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नगालैंड में मुर्गीपालन से स्वरोजगार

इस भाग में नगालैंड में मुर्गीपालन से स्वरोजगार से लोगों की जिंदगी में आ रहे बदलाव की जानकारी प्रस्तुत की गई है।

मुर्गीपालन से स्वरोजगार


नगालैंड जैसे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में मुख्यतया घर-आंगन में देसी मुर्गियां पाली जाती हैं। यहां की शत-प्रतिशत मांसाहारी आबादी को अंडे और मांस की आपूर्ति पूरा करने के लिए नगालैंड में मुर्गीपालन बड़े पैमाने पर किया जाता है लेकिन केवल 1.64 प्रतिशत ब्रायलर और 0.80 प्रतिशत लेअर मुर्गियां पाली जाती हैं। इसके अलावा देसी मुर्गियों जैसी दिखने वाली रंगीन मुर्गियों के अंडों और मांस को बहुत पसंद किया जाता है और इसका मूल्य व्यावसायिक अंडों या ब्रायलर मांस की तुलना में लगभग दोगुना है।

पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र के लिए भाकृअनुप अनुसंधान परिसर, नगालैंड केन्द्र,झरनापानी ने ग्रामीण मुर्गी उत्पादन में सुधार के लिए वर्ष 2009-10 में कुक्कुट अनुसंधान निदेशालय, हैदराबाद के सहयोग से पोल्ट्री सीड प्रायोजना के तहत दुकाजी ‘वनराज’ और लेअर ‘ग्रामप्रिया’ किस्मों के गुणवत्Poultry Farm1तापूर्ण जननद्रव्य का उत्पादन शुरू किया। पिछले 5 वर्षों में इस केन्द्र द्वारा 5.93 लाख उर्वर अंडों और 2.63 लाख चूजों का उत्पादन किया जा चुका है। नगालैंड, असोम, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में 2.03 लाख से अधिक चूजों की आपूर्ति किसानों को सीधे अथवा एनजीओ या केन्द्रीय प्रायोजक कार्यक्रमों के माध्यम से की गयी है। कृषकों, बेरोजगार ग्रामीण युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए राज्य में 20 से अधिक क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किये गये। इनके द्वारा नगालैंड में ‘वनराज’ और ‘ग्रामपिया’ मुर्गी किस्मों को प्रचलित करने के लिए 1000 लाभार्थियों के साथ 25632 मुर्गियों के प्रयोग से 744 फार्म प्रदर्शनों का आयोजन किया गया।

आजीविका सुरक्षा

अंडा उत्पादन

नगालैंड राज्य के दीमापुर जिले में गहरे भूरे अंडों की बढ़ती मांग के मद्देनजर, शिक्षित बेरोजगार युवा श्री लिबेमो लोथा मुर्गी पालन में दिलचस्पी लेने लगे। इन्होंने नगालैंड केन्द्र पर प्रशिक्षण प्राप्त किया और 400 'वनराज' और 'ग्रामपिया' चूजों के साथ लघुस्तरीय गहन मुर्गीपालन इकाई शुरू कर दी। इन्होंने नर पक्षियों को मांस के लिए बेचने से पूर्व 2.50 कि.ग्रा. शारीरिक भार अवस्था तक 4 महीने पालन-पोषण किया और मादा पक्षियों का स्थानीय उपलब्ध सामग्री से घर में आहार बनाकर अंडों के लिए पालन-पोषण किया।

पहले बैच में ही इन्हें 9400 रु. प्रति माह का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। अपने फार्म से प्राप्त अनुभव और अच्छा लाभ देखकर इन्होंने नार्थ ईस्ट डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड, दीमापुर से वित्तीय सहायता प्राप्त करके 2000 वर्ग मीटर में 700 लेअर मुर्गियों की एक अन्य इकाई शुरू कर दी। अब श्री लिबेमो के फार्म पर 580-600 अंडों का प्रतिदिन उत्पादन होता है और इसे 7 रु. प्रति अंडा थोक बाजार में बेचा जाता है। इस लेअर इकाई से 57,800 रु. प्रति माह शुद्ध लाभ होता है। उनकी इस उपलब्धि से अन्य ग्रामवासी और बेरोजगार युवा भी मुर्गीपालन को उद्यम के रूप में शुरु करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

मांस उत्पादन

सेथिकेमा, दीमापुर की एक शिक्षित महिला श्रीमती थेजानो भी पारम्परिक रूप से पशुपालन कार्य करती थीं किन्तु वैज्ञानिक ज्ञान और विषेशज्ञता के अभाव में सफल नहीं हो सकी थीं। नगालैंड केन्द्र पर इन्होंने वैज्ञानिक तरीके से मुर्गीपालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और 400 'वनराज' मुर्गियों के साथ अर्द्धगहन मुर्गीपालन इकाई की शुरुआत की। 4 माह की अवधि में 98 प्रतिशत मुर्गियां जीवित रहीं और 16 सप्ताह की आयु में औसत 2.5 कि.ग्रा. शारीरिक भार प्राप्त किया। इन्होंने 150 रु. प्रति कि.ग्रा. की दर से 1057 कि.ग्रा. मांस का विक्रय स्थानीय बाजार में किया।

प्रत्येक बैच में इनको 35,000-40,000 रु.का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। अब ये एक वर्ष में चार बैच रखती हैं और इससे इन्हें 1.4 से 1.6 लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। अपने फार्म के अनुभवों से सीखकर और बढ़ते लाभ के मद्देनजर, इन्होंने वर्षभर 1,000 मुर्गियों का पालन शुरु कर दिया है। इनकी सफलता ने नजदीकी गांवों के महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रेरणा दी है जिससे वे उन्नत ‘वनराज’ मुर्गी का पालन करके आत्मनिर्भर बन सकें।

प्रेरणास्त्रोत

भाकृअनुप, नगालैंड केन्द्र मुर्गीपालन इकाई के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करने, उन्नत जननद्रव्य की आपूर्ति और वित्तीय एवं विपणन संपर्क प्रदान करने के अलावा निरंतर निगरानी और स्वास्थ्य संबंधी परामर्शदात्री सेवाएं प्रदान कर रहा है। इस तरह पोल्ट्री सीड प्रोजेक्ट ने नगालैंड के आदिवासी लोगों के जीवन में नई आशा जगायी है और पारम्परिक आंगन मुर्गीपालन को सैंकड़ों ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए लाभ आधारित, वर्ष भर के रोजगार और आजीविका अवसर में बदल दिया है।

स्त्रोत: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद,भारत सरकार।

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