर एवं उपकरण को दूसरी बार रोगमुक्त बनाना

ब्रशिंग के 2 दिन पहले

 

08

पालनघर के सामने व आने-जाने के रास्ते को धूल-कण मुक्त बनाना

09

हवा के आवागमन हेतु पालनघर की खिड़कियों को खुला रखना

ब्रशिंग के एक दिन पहले

10

ब्रशिंग हेतु तैयारी

7. शूट पालन- एक किफायती उपाय

रेशमकीट पालन की इस पद्धति में अंतिम तीन अवस्थाओं का पालन एक स्वतंत्र पत्ती के स्थान पर मलबरी शूट देकर किया जाता है। पालन की यह सबसे किफायती पद्धति है जिससे 40 प्रतिशत तक पालन श्रम की बचत होती है। अन्य लाभ इस प्रकार है-

  • रेशमकीट की संख्या कम होने पर बीमारी के फैलाव एवं संक्रमण में कमी।
  • कीड़ों और पत्तियों को प्रक्रिया से अलग करते ही द्वितीयक संक्रमण घट जाता है।
  • साफ-सफाई बनाये रखना।
  • भंडारण और बेड पर होने की स्थिति में पत्ती की गुणवत्ता का बेहतर संरक्षण।
  • बेड में बेहतर वायु संचरण।
  • बेहतर कोकुन गुणवत्ता एवं लार्वा की उच्च उत्तर-जीविता।
  • न्यून गैर आवर्ती व्यय।

8. पोषण

  • 50-55 दिन पुराने शूट का पोषण प्रारंभ करें। इसकी कटाई सुबह के ठण्डे मौसम में 3-4 फीट की ऊँचाई पर करें। 60-65 दिन पुराने शूट का पोषण पाँचवीं अवस्था वाले कीटों के साथ की जानी चाहिए।
  • कटाई की गई शूट का भंडारण ढीले में उर्ध्वाकार अवस्था में ठण्ड और आर्द्रता युक्त वातावरण में करनी चाहिए जो साफ, रोगाणुमुक्त एवं गीले कपड़े से ढके हुए हों।
  • बाई वोल्टाईन रेशमकीट के लिए चौथे अंतर्रूप में 460 कि.ग्राम और पाँचवें अंतर्रूप में 2880 कि.ग्राम मलबरी मंजरी के मात्रा की आवश्यकता होती है।
  • प्रतिदिन 3 बार भोजन देने (सुबह 6 बजे, दोपहर 2 बजे और रात 10 बजे) की सारणी को अपनाया जाना चाहिए।
  • मटमैले या अधिक पके हुए पत्तियों को न खिलाएँ।
  • प्रत्येक पोषण के दौरान बेड में लार्वा को समानांतर रूप में वितरित करें। पाँचवीं अवस्था के अंत में 100 डीएफएलएस के लिए 600 वर्ग फीट की जगह की आवश्यकता होती है।
  • प्रत्येक सफाई/पोषण से पहले चॉप स्टीक से ध्यानपूर्वक सभी छोटे आकार वाले और बीमारी की आशंका वाले कीड़ों को हटा दें। लिये गये लार्वा को 0.3 विलयन बुझे हुए चूने के 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाउडर में रखें।

9. बेड क्लीनिंग

अस्वस्थ लार्वा को हटाएँ और उसे 0.3 बूझा हुआ चूना विलयन में 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाऊडर में रखें।

बेड की सफाई करते समय पालन कक्ष में बेड को सतह पर इधर-उधर न फैलाएँ।

10. तापमान और आर्द्रता बनाये रखना

तीसरे अंतर्रूप लार्वा के लिए बेहतर तापमान 26 डिग्री सें, चौथे अंतर्रूप के लिए 25 डिग्री से. और 5 वें अंतर्रूप के लिए 24 डिग्री से. आदर्श तापमान है तथा उसी प्रकार तीसरे अंतर्रूप के लिए आर्द्रता 80 प्रतिशत तथा चौथे व 5 वें अंतर्रूप लार्वा के लिए 70 प्रतिशत आर्द्रता की आवश्यकता होती है।

एयर कूलर, रूम हीटर, चारकोल स्टोव, भींगी थैली या भीगी हुई रेत का उपयोग करते हुए कूलिंग, हीटिंग और आर्द्रता वाले उपकरणों का उपयोग कर आवश्यक तापमान और आर्द्रता बनाए रखे।

हवा के आवागमन से रेशमकीट के शारीरिक तापमान को घटाने में मदद मिलती है।

11. निर्मोचन के दौरान देखभाल

निर्मोचन अवधि के दौरान पालन घर में खुली हवा और शुष्कता की स्थिति बनाये रखे।

निर्मोचन के लिए कीड़ो के स्थिर होने के बाद बेड को धीरे से फैलाएँ तथा बेड को सूखा बनाए रखने के लिए बूझे हुए चूने के पाउडर का समान रूप से उपयोग करें।

अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले तापमान और आर्द्रता तथा तेज़ हवा या अधिक प्रकाश का इस्तेमाल न करें।

निर्मोचन से 95 प्रतिशत कीड़ो के बाहर आने के बाद भोजन दें।

12. साफ-सफाई की व्यवस्था

पालनघर में प्रवेश करने से पहले अपने हाथ-पैर अच्छी तरह धोएँ। हाथ-पैर को अम्लीय साबून से व स्वच्छ घोल में धोएँ (0.5 बूझे हुए चूने के घोल में 2-5 सैनिटेक/सेरिक्लोर या) फिर 0.3 प्रतिशत बूझे हुए चूने में 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाऊडर)

स्वच्छ घोल में हाथ धोएँ तथा रोगमुक्त कीडों को हटाने के बाद बेड की सफाई करें।

हर दिन रोगग्रस्त कीड़ों को बेसिन में उठाएँ और चूने के पाउडर तथा ब्लीचिंग पाउडर का इस्तेमाल करें तथा इन्हें दूर जगह ले जाकर गाड़ दें या अग्नि में जला दें।

रेशमकीट पालन के समय कक्ष को हवादार और साफ-सुथरा रखें।

13. बेड रोगाणुमुक्तक का प्रयोग

विज़ेता, विज़ेता ग्रीन एवं अंकुश आदि पाउडर रेशमकीट को बीमारी से बचाने के लिए रेशमकीट के शरीर तथा पालन स्थान का रोगाणुनाशक है। उपयोग की पद्धति इस प्रकार है-

पतले कपड़े में पाउडर ले और प्रत्येक निर्मोचन के बाद रेशमकीट पर 5 ग्राम/वर्ग फीट की दर से छिड़क दें। ऐसा बेड सफाई करने के चार दिन बाद तालिका में दर्शाये गये विधि के अनुरूप करें-

छिड़काव का समय

रोगाणुनाशक

ग्राम/वर्ग फीट बेड क्षेत्रफल

100 डीएलएफएस हेतु अपेक्षित मात्रा

तीसरे निर्मोचक के बाद व भोज़न से पूर्व

विज़ेता/विज़ेता ग्रीन अंकुश

5

900 ग्राम

चौथे अंतर्रूप के तीसरे दिन

विज़ेता अनुपूरक (खाद्य)

3

600 ग्राम

चौथे निर्मोचन के बाद भोजन देने से पूर्व

विज़ेता/ विज़ेता ग्रीन/ अंकुश

5

1200 ग्राम

पाँचवे अंतर्रूप के दूसरे दिन

विज़ेता अनुपूरक (खाद्य)

3

1300 ग्राम

पाँचवे अंतर्रूप के चौथे दिन

विज़ेता/ विज़ेता ग्रीन/ अंकुश

5

3000 ग्राम

पाँचवें अंतर्रूप के 6ठे दिन

विज़ेता खाद्य

3

1800 ग्राम

नोट- बारिश व ठंड के मौसम में मसकार्डिन रोग के नियंत्रण हेतु विज़ेता अनुपूरक की सिफारिश की गई है।

  • बरसात और ठंड के मौसम में यदि मसकार्डिन बीमारी उच्च हो तो इस पर नियंत्रण पाने के लिए विज़ेता अनुपूरक खाद्य की सिफारिश की गई है।
  • निर्मोचन के समय या कीड़ो द्वारा मलबरी पत्ती खाते समय पाउडर का छिड़काव न करें।
  • छिड़काव के बाद 30 मिनट तक रेशमकीट को आहार न दे।

14. विकसित कीड़ो का आधार

ऐसे उच्च स्तर वाले कोकुन प्राप्त करने के लिए समय पर रेशमकीट लार्वा का आधार अत्यंत आवश्यक है। सातवें दिन पर पाँचवें अंतर्रूप में रेशमकीट परिपक्वता की स्थिति में आता है। अतः पोषण देना बंद करे और कोकुन के निर्माण हेतु जगह ढूँढ़े। ऐसे लार्वा को तुरन्त पकड़े और अवलम्बक पर आधार दें। ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि माऊंटेज़ (आधार) पर लार्वा की संख्या प्रत्येक आधार की क्षमता से अधिक नहीं होनी चाहिए।

लार्वा जब कताई की अवस्था में हों तब कमरे का तापमान 24 डिग्री से.के आसपास होनी चाहिए और सापेक्ष आर्द्रता 60-70 प्रतिशत होनी चाहिए, साथ ही, उसमें खुली हवा की सुविधा होनी चाहिए। बेहतर गुणवत्ता वाले कोकुन उत्पादन हेतु रोटरी आधार की सिफारिश की गई है। 100 डीएफएलएस के माऊंटिंग कीड़ों के लिए लगभग 35 सेट रोटरी माऊंटिंग (आधार) की आवश्यकता होती है। रोटरी माउंटिंग को लटकाने के लिए अलग से बरामदा की आवश्यकता होती है।

15. कटाई एवं छँटाई

कोकुन फसल की छः दिन पर कटाई होती है। विकृत कोकुन को हटाएँ। खराब कोकुन की छँटनी के बाद गुणवत्ता के आधार पर उसका श्रेणीकरण करें। ठंड के मौसम में कटाई के लिए एक दिन अधिक का समय दे।

16. विपणन

कोकुन को बाजार दिन के ठंडे समय में सातवें दिन ले जाएँ। कोकुन को 30-40 किलो ग्राम क्षमता वाले नॉयलॉन बैग में रख कर ढ़ीले से बाँधनी चाहिए और उसे ऐसी गाड़ी में ले जाना चाहिए जिसमें उसे रखने के लिए शेल्फ या दराज़ बने हों।

17. कोकुन ऊपज़

100 डीएफएलएस से 60-70 कि. ग्राम की औसत ऊपज़ होती है। एक साल में एक एकड़ मलबड़ी गार्डन में लगभग 700-900 किलो ग्राम कोकुन की फसल उगाई जा सकती है।

नर्सरी में शहतूत की पैदावार की नई विधि

शहतूत के पौधे छोटी अवस्था में कटिंग्स या फ्लैट बेड प्रणाली द्वारा वाणिज्यिक स्तर पर उत्पादित किए जाते हैं।

अंकुरण की सफलता और पौध की ताक़त प्रतिस्पर्धी खरपतवार, मिट्टी की नमी, और मिट्टी के तापमान से काफी हद तक प्रभावित होती है। चूंकि पानी और श्रम की उपलब्धता/ खरपतवार उन्मूलन में खर्च आजकल बाधा हैं, इन कठिनाइयों को दूर कर शहतूत की पैदावार करने के लिए पॉलिथीन शीट का उपयोग करते हुए एक नया तरीका विकसित किया गया है, जो व्यावहारिक व्यावसायिक उद्देश्य के लिए शहतूत के गुणवत्तापूर्ण पौधों के सफल उत्पादन के लिए कारगर साबित हुआ है।

विधि

30 से 40 सेमी गहराई तक भूमि जुताई और कृषि यार्ड खाद की 8 से 10 मीट्रिक टन मात्रा डालने के बाद, ज़मीन को समतल किया जाता है। दोनों ओर एक तीन चौथाई साझा सिंचाई नहर के साथ नर्सरी बेड तैयार किए जाते हैं।

15 फीट x 5 फीट आकार में काली पॉलिथीन शीट को काट कर बेड पर रखा जाता है और 6 से 8 माह पुराने रोग मुक्त शहतूत कटिंग महीने (3 कलियों के,15 से 20 सेमी लंबाई के) पॉलिथिन से ढंकी नर्सरी बेड की मिट्टी पर 10 सेमी x 10 सेमी की दूरी पर रखे जाते हैं। क्षेत्र की मिट्टी बनावट के आधार पर पोलीथीन पर ही चैनल से सिंचाई सप्ताह या 10 दिन में एक बार की जाती है।

लाभ

इस पद्धति द्वारा खरपतवार को पूरी तरह से रोका जा सकता है, क्योंकि उसे सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता है। इस प्रकार, पूरी नर्सरी अवधि (चार माह) के दौरान खरपतवार उन्मूलन की आवश्यकता नहीं होती है, जिससे खरपतवार उन्मूलन के लिए श्रम के व्यय में भारी बचत होती है।

चूंकि बढ़ते शहतूत पौधों के मुकाबले के लिए कोई खरपतवार नहीं होती है, उन्हें अधिक से अधिक मिट्टी पोषक तत्व प्राप्त होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उच्च शक्ति और विकास होता है, और उच्च गुणवत्ता के पौधे मिलते हैं। अन्य विधियों के विपरीत, सिंचाई 50 प्रतिशत तक कम की जा सकती है, क्योंकि मिट्टी पर पॉलिथीन कवर मिट्टी का तापमान काफी कम कर देता है और पानी का वाष्पीकरण बचाकर मिट्टी की नमी का संरक्षण करता है।

