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अगस्त के मुख्य कृषि कार्य

इस पृष्ठ में अगस्त के मुख्य कृषि कार्य की जानकारी दी गयी है।

परिचय

अगस्त, जिसे आप श्रावण-भाद्रपद भी कहते हैं, बरसात की झड़ी लगा देता है तथा चारों तरफ हरियाली से भर देता है। खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि अधिकतर फसलें इस समय शुरुआती बढ़वार की अवस्था में होती हैं। अगर कुछ कारणों से फसल की बुआई जुलाई में नहीं हो पायी है तो इस समय चारे के लिए फसलों की बुआई कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा अथवा सिंचाई के समुचित साधन हैं, जैसे कि उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भागों में इस समय धान की फसल मुख्य फसल के रूप में खेतों में होती है।

इस समय कई राज्यों में मूंगफली की फसल भी प्रमुख फसल के रूप में उगायी जाती है। इस समय शुष्क और अर्द्धशुष्क मक्का , ज्वार, बाजरा, अरहर, मूग, उड़द, ग्वार, सोयाबीन व तिल फसलों के सस्य प्रबंधन की आवश्यकता होती है। सब्जी वाली फसलों में कद्दूवर्गीय सब्जी के साथ भिण्डी और अगेती मूली, फूलगोभी भी खेतों में इस समय है। इनमें भी उत्तम प्रबंधन की आवश्यकता होती है। इसलिए इस समय । के सभी सस्य प्रबंधन का उद्देश्य, खड़ी फसल के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान कर फसल की उत्तम बढ़वार और उपज को सुनिश्चित करना है।

धान की फसल में देखभाल

  • कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण कई बार धान की रोपाई देर से की जाती है। कई बार ऐसा देखा गया है कि वर्षा बहुत अधिक हो जाती है या वर्षा का आगमन देर से होता है। ऐसी परिस्थितियों में जलभराव के कारण समय पर रोपाई संभव नहीं हो पाती है। उपरोक्त दशा में कुछ विशेष सस्य क्रियाओं को अपनाया जाये तो पुरानी पौध के प्रयोग से धान की अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। रोपाई की दूरी घटा देनी चाहिए, जिससे प्रति इकाई पौधों की संख्या बढ़ जाये। ऐसी दशा में धान की रोपाई के लिए पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे को 20X10 एवं 15x10 सें.मी. दूरी पर लगायें और प्रति स्थान पर 3-5 पौधों की रोपाई करें। धान की देर से पकने वाली प्रजातियों की रोपाई इस समय बंद कर दें। धान में इस समय उर्वरक प्रबंधन महत्वपूर्ण होता है। नाइट्रोजन की बची हुई दो तिहाई मात्रा को दो भागों में समान रूप में डालें। नाइट्रोजन की पहली एक तिहाई मात्रा कल्ले निकलते समय तथा शेष एक तिहाई मात्रा का पुष्पावस्था पर यूरिया खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिए। यदि खेत में जिंक की कमी के लक्षण हों तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का 0.25 प्रतिशत बुझे हुए चूने के घोल के साथ 2-3 छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करें। जिन क्षेत्रों में धान की सीधी बुआई की जाती है वहां यदि पौधों में लौह तत्व की कमी दिखाई दे तो 0.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट का घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें।
  • साथ ही इस महीने में खरपतवारों के नियंत्रण की भी आवश्यकता होती है और विशेषकर ऊपरी भूमि या सीधी बुआई वाले धान में तो इस समय खरपतवार प्रबंधन अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। धान की फसल में लगभग 47 से 86 प्रतिशत तक का नुकसान खरपतवारों के द्वारा होता है। गीली जुताई (पडलिंग) के पश्चात धान की फसल में खरपतवारों की विशेष समस्या नहीं होती है। खरपतवार निकलने पर उन्हें उखाड़कर खेत में गहरा दबा देते हैं। धान की फसल में सारणी-1 के अनुसार खरपतवारनाशी किसी भी दवा का प्रयोग किया जा सकता है।
  • धान की फसल में झुलसा या जीवाणु पर्ण अंगमारी रोग जीवाणु के द्वारा होता है। पौधे की छोटी अवस्था से लेकर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी हो सकता है। इस रोग में पत्तियों के किनारे ऊपरी भाग से शुरू होकर मध्य भाग तक सूखने लगते हैं। सूखे पीले पत्तों के साथ-साथ राख के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं। नियंत्रण के लिए (1) नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग रोक देनी चाहिए। (2) पानी निकालकर प्रति हेक्टयर स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 15 ग्राम या 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड जैसे ब्लाइटॉक्स 50 या फाइटेलान का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर 10-12 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव कर देने चाहिए।
  • धान की फसल में पत्ती लपेटक, तना छेदक और फुदका कीटों के नियंत्रण के लिए कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 50 एस.पी. 2 ग्राम/लीटर या एसीफेट 75 एस.पी. 2 ग्राम/लीटर या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. को 1.4 लीटर/हेक्टयर या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी. 25 कि.ग्रा./हेक्टयर या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी. 30 कि.ग्रा./हेक्टयर की दर से बुरकाव करें। भूरे पौध फुदकों के नियंत्रण के लिए 200 मि.ली. कॉन्फीडोर/हेक्टयर को 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

