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विस्तार प्रथाएं

किसानों द्वारा अपनाई विस्तार प्रथाओं और नई प्रौद्योगिकियों में के रुप में अपनाए जा रहे नवाचारों को प्रस्तुत किया गया है।

एस.आर.आई (श्री)

चावल गहनीकरण पद्धति (एसआरआई)

धान की खेती : कुछ मिथक

प्रत्येक व्यक्ति यह मानता है कि चावल एक जलीय फसल है तथा स्थिर जल में अधिक वृद्धि करता है। जबकि सच्चाई यह है कि धान जल में जीवित अवश्य रहता है पर यह जलीय फसल नही है और न ही ऑक्सीज़न के अभाव में उगता है। धान का पौधा पानी के अंदर अपने जड़ों में वायु कोष (एरेनकाईमा टिश्यू) विकसित करने में काफी ऊर्जा व्यय करता है। 70% धान की जड़ें पुष्पावधि के समय बढ़ता है।

श्री के बारे में गलत अवधारणा

श्री खेती के अंतर्गत धान जलमग्न नहीं होता है परंतु वानस्पतिक अवस्था के दौरान मिट्टी को आर्द्र बनाये रखता है, बाद में सिर्फ 1 इंच जल गहनता पर्याप्त होती है। जबकि श्री में सामान्य की तुलना में सिर्फ आधे जल की आवश्यकता होती है।

वर्त्तमान में विश्वभर में लगभग 1 लाख किसान इस कृषि पद्धति से लाभ उठा रहे हैं। श्री में धान की खेती के लिए बहुत कम पानी तथा कम खर्च की आवश्यकता होती है और ऊपज भी अच्छी होती है। छोटे और सीमान्त किसानों के लिए ये अधिक लाभकारी है।1980 के दशक के दौरान श्री को मेडागास्कर में पहली बार विकसित किया गया। इसकी क्षमता परीक्षण चीन, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाइलैंड, बांगलादेश, श्रीलंका एवं भारत में किया गया। आँध्र प्रदेश में वर्ष 2003 में श्री के खरीफ फसल के दौरान राज्य के 22 जिलों में परीक्षण किया गया।

विभिन्न राज्यों में विभिन्न राज्यों में श्री पद्धति के अनुभव

औपचारिक प्रयोग वर्ष 2002–2003 में प्रारंभ हुआ। अब तक इस पद्धति को आँध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं गुजरात में प्रारंभ किया गया है।

  • आँध्र प्रदेश
  • तमिलनाडु
  • पश्चिम बंगाल
  • गुजरात
  • झारखंड में श्री पद्धति से धान उत्पादन

कपास से जवार तक वैकल्पिक खेती की पद्धतियाँ

रायचूर जिले में नागालापुर 140 घरों का एक छोटा सा गाँव है। उनमें से अधिकाँश लिंगायत, अनुसूचित जाति तथा मदिवाला समुदायों के छोटे किसान हैं। तुंगभद्रा नहर के पिछले सिरे पर स्थित, कुछ लोगों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन पिछले पांच वर्षों से इस गाँव को इस स्रोत से थोड़ा भी पानी नहीं मिला है, जिससे वे पूर्ण रूप से वर्षाजल पर निर्भर हैं। जवार, कपास तथा सूर्यमुखी यहाँ की मुख्य फसलें हैं। लेकिन इस गाँव में काली मिट्टी होने के कारण यह कपास के लिए आदर्श है। कपास एकल फसल प्रणाली के अर्न्तगत उगाई जाती है। लागत की वस्तुएं अधिक खरीदने के कारण कपास की फसल पर लाभ कम हो गया है।

  • वैकल्पिक खेती की पद्धतियों की ओर बढ़ना
  • कपास के लिए लागत तथा प्राप्तियां (रुपये/एकड़) - 2005
  • कपास की सीखों को जवार पर लागू करना
  • जवार के लिए लागत तथा लाभ (रुपये/एकड़) – 2005

स्रोत: AME Foundation,amefound.org, WASSAN-CSA-WWF Manual on SRI

अन्य प्रयास

कच्चा नारियल तोड़ने और नारियल पानी ठंडा करने का उपाय

महादेव्या विनोद । बंगलौर, कर्नाटक

नवप्रवर्तक की इच्छा थी कि एक ऐसा यंत्र विकसित किया जाए, जिससे कच्चे नारियल को तोड़ा जा सके और इसके पानी को निकालकर ठंडा किया जा सके। महादेव्या ने अपनी मशीन में नारियल तोड़ने के लिए कटर लगाया है। टूटे हुए नारियल से पानी निकलकर ट्रे के माध्यम से एक बरतन में जाता है। बर्फ से ढंकी पाइपों के माध्यम से नारियल पानी को गुजारने के कारण इसका तापमान 14-15 डिग्री से. हो जाता है। इस उपाय से एक समय में 400 गिलास (प्रति गिलास 200 मिली) नारियल पानी ठंडा किया जा सकता है।