आय

इस विधि से, चार महीनों में प्रति एकड़ 2.30 से 2.40 लाख पौधों का उत्पादन किया जा सकता है जिससे अन्य विधियों की तुलना में औसतन 50,000 रुपेय अधिक आय होती है।

उत्पादन लागत

कोकुन उत्पादन का आर्थिक विश्लेषण (प्रति एकड़)

मलबरी बगीचा की स्थापना लागत (प्रथम वर्ष)

क्र.सं

विवरण

मूल्य रुपये में

1

जुताई कार्यक्रम

1500.00

2

अंतिम रूप से भूमि की जुताई

400.00

3

कृषि यार्ड खाद (8 टन) 500 रुपये/टन की दर से

4000.00

4

मलबरी पौधे - 6000 छोटे पौधे 0.50 रुपये/पौधे की दर से

3000.00

5

ट्रैक्टर के साथ क्यारी बनाना (4 घंटे) एवं पौध रोपण

2000.00

6

उर्वरक (100 कि. ग्राम अमोनियम सल्फेट, 125 कि. ग्रा.सिंगल सुपर फॉस्फेट एवं 35 कि. ग्रा. पोटाश)

1036.00

7

उर्वरक प्रयोग की लागत

120.00

8

सिंचाई

1500.00

9

घास-पात काटना ( तीन बार)

1800.00

10

विविध खर्च

500.00

 

कुल

16056.00

 

मलबरी बगीचा का रख-रखाव (दो वर्ष पश्चात)

क्र.सं

विवरण

मूल्य रुपये में

संचालन लागत

 

1

कृषि यार्ड खाद (8 टन) 500 रुपये/टन की दर से

4000.00

2

उर्वरक की लागत (600 कि. ग्राम अमोनियम सल्फेट, 300 कि. ग्रा.सिंगल सुपर फॉस्फेट व 80 कि.ग्रा. पोटाश)

5538.80

3

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

1200.00

4

सिंचाई जल लागत

5000.00

5

सिंचाई

3600.00

6

घास-पात काटना

3400.00

7

शूट हार्वेस्ट

7200.00

8

पौधों की छँटाई व सफाई

600.00

9

भू-राजस्व

50.00

10

विविध व्यय

500.00

11

कार्यगत पूँजी पर ब्याज

621.00

 

कुल तरल लागत

31710.58

स्थिर लागत

 

 

मलबरी बगीचा की स्थापना का आनुपातिक लागत

1070.42

 

कुल पत्ती उत्पादन लागत

32781.00

 

पत्ती का लागत/कि. ग्राम

1.64

300 डीएफएलएस के लिए पालन संपत्ति और भवन

क्रम

संख्या

पालन निर्माण /

उपकरण

अपेक्षित संख्या / मात्रा

दर

(रुपये में )

मूल्य

(रुपये में)

जीवन अवधि

मूल्य ह्रास

(रुपये)

 

भवन

 

 

 

 

 

1

बड़े उम्र का पालनघर

(चावकी और शूट भंडार कक्ष सहित) वर्ग फीट

 

1300 वर्ग फुट

 

250.00 /

वर्ग फुट

 

325000.00

 

30

 

10833.33

2

बरामदा (वर्ग फीट में)

300 वर्ग फुट

50.00 /वर्ग फुट

15000.00

15

1000.00

 

कुल

 

 

340000.00

 

11833.33

 

उपकरण

 

 

 

 

 

1

बिजली स्प्रेयर

1

6000.00

6000.00

10

600.00

2

मास्क

1

2000.00

2000.00

5

400.00

3

रूम हीटर

3

750.00

2250.00

5

450.00

4

आर्द्रता-वाहक (ह्युमिडिफायर)

3

 

1500.00

4500.00

5

450.00

5

गैस फ्लेम गन

1

500.00

500.00

5

100.00

6

अंडा परिवहन बैग

1

150.00

150.00

5

30.00

7

चावकी पालन स्टैंड

2

500.00

1000.00

10

100.00

8

लकड़ी संपोषक ट्रे

24

150.00

3600.00

10

360.00

9

पोषण स्टैंड

1

100.00

100.00

5

20.00

10

पत्ती काटने का बोर्ड

1

250.00

250.00

5

50.00

11

चाकू

1

50.00

50

5

10.00

12

पत्ती कक्ष

1

1000.00

1000.00

5

200.00

13

चीटी कुँआ

42

25.00

1050.00

5

210.00

14

चावकी बेड सफाई नेट

48

20.00

960.00

5

192.00

15

लिटर बास्केट/

विनाइल शीट

2

250.00

 

500.00

 

2

 

250.00

16

प्लास्टिक बेसिन

2

50.00

100.00

2

50.00

17

पत्ती संग्रहण टोकड़ी

2

50.00

100.00

2

300.00

18

अंकुरण पालन रैंक

(45 फीट 5X4टायर)

2

1500.00

3000.00

10

50.00

19

नायलन नेट

1

1500.00

1500.00

5

300.00

20

घुमाव वर्त ( माउंटेज )

105

240.00

25200.00

5

5040.00

21

प्लास्टिक अंड सेवन फ्रेम

6

50.00

300.00

5

60.00

22

प्लास्टिक बाल्टी

2

50.00

100.00

2

50.00

 

कुल

 

 

54210.00

 

9737.00

 

कुल योग

 

 

394210.00

 

21570.33

रेशमकीट पालन में निवेश और आमदनी

क्र.सं.

विवरण

लागत / राजस्व

तरल मूल्य

 

1

पत्तियाँ

32781.00

2

रोगमुक्त अंडा (1500 डीएफएल)

4200.00

3

रोगाणुनाशक

7425.00

4

श्रम 25 एम डी/100 डीएफएलएस की दर से

16875.00

5

परिवहन एवं विपणन

1580.00

6

अन्य लागत

500.00

7

कार्यगत पूँजी पर ब्याज़

305.00

 

कुल तरल लागत

63666.80

स्थिर लागत

 

 

भवन एवं उपकरणों पर मूल्य ह्रास व स्थिर लागतों पर ब्याज

21570.33

 

कुल लागत

85237.13

राजस्व

 

 

कोकुन उपज

60.00

 

औसत कोकुन मूल्य

120.00

 

कोकुन उत्पादन

900.00

 

कोकुन से आय

108000.00

 

सह उत्पाद से आय

5400.00

 

कुल राज़स्व

113400.00

 

शुद्ध राज़स्व

28162.87

 

फायदा - मूल्य अनुपात

1.33

उपयोगी लिंक

www.indiansilk.kar.nic.in
http://www.seri.ap.gov.in/2_seri_tech.htm
http://www.seri.ap.gov.in/8_gallery.htm

चावकी पालन

चावकी पालन का मतलब है रेशमकीट पालन की पहली दो अवस्थाएँ। यदि चावकी कृमि का सही ढंग से पालन नहीं की गई तो बाद की अवस्था से फसल की हानि हो सकती है। इसलिए चावकी का पालन सही ढंग से की जानी चाहिए। इसके लिए उपयुक्त तापमान एवं आर्द्रता, स्वास्थ्य की स्थिति, मुलायम पत्तियाँ, बेहतर पालन सुविधाएँ तथा सभी तकनीकी कौशलों की आवश्यकता होती है।

वाणिज्य़िक चावकी पालन केन्द्र

वाणिज़्यिक चावकी पालन मॉडल को सीएसआरटीआई, मैसूर में स्थापित किया गया है जहाँ वर्ष में 32 बैचों में प्रति बैच 5 हज़ार की दर से 1 लाख 60 हज़ार (रोगमुक्त अंडज़) ब्रश करने की क्षमता उपलब्ध है। दो वर्ष तक इस मॉडल की सफलतापूर्वक परीक्षण के बाद देश में इस मॉडल को मुख्य रेशमकीट पालन उगाई क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाया गया है।

वाणिज्य़िक चावकी पालन केन्द्र के लिए जरूरी चीजें

वाणिज़्यिक तौर पर चावकी पालन केन्द्र के लिए एक अलग चावकी सिंचित मलबरी गार्डन, आवश्यक सुविधाओं से युक्त चावकी पालन गृह तथा वैज्ञानिक पद्धति से चावकी पालन हेतु आवश्यक प्रशिक्षण/कौशल की आवश्यकता होती है।

रेशमकीट अंडे को ग्रेनेज़ेस या 120 से 150 एकड़ क्षेत्र वाले मलबड़ी गार्डन से प्राप्त किया जा सकता है जिसे 80 से 100 रेशमकीट विशेषज्ञों द्वारा देखभाल किया जाता है।

  • वाणिज़्यिक चावकी पालन केन्द्र के लाभ
  • स्वस्थ एवं शक्तिशाली कम उम्र के कीट की वृद्धि जो कोकुन फसल के स्थिरीकरण और कोकुन फसल उत्पाद में वृद्धि को सुनिश्चित करता है।
  • एक समान तथा स्वस्थ रेशमकीट लार्वा एवं कोकुन का उत्पादन।
  • बीमारी के फैलाव और संक्रमण की संभावना को कम करता है।
  • अंडो के उपयुक्त सेचन से स्वस्थ हैचिंग होता है।
  • पालन के दौरान लार्वा के गुम होने के प्रतिशत में कमी जिससे फसल की ऊपज़ में वृद्धि होती है।

चावकी पालन और इससे संबंधित पद्धति के बारे में अधिक जानकारी के लिए केन्द्रीय रेशमकीट पालन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, मैसूर से संपर्क करें।

आर्गेनिक तसर रेशम उत्पादन की विधियाँ

स्त्रोत: केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान

केन्द्रीय रेशम बोर्ड( वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार)

नगड़ी, रांची – 835303 (झारखण्ड)

केंचुआ खाद

केंचुआ किसानों का दोस्त होता है जो खेत की मिटटी एवं खेत में स्थित फसलों के अवशेष को खाकर किसानों के लिए बहुमूल्य तत्व प्रदान करता है जिसे आम बोलचाल की भाषा में वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं | वर्मी कम्पोस्ट में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सूक्षम तत्व, एंजाइम, हार्मोन्स एवं मृदा सूक्षम जीवाणुओं की प्रचुरता रहती है | वर्मी कम्पोस्ट के प्रयोग से मृदा के भौतिक, रासयनिक एवं जैविक संरचना में परिवर्तन होता है जिससे न केवल मृदा पी.एच., जल धारण क्षमता एवं ह्यूमस की वृद्धि होती है बल्कि तसर भोज्य पौधों के पत्तियों की गुणवत्ता में भी वृद्धि होती है |

केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) बनाने की विधि

केंचुआ खाद बनाने के लिए एक गड्ढ़े की आवश्यकता होती है जिसका आकार आवश्यकतानुसार घटया-बढ़ाया जा सकता है लेकिन गड्ढ़े की गहरायी एक से डेढ़ मीटर रखना आवश्यक है | गड्ढ़े का तल एवं चारों दीवारें ईंट या कंक्रीट पक्का बनाना लाभदायक होता है इससे केंचुआ गड्ढ़े के बाहर नहीं जा सकेंगे तथा पोषक तत्वों का रिसाव भी नहीं होगा | गड्ढा तैयार होने के पश्चात तसर प्रक्षेत्र के अवशेषों जैसे आसन, अर्जुन की पत्तियां, अपतृण,घास, साल वृक्षों के फूल, पोआल आदि के छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गोबर के साथ मिश्रण बनाकर गड्ढ़े में भरकर उपर से पुआल या खर-पतवार से ढक देते हैं | गड्ढ़े में चूना मिलाना लाभदायक है जो अवशेषों को सड़ाने में सहायक होता है | प्रति टन अवशेष के हिसाब से 10-12 कि० ग्रा० रॉक फास्फेट या सुपर फास्फेट या जलावन लकड़ी का अवशेष डालने से कम्पोस्ट की गुणवत्ता में सुधार होता है | गड्ढ़े में नमी बनायें रखने के लिए समय समय पर पानी का छिड़काव करना चाहिए | हर 15-20 दिनों के अंतराल में अवशेषों को उलट-पलट करना लाभदायक होता है | जब गड्ढे में स्थित अवशेष 50% से अधिक सड़ जाए तब केंचुआ की उन्नत प्रजाति “आईसिनिया फेटीडा” की पर्याप्त मात्रा कम्पोस्ट में छोड़ देनी चाहिए | इस प्रजाति केंचुआ बिना सुषुप्तावस्था में गये पूरे वर्ष वर्मी कम्पोस्ट बनाने की क्षमता रखते हैं |  जबकि देशी प्रजाति का केंचुआ केवल वर्षा के मौसम में दिखाई देता है और वर्षा के पश्चात इस महीने में सुषुप्तावस्था में चला जाता है | जब गड्ढे में कम्पोस्ट पूर्ण रूप से दानेदार हो जाए तब कम्पोस्ट गड्ढे में पानी छिड़काव बंद कर देना चाहिए तथा सूखने के पश्चात वर्मी कम्पोस्ट को किसी छायादार वृक्ष के नीचे निकालकर रख देना चाहिए| केंचुओं को पुन: प्रयोग में लाने के लिए दो मी. मी. छेद वाली चलनी से छानकर केंचुआ को वर्मी कम्पोस्ट से अलग कर देना चाहिए |

वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग तसर भोज्य पौधों के चारों ओर थाल बनाकर 2 कि० ग्रा० प्रति वृक्ष की दर से करना चाहिए | वर्मी कम्पोस्ट कार्बनिक होने के साथ तसर खाद पौधों के लिए अधिक उपयोगी है | इसकी मांग किसानों द्वार भी वृहद रूप में की जा रही है | उपयोगिता की दृष्टि से रसायनिक खाद एवं वर्मी कम्पोस्ट का तुलनात्मक विवरण निम्नवत है :

रासायनिक खाद

वर्मी कम्पोस्ट

रासायनिक उर्वरक खाद काफी महंगे होते हैं |

केंचुआ जैविक खाद अत्यधिक किफायती होता है |

इसके निरंतर उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति, मृदा गठन एवं मृदा संरक्षण में काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे जमीन की स्थिति ठीक नहीं रहती है|

इस खाद के उपयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति में वृधि होती है तथा जमीन में काफी सुधार हो जाता है|

रासायनिक खादों के उपयोग से पौधों की जल आवश्यकता ज्यादा होती है |

इस खाद से फसलों में पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है |

इस खाद के उपयोग से विशेष तरह के अनाज का उत्पादन होता है |

इस खाद के प्रयोग से सुरक्षित अनाज उत्पादन होता है और इसमें स्वाद और विटामिन अधिक मात्रा में पाया जाता है |

इसके प्रयोग के लिए बाजार पर ही निर्भर रहना पड़ता है |

इस तकनीक अवशिष्ट प्रबंधन के अंतर्गत वर्मी कम्पोस्ट एवं केंचुओं को बिक्री कर रोजगार के अवसर प्रदान करती है | और बाजार में इस खाद का मूल्य रू 2000/- प्रति टन है |

कृत्रिम आहार पर तसर चाकी कीटपालन

तसर कृत्रिम आहार की आवश्यकता क्यों?