मक्का, ज्वार और बाजरा

  • मक्का में बुआई के 40-45 दिनों बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टयर की दर से दूसरी व अन्तिम टॉप ड्रेसिंग नमी होने पर नर मंजरी निकलते समय करनी चाहिए। मक्का में बाली बनते समय पर्याप्त नमी होनी चाहिए अन्यथा उपज 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। सामान्यतः यदि वर्षा की कमी हो तो क्रांतिक अवस्थाओं (घुटने तक की ऊंचाई वाली अवस्था, झंडे निकलने वाली अवस्था, दाना बनने की अवस्था) पर एक या दो सिंचाइयां कर देनी चाहिए, जिससे उपज में गिरावट न हो।
  • खरीफ के मौसम में खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा होता है, जिससे 50-60 प्रतिशत उपज में गिरावट आ सकती है। इसलिए मक्का के खेत को शुरु के 45 दिनों तक खरपतवारमुक्त रखना चाहिए। खरपतवारों के प्रबंधन के लिए 2-3 निराई-गुड़ाई खुरपी या हैंड-हो या हस्तचालित अथवा शक्तिचालित यंत्रों से खरपतवारों को नष्ट करने से मृदा में पड़ने वाली पपडी भी टूट जाती है और पौधों की जड़ों को अच्छे वायु संचार से बढ़वार में मदद मिलती है। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए एट्राजिन की 1-1.5 कि.ग्रा./हेक्टयर मात्रा का छिड़काव करके भी नियंत्रित किया जा सकता है। एट्राजिन की आवश्यक मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद परंतु जमाव से पहले छिड़क देना चाहिए।
  • रोगों को रोकने के लिए रोगरोधी  प्रजातियों की समय से बुआई करनी चाहिए, जबकि मेडिस, टर्सिकम लीफ ब्लाइट की रोकथाम के लिए 2.5 कि.ग्रा./हेक्टयर जिनेब को 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। यदि रोग की रोकथाम न हो तो 10-15 दिनों के अंतराल पर दूसरा छिड़काव अवश्य कर देना चाहिए। मक्का की फसल में पत्ती लपेटक कीट की रोकथाम के क्लोरोपायरीफॉस एक मि.ली. पानी में मिलाकर या इमानेकटिन बेंजोएट एक मि.ली. लीटर दवा 4 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • दाने के लिए ज्वार की फसल में विरलीकरण (थिनिंग) करके पंक्तियों में पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सें.मी अवश्य कर दें। विरलीकरण का कार्य करने के बाद उन्नत/संकर प्रजातियों में 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टयर की दर से टॉप डैसिंग बुआई के 30-35 दिनों बाद खड़ी फसल में छिड़क दें। असिंचित दशा में 2 प्रतिशत यूरिया का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना अत्यंत लाभप्रद पाया गया है। ज्वार की फसल में पौधों की वृद्धि, फूल तथा दाना बनते समय सिंचाई करना आवश्यक होता है। ज्वार की फसल के लिए सिंचाई देने की चार क्रान्तिक अवस्थाएं हैं-प्रारंभिक बीज पौधे की अवस्था, भुट्टे निकलने से पहले, भुट्टे निकलते समय व भुट्टों में दाना बनने की अवस्थाएं। ज्वार की अच्छी उपज लेने के लिए बुआई के 3 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ भूमि में वायु का संचार होता है तथा भूमि में नमी भी सुरक्षित रहती है। यदि किसी कारणवश निराई-गुड़ाई संभव न हो तो बुआई के तुरंत बाद एट्राजिन नामक खरपतवारनाशी का 0.75-1.0 कि.ग्रा. 700-800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टयर की फिर दर से छिड़काव करना चाहिए।
  • तना मक्खी ज्वार का एक प्रमुख कीट है। इसका प्रकोप पौधों के जमाव के लगभग 7 से 30 दिनों तक होता है। कीट की इल्लियां उगते हुए पौधों की गोफ को काट देती हैं, जिससे शुरू की अवस्था में ही पौधे सूख जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए फोरेट 10 जी. या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी बुआई के समय 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टयर की दर से कूड़ों में डालना चाहिए।
  • मण्डुआ, झंगोरा, रामदाना, और कुट्टू की फसल में तनाछेदक कीट का प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिये क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी की  20 मि.ली. दवा प्रति नाली की दर से 15-20 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।
  • तनाछेदक कीट से बचाव के लिए लिए कार्बारिल 2.5 मि.ली. लीटर दवा का घोल प्रति लीटर 500 लीटर पानी में मिलाकर या लिन्डेन 6 प्रतिशत ग्रेन्यूल अथवा कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत ग्रेन्यूल 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें। 8 ट्राइकोकार्ड प्रति हेक्टयर लगाने से भी इसकी रोकथाम की जा सकती है।

