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अलसी का पौष्टिक महत्व एवं वैज्ञानिक खेती

इस पृष्ठ में अलसी का पौष्टिक महत्व एवं वैज्ञानिक खेती की जानकारी दी गयी है।

परिचय

विश्व में भारत का तिलहन उत्पादन में प्रमुख स्थान है। अर्थव्यवस्था के अनुसार अमेरिका और चीन के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा वनस्पति तेल उत्पादक देश है। तिलहन क्षेत्र, उत्पादन और मूल्य के मामले में अनाज के बाद ही आते हैं। वर्तमान में भारत में तिलहनी फसलों का क्षेत्रफल लगभग 13 प्रतिशत है। विश्व के तेल उत्पादन में हमारा योगदान 7 प्रतिशत है और विश्व के कुल खाद्य तेल की खपत में 10 प्रतिशत योगदान भारत का है। देश में 26.1 मिलियन हेक्टेयर  क्षेत्र तिलहनी फसलों के अंतर्गत आता है, जो कि 27.98 मिलियन टन उत्पादन देता है और 10.10 क्विंटल/हेक्टेयर  की उत्पादकता देता है। यह सकल राष्ट्रीय उत्पाद का करीब 3 प्रतिशत और सभी कृषि उत्पादों के मूल्य का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। 1986 में तिलहनों पर तकनीकी मिशन (टीएमओ) की स्थापना के बाद से तिलहनी फसलों ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इसमें उच्च आयात शुल्क की सुरक्षा छतरी द्वारा सहायता प्रदान की गई थी।

अलसी का बोटेनिकल नाम लिनम उसीटेटिसिमम है। यह परिवार लिनेसी के जीनस लिनम का एक सदस्य है। इसे अंग्रेजी में लिनसीड यानी अति उपयोगी बीज भी कहा जाता है। यह विश्व की छठी सबसे बड़ी तिलहन फसल है। भारत में यह एक महत्वपूर्ण रबी तिलहन फसल और तेल और रेशे का एक प्रमुख स्रोत भी है। विश्व के अलसी उत्पादन में भारत का पहला स्थान है और क्षेत्र में तीसरा स्थान है। यह देश की सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक तिलहन फसल है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और बिहार प्रमुख अलसी उत्पादक राज्य हैं। देश में अलसी मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और बिहार राज्यों में उगाई जाती है। क्षेत्रफल व उत्पादन की दृष्टि से मध्य प्रदेश का देश में प्रथम स्थान है।

पौष्टिक महत्व

अलसी एक चमत्कारी आहार है। इसमें दो आवश्यक फैटी एसिड पाए जाते हैं। अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) और लिनोलेनिक एसिड (LA)। इन्हें उन खाद्य आवेदनों में प्रयोग किया जाता है, जहां स्थिरता की आवश्यकता होती है। लिनोलेनिक एसिड और लिनोलिक एसिड को मनुष्य के लिए अपरिहार्य माना जाता है और उन्हें खाद्य तेलों और वसा से प्राप्त किया जाना चाहिए। यदि इसका नियमित सेवन किया जाए तो कई प्रकार के रोगों से बचा जा सकता है। यह  कैंसर, टी.बी., हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कब्ज, जोड़ों का दर्द आदि कई रोगों से हमें बचा सकता है। अलसी में लगभग 18 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है तथा अल्फा लिनोलेनिक एसिड, लिग्नेन, प्रोटीन व फाइबर होता है। अलसी पृथ्वी पर ओमेगा-3 फैटी एसिड का सबसे बड़ा स्रोत है। हमारे शरीर में इसका संश्लेषण नहीं होता है। इस कारण से इसकी आपूर्ति बाहरी स्रोत द्वारा ही की जानी चाहिए। अलसी में ओमेगा-6 और ओमेगा-3 का अनुपात 0.3 : 1 होता है। इस प्रकार अलसी ओमेगा-3 का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। हमारे दैनिक भोजन में ओमेगा-6 की मात्रा अधिक होती है, जिस वजह से असंतुलन की स्थिति बन जाती है। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए ओमेगा-3 को अधिक मात्रा में लेना चाहिए। इसलिए अलसी को हमारे दैनिक भोजन में सम्मिलित करना चाहिए। ओमेगा-3 की यह कमी हम प्रतिदिन 30 से 60 ग्राम अलसी के सेवन से पूरी कर सकते हैं। यह हमारे शरीर में अच्छे कॉलेस्ट्रोल की मात्रा को बढ़ाता है और ट्राइग्लिसराइड कॉलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करने में सहायक होता है। यह हमारे हृदय की धमनियों में खून के थक्के बनाने से रोकता है और हृदय घात व स्ट्रोक जैसी बीमारियों सेभी हमारा बचाव करता है।