  • तसर कीटों का चाकी अवस्था में बाह्यं कीटपालन में 35-40% नुकसान होता है |
  • कई नई विधिओं व तकनीकों से 15-20 कोसा/ रो. म.च. उत्पादन में वृधि हुई है |
  • अत: चाकी अवस्था में इस हानि को कम करने हेतु कमरे के अन्दर कृत्रिम आहार पैर कीटपालन तकनीक विकसित की गई है |
  • कृत्रिम आहार चाकी तसर कीट पालन में कीटों की वृधि एक समान व अधिक वजन का होता है |

कृत्रिम आहार: कृत्रिम आहार में आसन/अर्जुन की कोमल पत्तियों का पाउडर, आर्गेनिक सामग्री के साथ मिला कर स्टैण्डर्ड प्रोटोकॉल बनाया गया है |

विधि:

तसर कीड़ों को ब्रशिंग के पहले ट्रे को 5% ब्लीचिंग पाउडर घोल से धोकर सूखा लें | ट्रे की पट्टी में अंदर की तरफ ब्राउन टेप चिपकाएं तथा उसके उपर ग्रीस की पतली तह लगाएं जिससे कीड़े ट्रे से बहार न जाएं | कृत्रिम आहार के छोटे-छोटे टुकड़े (5 x 1 से. मी.) काटकर ट्रे में फैला दें | अंडों से निकले कीड़ों को ट्रे में कृत्रिम आहार पर छोडें | सभी ट्रे को स्टैंड पर रखें | ट्रे के उपर अखबार रखें जिससे कीड़ों का लीटर दूसरी ट्रे में न जाए | ब्रशिंग के तीसरे या चौथे दिन यदि आहार कम पड़े तो डालें | चौथे दिन कीड़े प्रथम मोल्ट में जान शुरू कर देते हैं | पांचवे-छठवें दिन 80-90% कीड़े दूसरी अवस्था में आ जाते हैं| दूसरी अवस्था के दूसरे दिन अर्जुन, आसन की ताजी पत्तियां डालियाँ सहित ट्रे में रखें | तीसरे दिन सभी कीड़े पत्तियों में चले जाते हैं | कीड़े सहित डालियाँ खाध पौधों में 3.00 से 4.00 बजे शाम के बीच स्थानांतरित करें|

कृत्रिम आहार से लाभ:

चाकी जीवित प्रतिशत: 94.0% चाकी कीड़ों का वजन: 0.50(g) कोसा उत्पादन/ रो. मु. च. : 92

  • तसर चाकी कीड़ों को बहुत कम हस्तांतरण की आवश्यकता होती है |
  • 200 रो. मु. च. को कृत्रिम आहार पर चाकी कीटपालन में मजदूरी लागत बहुत कम है |
  • कृत्रिम आहार की लागत 650 रुपए/ 200 रो. मु. च.
  • कृत्रिम आहार में पालने से कम-से-कम 15-20 कोसा की वृधि होती है जिससे 2500-3000 रुपए अतिरिक्त आमदनी 650 रूपए खर्च करने पर होती है |
  • तसर की बहुमूल्य पारि-प्रजातियों के संरक्षण में सहायक |

तसर रेसम कीटपालन में रोग नियंत्रण की आर्गेनिक विधि: लीफ सरफेस माइक्रोब ( एल. एस. एम.) रोगों का जैविक नियंत्रण

  • केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, रांची ने रेशम कीटपालन के दौरान एल. एस. एम के उपयोग के लिए एक तकनीक विकसित की है |
  • यह तकनीक एल. एस. एम लीफ सरफेस माइक्रोब (एल. एस. एम) आधारित तसर रेशमकीट रोगों के नियंत्रणका एक जैविक उपचार है |
  • तसर भोज्य पौधों का एल. एस. एम रेशम कीट के बैक्टीरिया तथा वाइरस रोगाणुओं के प्रति-प्रतिरोधक क्षमता रखता है |

एल. एस. एम का घोल बनाने की विधि

  • कीटपालन क्षेत्र में 4-5 किग्रा, मिटटी आधा फीट गहराई से लें तथा एक बाल्टी में 10 लीटर पानी में अच्छी तरह मिश्रित करें तथा रात भर रखा रहने दें |
  • अगले दिन बाल्टी से उपर की परत का साफ पानी एकत्र करें |
  • एकत्रित 5 लीटर मिटटी के पानी में एल. एस. एम की एक एम्प्यूल डालकर अच्छी तरह मिलाएं |
  • तैयार एल. एस. एम घोल का भोज्य पौधों की पत्तियों पर छिड़काव सिर्फ एक बार कीट की दूसरी अवस्था के दौरान करें |

एल. एस. एम का प्रभाव

रोगों की कमी                  : 44%

कोसा उत्पादन में वृधि / रोमुच    : 12

लाभ-खर्च अनुपात               : 1:6

लीफ सरफेस माइक्रोब की उपलब्धता

लीफ सरफेस माइक्रोब ऐम्प्यूल के रूप में केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, रांची द्वारा मांग पर 40 रूपए प्रति ऐम्प्यूल की दर से वितरित की जाती है | एक ऐम्प्यूल 100 रो.मु.च. के कीटपालन के लिए पर्याप्त है |

तसर रेशम कीटपालन में रोग नियंत्रण की आर्गेनिक विधि: जीवन सुधा, एक वानस्पतिक उत्पाद

जीवन सुधा औषधियों पौधों से निर्मित एक वानस्पतिक उत्पाद है जो तसर रेसम कीट की वायरोसिस के नियंत्रण के लिए प्रयुक्त की जाती है | जीवन सुधा पाउडर जो 1.0% जलीय अर्क का कीटपालन में उपयोग रेशमकीट को वायरोसिस रोग से बचाता है | इसके उपयोग से कोसा फसल में 10 -12 कोसा/ रोगमुक्त चकता का फायदा होता है |

जीवन सुधा के अवयव

जीवन सुधा तीन औषधीय पौधों एलोवेरा(घृत कुमारी), एंड्रोग्रेफिस पेनिकुलेटा (कालमेघ) तथा फ़ाइलेन्थस निरुरी (भूमि आंवला) के पाउडर/ जैल का एक निश्चित अनुपात मिश्रण है |

जीवन सुधा बनाने की विधि

  • आवश्यक मात्रा में घृत कुमारी का जैल, कालमेघ तथा भूमिआंवला का जमीन से उपरी भाग का सूखा पाउडर लें|
  • सभी अवयवों को निश्चित अनुपात में मिलने के बाद अच्छी तरह मिश्रित कर पतली परत में फैलाकर सुखायें|
  • इस मिश्रण को छाया में दो दिन तक पूरी तरह सुखायें |
  • सुखे मिश्रण को मिक्सी में पीसकर पतला पाउडर बनायें |
  • 300 ग्राम पाउडर का एक जीवन सुधा पैकेट बनायें |

एक पैकेट को 200 रो.मु.च. के कीटपालन के लिए उपयोग करें

जीवन सुधा घोल बनाने की विधि

  • जीवन सुधा पाउडर की आवश्यक मात्रा रोगमुक्त चकत्तों की संख्या तथा रेशम कीट की अवस्था के आधार पैर 300 ग्राम पैकेट से लें |
  • जीवन सुधा का एक भाग 100 भाग साफ पानी में डाल कर रात भर रखें फिर मसलिन कपड़े में छान कर अच्छी तरह निचोड़ लें |
  • यह जलीय अर्क रेशमकीट लार्वे के खाने के लिए भोज्य पौधों की पत्तियां पर छिड़कें |

जीवन सुधा की खुराक तथा उपयोग का समय

  • जीवन सुधा के जलीय अर्क की तीन खुराक भोज्य पौधों की पत्तियों पर छिड़के |
  • पहली, दूसरी, तथा तीसरी अवस्था में एक-एक बार रेशमकीट लार्वे के खाने की अवस्था में दें |

200 रोग मुक्त चकतों के कीटपालन के लिए जीवन सुधा एवं पानी की मात्रा

लार्वा की अवस्था

जीवन सुधा पाउडर (ग्रा.)

पानी (ली.)

पहली

50

5

दूसरी

100

10

तीसरी

150

15

जीवन सुधा का प्रभाव

वायरोसिस में कमी    : 37%

उत्पादन में वृधि      :10-12 कोसा/ रो.मु.च.

लागत              : रु 80.00/ 200  रो.मु.च.

लागत तथा लाभ अनुपात:1:6

 

आर्गेनिक सिल्क धागाकरण : एन्थेरिया माडइलिट्टा कूकनेज द्वारा तसर कोसा पाकने की विधि

एन्थेरिया माडइलिट्टा प्यूपा से तितली बनाते समय प्रोटियोलिटिक एन्जाइम कूकनेज का स्त्राव होता है जिससे कोसा का आग्र भाग मुलायम हो जाता है परिणामस्वरूप तितली बाहर आ जाती है | इसे कूकनेज एन्जाइम को इकठा* करने की विधि विकसित की गई है, जिसका कोसा पाकने में उपयोग किया जा रहा है |

परिणाम :

कूकनेज से पकाये कोसों से निकले धागे ऑर्गेनिक होते है जिसमें नैसर्गिक रंग बरकरार रहता है तथा इसका स्पर्श मुलायम रहता है | कूकनेज द्वारा कोसा पाकने की तकनीक विकसित की गई है| इसकी प्रभावी विधि एवं वाणिणज्यिक स्तर पर अच्छे सिल्क रिकवरी प्राप्त करने हेतु आनुसंधन कार्य जारी है |

कोसा पकाने में कूकनेज की महत्ता :

  1. प्राकृतिक रंग
  2. मुलायम धागे
  3. प्राकृतिक मित्र( इको-फ्रेन्डली) रसायन
  4. अच्छी मजबूती
  5. आर्गेनिक सिल्क
  6. कम ईंधन खपत/ खर्च

अध्ययन जारी है:

कूकनेज की तरह एक रसायन सेम (बीन) के फलियों में भी पाया गया है |

सेम के रस के उपयोग से कोसों को पकाने का परीक्षण किया जा रहा है |

सेम के रस तथा कूकनेज के मिश्रण के साथ-साथ तापमान / पी एच घाट-बढ़ाकर कोसों को पकाने तथा धागा परिक्षण जारी है |

केन्द्रीय तसर अनुसंधान  एवं प्रशिक्षण संस्थान, नगड़ी , राँची

तसर रेशम कोसोत्तर प्रोधोगिकी एवं इसके विकास

उदेश्य:

  • तसर रेशम के उत्पाद के गुणवत्ता को सुधारने धागाकरण, कताई, बुनाई, एवं रंगाई मशीनों का उन्नयन (अपग्रेड करना)
  • किसानों को सम्बंधित प्रशिक्षण एवं तकनीकी जानकारी प्रदान करना| के.त.अ व प्र. सं., रांची द्वारा निम्न तकनीकों का विकास किया गया है :
1. वुडेन चरखा
  • यह चरखा पारम्परिक धागाकरण हेतु दो व्यक्तियों द्वारा उपयोग किया जाता है |
  • इस चरखा द्वारा जांघ पर धागाकरण प्रणाली को दूर करने का प्रयास किया गया है |
  • इस चरखा पर ऐंठन रहित धागा प्राप्त होता है जिसे बुनकर बाना में उपयोग करता हैं |
  • इसका उत्पादन 300-400 ग्राम प्रति दिन दो व्यक्तियों के कार्य द्वार होता है |
  • इसका धागा असमान एवं बिखरे हुए रेशम तंतु सहित रहता है |
  • प्रति व्यक्ति आमदनी 90 रू प्रति दिन होती है |
2. धागाकरण सह ऐंठन मशीन
  • इस मशीन में आयताकार बेसिन एवं चार स्पेंडल होते हैं|
  • इस  मशीन में धागाकरण एवं ऐंठन साथ-साथ होती है |
  • इस मशीन का धागा ताना-बाना में उपयोग किया जा सकता है |
  • इसका धागा उत्पादन 100-120 ग्राम प्रति दिन एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है |
  • इस मशीन पर प्रति व्यक्ति आय रू 50/- प्रति दिन होता है |
3. ट्विन चरखा
  • यह चरखा दो चरखा को जोड़कर धागाकरण हेतु उन्नत किया गया है |
  • इस चरखा पर ऐंठन रहित तसर धागा, जिसे केवल कपड़ा बनाने के लिए बाना में उपयोग करते हैं |
  • इस चरखा पर प्रति एक किलोग्राम धागा तीन व्यक्तियों द्वारा प्राप्त किया जाता है |
  • इस पर धागा बनाने में प्रतिदिन 110-140 रू प्रति व्यक्ति प्राप्त होता है |
4. वेट रीलिंग मशीन
  • हस्तचालित वेट रीलिंग मशीन छ: घिरणीयों* द्वारा निर्मित होती है जिसमे दो व्यक्ति कार्य करते हैं |
  • इस मशीन पर प्रतिदिन 600 ग्राम ऐंठन रहित धागा जिसे ताना में सीधे उपयोग किया जा सकता है |
  • इस मशीन के संचालन हेतु  नियमित तापमान की (40-45 डीग्री) की आवश्यकता होने से उत्पादन लागत बढ़ जाती है |
  • इस मशीन पर प्रति व्यक्ति 130-150 प्रति दिन कामा सकते हैं |
5. सोलरचालित कताई मशीन
  • यह मशीन तसर धागा के कताई हेतु उपयोग की जाती है इसमें एक व्यक्ति एक स्पेंडल पर कार्य करता है |
  • इस मशीन पर 200-250 ग्राम धागा काता जाता सकता है एवं 100-300 रू प्रतिदिन आमदनी हो सकती है |
6. इस पर उत्पादित धागे में असमान ऐंठन एवं तंतु उभरे रहने से कपड़े की गुणवत्ता प्रभावित होती है|
7. सोलर वर्टिकल, स्पीनिंग, रीलिंग एवं ट्विस्टिंग मशीन(समृधि)
  • इस मशीन पर दो खड़े स्पेंडल, जिन पर रीलिंग मशीन एवं ऐंठन का कार्य तसर धागा पर किया जाता है |
  • यह नयी मशीन वर्तमान में सभी तसर उधोग की धागा से सम्बंधित समस्याओं को दूर कर सकती है |
  • यह मशीन सुरक्षित एवं सौर उर्जा चालित आसान कार्य हेतु गाँवों के लिए उपयोगी होती |
  • इस मशीन पर प्रतिदिन कताई धागा 200-250 ग्राम एवं 100 ग्राम स्पिंडल रील्ड धागा प्राप्त होता है |
  • इस मशीन का आसानी से परिवहन एवं कम जगह में स्थापित कर संचालित किया जा सकता है |
  • इस मशीन पर धागा निर्माण के अलावा रोशनी, मोबाइल चार्जिंग का संचालन का कार्य भी किया जा सकता है|
  • इस मशीन द्वारा धागा निर्मित कर प्रति व्यक्ति 150-200 रू तक की आमदनी प्रति दिन हो सकती है |

मशरूम उत्पादन

सामान्य रुप से छत्तेदार खाद्य फफूँदी (कवक) को मशरुम या खुँभी कहते हैं।

झारखंड़ में इसे लोग प्रायः खुखड़ी के नाम से जानते हैं। प्रायः मशरुम में ताजे वजन के आधार पर 89-91 % पानी , 0.99-1.26 % राख, 2.78- 3.94% प्रोटीन, 0.25-0.65% वसा,0.07-1.67 % रेशा, 1.30-6.28% कार्बोहाइड्रेट और 24.4-34.4 किलो केलोरी ऊर्जामान होता है। यह विटामिनों जैसे –बी 1, बी 2, सी और डी. एवं खनिज लवणों से भरपूर होता है। यह कई बीमारियों जैसे-बहुमूत्र, खून की कमी, बेरी-बेरी, कैंसर, खाँसी, मिर्गी, दिल की बीमारी, में लाभदायक होता है। इसकी खेती

कृषि, वानिकी एवं पशु व्यवसाय सम्बन्धी अवशेषों पर की जाती है, तथा उत्पादन के पश्चात् बचे अवशेषों को खाद के रुप में उपयोग कर लिया जाता है। उत्पादन हेतु बेकार एवं बंजर भूमि का समुचित उपयोग मशरुम गृहों का निर्माण करके किया जा सकता है। इस प्रकार यह किसानों एवं बेरोजगार नवयुवकों के लिए एक सार्थक आय का माध्यम हो सकता है।

खेती का स्थान

साधारण हवादार कमरा, ग्रीन हाउस, गैरेज, बन्द बरामदा, पालीथिन के घर या छप्परों वाले कच्चे घरों में इसकी खेती की जाती है।
बीज (स्पॉन) अनाज के दानों पर बने उच्चगुणों वाले प्रमाणित बीज (स्पॉन) का ही व्यवहार करें । इसे बिरसा कृषि वि.वि. से प्राप्त कर सकते हैं।

प्रजातियाँ

  1. अगेरिकस या बटन मशरुम – इसे कम्पोस्ट पर 18-250 से. तापक्रम पर जाड़े में उगाया जा सकता है।
  2. वायस्टर या ढिगरी प्लूरोटस मशरुम – इसे 20-280 सें. तापक्रम पर सभीमोसम में उगाया जा सकता है।
  3. वॉलवेरिया या धान के पुआल वाला मशरुम - 30-400 सें. तापक्रम पर गर्मी में उगाया जाता है।

कृत्रिम मशरुम घर में होने पर किसी भी मशरुम की खेती किसी भी समय हो सकती है। झारखण्ड के किसानों या उत्पादकों के लिए सामान्य कमरे के तापक्रम पर ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती वर्ष के अधिकांश (9-10 माह) समय में हो सकती है।

ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती की विधिः

  1. धान या गुंदली के पुआल के कुट्टी (1-1.5’’) या गेहूँ का भूसा 12 घण्टे तक पानी में भिगो लें या ½ घंटे तक उबाल लें। भिंगोने वाले पानी में ½ मिलीलीटर रोगर या नुवान या इंडोसल्फान और 1 ग्राम इंडोफिल या बैविस्टीन 75 मिली ग्राम प्रति लीटर की दर से डालें।
  2. पानी निथार कर कुट्टी/ भूसे को छाये में सूखायें (50-60% नमी रहें)
  3. पालीथिन के थैलियों में (45x60 सेंमी.) 5-6 छिद्र करें । आवश्यक मात्रा का बीज इस कुट्टी में मिला लें या तीन-चार तह लगाकर बिजाई करें । 30-50 ग्राम स्पॉन 1 किलो भीगे पुआल की कुट्टी के लिए पर्याप्त है।
  4. थैलों के खुले मुख को रबर बैण्ड या धागें से बन्द कर लें । 10-15 दिनों के लिए इसे मशरुम उत्पादन घर में रखें।
  5. कुट्टी सफेद हो जाने पर पालीथिन शीट को काटकर हटा लें तथा दिन में  1-2 बार पानी का छिड़काव करें।
  6. 2-3 दिनों में मशरुम के छत्ते निकल पड़ेंगे इसकी तुड़ाई पुआल से सटाकर हल्का सा घुमाव देकर करें। 3-4 फसल ली जा सकती है।

उपजः प्रति किलों ग्राम सूखे पुआल / भूसे से लगभग 0.8-1 किलोग्राम ताजा मशरुम का उत्पादन होगा। बटन मशरुम तथा धान पुआल की खेती की विधि के लिये बिरसा कृषि वि.वि के पौधा रोग विभाग से संपर्क करें।

प्रति किलों ग्राम सूखे पुआल / भूसे से लगभग 0.8-1 किलोग्राम ताजा मशरुम का उत्पादन होगा। बटन मशरुम तथा धान पुआल की खेती की विधि के लिये बिरसा कृषि वि.वि के पौधा रोग विभाग से संपर्क करें।

व्यावसायिक बटन खुम्ब फार्म की संरचना

ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम की खेती

खुम्ब के कीड़ों- मकौड़ों और सूत्रकृमियों का प्रबंधन

ऋतुओं पर आधारित मशरूम की वर्षभर खेती

रिशी (गैनोडर्मा)- गुण व उत्पादन

कम लागत पर खुम्ब उत्पादन

दूधिया मशरूम की खेती

मशरूम में व्यंजन

पुआल मशरूम (वॉल्वेरिएला वॉल्वेसिया) उत्पादन

श्वेत बटन मशरूम (खुम्ब) खेती की प्रारंभिक जानकारी

स्पेंट खुम्ब पोषाधार का प्रबंधन

वेट बबल (गीला बुलबुला माईकोगोन) का प्रबंधन

सब्जी की खेती

साग-सब्जियों का हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है विशेषकर शाकाहारियों के जीवन में। शाक-सब्जी भोजन के ऐसे स्रोत है जो हमारे पोषक मूल्य को ही नहीं बढ़ाते बल्कि उसके स्वाद को भी बढ़ाते हैं। पोषाहार विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित भोजन के लिए एक वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन 85 ग्राम फल और 300 ग्राम साग-सब्जियों की सेवन करनी चाहिए। परन्तु हमारे देश में साग-सब्जियों का वर्त्तमान उत्पादन स्तर प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति की खपत के हिसाब से मात्र 120 ग्राम है।

सब्जी बगीचा

उपरोक्त स्थितियों पर विचार करते हुए उपलब्ध स्वच्छ जल के साथ रसोईघर एवं स्नानघर से निकले पानी का उपयोग कर घर के पिछवाड़े में उपयोगी साग-सब्जी उगाने की योजना बना सकते हैं। इससे एक तो एकत्रित अनुपयोगी जल का निष्पादन हो सकेगा और दूसरे उससे होने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिल जाएगी। साथ ही, सीमित क्षेत्र में साग-सब्जी उगाने से घरेलू आवश्यकता की पूर्ति भी हो सकेगी। सबसे अहम् बात यह कि सब्जी उत्पादन में रासायनिक पदार्थों का उपयोग करने की जरूरत भी नहीं होगी। अतः यह एक सुरक्षित पद्धति है तथा उत्पादित साग-सब्जी कीटनाशक दवाईयों से भी मुक्त होंगे।

सब्जी बगीचा के लिए स्थल चयन

सब्जी बगीचा के लिए स्थल चयन में सीमित विकल्प है। हमेशा अंतिम चयन घर का पिछवाड़ा ही होता है जिसे हम लोग बाड़ी भी कहते हैं। यह सुविधाजनक स्थान होता है क्योंकि परिवार के सदस्य खाली समय में साग-सब्जियों पर ध्यान दे सकते हैं तथा रसोईघर व स्नानघर से निकले पानी आसानी से सब्जी की क्यारी की ओर घुमाया जा सकता है। सब्जी बगीचा का आकार भूमि की उपलब्धता और व्यक्तियों की संख्या पर निर्भर करता है। सब्जी बगीचा के आकार की कोई सीमा नहीं है परन्तु सामान्य रूप से वर्ग की अपेक्षा समकोण बगीचा को पसंद किया जाता है। चार या पाँच व्यक्ति वाले औसत परिवार के लिए 1/20 एकड़ जमीन पर की गई सब्जी की खेती पर्याप्त हो सकती है।

सब्जी का पौधा लगाने के लिए खेत तैयार करना

सर्वप्रथम 30-40 सेंमी की गहराई तक कुदाली या हल की सहायता से जुताई करें। खेत से पत्थर, झाड़ियों एवं बेकार के खर-पतवार को हटा दें। खेत में अच्छे ढंग से निर्मित 100 कि.ग्राम कृमि खाद चारों ओर फैला दें। आवश्यकता के अनुसार 45 सेंमी या 60 सेंमी की दूरी पर मेड़ या क्यारी बनाएँ।

