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आय अर्जन का स्रोत है कुमट

इस भाग में आय अर्जन का स्रोत है कुमट (गम अरेबिक) के बारे में जानकारी दी गई है।

परिचय

कुमट का मुख्य उत्पाद गोंद (गम अरेबिक) है। विश्व का 90 प्रतिशत गम अरेबिकनामक इस वृक्ष सर प्राप्त होता है। साधारण भाषा में गम अरेबिक को कुमट का गोंद भी कहते हैं। यह गोंद उच्च गुणवत्ता वाला होता है एवं बाजार में इसकी कीमत 500 से 800 रूपये प्रति किलोग्राम तक होती है। गम अरेबिक का उफोग दवाइयों के उत्पादन, खाने की वस्तुओं एवं अन्य उद्योगों में किया जाता है। विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत गम अरेबिक सूडान से प्राप्त होता है। भारत में इसका उत्पादन बहुत कम होता है एवं घरेलू मांग की आपूर्ति के लिए गम अरेबिक का आयात सूडान और नाइजीरिया से किया जाता है। चूंकि कुमट का वृक्ष शुष्क एवं अर्द्धशुष्क जलवायु का पौधा है, इसलिए राजस्थान में यह फलता – फूलता है एवं भारत में गम अरेबिक की अधिकतम पैदावार राजस्थान के अतिरिक्त कुमट का वृक्ष पंजाब, हरियाणा एवं गुजरात में भी पाया जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र की जलवायु अर्द्धशुष्क है एवं जमीन चट्टानी, कंकरीली पथरीली है, जोकि कुमट के वृक्ष के लिए उपयुक्त है। अत: बुंदेलखंड क्षेत्र में कुमट के वृक्षरोपण कर गम अरेबिक पैदा करने की अपार संभावनाएं हैं, जिससे कृषकों की आमदनी में बढ़ोतरी की जा सकती है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में कृषिवानिकी को बढ़ावा देने के लिए केन्द्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान संस्थान, झाँसी पिछले 30 वर्षों से शोधरत है। यह कृषकों के खेतों पर कृषि वानिकी की उन्नत तकनीक का प्रसार करते हुए कृषकों द्वारा कृषि वानिकी प्रणाली को अपनाने पर जोर दे रहा है। विभिन्न कृषि वानिकी पद्धतियों में वृक्ष प्रजातियों के साथ कृषि फसलों, उद्यानिकी (फल) वृक्षों तथा चारा वाली घासों का समन्वयन इस प्रकार से किया जाता है कि कृषकों को पूरे वर्ष रोजगार मिले एवं विभिन्न उत्पाद पैदा हो, जो कृषक की आय बढ़ाने से सहायता करें। अतिरिक्त आय के साथ – साथ कृषिवानिकी से खेती में टिकाऊपन आता है एवं जलवायु के बदलते परिवेश में अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, सूखा और प्राकृतिक आपदाओं से जोखिम भी कम होता है।

कुमट आधारित कृषिवानिकी

बुंदेलखंड क्षेत्र में कुमट आधारित कृषिवानिकी एवं गम अरेबिक की पैदावार बढ़ाने के लिए केंद्रीय कृषिवानिकी अनुसंधान संस्थान, झाँसी द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा वित्त – पोषित प्राकृतिक रोल एवं गोंद की कटाई, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन नेटवर्क परियोजना के अंतर्गत शोध किया जा रहा है। इस परियोजना का मुख्यालय प्राकृतिक रौल एवं गोंद अनुसंधान संस्थान, रांची, झारखंड है। इस परियोजना के तहत कुमट आधारित कृषिवानिकी प्रारूप का विकास किया जा रहा है। इसकी जानकारी कृषकों को दी जाती है, जिससे ज्यादा से ज्यादा कृषक कुमट आधारित कृषिवानिकी अपनाने में सफल हो। कुमट कुमट का वृक्षारोपण तीन तरीके से किया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं –

मोनोकल्चर (एकल रोपण)

कुमट का सघन रोपण 3x3 अथवा 4x3 मीटर की दूरी पर। कंकरीली – पथरीली व चट्टानी एवं ऊबड़ - खाबड़ भूमि पर किया जाता है।

वन चरागाह

समूहिक चरागाह या पंचायत के गौचर वाली भूमि पर घास के मैदान में 5 x 5 ममीटर या 10x5  मीटर की दूरी पर।

एग्री

सिल्वीकल्चार पद्धति (कृषि वन पद्धति – इसमें कुमट का रोपण खेत की मेड़ पर अथवा खेत में 10x10  मीटर की दूरी पर पंक्तियों में किया जाता है एवं अंत:पंक्ति स्थान में फसलें उगाई जाती है। कुमट का वृक्ष बाजरा, ग्वार, लोबिया, मूंगफली इत्यादि फसलों को अच्छी उपज में सहायक होता है।

