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गन्ना उपज में सुधार से बदलेगी तस्वीर

इस भाग में गन्ना उपज में सुधार कर अपनी आर्थिक स्थिति में बदलाव के बारे में जानकारी दी गई है।

परिचय

हमारे देश में वर्तमान गन्ना फसल की औसत उपज, तकनीक और आर्थिक उपज क्षमता (339.42 टन प्रति हे.) का केवल 21 प्रतिशत है। देश के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 65 तन प्रतिहे. और उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 80 टन प्रति हे. की उपज में बहुत बड़ा अंतर है। 0.1 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी चीनी परता में होती है तो 2.68 रूपये प्रति क्विंटल की दर से एफआरपी बढ़ जाएगी। वर्ष 2015 – 16 में औसत चीनी परता 10.60 थी। वर्ष 2022 में किसानों की दोगुनी आय के लिए अनुबद्ध उपज और चीनी परता पर जानकारी लेख में दर्शायी गयी है।

देश में वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने के लिए कम आय वाले राज्यों की समूह को ध्यान में रखकर संभावित रणनीतियों की चर्चा इस अभिलेख में की गई है।

गन्ना उपज एव चीनी परता को बढ़ाना

देश के गन्ना उत्पादकों को लिए भाकृअनुप – गन्ना प्रजनन संस्थान, क्योम्बटूर द्वारा अनुशंसित उपयुक्त किस्मों के साथ उत्पादन सह सुरक्षा प्रौद्योगिकी को अपनाने से लक्षित उपज (75 टन प्रति हे.)  से 50 प्रतिशत गन्ने की उपज को बधाकर्चिनी परता में 0.4  इकाई का सुधार करना संभव है। प्रचलित किस्मों की सामर्थ्य और प्रौद्योगिकियों की क्षमता विवादस्पद है, क्योंकि प्रचलित किस्मों और प्रौद्योगिकियों के द्वारा उन्नतशील किसानों के द्वारा अभी तक गन्ने की उपज का 290 टन प्रति हे. रिकार्ड उत्पादन प्राप्त किया गया है। हालाँकि देश के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में सुधार संभव है। उपोष्ण कटिबंधीय भारत और उष्ण कटिबंधीय हिस्सों में गन्ने की उपज और चीनी परता को बढ़ाने में अनुशंसित प्रौद्योगिकियां की अनुशंसित सारणी – 1 और 2 में की गई है।

गन्ने के साथ कम अवधि वाली दलहनी फसलें और सब्जियों की खेती

चौड़ी पंक्ति के अंतर्गत, उपलब्ध वृद्धि साधनों के द्वारा जैसे सौर विकिरण, माध्यम वितान एवं उच्च उलज वाली किस्मों की फसल को अंत:फसल के रूप में उगाया जा सकता है। संकीर्ण अंतराल में अंत:फसल उगाने की अपेक्षा चौड़ी पंक्ति अन्तराल से ज्यादा उपज और अतिरिक्त प्रतिफल मिलता है। फलीदार फसलों को अंत:फसल के रूप में उगाने से रूप मृदा उर्वरता में सुधार होता है। गन्ने की फसल के साथ अंत:फसल के रूप में मूंग, उड़द, सोयाबीन, सनई, ढैंचा, आलू लहसुन, प्याज और दलहनी फसलों को उगाया जा सकता है। अंत: फसल उगाने से अपेक्षित कुल आय का 10,000 से 40,000 रूपये प्रति एकड़ प्राप्त होता है।

सारणी 1. उपोष्ण कटिबंधीय राज्यों में गन्ना उपज और चीनी परता बढ़ाने के लिए अनुशंसित प्रौद्योगिकियां

प्रौद्योगिकियां

अनुशंसित प्रौद्योगिकियां

समस्याओं का निराकरण एवं अपेक्षित परिणाम

किस्में

को,- 98014, को,- 0118, को,-0232, और को.- 0233, को.- 0238, को. – 0237, को.- 0239, को. – 0124, को.- 05009, को.- 05011, को.- 06034 और को.- 09022

उच्च उपज और उच्च चीनी परता वाली किस्में प्रचलित किस्मों की अपेक्षा गन्ना उपज में 15 टन प्रति हे. का सुधार चीनी परता में एक इकाई से ज्यादा का सुधार उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु अवस्था के लिए आदर्श हो

रोपण प्रणाली

गन्ने के सैट्स के द्वारा उगायी गयी पौध रोपण तकनीक (एस. टी. टी.)