दलहनी फसलों की देखभाल

  • उड़द व मूंग की शीघ्र पकने वाली किस्मों की बुआई करें। इसके लिये मूंग की पी.डी.एम.-54, नरेन्द्र मूंग-1, पन्त मूंग-2, पन्त मूंग-4, पन्त मूंग-5 एवं उड़द के लिये पन्त उड़द-35, पन्त उड़द-31, पंत उड़द-19, पन्त उड़द-40, नरेन्द्र उड़द-1 की बुआई कर सकते हैं। यदि मृदा की जांच नहीं कराई गई है तो 10-15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हेक्टयर की दर से बुआई के समय कूड़ों में डालना चाहिए। अरहर, मूंग, उड़द व लोबिया इस प्रकार की दलहनी फसलों में फूल आने पर मिट्टी में हल्की नमी बनाये रखें। इससे फूल झड़ेंगे नहीं तथा अधिक फलियां लगेंगी व दाने भी मोटे तथा स्वस्थ होंगे। परंतु खेतों में वर्षा का पानी खड़ा नहीं होना चाहिए तथा जल निकास अच्छा होना चाहिए।
  • बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। पहली सिंचाई के बाद निराई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ भूमि में वायु का संचार भी होता है, जो मूल ग्रन्थियों में क्रियाशील जीवाणुओं द्वारा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन एकत्रित करने में सहायक होता है। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण हेतु 2.5-3.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर बुआई के 2 से 3 दिनों के अंदर अंकुरण के पूर्व छिड़काव करने से 4 से 6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते हैं। चौड़ी पत्ती तथा घास वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिये पेन्डीमेथिलीन (30 ई.सी.) 3.30 लीटर या एलाक्लोर 4 लीटर या फ्लूक्लोरोलिन (45 ई.सी.) नामक रसायन की 2.20 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चाहिए। अतः बुआई इस के 15-20 दिनों के अंदर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए।
  • उड़द, मूंग एवं अरहर की फसल में पीला मोजैक की रोकथाम के लिए डाइमोथेएट (30 ई.सी.) एक लीटर या मिथाइल-ओ-डिमिटान (25 ई.सी.) एक लीटर मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 10-15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें। या इमिडाक्लोरोप्रिड 0.5 मि.ली./लीटर पानी 500 लीटर प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें।

सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी और तिल

  • सोयाबीन और तिल में भी खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ होने वाले प्रमुख रोगों और कीटों को नष्ट करने के लिए उपाय करने चाहिए। सोयाबीन की फसल पर पीला मोजैक रोग का विशेष प्रभाव पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए डाईमेथोएट (30 ई.सी.) या मिथाइल-ओ-डिमेटान 25 ई.सी.) की एक लीटर मात्रा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 10-15 दिनों के अंतराल पर 1-2 छिड़काव करें। खेत में दीमक का प्रकोप दिखाई देने पर मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 750 मि.ली. या क्लोरोपायरीफॉस (20 ई.सी.) 2.5 लीटर या क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.5 लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें।
  • मूँगफली की फसल में बुआई के 35-40 दिनों तक पुष्पावस्था से पेगिंग के होते हैं। इस समय पर पानी की कमी होने पर मूंगफली की उत्पादकता काफी कम हो जाती है। इसलिए इस समय यदि वर्षा नहीं होती है तो सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए। इस समय यदि पेगिंग हो गयी है तो पौधों के चारों ओर मिट्टी चढ़ाने का कार्य करने से फली का विकास अच्छा होता है और पैदावार में बढ़ोतरी होती है। समय सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे बोरॉन की कमी दिखने पर 0.2 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का प्रयोग करें। इसी प्रकार जिंक की कमी होने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 0.25 प्रतिशत चूने का प्रयोग करना चाहिए।

गन्ने की फसल में देखभाल

  • वर्षा न होने की स्थिति में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। हल्की मिट्टी वाले क्षेत्र में फसल को गिरने से बचाने तथा देर से फूटने और कल्लों को निकलने से रोकने के लिए वर्षा प्रारंभ होते ही पौधे की जड़ों पर अच्छी तरह मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। अगस्त-सितंबर में फसल की बंधाई कर देनी चाहिए, ताकि फसल गिरने न पाए, क्योंकि फसल गिरने से उपज तथा गन्ने में शक्कर की मात्रा दोनों कम हो जाती हैं। गुरदासपुर बेधक एवं सफेद मक्खी के प्रभावी नियंत्रण हेतु जल निकास की व्यवस्था करें तथा मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 1-1.5 लीटर प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें। अगस्त में गन्ने पर चढ़ने वाले खरपतवार यथा आइपोमिया प्रजाति (बेल) की बढ़वार होती है, जिसे खेत से उखाड़कर फेंक दें अथवा मेट सल्फ्यूरॉन मिथाइल 4 ग्राम प्रति हेक्टयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर जब इसमें छोटे पौधे खेत में दिखाई पड़े प्रयोग करना चहिये।

सब्जी वाली फसलों का उत्पादन एवं प्रबंधन

  • खरीफ मौसम में टमाटर की पूसा सदाबहार, पूसा रोहिणी, पूसा-120, पूसा गौरव, पी.एच.-2 और पी.एच.-8 की रोपाई कर सकते हैं।
  • हरी प्याज की रोपाई से पूर्व 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद या 8 टन नाडेप कम्पोस्ट खेत में मिला दें तथा अन्तिम जुताई के बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला दें।
  • शिमला मिर्च, टमाटर एवं गोभी की मध्यमवर्गीय प्रजातियों की पौधशाला में बिजाई पूरे साप्ताहिक अंतराल पर कर सकते हैं।
  • बैंगन, मिर्च व भिण्डी की फसलों में निराई-गुड़ाई व जल निकास तथा रोग एवं कीटों से रोकथाम की व्यवस्था करें। बैंगन में रोपाई के 30 दिनों बाद 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, मिर्च में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा फूलगोभी में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग प्रति हेक्टयर की दर से प्रयोग करें।
  • इस समय बैंगन में कोक्सीनेल्ला बीटल का प्रकोप होता है। इसकी रोकथाम के लिए क्विनालफॉस 2 एम.एल. प्रति लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिए। साथ ही शूट और फूट बोरर के लिए कार्बारिल 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
  • पूसा संकर-3 लौकी की बुआई अगस्त तक की जा सकती है और इस किस्म में लौकी की तुड़ाई 50-55 दिनों में शुरू हो जाती है।
  • कददूवर्गीय सब्जियों में प्रति हेक्टयर 25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 54 कि.ग्रा. यूरिया को दो भागों में बांटकर बुआई के 30 एवं 45 दिनों बाद टॉप ड्रेसिंग करें। कददूवर्गीय सब्जियों में मचान बनाकर उस पर बेल चढ़ाने से पैदावार में वृद्धि होगी और फल स्वस्थ होंगे। सभी सब्जियों में उचित जल निकास की व्यवस्था करें।
  • गाजर की पूसा मेघाली, पूसा यमदाग्नि व पूसा वृष्टि एवं मुली की पूसा चेतकी व पूसा देसी क़िस्मों की बुआई अगस्त तक की जा सकती है, जो कि 40-50 दिनों में तैयार हो जाती है।