सब्जी बीज की बुआई और पौध रोपण

  • सीधे बुआई की जाने वाली सब्जी जैसे - भिंडी, बीन एवं लोबिया आदि की बुआई मेड़ या क्यारी बनाकर की जा सकती है। दो पौधे 30 सेंमी की दूरी पर लगाई जानी चाहिए। प्याज, पुदीना एवं धनिया को खेत के मेड़ पर उगाया जा सकता है।
  • प्रतिरोपित फसल, जैसे - टमाटर, बैगन और मिर्ची आदि को एक महीना पूर्व में नर्सरी बेड या मटके में उगाया जा सकता है। बुआई के बाद मिट्टी से ढ़ककर उसके ऊपर 250 ग्राम नीम के फली का पाउडर बनाकर छिड़काव किया जाता है ताकि इसे चीटियों से बचाया जा सके। टमाटर के लिए 30 दिनों की बुआई के बाद तथा बैगन, मिर्ची तथा बड़ी प्याज के लिए 40-45 दिनों के बाद पौधे को नर्सरी से निकाल दिया जाता है। टमाटर, बैगन और मिर्ची को 30-45 सेंमी की दूरी पर मेड़ या उससे सटाकर रोपाई की जाती है। बड़ी प्याज के लिए मेड़ के दोनों ओर 10 सेंमी की जगह छोड़ी जाती है। रोपण के तीसरे दिन पौधों की सिंचाई की जाती है। प्रारंभिक अवस्था में इस प्रतिरोपण को दो दिनों में एक दिन बाद पानी दिया जाए तथा बाद में 4 दिनों के बाद पानी दिया जाए।
  • सब्जी बगीचा का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है तथा वर्षभर घरेलू साग-सब्जी की आवश्यकता की पूर्ति करना है। कुछ पद्धतियों को अपनाते हुए इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
  • बगीचा के एक छोड़ पर बारहमासी पौधों को उगाया जाना चाहिए जिससे इनकी छाया अन्य फसलों पर न पड़े तथा अन्य साग-सब्जी फसलों को पोषण दे सकें।
  • बगीचा के चारों ओर तथा आने-जाने के रास्ते का उपयोग विभिन्न अल्पावधि हरी साग-सब्जी जैसे - धनिया, पालक, मेथी, पुदीना आदि उगाने के लिए किया जा सकता है।

फसल पद्धति

भारतीय स्थितियों के अनुसार सब्जी बगीचा हेतु सहायक फसल पद्धति को निम्न रूप में दर्शाया गया है (पहाड़ी स्थानों को छोड़कर) –

प्लॉट संख्या

सब्जी का नाम

बुआई/रोपे जाने का महीना

1

टमाटर एवं प्याज

जून-सितम्बर

 

मूली

अक्तूबर-नवम्बर

 

बीन

दिसम्बर-फरवरी

 

भिंडी (ओकरा)

मार्च-मई

2

बैगन

जून-सितम्बर

 

बीन

अक्तूबर-नवम्बर

 

टमाटर

जून-सितम्बर

 

अमरान्तस

मई

3

मिर्ची और मूली

जून-सितम्बर

 

लोबिया

दिसम्बर-फरवरी

 

प्याज (बेल्लारी)

मार्च-मई

4

भिंडी और मूली

जून-अगस्त

 

पत्तागोभी

सितम्बर-दिसम्बर

 

बीन

जनवरी-मार्च

5

बेल्लारी प्याज

जून-अगस्त

 

शक्कर कंद

सितम्बर-नवम्बर

 

टमाटर

दिसम्बर-मार्च

 

प्याज

अप्रैल-मई

6

बीन

जून-सितम्बर

 

बैगन और शक्करकंद

अक्तूबर-जनवरी

7

बेल्लारी प्याज

जुलाई-अगस्त

 

गाजर

सितम्बर-दिसम्बर

 

कद्दू (छोटा)

जनवरी-मई

8

लब-लब (झाड़ी की तरह)

जनवरी-अगस्त

 

प्याज

सितम्बर-दिसम्बर

 

भिंडी

जनवरी-मार्च

 

धनिया

अप्रैल-मई

बारहमासी खेत

  • सहजन की पल्ली, केला, पपीता, कढ़ी पता
  • उपरोक्त फसल व्यवस्था से यह पता चलता है कि वर्षभर बिना अंतराल के प्रत्येक खेत में कोई न कोई फसल अवश्य उगाई जा सकती है। साथ ही, कुछ खेत में एक साथ दो फसलें (एक लम्बी अवधि वाली और दूसरी कम अवधि वाली) भी उगाई जा सकती है।

सब्जी बगीचा निर्माण के आर्थिक लाभ

व्यक्ति पहले अपने परिवार का पोषण करता उसके बाद बेचता है। आवश्यकता से अधिक होने पर उत्पाद को बाजार में बेच देता है या उसके बदले दूसरी सामग्री प्राप्त कर लेता है। कुछ मामले में घरेलू बगीचा आय सृजन का प्राथमिक उद्देश्य बन सकता है। अन्य मामले में, यह आय सृजन उद्देश्य के बजाय पारिवारिक सदस्यों के पोषण लक्ष्य को पूरी करने में मदद करता है।   इस तरह, यह आय सृजन और पोषाहार का दोहरा लाभ प्रदान करता है।

कृमि खाद उत्पादन

अपशिष्ट या कूड़ा-करकट का मतलब है इधर-उधर बिखरे हुए संसाधन। बड़ी संख्या में कार्बनिक पदार्थ कृषि गतिविधियों, डेयरी फार्म और पशुओं से प्राप्त होते हैं जिसे घर के बाहर एक कोने में जमा किया जाता है। जहाँ वह सड़-गल कर दुर्गंध फैलाता है। इस महत्वपूर्ण संसाधन को मूल्य आधारित तैयार माल के रूप में अर्थात् खाद के रूप में परिवर्तित कर उपयोग में लाया जा सकता है। कार्बनिक अपशिष्ट का खाद के रूप में परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य केवल ठोस अपशिष्ट का निपटान करना ही नहीं अपितु एक उत्तम कोटि का खाद भी तैयार करना है जो   हमारे खेत को उचित पोषक तत्व प्रदान करें।

कृमि खाद में स्थानीय प्रकार के केंचुओं का प्रयोग किया जाता है

दुनियाभर में केंचुओं की लगभग 2500 प्रजातियों की पहचान की गई है जिसमें से केंचुओं की पाँच सौ से अधिक प्रजाति भारत में पाई जाती है। विभिन्न प्रकार की मिट्टी में भिन्न-भिन्न प्रकार के केंचुए पाए जाते हैं। इसलिए स्थानीय मिट्टी में केंचुओं की स्थानीय प्रजाति का चयन कृमि खाद के लिए अत्यंत उपयोगी कदम है। किसी अन्य स्थानों से केंचुआ लाये जाने की जरूरत नहीं है। भारत में सामान्यतौर पर जिन स्थानीय प्रजाति के केंचुओं का उपयोग किया जाता है उनके नाम पेरियोनिक्स एक्सकैवेटस एवं लैम्पिटो मौरिटी है। इन केंचुओं को पाला जा सकता है या फिर इसे गड्ढों, टोकरी, तालाबों, कंक्रीट के बने नाद घर या किसी कंटेनर में सामान्य पद्धति से कृमि खाद बनाने में उपयोग में लाया जा सकता है।

स्थानीय केंचुओं को संग्रहित करने की विधि -

  1. मिट्टी की सतह पर दिखाई पड़ने वाले कृमि के आधार पर केंचुआ युक्त मिट्टी की पहचान करना
  2. 500 ग्राम गुड़ एवं 500 ग्राम ताजे पशु गोबर को दो लीटर पानी में घोलें तथा 1 मीटर X 1 मीटर के क्षेत्र पर उसका छिड़काव करें
  3. भूसे या धान की पुआल या पुराने थैले से उसे ढ़क दें
  4. 20 से 30 दिनों तक उसपर पानी का छिड़काव करें
  5. पश्च प्रजनन और प्राचीन स्थानीय कृमियों का समूह उस स्थान पर एकत्रित हो जाता है जिसे जमा कर उपयोग में लाया जा सकता है

कृमि खाद गड्ढे का निर्माण

कृमि खाद गड्ढे को किसी भी सुविधाजनक स्थान या घर के पिछवाड़े या खेत में निर्मित किया जा सकता है। यह किसी भी आकार का ईंट से निर्मित और उचित जल निकासी युक्त, एक गड्ढे वाला या दो गड्ढे वाला या टैंक हो सकता है। 2 मीटर X 1 मीटर X 0.75 मीटर के आकार वाले कक्ष या गड्ढे की आसानी से देखभाल की जा सकती है। जैव पदार्थ और कृषि अपशिष्ट की मात्रा के आधार पर गड्ढों और चैम्बर्स के आकार को निर्धारित किया जा सकता है। कृमि को चीटियों के हमले से बचाने के लिए कृमि गड्ढे की पैरापेट दीवार के केन्द्र में जल-खाना का होना जरूरी है।

चार कक्ष वाला टैंक/गड्ढा पद्धति

कृमि खाद गड्ढे निर्माण की चार कक्ष वाली पद्धति, केंचुओं को पूर्ण गोबर युक्त पदार्थ वाले एक कक्ष से पूर्व प्रसंस्कृत अपशिष्ट वाले दूसरे चैम्बर में आसानी से आवाजाही की सुविधा प्रदान करता है।

कृमि सतह का निर्माण

  • लगभग 15 से 20 सेंमी मोटी कृमि सतह बेहतर, आर्द्र व नरम मिट्टी युक्त वास्तविक सतह होता है जो निचले स्तर पर स्थित होता है। यह ईंट के चूर्ण और बालू के 5 सेंमी वाले पतले सतह के ऊपर स्थित होता है।
  • केंचुआ को गीली मिट्टी में रखा जाता जहाँ वह अपने आवास के रूप में रहता है। 15 से 20 सेंमी वाले मोटे कृमि बेड के साथ 2 सेंमी X 1 सेंमी X 0.75 सेंमी आकार के खाद गड्ढे में 150 केंचुओं को रखा जाता है।
  • कृमि बेड के ऊपर यादृच्छिक रूप में ताजे गोबर का लेप लगाया जाता है। खाद के गड्ढे को सूखी हुई पत्तियों विशेषकर बड़े पत्ते, पुआल या कृषि जैव/अपशिष्ट पदार्थों से 5 सेंमी की ऊँचाई तक ढक दिया जाता है। अगले तीस दिनों तक गड्ढे को नम रखने के लिए उसपर नियमित रूप से पानी का छिड़काव किया जाता है।
  • बेड न तो सूखी होनी चाहिए न ही नम। गड्ढे को नारियल या खजूर के पत्तों या पुराने जूट की बोड़ी से ढका जाना चाहिए ताकि पक्षियों से उनकी रक्षा की जा सके।
  • प्लास्टिक शीट को बेड पर न बिछाया जाए क्योंकि वे गर्मी ग्रहण करते हैं। पहले 30 दिनों के बाद पशुओं का गीला गोबर या रसोई, होटेल या होस्टल से निकला कचरा, राख या या कृषि अपशिष्ट को लगभग 5 सेंमी की मोटाई तक छीटें। इसे हफ्ते में दो बार दोहराया जाए।
  • सभी कार्बनिक अपशिष्ट को कुदाली की सहायता से समय-समय पर ऊपर-नीचे किया जाए या मिलाया जाए।
  • गड्ढे में उचित मात्रा में आर्द्रता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से जल का छिड़काव किया जाए। यदि मौसम बहुत अधिक शुष्क हो तो बार-बार पानी देकर गीला बनाए रखना चाहिए।

खाद के तैयार होने का समय

  1. जब सामग्री पूरी तरह से मुलायम या चूर्ण बन जाती है और खाद का रंग भूरा हो जाता है तब खाद बनकर तैयार हो जाता है। यह काले रंग का दानेदार, हल्का वज़नी और उर्वरा शक्ति से युक्त होता है।
  2. गड्ढे के आकार के आधार पर बेड के ऊपरी सिरे पर निर्धारित मात्रा में कृमि की उपस्थिति में 60 से 90 दिनों के भीतर कृमि खाद तैयार हो जाना चाहिए। इसके बाद कृमि खाद को गड्ढे से निकालकर उपयोग में लाया जा सकता है।
  3. खाद से कृमियों को अलग करने के लिए नियत समय से दो या तीन दिन पहले पानी का छिड़काव बंद कर दें, उसके बाद बेड को खाली करें। ऐसा करने से 80 प्रतिशत तक कृमि बेड के निचली सतह पर जा बैठेते हैं।
  4. कृमियों को चलनी का उपयोग कर अलग किया जा सकता है। केंचुए और गाढ़े पदार्थ जो चलनी के ऊपरी भाग में बने रहते हैं वे फिर बिन में वापस जाते और प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है। खाद की गंध सोंधी होगी। यदि खाद से गंदी बदबू आ रही हो तो इसका मतलब है कि खमीर की प्रक्रिया उसके अंतिम चरण तक नहीं पहुँची है और जीवाणु संबंधित प्रक्रिया अभी भी जारी है। मटमैली बदबू आने का मतलब है कि खमीर की उपस्थिति या अत्यधिक गर्मी के कारण नाईट्रोजन की कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में खाद के ढेर को हवादार बनाए रखने या उसमें फिर से सूखी या कड़ी/ रेशेदार सामग्री मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ करें और ढेर को सूखा बनाए रखें। बोरी में बंद करने से पहले खाद के ढेले को फोड़कर छोटा-छोटा बना लें।
  5. संचित सामग्री को धूप में ढ़ेर के रूप में रखें ताकि अधिकाँश कृमि ढ़ेर के निचले ठंडे आधार पर चले जाएँ।
  6. दो या चार गड्ढे वाले पद्धति में, प्रथम चैम्बर में पानी डालना बंद कर दें ताकि कृमि स्वयं दूसरे चैम्बर में चले जाएँ। जहाँ कृमि के लिए अनुकूल वातावरण चक्रीय तरीके से बनाई रखी जाती है और चक्रीय आधार पर लगातार केचुएँ भी प्राप्त की जा सकेगी।

