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सुस्थिर कृषि

इस लेख में सुस्थिर कृषि के सभी तथ्यों के ऊपर जानकारी दी गयी है जिसका फायदा पूरे देश के किसानों ने उठाया है| साथ ही आत्मनिर्भरता और महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की गयी है|

स्ट्रिप खेती- शुष्क भूमि के किसानों के लिए आशा की एक किरण

चित्रदुर्गा तथा बेल्लारी जिलों के चिनाहगारी तथा उपरहल्ला जलसंभर, कर्नाटक के सूखे इलाकों से सम्बन्ध रखते हैं। इसके अलावा इन क्षेत्रों में जब-तब सूखे की संभावना बनी रहती है। छिछली मिट्टी, उनमें जैविक पदार्थ की निम्न मात्रा तथा नमी संरक्षण की अपर्याप्त पद्धति के कारण मूंगफली जैसे केवल लचीले प्रकार की ही फ़सल उगाई जा सकती है। मूंगफली ही ऐसी फ़सल है जो यहां पूरे साल उगाई जा सकती है। लगभग 80% किसान मूंगफली की खेती पर निर्भर करते हैं, जो उनकी जीविका का साधन है। दैनिक मजदूरी तथा प्रवास के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। मूंगफली की मोनोक्रॉपिंग लगभग 30 सालों से की जा रही है। फ़सल की एक निश्चित अवस्था में प्राप्त कुल 300 mm वर्षा से अच्छी उपज तथा चारे प्राप्त होते हैं। सामान्य बारिश की स्थिति में मूंगफली खेती से प्राप्त सालाना आय कम से कम लगभग 2000-3000 प्रति हेक्टेयर हुआ करती थी।

इस क्षेत्र के किसानों की खाद्य तथा आय सुरक्षा को बढ़ाने के लिए क्षेत्र में वर्ष 2002 तथा 2005 के बीच कर्नाटक वाटरशेड डेवलपमेंट (KAWAD) परियोजना का आरंभ किया गया। इस परियोजना में गहन रूप से बंध बनाने, नालियों के निर्माण करने, जल क्षेत्र की प्रक्रिया इत्यादि पर कार्य किए गए। AME फाउंडेशन (AMEF), जो कि इस परियोजना का एक सहभागी है, ने खेती की प्रणालियों को उन्नत करने में मदद की।

यथास्थिति मिट्टी, नमी संरक्षण तथा मृदा उर्वरता पद्धति को बढ़ावा देने के अलावा AMEF ने अन्य फ़सल के विकल्पों की खोज द्वारा किसानों द्वारा किए जाने वाले मूंगफली के मोनोक्रॉपिंग से भी निजात पाने पर भी ध्यान दिया। पर चूंकि मूंगफली नकदी फ़सल थी इसलिए किसान उसकी जगह अन्य फ़सलों को नहीं उगाना चाहते थे। पर इसी स्थिति में अनाजों की खेती को भी आरंभ करने की योजना बनाई गई। छोटा बाजरा सूखे को झलने के लिए तथा गरीबों की फ़सल के रूप में जाना जाता है। बस इसे अंकुरण के लिए नमी की आवश्यकता होती है, उसके बाद बढ़िया उपज मिल जाती है। अतः किसानों ने मूंगफली की फ़सल के बीच अनाज की फ़सल की पट्टी (स्ट्रिप) उगाई। इस तकनीकी को सामान्यतः स्ट्रिप खेती के नाम से जाना जाता है।

स्ट्रिप खेती का प्रयास

स्ट्रिप खेती तकनीकी किसानों के लिए नई थी। उन्हें इस तकनीकी पर कुछ संदेह भी था। उन्हें डर था कि अनाज की फसल के छांव से मूंगफली की फ़सल पर बुरा असर पड़ेगा। उन्हें यह भी भय था कि रागी या बाजरा (स्ट्रिप खेती के विकल्क के रूप में) से होने वाली आमदनी मूंगफली की तुलना में कम होगी। भले ही रागी या बाजरा को संभावित विकल्प माना गया पर अधिकतर किसानों ने मूंगफली तथा रागी को साथ बोना आरंभ किया।

संचालनात्मक बाधाएं

इस तकनीकी को व्यवहार में लाने में कुछ कठिनाइयां भी थीं। मूंगफली की बुआई बैलों से खींचे जाने वाले तीन फाल वाले सीड ड्रिल से की जाती है। किसान 9:6 में मूंगफली-बाजरा की क्यारियां बनाने को तैयार हो गए। मूंगफली तथा बाजरे के बीजों के आकार में फ़र्क के कारण मजदूरों को बुआई के वक्त दोनों ही फ़सलों की बुआई की गहराई को बदलना पड़ता था। बुआई में सावधानी के बावजूद कुछ किसानों को गहरी बुआई के कारण सही अंकुरण प्राप्त नहीं हो सका। साथ ही बाजरे पर टिड्डों के हमले के कारण भी फ़सल सीधा खड़ा नहीं रह पाती, और इस कारण भी कुछ किसान मूंगफली के साथ बाजरे की बुआई करने के लिए मजबूर हुए। बुआई जब उत्तर-दक्षिण दिशा में की गई तो रागी की क्यारियों के पास छांव के कारण मूंगफली के पौधों का विकास बाधित होता पाया गया। अंत में 27 किसान स्ट्रिप खेती को जारी रखने में कामयाब हो पाए।

आर्थिक लाभ से भी अधिक

स्ट्रिप खेती विधि से मूंगफली की फ़सल से औसतन 276 किलोग्राम उपज की प्राप्ति होती है, जबकि केवल मूंगफली की खेती से 362 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की प्राप्ति होती है। यद्यपि कठिन स्थितियों में यह कुछ कम होती है, हालांकि स्ट्रिप खेती विधि से कुल उत्पादन कहीं ज्यादा होता है, क्योंकि ज्वार की 125 किलोग्राम की उपज भी प्राप्त होती है। इसलिए मूंगफली की फलियों, चारे तथा रागी के चारों को बेचकर किसान को कुल 5507 रुपयों की प्राप्ति हो जाती है।

दो जलसंभरणों में उपरहल्ला में मूंगफली की स्ट्रिप खेती अधिक कामयाब रही, जबकि इसमें वर्षा अपेक्षाकृत कम ही होती है। इस प्रकार स्ट्रिप खेती सूखे में कामयाब साबित हुई।

तालिका 1: विभिन्न फ़सल प्रणालियों द्वारा मूंगफली की खेती से प्राप्त आय

फ़सल प्रणाली

केवल मूंगफली की खेती

एकल फ़सल + स्ट्रिप खेती
(मूंगफली + रागी )

मूंगफली

मूंगफली

रागी

उपज(kg/ac)

 

 

 

फलियां / अनाज

362

276

125

चारे

636

624

467

कुल आय (Rs)

 

 

 

फलियां / अनाज

5784.00

4416.00

चारे

636.00

624.00

467.00

 

 

5040.00

467.00

कुल रुपए

6420.00

5507.00 रु. तथा परिवार के लिए अनाज की प्राप्ति

मूंगफली के साथ रागी की खेती से कीटों के हमले से भी बचा जा सका। रागी, चूसक कीट जैसे थ्रिप, जिससे मूगफली कलिका उतकक्षय विषाणु रोग (PBND) फैलता है ,के लिये बाधक है । मिट्टी जनित रोग भी कम पाए गए, क्योंकि मिश्रित खेती के कारण रोगाणुओं के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो गई और उनका पनपना कम हो गया।

इन सभी लाभों के अलावा रागी ने महिलाओं को सबसे अधिक लुभाया, क्योंकि इससे परिवार की खाद्य-सुरक्षा में इज़ाफा हुआ। महिलाएं अब पत्तीदार सब्जियां और कम अवधि वाली दाल, जैसे चना तथा राजमा उगाने लगीं। जिन्हें वे घर में इस्तेमाल करने के साथ बाजार में बेच कर आमदनी प्राप्त कर सकती थीं। हालांकि नई पद्धति से उनके काम के बोझ में कमी नहीं हुई है।

स्ट्रिप खेती में किसानों ने एक और फायदे पर ध्यान दिया। पारंपरिक पद्धति में वे पूरे के पूरे मूंगफली के पौधे को ही उखाड़ लेते थे, जिससे मिट्टी में कुछ भी नहीं बचता। पर अनाज की फ़सल को शामिल करने से उन्हें पौधों को खेत में ही छोड़ना पड़ता, जिससे जमीन की उरवर्ता भी बढ़ी।

मूंगफली उपजाने वाले किसान मूंगफली की फ़सल को संचित करने के लिए सामान्यतः धान या अन्य अनाजों के पुआल खरीदते। अब ज्वार की काठियों से मूंगफली ढेर को ढंकने में इस्तेमाल किया जाने लगा, और इस प्रकार उनका खर्च पहले से कम हो गया।

गुरुदत्त हेगड़े, रविंद्रनाथ रेड्डी, अरुण बालामत्ती
कार्यकारी निदेशक, AME फाउंडेशन,
नं. 204, 100 फीट रिंग रोड, 3rd फ़ेज,
बनशंकरी 2nd ब्लॉक, 3rd स्टैज, बैंगलूरु – 560085

स्रोत: LEISA India, Vol 7-2

जैव खाद से बेहतर उपज एवं लाभ एक छोटे किसान की सकारात्मक पहल

 

यह कहानी एक छोटे किसान की है जिसने सूखी ज़मीन से न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्षरत स्थिति से हटकर कुछ अलग करने का सोचा। उनके ‘जीवन के प्रति गहरे प्यार’ ने उन्हें न सिर्फ बहुत अच्छी आमदनी दी है, वरन् इससे अधिक महत्वपूर्ण, कई अन्य किसानों को उनका अनुसरण करने की प्रेरणा भी दी है।

चन्द्रण्णा, एक युवा किसान, पहले ‘नर्सरी चन्द्रण्णा’ के नाम से जाने जाते थे और अब ‘वर्मिकम्पोस्ट चन्द्रण्णा’ के नाम से। तीन वर्षों में उन्होंने वर्मिकम्पोस्ट तथा केंचुओं की बिक्री कर 1.4 लाख रुपये कमाये हैं। अब यह बात उस इलाके में परीकथा जैसी हो गई है जहां उनके जैसे छोटे किसान की औसत वार्षिक आय 15000 रुपये से अधिक नहीं थी।

चन्द्रण्णा 650 घरों के तुमकुर्लहल्ली गांव में रहते हैं जो कर्नाटक के चित्रदुर्ग ज़िले के मोलकलमुरु तालुका में स्थित विषम परिस्थितियों वाला एक आदर्श गांव है। इस गांव में अधिकांश पिछड़े समुदायों के लोग हैं। वहाँ की कुल 3800 की जनसंख्या में 410 अनुसूचित जाति के परिवार, 100 मुसलमान एवं 100 लिंगायत परिवार हैं। गांव में लगभग 3322 हेक्टेयर जमीन हैं जिसमें से 15% सूखी ज़मीन तथा 3.5% बोरेवेल के पानी से सिंचित है। बचा हुआ 2695 हेक्टेयर (81.5%) सामान्य ज़मीन है जिसमें कचरा फेंकने की, पशुओं के चरने लायक ज़मीन एवं ‘संरक्षित वन’ हैं जहां कभी-कभी केवल घासफूस एवं झाड़‍ियां देखी जाती हैं। सामान्य रूप से यहां के भू-भाग में लाल उथली रेतीली मिट्टी है। पूरी ज़मीन पर पत्थर फैले होने के कारण यह गांव फलदायी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। वार्षिक औसत वर्षा मात्र 500 मिमी होने के कारण किसानों को मूंगफली की खेती पर दांव लगाना पड़ता है, जो कि साल दर साल उपजाई जा रही नकदी फसल है। 30 वर्षों से सिर्फ और सिर्फ मूंगफली की खेती के कारण उपज दर घट कर 8 क्विंटल/हेक्टेयर के दयनीय स्तर तक गिर गई है। यद्यपि कृषि कोई आकर्षक बात नहीं है, अधिकांश लोग आजीविका के लिए अभी भी सिर्फ कृषि तथा मज़दूरी पर निर्भर हैं। ज़ाहिर है, इस गांव से वर्ष के अधिकांश हिस्से में पुरुष प्रवासी होते हैं।

एक छोटे किसान की बड़‍ी आशा

ऐसे गांव में, जहां खेती से सम्बन्धित कोई करिश्मा शायद ही कभी होता हो, चन्द्रण्णा का मामला यह दर्शाता है कि गहरी रुचि एवं स्वयं में विश्वास, कृषि को आय का एक भरोसेमन्द ज़रिया बना सकते हैं। क्योंकि, यह कोई रातोंरात सफलता मिलने की कहानी नहीं है बल्कि गांव के किसानों को कई प्रकार की एजेंसियों द्वारा दिए गए अवसरों को भुनाने के लिए किए गए व्यवस्थित प्रयासों की कहानी है।

एक गरीब किसान परिवार के चन्द्रण्णा को विरासत में 3 एकड़ सूखी ज़मीन मिली थी जिसका एक एकड़ भाग खेती योग्य नहीं है। इसलिए, आजीविका कमाने के लिए 2 एकड़ ज़मीन पर खेती करने के बजाय मज़दूरी करना परिवार के लिए अधिक महत्वपूर्ण स्रोत था। उनके माता-पिता अपने इकलौते पुत्र को पढ़ाना चाहते थे। लेकिन गरीबी की वज़ह से उनके लिए पूर्व-विश्वविद्यालय स्तर से आगे जाना सम्भव नहीं था। वे वापस लौटकर अपने माता-पिता के साथ खेती करने के लिए मज़बूर थे। कर्नाटक वॉटरशेड डॆवलपमेंट (KAWAD) परियोजना में, जिसमें एएमई फाउंडेशन एक संसाधन एजेंसी थी, चन्द्रण्णा एक स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ गए।

शुरुआती बिन्दु

चन्द्रण्णा ने सन 2000 में तिप्तुर के बैफ इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट, कर्नाटक (BIRD K) में आयोजित नर्सरी उगाने के प्रशिक्षण में भाग लिया। लेकिन उन्हें वर्मिकम्पोस्टिंग के बारे में जानने की अधिक जिज्ञासा थी, जिसके बारे में उसी समय किसानों के अन्य समूह के लिए उसी स्थान पर एक अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था। जब भी सम्भव होता, वे उस समूह में शामिल हो जाते थे। उन्हें केंचुओं की पैदावार एवं वर्मीकम्पोस्ट तैयार करना बेहद दिलचस्प मालूम हुआ।

नर्सरी प्रशिक्षण से लौटने के बाद उनके समूह को 15,000 अंकुरों की नर्सरी रोपने का अवसर दिया गया। इस कार्य का ज़िम्मा चन्द्रण्णा को दिया गया। सन् 2000 से शुरुआत कर चन्द्रण्णा ने लगातार तीन वर्षों तक नर्सरी उगाई। सन् 2003 में वॉटरशेड परियोजना में उनकी नर्सरी श्रेष्ठ आंकी गई और चन्द्रण्णा ‘नर्सरी चन्द्रण्णा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। एक विनम्र शुरुआत और उसके बाद आश्चर्यजनक प्रगति। वर्मीकम्पोस्टिंग के बारे में उनकी जिज्ञासा जारी रही। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने जो सीमित ज्ञान अर्जित किया था, उसके आधार पर उन्होंने नारियल की खोलों में केंचुओं की स्थानीय प्रजातियों को बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन वे ज़िन्दा नहीं बचे। सन् 2003 में चन्द्रण्णा ने KAWAD परियोजना की सहायता से 6 X 3 X 3 क्यूसिक फीट आकार के चार वर्मिकम्पोस्ट गड्ढे बनाए। हालांकि उन्हें इन गड्ढों के उपयोग का तरीका मालूम नहीं था। GUARD के स्टाफ के एक सदस्य ने उसके बाद 2 किलोग्राम केंचुए लाकर दिए, जिसकी कीमत चन्द्रण्णा को 300 रुपये देनी पड़ी। इन 2 किलोग्राम केंचुओं से उन्होंने 2 क्विंटल वर्मिकम्पोस्ट बनाया, जिसे उन्होंने 2 एकड़ में अपनी रागी फसल के लिए उपयोग किया। तुम्कर्लाहल्ली में रागी की फसल उगाना भी एक नया प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले इस गांव में किसी ने भी उसे उगाने का प्रयास नहीं किया था। 2 एकड़ से उन्हें 14 क्विंटल फसल मिली।

सन 2004 में उन्होंने अच्छी गुणवत्ता की वर्मीकम्पोस्ट का 6 क्विंटल तथा 1 थैला डीएपी के साथ 2 ट्रैक्टर एफ.वाई.एम (2 टन) का उपयोग किया। इस बार उन्होंने मूंगफली उगाई तथा 20 थैले उपज प्राप्त की, जिसका वज़न 9 क्विंटल था।
वृक्ष-आधारित खेती के स्थानों पर जाकर, तथा जो किसान कम्पोस्टिंग एवं वर्मीकम्पोस्टिंग में सफल रहे थे उनसे बातचीत ने चन्द्रण्णा को दीर्घकालीन कृषि के बारे में विस्तृत जानकारी देने में मदद की। उन्होंने बी.जी. केरे, जो कि पास के गांव के प्रगतिशील किसान हैं, के पास जाकर उनसे वर्मीकम्पोस्टिंग के बारे में अधिक जानकारी ली।