बहुद्देशीय प्रसंस्करण यंत्र

धर्मवीर कांबोज । यमुनानगर, हरियाणा

खाद्य एवं दवा उद्योग में विभिन्न प्रकार के खाद्य एवं गैर-खाद्य फलों एवं जड़ी-बूटियों का रस, लुगदी, तेल इत्यादि निकालने की आवश्यकता होती है। यह बहुद्देशीय प्रसंस्करण यंत्र एक ऐसी पोर्टेबल मशीन है जो सिंगल फ़ेज मोटर पर काम करती है और विभिन्न प्रकार के फलों, जड़ी-बूटियों और बीजों के प्रसंस्करण में उपयोगी है। यह एक बड़े प्रेशर कुकर के रूप में भी काम करती है, जिसमें ताप नियंत्रण एवं ऑटो कट-ऑफ़ सुविधा भी है। इसमें संघनन क्रियाविधि (कंडनसेशन मैकेनिज़्म) भी है जिसकी मदद से फूलों एवं वानस्पतिक औषधियों का अर्क निकाला जा सकता है। यह 50 किग्रा/घंटा और 150 किग्रा/घंटा रस निष्कर्षण क्षमता के साथ दो मॉडलों में उपलब्ध है। यह मशीन एलोवेरा (घृतकुमारी), आम, आँवला, तुलसी, अश्वगंधा, सतावर और अन्य जड़ी बूटियों, फूलों जैसे गुलाब, चमेली, लेवैंडर इत्यादि के प्रसंस्करण में उपयोगी है। यह यंत्र मौके पर ही मूल्य परिवर्धन (वैल्यू एडीशन) हेतु बहुत ही उपयोगी है, जिससे उत्पाद के बेहतर दाम मिल सकते हैं।

बांस छीलने एवं तीलियां बनाने का यंत्र

लालबियाकजुआला राल्टे एवं लालपियांग साइलो | आइजोल, मिजोरम

बांस की तीलियां बनाने में वर्षों से चाकू का इस्तेमाल होता आया है, जो कि बेहद थकाऊ, अधिक समय लेने वाली और जोखिमपूर्ण विधि है। राल्टे और साइलो ने एक ऐसी हाथ से चलने वाली मशीन विकसित की है जो बांस की खपच्चियां बना सकती है और साथ ही इन खपच्चियों से तीलियां भी बना सकती है। इसमें बांस को मशीन में डाल दिया जाता है और कटर को एक हैंडल द्वारा आगे-पीछे किया जाता है। इससे बांस की खपच्चियां बन जाती हैं। लगभग 50 खपच्चियां लेकर उन्हें फिर मशीन में उध्र्वाधर यानी खड़े रूप में डाला जाता है। कटर फिर आगे पीछे चलता है और परिणामस्वरूप 1.2 मिमी की बांस की तीलियां बन जाती हैं। इस मशीन का प्रयोग करते हुए एक व्यक्ति एक घंटे में लगभग 5000 तीलियां तैयार कर सकता है।

वर्षा के पानी की सिरिंज

के जे अंतोजी। कोचीन,केरल

अंतोजी कोचीन के तटीय क्षेत्र में रहते हैं जहाँ भूजल खारा और उसका स्तर समुद्र जल स्तर के बराबर ही है। एक बार जब वह अपने बगीचे में पानी दे रहे थे होज पाइप नीचे गिर गया और पानी के दबाव की वजह से मिट्टी के ऊपर 30 सेमी का छेद हो गया। इस पानी के दबाव का उपयोग कर एक वर्षा जल संचयन तकनीक के विकास के बारे में उनके पास एक विचार आया। कई प्रयोगों करने के बाद वह अपने नवाचार मूर्त रुप में सामने आया। इस प्रणाली में छत पर जमा वर्षा जल को एक दबाव टैंक में जमा किया जाता है और पीवीसी पाइप पानी की मदद से समुद्र जल स्तर की गहराई से नीचे तक संग्रहीत कर दिया जाता है। छेद से पानी रिचार्ज होता है और भूजल के साथ मिल जाता है। आवश्यकता होने पर, पानी अच्छी तरह से बाहर पंप से निकाला जा सकता है।

स्त्रोत : राष्ट्रीय नवाचार फांउडेशन

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