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कोको की खेती – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस पृष्ठ में कोको की खेती से सम्बंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों को प्रस्तुत किया गया है।

कोको के विकास के लिए अनुकूल जलवायु-स्थिति कौन सी है?

कोको ऐसी जगहों में पनपता है जहॉं का तापमान 18 एवं 32˚ से. के बीच हो।

कोको के लिए उचित मृदा कौन सी है?

वैसे कई प्रकार की मृदाओं में कोको पनपता है। लेकिन गहरी एवं समृद्ध मृदा ही सर्वोत्तम है।

कोको का प्रवर्धन कैसे होता है?

कोको का, बीज प्रवर्धन या कायिक प्रवर्धन किया जा सकता है।

बीजू प्रवर्धन किस प्रकार होता है?

द्विक्लोनी या बहुक्लोनी बीजोद्यान से बीज इकट्ठा करके दिसंबर-जनवरी महीने में बोया जाए ताकि रोपण-काल में, याने मई-जून में, 4-6 महीने के बीजू पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाएँ।

इस प्रकार के बीज एवं बीजू पौधे कहॉं से प्राप्त हो सकते हैं?

विट्ठल स्थित केंद्रीय बागवानी फसल अनुसंधान केंद्र तथा केरल कृषि विश्वाविद्यालय, वेल्लानिक्करा में द्विक्लोनी एवं बहुक्लोनी उद्यान स्थापित किए गए हैं जहॉं से उत्पादकों को बीज एवं बीजू पौधे वितरित किए जाते हैं।

कोको रोपण के लिए संस्तुत किस्में कौन-कौन सी है?

केरल कृषि विश्वविद्यालय, वेल्लानिक्करा

M 16.9(CCRP1)

M 13.12(CCRP 2)

GI 5.9 (CCRP 3)

GII 19.5(CCRP 4)

GIV 18.5 (CCRP5)

G VI 55(CCRP 6)

GVI 56 (CCRP 7)

सी.पी.सी.आर.आई, विट्ठल

I-56

I-14

III-105

NC 42/94

कोको की खेती के लिए उचित जगह कौन सी है?

भारत में कोको की खेती सामान्यत: नारियल या सुपारी बागानों में अंतराल-सस्य के रूप में की जाती है क्यों कि यहॉं सूरज की रोशनी ज्यादा प्राप्त होती है।

कोको के रोपण में उचित अंतराल क्या है?

नारियल बागानों में कोको का उचित अंतराल 3 मी. X 7.5 मी. है और इस प्रकार प्रति हेक्टेयर 614 पौधे लगाए जा सकते हैं। सुपारी के बागानों में प्रति हेक्टेयर 689 पौधे लगाए जा सकते हैं क्योंकि वहाँ का उचित अंतराल 5.4 मी. X 2.7 मी. है।

रोपण के लिए उचित मौसम कौन सा है?

जब तक मृदा में ज़रूरी नमी है, कोको की खेती साल में कभी भी की जा सकती है। फिर भी सबसे अनुकूल समय मानसून की शुरुआत में है।

कोको का रोपण किस प्रकार किया जाता है?

उपरि-मृदा एवं जैव खाद के मिश्रण से भरे 50सें.मी. X 50 सें.मी. के गड्ढों में कोको का रोपण किया जाता है।

रोपणोत्तर उपचार क्या-क्या है?

रोपण के तुरंत बाद पौधों के बेसिन को जैव मात्रा से पलवारा जाए। छाया के अभाव में पलवरी गई जगहों को गरमी के मौसम में नारियल या कोको भूसे से ढका जाए ताकि नमी कायम रहे।

उर्वरक कितनी मात्रा में दी जानी चाहिए?

कोको के बागानों में जो पोषण तथा उर्वरक देना चाहिए उसका विवरण नीचे प्रस्तुत है :

पोषण (ग्राम/पेड)

पहले साल

दूसरे साल

तीसरे साल

नाईट्रजन

33

66

100

पी2ओ5

13

26

40

के2ओ

46

92

140

 

उर्वरक कब और किस प्रकार दिया जाना चाहिए?

