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उत्तर प्रदेश में राई एवं सरसों की उन्नतशील खेती

इस पृष्ठ में उत्तर प्रदेश में राई एवं सरसों की उन्नतशील खेती की जानकारी दी गयी है।

परिचय

राई/सरसों का रबी तिलहनी फसलों में प्रमुख स्थान है। प्रदेश में अनेक प्रयासों के बाद भी राई के क्षेत्रफल में विशेष वृद्धि नहीं हो पा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि सिंचित क्षमता में वृद्धि के कारण अन्य महत्वपूर्ण फसलों के क्षेत्रफल का बढ़ना। इसकी खेती सीमित सिंचाई की दशा में अधिक लाभदायक होती है। उन्नत विधियाँ अपनाने से उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है। खेत की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए। यदि खेत में नमी कम हो तो पलेवा करके तैयार करना चाहिए। ट्रैक्टर चालित रोटावेटर द्वारा एक ही बार में अच्छी तैयारी हो जाती है।

उन्नतिशील प्रजातियाँ

प्रजातियाँ

विमोचन की तिथि

नोटीफिकेशन की तिथि

पकने की अवधि (दिनों में)

उत्पादन

क्षमता कु./हे.

विशेष विवरण

सिंचित क्षेत्र

नरेंद्र अगेती राई – 4

1999

15.11.01

95-100

15-20

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

वरुणा (टी 59)

1975

2.2.76

125-130

20-25

सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र

बसंती (पीली)

2000

15.11.01

130-135

25-28

-

रोहिणी

1985

26.11.86

130-135

22-28

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

माया

2002

11.3.03

130-135

25-28

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

उर्वशी

1999

2.2.01

125-130

25-28

शीघ बुआई हेतु

नरेंद्र स्वर्ण – राई – 8 (पीली)

2004

23.8.05

130-135

22-25

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

नरेंद्र राई

(एन.डी.आर. – 8501)

1990

17.8.90

125-130

25-30

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

 

 

 

 

 

 

असिंचित क्षेत्रों के लिए

 

 

 

 

 

प्रजातियाँ

 

 

 

 

 

वैभव

1985

18.11.85

125-130

15-20

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

वरुणा (टा. – 59)

1975

2.2.76

120-125

15-20

सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र हेतु

विलंब से बुआई के लिए

 

 

 

 

 

प्रजातियाँ

 

 

 

 

 

आशीर्वाद

2005

26.8.05

130-135

20-22

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

वरदान

1985

18.11.85

120-125

18-20

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

क्षारीय / लवणीय भूमि हेतु

 

 

 

 

 

नरेंद्र राई

1990

17.8.90

-

-

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

सी. एस. – 52

1987

15.5.98

135-145

16-20

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

सी. एस. – 54

2003

12.2.05

135-145

18-22

सम्पूर्ण उ. प्र. हेतु

 

क्षारीय/लवणीय भूमि हेतु

क्षारीय एवं लवणीय क्षेत्रों के लिए नरेन्द्र राई (एन.डी.आर.-8501), सी.एस. 52 एवं सी.एस. 54।

बीज दर

सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों में 5-6 किग्रा./हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए।

बीज शोधन

बीज जनित रोगों से सुरक्षा हेतु 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलो की दर से बीज को उपचारित करके बोये। मैटालेक्सिल 1.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज शोधन करने से सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की प्रारम्भिक अवस्था में रोकथाम हो जाती है।

बुआई का समय एवं विधि

राई बोने का उपयुक्त समय सितम्बर का अंतिम सप्ताह से अक्टूबर का प्रथम पखवारा है। बुआई देशी हल के पीछे उथले (4-5 सेन्टीमीटर गहरे) कूड़ों में 45 सेन्टीमीटर की दूरी पर करना चाहिए। बुआई के बाद बीज ढकने के लिए हल्का पाटा लगा देना चाहिए । असिंचित दशा में बुआई का उपयुक्त समय सितम्बर का द्वितीय पखवारा है। विलम्ब से बुआई करने पर माहू का प्रकोप एवं अन्य कीटों एवं बीमारियों की सम्भावना अधिक रहती है।

