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कंदीय फसलों से भरपूर आमदनी

इस भाग में कंदीय फसलों से भरपूर आमदनी किस प्रकार से किया जा सकता है इसके बारे में जनकरी दी गई है।

परिचय

भारत सरकार द्वारा वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। खाद्य के मूल्यों में अत्यधिक उतार – चढ़ाव, मौसमी और कम समय के लिए मूल्य वृद्धि और अनियमित मानसून को देखते हुए कृषि क्षेत्र में शामिल सभी हितधारकों के लिए एह एक कठिन चुनौती है। इसके बावजूद किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को अवश्य हासिल किया जा सकता है। खेत उत्पादकता में सुधार लाने, खेती की लागत को कम करने, अखिल भारतीय स्तर पर बाजार पहुँच को सुनिश्चित करने आदि की दिशा में सामूहिक प्रयास से इस लक्ष्य की प्राप्ति में काफी आसानी हो सकती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। की इस लक्ष्य को हासिल करने में कंदीय फसलों की मुख्य भूमिका होगी।

आलू, कसावा, शकरकंद, जिमीकंद, कचालू, टेनिया, याम (रतालू), याम बीन, अरारोट दि जैसी कंदीय फसलें स्टार्चयुक्त भंडारण अवयव के रूप में संशोधित जड़ अथवा तने के साथ पौधों का एक समूह बनाती हैं। इनमें कहीं अधिक जड़ें, घनकंद, राइजोम्स होते है और इनके कंदों की खुदाई आमतौर पर जमीन से नीचे की जाती है। ये फसलें अनाज एवं दाना फसली के उपरांत तीसरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण खाद्य फसलें हैं और प्रति इकाई समय में प्रति इकाई क्षेत्रफल में उच्च शुष्क सामग्री उत्पादन के साथ खाद्य उत्पादक रूप में अपनी जैविक प्रभावशीलता के आधार पर ये फसलें अनूठी हैं। ऊर्जा उत्पादन में आलू सबसे आगे (216 मेगाजूल/हे./दिन) एवं इसके बाद क्रमशः रतालू (181 मेगाजूल/हे./दिन), शकरकंद (152 मेगाजूल/हे./दिन), तथा कसावा (121 मेगाजूल/हे./दिन) का स्थान है। कंदीय फसलें विश्व की 1/5 आबादी के लिए मुख्य अथवा सहायक खाद्य के तौर पर उष्णकटिबंधीय तथा अर्द्ध उष्णकटिबंधीय देशों में लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

उपयोगी  प्रौद्योगिकियां

ऐसे किसान जो आलू और अन्य कंदीय फसलों की खेती करते हैं, वे उपयुक्त फसल किस्म, आधुनिक उत्पादन एवं संरक्षण तकनीकें अथवा बचाव प्रौद्योगिकियों को अपनाकर अपनी फार्म आमदनी में बढ़ोतरी कर सकते हैं। भाकृअनुप – केंद्रीय फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम जैसे शोध संस्थानों द्वारा आलू और अन्य कंदीय फसलों की अधिक पैदवार देने वाली अनेक किस्में और प्रौद्योगिकियां विकसित की गई है। कुछ प्रौद्योगिकियां राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा भी विकसित की गई हैं और वे किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इन प्रौद्योगिकियों की पहुँच अभी बहुत सीमित हैं। इन्हें किसान समुदाय के बीच लोकप्रिय बनाये जाने की जरूरत है ताकि कंदीय फसलों में वर्तमान पैदावार अंतराल को कम किया जा सके। आलू और अन्य कंदीय फसलों की उत्पदकता को बढ़ाने के लिए यहाँ प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेपों पर जानकारी देने का प्रयास किया गया है।

गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री

अधिकांश कंदीय फसलों को तने के टूकड़ों अथवा कंद का उपयोग करके शाकीय रूप से प्रवर्धित किया जाता है। इसलिए बीज की गुणवत्ता को बनाये रखना विशेषकर इसे वायरस तथा अन्य रोगजनकों से मुक्त रखना बहुत आवश्यक होता है। भारत में आलू उत्पादकों के समक्ष गुणवत्ता आलू बीज की उपलब्धता अभी भी एक प्रमुख समस्या है। इसीलिए यह जरूरी है कि किसानों को सस्ते दामों पर अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की आपूर्ति की जाये। किसान स्वयं भी भाकृअनुप – केंद्रीय फसल  अनुसंधान संस्थान, शिमला द्वारा विकसित की गई बीज प्लाट तकनीक का उपयोग आलू बीज उगा सकते हैं। यह प्रौद्योगिकी पिछले 50 वर्षों से भारत में आलू के उत्पादन और उत्पादकता क्षेत्र में उल्लेखनीय बढ़ोतरी में मुख्य भोमिका निभा रही है। वायरस की पहचान करने वाली उन्नत तकनीकों, पौध बचाव उपायों और सस्यविज्ञान रीतियों के साथ बीज प्लाट तकनीक का एकीकरण करने से भारत में प्रजनक बीज उत्पादन कार्यक्रम की मजबूत बुनियाद रखने को बढ़ावा मिला है।

हाल ही में हाइटेक बीज उत्पादन प्रौद्योगिकियां जैसे कि ऊतक संवर्धन से तैयार लघु कंद के साथ – साथ ऐरोपॉनिक प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार लघु कंद का विकास किया गया है\ इन्हें गुणवत्तायुक्त आलू बीज के उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐरोपॉनिक   प्रौद्योगिकी के अंतर्गत, आलू पौधों को एक बंद अथवा संरक्षित वातावरण में उगाया जाता है और मृदा अथवा किसी अन्य समुच्य मीडियम का उपयोग किये बिना पोषण से भरपूर घोल का साथ समय – समय पर जड़ों पर छिड़काव  किया जाता है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री का तेजी से गुणन होता है, जिसमें प्रति ऊतक संवर्धन पादप 35 – 60 लघुकंद उत्पन्न होते हैं। इसमें अनेक मृदा जनित रोगजनकों के आलू कंदों के साथ सम्पर्क में कमी आती है। इसके अलावा इसे ऑपरेट करना भी आसान होता है। इस प्रणाली को गौरवायविय  तथा पानी की कमी वाले इलाकों में स्थापित किया जा सकता है। यह प्रौद्योगिकी अत्यधिक लागत प्रभावी है, जिसमें 10 लाख कंदों के उत्पादन के लिए 100 लाख रूपये का निवेश करने की जरूरत होती है और कोई भी उद्यमी इससे प्रति वर्ष 52 लाख रूपये तक कमा सकता है। अत: ऊतक संवर्धन और ऐरोपॉनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारत में पारंपरिक बीज उत्पादन प्रणाली में क्रन्तिकारी बदलाव लाने की क्षमता है। भाकृअनुप – केंद्रीय कंदीय फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम द्वारा मानकीकृत मिनी सेट प्रौद्योगिकी को अपना कर उष्णकटिबंधीय कंदीय फसलों में भी वायरसमुक्त गुणवत्ता रोपण सामग्री को विकसित किया जा सकता है।

अनाज फसलों की तुलना में कंदीय फसलों से अधिक लाभ

चावल, गेंहू और मक्का जैसे पारंपरिक अनाज फसलों की तुलना में फल व सब्जियों जैसे बागवानी फसलें कहीं अधिक लाभ प्रदान करती हैं। उच्च मूल्य वाली फसलों और उद्यमों की दिशा में कृषि गतिविधियों का विविधीकरण करना किसानों की आय को बढ़ाने में एक प्रमुख चालक बन सकता है। भारत के तीन मुख्य राज्यों यथा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार के लिए चावल व गेहूं जैसे अनाज फसलों और प्रमुख कंदीय फसल आलू में खेत की लागत और शुद्ध आय के तुलनात्मक अध्ययन को सरणी – 1 में दर्शाया गया है। यह देखा जा सकता है कि सभी चयनित राज्यों के लिए आलू की खेती की लागत चावल और गेहूं से कहीं ज्यादा है, जो कि पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा रूपये 1,08,860,30 प्रति हे. है। उत्तर प्रदेश में आलू से मिलने वाली प्रति हे. शुद्ध आय चावल और के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा है। पश्चिम बंगाल में आलू से मिलने वाली प्रति हे. शुद्ध आय रूपये 36,519,70  है, जो कि चावल तथा गेहूं की तुलना में लगभग तीन गुना है। बिहार में गेहूं (प्रति हे. रूपये 26,835,70) के मुकाबले आलू (प्रति हे. रूपये 32,787,00) में कहीं अधिक लाभ मिला। बिहार में किसानों के लिए धान की खेती आलू की ही तरह लाभप्रद नहीं है, क्योंकि इससे उन्हें प्रति हे. केवल रूपये 6,277,70  का कम लाभ ही मिल रहा है। अत: यह देखा जा सकता है कि पारंपरिक अनाज फसलों के मुकाबले आलू जैसी कंदीय फसल की खेती करके किसान कहीं अधिक लाभ कमा सकते हैं।

उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियां

भारत में कृषि केवल लाभ अर्जित करने वाला व्यवसाय नहीं है बल्कि यह 138 मिलियन से भी अधिक कृषिजोत पर काम करने वाले परिवारों के लिए परंपरा का हिस्सा है इनमें से 85 प्रतिशत परिवारों के पास 2 हे. से भी कम आकार वाली कृषिजोत हैं। इनमें से अधिकांश कृषिजोत का उपयोग बहु कृषि गतिविधियों यथा कृषि/बागवानी, पोल्ट्री एवं पशु पालन, मत्स्यिकी, मधुमक्खी पालन रेशमा पालन तथा वानिकी में किया जाता है। इन छोटी तथा सीमांत कृषिजोत में फसलचक्र सघनता बहुत अधिक होती है। यहाँ तक कि प्राय: यह 300 प्रतिशत तक भी पहुँच जाती है।

फायदे का सौदा आलू

भारतीय समाज में आलू सर्वाधिक प्रचलित सब्जी है। देश में सब्जियों के तहत कूल कृषि में यह 21 प्रतिशत क्षेत्र में बोई जाती है और कुल सब्जी उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 25.50 प्रतिशत है। चीन के बाद भारत आलू का सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब राज्यों को शामिल करते हुए भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में देश के कुल आलू उत्पादन का 85 प्रतिशत से भी अधिक उत्पादन होता है। वर्ष 2014 – 15 में भारत में 23.1 टन/हे. की औसत उत्पादन हुआ। लगातर बढ़ रही जनसंख्या के साथ भविष्य में भारत में आलू की खपत कई गुना बढ़ने का अनुमान है।

भाकृअनुप – केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारत में 3.62 मिलियन हे. कृषि क्षेत्र से 124.8 मिलियन टन आलू का उत्पादन करने की जरूरत होगी।

जल बचत

आलू सहित किसी भी फसल की खेती के लिए सिंचाई जल इ=की म=कमी प्रमुख समस्या है। आधुनिक आलू किस्में जल की कमी वाली मृदाओं के प्रति संवेदनशील होती है और उनमें बार – बार उथली सिंचाई करने की जरूरत होती है। आमतौर पर पानी की कमी फसल की बढ़वार अवधि के मध्य से पिछेती भाग में भूस्तारी अथव स्टोलन गठन और कंद की शुरूआत तथा बल्किंग के दौरान होती है। इससे पैदावार में कमी होने की आशंका रहती है। अगेती फसलें शाकीय वृद्धि के दौरान कम संवेदनशील होती हैं। फसल पकने वाले अवधि की ओर उच्चतर रिक्तिकरण को अपनाकर भी जल की बचत की जा सकती है ताकि फसल द्वारा अपने जड़ क्षेत्र में भंडारित उपलब्ध पूरे जल का उपयोग किया जा सके। इस क्रियाविधि अथवा रीति से परिपक्वता को भी जल्दी किया जा सकता है और शुष्क पदार्थ सामग्री को बढ़ाया जा सकता है। कुछ किस्में कंद बल्किंग के अगेती भाग में सिंचाई के प्रति कहीं बेहतर प्रतिक्रिया देती हैं, जबकि अन्य बाद वाले हिस्से में कहीं बेहतर प्रतिक्रिया को दर्शाती हैं। कम कंदों वाली किस्में आमतौर पर अनके कंदों वाली किस्में आमतौर पर अनेक कंदों वाली किस्मों की तुलना में जल की कमी के प्रति कम संवेदनशील होती हैं। सिंचाई के लिए सही समय का चयन करके और पौधा वृद्धि चक्र की विशिष्ट अवस्था में जल प्रयोग की उपयुक्त गहराई का प्रयोग करके आलू की फसल में जल की जरूरत को किफायती बनाया  जा सकता है। अब जलमग्न अथवा बाढ़ जैसे सिंचाई की तुलना में ड्रिप एवं स्प्रिकलर विधियों के माध्यम से सटीक रूप से सिंचाई करने के लिए प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं, जो न केवल पानी की बचत करती हैं वरन साथ ही उत्पादकता को भी बढाती हैं।