सन 2005 में चन्द्रण्णा ने पीटीडी क्षेत्र के एक एकड़ में 6 क्विंटल वर्मीकम्पोस्ट डाला, तथा इसके साथ अन्य पद्धतियों जैसे ग्रीष्मकालीन जुताई, बीजों का जैविक उपचार (र्हिज़ोबियम एवं ट्राइकोडर्मा), जिप्सम (50 किलो) का उपयोग, सामान्य बीजदर से अधिक का उपयोग (45 किलो), अंतर-फसलें उगाने एवं बाड़ की फसलें लगाने का उपयोग किया। उपज एक एकड़ से 13 बोरों तक पहुंच गई जिससे उन्हें 6.5 क्विंटल मूंगफली प्राप्त हुई। इस क्षेत्र में ए.एम.ई फाउंडेशन के चार वर्षों के कार्य के दौरान किसी किसान द्वारा दर्ज़ उच्चतम उपज थी। सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात थी कि प्रत्येक बोरे का वज़न, जो 50 से 60 किलो के बीच था। जबकि चन्द्रण्णा के 25 बोरों का वज़न 13 क्विंटल था, उनके पड़ोसी टिप्पेस्वामी के 40 बोरों का वज़न मात्र 13 क्विंटल था। उपज खरीदने वाले व्यापारियों को इस बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। बल्कि सच बात तो यह है कि व्यापारियों ने चन्द्रण्णा से बोरा खाली करने के लिए कहा, यह देखने के लिए कि कहीं उसमें पत्थर तो नहीं भरे थे। यह बहुत असामान्य बात थी कि मूंगफली का एक बोरा 50 किलो से अधिक वज़न का था। फलियों की एक समान परिपक्वता एवं उचित भराई ने मूंगफली की गुणवत्ता अत्यधिक बढ़ा दी थी।

वर्मीकम्पोस्टिंग, एक आकर्षक उद्यम

चन्द्रण्णा वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन कर अपनी दो एकड़ ज़मीन में इस्तेमाल करने तक ही नहीं रुके। सन 2004 से उन्होंने केंचुए तथा वर्मीकम्पोस्ट, दोनों बेचने शुरु कर दिए। सन 2004 में उन्होंने 124 किलोग्राम केंचुए 150 रुपये प्रति किलो की दर से बेचे, जिससे उन्हें 18,600 रुपये की आय हुई। इसके अलावा उन्होंने 15 क्विंटल वर्मीकम्पोस्ट को 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचकर और 7500 रुपये कमाए। कुल मिलाकर उन्होंने लगभग 26,100 रुपये कमाए।

Vermicomposting

केवल मूंगफली की तुलना में अधिक आय से प्रेरित होकर, उन्होंने 2005 में कीटों तथा कम्पोस्ट का उत्पादन बढ़ा दिया। इस प्रक्रिया में, उन्होंने ठोकरें खाकर कुछ सीखें हासिल कीं। एक बार उन्होंने मिट्टी के साथ 30 किलो केंचुए बेचने के लिए पैक कर दिए जो सौदा होने से पहले मर गए। इसके बाद उन्होंने कीटों को गोबर के साथ पैक कर बेचना शुरू किया। जब वॉटरशेड परियोजना द्वारा उसके अंतिम वर्ष में बड़ी संख्या में किसानों को और अधिक वर्मीकम्पोस्ट गड्ढे प्रस्तावित किए गए, तो केंचुओं की मांग और बढ़ गई। उन्होंने 275 किलो कीटों के विक्रय से (150 रुपये/किलो की दर से) 41,700 रुपये कमाए तथा 500 रुपये/क्विंटल की दर से 23 क्विंटल कम्पोस्ट बेचकर 11,500 रुपये कमाए। इससे सन 2005 में उन्हें कुल 53,200 रुपये की प्राप्ति हुई। इसके बाद उन्होंने वर्मीकम्पोस्टिंग गड्ढों की संख्या और बढ़ा दी। वे फसल के शेष भाग तथा कृषि सम्बन्धी व्यर्थ पदार्थों की तलाश में रहने लगे।

उनके खेत में पोंजेमिआ के चार पेड़, नहर के सहारे के पेड़ों से बायोमास एवं नीलगिरि की सूखी पत्तियों ने वर्मीकम्पोस्ट के गड्ढों के लिए कच्चे माल का काम किया। वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए गाय के गोबर की आवश्यकता को महसूस करते हुए, चन्द्रण्णा ने एक जोड़ी बैल, एक गाय तथा 20 मुर्गियां रखना शुरू कर दिया। आय लगातर बढ़ रही है। वर्ष 2006 में जिसमें ऐसा अकाल पड़ा जो पिछले 50 वर्षों में नहीं देखा गया था, चन्द्रण्णा ने 285 किलो कीट तथा 32 क्विंटल वर्मीकम्पोस्ट बेचकर 58,750 रुपये की कमाई कर ही ली। 2003 से उनकी कुल आय 1,38,050 रुपये हो गई है। वास्तविक आय इससे भी अधिक हो सकती है। उनके द्वारा कमाए गए 1.4 लाख रुपये उनके द्वारा दी गई रसीदों के ज़रिए रिकॉर्ड में दर्ज़ है। उनके अधिकतर ‘ग्राहकों’ में स्वयं सहायता समूह तथा बेल्लारी, चित्रदुर्ग, बगलकोट एवं बीजापुर ज़िलों के गैर सरकारी संगठन से आने वाले किसान हैं, जो बिल लेने पर ज़ोर देते हैं। लेकिन कई किसान ऐसे भी हैं जो बिल लिए बगैर कम्पोस्ट या कीट खरीदते हैं, जिसके कारण उनके साथ हुए विनिमय का कोई रिकॉर्ड नहीं है। अब वे स्वयं सहायता समूह को 100 रुपये प्रति किलो का विशेष भाव प्रस्तावित कर रहे हैं जबकि अन्यों के लिए यह 150 रुपये प्रति किलो है। पास के ग्राहकों को चन्द्रण्णा द्वारा बिक्री-उपरांत सेवा भी अतिरिक्त रूप से मिलती है। चन्द्रण्णा अपने ग्राहकों के खेतों में जातें हैं और यदि कीट संतोषजनक संख्या में जीवित नहीं रहते तो वे मुफ्त में कुछ और कीट उपलब्ध कराते हैं।

नाउम्मीद लोगों के लिए आशा की किरण

उनका लोकप्रिय नाम ‘नर्सरी चन्द्रण्णा’ अब बदलकर ‘वर्मीकम्पोस्ट चन्द्रण्णा’ हो गया है। एक छोटा सा मिट्टी का घर अब सीमेंट की दीवारों से बढ़ाया जा रहा है और साथ ही पिछवाड़े में वर्मीकम्पोस्टिंग के गड्ढों की संख्या भी बढ रही है। अब तक उन्होंने अपने गांव के कई किसानों को वैकल्पिक खेती के तरीके आज़माने के लिए तथा विशेष रूप से वर्मीकम्पोस्टिंग आज़माने के लिए प्रेरित किया है। छोटी सफलताओं को जनान्दोलन में बदलने के लिए आवश्यक उत्प्रेरक के रूप में गैर सरकारी संस्थाएं ठीक चन्द्रण्णा जैसे स्वप्रेरित किसानों की तलाश में रहते हैं। यह एकदम उचित प्रकार की इच्छा है जिसके द्वारा कम संसाधनों वाले गरीब किसान विषम परिस्थितियों से उबर सकते हैं।

बीहड खाद्यों का स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षण

दक्षिण भारतीय राज्य आंध्र प्रदेश के मेदक जिले के जहीराबाद इलाका डक्कन के पठार पर स्थित है। यहां की मिट्टी प्रमुख रूप से काली है, पर छोटे इलाके में रेतीली तथा कपास की उपज वाली काली मिट्टी भी पाई जाती है। औसतन वर्षा 700 से 850 मि.मी होती है जो अनिश्चित और असमान रूप से वितरित होती है। लाल मिट्टी में प्रायः 6-8 इंच से अधिक की गहराई नहीं होती। इस प्रकार के कृषि-जलवायविक कठिनाइयों से मुकाबला करने के लिए किसानों ने कई रणनीतियां विकसित की हैं, जिनमें एक है कृषि विविधता।

डक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी (डीडीएस), मेदक जिले के ग्रामीण इलाकों में काम कर रहा है, जो एक जमीनी स्तर का एक स्वैच्छिक संगठन है। यह पिछ्ले डेढ़ दशकों से ग्रामीण गरीबों की जिंदगी को उन्नत करने के लिए बीहड खाद्यों की भूमिका की तलाश कर रहा है। सब्जियों, हरियाली तथा बेरी जैसे लगभग 80 बीहड खाद्यों की पहचान की गई है तथा उन्हें वर्गीकृत किया गया है।

इनमें से अधिकतर ऐसी दलित महिलाओं द्वारा उपजाए जा रहे हैं, जो अपने समुदाय के हाशिए पर रहते हैं। अपनी जीविका चलाने के लिए वे कृषि श्रमिकों के रूप में काम करती हैं। खेतों में फ़सलों की विविधता से उन्हें प्रतिकूल जलवायविक स्थितियों से उबरने में मदद मिलती है तथा अच्छी उपज भी मिलती है। वे एक बार में कम से कम 8 से 12 फ़सलों की खेती कर लेती हैं।

हरियाली (ग्रीन)- पोषकों का प्रचुर स्रोत

ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए, खासकर गरीबों के लिए बीहड हरे खाद्य के प्रमुख स्रोत हैं। भोजन के प्रमुख स्रोत होने के अलावा वे गरीबों के पोषण का मुख्य स्रोत भी हैं। कई प्रकार की हरी पत्तियां सब्जियों के रूप में खाई जाती हैं और अधिकतर में कैल्शियम, आयरन, कैरोटीन, विटामिन सी तथा फॉलिक अम्ल प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये हरे खाद्य कई पोषकों के लिए कीमती स्रोत होती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। इन हरियालियों का जम कर सेवन किया जाता है, खासकर गर्भवती तथा नर्सिंग महिलाओं और बच्चों द्वारा।

संगम डे केयर सेंटर में प्री-स्कूल के बच्चों को प्रतिदिन कई प्रकार की हरियालियां खिलाई जाती हैं, जो अनाजों, दालों या रोटियों के साथ दी जाती है। इस प्रकार आरंभिक निर्माण वर्षों से ही बच्चों को सबसे सुरक्षित तथा ज्ञात स्रोत से स्थानीय, विविध, स्वादिष्ट तथा पोषण भोजन की प्राप्ति हो जाती है। हर दिन वे इन हरियालियों को खेतों, खेरों तथा बगियों से चुन कर लाते हैं। सभी महिलाएं जो खरपतवार उखाड़ने जाती हैं, पकाने के लिए हरियाली भी साथ ले आती हैं।

गरीबों के स्वास्थ्य के प्रति इन हरी सब्जियों के योगदान को समझने के लिए बीहड हरी पत्तिदार सब्जियों पर वैज्ञानिक शोध किए जाते रहे है । अगस्त तथा सितम्बर के सबसे उपयुक्त महीनों में महिलाओं की मदद से इन हरियालियों को सीधा खेत से चुनवाया जाता। उनका विश्लेषण हैदराबाद के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्युट्रिशन में किया गया, जो उनमें मौजूद पोषक तत्त्वों की पता लगाने के लिए किया गया। नतीजों से पता चलता है कि सबसे अधिक बीहड हरे जोनाचमचली के प्रति 100 खाद्य हिस्से में 3237 मि.ग्रा कैल्शियम तथा 111.3 मि.ग्रा आयरन मौजूद होता है। जबकि अदावी पुलाकुरा, जो सालों भर उपलब्ध रहता है, इसमें भी प्रति 100 ग्राम पत्ती में आयरन तथा कैल्शियम क्रमशः 139 मि.ग्रा 331 मि.ग्रा की मात्रा होती है और तुम्मीकुरा, जो बहुत महत्वपूर्ण और अधिक परिवारो द्वारा ग्रहण किया जाता है, 100 ग्राम पत्तियो से 81.6 मि. ग्रा. आयरन प्रदान करता है. प्राप्त नतीजों से यह साबित होता है कि हमारी महिलाओं की जानकारी तथा बुद्धिमत्ता कहीं अधिक है।

फ़सल विविधता का उत्सव

किसान अपने खेतों में मौजूद इस बड़ी विविधता का कई रूपों में उत्सव मनाते हैं, जबकि ऐसा करते हुए वे अपने खेतों में मौजूद हरियाली के लिए भी काफी उत्साहित रहते हैं। उत्सव का ऐसा ही एक उदाहरण है “शूनयम पांडुगा”, जो दिसम्बर के महीने में मनाया जाता है। इस समय अधिकतर खरीफ़ तथा रबी फ़सल पकने के चरण में होती है। किसान समुदाय धरती माता के पूजा करते हैं, जिसमें वे खेतों में विशेष त्योहार वाले गीत गाते हैं, और उस समय उपलब्ध 20 से अधिक बीहड हरे खाद्य से बने भोज्य पदार्थ का चढ़ावा चढ़ाते हैं।

निष्कर्ष

अनुभव से पता चलता है कि बीहड पौधे इस क्षेत्र के भोजन प्रणाली के अभिन्न भाग होते हैं। पारिस्थितिक तंत्र में कृषि विविधता की सुरक्षा तथा कृषि पद्धतियां (मिश्रित खेती, बहु-खेती, तथा कीटनाशियों इत्यादि का इस्तेमाल न करना) हमारी संस्कृति में बीहड भोजन की निरंतरता बनाए रखेंगी। ये कारक गरीबों को तो खास फायदेमंद है ही साथ ही अधिसंख्य लोगों के लिए तथा भोज्य पदार्थ पर स्थानीय नियंत्रण के लिए भी अहम है। ये बीहड खाद्य प्राकृतिक रूप से सुरक्षित होते हैं, बीटा कैरोटीन, विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन इत्यादि जैसे सूक्ष्म तत्व से भरपूर होते हैं। इसलिए खेती के स्थान पर तथा कृत्रिम माध्यमों के पूरक के रूप इन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

बी सैलोम येसुदास
डक्कन डेवलपमेंट सिसाइटी (डीडीएस), पास्तापुर, जहीराबाद, मेदक जिला, आंध्र प्रदेश, भारत।

स्रोत : LEISA India, Vol 6-1

मेंतापल्ली में दाल मिल ने दी पोषण सुरक्षा

आंध्र प्रदेश का महबूब नगर, अर्धशुष्क भारत के अन्य गांव जैसा ही है। यहां 650 मि.मी वर्षा होती है, जो जून से सितम्बर माह के बीच अनिश्चित तरीके से वितरित होती है। इस गांव में प्रमुख रूप से छोटे तथा सीमांत किसान रहते हैं, जो अपने सूखे खेत में एक ही मौसम में फ़सल उपजाते हैं। शुष्क समय के दौरान किसान रोजगार की तलाश में दूर-दराज के इलाकों की ओर चल पड़ते हैं। अरहर यहां की मुख्य फ़सल है, साथ ही ज्वार तथा मक्के की भी खेती की जाती है। जीवाणु जनित उक्टा रोग मिट्टी से पैदा होने वाला मुख्य पादप रोग है, जिससे फ़सलों की गंभीर हानि होती है।

ICRISAT (International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics) के जीविकोपार्जन कार्यक्रम के हस्तक्षेप से किसान अब अरहर की न मुरझाने वाली किस्म ‘आशा’ की खेती कर सकते हैं। यह जीवाणु जनित उक्टा रोग के प्रति बहुत हद तक सहनशील है, साथ ही स्थानीय प्रजाति से 20 से 30% अधिक उपज देती है। अरहर की कटाई के बाद पारंपरिक रूप से इसे हाथ से चलाए जाने वाली चक्की में डाला जाता था। यह काम सामान्यतः पुरुषों द्वारा किया जाता था। गांव से पुरुषों के प्रवास बाद से यह प्रथा कम होती चली गई। इसके विपरीत कि यह गांव बड़ी मात्रा में अरहर का उत्पादन करता था, जिसे बाजार में 12 से 14 रु. प्रति किलो की दर से बेचा जाता था और घर के उपयोग के लिए 22 रु. प्रति किलो की ऊंची कीमत पर दाल खरीदी जाती थी।

ICRISAT वाटर टीम ने मेंतापल्ली की इस ‘सस्ती बिक्री और महंगी खरीद’ की प्रथा को खत्म करने का फैसला किया और इस बारे में गांव वालों से बातचीत की। ग्रामीण अरहर के दाने से दाल बनाने के लिए तैयार हो गए। मेंतापल्ली में जलग्रहण कार्यक्रम चलाने वाले एक एनजीओ सोसाइटी फॉर डेवेलपमेंट ऑफ ड्रॉट प्रोन एरिया (SDDPA) ने स्वयंसेवी महिलाओं को एकजुट करना आरंभ कर दिया। इस प्रकार गांव में एक मामूली-सी दाल मिल स्थापित की गई। उसे स्थापित करने के बाद किसानों को मशीन चलाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया।