मेड़ रोपण

कुमट के पौधे कांटेदार होने के कारण बाड़ रोपण के लिए सवर्था उपयुक्त है। मेड़ पर सजीव बाड़ के रूप में इसे एक या दो कतारों में (3x3 मीटर दो एकान्तर कतार) लगाया जा सकता है। बुंदेलखंड की जलवायु में तीन वर्ष में प्रभावी बाड़ तैयार हो जाती है। तत्पश्चात इसकी नियमित छंटाई करके आकार को नियंत्रित रखते हैं और पांचवें वर्ष से पौधों से गोंद मिलना प्रारंभ हो जाता है।

कुमट का वृक्षारोपण

कुमट का रोपण करने हेतु अच्छी गुणवत्ता वाली पौध किसी सत्यापित पौधशाला से प्राप्त करनी चाहिए। कृषक किसी वन विभाग की पौधशाला से संपर्क कर 6 माह से एक वर्ष तक के लगभग 50 से 60 सें. मी. लंबे पौधे प्राप्त कर सकते हैं। वृक्षरोपण मानसूनी वर्ष शुरू होने पर जुलाई में कर देना चाहिए। वृक्षारोपण हेतु 30x30x30 सें. मी. अथवा 45x45x45 सें. मी. के गड्ढे खोदकर 1:1 अनुपात में गोबर की खाद एवं मिट्टी से भरकर  उसके बीच में पौधा रोपना चाहिए। पौधा रोपते समय उसकी जड़ों के आसपास की मिट्टी को पैरों से अच्छी प्रकार से दबा देना चाहिए। रोपण के तुरंत पश्चात् एक बाल्टी पानी थाले में डाल देनी चाहिए। यदि वर्ष न हो तो रोपण के एक सप्ताह बाद सिंचाई की जा सके। अच्छी वर्षा वाली वर्ष में पौधे 6 माह में भली – भांति स्थापित हो जाते हैं एवं कठिन परिस्थितियों को सहन करने के लिए सक्षम हो जाते हैं। परंतु अच्छी बढ़वार के लिए प्रथम वर्ष में गर्मियों में एक या दो बार सिंचाई करना ठीक रहता है। वृक्षों को अच्छी बढ़वार गोंद पैदा होने के लिए यह आवश्यक है कि रोपित पौधों की अच्छी देखभाल एवं 3 – 4 वर्ष के बाद से प्रत्येक वर्ष पौधे की छंटाई की जाये।

क्या है कुमट

कृषिवानिकी में जिन वृक्ष प्रजातियों का रोपण किया जाता है वे प्राय: बहुउद्देशीय होते हैं। इन्हीं बहुउद्देशीय प्रजातियों में कुमट (अकेसिया सेनेगल एल.) एक है इसकी पत्तियों एवं फलियों को चारे के रूप में बकरी एवं ऊंट चाव से खाते हैं। पत्तियों में 22 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन होता है। कुमट के बीज का उपयोग राजस्थान में सब्जी (पंचकूटा) में किया जाता है। यह बाजार में 60 – 70 रूपये प्रति किग्रा. की दर से बिकता है। कुमट से अच्छी जलावन लकड़ी भी प्राप्त होती है।

कुमट से गोंद का उत्पादन

गोंद (गम अरेबिक) कुमट का मुख्य आर्थिक उत्पाद है। शोध से ज्ञात हुआ है कि बुंदेलखंड में कुमट के वृक्ष से रोपण के 5 वर्ष पश्चात् ही गोंद के निकलना आरंभ हो जाता है। झाँसी स्थित केंद्रीय कृषिवानिकी प्रारूप में कुमट के 5 वर्ष के वृक्ष प्राप्त हुई, जबकि 6 वर्ष वाले वृक्षों से औसतन 58.7 ग्राम गोंद प्रति वृक्ष प्राप्त हुआ। इसके विपरीत कृषकों के खेतों पर लगाये गये कुमट के वृक्षों पर गोंद निकालना 7 वर्ष की आयु में देखा गया। इससे यह स्पष्ट है कि यदि सही रखरखाव के 5 – 6 वर्षों बाद गोंद मिलना शुरू हो जाता है। ऐसा अनुमान है कि 12 से 15 वर्षों के पश्चात् एक परिपक्व कुमट के वृक्ष से औसतन 250 ग्राम गोंद प्रति वर्ष प्राप्त हो सकता है।