बागवानी से भरपूर आय

बागवानी क्षेत्रों में किसानों की आय को बढ़ाने की भरपूर क्षमता है। इसलिए पारंपरिक अनाजीय फसलों से उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की ओर बदलाव करने से से भारत में किसानों की आय को दोगुनी करने की दिशा में व्यापक पैमाने पर योगदान किया जा सकेगा। बागवानी फसलों में भी विशेषत: कंदीय फसलें इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनमें अभूतपूर्व उच्च प्रति इकाई उत्पादकता पाई जाती है। हालाँकि एक सम्यक रीति में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए उत्पादन क्लस्टरों को इनपुट के साथ – साथ उपभोक्ता बाजारों से अच्छी तरह से जोड़ने की जरूरत है यह संदेह से परे है कि कृषि इनपुट और उत्पादन से जुड़े सूक्ष्म – लघु – छोटे तथा माध्यम स्तरीय उद्यमों की स्थापना से ग्रामीण भारत की आजीविका सुरक्षा में प्रभावी तरीके से सुधार किया जा सकता है। कंदीय फसलें ग्राम स्तर पर ही ऐसे उद्यमों को स्थापित करने  के भरपूर  अवसर प्रदान करती हैं। कंदीय फसल अनुसंधान पर कहीं अधिक ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें शामिल है: गैर- पारंपरिक क्षेत्रों में इनकी खेती का विस्तार करना, कंदीय फसलों की पोषणिक एवं खाद्य सुरक्षा भूमिका का पूर्वानुमान करना, मूल्यवर्धित खाद्य, आहार एवं औद्योगिक उत्पादों का विकास करके उपयोगिता संभावनाओं को बढ़ाना, अमंग आकलन रण नीतियाँ विकसित करना, नये बाजार विकल्पों की तलाश करना, औषधीय प्रभावों वाले हर्बल उत्पादों, जैव कीटनाशकों, प्राकृतिक खाद्य रंगों का विकास करना जैसे अल्प दोहित क्षेत्रों की खोज करना आदि। प्रौद्योगिकीय प्रगति का प्रभावी तरीके सेड प्रदर्शन और प्रसार करने. उत्पादकता में और सुधार करने और ग्रामीण जनसंख्या तक लाभ पहुँचाने के लिए इन फसलों की उपयोगिता संभावनाओं का खुलासा करने में काफी मदद मिल सकती है।

उन्नत फसलोत्तर प्रबंधन

खुदाई अथवा तुड़ाई करने के उपरांत, छिलकों के उपचार हेतु कंदों को 10 – 15 दिनों तक ढेर में रखा जाना चाहिए। यह जरूरी है की सभी क्षतिग्रस्त और सड़े हुए कंदों को हटा दिया अच्छा लाभ कमाने के लिए उत्पाद अर्थात कंदों की छटाई की जाये और उन्हें ग्रेडिंग के अनुसार जूट के थैलों में पैक किया जाए। किसान अधिक लाभ कम सकते है यदि अपने आलू को शीत भंडार में भंडारित किया जा सकता है। इस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए भंडारित किये गये आलू स्वाद में मीठे नहीं होंगे और इस प्रकार इनसे कहीं अधिक मूला हासिल किये जा सकता है। यह ध्यान दिया जाये कि बीज आलू को केवल 0 – 20 सेल्सियस तापमान पर ही भंडारित किया जाये। चिप्स, फ्रेंच फ्रेंचाइज, लच्छा आदि जैसे निर्जलीकृत आलू उत्पादों को तैयार करके आलू में मूल्यवर्धन करने से भी किसानों को आकर्षक लाभ मिल सकता है। भाकृअनुप – केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में घरेलू स्तर पर मूल्य वर्धन करने की प्रौद्योगिकियां उपलब्ध हैं।