कृमि खाद के लाभ

  • केंचुओं द्वारा कार्बनिक अपशिष्ट को शीघ्रता से तोड़कर टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है जो एक बेहतर संरचना में गैर विषैली पदार्थ के रूप में बदल जाता है। उसका उच्च आर्थिक मूल्य होता है, साथ ही, वह पौधों की वृद्धि में मृदा शीतक (स्वायल कंडिशनर) का कार्य भी करता है।
  • कृमि खाद भूमि को उपयुक्त खनिज संतुलन प्रदान करता है तथा उसकी ऊर्वरा शक्ति में सुधार करता।
  • कृमि खाद बड़े पैमाने पर रोगमूलक सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या को कम करता है और इस नजरिए से यह कूड़ा-करकट से अलग नहीं है।
  • कृमि खाद अपने निष्पादन के दौरान पर्यावरणात्मक समस्याओं को भी कम करता है।
  • ऐसा माना जाता है कि कृमि खाद समाज के गरीब और पिछड़े समुदाय के लिए कुटीर उद्योग का कार्य कर सकता है जो उन्हें दोहरा लाभ दिला सकता।
  • यदि प्रत्येक गाँव के बेरोजगार युवक/महिला समूहों की सहकारी समिति बनाकर कृमि खाद का उत्पादन कर प्रस्तावित दर पर ग्रामीणों के बीच बिक्री की जाए तो यह एक समझदारीभरा संयुक्त उद्यम का रूप ले सकता है। इससे युवा वर्ग न केवल धन अर्जित कर सकेंगे अपितु सुस्थिर कृषि पद्धतियों के लिए उत्कृष्ट गुणपरक कार्बनिक खाद प्रदान कर समाज की मदद भी कर सकेंगे।

कृषि व्यवसाय

शुष्क पुष्प क्यों

  • भारतीय और विदेशी बाजारों में शुष्क पुष्प की अच्छी माँग है। भारत से इसका निर्यात अमेरिका, जापान और यूरोप तक होता है।
  • शुष्क पुष्प निर्यात में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, क्योंकि यहाँ कई प्रकार के पौधे पाये जाते हैं।
  • शुष्क पुष्प से तात्पर्य केवल फूल से ही नहीं है, बल्कि इसके तहत शुष्क तना, बीज, कलियां आदि भी है।
  • भारत से हर साल करीब एक सौ करोड़ रुपये मूल्य का शुष्क पुष्प का निर्यात किया जाता है। यह उद्योग 20 देशों को पांच सौ से अधिक किस्म के शुष्क पुष्प का निर्यात करता है।
  • इनका इस्तेमाल हस्तनिर्मित कागज, लैंप शेड, मोमबत्ती स्टैंड, जूट के थैले, फोटो फ्रेम, बक्से, किताबें, दीवारों की सजावट, कार्ड और अन्य उपहार सामग्री के निर्माण में होता है। इन सामग्रियों के निर्माण में शुष्क पुष्प के इस्तेमाल से उनकी खूबसूरती बढ़ जाती है।

शुष्क पुष्प निर्माण की तकनीक

शुष्क पुष्क उत्पादन के दो महत्वपूर्ण चरण है-

(क) सुखाना
(ख) रंगाई

फूलों के काटने व सुखाने का उचित समय

फूलों की सुबह के समय पौधों पर से ओस की बूंदें सूखने के बाद करनी चाहिए। काटने के बाद उसे रबड़ बैंड की मदद से गुच्छे में रख दिया जाना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके, धूप से हटा देनी चाहिए।

सूर्य की रोशनी में सुखाना

  • सूर्य की रोशनी में सुखाने की तकनीक सबसे आसान और सस्ती है। लेकिन बारिश के मौसम में  इस तकनीक से फूलों को नहीं सुखा सकते।
  • फूलों के गुच्छों को रस्सियों या बाँस में उलटा लटका कर सुखाया जाता है।
  • इसमें किसी रसायन का इस्तेमाल नहीं होता। केवल अच्छी हवा की जरूरत पड़ती है।
  • इस तरीके में फफूंद के हमले का खतरा सर्वाधिक होता है।

जमा कर सुखाना

  • यह सूर्य की रोशनी में सुखाने की तकनीक से उन्नत तकनीक है।
  • जमा कर सुखाने के लिए आवश्यक यंत्र महंगे होते हैं। लेकिन इस तकनीक से सुखाये गये फूलों की गुणवत्ता अच्छी होती है और उनकी कीमत भी अधिक मिलती है।

दबाना

  • इसमें सोख्ता कागज या साधारण कागज का इस्तेमाल किया जाता है।
  • फूल सपाट हो जाते हैं और इस तकनीक से फूलों के क्षतिग्रस्त होने का खतरा अधिक होता है।

ग्लिसरीन तकनीक

  • फूलों से नमी हटाने के बाद ग्लिसरीन भर दिया जाता है।
  • इस तकनीक से उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पाद हासिल होते हैं।

पॉलिसेट पॉलिमर

  • पॉलिसेट पॉलिमर के छिड़काव से फूल सूख जाते हैं।
  • इस तकनीक में सूखने का समय बहुत कम होता है।
  • इससे अंतिम उत्पाद का रंग उन्नत होता है।

सिलिका सोख्ता

  • सिलिका या सिलिका जेल का इस्तेमाल कर फूलों की गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं और इससे फूल साबुत रहते हैं।
  • इस तकनीक से बहुत जटिल फूल और पौधे सुखाये जाते हैं।

रंगाई

  • शुष्क फूलों के लिए प्रोसियन रंग सर्वोत्तम होते हैं।
  • चार किलोग्राम रंग का पाउडर लेकर उसे 20 लीटर पानी में मिलायें।
  • इस घोल को आठ सौ लीटर गर्म पानी में मिला दें।
  • इसमें दो लीटर एसीटिक एसिड मिला दें।
  • बहुत नर्म फूलों का रंग सुधारने के लिए मैग्नेशियम क्लोराइड मिलायें।
  • शुष्क फूलों को तब तक भिगोयें, जब तक उन पर रंग न चढ़ जाये।

फूल और पौधों के भाग

  • इस वर्ग में बेला, चमेली, अमलताश, अड़हुल और नारियल के पत्ते आते हैं। इसमें सूखे पत्ते और तने भी शामिल हैं, जो भरने के काम आते हैं।
  • भारत पिछले 20 साल से इनका निर्यात कर रहा है।

गुलदस्ता

  • यह सुगंधित फूलों का मिश्रण है, जिसे पॉलिथिन बैग में रखा जाता है।
  • इसे सामान्यतौर पर आलमीरा, दराज और बाथरू म में रखा जाता है।
  • इस तकनीक में तीन सौ से अधिक किस्म के पौधों का इस्तेमाल होता है।
  • सुगंधा, बेला, चमेली, गुलाब की पंखुड़ियां, बोगनवेलिया, नीम के पत्ते और कड़े फल भारत में आम तौर पर इस्तेमाल होते हैं।
  • हमारा मुख्य ग्राहक ब्रिटेन है।

शुष्क पुष्प गमले

  • इसमें सूखे हुए तने और डालियों का इस्तेमाल होता है।
  • हालांकि बाजार में इसकी माँग काफी कम है, इसकी कीमत अधिक मिलती है और उच्च आय वर्ग के लोग इसे काफी पसंद करते हैं।
  • इसमें सामान्यतौर पर इस्तेमाल होनेवाली सामग्री में सूखे सूती कपड़े, सूखी मिरची, सूखे टिंडे, घास, चमेली, फर्न के पत्ते तथा अन्य शामिल हैं।

शुष्क पुष्प हस्तकला

  • शुष्क पुष्प बाजार में यह नवीनतम विकास है।
  • विभिन्न रंगों के शुष्क पुष्प से शुष्क पुष्प की फ्रेम जड़ित तसवीरें, बधाई कार्ड, कवर, पुष्पगुच्छ, मोमबत्ती स्टैंड, शीशे की कटोरी बनती है।

गेंदा की खेती

गेंदा की खेतीगेंदा बहुत ही उपयोगी एवं आसानी से उगाया जाने वाला फूलों का पौधा है। यह मुख्य रूप से सजावटी फसल है। यह खुले फूल, माला एवं भू-दृश्य के लिए उगाया जाता है। मुर्गियों के दाने में भी यह पीले वर्णक का अच्छा स्त्रोत है। इसके फूल बाजार में खुले एवं मालाएं बनाकर बेचे जाते है। गेंदे की विभिन्न ऊॅंचाई एवं विभिन्न रंगों की छाया के कारण भू-दृश्य की सुन्दरता बढ़ाने में इसका बड़ा महत्व है। साथ ही यह शादी-विवाह में मण्डप सजाने में भी अहम् भूमिका निभाता है। यह क्यारियों एवं हरबेसियस बॉर्डर के लिए अति उपयुक्त पौधा है। इस पौधे का अलंकृत मूल्य अवि उच्च है क्योंकि इसकी खेती वर्ष भर की जा सकती है। तथा इसके फूलों का धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में बड़ा महत्व है। हमारे देश में मुख्य रूप से अफ्रीकन गेंदा और फ्रेंच गेंदा की खेती की जाती है।

गेंदा पीले रंग का फूल है। वास्तव में गेंदा एक फूल न होकर फूलों का गुच्छा होता है, लगभग उसकी हर पत्ती एक फूल है। गेंदा का वैज्ञानिक नाम टैजेटस स्पीसीज है। भारत के विभिन्न भागों में, विशेषकर मैदानों में व्यापक स्तर पर उगाया जा रहा है। मैक्सिको तथा दक्षिण अमेरिका मूल का पुष्प है। हमारे देश में गेंदे के लोकप्रिया होने का कारण है इसका विभिन्न भौगोलिक जलवायु में सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है। मैदानी क्षेत्रों में गेंदे की तीन फ़सलें उगायी जाती है, जिससे लगभग पूरे वर्ष उसके फूल उपलब्ध रहते हैं। उत्तर भारत के राज्य हिमाचल प्रदेश में छोटे किसान भी गेदें की फ़सलों को सजावट तथा मालाओं के लिए करते हैं उगाते हैं।

इतिहास

16वीं शताब्दी की शुरुआत में ही गेंदा, मैक्सिको से विश्व के अन्य भागों में प्रसारित हुआ। गेंदे के पुष्प का वैज्ञानिक नाम टैजेटस एक गंधर्व टैजस के नाम पर पड़ा है जो अपने सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध था। अफ्रीकन गेंदे का स्पेन में सर्वप्रथम प्रवेश सोलहवीं शताब्दी में हुआ और यह रोज आफ दी इंडीज नाम से समस्त दक्षिणी यूरोप में प्रसिद्ध हुआ। फ्रेंच गेंदे का भी विश्व में प्रसार अफ्रीकन गेंदे की भांति ही हुआ।

गेंदे का विवरण

गेंदे को विभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है। इसकी खेती मुख्य रूप से बडे़ शहरो के पास जैसेः मुम्बई, पुणे, बैंगलोर, मैसूर, चेन्नई, कलकत्ता और दिल्ली में होती है।

उचित वानस्पतिक बढ़वार और फूलों के समुचित विकास के लिए धूप वाला वातावरण सर्वोत्तम माना गया है। उचित जल निकास वाली बलूवार दोमट भूमि इसकी खेती के लिए उचित मानी गई है। भारत में 1,10,000 हैक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी खेती की जाती है। इसकी खेती करने वाले मुख्य राज्य कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र है। पारम्परिक फूल जिनके गेंदा का लालबाग़ तीन चौथाई भाग है। जिस भूमि का पी.एच.मान 7 से 7.5 के बीच हो, वह भूमि गेंदें की खेती के लिए अच्छी रहती है। क्षारीय व अम्लीय मृदाए इसकी खेती के लिए बाधक पायी गई है|

बीज

संकर किस्मों में 700-800 ग्राम बीज प्रति हेक्टर तथा अन्य किस्मों में लगभग 1.25 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है। उत्तर प्रदेश में बीज मार्च से जून, अगस्त-सितंबर में बुवाई की जाती है |

सुगंध

गेंदे की सुगंध बहुत मंद गंध, कस्तूरी गंध, लकड़ी जैसी होती है।

मृदा (मिट्टी)

गेंदे की खेती विभिन्न प्रकार की मृदा में की जा सकती है। वैसे गहरी मृदा उर्वरायुक्त मुलायम जिसकी नमी ग्रहण क्षमता उच्च हो तथा जिसका जल निकास अच्छा हो उपयुक्त रहती है। विशेष रूप से बलुई-दोमट मृदा जिसका पी.एच. 7.0-7.5 सर्वोतम रहती है।

जलवायु

गेंदे की खेती संपूर्ण भारतवर्ष में सभी प्रकार की जलवायु में की जाती है। विशेषतौर से शीतोषण और सम-शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। नमीयुक्त खुले आसमान वाली जलवायु इसकी वृध्दि एवं पुष्पन के लिए बहुत उपयोगी है लेकिन पाला इसके लिए नुकसानदायक होता है। इसकी खेती सर्दी, गर्मी एवं वर्षा तीनों मौसमों में की जाती है। इसकी खेती के लिए 14.5-28.6 डिग्री सैं. तापमान फूलों की संख्या एवं गुणवत्ता के लिए उपयुक्त है जबकि उच्च तापमान 26.2 डिग्री सैं. से 36.4 डिग्री सैं. पुष्पोत्पादन पर विपरीत प्रभाव डालता है।