ओमेगा-3 के अलावा अलसी का दूसरा महत्वपूर्ण अवयव लिग्नेन है। अलसी में इसकी मात्रा 0.8 से 12.0 मि.ग्रा./ग्राम होती है। यह एंटीबैक्टेरियल, एंटीवायरल, एंटीफंगल, एंटीऑक्सीडेंट तथा कैंसररोधी है। यह शरीर में कॉलेस्ट्रोल कम करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। अलसी में लगभग 28 प्रतिशत रेशा होता है और यह कब्ज़ के रोगियों के लिए बहुत राहतमंद साबित होताहै। डब्ल्यूएचओ भी इसे सुपर स्टार भोजन का दर्जा देता है। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जहां अलसी का सेवन किया जाएगा, वह समाज स्वस्थ और समृद्ध रहेगा।

उपयोगी अलसी

इसके तेल का इस्तेमाल कई उत्पादों में किया जाता है, जिसमें पेंट, वार्निश, लिनोलियम, ऑयल क्लॉथ, प्रिंटर की स्याही और चमड़े के उत्पाद शामिल हैं। अलसी का उपयोग कम से कम 5000 वर्षों से कपड़ा बनाने में किया जा रहा है। इसका रेशा रंग में हल्का पीला, नरम और चमकदार लेकिन कम लचीला और कपास की तुलना में फसल में वानस्पतिक वृद्धि के समय वातावरण अधिक मजबूत होता है। गर्म मौसम में पहनने के लिए लिनेन उपयोगी है, क्योंकि यह आसानी से पानी को अवशोषित कर लेता है। सिगरेट के लिए रोलिंग पेपर और अधिक गुणवत्ता वाले रेशे को मुद्रा नोट बनाने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

अलसी के पौधे में नीले, सफेद एवं बैंगनी रंग के फूल आते हैं व इसके बीज तिल से थोड़े बड़े, भूरे, भूरे-पीले रंग के होते हैं। इसकी सतह चिकनी, लसदार व तैलीय प्रकृति की होती है। अलसी का तेल बहुत गुणकारी होता है। अगर त्वचा जल जाए तो अलसी के उपयोग से दर्द व जलन में राहत मिलती है। अलसी के बीज में तेल की मात्रा लगभग 30-45 प्रतिशत होती है। तेल से मालिश करने पर त्वचा के दाग-धब्बे, झाइयां और झुर्रियां दूर होती हैं। अलसी का तेल निकालने के बाद जो खली बचती है वह दुधारू जानवरों को अगर खिलाई जाए तो दूध उत्पादन बढ़ जाता है। इसमें सभी वनस्पतियों की तुलना में अधिक ओमेगा-3 होता है तभी इसे चिकित्सा विज्ञान में वेज ओमेगा भी कहते हैं। आयुर्वेद में अलसी को दैविक भोजन माना जाता है। इसमें लगभग 33 से 45 प्रतिशत तेल और 24 प्रतिशत कच्चे प्रोटीन शामिल हैं और यह विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे पुराने व्यावसायिक तेलों में से एक है। इसकी खली दुधारू मवेशी के लिए अच्छा भोजन है और इसे खाद के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमें लगभग 3 प्रतिशत तेल और 30 प्रतिशत प्रोटीन होता है।

सारणी 1. अलसी में पोषक तत्वों की मात्रा (प्रति 100 ग्राम)

पोषक तत्व

मात्रा

प्रोटीन

20.3 ग्राम

वसा

37.1 (ओमेगा-3, अल्फा लिनोलेनिक एसिड 18.1 ग्राम, संतृप्त वसा)

 

ऊर्जा

530 किलो कैलोरी

 

फाइबर

 

4.8

विटामिन

थाइमीन, विटामिन बी-5, नाइसीन, राइबोफ्लेविन और विटामिन-सी

 

खनिज लवण

कैल्शियम, लोहा, पोटेशियम, जिंक और मैग्नीशियम

एंटीऑक्सीडेंट

लाइकोपेन, लिग्नेन, लिउटीन

 

अलसी उत्पादन तकनीक

जलवायु

यह एक ठंडे मौसम की फसल है। इस फसल में वानस्पतिक वृद्धि के समय वातावरण का तापमान मध्यम ठंडा होना चाहिए। यदि पुष्पावस्था के समय तापमान 32° सेल्सियस से अधिक हो जाए व मृदा में पानी की कमी हो जाए तो फसल की पैदावार और बीज में तेल की मात्रा व तेल की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है। यह पाले के प्रति अति संवेदनशील है। यदि फूल बनने के समय पाला पड़ जाए तो फसल के लिए अत्याधिक नुकसानदायक है। वृद्धि अवस्था में अधिक वर्षा फसल के लिए हानिकारक होती है। भारत में अलसी वर्षा ऋतु समाप्त होने पर लगाई जाती है। इस दौरान फसल मृदा में संचित नमी से अपनी पानी की आवश्यकता की पूर्ति करती है।