कंदीय फसलों में मूल्यवर्धन

उष्णकटिबंधीय कंदीय फसलों में न केवल खाद्य फसलों के रूप में महत्ता हासिल की है वरन इनकी आहार और कृषि आधारित उद्योगों में भी व्यापक संभावनाएं हैं। खाने – पीने की आदतों में तेजी से हो रह बदलाव और प्रति व्यक्ति आमदनी में अनुमानित बढ़ोतरी के साथ शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते देशांतर से अगले 30 – 40 वर्षों में प्रसंस्करित और रेडी टू ईट (खाने के लिए तुरंत तैयार) सुविधाजनक खाद्य में बढ़ोतरी होने का अनुमान है। उस परिदृश्य में कंदीय फसलों से रोग – निरोधी और चिकित्सीय कार्यशील खाद्य विकसित करने की व्यापक संभावना विद्यमान है।

भाकृअनुप – केंद्रीय कंदीय फसल अनुसंधान संस्थान, तिरुवनंतपुरम द्वारा अनेक मूल्यवर्धित उत्पाद विकसित किये गये हैं। इनमें शामिल हैं: पोषणिक प्रवर्धित स्नैक्स फ़ूड एवं फ़्राईड चिप्स। कसावा से स्नैक्स फ़ूड तैयार करने की प्रौद्योगिकियों को लघु एवं माध्यम उद्यमियों को हस्तांतरित किया गया है। इसके अलावा, सुपर अवशोषक पॉली मार्स, ग्राफ्ट को – पॉलीमिराइज्ड स्टार्च, सुपरपोस हाइड्रोजेल तथा बायोफिल्म आदि जैसे अनेक स्टार्च आधारित उत्पादन विकसित किये गये, जो की व्यवसायीकरण के लिए तैयार पदार्थ हैं। कसावा और शकरकंदी से कम ग्लाइसीमिक मात्रा वाले पास्ता/सेवई जैसे स्वास्थ्यवर्धक खद्या पदार्थ तैयार किये गये जिनमें उच्च पोषणिक गुणवत्ता के साथ – साथ भारत की खाद्य एवं पोषक सुरक्षा में कंदीय फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है। अपनी  एथोसायनिन और कैरोटीननाइड्स मात्रा के कारण कंदीय फसलों के प्रचुर न्यूट्रस्यूटीकल्स मूल्य का बभी तक पूरी तरह से दोहन नहीं किया जा सका है। इसके अलावा, जैव – इथेनोल उत्पादन के लिए अच्छा सामग्री के रूप में कसावा में प्रचुर क्षमता है। उपरोक्त सभी संकेतक मूल्यवर्धित खाद्य, आहार और औधोगिक उत्पादों, जैव कीटनाशकों, प्राकृतिक खाद्य रंगों आदि के उत्पादन के संबंध में ग्रामीण उद्यम विकास के लिए कंदीय फसलों की प्रचुर क्षमता की ओर इशार करते हैं। कृषि संबंधी उद्यमों का सृजन करने से केवल ग्रामीण भारत की आजीविका सुरक्षा में सुधार आएगा बल्कि किसानों की आमदनी भी निश्चित तौर पर बढ़ेगी।

राज्य

विवरण

धान

गेहूं

आलू

उत्तर प्रदेश

खेती की लागत (रूपये/हे.)

29915.4

27501.3

77307.3

कुल आय (रूपये/हे.)

61692.4

59233.9

139786.4

शुद्ध आय (रूपये/हे.)

31777.0

31732.1

62479.1

पश्चिम बंगाल

खेती की लागत (रूपये/हे.)

44645.8

34709..1

108860.3

कुल आय (रूपये/हे.)

57316.5

44614.7

145380.0

शुद्ध आय (रूपये/हे.)

12670.7

9905.6

36519.7

बिहार

खेती की ऑपरेशनल  (रूपये/हे.)

25236.5

23055.8

39952.7

कुल आय (रूपये/हे.)

31514.2

49891.5

72739.7

शुद्ध आय (रूपये/हे.)

6277.7

26835.7

32787.0

स्रोत : आर्थिकी एवं सांख्यिकी निदेशालय, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार (2013 – 14)

लेखन: धीरज कुमार सिंह, स्वरुप कुमार चक्रवर्ती और एन. के पाण्डेय

 

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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