बिजली की बिल चुकाने के लिए स्व-सहायता समूह ने रुपए इकट्ठे किए। इसने एक किलो दाल बनाने की दर तय की। इस प्रकार ग्रामीण सही कीमत पर अपने अरहर के दानों से दाल निर्माण करने लगे, साथ ही उन्हें पौषण से भरपूर चारे के लिए भूसी भी प्राप्त होने लगी। हालांकि गांव में बनी दाल को बाजार में अच्छी कीमत नहीं मिल पाती, क्योंकि इसमें चमक और रंग नहीं होते। इसलिए इस दाल का प्रयोग घरेलू उपयोगों में ही किया जाने लगा। चूंकि ‘आशा’ अच्छी तरह से पकती है, इसलिए महिलाएं भोजन में इसका इस्तेमाल करना पसंद करती थीं।

अब यही मिल बड़ी मात्रा में अरहर के दानों से दाल का निर्माण (90% प्राप्ति के साथ) कर रही है, और किसानों के चेहरे पर मुस्कराहट आ चुकी है। महिलाएं खुश हैं क्योंकि वे अपनी फ़सल से स्वादिष्ट दाल बनाकर खाने को मिल रही है। साथ ही उन्हें यह कम कीमत पर और अच्छी पोषण मात्रा के साथ उपलब्ध हो रही है, क्योंकि दाल प्रोटीन की सस्ता स्रोत है।

सफलता तथा प्रसार

दाल मिल की सफलता के लिए तीन कारक जिम्मेदार रहे। पहला, मिल का संचालन काफी आसान था, और गांवों में दिखने वाली आटे चक्की जैसी ही थी। दूसरा, अरहर के दाने को तोड़ने की विधि गांव वालों के लिए आसान थी, जिसमें उन्हें रात में दानों को पानी में भिंगोता पड़ता है और 2-3 दिनों तक धूप में सुखाना होता है, फिर उन्हें मिल में डाला जाता है। और तीसरी बात यह है कि यह दाल मिल सिंगल-फेज पॉवर सप्लाइ से चलती है, जो मेंतापल्ली के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यहां बिजली के तीन फेज नहीं हैं।

इस दाल मिल की सफलता की कहानी आस-पास के गांवों भी फैल चुकी है। आस-पास के ग्रामीण अरहर लाकर इस मिल में दाल बनवा जाते हैं।

अब स्व-सहायता समूह मेंतापल्ली गांव के लिए एक मिल स्थापित करने की योजना में है, क्योंकि पहले से स्थापित दाल मिल को अब अन्य गांवों में स्थापित किया जाएगा। मेंतापल्ली में मिले नतीजों से उत्साहित होकर इस विचार को अब कुरनूल जिले के अन्य इलाकों में ले जाया जा रहा है, जहां अरहर की अधिक खेती होती है।

श्रीनाथ दीक्षित
क्रीडा ( CRIDA ), हैदराबाद, भारत

एसपी वानी तथा सीएच रविंदर रेड्डी
इकरिसेट (ICRISAT), पटेनचेरू, आंध्रप्रदेश, भारत

स्रोत : LEISA India, Vol 6-3

समुदाय द्वारा प्रबन्धित खाद्य वन

वनों तथा अन्य परितंत्र के क्षरण के साथ, गरीब परिवारों की आय के स्रोत धीरे-धीरे छिनते जा रहे हैं और इसके परिणामस्वरूप भोजन की भारी कमी तथा कुपोषण हो रहा है. उनकी तकलीफों में ऐसे देसी पेडों की विस्तृत किस्में विलुप्त होना जुड गया है जो ग्रामीण न केवल गरीब जनता को भोजन या फल (गूदेदार, जडें, विभिन्न किस्म की घास, शरबत आदि) प्रदान करते थे बल्कि पशुधन के लिए चारा भी प्रदान करते थे. भूमिहीन एवं गरीब परिवारों की स्थिति और बदतर हो जाती है जो प्राकृतिक आपदाओं के बाद असहाय स्थिति में होते हैं. उनके लिए जोखिम अधिक है क्योंकि उनके पास किसी त्रासदी से विनाश की भरपाई के लिए एक सामाजिक या वित्तीय सहारे की अतिरिक्त प्रणाली नहीं है.

food forest

खाद्य वन के मॉडल में, भूमिहीन या रोज़गारविहीन ग्रामीणों के समूह मिलकर लघु अवधि के लिए ऊसर ज़मीन पट्टे पर लेते हैं और पर्यावरणीय रूप से व्यवस्थित यथोचित बहुउद्देशीय वृक्ष लगाते हैं अर्थात विभिन्न पेडों, झाडियों, बेलों, घासों, कन्दों का सोच-समझकर किया गया मेल – जिनकी एक विशाल खाद्य भंडार होने के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध अधिक सहनशक्ति होती है और जो मौसमी उत्पादन के साथ भोजन, ईन्धन एवं चारे के साथ-साथ ऊंची गुणवत्ता का फर्नीचर बनाने के लिए अच्छे सिद्ध होते हैं. यदि जलाशय उपलब्ध हो तो मछली, बतख पालन अतिरिक्त विकल्प हैं. यह मॉडल त्रासदियों द्वारा उत्पन्न संकट को दूर करने में सफ़ल रहा है और समूह के सदस्यों को मत्स्यपालन, मुर्गीपालन एवं बतखपालन द्वारा अतिरिक्त आय की सम्भावना भी प्रदान करता है. इसके साथ ही एक तरफ तो यह सघन रूप से मिश्रित वृक्षारोपण से वनीकरण बढता है जो ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रतिरोध करता है, जैवविविधता का बचाव करता है वहीं दूसरी तरफ़ भूमिहीनों के लिए सम्पदा निर्मित करता है.

खाद्य वन पहली बार खोसकदमपुर गांव (ग्राम पंचायत कंकलिताला, ब्लॉक-बोलपुर स्रीनिकेतन, बीरभूम ज़िला - बंगाल) के गरीबों और भूमिहीनों के बीच आरम्भ किया गया था. DRCSC ने समुदाय के भूमिहीन गरीबों को इस शर्त पर ज़मीन की प्राप्ति के लिए PRI से विचार विमर्श के लिए संगठित किया कि ज़मीन से प्राप्त राजस्व का सरकार तथा समुदाय के बीच 25:75 के अनुपात में बंटवारा होगा. उपयोगकर्ता समुदायों की प्रजातियों के चयन, ज़मीन की तैयारी, बीजारोपण, पौधों की सुरक्षा, फ़सल की कटाई एवं उत्पादन के वितरण में भूमिका होती है. बीते सालों में समूह के सदस्यों ने पौधों की सुरक्षा एवं पालन किया और अब वे फ़ल तथा अन्य उपज प्राप्त कर रहे हैं, जिसे सदस्यों के बीच बराबर भागों में वितरित किया जाता है, विशेष रूप से किसी प्राकृतिक आपदा के बाद. जब कोई अन्य भोजन उपलब्ध नहीं होता है. सब्ज़ियां, दालें, दलहन आदि भी अंतरिम फ़सलों के रूप में उगाई जाती हैं जो न केवल मनुष्यों की रोज़मर्रा की आवश्यकता की पूर्ति करती हैं बल्कि पशुधन के चारे की ज़रूरतें भी पूरी करती हैं. इन प्रयासों की निरंतरता बनाए रखने के लिए खाद्य वन को मुर्गीपालन तथा बतखपालन के साथ एकीकृत किया गया है.

स्रोत : DRCSC न्यूज़लेटर, अंक 6

छोटा लेकिन सुन्दर

राखी तुरी, बोल्पुर कस्बे की झुग्गियों की गृहिणी भी भोलापुकुर के अल्पबचत एवं साख समूह की सदस्य है. उनके पति बिकाश तुरी एक रिक्शा चालक हैं. उनकी मासिक आय रु.1650 है जो 5 सदस्यीय परिवार के लिए बिल्कुल अपर्याप्त है. अनुसूचित जाति का यह परिवार भारत सरकार की गरीबी के रेखा के नीचे की सूची में भी दर्ज़ है. राखी को काम की तलाश थी जो उसे मिल नहीं पा रहा था. उस समय DRCSC ने इनोवेटिव चैलेंज फंड, KUSP के सहयोग से वर्मिकम्पोस्ट उत्पादन के उद्यम में हस्तक्षेप किया. राखी तुरी और उनके समूह ने इस उद्यम में अपनी रुचि दिखाई.

इस परियोजना का लक्ष्य था 15 महिलाएं प्रति समूह के साथ 5 समूह बनाना. ये समूह बोलपुर के बाज़ारों से सब्ज़ियों का अपशिष्ट एकत्रित करेंगे और व्यावसायिक रूप से वर्मिकम्पोस्ट बनाएंगे. भोलापुकुर 1 समूह की महिलाओं ने जमुबोनी के ‘सपोर्ट’ नामक संगठन की ज़मीन पर वर्मिकम्पोस्ट बनाने के लिए गड्ढे तैयार करने का निर्णय लिया.

वर्मिकम्पोस्ट बनाने के लिए महिला सदस्यों को प्रशिक्षण दिया गया. परिवारों के पुरुषों ने भी बाज़ारों से सब्ज़ियों का अपशिष्ट एकत्रित करने में मदद की. महिलाओं ने पुआल, गोबर आदि इकट्ठा करना आरम्भ किया. उन्होंने ऊंची गुणवत्ता के वर्मि से वर्मिकम्पोस्ट बनाना आरम्भ किया. उन्होंने अपने उत्पाद के लिए ‘बसुन्धरा वर्मि कम्पोस्ट’ नाम तय किया. पहले महीने में 2 कुंडों से कुल 400 किलो उत्पादन हुआ. अब उनका उत्पाद बेचने के लिए पहल करने का समय आ गया था. यह तय किया गया कि बाज़ार भाव रु.10 प्रति किलो होगा. भविष्य में गड्ढे निर्मित करने के लिए विक्रय के बाद रु.1000 की बचत कर बैंक खाते में जमा किए जाएंगे. बची हुई राशी को सदस्यों के बीच बराबर भागों में वितरित कर दिया जाएगा.

स्रोत : ड्र्कस समाचारपपत्र, प्रति 6

कृषि कार्यों में कीट प्रबंधन की नई परिभाषा

- जी. वी रमनजनेयुलु तथा ज़ाकिर हुसैन

यह आंध्र प्रदेश के खम्माम जिले के पुनुकुला गांव की कहानी है, जहां के लोगों ने पांच वर्षों (1999 से 2003) के प्रयास से कीटनाशियों से पूरी तरह छुटकारा पा लिया। आज ग्रामीण रासायनिक कीटनाशियों का जरा भी प्रयोग नहीं करते- बल्कि वे अपने जिले के अन्य किसानों को भी ऐसा ही करने और अपनी जीविका को उन्नत बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। पंचायत ने एक प्रस्ताव पास किया है कि वहां कीटनाशियों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

पुनुकुला

कुछ समय से पुनुकुला की मुख्य फ़सल कपास रही थी। इसकी खेती मोनोकल्चर के रूप में की जाती थी तथा फ़सलों की सुरक्षा के लिए बड़ी मात्रा में कीटनाशियों का प्रयोग किया जाता था। इससे अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हो गई, जैसे विषाक्तता की घटना, जिसमें लोग जीवन भर के लिए अपंग हो गए तथा उन्हें अपने स्वास्थ्य पर काफी खर्च करना पड़ गया। अन्य समस्या थी, कीटनाशियों की खरीद के लिए लोगों द्वारा लिया गया उधार। इन उधार राशियों से किसानों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

परिवर्तन की बयार

वर्ष 1999 में एक स्थानीय एनजीओ SECURE (सोशिओ-इकोनोमिक एंड कल्चरल अपलिफ्टमेंट इन रूरल एन्वायरनमेंट) ने ग्रामीणों के जीविकोपार्जन के साधनों का अध्ययन किया। उस अध्ययन से यह पता चला कि खेती से जुड़ी कई समस्याओं से उन्हें जूझना पड़ रहा है, जैसे निवेश के लिए मदद की कमी, हर साल होने वाला ऊंचा खर्च, बाजार की मदद न होना, ऋणग्रस्तता इत्यादि। यह जानते हुए कि कपास में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशी ही इन तरह की कई समस्याओं की जड़ है, संगठन ने गैर-कीटनाशी प्रबंधन (NPM) पर कार्य करना आरंभ कर दिया। फिर NPM प्रोजेक्ट का क्रियांवयन हैदराबाद स्थित ‘सेंटर फॉर वर्ल्ड सॉलिडैरिटी’ज सस्टेनेबल एग्रीकल्चर विंग’ (अब इसे सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के नाम से जाना जाता है) द्वारा किया गया।

आरंभिक हिचक

जब SECURE के कर्मचारियों ने किसानों को अपने गैर-कीटनाशी तकनीकों के बारे में बताया तो पहले-पहल लोग उसे लेकर सशंकित थे। आरंभिक हिचकिचाकट को याद करते हुए श्री हेमला नायक कहते हैं, “मैं कैसे विश्वास करता कि जो कीड़े जहरीले कीटनाशियों से नहीं मरते, उन्हें हम नीम से नियंत्रित कर सकते हैं, जिससे मैं रोज दातुन किया करता था।” पर धीरे-धीरे लोगों ने फर्क महसूस शुरु कर दिया।

सफलता का मीठा स्वाद

NPM के तरीकों के अपनाए जाने के पहले साल ही सकारात्मक अंतर दिखाई पड़ने लगा। वर्ष 2001-02 में गैर-कीटनाशी प्रबंधन को 6.4 हेक्टेयर पर आजमाया गया, जिसमें पुनुकुला के 8 कपास किसान शामिल हुए। अरहर की फसल पर इसे 7 हेक्टेयर पर आजमाया गया जिसमें 3 किसान शामिल हुए। अच्छे नतीजों को देखते हुए दूसरे साल और भी किसानों ने इस प्रयास में अपनी भागीदारी दिखाई। किसानों को उनके जिले में जानकारी हेतु भ्रमण भी करवाया गया। गांव में कई प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। धीरे-धीरे बात फैलती गई और लोगों ने कीटनाशी मुक्त होने का संकल्प ले लिया। वर्ष 2002-03 तक तो NPM के प्रयास को धान, अरहर, कपास तथा मिर्च पर आजमाया जाने लगा। अब किसानों की संख्या भी बढ़कर 59 हो गई थी तथा अब 58 एकड़ भूमि पर यह प्रयास चलाया जाने लगा। वर्ष 2003-04 में पुनुकुला तथा पुलाइगुडम गावों में NPM के उपयोग वाली जमीनों का रकवा 480 ha. तक जा पहुंचा, जिसमें पुनुकुला के कपास की खेती वाली सभी भूमि आ चुकी थी। मिर्च की खेती में कीटनाशियों के प्रयोग के रुकने से उनकी गुनवत्ता भी बढ़ी तथा बाजार में अब उनके अच्छे मूल्य मिलने लगे।

प्रभाव

वर्ष 2004-05 तक गांव लोगों ने कीटनाशी डीलरों के पास जाना ही छोड़ दिया। ग्राम पंचायत ने एक प्रस्ताव पारित कर इसे कीटनाशी मुक्त पंचायत घोषित किया और आगे भी रहने का वादा किया। दो सालों में ही गांवों के किसान अपने पहले के कर्ज से मुक्त हो गए। उधार खत्म हो जाने के बाद अब किसान अधिक से अधिक प्राकृतिक विधियों के प्रयोग के इच्छुक हैं तथा उन्हें अधिक से अधिक फ़सलों पर इस्तेमाल करना चाहते हैं। खेतों में पारिस्थितिक संतुलन कायम हो चुका है। किसानों के स्वास्थ्य में वृद्धि हुई है। वर्ष 2004 में महिला समूहों ने पुनुकुला में नीम के बीज पीसने की एक मिल स्थापित की। यह कार्य पंचायत तथा सेंटर फॉर वर्ल्ड सॉलिडैरिटी की मदद से पूरा किया गया, जिसने इसे निवेश में मदद की। इस मशीन के संचालन में दो महिलाओं को पूर्णकालिक रोजगार मिला।

प्रयास का हुआ तीव्र प्रसार

पुनुकुला के 174 किसान तथा पुलाइगुडम के 120 किसानों ने मिलकर इस नए कीट प्रबंधन के बारे में अन्य लोगों को भी समझाया और उन्हें इससे प्राप्त को भी बताया।

गांव

रकवा

औसत उपज

प्रति हे. खेती में लगी औसत लागत

प्रति हे. औसत शुद्द आय
Income per ha

पुनुकुला तथा पुलइगुडम

480 ha

30 q/ha

Rs. 21408/ha

Rs. 52593/ha

जी. वी रमनजनेयुलु तथा ज़ाकिर हुसैन (Dr. G. V. Ramanjaneyulu and Zakir Hussain)
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर 12-13-445, स्ट्रीट न. 1, टर्णका, सिकंदराबाद-500 017, आंध्र प्रदेश, भारत।

स्रोत : LEISA India, Vol 8-2

किसानों द्वारा बाज़ार का संचालन - एक सामूहिक प्रयास

तमिलनाडु के पेराम्बलुर जिले के शुष्क ज़मीन के क्षेत्र में मक्का का विस्तृत फैलाव एक आम दृश्य है। ऐसे क्षेत्र में जो पारंपरिक रूप से कपास तथा मूंगफली उगाता था, विभिन्न कारकों ने मिलकर किसानों को मक्का की खेती की ओर प्रोत्साहित किया। कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण कपास की खेती उतनी लाभकारी नहीं रह गयी थी। मानसून के आगमन में देरी से उचित समय पर मूंगफली की बुआई नहीं हो पाती था जिसके कारण उपज में कमी हो रही थी। इसलिए मक्का की खेती को तुलनात्मक रूप से आसान उपाय समझा जा रहा था, जिसके साथ पशुओं के खाने की मांग की पूर्ति भी जुड़ी हुई थी।