उर्वरक की मात्रा

उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाये। सिंचित क्षेत्रों में नत्रजन 120 किग्रा. फास्फेट 60 कि.ग्रा. एवं पोटाश 60 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। फास्फोरस का प्रयोग सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में अधिक लाभदायक होता है। क्योंकि इससे सल्फर की उपलब्धता भी हो जाती है। यदि सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग न किया जाए तो गंधक की उपलबधता को सुनिश्चित करने के लिए 40 किग्रा./हे. की दर से गंधक का प्रयोग करना चाहिए तथा असिंचित क्षेत्रों में उपयुक्त उर्वरकों की आधी मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग की जाये। यदि डी.ए.पी. का प्रयोग किया जाता है तो इसके साथ बुआई के समय 200 किग्रा. जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना फसल के लिए लाभदायक होता है तथा अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 60 कुन्तल प्रति हे. की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए।

सिंचित क्षेत्रों में नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय कूड़ों में बीज के 2-3 सेमी. नीचे नाई या चोगें से दिया जाय। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई (बुआई के 25-30 दिन बाद) के बाद टापड्रेसिंग में डाली जाय।

निराई-गुड़ाई एवं विरलीकरण

बुआई के 15-20 दिन के अन्दर घने पौधों को निकालकर उनकी आपसी दूरी 15 सेमी. कर देना आवश्यक है। खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराई-गुड़ाई, सिंचाई के पहले और दूसरी पहली सिंचाई के बाद करनी चाहिए रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने पर बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरोलिन 45 ई.सी. की 2.2 लीटर प्रति 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर भली-भांति हैरो चलाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए या पैन्डीमेथलीन 30 ई.सी. 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के दो तीन दिन के अन्दर 800-1000 लीटर पानी में घोलकर समान रूप से छिड़काव करें।

सिंचाई

राई, नमी की कमी के प्रति, फूल आने के समय तथा दाना भरने की अवस्थाओं में विशेष संवेदनशील होती है। अतः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए सिंचाई करें यदि उर्वरक का प्रयोग भारी मात्रा में (120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फेट तथा 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर) किया गया हो तथा मिट्टी हल्की हो तो अतिकतम उपज प्राप्त करने के लिए 2 सिंचाई क्रमशः पहली बुआई के 30-35 दिन बाद तथा दूसरी वर्षा न होने पर 55-65 दिन बाद करें।

राई की फसल पर लगने वाले कीट व रोग

राई की फसल पर लगने वाले कीट व रोग निम्नलिखित हैं

प्रमुख कीट

-    अल्टरनेरिया पत्ती झुलसा रोग

-    सफेद किट्ट रोग

-    चूर्णिल आसिता रोग

-    तुलासिता रोग

अपनाई जाने वाली प्रमुख क्रियाएँ

i. रोग जनक की मात्रा कम करने के लिए गर्मी के दिनों में गहरी जुताई, फसल चक्र अपनाना, रोगग्रसित पौधो के अवशेषों का जलाना तथा खरपतवारों का नष्ट करना बहुत जरूरी है।

ii. अगेती बुवाई भी अल्टरनेरिया पत्ती झुलसा, सफेद किट्ट व चूर्णिल आसिता आदि रोगों को रोकने में सहायक होती है।

iii. स्वस्थ व साफ सुथरे बीजों का प्रयोग करना चाहिए। बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए 2.5 ग्राम थीरम प्रति किग्रा. बीज या मेटालेक्सिल 1.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीज शोधन करने पर प्रारम्भिक अवस्था में सफेद किट्ठ व तुलासिता रोग की रोकथाम हो जाती है।

iv. ट्राइकोडरमा पाउडर की 5.0 ग्राम मात्रा से प्रति किग्रा. बीज की दर से बीजोपचार भी विभिन्न प्रकार के रोगों के प्रबन्धन में सहायक होता है। फसल की तैयारी के समय 5.0 किग्रा. ट्राइकोडरमा आधारित जैवकवकनाशी को 2.5 कु. गोबर की खाद में निवेशित कर मिट्टी में मिलायें।

v. रोग रोधी/सहिष्णु प्रजातियों के प्रमाणित बीज की बुवाई करनी चाहिए। जैसे - अल्टरनेरिया, झुलसा रोग के लिए टी.-4, वाइ.आर.टी.टी.-6, व आर. एच.-30 आदि।

vi. सफेद किट्ट तथा तुलासिता रोग की रोकथाम के लिए मैन्कोजेब 75 प्रतिशत की 2.0 किग्रा. मात्रा अथवा मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब (रिडोमिल एम जेड) की 1 किग्रा. दवा का 800 - 1000 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। बुवाई के एक माह बाद एक प्रोफाइलेक्टिक (अवरोधक) छिड़काव करना लाभदायक है।

vii. राई सरसों में बुवाई के समय 60 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से बुवाई से पूर्व बेसल ड्रेसिंग के रूप में करना चाहिए। फास्फेट का प्रयोग सिंगल सुपर फास्फेट के माध्यम से करना चाहिए यदि यह उपलब्ध करे तथा न हो तो फास्फेट की पूर्ति डी.ए.पी. के माध्यम से 60 किग्रा. तथा 40 किग्रा. सल्फर प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग किया जाय। राई-सरसों में 75 किग्रा. नत्रजन बुवाई से 30-35 दिन बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करना चाहिए। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करने के कई तरह की बीमारियों से बचाव किया जा सकता है।