बागवानी फसलों का उत्पादन एवं प्रबंधन

  • मानसून के समय बागानों में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए। । साथ ही लगातार बागों में निगरानी रखें और रोग आदि के लक्षण दिखने पर शीघ्र उपचार करें।
  • आम के बागों से फलों की तुड़ाई के बाद पेड़ों की रोग वाली और फालतू शाखाओं की कटाई-छंटाई करें। रोग व सूखी टहनियों को काट कर जला दें। नये पेड़ों में 500 ग्राम नाइट्रोजन प्रति पेड़ की दर से प्रयोग करें। आम में शल्क कीट तथा शाखा गांठ कीट की रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियान एक मि.ली. या डाई मेथोएट 1.5 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में से किसी एक दवा का 15 दिनों के अंतराल पर बदलकर दो बार छिड़काव करें। तराई क्षेत्रों में आम के पौधों पर गांठ बनाने वाले कीड़े गॉल मेकर की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 0.5 प्रतिशत या डाईमेथोएट 0.06 प्रतिशत दवा का छिड़काव करें। आम के पौधों पर लाल रतुआ एवं श्यामव्रण (एंथ्रोक्नोज) के रोग पर कॉपर ऑक्सीकक्लोराइड 0.3 प्रतिशत दवा का छिड़काव करें।
  • आम एवं लीची में रेडरस्ट और सूटी मोल्ड की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 30 ग्राम प्रति लीटर या ब्लाइटॉक्स 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर) का छिडकाव पेडों पर करें। लीची की फसल में लीफ माइनर की रोकथाम के लिए मेटासिस्टॉक्स 2 मि.ली. प्रति लीटर का प्रयोग करें। लीची की छाल को खाने वाले कीड़ों की रोकथाम के लिए इनके द्वारा बनाए गए छिद्रों में क्लोरोफार्म पेट्रोल या केरोसिन को रूई की मदद से उपचार कर नष्ट करना चाहिए।
  • नीबू में सिट्रस कैंकर रोग, जिसमें रोग के लक्षण पत्तियों से प्रारंभ होकर बाद में टहनियों, कांटों और फलों पर आ जाते हैं, की रोकथाम के लिए गिरी हुई  पत्तियों को इकट्ठा कर नष्ट कर दें तथा रोगयुक्त टहनियों की काट-छांट कर बोंड मिश्रण (5:5:50) का छिड़काव करें। ब्लाइटॉक्स 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव पेड़ पर करें। नीबूवर्गीय फलों में रस चूसने वाले कीड़े आने पर मेलाथियान 2 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  • पपीते के पौधों पर फूल आने के समय 2 मि.ली. सूक्ष्म तत्वों को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  • बेर में मिलीबग कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

पुष्प व सुगंध वाले पौधों का प्रबंधन

  • गुलाब की नर्सरी स्टॉक की क्यारियों  में बदलाई करें। गुलाब की फसल में जल निकास की व्यवस्था करें तथा आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करते रहें।
  • रजनीगंधा, ग्लोडियोलस में आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई-गुड़ाई करें तथा पोषक तत्वों के मिश्रण का छिड़काव करें एवं रजनीगंधा के स्पाइक की समय पर कटाई करें।
  • फूलों के खेतों में वर्षा का पानी निकालने का इंतजाम करें। फूलों में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को समय पर निकालते रहें।