इस परिदृश्य में एएमई फ़ाउन्डेशन की त्रिची इकाई ने मई 2005 में पेराम्बलुर जिले के कुन्नम तालुका के चार गाँवों के किसानों के समूहों के साथ काम करना शुरू किया। इस प्रयास का ध्यान मक्का की उपज में वृद्धि तथा उत्पादन मूल्य कम करने पर केन्द्रित था। लेकिन, किसानों के साथ विचार-विमर्श से यह बात सामने आई कि बढ़ती लागत के अलावा उत्पाद के विपणन में खर्च के कारण होती नुकसान किसानों की घटती आय का एक प्रमुख कारण था। इसलिए, उत्पाद के रूप में मक्का के विपणन पर ध्यान केन्द्रित किया गया।

farmers weighiting

वर्त्तमान विपणन पद्धतियाँ

किसान गाँव में ही व्यापारियों को अपना उत्पाद बेच देते थे। फसल कटाई के समय, उत्पाद खरीदने के लिए व्यापारी पेराम्बलुर से गाँव में आते हैं। वे अपने साथ वज़न करने की मशीनें, बोरे लाते हैं तथा शहर में तुंरत मक्का ले जाने के लिए स्वयं परिवहन की व्यवस्था करते हैं। वे उत्पाद का वज़न करते हैं, इन्हें 100 किलो की बोरियों में भरकर लॉरियों से बेचने के लिए पेराम्बलूर ले जाते हैं।

मक्का का उत्पादन चाहे कम हो या ज़्यादा, यह प्रक्रिया एक समान होती है। दिया गया मूल्य, मौसम पर निर्भर करता है। फरवरी तथा मार्च में कटाई के समय मूल्य कम होता है। चूंकि किसान कटाई के तुंरत बाद अपना उत्पाद बेच देते हैं, सामान्यतः उन्हें बाज़ार में माल की बहुतायत के कारण मूल्य कम मिलता है। फिर भी, चूंकि किसानों के पास उत्पाद के भण्डारण की सुविधा नहीं है, वे अपने उत्पाद को कम मूल्य पर बेचने के लिए मजबूर हैं। बदले में, वे मक्के से तैयार पशुओं के भोजन के लिए अधिक मूल्य चुकाते हैं। यह देखा गया है कि मक्का का वज़न तौलना एक मुख्य मुद्दा है जिसमें किसान फंस जाते हैं। वज़न तौलने में कई धांधलियां होती हैं। उसपर किसानों का ध्यान ही नहीं जाता। लेकिन अधिकाँश मामलों में किसान असहाय, मूक दर्शक बने रहते हैं। इस तरह अतिरिक्त मक्का लेकर बिचौलिए 14 टन वज़न पर 1000 रुपये तक बना लेते हैं। इस गलत तरीके पर रोक लगाने के लिए किसान पहले से तोले गए बोरों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इसका नतीजा यह होता है की व्यापारी ऐसे गाँवों में बहुत मुश्किल से आते हैं।

मक्का तौलने में आम धांधलियां

  • प्रत्येक बोरे पर व्यापारी द्वारा लगभग आधा किलो मक्का नुकसान के रूप में ले लिया जाता है, जिसका आमतौर पर किसानों द्वारा विरोध नहीं किया जाता है।
  • गड़बड़ी किए गए वज़न के तौल-कांटे, जिनसे प्रति बोरा कम से कम 1 किलो का अंतर आता है।
  • वज़न तौलते समय बोरों से छेड़छाड़, जिससे प्रत्येक बोरे पर 2 से 8 किलो का फर्क आ जाता है।
  • आम तौर पर तौल देर शाम को की जाती है जबकि किसान वज़न साफ़ तरीके से नहीं देख पाते हैं। पहले बोरों को तौलना तथा कमी-बेशी के नाम पर अतिरिक्त मात्रा डालना भी आमबात है।
  • आये हुए हम्माल बोरों का वज़न करते हैं तथा किसानों को इसकी अनुमति नहीं दी जाती।
  • गड़बड़ी किये गये वज़न के तौल-कांटे, जिनसे प्रति बोरा कम से कम 1 किलो का अंतर आता है।
  • वज़न तौलते समय बोरों से छेड़छाड़ जिससे प्रत्येक बोरे पर 2 से 8 किलो का फर्क आ जाता है।

व्यापारियों द्वारा इस प्रकार के शोषण के लिए शायद किसान स्वयं जिम्मेदार हैं। आमतौर पर किसान अधिक मूल्य तथा स्थानीय व्यापारियों द्वारा बोरे दिए जाने के वायदे से बहक जाते हैं। वे गलत वज़न की वज़ह से होने वाले नुकसान को आसानी से नहीं समझ पाते। छोटे किसानों के पास बहुत कम फसल होती है तथा वह वे मोल-भाव करने की स्थिति में नहीं होते। साथ ही, पैसों की तुंरत आवश्यकता होने की मजबूरी की वजह से स्थिति को और बिगड़ जाती है। वे, जिनके पास मक्के की अधिक मात्रा होती है, जो कि बोरों तथा भण्डारण के स्थान की कमी के कारण उसे नहीं रख सकते, बराबर रूप से प्रभावित होते हैं।

पहला कदम आगे बढ़ाना

समूह तथा एएमई फाउंडेशन की मदद के आधार पर, पर्मातुकुडिकाडु जिले के विनायागा समूह के किसानों ने नाम्माक्कल की कुक्कुट आहार इकाई को मक्का सीधे बेचने का फैसला किया। यह इकाई, गाँव से लगभग 160 किलोमीटर दूर स्थित थी। शुरुआत में दो किसान 14 टन (एक लोड) मक्का नाम्माक्कल पोषण संयंत्र ले गए।

सीधे विपणन का पहला अनुभव होने के कारण किसानों को कई परेशानियां उठाना पड़ी। सबसे पहले, हम्मालों ने किसानों की मजबूरी देखते हुए अपना मेहनताना दुगुना कर 5 रुपए से 10 रुपए कर दिया। अपने यूनियन का लाभ वे ऐसे नए लोगों से अधिक वसूली के द्वारा लेते थे। गाँव में हम्माली के लिए बाहरी लोगों को नहीं आने दिया जाता। दूसरे, मौसम शीर्ष पर होने के चलते परिवहन शुल्क 25% बढ़ा दिया गया, साथ ही पोषण कंपनियों ने कम मूल्य पर खरीद का प्रस्ताव दिया। कम मूल्य पर खरीद का प्रस्ताव देने के लिए पोषण कंपनियों ने नमूनों में नमी के आंकड़े में हेरफेर करने की कोशिश की। मौसम शीर्ष पर होने के चलते बोरों के मूल्य में भी 50% वृद्धि कर दी गयी। लेकिन, इन सब परेशानियों का मुकाबला स्वामी कंपनी द्वारा किसानों की मदद के लिए व्यक्तिगत रूचि दिखाए जाने से किया जा सका। किसानों ने जिन अन्य जोखिमों का अंदाजा लगाया, वे थे - वर्षा के कारण उत्पाद को होनेवाला नुकसान, परिवहन व्यवस्था में गड़बड़ी के कारण देरी, कंपनियों द्वारा गलत कारण देना, जैसे कि पड़ोसी राज्यों से सस्ता मक्का आना तथा लॉरी की दुर्घटना या ब्रेकडाउन होना। वह केवल किसानों के समूह का दृढ़ संकल्प ही था जिसके फलस्वरूप वे ऐसी विषम परिस्थितियों से पार पा सके।

इन सब व्यवधानों के बावजूद किसानों को बहुत लाभ हुआ। तौलकांटे पर वज़न करने में ही 14 टन के एक लोड में 610 किलो का अतिरिक्त योगदान हो गया। धनराशि के रूप में यह 3375 रुपये था। निश्चित रूप से कीमत का लाभ मिला। मक्का 555 रुपये/क्विंटल बेचा गया। गाँव में कीमत 500 रुपये/क्विंटल प्रस्तावित की गयी थी। यद्यपि किसानों को विपणन का अतिरिक्त खर्च वहां करना पड़ा, फिर भी उनकी शुद्ध प्राप्ति 3.2 % बढ़ गयी। इस पहल के द्वारा किसानों ने प्रति बोरा 13.30 रुपये अतिरिक्त अर्जित किए। यदि किसानों द्वारा ऑफ़ सीज़न में बोरे खरीदे जाएं तथा लदाई एवं परिवहन के ठेके पहले से सुनिश्चित कर लिए जाएं तो शुद्ध आय 50 % तक बढ़ने की संभावना है। आर्थिक लाभ के अलावा, किसान इस पहल से प्राप्त अनुभव एवं ज्ञान को मूल्यवान समझते हैं।

पदचिन्हों पर चलना

दो किसानों द्वारा उठाए गए साहसिक कदम को देखकर समूह के अन्य किसान भी समान प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रेरित हुए। दुर्भाग्य से, बर्ड फ्लू के कारण, नामाक्कल की कई कुक्कुट पालन इकाईयां बंद हो गईं, जिसके कारण मक्का का भाव अत्यधिक गिर गया। आशा छोड़े बिना, किसानों ने वैकल्पिक रणनीतियां बनायी।

समूह चर्चा में किसानों ने मूल्य स्थिर होने की राह देखने का फैसला किया। जिन्हें पैसों की आवश्यकता थी, उन्हें समूह के सदस्यों ने मदद की। चार समूहों के लगभग 50 किसानों ने बेहतर मूल्य मिलने तक इंतज़ार करने का फैसला किया। उन्होंने विपणन को 2 महीनों तक रोके रखा एवं उसके बाद अपने उत्पाद स्थानीय डीलरों को बेच दिए। इससे प्रत्येक किसान को 10 रुपये प्रति बोरा का लाभ मिला तथा उनकी औसत आय 300 रुपये बढ़ गयी। सामूहिक विपणन के प्रयासों से किसान पूरी तरह तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक वज़न तौलने की अनियमितताओं को कम करने में सफल हुए।

जिन किसानों के पास पशु थे, वे अपने उत्पाद को पशुओं का भोजन बनाने में इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित हुए। किसानों को मक्का तथा अन्य उपलब्ध चीज़ों जैसे जवार, मूंगफली तथा तिल से पशुओं का भोजन तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। इसके फलस्वरूप चार समूहों के 30 किसानों ने बाहर से खरीदने के बजाय पशुओं का भोजन स्वयं तैयार किया। उत्पादन का औसत मूल्य 8 रुपये/किलो था जो कि व्यावसायिक तौर पर उपलब्ध वस्तु के मूल्य 13 रुपये/किलो से काफी कम था। इस पहल से किसानों द्वारा पशुओं के भोजन की खरीद में औसतन 200 रुपये/महीना/गाय की कमी हासिल की गयी। किसानों ने दूध के गाढेपन में भी बढ़त देखी, जो कि वसा का प्रतिशत बढ़ने से होती है।

सीधे विपणन पर व्यय तथा उससे प्राप्तियां- रुपयों में-

क्रमांक

गतिविधि

पूर्व प्रथा

सीधा विपणन

अंतर

1

तोले गए मक्का की मात्रा (किलोग्राम)

14000.00

14610.00

4.3%

 

व्यय

 

 

 

 

सामान (बोरे)

 

1667.50

 

 

लदाई का व्यय

 

1450.00

 

 

परिवहन

 

5440.00

 

 

अन्य

 

266.00

 

2

कुल व्यय

 

8823.00

 

3

कुल प्राप्तियां

70000.00

81085.50

15.8%

4

शुद्ध प्राप्तियां

70000.00

72262.00

3.2%

स्रोत : AME फ़ाउन्डेशन

महिलाओं के लिए फार्मर फील्ड स्कूल आईपीएम-एफएफएस का टमाटर के लिए अनुभव

धरमपुरी जिले के कोत्तूर, सीरिअम्पट्टी एवं ईचाम्पल्लम गाँवों में टमाटर मुख्य नकदी फसल है। इस फसल में अत्यधिक मजदूरी लगने के कारण, गाँवों में टमाटर की खेती रोज़गार का भी एक ज़रिया है। इन गाँवों में किसान मुख्य रूप से महँगी बाहरी लागत से टमाटर की खेती करते हैं। रासायनिक खाद तथा कीटनाशक बगैर सोचे-समझे इस्तेमाल किए जाते हैं, जिससे लागत मूल्य बढ़ता है। आमतौर पर खेती के पर्यावरण-मित्र तरीकों को किसानों द्वारा अपनाए जाने के में समर्थ करने तथा विशेष रूप से लागत मूल्य कम करने के लिए उन्हें खेती के वैकल्पिक तरीकों के लिए सशक्तीकृत करना आवश्यक था। इस उद्देश्य के लिए खोज द्वारा सीख की पद्धति, फार्मर फील्ड स्कूल (FFS) सबसे अधिक उपयुक्त मानी गयी।

प्रक्रियाएं

एग्रोइको सिस्टमविश्लेषण(AESA)
प्रतिभागियों के सीखने तथा अनुभव के लिए 0.64 एकड़ के एक प्लाट का उपयोग किया गया। किसानों के अभ्यास, मानकों, दीर्घकालीन प्रयोगों तथा आईपीएम विकल्पों के लिए प्रयोग निर्धारित किए गए। चौले जैसी अंतर-फसल तथा मक्का जैसी बाड़ की फसल, गेन्दा तथा बाजरा कीट प्रबन्ध के लिए तथा अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में लगाई गई।
खेतों में एईएसए के साप्ताहिक अवलोकन समूह चर्चाओं के आधार थे, जिनसे अनुभव बांटना तथा निर्णय लेने की बेहतर क्षमता का विकास हुआ। पोषक तत्वों के प्रबन्ध, कीटों की प्रदर्शनी, आधी सड़ी घास एवं पत्तियों की भरपाई पर छोटे अध्ययन किए गए ताकि प्रतिभागियों को प्रत्यक्ष अनुभव हो।

ग्रुप डायनेमिक्स समूह की गतिविधियाँ
ग्रुप डायनेमिक्स टीम विकास एवं समस्याएं सुलझाने की दक्षता विकसित करने के लिए एफएफएस प्रक्रिया का एक भाग थी। अनुभव बांटने के लिए  एफएफएस प्रतिभागियों ने आगे बढ़कर गांव की अन्य समूह चर्चाओं में भाग लिया। एफएफएस के समापन के समय एक फील्ड दिवस आयोजित किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने पड़ोस के पांच गांवों के टमाटर उत्पादकों के साथ अपने अनुभव बांटे।

कार्य प्रणालियाँ

नर्सरीलगाना
विशेष रूप से रेज्ड बेड पद्धति से नर्सरियों में टमाटर की कोपलें लगाने से किसानों को उसके द्वारा मिट्टी के कीटाणुओं से लड़ने तथा स्वस्थ कोपलें प्राप्त करने के लाभों के बारे में समझने में मदद मिली। नर्सरियों में एक कतार में बुआई से खर-पतवार निकालने में मदद मिली।

बाड़कीफसलें तथारोधीफसलें
टमाटर हमेशा अकेली फसल के रूप में लगाया जाता रहा था। एफएफएस से पहले किसानों की धारणा थी कि मध्यवर्ती फसलें टमाटर के लिए नुकसानदेह थी तथा कीटों को आकर्षित करती थी। एफएफएस में भाग लेकर प्रतिभागियों ने पहली बार टमाटर में अन्य फसलों का महत्व समझा एवं उनकी गलत धारणाएं दूर हो गयी। मक्का एवं बाजरा जैसी बाड़ की फसलों ने सफ़ेद कीड़े रोधी के रूप में कार्य किया। एक जाल फसल के रूप में गेंदा, फसल छिद्रक वयस्कों को अंडे देने के लिए आकर्षित करती है तथा उन्हें लोबिया भोजन के स्रोत के रूप में उपलब्ध कराई जाती है।

आधीसड़ीघास (मल्चिंग ) सेप्राप्त कईलाभ
आधी सड़ी घास (मल्चिंग) के लाभ को समझना एक महत्वपूर्ण सीखों में से एक था। खेत की बची हुई वस्तुएं जैसे गन्ना, चावल की बची हुई खाली तथा नारियल की पट्टियां, टमाटर के खेत में सड़ी घास के रूप में इस्तेमाल की गयी। किसानों ने देखा की सड़न प्रक्रिया से ज़मीन की नमी बनी रहती है, जिसके निम्न फायदे हुएः

  • लाल कीड़ों में अत्यधिक कमी, जो कि फसल को काफी नुक्सान पहुंचाते थे,
  • सिंचाई की आवृत्ति में कमी (3-4 दिन में एक बार से 7 दिन में एक बार)
  • उत्पादन के मानदंडों, जैसे कि पत्तियों की संख्या, पौधों की ऊंचाई आदि में 30 % की बढोतरी
  • खरपतवार का विकास रुका।