यदि एक कृषक अपने खेत में 10x10 मीटर की दूरी पर अथवा मेड़ पर 100 कुमट के वृक्ष लगाये एवं गोंद की उपज को 500 रूपये प्रति किग्रा की दर से बेचे तो उसकी वार्षिक आमदनी में लगभग 12500 रूपये की बढ़ोतरी हो जाएगी। कुमट के गोंद का रिसाव अक्टूबर – नवंबर एवं मार्च – अप्रैल में होता है। गोंद के रिसाव को प्राप्त करने के लिए कुमट के वृक्षों में हल्की छंटाई की जाती है। छंटाई के 30 - 40 दिनों के पश्चात् गोंड रिसता है, जो बाद में सूखकर सख्त हो जाता है। यह गोंद वृक्ष से अलग करके एकत्र कर लिया जाता है। गोंद का रिसाव बढ़ाने के लिए कुछ रसायनों का उपयोग भी किया जाता है।

केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान) ने शोध के पश्चात् कुमट से गोंड उत्पादन बढ़ाने हेतु इथेफान (2 – क्लोरोईथाइल फस्फोनिक एसिड) नामक रसायन के प्रयोग की सिफारिश की है। इथेफान की 4 मि. ली. मात्रा कुमट के तने में (भूमि से लगभग एक फीट ऊंचाई) 450 के कोण में 5 सेंमी. का छेद करके इंजेक्शन द्वारा भी दी जाती है एवं छेद को ऊपर से मिट्टी की सहायता से बंद कर देते हैं। इस तकनीक से कुमट के गोंद की उत्पादकता में वृद्धि  290 से 500 ग्राम गोंद प्रति वृक्ष तक पाई गई। कृषकों के खेतों में परिपक्वा कुमट के वृक्षों से गोंद की अधिक पैदावार प्राप्त होने में इथेफान का उपयोग काफी प्रभावी पाया गया है। कम आयु के वृक्षों पर (10 वर्ष से कम) इथेफान का प्रयोग वर्जित है, क्योंकि वृक्ष के सूख जाने का खतरा रहता है। इसलिए कृषकों को इथेफान का प्रयोग तकनीकी अनुशंसा के आधार पर वैज्ञानिक सुझाव के अनुसार ही करना चाहिए। बुंदेलखंड क्षेत्र में इथेफान का प्रयोग अभी अनुशंसित नहीं है एवं केंद्रीय कृषिवानिकी अ अनुसंधान संस्थान, झाँसी द्वारा इस दिशा में शोध किया जा रहा है।

कृषि आय बढ़ाने के लिए कृषि आधारित विविध उद्यमों को वैकल्पिक आय स्रोत के रूप में विकसित करने की परम आवश्यकता है। ये उद्यम वृक्ष या फसल आधारित हो सकते हैं। मधुमक्खी पालन, लाख उत्पादन, गोंद एवं रेजिन उत्पादन, मशरूम उत्पादन आदि किसानों की आय बढ़ाने के साथ – साथ वैकल्पिक रोजगार सृजन में भी मददगार हैं। इससे किसानों का जोखिम भी कम होगा और आय की सतता भी बरक़रार रहेगी।

बुंदेलखंड अर्द्धशतक जलवायु वाला क्षेत्र है। यहाँ की भूमि पथरीली,ढलवां तथा मिट्टी कम गहराई वाली एवं कम जल धारण क्षमता वाली है। वर्षा के दिनों में पानी से मृदा क्षरण आम बात है। इसके अतिरिक्त अधिकतम क्षेत्रफल परती एवं क्षरित भूमि का है। ऐसे सभी क्षेत्रों में कुमट का वृक्षारोपण सफलतापूर्वक किया जा सकता है। कृषक अपने खेतों की मेड़ पर इसका रोपण प्राथमिकता से करते हैं क्योंकि यह वृक्ष कांटेदार होने की वजह से खेत की बाड़ का कार्य करते हुए फसलों को जानवरों से सुरक्षा प्रदान करते है इससे ईंधन के लिए लकड़ी प्राप्त होती है। इससे प्राप्त होने वाले मुख्य उत्पाद गोंद (गम अरेबिक) से कृषकों की आय में वृद्धि होती है। अत: कृषकों की आय बढ़ाने में कुमट आधारित कृषिवानिकी अहम भूमिका निभाने के लिए समर्थ है तथा बुंदेलखंड में इसकी आपर संभावनाएं हैं।

लेखन : राजेन्द्र प्रसाद, ए. के. हांडा, बद्री आलम, रमेश सिंह, ओ.पी. चतुर्वेदी, आशोक शुक्ला और प्रशांत

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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