 

 

 

ट्रैंच  रोपण

परंपरागत तरीका के अंतर्गत 50,000 सैट्स (गन्ने के बीज टुकड़े) के अपेक्षा एकल आँख के टूकड़े की बिजाई के संदर्भ में 12,500  गन्ने की पौध प्रति हे. की आवश्यकता होती है। बीज सामग्री की बहुत अधिक मात्रा में बचत होती है।

एकल आंख के टुकड़े में अंकुरण होता और 80 प्रतिशत सर ज्यादा पौध की उत्तरजीविता रहती है। गन्ना बिजाई की ट्रैंच प्रणाली सार्थक उच्च गन्ना उपज उत्पादित करती है। पानी की बचत होती है,  क्योंकि ट्रैंच को ही सिंचित किया जाता है ना कि पूरे खेत को। लवणीय मृदाओं में रोपण ट्रैंच प्रणाली और लवणयुक्त पानी से सिंचित क्षेत्र में प्रतिशत के आसपास गन्ना उपज में सुधार हुआ।

पोषक तत्व प्रबंधन

नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा का कई भागों में प्रयोग करना (दो या तीन भागों में), पट्टी अवस्थापन में उर्वरकों को मृदा के साथ ढकना और सिंचाई करना।

गन्ने कि फसल लंबी अवधि की है और अत्यधिक बायोमास (जैवभार) उत्पादन वाली है। यह अधिक पानी, पोषक तत्व और सूर्यप्रकाश के मांग करती है। गन्ने की फसल में हमेशा मृदा परिक्षण के आधार पर अनुशंसित खाद और उर्वरक की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

 

आवश्यकता के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्व का उर्वरीकरण

जब पोषक तत्व की सांद्रता क्रांतिक सीमा से नीचे चली जाये तो गन्ने की उपज में जबरदस्त कमी आ जाती है।

 

सारणी – 2. उत्पादकता सुधार के लिए आगतों की उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए अनुशंसित प्रौद्योगिकियां

प्रौद्योगिकियां

अनुशंसित प्रौद्योगिकियां

समस्याओं का निराकरण एवं अपेक्षित परिणाम

भूमि की तैयारी

लेजर लेवलर

कम अवधि के समय में एकदम सही समतलीकरण करना लेजर लेवलिंग का एक अन्य लाभ है।

किस्म

स्थान विशिष्ट किस्म

विशेष कृषि जलवायु स्थान के लिए फसल काटने वाली मशीन के लिए सही किस्में के सैट का चयन बहुत ही महत्वपूर्ण है एवं अन्य दिए गये फसल उत्पादन और सुरक्षा आगतों के उपायों की भी जरूरत होती है।

 

स्वस्थ बीज

गन्ने फसल में उत्तम बीज इस तरह से परिभाषित किया जाता है – गन्ने के सैट  अच्छी फसल से प्राप्त किये गये हों। बीज कीट एवं रोगों से मुक्त होना चाहिए एवं उसका अंकुरण 85 प्रतिशत से ज्यादा होना चाहिए। अनुवांशिक शुद्धता वाली किस्म से गन्ने की उपज में 10 – 15 प्रतिशत का सुधार होगा।

रोपण प्रणाली

गन्ने के सैट्स के द्वारा उगायी गयी पौध रोपण तकनीक (एस.टी.टी.)

गन्ने की फसल के रोपण के परंपरागत तरीके के अंतर्गत तीन आंख वाले टूकड़े के बीज की लगभग 8 – 9 टन प्रति हे. की आवश्यकता होती है। गन्ने की आँख के टुकड़े और एकल आँख के टुकड़े से उत्पादित पौध भी गन्ने की आँख के टुकड़े से उत्पादित पौध भी गन्ने की रोपण सामग्री के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। गन्ने की आंख के टूकड़े से रोपण के संदर्भ में केवल 12,500 पौध प्रति हे. की आवश्यकता होती है। गन्ने की आँख के टुकड़े का उपयोग करके नर्सरी में पौध उगाकर तीन आँख के टुकड़े की अपेक्षा 80 प्रतिशत बीज सामग्री की बचत की जा सकती है।