आइपीएम
आईपीएम जैसी कई विधियां जैसे पीला चिपचिपा जाल, फेरोमोन जाल, गड्ढे, ट्राइकोग्राम्मा एग पैरेसिटॉइड्स का रिसाव, क्राइसोपर्ला परभक्षी, मिर्च-लहसुन के सत्व का छिड़काव, लैंटाना की पत्ती का अर्क, पंचगव्य, एनपीवी, स्यूडोमोनास फ्लुऑरेसेंस पौधों की रक्षा के बारे में अन्य सीखें थीं।

पीला चिपचिपा जाल
किसानों ने पीले चिपचिपे जाल द्वारा चूषक कीड़ों को फंसाने के बारे में सीखा। जाल के विभिन्न रंगों के इस्तेमाल तथा ऊंचाई बदल-बदलकर देखने के प्रयोगों द्वारा किसानों ने पाया कि कीड़ों को फंसाने के लिए जाल का रंग तथा ऊंचाई महत्वपूर्ण कारक थे।

मुख्य परिणाम

लागतमेंकमी
कुछ बाहरी लागतों के उपयोग में कमी की वज़ह से उत्पादन की लागत में 13,000 रुपये प्रति एकड़ की दर कमी हुई। टमाटर की कोपलें अपने आप उगाने के कारण किसानों को कोपलों की लागत में 68% की कमी हुई। किसानों के पूर्व पद्धतियों की तुलना में उर्वरकों तथा कीटनाशकों की लागत में 75% की विशाल कमी हुई। एफ.एक.एस क्षेत्र में खर-पतवारों की गैर-मौजूदगी में मजदूरी के खर्च में 16% की कमी हुई। कुल उत्पादन मूल्य को देखें तो उसमें 29 % की गिरावट आई।

आई.पी.एमके निर्णय- महिलाएंला रही बदलाव
कोत्तूर में खेती कार्यो से संबंधित निर्णय, विशेष रूप से कीट प्रबंध से सम्बंधित, हमेशा पुरुषों द्वारा लिए जाते थे। लेकिन इस बार फार्मर्स फील्ड स्कूल से अर्जित ज्ञान के आधार पर महिला प्रतिभागियों ने वैकल्पिक तरीकों का अनुसरण किया जिससे उनके खेतों में लाल कीड़े के प्रकोप में कमी जैसे लाभ हुए, जो कि पूर्व में फसल को अत्यधिक नुक्सान पहुंचाते थे। इन लाभों को देखने के बाद, घर के पुरुषों ने, जो पूर्व में कुछ शंकित थे, अब टमाटर की खेती में महिलाओं के आईपीएम निर्णय को स्वीकार करना आरम्भ कर दिया है। दूसरी ओर वे इस बात से भी खुश हैं कि वे मंहगे रसायनों का खर्च कम करने सफल सके। अब पुरुष, महिलाओं को सत्रों में नियमित रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अब महिलाएं खुश हैं कि फार्मर्स फील्ड स्कूल ने उन्हें बेहतर ज्ञान द्वारा फसल उत्पादन में सार्थक योगदान देने के योग्य बनाया है और परिवार व समाज के पुरुष इस बात को मान्यता भी दे रहे हैं।

तुलनात्मक लागत तथा प्राप्तियां (प्रति एकड़)

संख्या

वस्तु

पूर्ववर्ती

एसएफएस क्षेत्र

अन्तर(प्रतिशत में)

1

लागत मूल्य

ज़मीन की तैयारी

2200

2200

-

पदार्थ

12000

12000

-

लागत (कोपलें, जैविक खाद, उर्वरक एवं कीटनाशक)

15590

5125

67%

मजदूरी

15860

13260

16%

कुल

45650

32585

29%

2

उपज

18420

17800

-3%

3

सकल प्राप्तियां

230250

222500

-3%

4

शुद्ध प्राप्तियां

184600

189915

3%

आय में बढ़ोतरी

उस मौसम में उत्पादन मूल्य घटने के कारण तथा खेत से निकास के समय फसल के अत्यधिक बढ़े मूल्य के कारण किसानों को 5315 रुपये प्रति एकड़ अतिरिक्त शुद्ध प्राप्तियां हुई। रसायन आधारित खेती के बजाय एलईआईएसए पद्धतियाँ अपनाने के पहले वर्ष के भीतर ही उपज में 620 किलोग्राम प्रति एकड़ कमी होने के बावजूद 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

किसानों का नवोत्पादः पीले चिपचिपे जाल का स्थानीय विकल्प

प्रतिभागियों ने पीले चिपचिपे जाल के विकल्प की नवरचना की। कीड़ों को फंसाने के लिए नारियल की खोल तथा रेशा इकट्ठे किए गए, पीले रंग से रंगे गए तथा बाहर से लिसलिसे किए गए। कीटों को प्रभावी तरीके से फंसाने के लिए अरंडी के तेल द्वारा चिपचिपाहट करना हर 3-4 दिनों में दोहराया गया।

पारिस्थितिकी संरक्षण पर युवाओं में जागृति

पारिस्थितिकी के भीतर परस्पर सम्बन्ध को समझने में बच्चों की मदद करना एक अनोखा अनुभव था। अपने खाली समय में बच्चे, फार्मर्स फील्ड स्कूल की गतिविधियों में भाग लेते थे। उन्होंने खेत के अवलोकन, उस पर चार्ट तैयार कर उसे प्रस्तुत करने में उत्साहपूर्वक भाग लिया। फसलों, कीटों एवं उनके परस्पर संबंध पर नई समझ द्वारा, इन बच्चों ने आगे इस ज्ञान को स्कूल शिक्षकों तथा अन्य छात्रों के साथ बांटा।

igniting young minds

स्रोत : AME फाउन्डेशन

शुष्क भूमि पर कपास की लाभकारी खेती के लिए वैकल्पिक तरीके

रायचूर तालुका के 450 घरों के एक गांव गाधार में कपास एक प्रमुख नकदी फसल है। गाँव के अधिकाँश किसान आजीविका के लिए शुष्क भूमि पर निर्भर हैं, जबकि कुछ के पास खुले कुओं से सिंचाई की व्यवस्था है। एकल फसल न केवल इस गाँव की परम्परा रही है बल्कि पूरे क्षेत्र की। कपास, जो कि कुछ वर्षों पहले अत्यधिक लाभकारी फसल थी, खरीद की उच्च लागत की वज़ह से धीरे-धीरे कम लाभकारी हो गयी है। लागत की वस्तुओं के दलालों द्वारा मार्गदर्शन के आधार पर ही किसान मुख्य रूप से इनका इस्तेमाल करते हैं। साथ ही, किसान खेतों में बोने के लिए उपचार-रहित बीज सीधे दुकानदारों से लेते हैं। समय के साथ, कपास के उत्पादन का खर्च बढ़ गया है, ज़मीन की शक्ति कम हो गयी है तथा उपज घटने लगी है।

बदलाव की ओर

क्षेत्र के किसानों की आजीविका की समस्या पर गौर करते हुए ए.एम.ई फ़ाउन्डेशन की रायचूर क्षेत्र इकाई ने किसानों को दीर्घकालीन फसल उत्पादन के लिए वैकल्पिक खेती के तरीके अपनाकर बाहरी लागत कम कर आगे बढ़ने के लिए मदद देने हेतु इस गाँव का चयन किया।

किसानों के साथ बातचीत में यह तथ्य सामने आया कि कीट प्रकोप, विशेष रूप से चूषक कीड़े तथा बॉलवर्म कपास की उपज को प्रभावित कर रहे थे। कीट प्रबंध के लिए, वर्तमान में, औसत रूप से, फसल की अवधि के दौरान, नौ बार छिड़काव किया जाता है, जिसमें से पांच हेलिओथिस नियंत्रण के लिए लक्षित थे तथा बचे हुए चूषक कीड़े के लिए। औसतन, कपास की उपज 3.5 क्विंटल/एकड़ थी जो 6 क्विंटल/एकड़ की सामान्य क्षमता से बहुत कम थी। उपज को अन्य बातें भी प्रभावित कर रही थी, जैसे की बीज की खराब गुणवत्ता, बुआई में देरी, अनुपयुक्त ज़मीन एवं जल प्रबंध, एवं जैविक खाद का अपर्याप्त उपयोग।

किसानों को उनकी फसल को अलग से देखने के बजाय उसे वर्त्तमान फसल के परितंत्र से जोड़कर देखना सिखाने के लिए, खोजकर सीखने की एक प्रक्रिया, फार्मर फील्ड स्कूल (FFS), को सबसे उचित तरीका माना गया। कृषक फील्ड विद्यालय को जून से दिसम्बर 2005 की फसल के दौरान संचालित किया गया।

यहाँ ए.एम.ई. फाउंडेशन के सामान्य एवं कृषक फील्ड विद्यालय के कपास के संबंध में विशेष रूप से हस्तक्षेप के नतीजे पर आधारित श्री प्रताप रेड्डी के प्रदर्शन का ब्यौरा दिया जा रहा है। यह मामला एक किसान द्वारा वैकल्पिक खेती के तरीके अपनाने के प्रयासों तथा उन्हें समूह में दूसरों के साथ एवं उनसे परे भी बांटने का वर्णन करता है।

35 वर्षीय प्रताप रेड्डी ने मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की है। उनके दो बच्चे हैं। वे 16 एकड़ ज़मीन के मालिक हैं तथा बाहरी मज़दूरों की मदद से उसका प्रबंध करते हैं। रेड्डी कई वर्षों से कपास उगा रहे हैं। उनके लिए, कपास उगाने में कई सामान्य गतिविधियाँ जैसे सीधे डीलर से खरीदा हुआ बीज बोना, कीट देखते ही कीटनाशकों का उपयोग करना एवं मानक प्रथा के अनुसार उर्वरक का उपयोग करना शामिल थी। समूह के एक सदस्य के रूप में, प्रताप रेड्डी कपास के कृषक फील्ड विद्यालय में एक सक्रिय प्रतिभागी थे। उन्होंने कृषक फील्ड विद्यालय के लिए 0.75 एकड़ प्लाट का उपयोग किया। और 0.5 एकड़ में कृषक फील्ड विद्यालय समूह के निर्णय के अनुसार उगाई की पद्धति अपनाई गयी तथा 0.25 एकड़ में उगाई। उनकी सामान्य खेती की पद्धति के अनुसार की गयी. FFS के बतौर किए गए प्रयोगों के अनुसार, उन्होंने कपास की वैकल्पिक खेती के बारे में काफी कुछ सीखा।

अपनाई गई वैकल्पिक खेती की पद्धति

बाड़ की फसल के रूप में मसूर की दाल बोयी गयी, गेन्दे के बीज बिखेरे गए तथा खेत में भिन्डी के बीज 1:10 के अनुपात में बोए गए। बोने से पहले सभी बीज जैविक तरीके से उपचारित किए गए।

बीजोपचार: बीजों को बोने से पहले फोस्फोबैक्टेरिया एवं एजोस्पिरिलम से निम्नलिखित तरीके से उपचारित किया गया-
कपास के 750 ग्राम बीज के लिए:
◗ 20 ग्राम गुड़
◗ 50 ग्राम फोस्फोबैक्टीरिया 
◗ 50 ग्राम एजोस्पिरिलम

बीजों को एक चादर या बोरे पर फैलाएं; गुड़ का घोल बीजों के ऊपर डालें तथा बायो-एजेंट्स छिड़कें। छाया में लगभग आधा घंटा सूखने दें तथा तुंरत बो दें।
(हालांकि बायो-उर्वरकों की 200 ग्राम प्रति एकड़ बीज मात्रा की सिफारिश की जाती है, उपचार के दौरान, किसानों ने महसूस किया कि प्रति एकड़ कपास के बीजों के उपचार के लिए 50 ग्राम पर्याप्त नहीं था)।

कीटनाशकोंकाप्रबंध : मसूर की दाल, गेन्दा एवं भिंडी जैसी फसलें हेलिओथिस तथा चकत्ते वाले बॉलवर्म जैसे कीटों के प्रबन्ध के लिए उगाई गई। उन्होंने हेलिओथिस पर एक परजीवी के अंडे, ट्राइकोग्रामा जैसे उपयोगी कीट की उपयोगी भूमिका के बारे में सीखा। उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि फसल को लाभ पहुंचाने वाले भी कुछ कीट हो सकते हैं। सावाधानी के बतौर एक बायो-एजेंट एनपीवी तथा एक छिड़कने वाले कीटनाशक का उपयोग किया गया। पहले की प्रथा यह थी कि कोई भी कीट दिखने पर तुंरत कीटनाशक का छिड़काव कर दिया जाता था। इन नई प्रथाओं ने पहले वर्ष में कीटनाशकों के छिड़काव को 9 से घटाकर 4 तथा दूसरे वर्ष के दौरान 4 से घटाकर 1 करने में मदद की। कीटनाशक का उपयोग 75% घट गया जो कि पूर्व में एक बड़ा खर्च था। पोषक तत्वों का प्रबंध: पहले, किसानों में उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग के लिए होड़ लगी रहती थी। यदि एक किसान 10 बोरी उर्वरक का उपयोग करता था तो उसका पड़ोसी 12 बोरी डालता था। पहले मौसम में प्रताप रेड्डी ने उर्वरक का उपयोग कम नहीं किया बल्कि उसे एफ.आई.एम की अतिरिक्त मात्रा के साथ 2 टन/एकड़ से बढाकर 3 टन/एकड़ कर दिया एवं साथ ही वर्मी कम्पोस्ट (2 टन/एकड़) भी डाला। वर्त्तमान में उन्होंने उर्वरक के पूरक के रूप में कम्पोस्ट भी डालना शुरू कर दिया है, जिसे उन्होंने अपने खेत में ही तैयार करना सीख लिया है। कपास फिर से लाभकारी फसल हो गई है। रासायनिक खेती से हटकर वैकल्पिक, पर्यावर्ण मित्र तरीकों की वैकल्पिक पद्धतियों ने कपास की उपज को 20% एवं शुद्ध आय को 44%  तक बढ़ा दिया है। उत्पादन की लागत उनके द्वारा प्रयुक्त जैविक खाद को खरीदने की वज़ह से बढ़ी। चूंकि अब प्रताप रेड्डी ने स्वयं के खेत में जैविक खाद का उत्पादन आरंभ कर दिया है, आने वाले वर्षों में उत्पादन की लागत कम होने की संभावना है।

खर्च एवं प्राप्तियां (रुपये /एकड़)

क्रम संख्या

वस्तु

खेत का क्षेत्रफल

एफएफएसप्लॉट

प्रतिशत अंतर

a

लागत मूल्य

 

बीज एवं बीजोपचार

280

290

-

 

जैविक खाद

1500

2650

76.6%

 

उर्वरक

555

555

-

 

कीटनाशक

1030

240

- 75.2%

 

उद्यान

-

304

 

 

कुल

2365

4039

70.7%

b

मज़दूरी की लागत

2475

2250

- 9.0%

1

उत्पादन की लागत

5840

6289

7.6%

2

उपज (किलोग्राम)

500

600

20.0%

3

कुल आय

9800

12000

22.4%

4

शुद्ध आय

3960

5711

44.2%

समग्र खेती की प्रणाली की ओर

ए.एम.ई. फाउंडेशन एवं आतंरिक चर्चा समूहों से सतत विचार विमर्श ने प्रताप रेड्डी को प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंध एवं खेत की व्यर्थ वस्तुओं के पुनर्चक्रण के लिए शंका-रहित कर दिया। एल.ई.आई.एस.ए फार्म्स को एक अध्ययन दौरे के दौरान रेड्डी ने माना कि खेत में अधिक जैविक खाद के उत्पादन के लिए पेड़ों का अतिरिक्त बायोमास निर्णायक है। इसके बाद उन्होंने पेड़ों का बायोमास जनित करने के लिए 10000 बहु-उद्देशीय कोपलें लगाई। इन्हें उन्होंने खेत की मेड़ों पर तथा तालाब की ओर लगाया। उन्होंने कुछ उद्यान विज्ञान आधारित फसलें भी, जैसे आम, इमली एवं चीकू भी लगाई हैं। पेड़ों के बायोमास का महत्व समझने के उपरांत, रेड्डी ने सूर्यमुखी के डंठल एवं अन्य फसलों के बचे हुए हिस्से जलाना छोड़ दिया है। उल्टे, वे उन्हें ज़मीन में डाल देते हैं।

प्रताप रेड्डी ने जैविक खाद तथा घरेलू बागवानी जैसी कुछ सहायक गतिविधियाँ भी शुरू की हैं। उन्होंने अपने घर के पास बैंगन, ककडी, टमाटर, लौकी लगाए हैं तथा कपास के खेत में भिन्डी। वे महसूस करते हैं कि अब घर के उपयोग के लिए उनके पास पर्याप्त सब्जियां हो जाती हैं। जल संरक्षण हेतु खेत में उन्होंने 12 फीट गहराई का एक तालाब बनाया है। भविष्य में तालाब में पानी की उपलब्धता के अनुसार उनकी मछली पालन की योजना है।