भूमि का चुनाव

अलसी को सभी प्रकार की भूमि में आसानी से उगाया जा सकता है। दोमट से मटियार मिट्टी, जिसमें पर्याप्त जल निकास की व्यवस्था हो, उपयुक्त मानी जाती है।

खेत की तैयारी

अलसी के अच्छे अंकुरण के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करना चाहिए। इसके लिए खेत की एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से व दो से तीन बार डिस्क हैरो से 8-10 टन प्रति हेक्टेयर  की दर से गोबर खाद डालकर व पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

बुआई का समय

बीज की उपज बढ़ाने के लिए बुआई की तारीख का समायोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि बीज की पैदावार पर्यावरण स्थितियों पर निर्भर करती है। अच्छी पैदावार के लिए बुआई का समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिए अलसी की बुआई का समय अलग-अलग है। इसकी बुआई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लेकर नवंबर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है। यदि बुआई इसके बाद की जाती है तो फसल की इसके सहायक पात्रों की बेहतर अभिव्यक्ति वृद्धि और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बुआई के समय में देरी से फसल के प्रजनन विकास के दौरान पर्यावरणीय तापमान में वृद्धि हो जाती है, जिससे बीज की गणवत्ता कम हो जाती है। फसल का विकास चरण उपज और इसके सहायक पात्रों की बेहतर अभिव्यक्ति के लिए इष्टम पर्यावरणीय परिस्थितियों के साथ समकालीन होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को अधिकतम करने के लिए उचित बुआई तारीख बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अच्छा बीज अंकुरण सुनिश्चित करता है। साथ ही साथ समय पर अंकुर और जड़ों का इष्टतम विकास सुनिश्चित करता है।

बीज की मात्रा

सिंचित दशा में 25-30 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर  में बुआई हेतु पर्याप्त होते हैं। बारानी क्षेत्रों में बुआई हेतु 30-35 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है। धान की खड़ी फसल में बुआई हेतु बीज 35-40 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर से औधक नहीं होना चाहिए। ऐसा करने से फसल में मृदा जनित रोगों का प्रकोप नहीं होता है।

बुआई की विधि

अलसी की बुआई पंक्तियों में करनी चाहिए। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सें.मी. और प्रत्येक पंक्ति में पौधे से पौधे की दूरी 5 सें.मी. रखनी चाहिए। बिहार व मध्य प्रदेश में अलसी की बुआई धान के खड़े खेतों मेंभी की जाती है। अच्छे जमाव के लिए बुआई हल या सीडडिल द्वारा करनी चाहिए। 4 से 5 सें.मी. की गहराई पर बुआई करनी चाहिए।

फसल चक्र

अलसी को मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, लोबिया व सोयाबीन आदि के साथ फसल चक्र में उगाया जाता है। इसे गेहूं, जौ, सरसों के साथ मिश्रित रूप में भी उगाया जा सकता है। इसे रबी मक्का के साथ भी उगाया जा सकता है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

अच्छी उपज के लिए खेत की तैयारी के समय लगभग 8-10 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए। असिंचित दशाओं में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20-30 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में देनी चाहिए, जबकि सिंचित दशा में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करनी चाहिए।

जल प्रबंधन

अलसी की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए दो सिंचाइयां आवश्यक हैं। बुआई के 30-45 दिनों के बाद पहली सिंचाई देनी चाहिए तथा दूसरी सिंचाई 75 दिनों के बाद फूल आने से पहले देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

अलसी की फसल खरपतवार से अधिक प्रभावित होती है, क्योंकि इसकी पत्तियों का क्षेत्र कम होता है। अलसी में खरपतवार उपज व तेल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इससे बचने के लिए कम से कम दो निराई-गुड़ाई क्रमशः बुआई के दो से तीन दिनों और चार से पांच सप्ताह बाद करनी चाहिए। रासायनिक दवाओं के द्वारा भी खरपतवारों का आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है। बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरलिन एक कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर  की दर से 600 लीटर पानी में बने घोल का छिड़काव करके भी खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त एलाक्लोर शाकनाशी के एक कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को 500-600 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए। यह ज्यादातर खरपतवार को नष्ट कर देता है।

कीट एवं रोग प्रबंधन

अलसी की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों में रस्ट, उकठा और चूर्णिल आसिता है। अलसी की फसल कीटों से ज्यादा प्रभावित नहीं होती है। अलसी मिज, कटवर्म और पत्ती खाने वाली सुंडियां कहीं-कहीं पर फसल को हानि पहुंचाती हैं।