किस्मों का चुनाव

1. अफ्रीकन गेंदा

पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, अलास्का, एप्रिकॉट, बरपीस मिराक्ल, बरपीस ह्नाईट, क्रेकर जैक, क्राऊन ऑफ गोल्ड, कूपिड़, डबलून, फ्लूसी रफल्स, फायर ग्लो, जियाण्ट सनसेट, गोल्डन एज, गोल्डन क्लाइमेक्स जियान्ट, गोल्डन जुबली, गोल्डन मेमोयमम, गोल्डन येलो, गोल्डस्मिथ, हैपिनेस, हवाई, हनी कॉम्ब, मि.मूनलाइट, ओरेन्ज जूबली, प्रिमरोज, सोबेरेन, रिवरसाइड, सन जियान्ट्स, सुपर चीफ, डबल, टेक्सास, येलो क्लाइमेक्स, येलो फ्लफी, येलोस्टोन, जियान्ट डबल अफ्रीकन ओरेन्ज, जियान्ट डबल अफ्रीकन येलो इत्यादि।

हाइब्रिड्स : अपोलो, क्लाइमेक्स, फर्स्ट लेडी, गोल्ड लेडी, ग्रे लेडी, मून सोट, ओरेन्ज लेडी, शोबोट, टोरियडोर, इन्का येलो, इन्का गोल्ड, इन्का ओरेज्न इत्यादि।

2. फ्रेन्च गेंदा

(अ)   सिंगल : डायण्टी मेरियटा, नॉटी मेरियटा, सन्नी, टेट्रा रफल्ड रेड इत्यादि।

(ब)   डबल : बोलेरो, बोनिटा, बा्रउनी स्कॉट, बरसीप गोल्ड नगेट, बरसीप रेड एण्ड गोल्ड, बटर स्कॉच, कारमेन, कूपिड़ येलो, एल्डोराडो, फोस्टा, गोल्डी, जिप्सी डवार्फ डबल्, हारमनी, लेमन ड्राप, मेलोडी, मिडगेट हारमनी, ओरेन्ज फ्लेम, पेटाइट गोल्ड, पेटाइट हारमनी, प्रिमरोज क्लाइमेक्स, रेड ब्रोकेड, रस्टी रेड, स्पेनिश ब्रोकेड, स्पनगोल्ड, स्प्री, टेन्जेरीन, येलो पिग्मी इत्यादि|

खाद्य एवं उर्वरक

सड़ी हुई गोबर की खाद           : 15-20 टन प्रति हैक्टेयर

यूरिया                         : 600 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

सिंगल सुपर फास्फेट             : 1000 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

म्यूरेट ऑफ पोटाश               : 200 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

सारी सड़ी हुई गोबर की खाद, फास्फोरस, पोटाश व एक तिहाई भाग यूरिया को मृदा तैयार करते समय अच्छी तरह मिला लें तथा यूरिया की बची हुई मात्रा का एक हिस्सा पौधे खेत में लगाने के 30 दिन बाद व शेष मात्रा उसके 15 दिन बाद छिड़काव करके प्रयोग करें।

बीज शैया तैयार करना:

गेंदे की पौध तैयार करने के लिए बीज शैया तैयार करें, जो कि भूमि की सतह से 15 सैं.मी. ऊॅंची होनी चाहिए ताकि जल का निकास ठीक ढंग से हो सके। बीज शैया की चौड़ाई 1 मीटर तथा लंबाई आवश्यकतानुसार रखें। बीज बुवाई से पूर्व बीज शैया का 0.2 प्रतिशत बाविस्टीन या कैप्टान से उपचारित करें ताकि पौधे में बीमारी न लग सके और पौध स्वस्थ रहे।

बीजों की बुवाई : अच्छी किस्मों का चयन कर बीज शइया पर सावधानीपूर्वक बुवाई करें। ऊपर उर्वर मृदा की हल्की परत चढ़ाकर, फव्वारे से धीरे-धीरे पानी का छिड़काव कर दें।

बीज दर : 800 ग्राम से 1 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर बीजों का अंकुरण 18 से 30 डिग्री सैं. तापमान पर बुवाई के 5-10 दिन में हो जाता है।

बुवाई का समय

पुष्पन ऋतु

बीज बुवाई का समय

पौध रोपण का समय

वर्षा

मध्य - जून

मध्य - जुलाई

सर्दी

मध्य - सितम्बर

मध्य – अक्तूबर

गर्मी

जनवरी - फरवरी

फरवरी - मार्च

 

पौध रोपण :

अच्छी तरह तैयार क्यारियों में गेंदे के स्वस्थ पौधों को जिनकी 3-4 पत्तियां हों पौध रोपण हेतु प्रयोग करें। जहां तक संभव हो पौध रोपाई शाम के समय ही करेुं तथा रोपाई के पश्चात् चारों तरफ मिट्टी को दबा दें ताकि जड़ों में हवा न रहं एवं हल्की सिंचाई करें।

पौधे से पौधे की दूरी

  1. अफ्रीकन गेंदा : 45 गुणा 45 सैं.मी. या 45 गुणा 30 सैं.मी.
  2. फ्रेन्च गेंदा : 20 गुणा 20 सैं.मी. या 20 गुणा 10 सैं.मी.

सिंचाई

गेंदा एक शाकीय पौधा है। अत: इसकी वानस्पतिक वृध्दि बहुत तेज होती है। सामान्य तौर पर यह 55-60 दिन में अपनी वानस्पतिक वृध्दि पूरी कर लेता है तथा प्रजनन अवस्था में प्रवेश कर लेता है। सर्दियों में सिंचाई 10-15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मियों में 5-7 दिन के अंतराल पर करें।

वृध्दि नियामकों का प्रयोग

पौधों की रोपाई के चार सप्ताह बाद एस ए डी एच का 250-2000 पी.पी.एम. पर्णीय छिड़काव करने से पौधों में समान वृध्दि पौधे में शाखाओं के बढ़ने के साथ ही फूलों की उपज व गुणवत्ता भी बढ़ती है।

पिंचिंग (शीर्ष कर्तन)

पौधे के शीर्ष प्रभाव को खत्म करने के लिए पौध रोपाई के 35-40 दिन बाद पौधों को ऊपर से चुटक देना चाहिए जिससे पौधों की बढ़वार रूक जाती है। तने से अधिक से अधिक संख्या में शाखाएं प्राप्त होती है तथा प्रति इर्का क्षेत्र में अधिक से अधिक मात्रा में फूल प्राप्त होते हैं।

खरपतावार नियंत्रण

खरपतवार पौधों की उपज व गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। क्योंकि खरपतवार मृदा से नमी व पोषण दोनों चुराते हैं तथा कीड़ो एवं बीमारियों को भी शरण देते हैं। अत: 3-4 बार हाथ द्वारा मजदूरों से खरपतवार निकलवा दें तथा अच्छी गुढ़ाई कराएं।

खरपतवारों का रासायनिक नियंत्रण भी किया जा सकता है। इसके लिए एनिबेन 10 पौण्ड, प्रोपेक्लोर और डिफेंनमिड़ 10 पौंड प्रति हैक्टेयर सुरक्षित एवं संतोषजनक है।

फूलों की तुड़ाई : पूरी तरह खिले फूलों को दिन के ठण्डे मौसम में यानि कि सुबह जल्दी या शाम के समय सिंचाई के बाद तोड़े ताकि फूल चुस्त एवं दूरुस्त रहें।

पैकिंग : ताजा तोड़े हुए फूलों को पॉलीथीन के लिफाफों, बांस की टोकरियों या थैलों में अच्छी तरह से पैक करके तुरंत मण्डी भेजें।

उपज : अफ्रीकन गेंदें से 20 - 22 टन ताजा फूल तथा फेंच गेंदे से 10 - 12 टन ताजा फल प्रति हैक्टेयर औसत उपज प्राप्त होती है।

कीट एवं व्याधियां

  1. रेड स्पाइडर माइट : यह बहुत ही व्यापक कीड़ा है। यह गेंदे की पत्तियों एवंत ने के कोमल भाग से रस चूसता है। इसके नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत मैलाथियान या 0.2 प्रतिशत मेटासिस्टॉक्स का छिड़काव करें।
  2. चेपा : ये कीड़े हरे रंग के, जूं की तरह होते हैं और पत्तओं  की निचली सतह से रस चूसकर काफी हानि पहँचाते हैं। चेपा विषाणु रोग भी फैलाता है। इसकी रोकथाम के लिए 300 मि.ली. डाईमैथोएट (रोगोर) 30 ई.सी. या मैटासिस्टॉक्स 25 ई.सी. को 200-300 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। यदि आवश्यकता हो तो अगला छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करें।

व्याधियां व रोकथाम

  1. आर्द्र गलन : यह बीमारी नर्सरी में पौध तैयार करते समय आती है। इसमें पौधे का तना गलने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत कैप्टान या बाविस्टिन के घोल की डे्रचिंग करें।
  2. पत्तों  का धब्बा व झुलसा रोग : इस रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तिायों के निचले भाग भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं जिसकी वजह से पौधों की बढ़ावर प्रभावित होती है। इसकी रोकथाम के लिए डायथेन एम. के 0.2 प्रतिशत घोल का 15-20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  3. पाऊडरी मिल्डयू : पत्तियों के दोनों तरफ व तने पर सफेद चूर्ण तथा चकते दिखाई देते हैं। जिसकी वजह से पौधा मरने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील सल्फर (सल्फैक्स) एक लीटर या कैराथेन 40 इ.सी. 150 मि.ली. प्रति हैक्टेयर के हिसाब से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

गेंदे के फ़ायदे

  • गेंदे की पत्तियों का पेस्ट फोड़े के उपचार में भी प्रयोग होता है। कान दर्द के उपचार में भी गेंदे की पत्तियों का सत्व उपयोग होता है।
  • पुष्प सत्व को रक्त स्वच्छक, बवासीर के उपचार तथा अल्सर और नेत्र संबंधी रोगों में उपयोगी माना जाता है।
  • टैजेटस की विभिन्न प्रजातियों में उपलब्ध तेल, इत्र उद्योग में प्रयोग किया जाता है।
  • गेंदा जलन को नष्ट करने वाला, मरोड़ को कम करने वाला, कवक को नष्ट करने वाला, पसीना लाने वाला, आर्तवजनकात्मक होता है। इसे टॉनिक के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।
  • इसके उपयोग से दर्द युक्त मासिक स्त्राव, एक्जिमा, त्वचा के रोग, गठिया, मुँहासे, कमज़ोर त्वचा और टूटी हुई कोशिकाओं में लाभ होता है।

स्रोत:

  • विकिपीडिया
  • भारतकोश
  • दैनिक भास्कर

हरित गृह (ग्रीन हाउस) प्रौद्योगिकी

हरित गृह (ग्रीन हाउस) प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्देश्य सालों भर सफलतापूर्वक अच्छे किस्म के पौधों को बढ़ने के लिए उचित व संवर्द्धनीय वातावरण उपलब्ध कराना है। पश्चिमी देशों में मौसम की स्थिति सामान्यतया मृदु रहती है। प्लास्टिक गृहों (पोलि हाउस) के अंदर फल, फूल और सब्जियों का उपज सामान्य पहल या कार्य है। हरित गृह (ग्रीन हाउस) संरचना का उपयोग सामान्यतया गैर मौसमी बागवानी फसलों को उगाने में किया जाता है जिसका सामान्य स्थितियों में उपज संभव नहीं होता। हरित गृह (ग्रीन हाउस) सालों भर नियमित रूप से फल, फूल और सब्जियों की आपूर्ति को सुनिश्चित करता है। देश में विविध प्रकार के कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए उसके अनुकूल मौसम की स्थिति बनाये रखने के लिए प्लास्टिक हरित गृह तकनीक जरूरी है।

हरित गृह (ग्रीन हाउस) एक प्रकार का ढाँचा होता है जो पारदर्शी से अपारदर्शी सामग्री जैसे - निम्न घनत्व वाला पोलि एथीलिन (एलडीपीई), एफ.आर.पी. पोलि कार्बोनेट से ढका होता है। ये पारदर्शी-अपारदर्शी सामग्री सौर्य विकिरण को भीतर आने तो देती लेकिन उसके भीतर स्थित वस्तुओं से निकलने वाले तापीय विकरण को बाहर जाने से रोकता है। यह पौधों के विकास के लिए उचित वातावरण उत्पन्न करता है। दिन के समय सूर्य से प्राप्त ऊर्जा, हरित गृह के भीतर ताप में बदल जाता जिसका पौधों के सामान्य श्वसन क्रिया के दौरान पानी के वाष्पीकरण में प्रयोग किया जाता है। पौधों के विकास को बहुत सारे प्रतिमानक जैसे- प्रकाश, गर्मी, ऊर्जा, कार्बन डायऑक्साइड व आर्द्रता प्रभावित करते हैं, जिन्हें इस प्रकार के ढाँचों में नियंत्रित किया जा सकता है।
हरित गृह (ग्रीन हाउस) के निर्माण पर आने वाली लागत ढकने वाली सामग्री (चाहे वह कठोर हो या लचीला) के चयन जैसे जी.आई पाइप, एम.एस. ऐंगल, फाइबर शीशा से युक्त पोलिस्टर, शीशा, उगलिक (एक्रिलिक) इत्यादि पर निर्भर करता है। इसके अलावे, हरित गृह की स्थापना का लागत उसे ढकने के लिए प्रयुक्त सामग्री पर भी निर्भर करता है।
हालांकि ऊपर बताये गये सामग्री से निर्मित हरित गृह काफी खर्चीला हो जाता है जो सामान्य भारतीय किसान की पहुँच से बाहर है। इस समस्या के समाधान के लिए ऐसे हरित गृह निर्माण की व्यवस्था की गई है जो किसानों के आमदनी में संभव हो। इसके लिए पूरी तरह जाँचा-परखा कम लागत वाला लकड़ी का हरित गृह बनाया गया है। यह ढाँचा किसी प्रकार के ढकने वाले सामग्री- फिल्म प्लास्टिक चादर, छायादार जाल, यूवी पोषित निम्न घनत्व वाला पोलि एथलीन फिल्म चादर के लिए उपयुक्त है। इस तरह के हरित गृह के निर्माण की प्रक्रिया नीचे बताई गई है, जिसमें हरित गृह के उपयोगकर्ता या किसान हरित गृह के भीतर विभिन्न फसलों को उगाने के लिए अधिक से अधिक जगह का उपयोग कर सकते हैं।
इन हरित गृहों के अंदर उगाये गये पौधों से प्राप्त परिणाम बताता है कि यह लघु और सीमान्त किसानों के लिए साध्य या उपयोगी प्रौद्योगिकी हो सकता है। इसका उपयोग कर किसान अधिक मात्रा में सब्जी के साथ अन्य बेमौसमी फसल उगा सकते हैं।