 

गन्ने की फसल के साथ अंत: फसल के रूप में कम अवधि वाली दलहनी फसलों एवं सब्जियां को उगाना

गन्ने की फसल के साथ फलीदार फसलों को अंत:फसल के रूप में उगाने से मृदा उर्वरता में सुधार किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।

मूंग, उड़द, सोयाबीन, सनाई, ढैंचा, आलू लहसुन, प्याज और दलहनी फसल को अंत: फसल के उगाया जा सकता है।

किसान को बहुत कम समय में (65 से 90 दिनों)  में ही अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है।

जल प्रबंधन

टपक सिंचाई प्रणाली

लगभग 40 प्रतिशत पानी की बचत और 25 प्रतिशत उपज में बढ़ोतरी होती है।

सिंचाई के लिए श्रमिकों की आवश्यकता में कमी आती है।

अकार्बनिक उर्वरकों का प्रभावों प्रयोग चीनी परता में सुधार

 

जल संरक्षण प्रौद्योगिकियां

पलवार (मल्चिंग) नमी संरक्षण के अलावा खरपतवार वृद्धि को कम करता है। जहाँ कहीं भी पानी की कमी है वहां पर सूखी पत्तियों को पलवार से सिंचाई की संख्या में कमी की जा सकती है और पानी की बचत कर सकते हैं।

मृदा स्वास्थ्य का प्रबंधन

एस. ओ.एम. को उन्नत करता है। गन्ने की सूखी पत्तियों की खाद और जैव – खाद का अनुप्रयोग

मृदा उर्वरता को कायम रखती है और गन्ने की उत्पादकता को बनाये रखती है।

 

मृदा लवणता और क्षारीयता को सुधारना

साधनों की उपयोग क्षमता और फसल उत्पादकता को बढ़ाता है।

 

सहसतही कठोर परत और चिजल जुताई का निदान

मृदा संघनन मृदा निम्नीकरण का एक गंभीर और अनावश्यक प्रकार हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप मृदा कटाव बढ़ सकता हैं और जिससे फसल उत्पादन मी कमी आती है। मृदा कणों का कम मात्रा में दबाव ही मृदा का संघनन कहलाता है और यह हवा और पानी के लिए उपलब्ध स्थान के छिद्रों के आकार को कम कर देता है।

पादप सुरक्षा उपाय

एकीकृत कीट प्रबंधन (आई.पी.एम)

यदि किसानों के स्तर पर एकीकृत कीट प्रबंधन (आई.पी.एम.) किए जाये तो गन्ना पारिस्थितिक प्रणाली की आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत उपज की हानि कम होती है। कीट या रोग को नियंत्रण करने में एकीकृत कीट प्रबंधन में शामिल कर्षण, यांत्रिकीकरण, जैविक और रासायनिक तरीके होते हैं।

 

सारणी – 3. किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रस्ताव

मानदंड

उद्देश्य

प्रस्ताव

उपज और चीनी परता में बढ़ोतरी

प्रति हे. आय को बढ़ाया

उपयुक्त किस्मों को उगाना और अत्याधुनिक तकनीकों जैसे खेत की तैयारी, मृदा एवं जल प्रबंधन, उर्वरता प्रबंधन, रोग रोधी रोपण सामग्री का चयन, बीज उपचार, कटाई में होने वाली हानि को रोकने के लिए मशीनों और औजारों आदि का उपयोग

संसाधन संरक्षण

खेती की लागत को कम करना

लागत मी कमी और संसाधन उपयोग के अनुकूलन के लिए संसाधन उपयोग क्षमता दक्षता का अधिकतम उपयोग। संसाधन संरक्षण तकनीकियों का प्रयोग, एकीकृत पोषक प्रबंधन, सूक्षम खेती तकनीकों, खेतों में जैव – संसाधानों को बढ़ाने और कम आगत और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना

जैविक और अजैविक तनाव के कारण क्षति   को प्रबंधित करना

रोगों और अन्य तनावों के कारण फसल हानि को रोकना

प्रभावित रोग प्रबंधन, एकीकृत पोषक प्रबंधन पद्धति का प्रयोग, समय – समय पर मौसम की सलाह और सूखा एवं बाढ़ के दौरान फसल की सलाह, तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करना एवं देखरेख और देश भर में कीड़ों,कीटों और रोगों के उन्मूलन के लिए निगरानी और एकीकृत प्रणाली के द्वारा फसल हानि को कम करना

क्षमता निर्माण और लक्ष्य तक पहुंचाना

किसानों की क्षमता को सुधारना और किसानों द्वारा अनुशंसित प्रौद्योगिकियों की उपलब्धता  और सुगमता को सुनिश्चित करना

अनुसंधान विस्तार एवं किसान उद्योग  निरंतरता के सभी स्तरों पर किसानों के समूहों और क्षेत्रीय प्रसार और आईसीटी के उपयोग के संबंधों को स्थापित और मजबूत करना

 

 

गन्ना सुधार

किसानों की आमदनी को सुधारने के लिए एक माद्यम अवधि की योजना से किसानों की आय को दोगुना करने के लिए एक उपयुक्त तरीके से काम किया जायेगा। इसके प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं :

  • चुने गये विशेष स्थान पर गन्ने की सुधरी हुई किस्मों का प्रयोग
  • ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार किये गये प्रसिद्ध किस्मों के स्वस्थ बीजों/सेट्स की खेती करना
  • ज्यादा स्तर पर अपनाई गई खेती के लिए पौध रोपण तकनीक का उपयोग करना
  • मशीनीकरण और संसाधन के उपयोग की दक्षता में सुधार करना
  • गन्ने के लिए सूक्ष्म सिंचाई का विकास और जरूरत के आधार पर सिंचाई कार्यक्रम बनाना
  • रोगों, पीड़को और सूत्रकृमियों से होने वाली फसल की हानि को कम करने के लिए के लिये सही फसल संरक्षण तकनीकों को अपनाना
  • बाजार के आधार पर गन्ने में अंत:फसल को लगाना

प्रक्षेत्र क्रियाओं का यांत्रिकीकरण

परंपरागत प्रणाली के अंतर्गत प्रति एकड़ (0.4 हे.) भूमि में गन्ने की खेती के लिए लगभग 1170 श्रम घंटा और 130 जोड़ी बैल श्रम घंटे की जरूरत होती है। इस कारण से यह परिश्रम से भरा होता है, जो नीरसता को ही नहीं बढ़ाता परंतु यह उत्पादन की लागत को भी बढ़ा देता है। खेती की लागत और स्थायी लागत 1,50,000 रूपये के आसपास प्रति एकड़ प्राप्त होती है। कुल लागत का लगभग 45 – 48 प्रतिशत का भुगतान मानवीय श्रम पर केवल 15 – 16 प्रतिशत खर्च परिवहन सहित मशीनरी पर होता है। सारणी – 2 में उत्पादकता सुधार के लिए आगतों की उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए अनुशंसित प्रौद्योगिकियों के हस्तक्षेप का वर्णन किया गया है।

गन्ने की फसल आने वाले वर्षों में उपयुक्त रूप से शोषित करने वाले विकल्पों का एक स्तर प्रदान करती है। इसके लिए इन शर्करा कारखानों को शर्करा में से अन्य उत्पादों को उत्पादित करने के एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करने के लिए इनको कृषि संसाधन परिसरों में परिवर्तित कर देना चाहिए। गन्ना कृषि को भी उद्योगों के अनुसार गन्ना खेती, उर्जा और गन्ना जैव ईंधन को विभिन्न उद्देश्यों के लिए गन्ने की फसल को उगाकर विविधता उत्पन्न करने की जरूरत है।

नई प्रौद्योगिकियों के साथ पारस्परिक रूप से पूरक तरीकों से सुधरी किस्मों को एकीकृत करने के प्रयास करने की जरूरत है। इससे तकनीकों में नवीनता आएगी और गन्ना उत्पादन प्रणाली में कमी किये बिना वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना कर पाना संभव हो सकेगा।

लेखक : वी. वेंकटसुब्रमणियम, पी. मुरली, बक्शी राम, बृजमोहन सिंह बघेल और राजेश कुमार

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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