स्रोत: AME फ़ाउन्डेशन

कपास से जवार तक वैकल्पिक खेती की पद्धतियाँ

रायचूर जिले में नागालापुर 140 घरों का एक छोटा सा गाँव है। उनमें से अधिकाँश लिंगायत, अनुसूचित जाति तथा मदिवाला समुदायों के छोटे किसान हैं। तुंगभद्रा नहर के पिछले सिरे पर स्थित, कुछ लोगों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन पिछले पांच वर्षों से इस गाँव को इस स्रोत से थोड़ा भी पानी नहीं मिला है, जिससे वे पूर्ण रूप से वर्षाजल पर निर्भर हैं। जवार, कपास तथा सूर्यमुखी यहाँ की मुख्य फसलें हैं। लेकिन इस गाँव में काली मिट्टी होने के कारण यह कपास के लिए आदर्श है। कपास एकल फसल प्रणाली के अर्न्तगत उगाई जाती है। लागत की वस्तुएं अधिक खरीदने के कारण कपास की फसल पर लाभ कम हो गया है।

बासवराजप्पा 38 वर्ष आयु के लिंगायत समुदाय के एक छोटे किसान हैं तथा उनकी शिक्षा चौथी कक्षा तक हुई है। वे एक संयुक्त परिवार से हैं जिसमें 12 सदस्य हैं। अपने खेत पर काम करने के अलावा, परिवार के सदस्य घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अन्य जगहों पर भी नौकरी करते हैं। काम कम होने पर, उसकी तलाश में परिवार के सदस्य नज़दीकी शहरों को चले जाते हैं। बासवराजप्पा के पास 4 एकड़ शुष्क ज़मीन है। वे उसपर जवार, कपास तथा सूरजमुखी उगाते हैं। वे कपास को एकल फसल की तरह लगाते आ रहे हैं, जो इस क्षेत्र में सबसे आमबात है। आमतौर पर 3 वर्षों में एक बार खेत की खाद डाली जाती है जबकि यूरिया, डीएपी एवं अन्य उर्वरक प्रत्येक मौसम में 50 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से डाले जाते हैं। बीज दुकानों से खरीदकर सीधे खेत में बो दी जाती है। सामान्यतः बचाव एवं उपचार के तहत मोनोक्रोटोफोस, एन्डोसल्फ़ेन, क्विनोल्फोस जैसे रसायनों के 5-6 छिड़काव किए जाते हैं। इन सब उपायों से, औसतन वे लगभग 5 क्विंटल कपास प्रति एकड़ ले रहे थे।

alternative farming

वैकल्पिक खेती की पद्धतियों की ओर बढ़ना

बासवराजप्पा समूह के सक्रिय सदस्य हैं। उन्होंने एएमई फाउन्डेशन द्वारा संयोजित फार्मर्स फील्ड स्कूल में भाग लिया। विभिन्न वैकल्पिक खेती के तरीके आजमाने के लिए उन्होंने अपनी एक एकड़ ज़मीन निर्धारित कर दी।

फार्मर्स फील्ड स्कूल को दी गयी ज़मीन को पहली वर्षा का जल सोखने के लिए ग्रीष्मकाल में जोत लिया गया। इसके बाद बीज बोने से पहले ज़मीन को तीन बार और जोता गया। खेत की मेंड़ ठीक की गईं तथा मिट्टी की नमी को बेहतर रखने के लिए अन्दर भी छोटी-छोटी मेड़ बनाई गई। दो उद्देश्यों से मेड़ पर जट्रोफा तथा ग्लिरिसेडिया लगाए गए। पहले, मेड़ को सुरक्षित रखने के लिए तथा दूसरा, जैविक खाद में परिवर्तित करने के लिए अतिरिक्त पेड़ का अपशिष्ट पैदा करने के लिए। ज़मीन की उर्वरता बढाने के लिए भेड़ों को खेत में छोड़ा गया।

एकल फसल पद्धति की परम्परा को तोड़ते हुए, मसूर की दाल, भिन्डी तथा चौले के दानों  को कपास के साथ मिलाया गया। मसूर की दाल को बाड़ की फसल बनाया गया जबकि भिन्डी तथा चौले को मुख्य फसल में ट्रैप क्रॉप्स की तरह बिखेरा गया। कीट प्रबंध बीजोपचार से ही आरम्भ कर दिया गया। बोने  से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा एवं पीएसबी से उपचारित किया गया। नीम की पत्ती का रस, जिसमें कीटनाशक गुण होते हैं, 15-20 दिनों के अंतराल पर 3 बार छिड़का गया। रसायनों के छिड़काव को दो तक सीमित रखा गया, वह भी तब जबकि सितम्बर में बॉलवर्म का अत्यधिक प्रकोप था।

पर्यावरण-मित्र पद्धतियों से, बासवराजप्पा ने 8 क्विंटल कपास की फसल ली, जो की उनकी सामान्य पद्धति से खेती की जा रहे ज़मीन के हिस्से की उपज से 6.25% अधिक थी। लेकिन उनकी सबसे बड़ी प्राप्ति थी, लागत मूल्य में भारी कमी, जो कि रसायनों की मात्रा कम करने की वज़ह से हुई। उर्वरकों का इस्तेमाल 60% कम हो गया (सभी प्रकार के 150 किलो उर्वरकों के इस्तेमाल के विरुद्ध केवल 50 किलो जटिल उर्वरक का इस्तेमाल हुआ) तथा कीटनाशकों का इस्तेमाल 6 छिड़कावों से 2 छिड़कावों तक कम हो गया। रसायनों के उपयोग में कमी के साथ, उपज मूल्य में भी भारी कमी हुई-   उर्वरक के मूल्य में 39%, कीटनाशक के मूल्य में 77%; कुल मूल्य में 38% की कमी आई।

कपास के अलावा लगाई गई फसलें परिवार के भोजन का स्रोत बन गई – मसूर की दाल तथा भिन्डी प्रत्येक एक क्विंटल तथा 30-35 किलो चौला काटा गया, जिनका घर में उपयोग किया गया। फार्मर्स फील्ड स्कूल प्रशिक्षण के बाद अब वे लेडीबर्ड बीटल तथा क्राईसोपा जैसे उपयोगी कीटों के नाम तथा उन्हें पहचानने लगे हैं।

कपास के लिए लागत तथा प्राप्तियां (रुपये/एकड़) 2005

क्रमांक

गतिविधि

नियंत्रण प्लॉट

परीक्षण क्षेत्र

अंतर (प्रतिशत में)

1

उत्पादन मूल्य

ज़मीन की तैयारी

600

600

खाद एवं उर्वरक

1650

1000

- 39.4%

बीज एवं बीजोपचार

700

715

 

कीट एवं रोग प्रबन्ध

2380

550

- 76.9%

मज़दूरी

1050

1050

 

कुल

6380

3915

-38.6%

2

उपज (किलोग्राम)

750

800

6.25%

3

कुल आय (रुपये में)

16500

17600

6.66%

4

शुद्ध प्राप्ति

10120

13685

35.22%

कपास की सीखों को जवार पर लागू करना

कपास की खेती के लाभ ने समूह के सदस्यों को जवार जैसी फसल के लिए खेती के वैकल्पिक तरीके आजमाने के लिए प्रेरित किया। जवार एक भोजन की फसल के रूप में उगाई जा रही थी, मुख्यतः घर पर इस्तेमाल के लिए। ज़मीन की उर्वरता बढ़ाने या कीट प्रबंध के बारे में जुवार पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। एएमई फाउंडेशन के मार्गदर्शन में बासवाराजप्पा ने कुछ विशेष वैकल्पिक खेती के तरीकों को अपनाया। जमीन को ढलान पर जोता गया ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। खेत में बनाई गयी लगभग 20 गाड़ी खाद डाली गयी। पशुओं को घुसाने से रोकने के लिए कुसुम्भ को बाद पर लगाया गया तथा मसूर को मुख्य फसल के बीच में लगाया गया। बोने से पहले कुसुम्भ तथा जवार के बीजों को पीएसबी से उपचारित किया गया। जवार की बीज दर को सामान्य 3 किलो से घटाकर 2 किलो किया गया। उचित दूरी रखते हुए, बासवाराजप्पा ने देखा कि घटी हुई बीज दर से पौधों की संख्या बढ़ाने में मदद मिली। इससे  पौधों के विकास में मदद मिली। तनों तथा पत्तियों का आकार नियंत्रण प्लाट की तुलना में लगभग दुगुना हो गया था। सूक्ष्म कीटों के नियंत्रण के लिए नीम के सत्व का दो बार छिड़काव किया गया। वैकल्पिक पद्धतियों को अपनाते हुए, फसल की लागत बढ़ गयी, मुख्य रूप से अतिरिक्त ज़मीन जोतने तथा खरीदे हुए एफवाईएम के इस्तेमाल के कारण। लेकिन, बासवाराजप्पा द्वारा स्वयं के खेत में जैविक खाद बनाने के कारण, यह अनुमान है कि लागत धीरे-धीरे कम होगी। उत्पादन मूल्य अधिक होने के बावजूद, बासवाराजप्पा को शुद्ध लाभ अधिक हुआ। उन्होंने 9 क्विंटल जवार काटी, जो कि पहले से दुगुनी थी। चारा भी पहले से 2 टन/ एकड़ से दुगुना होकर 4 टन/ एकड़ हो गया। साथ ही, उन्हें 70 किलो मसूर तथा 6० किलो कुसुम्भ भी मिले, जिनसे 9 किलो तेल निकला।

जवार के लिए लागत तथा लाभ (रुपये/एकड़) – 2005

क्रमांक

गतिविधि

नियंत्रण क्षेत्र

परीक्षण क्षेत्र

अंतर (प्रतिशत में)

 

जुताई

400

2000

400%

एफवाईएम

-

900

बीज तथा बीजोपचार

94

65

-30%

मज़दूरी

880

880

 

1

उत्पादन मूल्य

1374

3845

179%

2

उपज – किलो

400

2900

125%

3

कुल प्राप्तियां

2400

7410

208%

4

शुद्ध प्राप्तियां

1026

3565

247%

स्रोत : AME फ़ाउन्डेशन

सामूहिक प्रयास के फलस्वरूप लाभ

भालुकगजर गांव पुरुलिआ, पश्चिम बंगाल में काशीपुर ब्लॉक के पूर्वी ओर स्थित है। यहां की मिट्टी चट्टानी है जिसकी जल सोखने की क्षमता बहुत कम है। वार्षिक वर्षा 1200 से 1400 मिमी के बीच होती है लेकिन वर्ष भर की समस्त बारिश 2 महीनों में ही हो जाती है। यह समस्त अर्ध-शुष्क क्षेत्र, एक फसल का क्षेत्र है और वह भी पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर है। बचे हुए 8-9 महीनों में पानी उपलब्ध न होने के कारण कोई भी फसल नहीं उगाई जा सकती। हाल के मौसम के असामान्य बदलाव के कारण वर्षाजल से सिंचित फसल भी प्रभावित हो रही है। इसलिए अधिकांश भूमि बहुत लम्बे समय तक उपयोग के बगैर रह जाती है। भोजन की कमी के कारण हट्टे-कट्टे पुरुषों और महिलाओं को काम की तलाश में पास के संसाधन्युक्त ज़िलों को जाना पडता है। ऐसी बंजर ज़मीन भालुकगजर में भी कम नहीं है।

लेकिन भालूकगजर किसानों के समूह ने ऐसी 300-350 बीघा ज़मीन को एकल फसल क्षेत्र से दोहरी या तिहरी फसल का क्षेत्र बना दिया है। द्वराकेश्वर नदी इस गांव के पास से बहती है। उन्होंने नदी के पास एक कुआं खोदा तथा नहरें बनाई ताकि जब नदी का पानी बारिश के मौसम में बाढ के कारण बहुतायत में हो तो नहरों के ज़रिए बहकर कुएं को भर दे। उन्होंने सूखे मौसम के दौरान नहर के पास में स्थित खेतों की सिंचाई के लिए इस पानी के इस्तेमाल की योजना बनाई। इसकी खुदाई करते समय उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पडा। लेकिन अनेक रुकावटों के बावज़ूद, अंततः वे 15 फीट गहरी तथा 16 फीट परिधि का कुआं खोदने में सफल रहे। 10 एचपी पम्प की मदद से अब कुएं के इर्द-गिर्द 300-350 बीघा ज़मीन तक वे मौसमी जुताई के समय सिंचाई कर सकते हैं। नदी की इस प्रकार उठाई गई सिंचाई प्रणाली द्वारा धान के अलावा दो और फसलें उगाई जा सकीं।

इस समूह के अधिकांश सदस्य भूमिहीन श्रमिक हैं। समूह द्वारा भू-स्वामियों के साथ किए गए करार के अनुसार, वर्षा ऋतु में भू-स्वामी धान उगाएंगे तथा वर्ष के बचे हुए समय में समूह के सदस्यों को ज़मीन पर खेती करने देंगे। पिछले वर्ष, उन्होंने जाड़े की फसलें लगाईं जैसे गेहूं, सरसों, अलसी, उड़द, मूंग, मटर, टमाटर, कद्दू, बैंगन, आलू, प्याज आदि।

वे 100 क्विंटल गेहूं, 700 किलो सरसों, 35 किलो मूंग, 10 किलो लेथिरस, 55 किलो चना दाल, 5 किलो अलसी, 210 किलो टमाटर, 22 किलो तुरई, 400 किलो कद्दू आदि उगाने में सफल रहे जिनका कुल मूल्य 1,20,000/- रुपए था। यह आशा की जा रही है कि अगले 2-3 वर्षों में सूखे मौसम के दौरान इस समूह के सदस्यों को अन्य ज़िलों में काम की तलाश में नहीं जाना पड़ेगा।

स्रोत : डी.आर.सी.एस.सी समाचार पत्रिका, अंक 1 अप्रेल – अगस्त, 2008

धनपति सप्कोटा, सिक्किम के पुरस्कृत कृषक

धनपति सप्कोटा, एक पुरस्कृत कृषक, ने गंग्टोक में अंतर्राष्ट्रीय पुष्प उत्सव के दौरान सब्ज़ी उगाने की प्रतियोगिता में रु.1.5 लाख का नकद इनाम जीता. मुख्यमंत्री ने चोट सिंग्तम, असम लिंज़े, पूर्व सिक्किम के प्रगतिशील कृषक को उनकी दस विभिन्न किस्मों की हॉर्टिकल्चर फ़सलों के लिए नकद पुरस्कार तथा प्रशस्ति पत्र दिया.

model farmer sikkim

घरेलू खपत के लिए धान तथा मक्के की पारम्परिक खेती से विमुख होते हुए, मर्चक में तीन दिन का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद सप्कोटा ने उनकी निजी ज़मीन के 2 एकड हिस्से में हॉर्टिकल्चर फ़सल लगाई. उन्होंने उत्तरांचल में राज्य के हॉर्टिकल्चर विभाग द्वारा जैविक खेती पर आयोजित 11-दिन के प्रशिक्षण में भी हिस्सा लिया.

इस प्रशिक्षण एवं स्वयं पर विश्वास ने सप्कोटा को आश्चर्यजनक परिणाम दिए. उन्होंने एक ही साल में 1900 बीजों से रु.1,52,000 मूल्य की 19 क्विंटल चेरी पेपर उत्पादित की. इसने उन्हें हॉर्टिकल्चर को गम्भीरता से अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने फ़ूलगोभी, टमाटर, पत्तागोभी एवं ब्रॉकोली की पैदावार आरम्भ कर दी.

सप्कोटा ने अपनी ज़मीन पर सुरक्षित खेती द्वारा एक संयंत्र से 40 किलो टमाटर प्राप्त किए. इस साल, इस आदर्श कृषक ने टेक्नॉलॉजी मिशन के अंतर्गत राज्य के हॉर्टिकल्चर विभाग से प्राप्त रोमियो किस्म के बीज का उपयोग कर बे-मौसम टमाटर प्राप्त किए. उन्होंने रु.1,94,000 मूल्य के 97 क्विंटल टमाटर बेचे. उन्होंने रु.64,000 मूल्य की आठ क्विंटल फ़ूलगोभी तथा रु.96,000 मूल्य की 12 क्विंटल चेरी पॆपर भी बेची. सप्कोटा ने कहा, “मैं मज़दूरी तथा अन्य व्यय का वहन करने के बाद हॉर्टिकल्चर से साल भर में हॉर्टिकल्चर से रु.2.5 लाख कमा लेता हूं.“ वे टेक्नॉलॉजी मिशन के अंतर्गत हॉर्टिकल्चर विभाग के सब्ज़ियों के क्षेत्र विस्तार के रूप में मिश्रित सब्ज़ियां भी पैदा कर रहे हैं. उन्हें विभाग से बीज, जैविक खाद, कीटनाशक तथा अन्य सहायता प्राप्त हो रहे हैं.

सप्कोटा ने दावा किया कि उन्होंने सिक्किम में ‘जुकुनी फर्सी’ (जुकुनी किस्म का कद्दू) की शुरुआत की है, जो ककडी/खीरे के आकार का होता है. चूंकि वे ‘जुकुनी फर्सी’ पैदा करने वाले पहले कृषक हैं, असम लिंग्ज़े के स्थानीय लोगों ने इस कद्दू का नाम ‘सप्कोटा फर्सी’ रख दिया है. सप्कोटा ने कहा, उन्होंने जुकुनी फर्सी के बीज 2004 में काठमांडू से खरीदे थे. उन्होंने आगे बताय कि कद्दू की यह प्रजाति सबसे पहले उन्होंने भक्तपुर में राणा के खेत में देखी थी. जुकुनी फर्सी उगाने तथा बेचने के बाद सप्कोटा की दौलत में रु.90,000 की वृद्धि हो गई.
इस प्रगतिशील कृषक के लिए यह सिर्फ जैविक खेती का मामला नहीं है. वे पशुपालन तथा जीवधन प्रबन्ध में भी संलग्न हैं और उन्होंने कार्फेक्टर, जोरेथांग में प्रशिक्षण प्राप्त किया था. वर्तमान में उनके पास पांच गाय हैं जिनमें से तीन दूध देती हैं. वे रु.20 प्रति लिटर के भाव पर रोज़ 20 लिटर दूध बेचते हैं. अपने खेत की गायों से सप्कोटा अपनी खाद भी प्राप्त करते हैं और उन्होंने हॉर्टिकल्चर विभाग की सहायता से एक वर्मि-कम्पोस्ट इकाई स्थापित की है.