कटाई-मड़ाई

अलसी की फसल अच्छी कटाई होने पर अच्छा उत्पादन देती है। प्रायः अलसी की फसल 130-150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। अलसी के पौधों के तने पीले पड़ जाएं तथा कैप्सूल और पत्तियां सूखनी शुरू हो जाएं और निचले हिस्सों के तनों से पत्तियां गिर जाएं तो यह समझना चाहिए कि फसल कटाई हेतु तैयार है। कटाई हो जाए तो पौधे को बंडल में बांधकर चार से पांच दिनों के लिए धूप में सूखने देना चाहिए। बीज अलग करने के लिए डंडों से पौधों को पीटकर या श्रेशर का उपयोग करना चाहिए। रेशा प्राप्त करने के लिए अलसी की कटाई, बुआई के लगभग 100 दिनों के बाद करनी चाहिए या फिर फूल आने के एक माह बाद और कैप्सूल जब बन जाए तो उसके दो सप्ताह बाद करनी चाहिए। रेशे के लिए उगाई गई फसल को जड़ से उखाड़ना चाहिए ताकि रेशे की अधिक लंबाई प्राप्त की जा सके। सही समय पर कटाई न होने पर तेल का उत्पादन कम होता है व तेल की गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

उपज

सिंचित दशाओं में अलसी की 15-20 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर  प्राप्त की जा सकती है, जबकि बारानी दशाओं में 8-10 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

सारणी 2. भारत में प्रमुख अलसी उगाने वाले राज्य

राज्य

क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर )

उत्पादन (लाख टन)

उपज (कि.ग्रा./हेक्टेयर )

असोम

0.06

0.04

 

671

बिहार

0.18

0.15

 

855

छत्तीसगढ़

0.28

0.10

 

371

झारखंड

0.26

0.16

 

612

कर्नाटक

0.20

0.16

 

333

मध्य प्रदेश

1.12

0.57

503

महाराष्ट्र

0.24

 

0.05

218

 

ओडिशा

0.19

0.09

 

479

उत्तर प्रदेश

0.23

0.11

 

475

पश्चिम बंगाल

0.07

0.02

 

317

सम्पूर्ण भारत

1.43

2.92

 

489

 

ओमेगा-3 समृद्ध उत्पाद उपलब्ध

  • ओमेगा-3 दूधः अभी इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रहा है, परंतु जब ओमेगा-3 के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ेगी तो इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर संभव हो सकेगा।
  • ओमेगा-3 अंडेः ये अंडे सम्पूर्ण मात्रा में ओमेगा-3 शरीर में उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं।
  • ओमेगा-3 कैप्सूलः बहुत सी कंपनियां ओमेगा-3 युक्त कैप्सूल का उत्पादन करती हैं। भारत में डेक्कन हैल्थ केअर, हैदराबाद, ऑक्सीप्लेक्स, ओमेगा डेक सॉफ्ट जेल तथा साइन डाइट care अल्फा लाइट नमक उत्पादों का निर्माण कर रही है, जो कि ओमेगा-3 युक्त है।
  • बिस्कुटः फ्लैक्सयुक्त बिस्कुट आज-कल बाजार में उपलब्ध है।
  • ओमेगा चॉकलेटः बहुत जल्दी इस उत्पाद की बाजार में आने की संभावना है।

कैसे जारी रहे पीली क्रांति

पीली क्रांति ने खाद्य तेल संकट की समस्या को हल करने के लिए एक अच्छा समाधान प्रस्तुत किया है। यह कई वैज्ञानिक और विकास संस्थानों, उद्योगों, प्रगतिशील किसानों और नीति निर्माताओं की टीम के काम का भी प्रतीक है। परंतु साथ ही साथ खाद्य तेल के आयात पर भी दबाव बढ़ रहा है, जो कि बहुत चिंता का विषय है। तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसमें कई चुनौतियों का सामना करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति को अपनाने की आवश्यकता है,जिसमें सुधार की तकनीक, विविधीकरण और मूल्य वृद्धि के बेहतर तरीकों को अपनाने के माध्यम से क्षेत्रीय विस्तार और उत्पादकता में सुधार के जरिए तिलहन उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। ऊर्ध्वाधर विकास पर अधिक जोर देने से यह उत्पादकता में वृद्धि के लिए सहायक हो सकता है, क्योंकि शहरीकरण के लिए क्षैतिज विस्तार के कारण भूमि की कमी और बढ़ती जनसंख्या के कारण अनाज के साथ प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।

लेखन: अभय कुमार सिंह और आरती सिंह

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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