बाजरा

बाजरा की बुआई अगस्त के प्रथम पखवाड़े तक पूरी कर लें। बुआई के 15-20 दिनों बाद विरलीकरण करके कमजोर पौधों को निकालकर लाइन में पौधों के आपस की दूरी 10-15 सें.मी. कर लेनी चाहिए। संकर/उन्नत प्रजातियों में 85-108 कि.ग्रा. यूरिया की टॉप डैसिंग/हेक्टयर की दर से करें। बाजरे की फसल में फूल आने की स्थिति में सिंचाई करना लाभप्रद होता है। वर्षा न होने की स्थिति में 2-3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पौधों में फुटान होते समय, बालियां निकलते समय तथा दाना बनते समय नमी की कमी नहीं होनीचाहिए। बाजरा जलप्लावन से भी प्रभावित होता है। अतः ध्यान रहे कि खेत में पानी इकट्ठा न होने पाये। खरपतवार नियंत्रण के लिए एक कि.ग्रा. एट्राजिन/हेक्टयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव बुआई के बाद तथा अंकुरण से पूर्व करते हैं।

अरहर

इस समय अरहर की फसल में उकठा, फाइटोफ्थोरा, अंगमारी व पादप बांझ रोग की रोकथाम के लिए 2.5 मि.ली. डाइकोफॉल दवा एक लीटर पानी में घोलकर एवं 1.7 मि.ली. डाइमेथोएट दवा एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करें। जिस खेत में उकठा रोग का प्रकोप अधिक हो उस खेत में 3 से 4 साल तक अरहर की फसल नहीं लेनी चाहिए। अरहर के ज्वार साथ की सहफसल लेने से काफी हद तक उकठा रोग का प्रकोप कम हो जाता है। ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज को उपचारित करना चाहिए। इन दलहनी फसलों में फलीछेदक कीड़े का प्रकोप भी इसी महीने अरहर पूसा-16 आता है। इसके लिए जब 70 प्रतिशत फलियां आ जाएं तो मोनोक्रोटोफॉस 36 एस एल को 300 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 15 दिनों बाद छिड़काव कर सकते हैं।

सारणीः विभिन्न रसायनों की मात्रा और छिड़काव करने का समय

रसायन

 

सक्रिय तत्व की मात्रा (कि.ग्रा./लीटर/हेक्टयर)

पानी की मात्रा (लीटर/हेक्टयर)

छिड़काव करने का उपयुक्त समय

 

पेन्डीमेथेलिन

1.0-1.5

 

500-600

रोपाई या बुआई के 1 से 2 दिनों बाद छिड़काव करें

ऑक्सीडायर जाइल

 

0.080-0.100

 

500-600

रोपाई या बुआई के 2 से 3 दिनों बाद छिड़काव करें

पाइराजोसल्फ्यूरॉन इथाइल 10 डब्ल्यू.पी.

 

0.020-0.025

600-700

रोपाई या बुआई के 1 से 2 दिनों बाद छिड़काव करें

प्रेटिलाक्लोर+सेफनर

 

0.750

 

600-700

रोपाई या बुआई के 3 से 5 दिनों बाद छिड़काव करें

बिसपाईरीबैक सोडियम 10 एस.सी. (नोमिनी गोल्ड)

0.020-0.025

600-700

रोपाई या बुआई के 25 से 30 दिनों बाद छिड़काव करें

पेन्डीमेथेलिन एवं उसके बाद बिसपाईरीबैक सोडियम

1.0.1.5 उसके बाद 0.025

 

500-600

रोपाई या बुआई के 1 से 2 दिनों तथा रोपाई या बुआई के 20-25 दिनों छिड़काव करें

 

ईथोक्सीसल्फ्यूरान 15 डब्ल्यू.डी.जी.

30 ग्राम

 

600-700

20-25 दिनों बाद छिड़काव करें

साइहेलोफोप ब्यूटाइल 10 ई.सी.

75-80

 

600-700

10-20 दिनों बाद छिड़काव करें

एजिमसल्फ्यूरॉन 50 डी.एफ.