(1)  झुलसा रोग की पहचान : इस रोग में पत्तियों तथा फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं जिनमें गोल गोल छल्ले केवल पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। इनके उपचार के लिए निम्न में से किसी एक रसायन का प्रयोग करें।

रसायन

प्रतिशत

मात्रा

मैकोजेब

75 प्रतिशत

2 कि.ग्रा. प्रति हे०

जीरम

80 प्रतिशत

2 कि.ग्रा. प्रति हे०

जिनेब

75 प्रतिशत

2.5 कि.ग्रा. प्रति हे०

जीरम

27 प्रतिशत

3.5 लीटर प्रति हे०

कापर आक्सीक्लोराइड

80 प्रतिशत

3.0 किग्रा प्रति हे०

 

(2) सफेद गेरूई रोग की पहचान : इस रोग की निचली सतह पर सफेद फफोले बनते हैं इसके उपचार हेतु रिडोमिल एम. जेड-72, 2.5 किग्रा०/ हे० की दर से 800 - 1000 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना लाभदायक है।

(3) तुलासिता रोग की पहचान : इस रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रोयेंदार फफूदी तथा ऊपरी सतह पर पीलापन होता है इसकी रोकथाम हेतु सफेद गेरूई के नियंत्रण वाले रसायन का प्रयोग करना चाहिए।

राई एवं सरसों के प्रमुख कीट

सरसों की आरा मक्खी : यह काले चमकदार रंग की घरेलू मक्खी से आकार में छोटी लगभग 4-5 मिली. लम्बी मक्खी होती है। मादा मक्खी का अंडरोपक आरी के आकार का होने के कारण ही इसे आरा मक्खी कहते हैं। इस कीट की सूड़ियॉ काले स्लेटी रंग की होती है। ये पत्तियों को किनारों से अथवा विभिन्न आकार के छेद बनाती हुई बहुत तेजी से खाती है। भयंकर प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है।

चित्रित कीट की पहचान : प्रौढ़ 5 से 8 मिमी. लम्बे, चमकीले काले, नारंगी एवं लाल रंग के चकत्तेयुक्त होते हैं। सिर छोटा तिकोना, ऑखे काली तथा उभरी हुई होती है। इसके प्रौढ़ तथा शिशु अपने चुभाने एवं चूसने वाले मुखागों को पौधों की कोमल पत्तियों, शाखाओं, तनों, फूलों एवं फलियों में चुभाकर रस चूसते हैं जिससे प्रकोपित पत्तियाँ किनारों से सूख कर गिर जाती है। प्रकोपित फलियों में दाने कम बनते हैं और इनमें तेल की मात्रा भी कम निकलती है। इसका आक्रमण अक्टूबर से फसल कट कर खलिहान में जाने तक कभी भी हो सकता है।

बालदार सूँडी : यह पीले अथवा नारंगी रंग की काले सिर वाली सुंडी होती है। इसका पूरा शरीर घने काले बालों से ढका होता है। इसकी सूड़ियाँ ही फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। ये प्रारम्भ में झुण्ड में तथा बाद में एकलरूप में पौधों की कोमल पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाती है।

गोभी की तितली : प्रौढ़ तितली पीताभ श्वेत रंग की होती है तथा शरीर के पृष्ठ तल का रंग धुएं जैसा सफेद होता है। इसके अगले पंख पर एक काला निशान होता है। इसकी नवजात सूड़ियॉ झुन्ड में पत्तियों की सतह को प्रारम्भ में खुरच कर खाती है तथा बाद में पत्तियों को किनारे से खाना आरम्भ करके अन्दर की तरफ खाती रहती हैं। अधिक प्रकोप की दशा में पूरा का पूरा पौधा खा लिया जाता है।