उत्पादों के विपणन के बारे में सप्कोटा ने कहा, “यह सही है कि विपणन के बारे में कई किसान मुश्किलों का सामना कर रहे हैं और यह समस्या तब तक हल नहीं होगी जब तक कि हम, सिक्किम के कृषक बाज़ार की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त उत्पादन नहीं कर पाते."
उनके प्रगतिशील कार्य से प्रभावित राज्य के हॉर्टिकल्चर विभाग ने टेक्नॉलॉजी मिशन के अंतर्गत फ़ार्म हैंडलिंग युनिट निर्मित की है जो उनके उत्पादों के विपणन में सहायक है. अब उन्हें अपने उत्पाद बाज़ार में ले जाने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि उनके उत्पाद इस युनिट द्वारा बेचे जा रहे हैं.

स्रोत : http://isikkim.com/dhanpati-sapkota-award-winning-farmer-from-sikkim/

बनमाली दास एक एकीकृत किसान

बनमाली दास पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के गयाधाम गांव के निवासी हैं। एकीकृत कृषि में उनके साथ 5 सदस्‍य हैं। उन्‍होंने तालाब और घरेलू बगीचे की 0.25 एकड़ भूमि और तराई की 0.33 एकड़ भूमि पर खेती करना शुरू किया। यह फार्म सुंदरबन डेल्‍टा में स्थित है, इसलिए यहां की मिट्टी गीली और लवणयुक्‍त है। नदी के किनारे होने के कारण उनकी भूमि अक्‍सर बाढ़ की चपेट में रहती थी। तराई में बनमाली खरीफ के मौसम में धान उगाता है और रबी के मौसम में आलू और लैथीरस। फार्म हाउस में उन्‍होंने फल और पत्‍तेदार सब्जियां उगाईं, लेकिन ये उनकी बाजार पर निर्भरता को कम नहीं कर सकीं। उन्‍होंने तालाब में मछली पालन भी किया, लेकिन इससे भी बहुत अधिक कमाई नहीं हो सकी। जमीन को उर्वर बनाने के लिए उन्‍होंने गाय के गोबर और फार्म की खाद का इस्‍तेमाल किया।

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हस्‍तक्षेप

उनकी भूमि के एक कोने में एक छोटा तालाब खोदा गया और वहां से प्राप्‍त मिट्टी को उनके प्रायोगिक जमीन के टुकड़े को ऊंचा करने के लिए इस्‍तेमाल किया गया। प्‍लॉट के अंदर की तरफ एक दीवार भी खोदी गई ताकि वर्षभर सिंचाई को सुनिश्चित किया जा सके। उनके प्‍लॉट के बाहरी सीमा पर यूकेलिप्‍टस, पीम, सबाबुल, रेन ट्री, बांस आदि के लंबे पेड़ हैं।

उनके सब्जियों के बाग में केला, अमरूद, वॉटर ऐपल, सपोटा, नींबू, आम और नारियल के पेड़ हैं। वर्ष भर उन्‍होंने विभिन्‍न संयोजनों की मिश्रित फसल तकनीक से 25-39 सब्जियों को उगाया। हाल ही में बनमाली दास ने अपने आंगन में बायोडाइजेस्‍टर का निर्माण करवाया है जहां उन्‍होंने बायोगैस और खाद उत्‍पन्‍न करने के लिए बायोगैस संयंत्र स्‍थापित किया है।

उन्‍होंने गाय, बतख और मुर्गियां पाल रखी हैं। उन्‍होंने खरीफ के दौरान चावल-मछली-बतख-अजोला के साथ उपयुक्‍त मिश्रित कृषि डिजाइन को अपनाया है। उनके खेत में किसी प्रकार के रसायन का इस्‍तेमाल नहीं होता। उन्‍होंने अपने तालाब में रोहू, काट्ला, बाटा, माइनर कार्प और कैटफिश का पालन किया है जो अधिक उत्‍पादक बन चुका है।

मछली के खाने के लिए वे केवल चारे, घरेलू बची हुई चीजों, गाय का गोबर और तिल का इस्‍तेमाल करते हैं। उनके पास 5 गायें, 8 बतख के बच्‍चे, 4 मुर्गियां और 14 चूजे हैं। चारे के तौर पर वे सूखी घास, विभिन्‍न फसलों की बची हुई चीजों का इस्‍तेमाल करते हैं। मुर्गियों और बतखों के लिए वे चावल के दाने, भूसी, धान की कटाई से बचे भूसे और तालाब से छोटे घोंघे का इस्‍तेमाल भी करते हैं।

वे खुद से वर्मीकम्‍पोस्‍ट और खाद तैयार करते हैं। वे तिल केक और जैविक खाद के तौर पर बायोगैस से बचे अपशिष्‍ट का इस्‍तेमाल भी करते हैं। वे कीटनाशक के तौर पर नीम, लहसुन मिश्रण और कैरोसिन के मिश्रण तैयार करते हैं। अक्‍सर वे पिछले मौसम में उगाई गई फसल से बचे बीज रख लेते हैं। केवल कुछ फसलें जो निश्चिततौर पर मौसमी और नकद होती हैं, जैसे नोलखोल, गोभी और फूलगोभी को स्‍थानीय बाजार से खरीद लेते हैं। वे निश्चित अवधि के बाद अपने बीजों को बदलते भी हैं। उनका ट्रायल प्‍लॉट और गार्डन बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है और सुंदर तरीके से व्‍यवस्थित है। उन्‍होंने अपने खेत में मिश्रित फसल (बैंगन, मूली, पालक और आलू और लौकी, प्‍याज और बासबेला) भी उगाई। उनके पास एक वर्मीकम्‍पोस्‍ट पिट भी है जहां से वे अपने खेत और बाग के लिए जैविक खाद की जरूरत को पूरा करते हैं।

उन्‍होंने एकीकृत खेती को भी अपनाया है। जब धान के खेत बाढ़ के पानी से भर जाते हैं तो वे अपने धान के खेत में हवा साफ करने के लिए बतख का और अपने बाग में कीटनाशकों को दूर करने के लिए मुर्गियों का प्रयोग करते हैं।

अपने प्रायोगिक खेत में उन्‍होंने 2004 में खरीफ के सीजन में एक फसल उगाई थी जबकि 2005 में 9 फसल तक उनकी खेती बढ़ गई है। उन्‍होंने अपने तालाब पर मुर्गियों का दड़बा लगाया है ताकि मुर्गियों के अपशिष्‍ट सीधे तालाब में गिर सकें। क्‍योंकि जूपलैंकटान और साइटोपलैंकटान की उपस्थिति से वे अपशिष्‍ट म‍छलियों के लिए खाने का अच्‍छा स्रोत होता है।

तालाब का किनारा इपोमोइया एक्‍वेटिका जैसी पत्‍तेदार सब्जियों को उगाने के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है। उनकी कुल लागत 12235.75 रुपये में से अपना खर्च 9497.75 रुपये है (जिसमें मजदूर की लागत शामिल नहीं है)। इसका मतलब यह है कि कुल लागत का लगभग 77.62 प्रतिशत उनकी ही जेब से लगा। इन पिछले सालों में मिट्टी में जैविक कार्बन का प्रतिशत बढ़ा है। यदि हम बनमाली के प्‍लॉट की तुलना जीवाश्‍म ईंधन पर निर्भरता के मामले में पारम्‍परिक प्‍लॉट से करते हैं, तो हम पाते हैं कि जीवाश्‍म ईंधन पर निर्भरता तकरीबन शून्‍य है क्‍योंकि सभी परिवर्तनीय माल का खेत के भीतर ही उत्‍पादन किया गया। उत्‍पादन प्रक्रिया में श्रम की अधिकतर जरूरत में किसान और उसके अपने परिवार का योगदान होता है। हालांकि, उन्‍होंने अपने खेत की योजना इस तरह से बनाई जिसमें श्रम की आवश्‍यकता घटे। आज बनमाली दास अपने खेत को अच्‍छी तरह से देखते हैं और इससे आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ लेते हैं। बनमाली की सफलता को देखने के बाद अधिकतर किसानों ने एकीकृत खेती को क्षेत्र के भीतर और बाहर दोनों जगह अपनाया है। बनमाली ने न केवल इनपुट सब्सिटट्यूशन बनाया और अपनी बाजार पर निर्भरता को कम किया, बल्कि अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के बाद बचे हुए पैदावार को बेच कर उससे लाभ भी कमाया।

एकीकृत जैविक खेती ने उनके परिवार को खाद्य सुरक्षा भी प्रदान की है। उनके खेत में इंटीग्रेशन के विस्‍तार ने बाजार पर उनकी निर्भरता को कम किया है क्‍योंकि अब उनके खेत में बड़े पैमाने पर उत्‍पादन किया जा रहा है।

स्रोत:डीआरसीएससी, कोलकाता

समुदायिक पहल से बहु-स्तरीय सीढ़ीदार तालाब के जरिए वर्षा जल संग्रहण

समस्‍या

पश्चिम बंगाल के पश्चिमी हिस्‍से में छोटानागपुर पहाडि़यों की श्रृंखला का प्रसार है। यहां की भूस्थिति ऊबड़-खाबड़ है। पहाडि़यों के ऊपर पेड़-पौधों का कोई निशान नहीं है और ये बिल्‍कुल बंजर हैं। यहां की मिट्टी में कंकड़ हैं और इसके पानी सोखने की क्षमता बहुत कम है। वार्षिक वर्षा का स्‍तर 1200 से 1400 मिली‍मीटर के बीच है, लेकिन पूरे वर्ष में 2 महीने की अवधि के भीतर ही वर्षा होती है। बाकी बचा हुआ पूरा वर्ष सूखा रहता है जो सूखे जैसी स्थिति को बढ़ाता है। पूरा अर्द्ध सूखा क्षेत्र एक फसली क्षेत्र है जो वर्षा पर निर्भर करता है। पानी की अनुपस्थिति में 8-9 महीने के दौरान कोई भी फसल नहीं हो सकती। बारिश के मौसम में होने वाली फसल भी अब जलवायु में हालिया परिवर्तन के चलते बाधित हो रही है।

इसलिए अधिकतर भूमि लंबे समय से प्रयोग में नहीं लाई गईं। खाद्यान्‍न की कमी के चलते पुरुष और महिलाएं काम की तलाश में अपने पड़ोसी जिलों में चले जाते हैं।
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तालाब की खुदाई मुश्किल हैं और छिपी हुई चट्टानों के चलते महंगी भी है। इसलिए तालाब सामान्‍यत: काफी संकरे होते हैं और वे गर्मियों तक पर्याप्‍त वर्षा जल को टिका नहीं सकते। कुएं भी सूख जाते हैं। कुछ नदियां में पानी 10 से 12 महीनों रहता है, लेकिन गरीब आदिवासियों के पास संसाधन और सूखे महीनों के दौरान इस पानी को सिंचाई के लिए इस्‍तेमाल करने के ज्ञान की कमी है।

हस्‍तक्षेप

  • छोटे और मझोले किसान समूहों में बांट दिए जाते हैं और नए तालाब खोदने तथा पुराने तालाबों का पुनर्निर्माण करने के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित किया जाता है। इन तालाबों का डिजाइन तीन या चार टायर का होता है। बीच में पहुंचने के लिए चारों तरफ तीन या चार चौड़ी सीढ़ी बनाई जाती हैं। ये सीढि़यां बारिश के दौरान डूबी रहती हैं। तालाब में गिर रहे बारिश के पानी के अलावा आसपास की जमीन से तालाब में पानी लाने के लिए मोरियां बनाई जाती हैं। तालाब के चारों किनारों पर बाड़ लगाई गई है जिससे तालाब में लगाए गए पौधों जैसे लौकी, सीताफल और करेले की बेलें उस पर रेंग कर चढ़ सकें। सूखे महीनों में जब तालाब में पानी का स्‍तर कम होता है, तो सब्जियां उसकी सीढि़यों पर उगाई जाती हैं। तालाब के किनारे का इस्‍तेमाल विभिन्‍न किस्‍म की सब्जियों, दालों, मटर और मौसमी पेड़ों को उगाने में किया जाता है। अतिरिक्‍त आय के लिए तालाब में मछलियां भी पाली जाती हैं। तालाब के पानी से उसके इर्द-गिर्द की मेड़ों को सींचा जाता है जिसमें सब्जियां पैदा होती हैं। तालाब के किनारे, उसके भीतर और सीढि़यों पर पैदावार जैविक तरीके से की जाती है। समूह की कुल जरूरत के मुताबिक यहां होने वाली उपज को समान रूप से बांट दिया जाता है। इसमें से बचे हुए एक हिस्‍से को गांव वालों में मुफ्त बांट दिया जाता है। अतिरिक्‍त उपज को बाजार में बेच दिया जाता है और बिक्री से अने वाले पैसे को समूह के बैंक खातों में जमा करा दिया जाता है।
  • इस तरह से व्‍यवस्‍था की जाती है कि वर्षा वाली एक फसल उगाने वाला भूस्‍वामी किसान मौसमी पैदावार की जमीन को सूखे के मौसम में इस्‍तेमाल के लिए छोटे किसानों को दे देता है। नदी से सिंचाई के लिए जल उठाने के लिए एक सस्‍ता मॉडल विकसित किया गया है।
  • तालाब का आकार 1.3 एकड़ हेता है- 180 फुट गुणा 160 फुट गुणा 10 फुट
  • जिस जमीन पर तालाब खोदा गया है, वह 5 लोगों की है जिन्‍होंने पट्टे पर इसे 30 किसानों को देने का तय किया। पट्टे की अवधि खत्‍म होने पर इस तालाब को इसके मालिकों को लौटा दिया जाएगा लेकिन इसके पानी का इस्‍तेमाल किसान समूह करता रहेगा।

प्रभाव

  • इस्‍तेमाल में नहीं आने वाले प्राकृतिक संसाधन खाद्य-चारे-ईंधन को बढ़ाने के लिए लाभदायक साबित हो सकता है।
  • एक व्‍यक्ति से ज्‍यादा दिनों तक काम करवाया जा सकता है जिससे मौसमी पलायन को रोका जाना संभव है। तालाब की खुदाई के लिए 2979 दिन व्‍यक्ति का सृजन किया जबकि आसपास की जमीनों पर फसल पैदावार के लिए 831 दिनों का सृजन किया गया।
  • मिट्टी का उपजाऊपन बढ़ा है।
  • वर्ष भर परिवार के लिए खाद्य और पोषक तत्‍वों की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जा सका है। तालाब के किनारे खेती को छोड़कर इसमें दस एकड़ खाली भूमि की सिंचाई की क्षमता होता है। 2006 में मिश्रित कृषि के जरिए लगभग 40 तरह की सब्जियां उगाईं गईं।

स्रोत:डीआरसीएससी, कोलकाता

पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से सूखा पर नियंत्रण

धान के रक्षक, कोक्करनी का मामला

केरल के पालक्कड जिले के एरिमायूर गांव के पडायेत्ती टोले की मुख्य फसल धान है। इस टोले में 69 परिवार रहते हैं और उनके पास करीब एक सौ एकड़ धान के खेत हैं। पिछले साल अगस्त में केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड और त्रिवेंद्रम की एक स्वैच्छिक संस्था थानल ने यहां कृषि- जैव विविधता की पुनर्स्थापना और जैविक गांव विकास के लिए तीन साल की परियोजना शुरू की।

ये खेत पहाड़ियों के बीच में हैं। घर खेतों से तनिक दूर और धान के खेतों से ऊपर हैं। औसत वर्षापात 1200 मिलीमीटर है, जो दक्षिण पश्चिम मानसून से आती है। केरल के अन्य भागों की तरह उत्तर पूर्वी मानसून या तुला वर्षा यहां नगण्य है।

नियमित सूखा

बारिश आधारित परिस्थितियों में किसान दो फसल लेते हैं। अच्छे-खासे क्षेत्र में दूसरी फसल हमेशा सूखे के खतरे में रहती है। मालमपुझा डैम की नहर का पानी गांव के बगल से गुजरता है। जनवरी के अंत तक वह भी बंद हो जाता है। करीब 25 एकड़ खेत के मालिक, जिनके खेत नहर के पास हैं, किसी प्रकार नहर के पानी से रक्षात्मक सिंचाई करते हैं।

लेकिन इस पानी को अधिक दूरी के लिए पंप नहीं किया जा सकता। ऊपरी सतहों पर किसानों द्वारा 2-3 सप्ताह की नमी का तनाव झेलने और फसल का नुकसान सामान्य है। पीने के पानी के लिए टोला खुले कुएं पर निर्भर है। कुछ सार्वजनिक और निजी कुएं हैं। फरवरी-मार्च तक खुले कुएं का सूखना यहां आम बात है। करीब 10 घरों ने बोरवेल भी खुदवाया है।