 

70

 

600-700

50-60 दिनों बाद छिड़काव करें

सूरजमुखी

सूरजमुखी की फसल में बुआई के 15-20 दिनों बाद फालतू पौधे निकालकर पंक्तियों में पौधे से पौधे की दूरी 20 सें.मी. करें। बुआई के 25 दिनों बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टयर की दर से टॉप ड्रेसिंग करें। फसल की बुआई के 40-45 दिनों बाद दूसरी निराई-गुड़ाई के साथ पौधों पर 15-20 सें.मी. मिट्टी चढ़ा दें। बुआई के 20 से 25 दिनों बाद पहली सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करना अति आवश्यक है। इससे खरपतवारपर नियंत्रण होता है। रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथिलीन 30 ई.सी. की 3.3 लीटर मात्रा 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टयर की दर से बुआई के 2-3 दिनों के अंदर छिड़काव करने से खरपतवारों का जमाव नहीं होता है। पहली सिंचाई बुआई के 20 से 25 दिनों बाद हल्की या स्प्रिंक्लर से करनी चाहिए, बाद में आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। कुल 5 या 6 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। फूल निकलते समय और दाना भरते समय बहुत हल्की सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, जिससे पौधे जमीन में गिरने न पाएं। क्योंकि जब दाना पड़ जाता है तो सूरजमुखी के फूल के द्वारा पौधे पर बहुत ही वजन आ जाता है, जिससे कि पौधा गिर सकता है।

भिण्डी

भिण्डी की फसल में बुआई के 50 दिनों बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 87 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टयर की दर से दूसरी टॉप ड्रेसिंग करें एवं भिण्डी की कटाई सही समय पर करें। सामान्यता फूल आने के 8-10 दिनों के भीतर भिण्डी की फली की तुड़ाई अवश्य करें। फली छेदक कीड़ों के प्रकोप से बचने के लिए मैलाथियान (50 ई.सी.) की 500-600 मि.ली. मात्रा का छिड़काव करते हैं। विशेष ध्यान रखें कि कीटनाशी का प्रयोग करने के 7-8 दिनों तक फली की तुडाई न करें।

फूलगोभी

अगस्त में फूलगोभी की अगेती किस्में जैसे-पूसा शरद, पूसा संकर-2, पूसा मेघना, पूसा पौषजा, पूसा शुक्ति प्रजातियों की बुआई के लिए नर्सरी तैयार करें। नर्सरी तैयार करने के लिए मिट्टी को कवकनाशी जैसे फार्मेल्डिहाइड की 25-30 मि.ली. मात्रा एक लीटर पानी में मिलाकर नर्सरी वाले क्षेत्र में छिड़कना चाहिए। नर्सरी को पॉलीथीन शीट से ढक दें और इसके करीब 15 दिनों बाद बुआई करें। फूलगोभी की मध्यमवर्गीय प्रजातियों की रोपाई के लिए प्रति हेक्टयर 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद या 8 टन नाडेप कम्पोस्ट खेत की तैयारी के समय तथा 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश अंतिम जुताई या रोपाई से पूर्व खेत में अच्छी तरह मिला दें। फूलगोभी की फसल में डैम्पिंग ऑफ के नियंत्रण के लिए एप्रॉन एस.डी. 35 या थिरम 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार तथा एंथ्रेक्नोज के लिये डायथेन एम-45 या बाविस्टीन 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

अमरूद

अमरूद के पौधों का रोपण 5x5 मीटर की दूरी पर करना चाहिए और पौध लगाते समय प्रति गड्ढा 25-30 कि.ग्रा. गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसके लिए प्रथम वर्ष में 260 ग्राम यूरिया, 375 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 500 ग्राम पोटेशियम सल्फेट प्रति पौधा डालना चाहिए। इसके बाद आयु की दर से उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। अमरूद में वर्षा के समय की फसल से पैदावार तो अधिक मिलती । है, किन्तु गुणवत्ता खराब होती है। इसलिए इस मौसम में फल न लेकर शरद ऋतु में लेने के लिए आवश्यक कृषि कार्य करने चाहिए।

लेखन: राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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