पत्ती में सुरंग बनाने वाला कीट (खनक कीट) : इस कीट का प्रौढ़ छोटी काले रंग की मक्खी होती है। इसकी मादा अपने अण्डरोपक को पत्तियों में धंसाकर अण्डे देती है जिससे नवजात सूड़ी निकलकर पत्तियों में सुरंग बनाकर खाती हैं जिसके फलस्वरूप पत्तियों में अनियमित आकार की सफेद रंग की रेखाएं बन जाती हैं।

माहू : यह पंखहीन अथवा पंखयुक्त हल्के स्लेटी या हरे रंग के 1.5 - 3.0 मिमी. लम्बे चुभाने एवं चूसने मुखांग वाले छोटे कीट होते हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एवं नई फलियों से रस चूसकर उसे कमजोर एवं क्षतिग्रस्त तो करते ही हैं साथ ही साथ रस चूसते समय पत्तियों पर मधुस्राव भी करते हैं। इस मधुस्राव पर काले कवक का प्रकोप हो जाता है तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित हो जाती है। इस कीट का प्रकोप दिसम्बर-जनवरी से लेकर मार्च तक बना रहता है।

आर्थिक क्षति स्तर :

कीट का नाम

फसल की अवस्था

आर्थिक क्षति स्तर

आरा मक्खी

 

वानस्पतिक अवस्था

एक सूड़ी प्रति पौधा

पत्ती खनक

वानस्पतिक अवस्था

2 से 5 सूँडी/ कृमिकोष प्रति पौधा

बालदार सूंड़ी

 

वानस्पतिक अवस्था

10-15 प्रतिशत प्रकोपित पत्तियाँ

माहू

वानस्पतिक अवस्था से फूल फली आने तक

30-50 प्रति 10 सेमी. मध्य ऊपरी शाखा पर या 30 प्रतिशत माहू से ग्रसित पौधे

 

एकीकृत प्रबंधन

  • गर्मी की गहरी जुताई करनी चाहिए।
  • 20 अक्टूबर तक बोवाई कर देनी चाहिए।
  • संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि नत्रजन की अधिक मात्रा एवं पोटाश की कमी होने पर माहू से हानि होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • फसल के बुवाई के चौथे सप्ताह में सिंचाई करने से चूसक कीट का प्रकोप कम हो जाता है।
  • प्रारम्भ में सप्ताह के अन्तराल पर एवं माहू का प्रकोप दिखाई देते ही सप्ताह में दो बार फसल का निरीक्षण अवश्य करना चाहिए।
  • आरा मक्खी की सूड़ियों को प्रातः इक्ट्ठा कर मार देना चाहिए।
  • झुण्ड में खा रही बालदार सूड़ी, गोभी की तितली आदि की सूड़ियों को पकड़ कर मार देना चाहिए।
  • प्रारम्भ में माहू प्रकोपित शाखाओं को तोड़कर भूमि में गाड़ दें।
  • माहू के प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण करना चाहिए।
  • फिर भी निरीक्षण में उपरोक्त में से कोई भी कीट आर्थिक क्षति स्तर पर पहुँच जाता है तो निम्नलिखित कीट नाशियों में से किसी एक को उनके सामने लिखित मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव अथवा 700 - 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

आरा मक्खी, बालदार सूँडी एवं गोभी की तितली :

  • मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल 20 से 25 किग्रा. या
  • इण्डोसल्फान 4 प्रतिशत धूल 20 से 25 किग्रा. या
  • इण्डोसल्फान 35 ई0 सी0 1.25 लीटर या
  • मैलाथियान 50 ई0 सी0 1.5 लीटर या
  • डी0डी0वी0पी0 76 एस0 एल0 0.5 लीटर।

चूसक कीट एवं माहूँ

निम्नलिखित कीट नाशियों में से किसी एक को उनके सामने लिखित मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव अथवा 700 - 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव सायंकाल करना चाहिए।

डाइमेथोएट

30 ई.सी. 1 लीटर या

मिथाइल ओ डेमेटान

25 ई.सी. 1 लीटर या

इन्डोसल्फान

35 ई.सी. 1.25 लीटर या

फेन्ट्रोथियान

50 ई.सी. 1 लीटर या

क्लोरोपायरीफास

. 20 ईसी. 1 लीटर चाहिये

 

कटाई–मड़ाई :

जब 75 प्रतिशत फलियॉ सुनहरे रंग की हो जायें, फसल को काटकर सुखाकर व मड़ाई करके बीज अलग करना चाहिए। देर करने से बीजों के झड़ने की आशंका रहती है। बीज को खूब सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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