वृष्टि-प्राप्ता प्रदेशों में दो किश्तों में दिया जाए। पहली किश्त मॉनसून में, याने मई-जून में, तथा दूसरी किश्त सितंबर-अक्तूबर में दी जाए। सिंचित कोको बागानों में यह मई-जून, सितंबर अक्तूबर तथा दिसंबर-फरवरी में तीन समान किश्तों में दिया जा सकता है।

उर्वरक लगाने का तरीका : पॉंचे के सहारे मिट्टी में उर्वरक मिला देना उचित है। पूर्ण विकसित पेड़ की द्रोणी में 150सें.मी. के व्यासार्ध में उपर्युक्त प्रकार से मिट्टी में मिला देना चाहिए। रोपण के पहले साल में यह व्यासार्ध 25सें.मी. तक सीमित रखा जाए और फिर धीरे-धीरे बढ्राकर 150 सें.मी. तक किया जा सकता है।

क्या कोको पौधों के लिए सिंचाई अनिवार्य है?

पाँच दिन के अंतराल में सिंचाई संस्तुत है। सिंचाई देने से शीघ्र वृद्धि एवं शीघ्र फलन होता है।

कोको का फसलन काल कब है और फसलन किस प्रकार किया जाता है?

परागण के 150-170 दिन बाद फसलन काल होता है। फलियॉं पकने के लिए लगभग 25 दिन लगते हैं और कई दिन तक इस प्रकार फसलन के लिए तैयार स्थिति में रखी जा सकती है। फसलन 7-10 दिन के अंतराल में किया जाना उचित है। फसलन का उच्च समय अक्तूबर-दिसंबर तथा अप्रैल-जून है। फसलन के बाद फलियों को 4 दिन तक स्टोर किया जा सकता है। ऐसा करने से फलियों के अंदर की किण्वन-पूर्व क्रिया बहतर बनाती है जिससे अच्छे किस्म के बीन प्राप्त होते हैं।

कोको बीनों का किण्वन किस प्रकार किया जाता है?

गीले बीनों को 4-6 दिन तक सघन इकट्ठा रखा जाता है जिससे एक प्रकार का ताप उत्पन्न होता है। इस ताप से बीनों के अंदर कई जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं और यही प्रक्रिया कोको को चोकलेटी फ्लेवर दिलाती है। सामान्य त: अपनाए जाने वाली किण्वन प्रणालियॉं हैं, ढेरन प्रणाली, ट्रे प्रणाली तथा डिब्बी प्रणाली।

कोको में दिखाई देने वाले मुख्य कीट कौन-कौन से हैं?

कोको पर आक्रमण करने वाले विभिन्न कीटों में मुख्य हैं फली वेधक, चाय मच्छर, चूहे, गिलहरियॉं, भूरे घुन, चूर्णी मत्कुण, आदि।

कीट प्रबंधन के लिए क्या किया जाए?

कीट प्रबंधन संबंधी विवरण नीचे दिया गया है।

कोको में कीट प्रबंधन

कीट/रोग

रोग लक्षण

नियंत्रण उपाय

लाल वेधक

मुख्यत: तरुण पेड़ों पर आक्रमण करता है जिससे तना सूख जाता है।

कार्बरिल 0.1% की फुहार

चाय मच्छर

फलियों पर आक्रमण करता है। फलियों पर जल-भरी चित्तियॉं दिखाई देती है।

कार्बरिल 0.1% की फुहार

काली फली रोग

फलियों पर आक्रमण होता है। फलियों में भूरे रंग की चित्तियॉं आती है जिससे फलियॉं गहरे भूरे रंग या काले रंग की हो जाती हैं।

मानसून से पहले 1% बोर्डिऑक्स की फुहार

संवहन रेखा पश्च क्षय

पत्तों में गहरे हरे रंग की चित्तियॉं नज़र आती हैं और बाकी पीले पड़ जाते हैं

1% बोर्डिऑक्स मिश्रण लगाया जाए

गिलहरियॉं एवं चूहे

फली का नाश करके बीनों को खा जाते हैं।

बिटुमेन तथा मिट्टी के तेल का लेप लगाया जाए, पॉली बैगों (१५० गेज के) से फलियों को ढका जाए और वायु के प्रवाह के लिए छेद बनाए जाएँ

 

 

स्त्रोत: काजू और कोको विकास निदेशालय, भारत सरकार

 

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