पहाड़ियों का अच्छा-खासा हिस्सा चट्टानी जमीन है। यहां किये गये एक गहन अध्ययन में पता चला है कि धान के जिन खेतों में अच्छी ऊपरी जमीन नहीं है और केवल चट्टान है, वैसे खेतों में दरारें पड़ जाती हैं। आश्चर्यजनक रूप से कुछ किसानों के पास छोटे तालाब हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में कोक्करनी कहा जाता है, जिनसे एक या दो बार बचाव सिंचाई हो सकती है। जिनके खेतों में कोक्करनी है, वे किसी तरह पंप सेट किराये पर लेते हैं और फसल बचाने के लिए एक या दो बार सिंचाई करते हैं।

पारंपरिक जल स्रोत

कोक्करनी खेत में जमा पानी या गङ्ढानुमा तालाब है। आमतौर पर यह तालाब- कुलम से छोटा और खुले कुएं से बड़ा होता है। इसके उपयोग में इसकी तुलना थालकुलम से की जा सकती है। बुजुर्ग किसान जब्बार बताते हैं: हमारे पूर्वजों ने ऊंचे खेतों में दर्जनभर से अधिक ऐसे कोक्करनी खोदे हैं। ये हमारे पूर्वजों द्वारा मालमपुझा डैम बनने से भी दशकों पहले खोदे गये थे।

ये गर्मियों में भी नहीं सूखते थे। जब फरवरी-मार्च में दूसरी फसल तैयार हो जाती थी, तब कोक्करनी का उपयोग नहाने के लिए भी किया जाता था। इनसे धान के निचले खेतों में नमी बनाये रखने में भी मदद मिलती थी।

तब गड़बड़ कहां हुई? वह बताते हैं: जैसे-जैसे परिवारों में विभाजन हुआ, जमीन के टुकड़े होते गये। जमीन पर अधिक दबाव पड़ने लगा। कोक्करनी के तल में भी टापोयका जैसी फसलें उगायी जाने लगीं। उनसे इन जल स्रोतों की मृत्यु होने लगी। हल्की जमीन इनमें समाने लगी और अब आपको इन जल स्रोतों का नामो-निशान नहीं मिलेगा, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने इतनी मेहनत से खोदा था।
करीब एक दशक पहले, जब भयानक सूखा पड़ा था, किसान समुदाय को पुराने कोक्करनी की याद आयी। पोकलाइन का इस्तेमाल कर करीब एक दर्जन किसानों ने अपने खेतों के किनारे कोक्करनी की खुदाई करायी। जब्बार ने भी दो कोक्करनी खुदवायी। इसमें से प्रत्येक में उन्हें करीब 15 हजार रुपये की लागत आयी। जब्बार बताते हैं: चूंकि यहां की मिट्टी भुरभुरी है, इसलिए ये हर साल ढह जाते हैं। यदि हमें इन्हें एक दशक तक टिकाऊ बनाना है, तो हमें इनके भीतर पत्थर की दीवार बनानी होगी। यह बेहद खर्चीला है। पडायेत्ती के तीन-चार किसानों ने ऐसी दीवारों का निर्माण कराया है। पत्थर की दीवार के बदले पहले मौसम में मानसून से ठीक पहले वेतीवर को रोपना सस्ता और प्रभावी विकल्प हो सकता है।
जहां भी मालमपुझा डैम का पानी नहीं पहुंचता है, कोक्करनी वहां अब भी मौजूद है और उनका ध्यान रखा जाता है। एरीमयूर पंचायत में, जहां पडायेत्ती भी है, कुलीस्सेरी में बहुत से कोक्करनी हैं। इसी तरह कुथथनूर पंचायत के मरुदामथादम में भी कई कोक्करनी हैं।
कोक्करनी का एक और लाभ यह है कि धीमे कटाव के कारण जमीन की ऊपरी सतह की नमी और भूगर्भ जल का स्तर बढ़ता है। जलग्रहण क्षेत्रों की ऊंची जगहों पर ऐसे तालाबों की खुदाई हमेशा लाभप्रद होती है। कर्नाटक के कोडागू जिले में हर परिवार के धान के खेत के ऊपरी हिस्से में ऐसी संरचना है। कालक्रम में लोग धान के खेत और भूगर्भ जल स्रोतों में इसके योगदान को भूल गये हैं।

यदि ग्रहण क्षेत्र चट्टानी है, तो वैसे व्यक्ति को उसके भूखंड के ऊपरी स्तर पर ऐसे तालाब खोदने होंगे, ताकि रिसाव का लाभ खेत के निचले हिस्सों तक पहुंच सके। यदि सभी किसान ऐसे रिसाव वाले तालाब खुदवा लें, तो उसका सामूहिक लाभ चना जैसी फसल के उत्पादन के रूप में सामने आयेगा, जो धान की फसल के बाद दूसरी फसल के रूप में उगाया जा सकता है।

5% मॉडल

बिहार के एक गैर-सरकारी संगठन प्रदान (प्रोफेशनल एसिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन) ने वहां इसी तरह की संरचनाओं को लोकप्रिय बनाया है। इसे पांच प्रतिशत मॉडल कहा जाता है। प्रदान के कार्यक्रम निदेशक दीनबंधु कर्मकार बताते हैं: यह विचार मूल रूप से पुरुलिया जिले में वर्षा पर आधारित धान की फसल को सितंबर के सूखे महीने से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया, जिसे लोग हथिया के नाम से जानते हैं। पानी की खेती के पांच प्रतिशत मॉडल का मूल है कि हर खेत का अपना जल स्रोत हो, जो वर्षा के पानी को रोक सके, क्योंकि यह पानी फसल के बढ़ने के दिनों में होनेवाली बारिश के कारण अक्सर बेकार बह जाता है। इन गङ्ढों में जमा पानी से वर्षा कम होने के दिनों में फसल की सिंचाई की जा सकती है। इन गङ्ढों से पानी के बहाव को निचले स्तर तक ले जाने और नमी को पूरे खेत में फैलाने में भी मदद मिलती है।

पडायेत्ती के किसान दूसरी फसल के लिए भी लंबी अवधि-120 दिन का धान उपजाते हैं। कम अवधि की किस्मों का चयन और श्री (एसआरआइ) तरीका अपनाना धान के खेत को सूखा से बचाने के दो अन्य संभावित समाधान हो सकते हैं। थानल ने यहां श्री (एसआरआइञ) तरीके का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है। उसने धान के खेत को किराये पर लिया और प्रदर्शन खेती की।

अब कुछ जागरुकता कार्यशालाओं के बाद पडायेत्ती के किसान नये कोक्करनी की खुदाई करने तथा सूखे से बचाने के अन्य उपायों को अपनाने लगे हैं। अब तक इलाके का 50 प्रतिशत हिस्सा शत प्रतिशत जैव खेती की ओर लौट चुका है। यह दावा है केरल के पर्यावरणीय गैर सरकारी संगठन थानल की एस उषा का। करीब एक दर्जन घरों में बिना किसी रासायनिक अवयव के सब्जियां उगायी जाने लगी हैं।

धीरे-धीरे, लेकिन मजबूती से पडायेत्ती दूसरी स्वाधीनता की ओर बढ़ रहा है। कौन जानता है कि अगले कुछ सालों में पडायेत्ती के पास पालक्कड जैसे सूखा प्रभावित धान के खेतों के लिए कुछ पाठ हो। हालांकि अच्छी बात यह है कि इसका कुछ हिस्सा उसके अतीत की सीखों से भी जुड़ा है।

स्रोत- श्री पड्रे, जल पत्रकार, पोस्ट वाणीनगर, वाया पेरला- 671552 (केरल)

प्लास्टिक बोतलों से पौधशाला का निर्माण

श्री संजय पाटिल, जौहर ताल, थाणे
तैयार करने की विधि

  • दो लीटर की खाली और बेकार प्लास्टिक की बोतलों को लंबाई में काट लिया जाता है और धान के पौधे उगाने के लिए जमीन तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है।
  • इन आधी कटी हुई बोतलों में कीचड़, वर्मी कम्पोस्ट और धान के पुआल 3:2:1 के अनुपात में भर दिये जाते हैं। आधी बोतल के लिए करीब 300 ग्राम सामग्री की जरूरत होती है।
  • अमृतपानी  बीजामृत से उपचारित बीज को इन बोतलों में बोया जाता है। प्रत्येक आधी बोतल में 10 ग्राम बीज बोया जाता है।
  • इन बोतलों को हरेक दो दिन में एक बार पानी डाल कर नम बनाये रखा जाता है।
  • 10 दिन में पौधे खेतों में रोपने के लिए तैयार हो जाते हैं।
  • एक हेक्टेयर में पुनर्रोपण के लिए निम्नलिखित सामग्री की जरूरत होती है-

सामग्री

संख्या

बोतलों की संख्या (आधी कटी हुई)-

625

बीज

6.3 किलोग्राम

कीचड़

93.7 किलोग्राम

वर्मीकम्पोस्ट-

62.5 किलोग्राम

राख

31 किलो

तैयार किये गये पौधों की संख्या

2,00,000

 

 

nusaryस्रोत : ऑरगेनिक कल्टीवेशन पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) नयी दिल्ली और जैव खेती के लिए राष्ट्रीय केंद्र (एनसीओएफ), गाजियाबाद की तकनीकी सहयोग परियोजना

तैयार किया गया
महाराष्ट्र जैव खेती संघ (एमओएफएफ)

उम्मीद का जंगल

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के राजनगर प्रखंड के नारायणपुर गांव में गर्मी के दिनों में कुत्ते भी लंबी दूरी तय करने में डरते हैं, क्योंकि यहां की जमीन पूरी तरह सूखी रहती है और छाया के लिए कोई पेड़ भी नहीं है। जनवरी 2008 में नारायणपुर शिशु समिति (एनएसएस) का गठन किया गया। इसने 40 एकड़ से अधिक लाल मिट्टी वाले सूखे खेतों को अपने नियंत्रण में लिया। इन खेतों को स्थायी रूप से बेकार करार दिया गया था। इससे पहले इस जमीन का उपयोग मवेशियों के चारागाह के रूप में किया जाता था। एनएसएस ने 12 भूमिहीन औरचार सीमांत किसानों का एक समूह बनाया। इनमें से अधिकांश आदिवासी थे। इस बंजर जमीन को गांव की स्थायी संपत्ति बनाने के प्रयास के रूप में उन्होंने इसपर फल, पशु चारा, जलावन के पेड़ और कम अवधि की फसलों की खेती शुरू की। इस बंजर जमीन के मालिक के साथ इन गतिविधियों के लिए यह समझौता हुआ कि परिपक्व पेड़ों की बिक्री का 50 प्रतिशत भाग उसके पास जायेगा और शेष उन पेड़ों के संरक्षकों के समूह के पास। बीच में उगनेवाली फसल को समूह के सदस्यों के बीच बराबर बांटा जायेगा। समूह ने अप्रैल 2008 में अपना काम पौधशाला में पौधे उगाने के साथ शुरू किया। सामाजिक विश्लेषण प्रणाली (एसएएस) नामक सहभागिता उपकरण को लागू करने के बाद पेड़ों की 36 प्रजातियों का चयन किया गया। 26 हजार पौधों में से 19,150 पौधों को रोपा गया, 4000 को बेचा गया और शेष को स्थानीय लोगों के बीच बांट दिया गया।

अगली बरसात तक जमीन में पानी के संरक्षण के प्रयासों से जमीन का स्वास्थ्य सुधर गया। घास और खर-पतवार प्राकृतिक रूप से उगने लगे। भूखंड के आसपास चार हरित पट्टी, 50 अर्द्धवृत्ताकार बांध और पांच पत्थरों के बांध बनाये गये। इससे 1342 मानव कार्यदिवस का सृजन हुआ। जौ, नेनुआ, बोदी आदि की खेती शुरू की गयी। इसके अलावा जंगली मटर, सवाई घास और अन्य की खेती भी शुरू की गयी। तालाब के कीचड़, कम्पोस्ट और नीम की खल्लियों का उपयोग उर्वरक के रूप में किया गया। सुरक्षा के लिए ताड़, खजूर, जंगली मटर और अन्य पेड़ के बाड़ लगाये गये। सदस्यों द्वारा बारी-बारी से सामाजिक सुरक्षा के उपाय भी किये गये। खरीफ मौसम के अंत में 150 किलोग्राम सब्जी, 15 किलो जौ, 200 किलोग्राम गुल्ला और 250 किलोग्राम चारा का उत्पादन हुआ, जिनका उपयोग परिवारों द्वारा किया गया। कुछ खर-पतवारों और घास से अतिरिक्त आय हुई, क्योंकि इसने हस्तकला और दवाओं के कच्चे माल की जरूरत पूरी की।

आरंभिक निवेश करीब ढाई लाख रुपये था, जिसमें श्रम के रूप में करीब 30 प्रतिशत स्थानीय अंशदान था। औसत रूप में 16 परिवारों को 155 दिन का काम मिला। परिवारों की सब्जियों की जरूरतों को मौसमी फसलों ने पूरा किया। चारे की अच्छी मात्रा उत्पादित की गयी। विलुप्तप्राय पेड़ों की प्रजातियों को पुनर्जीवित किया गया, जिससे जैव विविधता बढ़ी। झाड़ू निर्माण, गुल्ला जैम निर्माण आदि से आय की संभावना बढ़ी। आसपास के तीन-चार गांवों के लोग अपने गांवों में इस प्रकार की गतिविधि चलाने के लिए आकर्षित हुए। गतिविधि का समर्थन क्रिश्चियन एड ने किया।

स्रोत : डीआरसीएससी न्यूज, अंक- 3

बच्चों द्वारा निर्मित उद्यान ने बदला गाँव की सूरत

पश्चिमी मेदिनीपुर का बलियाघाटी एक आदिवासी गांव हैं, जहां के लोग बेहद निम्न आय वर्ग के हैं और स्वास्थ्य तथा पोषण जैसी आधारभूत सुविधाओं से वंचित हैं। एनपीएमएस नामक एक स्थानीय संगठन इस परिदृश्य को बदलने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहा है। वर्ष 2006 से डीआरसीएससी ने एनपीएमएस के साथ मिल कर 12 से 15 साल के आयु वर्ग के बच्चों को शामिल कर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन से संबंधित सीखने और प्रायोगिक गतिविधियों पर काम शुरू किया।

Garden by children

बलियाघाटी में प्रकृति के दो सबसे विनाशकारी और प्रलयंकारी स्वरूप- बाढ़ और सूखा सामान्य बाते हैं और यहां के निर्धनतम लोगों के पास इस प्रकोप को झेलने तथा उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सब्जी कभी उनके नियमित भोजन का हिस्सा नहीं रही। जून 2008 में गांव के 30 बच्चों के बीच सब्जियों के बीज के दो सौ पैकेट बांटे गये। उनमें से 18 ने अपने घरों में बगीचा लगाने में सफलता पायी।

अन्य के प्रयास बाढ़ के पानी में धुल गये। बीज के पैकेट में बंधागोभी, झिंगी, नेनुआ, कद्दू, शकरकंद, बोदी, सेम, सोयाबीन, खीरा, करैला, ओकरा, ओल, तारुकला आदि के बीज थे। ग्रामीण शुरुआत में इनमें से कुछ को खाने से हिचक रहे थे, क्योंकि इससे पहले उन्होंने कभी इन्हें देखा भी नहीं था। बाद में एनपीएमएस ने इन्हें लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से इन्हें पकाने का जिम्मा लिया। बच्चों द्वारा निर्मित कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट को जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया। तीन-चार महीने में उनमें से प्रत्येक को औसतन 150 किलोग्राम सब्जी मिली। बच्चों ने गतिविधियों का विस्तृत विवरण बना कर रखा, जिसमें देखे गये बदलाव, अपनायी गयी प्रक्रिया, घटनाएं, कीटों के हमले, पौधों के जीवन चक्र, बीजों का अंकुरण तथा उत्पाद की मात्रा और गुणवत्ता जैसी बातें शामिल थीं। इन विवरणों ने बच्चों को इनके पीछे का विज्ञान समझने में मदद की। माताओं-पिताओं ने भी इन गतिविधियों में खासी रुचि दिखायी।

इन पर्यावरण समूह के बच्चों और उनके माताओं-पिताओं के अलावा अब अन्य ग्रामीण भी इन सब्जियों का स्वाद चखने का अवसर पा रहे हैं, क्योंकि ये बच्चे अतिरिक्त मात्रा को उनके बीच बांटते हैं। यह उनके जागरूकता अभियान का हिस्सा है, जिससे ग्रामीण जान सकें कि अपने आंगन में बगीचा लगाने का क्या लाभ है। इस गतिविधि को इंडीएनहील्फ ने समर्थन दिया।

स्रोत: डीआरसीएससी न्यूज, अंक- 3

नर्सरी स्थापित कर अच्छी आय प्राप्त कर रहे कृषक

मशरूम उत्पादन व्यवसाय में सफलता

अधिक लाभ हेतु गन्ना व राजमा की सहफसली खेती

पालीहाउस में वर्षभर सब्जी उत्पादन

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