35 फीट X 20 फीट आकार के लकड़ी के हरित गृह (ग्रीन हाउस) निर्माण प्रक्रिया

जरूरी सामग्री
1. लकड़ी का खंभा
लकड़ी के खंभा का चयन इस ढाँचे की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसके लिए युकेलिप्टस का खंभा सबसे अच्छा विकल्प है। इसके कई फायदे हैं क्योंकि इसमें दीमक और कीड़े लगने की संभावना काफी कम होती है। इससे अधिक, जब इनके खंभे को गाड़ा जाता तो ये पूरी तरह सुरक्षित रहता और इसका नीचला हिस्सा का छिलका भी अलग नहीं होता।
इसके लिए, सामान्यतया दो आकार के लकड़ी के खंभा का उपयोग किया जाता। एक 7-10 सें.मी. के बड़े व्यास वाला और दूसरा लगभग 5 सेंमी व्यास वाला। बड़े आकार के तना का उपयोग मुख्य ढाँचा के लिए जबकि छोटे आकार वाले तनों का उपयोग सहायक ढाँचा के लिए किया जाता है।

जरूरी खंभों की संख्या
बड़े व्यास वाले खंभे - 21
छोटे व्यास वाले खंभे- 34
खंभे की कुल संख्या - 55

जी. आई. तार
4 मिली मीटर व्यास वाले जी.आई. तार का उपयोग मुख्य ढाँचे से बाँस की छड़ी या बत्ती को बाँधने में किया जाता है।
कुल जी.आई. तार की जरूरत - 2 किलो ग्राम

कील
लम्बे आकार वाले कील का उपयोग लकड़ी के मुख्य खंभे से सहायक खंभे को जोड़ने में किया जाता है।
7 सें.मी. आकार के जरूरी कील या काँटी - 3 किलो ग्राम

यूवी पोषित कम घनत्व वाला पोलि एथलीन फिल्म
यह ढाँचा किसी प्रकार के हरित गृह आच्छादन सामग्री के लिए उपयुक्त है। निम्न घनत्व वाला पोलि एथलीन फिल्म (एल.डी.पी.ई.एल) विश्वभर में हरित गृह में सामान्यतया में उपयोग किया जाता है। इससे अधिक, यह कम खर्चीला है और इसे लगाना भी आसान है। भारत में निम्न घनत्व वाले पोलि एथलीन फिल्म इंडियन पेट्रो केमिकल्स लि. द्वारा तैयार किया जाता है जिसकी कई विशेषताएँ हैं और वह लकड़ी निर्मित हरित गृह के लिए उपयुक्त ढकने वाली सामग्री है। अपने अनुभव में हमने पाया है कि इंडियन पेट्रो केमिकल्स लि. द्वारा निर्मित एल.डी.पी.ई. फिल्म में कई विशेषताएँ हैं और इस ढकने वाली सामग्री के निर्माण में पौधों की वृद्धि को प्रभावित करने वाले - प्रकाश, ताप या ऊर्जा, कार्बन डायऑक्साइड व संबंधित आर्द्रता जैसे प्रतिमानक का पूरी तरह पालन किया गया है।

जरूरी कुल फिल्म
भूमि या तल के कुल क्षेत्रफल से 2.48 गुणा बड़ा कम घनत्व वाले यू.वी. फिल्म, पोलि एथीलीन फिल्म की जरूरत होती है। जैसे यदि आप 35 फीट X 20 फीट आकार = 700 वर्ग फीट का हरित गृह निर्माण करना चाहते हैं तो उसके लिए आपको 1736 वर्ग फीट यू.वी. फिल्म की जरूरत होगी। इसकी मोटाई 200 माइक्रोन व वजन लगभग 30 किलो ग्राम होगा।

कोलतार या अलकतरा - 2 लीटर

कम घनत्व वाले पोलि एथलीन फिल्म रोल

(10 सें.मी. चौड़ाई वाला)
यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. फिल्म से लकड़ी के खंभे के सीधा सम्पर्क को रोकने के लिए 10 सें.मी. चौड़ाई वाला कम घनत्व वाला पोलि एथलीन फिल्म रोल या बचा हुआ यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. फिल्म रोल तैयार करें और उसे खंभा, जोड़ व तार में लपेट दें।

कुल जरूरी फिल्म - 3 किलो ग्राम

प्लास्टिक की रस्सी
प्लास्टिक रस्सी का उपयोग एल.डी.पी.ई. शीट के ऊपर ढाँचा के आधार और रस्सी के बीच कुछ रखने के लिए किया जाता है। यह किसी प्रकार के हवा के तेज झोंके से शीट को होने वाले खतरों से बचाव करता है।
जरूरी प्लास्टिक रस्सी - 5 किलो ग्राम

बाँस की छड़ी या बत्ती
बाँस की छड़ी का उपयोग मुख्य ढाँचा से सहायक ढाँचा को जोड़ने में किया जाता है, जिसपर एल.डी.पी.ई. शीट रखा जाता है।

जरूरी बाँस की छड़ी की कुल संख्या - 30

बाँधने या कसने वाला कील या नट

  • इसका उपयोग रबर वाशर के साथ एल.डी.पी.ई. शीट को लकड़ी के आधार ढाँचा को बाँधने या कसने में किया जाता है।
  • इनका उपयोग लकड़ी के खंभे पर एल.डी.पी.ई. शीट को समान रूप से फिट करने में किया जाता है ताकि वह शीट आधार ढाँचा पर समान रूप में बना रहे।
  • जरूरी नट या कील (1 इंच लंबाई वाला) - 250 ग्राम

कम घनत्व के पोलि-एथलीन फिल्म से ढकने हेतु 35 X 20 फीट के लकड़ीनुमा हरित गृह निर्माण प्रक्रिया

कदम -1

स्थान का चयन और हरित गृह अनुस्थापन या अभिविन्यास

  1. अच्छा व उपयुक्त स्थान हरित गृह के कार्यात्मक व वातावरणीय संचालन में विशेष अंतर ला सकता है। पानी के बहाव के लिए ढलुआ जमीन एक प्रमुख कारक है। हरित गृह से भूमि जल को दूर रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए।
  2. सभी मौसम में हरित गृह तक पहुँच की सुविधा से किसान वहाँ पहुँचकर उसकी देखभाल आसानी से कर सकेगा। इससे अधिक यदि हरित गृह, बाजार के नजदीक अवस्थित हो तो यह एक अतिरिक्त फायदा माना जाएगा। एक और महत्वपूर्ण कारक जिसपर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, वह है हरित गृह के नजदीक स्वच्छ जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  3. हरित गृह, भवन व पेड़-पौधों से दूर होना चाहिए ताकि सूर्य प्रकाश के आगमन में उत्पन्न  होनेवाली रुकावट को दूर किया जा सके।
  4. पूरब-पश्चिम दिशा की ओर बनाये गये हरित गृह जाड़े के मौसम में उत्तर -दक्षिण दिशा की ओर बने हरित गृह की तुलना में प्रकाश स्तर को सामान्य बनाये रखता है।
  5. यह बहुत जरूरी है कि हरित गृह अनुस्थापन या अभिविन्यास में संबंधित विभिन्न कारकों का ध्यान रखा जाए। ऐसे अनुस्थापन या अभिविन्यास, विशिष्ट स्थान या अवस्थिति के लिए हवा की दिशा, उपलब्ध शांत वायु दिन भर सूर्य प्रकाश की उपलब्धता के आधार पर, निश्चय किया जाना चाहिए।

कदम -2

  • बड़े व्यास वाले लकड़ी का खंभा लें और उसे शिलाजीत (राल, बिटुमिन) से पोत दें और पोलि प्रोपेलिन सुतली की सहायता से खंभे को किसी कम घनत्व वाला पोली एथलीन फिल्म से लपेटकर बाँध दें। यह खंभे को दीमक के हमला से बचाव करेगा।
  • हरित गृह का लकड़ीनुमा ढाँचा उपयुक्त कसौरीना के विभिन्न आकार या लंबाई के खंभे से तैयार किया जाए ताकि दिखाये गये चित्र के अनुरूप आधार ढाँचा बनाया जा सके।
  • दिखाये गये चित्र के अनुरूप पूरे तल क्षेत्र को ढकने के लिए बाँस के बेंत का उपयोग करें।
  • हरित गृह की लंबाई से लगाकर 0.2 मीटरX 0.2 मीटर चौड़ा गड्ढा खोदें। उसके मिट्टी को बाहर फेंके ताकि उसका उपयोग यू.वी. पोषित कम घनत्व वाले पोलि एथलीन फिल्म के किनारे को ढकने में किया जा सके। इस बात से भी आश्वस्त हो लें कि फिल्म को ढकने के लिए उपयोग की जा रही मिट्टी, पत्थर या किसी नुकीले पदार्थ से रहित हों।
  • यू.वी. पोषित कम घनत्व वाले पोलि एथलीन फिल्म के संपर्क में आने वाले सभी खंभे को यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. फिल्म से ढक दें या उसके ऊपर लपेट दें। यह बाहर निकले किसी नुकीले पदार्थ की जाँच के लिए किया जाता ताकि है यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. फिल्म को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचा सके। साथ ही, लकड़ी के खंभे से नुकीले या छोड़े गये राल या धूना की वजह से फिल्म के क्षति को रोका जा सकें।
  • चित्र के अनुरूप हरित गृह के चारों ओर यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. फिल्म लपेट दें। फिल्म के एक किनारे को 2 सें.मी. चौड़ाई पर मोड़कर 4 इंच की समान दूरी पर उसे नट व रबर वाशर की सहायता से टाइट कर दें। हरित गृह के सामने व पिछले हिस्से को एल.डी.पी.ई. शीट से ढक दें और उसे काटकर बराबर कर लें ताकि बिना किसी सिकुड़न या मोड़ के उसमें वह फिट हो जायें। ढाँचा के खंभे में उसे फिट करने के लिए कील व रबर वाशर का इस्तेमाल करें। जैसा पहले किया गया है उसी के अनुसार कोना को गड्ढा में गाड़ दें और मिट्टी से ढक दें। वहाँ पर सिर्फ हरित गृह में प्रवेश के मार्ग को छोड़ दें जहाँ एल.डी.पी.ई. शीट लगा रहेगा।
  • चित्र के अनुसार धातु निर्मित हुक का निर्माण करें और एक प्रवेशद्वार में दो हुक लगायें। यह हुक प्रवेशद्वार पर एल.डी.पी.ई. शीट खड़ा बनाये रखने में मदद करेगा।
  • कम लागत
  • आसान निर्माण
  • स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का प्रयोग
  • यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. या प्लास्टिक शीट के प्रयोग के लिए निर्मित
  • हवा के झोंका रोकने में सक्षम
  • टीकाउ
  • हरित गृह में अधिक जगह तथा हरित गृह प्रतिमानक जैसे आर्द्रता व तापमान आसानी से नियंत्रित किया जा सकता।

मुरुगप्पा चेट्टीयार शोध केन्द्र में बनाये गये हरित गृह ढाँचा के निम्नलिखित लाभ हैं -

  1. कम लागत
  2. आसान निर्माण
  3. स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का प्रयोग
  4. यू.वी. पोषित एल.डी.पी.ई. या प्लास्टिक शीट के प्रयोग के लिए निर्मित
  5. हवा के झोंका रोकने में सक्षम
  6. टीकाउ
  7. हरित गृह में अधिक जगह तथा हरित गृह प्रतिमानक जैसे आर्द्रता व तापमान आसानी से नियंत्रित किया जा सकता।

 

विशेष जानकारी के लिए निम्न पता पर संपर्क करें-
निदेशक, श्री एमएम मुरुगप्पा चेट्टियार रिसर्च सेंटर,तारामणि
चेन्नई -600113, तमिलनाडु, भारत.
फोन: 044-22430937 
फैक्स 044-224342688 
वेबसाइटः www.amm-mcrc.org

स्रोत: बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
http://www.dainet.org

सेंटर ऑफ साइंस फॉर विलेजेस, मगन संग्रहालय, वर्धा– 442001, महाराष्ट्र
श्री ए. एम.एम. मुरुगप्पा चेट्टियार शोध केन्द्र, चेन्नई

बालक महतो के सफलता की कहानी

अंतिम बार संशोधित : 2/21/2020



© C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate