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कृषि - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस पृष्ठ में कृषि से सम्बंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न बताये गए है।

नाइट्रोजन के प्रमुख उर्वरक कौन से हैं और उनमें नाइट्रोजन की मात्रा कितनी है?

नाइट्रोजन के प्रमुख उर्वरक निम्लिखित हैं। प्रत्येक उर्वरक में उपस्थित नाइट्रोजन कोष्ठ में दी गई है : यूरिया (46% ) कैल्शियम साइनामाईड (21%)ए कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (25% तथा 26% )ए अमोनिया सल्फेट नाइट्रेट (26%)ए अमोनिया नाइट्रेट (33-34%) ए अमोनिया सल्फेट (20%) ए अमोनिया क्लोराइड (24-26%) ए कैल्शियम नाइट्रेट (15.5%) ए सोडियम नाइट्रेट (16%) ए अमोनिया घोल (20-25%) ए अमोनिया एनहाईड्रेस (82%) ए तथा अमोनिया फास्फेट (20% नाइट्रोजन + 20% पी2ओ5), पोटेशियम नाइट्रेट (13% नाइट्रोजन तथा 44% पोटाशियम), यूरिया सल्फर(30 से 40%) नाइट्रोजन तथा 6 से 11% गंधक), दी अमोनियम फास्फेट (18% नाइट्रोजन तथा 46% पी2ओ5)।

किसान खाद तथा यूरिया में क्या अन्तर है जबकि दोनों में ही नाइट्रोजन तत्व ही होता है?

किसान खाद के अन्दर उपस्थित नाइट्रोजन की आधी मात्रा अमोनिया तथा आधी मात्रा नाइट्रेट रूप में होती है जबकि यूरिया में नाइट्रोजन रूप में होती है, जो बाद में रूपान्तरित होकर पहले अमोनियम तथा फिर नाइट्रेट में बदलती है। मृदा के अन्दर किसान खाद की प्रतिक्रिया उदासीन तथा यूरिया की आरम्भ में क्षारीय तथा बाद में अम्लीय हो जाती है। किसान खाद में नाइट्रोजन के अलावा 9.1 प्रतिशत कैल्शियम भी होता है। यूरिया में नाइट्रोजन 46 प्रतिशत होती है जबकि किसान खाद में 25 प्रतिशत या 26 प्रतिशत तक।

खड़ी फसल में यूरिया का छिड़काव कैसे करें?

खड़ी फसल की आयु, अवस्था तथा प्रकार के अनुसार 2 -3 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव किया जाता है। घोल की मात्रा का निर्धारण फसल की वानस्पतिक वृद्धि तथा छिड़कने वाले यंत्र पर निर्भर करेगा। खाद्यान की फसलों पर हसतचलित यंत्र से छिड़काव करने के लिए 200–300 लीटर घोल प्रर्याप्त होता है। यदि 2 प्रतिशत का 250 लीटर घोल छिड़कना हो तो 5 किलो यूरिया को 10–15 लीटर पानी में पहले अच्छी तरह से घोलकर, फिर आयतन 250 लीटर स्वच्छ पानी द्वारा बना लें। फिर जब आकाश साफ हो, ओस सूख गयी हो, हवा का दबाव कम हो तथा वर्षा का कोई आसार ना हों तो छिड़काव कर देना चाहिए। फिर आवश्यकतानुसार 2-3 छिड़काव 12-15 दिन के अन्तराल पर करके पूरा लाभ उठाया जा सकता है।

फास्फोरस की कमी के सामान्य लक्षण क्या हैं?

फास्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियों का रंग बैंगनी या गहरा हों जाता है। पुरानी पत्तियां आरम्भ में पीली और बाद में लाल – भूरी पड़ जाती है। पत्तियों के शिरे सूखने लगते हैं। पौधों की वृद्धि दर प्रतिदर कम हों जाती है। पौधे बौने,पतले सीधेतथा कम पत्तियों वाले होते हैं । कमी में जड़ों का विकास कम होता है, फुटाव कम होता है। बालियां दाने कम बनते हैं। दाने देर से बनते हैं। फसल देर से पकती है। दाने की अपेक्षा भूसे का अनुपात बढ़ जाता है। पौधों पर रोगों का हमला अधिक होता है। दलहनी फसलों में जीवाणुओं द्वारा नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कम होता है।

पोटैशियम का पौधों के पोषण में क्या कार्य है?

पोटैशियम, पत्तियों में शर्करा और स्टार्च के निर्माण की कुशलता वृद्धि करता है। यह दोनों के आकार तथा भार को बढ़ाता है। नाइट्रोजन की दक्षता को बढ़ाता है। पोटैशियम कोशिका पारगम्यता में सहायक होता है कार्बोहाइड्रेटो के स्थानान्तरण में सहायता करता है और पौधे में लोहे को अधिक चल रखता है। पोटैशियम पौधों में रोगों के प्रति प्रतिरोधिता को बढ़ाता है। प्रोटीन संक्ष्लेषण को बढ़ाता है। पौधे की सम्पूर्ण जल व्यवस्था को नियन्त्रित करता है और पौधों को पीले तथा सूखे से रक्षा करता है। पौधों के तने को कठोरता प्रदान करके गिरने से बचाता है। इसके अतिरिक्त पौधों की विभिन्न क्रियाओं को नियन्त्रित करने वाले एन्जाइमों को संचालित करता है।

रासायनिक उर्वरक श्रेष्ठ है या अन्य जैविक खादें। इनमे से कौन से खाद इस्तेमाल की जाए?

क्या उर्वरकों के निरन्तर प्रयोग से भूमि की दशा बिगड़ जाती है?  जैविक खादें और उर्वरक ही एक दूसरे के सहयोगी है। जोकि एक – दूसरे की फसल द्वारा प्रयोग करने की क्षमता बढ़ाते है। उर्वरकों को असन्तुलित मात्रा, भूमि की किस्म के अनुसार सही उर्वरक न प्रयोग करने से भूमि की दशा थोड़ी बिगड़ सकती है। परन्तु इन दोनों ही बातों का ध्यान रखें तो उर्वरकों के निरन्तर प्रयोग से भी दशा पहले की अपेक्षा सुधर सकती है। अकेले जैविक खादों द्वारा पोषक तत्वों की पूरी मात्रा देना असम्भव ही है क्योंकि उनको पोषक तत्वों की आवश्यकता पूर्ति करने की क्षमता सीमित ही है। दूसरी ये अधिक मात्रा में उपलब्ध भी नहीं है। तीसरे इनका ढोना और खेत में डालना काफी महंगा पड़ेगा हम तो यही कहेगे की थोड़ी मात्रा में जैविक खाद सभी खेतों में प्रयोग करें और पोषक तत्वों की पूर्ति उर्वरकों से करें।

मैग्नीशियम की कमी के क्या लक्षण है?

मैग्नीशियम की कमी में खासकर पुरानी पत्तियों का क्लोरिफल कम हो जाता है और फलस्वरूप पौधा पीला हों जाता है। पीलापन पत्ती की शिराओं के बीच वाले भाग पर अधिकाधिक दिखाई देता है। सामान्तर शिराओं वाली पत्तियों में हरे तथा भूरे रंग की धारियां से बन जाती है क्योंकि शिराएं हरी रहती है लेकिन बीच के भाग का रंग उड़ जाता है। यदि कमी लगातार देर तक बनी रहे तो फिर रंग लाल व भूरा हों जाता है और कई बार पत्तियां सूख भी जाती है।

गन्धक की कमी के लक्षण क्या है?

गन्धक की कमी के लक्षण मुख्यता रेतीली जमीनों में प्रकट होते है। कमी के लक्षण मुख्यता नयी पत्तियों पर प्रकट होते है। पत्तियों का हरा रंग समाप्त होना शुरू हों जाता है। कई बार रंग धारियों में उड़ता है चौड़ी पत्ती वाले पौधों में पत्तियों का रंग पीला या सुनहरी पीला हों जाता है। पत्तियों के किनारे ऊपर या नीचे की ओर मुड जाते है। और प्याले जैसे आकार के दिखने लगते है।

कौन सी फसलों को गन्धक की अधिक आवश्यकता होती है?

तिलहनी फसलों को सबसे अधिक मात्रा में गन्धक की आवश्यकता होती है। इसके साथ गन्धक दलहनी फसलों को भी चाहिए। अन्य फसलों की आवश्यकता आमतौर पर मिट्टी से पूरी हों जाती है। लेकिन उपरोक्त फसलों के लिए फास्फोरस के स्त्रोत सिंगल सुपरफास्फेट अथवा जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि सिंगल सुपर फास्फेट में 11 – 12 तथा जिप्सम में 18 – 19 प्रतिशत गन्धक होती है।

जस्ते का पौधों के पोषण में क्या महत्व है?

जस्ता अनेकों एंजाइमों का एक घटक होता है जैसे कार्बोनिक एनहाइड्रेस, एलकोहल जिहाइड्रोजेनेस और विभिन्न पेप्टीडेस। अत: यह अनेको एंजाइमीप्रतिक्रियों के लिए आवश्यक होता है। यह वृद्धि हार्मोनों के निर्माण में भी सहायता करता है। जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।

क्या जिंक सल्फेट और यूरिया मिलाकर छिड़के जा सकते है?

हां, बहुत ही सफलतापूर्वक दोनों को मिलाकर छिड़का जा सकता है। जिंक सल्फेट का घोल तेजाबी होता है। जबकि यूरिया का घोल क्षारीय होता है अत: दोनों को साथ मिलाकर छिड़कने से सामान्य घोल मिलता है। साधारणतया फसलों में जस्ते की कमी के साथ नाइट्रोजन की कमी होती है। अत: दोनों को एक साथ छिड़कने से दोनों की कमी दूर हों जाती है। यदि फसल में नाइट्रोजन की कमी ना हों तो फिर यूरिया का छिड़काव नहीं करना चाहिए।

लोहे की कमी के क्या लक्षण है?

लोहे की कमी के लक्षण नयी पत्तियों पर दिखाई देते हैं। शिराओं के बीच से पत्तियों का रंग उड़ जाता है। इसके बाद यही प्रक्रिया पुरानी तथा पुरे आकार की पत्तियों में होने लगती है। लोहे की कमी में शिराओं का भी रंग उड़ जाता है। पूरी पत्ती कई बार सफेद दिखाई देने लगती है।

लोहे की कमी कैसे दूर करें?

लोहे की कमी को दूर करने के लिए सबसे उत्तम साधन है कि फसल पर 1-2 प्रतिशत फैरस – सल्फेट घोल के 250 – 300 लीटर प्रति एकड़ के 2-3 छिड़काव 12-15 दिन के अन्तराल पर करने से लोहे की कमी दूर की जा सकती है। साधारणतया यदि मिट्टी में घुलनशील फैरस सल्फेट डाला जाता है तो वह शीघ्र आक्सीजन से क्रिया करके अघुलनशील फैरिक रूप में बदल जाता है जो पौधों के लिए अप्राप्य हों जाता है। इसके अतिरिक्त आयरन चोलेट को भी फसल पर छिड़ककर लोहे की कमी को ठीक किया जा सकता है। उच्च पी.एच. मान पर सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। फैरस सल्फेट के घोल को उदासीन कर लेना भी आवश्यक है क्योंकि यह तेजाबी होता है। 0.5 – 1.0 प्रतिशत चुने का छना पानी इसके तेजाबी असर को कम कर देता है।

अच्छी कम्पोस्ट किस प्रकार तैयार करें?

कम्पोस्ट बनाने से पहले फार्म के जो भी कचरा उपलब्ध हों इकट्ठा कर लिया जाता है उस सारे को आपस में मिला दिया जाता है। फिर 15 से 20 फुट लम्बा, 5-6 फुट चौड़ा, 3-3 ½ फुट गहरा गड्डा बना लिया जाता है फिर कचरे कि एक फुट गहरी तह बिछा दी जाती है फिर उसे गोबर के घोल से अच्छी तरह गीला कर दिया जाता है। यही क्रम तब तक अपनाया जाता है जब तक कि कचरे का स्तर भूमि की सतह से 2-2 ½ फुट ऊँचा ना हों जाए। फिर ऊपर से इसे मिट्टी से ढक दिया जाता है। यदि गर्मी में गड्डा भरा हों तो 15-20 दिन के अन्तर पर 1-2 बार गड्डे में पानी छोड़ देना चाहिए ताकि कचरे को गलाने के लिए पर्याप्त नमी बनी रहे। वर्षा ऋतु तथा जाड़ोंमें पानी डालने कि आवश्यकता नहीं । लगभग 4 माह में खाद तैयार हों जाएगी। जिसमे 0.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.15 प्रतिशत फास्फोरस तथा 0.5 प्रतिशत पोटाश होगी।

दलहनी फसलों में राईजोबियम टीका लगाने से क्या लाभ हैं ?

राईजोबियम का टीका अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग होता है टीका लगाने से राईजोबियम के जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है और उनकी क्रियाशीलता बढ़ती है जिससे वे वयुमंडल से अधिक से अधिक नाइट्रोजन लेकर पौधों की जड़ों में स्थित ग्रन्थियों में स्थिर करते है जोकि दलहन के पौधों को मिलती है और बाद में उगाई जाने वाली फसल का उपज बढ़ाने में भी सहायक होती है ।

राईजोबियम कल्चर किन-किन फसलों के काम आता है?

यह निम्न दलहनी फसलों के काम आता है – चना, मसर, मटर, बरसीम, रिजका, मूंग, उडद, लोबिया, अरहर, ग्वार, सोयाबीन, तथा मूंगफली। हरेक फसल का टीका अलग-अलग होता है।

राईजोबियम टीका लगाने की विधि क्या है ?

राईजोबियम कल्चर का प्रयोग बीज के साथ बुआई के समय निम्नलिखित विधि के अनुसार करें:-

1. 50 ग्राम गुड़ या शक्कर को 300 ग्राम पानी में घोल लें। पानी की मात्रा बीज की मात्रा के अनुसार घटाई बढ़ाई जा सकती है।

2. एक एकड़ के बीजों को साफ फर्श या तिरपाल पर बिछा लें।

3. गुड़ के घोल को धीरे-धीरे बीजों को डालें । फिर घोल को बीज के साथ मिलाएं यदि घोल कम पड़ें तो मात्रा बढ़ा लें।

4. इसके बाद कल्चर की थैली को खोलकर कला पाउडर बीजों पर छिड़कें। अच्छी तरह हाथ से मिलाएं ताकि सारे बीज पर काले पाउडर का लेप हों जाए।

5. कल्चर से उपचारित बीजों को 5-6 घण्टे छाया में सुखाकर बिजाई के लिए प्रयोग करें।

दलहनी फसलों के बाद गेहूं में कितनी नाइट्रोजन डालनी चाहिए?

यदि दलहनी फसलों को चारे के लिए प्रयोग कर लिया जाए तो गेहूं में 25 प्रतिशत कम नाइट्रोजन दें। दाने के लिए पकाई गई दलहन फसल के बाद गेहूं की फसल को नाइट्रोजन की पूरी मात्रा 48 किलोग्राम प्रति एकड़ का ही प्रयोग करें।

अरहर की फसल काटने के बाद गेहूं की फसल कुछ पीली रहती है एवं उपज भी कम मिलती है ऐसा क्योँ ?

अरहर की फसल पकते समय खेत में भारी मात्रा में जड़ें तथा पत्तियां छोड़ती है। जिनका गेहूं बोने के बाद गलना सड़ना शुरू होता है क्योंकि अरहर के खेत अक्तूबर नवम्बर में खाली होते है। इस समस्या से बचने के लिए अरहर फसल काटने के तुरन्त बाद सूखे खेत की जुताई कर देनी चाहिए और खेत को पलेवा करते समय 12-15 किलो नाइट्रोजन ( 25-30 किलो यूरिया) प्रति एकड़ डालने से पौधों के अवशेष समय से गल-सड़ जाते है। फलस्वरूप गेहूं की फसल पीली नही पड़ती। अरहर की जड़ो को निकलना भी श्रेयस्कर रहता है।

यूरिया छिड़काव के क्या लाभ है? किन परिस्थितियों में यह अधिक उपयोगी रहता है?

यूरिया छिड़काव से नाइट्रोजन की आंशिक कमी को बहुत ही शीघ्रता के साथ ठीक किया जा सकता है। छिड़काव के 1-2 दिन बाद ही फसल गहरे हरे रंग की हों जाती है। पानी की कमी की स्थिति में छिड़काव विधि अधिक उपयोगी रहती है। क्योंकि छिड़काव के बाद यदि किसी कारण पानी नही भी मिल पाये तो भी संतोषजनक लाभ हो जाता है जबकि मिट्टी में नाइट्रोजन उर्वरक प्रयोग करते समय पर्याप्त मात्रा में नमी का होना या तुरन्त सिंचाई लगाना नितांत आवश्यक होता है। जहां भूमि समतल नहीं है वहां भी यूरिया का छिड़काव लाभकारी रहता है।

बारानी क्षेत्रों में गेहूं के लिए नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग की सही मात्रा, विधि तथा समय बताएं?

बारानी क्षेत्रों में बौनी किस्मों के लिए 24 किलोग्राम तथा देसी या लम्बे बढ़ने वाली किस्म के लिए 12 किलोग्राम नाइट्रोजन पर्याप्त होती है। नाइट्रोजन की पूरी मात्रा, बिजाई के समय ही 10-15 सें.मी. की गहराई पर जहाँ पर पर्याप्त नमी हो ड्रिल कर देनी चाहिए। हमेशा ध्यान रखें कि उर्वरकों को जितना गहरा या नमी में डाला जाएगा उनसे उतना ही अधिक लाभ मिलेगा।

असिंचित गेहूं में यूरिया का छिड़काव कब करना चाहिए?

असिंचित गेहूं में यूरिया का छिड़काव फसल की बिजाई के 1 ½ -2 माह बाद 12-15 दिन के अन्तर पर करना चाहिए।

आलू के बाद गेहूं लगाने पर कितनी फास्फोरस डालें?

प्राय: आलू की फसल को भारी मात्रा में देसी या कम्पोस्ट खाद तथा बहुतायत में ही रासायनिक उर्वरक डाले जाते है। अत: इस प्रकार के खेतों की उर्वरा शक्ति अधिक होती है इसलिए यह अधिक उपयोगी होगा कि खेत की मिट्टी की जाँच कराकर ही उर्वरक डालें जाएं। यदि बिना किसी जाँच के ही फसल बीजनी है तो 25-50 प्रतिशत की फास्फोरस उर्वरकों में कटौती की जा सकती है।

गेहूं में पोटाश डालने का उचित समय तथा विधि क्या है?

गेहूं में पोटाश डालने का उचित समय बिजाई के समय का ही है। अन्य तत्वों के उर्वरकों के साथ बीज से 3-5 सें.मी. नीचे पोटाश उर्वरकों को पारा या ड्रिल करना चाहिए। पोटाश को खेत की तैयारी के समय बखेर कर मिट्टी में मिला लेने से प्राप्यता घट जाती है। इसकी पूर्ण उपयोगिता के लिए इसे सक्रिय जड़ क्षेत्र में, नम मिट्टी में डालना चाहिए। क्योँकि ऊपरी ऊपरी सतह पर पड़ा पोटाश पौधों द्वारा अच्छी तरह शोषित नहीं किया जा सकता। साथ ही दिसम्बर – जनवरी माह में कड़कती ठंड व पानी की कमी भी प्राप्यता को कम करते है।

जौ में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश कब तथा कैसे डालें ?

सिंचित जौ में प्रति एकड़ 24 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो पी2 ओ5 तथा 6 किलो पोटाश (के2 ओ) की सिफारिश की जाती है । सारी फास्फोरस, पोटाश तथा आधी नाइट्रोजन की मात्रा बिजाई के समय पोरनी चाहिए और बची हुई नाइट्रोजन बिजाई के एक महीने बाद पहली सिंचाई के समय डालें । यूरिया रेतीली जमीनों में पानी लगाने के 1-2 दिन बाद तथा दोमट व मटियार-दोमट में पानी लगाने से पहले डाल सकते है । असिंचित जौ में 12 किलो नाइट्रोजन, 6 किलो फास्फोरस (पी2 ओ5) प्रति एकड़ पर्याप्त होती है । दोनों ही तत्वों की सारी मात्रा बिजाई के समय बीज के नीचे पर्याप्त नमी वाली तह में पोरनी/ड्रिल करनी चाहिए।

क्या बारानी क्षेत्रों में खादों को बिजाई से पहले भी ड्रिल किया जा सकता है ?

हां, बारानी क्षेत्रों में आवश्यक खादों की मात्रा को बिजाई से 20-25 दिन पहले, 4-5 इंच की गहराई पर, खूब नमी वाले तह सफलतापूर्वक ड्रिल किया जा सकता है।

दाल वाली फसलों के बाद में जौ में कितनी नाइट्रोजन दें?

दाल वाली फसलों के बाद नाइट्रोजन की मात्रा में 25 प्रतिशत की कटौती की जा सकती है। सिंचित जौ में 18 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति एकड़ दें।

क्या गेहूं की तरह जौ में भी जस्ते का प्रयोग करना जरुरी है?

हां, यदि मिट्टी में प्राप्य जस्ते की कमी हो तो जस्ते का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

जौ की खड़ी फसल में जस्ते की कमी कैसे दूर करें?

खड़ी फसल में जस्ते की कमी को दूर करने के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल के तीन छिड़काव 12-15 दिन के अन्तराल पर करने से कमी को दूर किया जा सकता है। एक एकड़ के लिए 200-250 लीटर घोल पर्याप्त होगा। घोल को उदासीन बनाने के लिए इसमें 3 प्रतिशत यूरिया या 0.25 प्रतिशत बुझा हुआ चुना भी अवश्य मिलने चाहिए। ये सारी वस्तुएं मिलाकर घोल को छान करके प्रयोग में लाना चाहिए।

चने में नाइट्रोजन कब, कैसे और कितनी डालें?

चना एक दलहनी फसल है अत: इसके उर्वरक नाइट्रोजन की बहुत ही कम मात्रा में जररूत पड़ती है। बिजाई के समय ही 6 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ को 25 किलो किस्सन खाद या 13 किलो यूरिया द्वारा फास्फोरस उर्वरकों के साथ मिलाकर बीज के नीचे या बगल में पोर देनी चाहिए।

चने में नाइट्रोजन की अपेक्षा फास्फोरस की अधिक मात्रा की सिफारिश की जाती है, क्योँ?

चना एक दलहनी फसल है जोकि वायुमंडलीय नाइट्रोजन को सहजीवी जीवाणुओ द्वारा प्रयोग करने में सक्ष्म है जिसके लिए इसे पूर्ण विकसित जड़ तंत्र चाहिए। फास्फोरस डालने से चने की जड़ें गहरी, अधिक शाखाओं वाली होती है और उन पर गांठें अधिक बनती है अत: चने को नाइट्रोजन की अपेक्षा फास्फोरस 2-2 ½ गुना डाला जाता है जबकि खाद्य फसलों में इसका उल्टा होता है।

चने में फास्फोरस की मात्रा कितनी, कब और कैसे प्रयोग करने चाहिए?

चने में 16 किलोग्राम फास्फोरस (पी2 ओ5) की सिफारिश की जाती है जिसे डी.ए.पी. या सिंगल अथवा ट्रिपल सुपर फास्फेट द्वारा बिजाई के समय बीज से 3-5 सैं.मी. नीचे पोर देना चाहिए।

चने के लिए कौन स उर्वरक सबसे अच्छा है?

यदि मिट्टी में गन्धक की कमी हो तो सभी फास्फोरस उर्वरक एक जैसे ही प्रभावी होते है। लेकिन डी.ए.पी. सबसे सस्ता, प्रयोग करने में आसान और सब जगह में उपलब्ध उर्वरक है जिसके अन्दर 18 प्रतिशत नाइट्रोजन तथा 46 प्रतिशत पी2 ओ5 होता है। लेकिन गन्धक की कमी वाली जमीनों के लिए सिंगल सुपर फास्फेट अधिक उपयोगी सिद्ध होता है क्योंकि इसमें 16 प्रतिशत पी2 ओ 5 के अतिरिक्त लगभग 12 प्रतिशत गन्धक तथा 20 प्रतिशत कैल्शियम भी होता है। ये दोनों ही आवश्यक तत्व है।

क्या चने में राईजोबियम का टीका लगाना अनिवार्य है?

राईजोबियम कल्चर का टीका लगाने से चने में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों से लाभ होते है। टीका लगाकर लाभदायक जीवाणुओं की संख्या को मिट्टी में जड़ तंत्र के आस-पास बढ़ाने में भारी मदद मिलती है। क्योंकि, ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थापित करने में अधिक सबल तथा सक्ष्म होते है। जिससे चने के पौधों में अधिक मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध हो जाती है। साथ ही स्थापित नाइट्रोजन की मात्रा जो कि अगली फसल के काम आएगी बढ़ भी जाती है। यदि आप इन खेतों में लगातार चने की फसल लेते आ रहे है तो टीका लगाने की आवश्यकता नहीं है।

असिंचित सरसों तथा राया के लिए उर्वरकों की क्या सिफारिशें है?

असिंचित सरसों तथा राया के लिए 16 किलो नाइट्रोजन, 8 किलो फास्फोरस तथा 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ की सिफारिश की जाती है। नाइट्रोजन को 64 किलो किसान खाद तथा फास्फोरस का 50 किलो सिंगल सुपर फास्फेट द्वारा डाला जा सकता है। सभी उर्वरकों की बिजाई के समय लाइनों में 7 से 10 सैं.मी. पर पोर देना चाहिए।

क्या तिलहनी फसलों के लिए गन्धक आवश्यक है?

हां, तिलहनी फसलों के उत्पादन में गन्धक का बहुत ही महत्पूर्ण योगदान है। क्योंकि इसके प्रयोग से तेल की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। जोकि, विभिन्न तिलहनों में 3.6-8.5 प्रतिशत तक देखी गयी है। साथ ही कुल उपज में भी 15-30 प्रतिशत की वृद्धि होती है और गन्धक के खादों पर लगाई गई लागत की अपेक्षा लाभ कई गुना होता है।

धान की फसल में कौन - कौन सी खादें व कितनी और कैसे डालें ताकि उपज पूरी मिल सके?

धान की बौनी किस्मों में रोपाई करते समय 40 किलो यूरिया, 150 किलो सिंगल सुपर फास्फेट, 40 किलो म्यूरेट आफ पोटाश तथा 10 किलो जिंक सल्फेट लगाने चाहिए। फिर 21 तथा 42 दिन बाद 35-35 किलो यूरिया और डालना चाहिए। लम्बी बढ़ने वाली किस्मों में रोपाई करते समय 75 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 10 किलो जिंक सल्फेट लगाना चाहिए। रोपाई के 21 तथा 42 दिन बाद 38 किलो यूरिया डालना चाहिए। खादों की गहराई तथा मिट्टी में मिलाने से लाभ अधिक होगा। ये मात्राएं एक एकड़ के लिए है।

धान की फसल के लिए कौन सी उर्वरक उत्तम है?

धान की फसल में प्राय: नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, तथा जस्ते की कमी आती है । अत: इन्ही पोषक तत्वों के खाद उत्तम रहेंगे। नाइट्रोजन खादों में अमोनियम सल्फेट या यूरिया का प्रयोग करें। फास्फोरस के लिए डी.ए.पी. अथवा सिंगल सुपर फास्फेट, पोटाश के लिए म्यूरेट आफ पोटाश तथा जस्ते के लिए जिंक सल्फेट डालें। यदि इन सभी रासायनिक खादों की समुचित तथा सन्तुलित मात्रा में डाला जाए तो लाभ अधिक मिलते हैं। इसके साथ-साथ यदि खेत में हरी खाद की फसल ली जाए या देसी खाद का भी प्रयोग किया जाए तो लाभ में और भी वृद्धि हो जाती है।

जिंक सल्फेट को धान की रोपाई के समय प्रयोग करके खेरा बीमारी को रोका जा सकता है? जिंक सल्फेट की कितनी मात्रा डालें?

यदि 10 किलो जिंक सल्फेट / एकड़ धान की रोपाई के समय प्रयोग कर दिया जाए तो फिर फसल को खेरा बीमारी नहीं लग पाती है।

अधिक उपज देने वाली मक्का की किस्मों में खादों के प्रयोग के बारे में बताएं?

अधिक उपज देने वाली संकर तथा कम्पोजिट किस्मों के लिए 60 किलो नाइट्रोजन, 24 किलो फास्फोरस, 24 किलो पोटाश तथा 10 किलो जिंक सल्फेट की आवश्यकता होती है । जिसमें एक तिहाई (20 किलो) नाइट्रोजन तथा पूरा फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक सल्फेट बिजाई के समय ड्रिल करें । 20 किलो नाइट्रोजन जब फसल घुटने के बराबर तथा शेष 20 किलो को फसल में सिटट्टे बनने शुरू होने पर बखेरनी चाहिए। उर्वरक की मात्राएं एक एकड़ की दर से है।

तिल की फसल में उर्वरक के बारे में बताएं?

साधारणतया तिल की फसल को किसी विशेष खाद या उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है । फिर भी यदि बिजाई से 20-25 दिन पहले 100 से 120 क्विंटल प्रति एकड़ गोबर की खाद डाल दी जाये तो उपज काफी अच्छी मिलती है । रेतीली कम उपजाऊ भूमियों में यदि बिजाई के समय 15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन (60 किलो किसान खाद) पोर दिया जाये तो फसल अच्छी बन जाती है । लेकिन अच्छी उर्वरा शक्ति वाले खेतों में नाइट्रोजन नही देनी चाहिए अन्यथा पौधों कि वनस्पतिक वृद्धि अधिक हो जाएगी और उपज में गिरावट आ जाएगी।

क्या बालू मिट्टी में आलू बोया जा सकता है?

हां, बालू मिट्टी में आलू बोया जा सकता है । लेकिन खेत में भारी मात्रा में देसी या रासायनिक खादों का प्रयोग करना होगा । क्यूंकि इस प्रकार की मिट्टियों की उर्वरा शक्ति बहुत ही कम होती है । सामान्य भूमि की अपेक्षा इस प्रकार की भूमियों में 1/2 गुना खाद डालनी चाहिए। नाइट्रोजन तथा पोटाश जैसे उर्वरकों को क्रमशः चार तथा दो बार में डालें ताकि इन तत्वों की रिसाव से होने वाली हानि से बचाया जा सके।

टमाटर की फसल में कौन से, कब तथा कितने उर्वरक दें? इनका उपज की मात्रा तथा गुणों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या फलों का आकार तथा स्वाद उर्वरक देने से बदल जाता है?

टमाटर लगाने से 25 दिन पहले 10 टन प्रति एकड़ गोबर की गली सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। फिर पौधे लगाने से पहले अन्तिम तैयारी के समय 20 किलो नाइट्रोजन (80 किलो किसान खाद या 44 किलो यूरिया) 20 किलो फास्फोरस 25 किलो सिंगल सुपर फास्फेट या 44 किलो ट्रिपल फास्फेट तथा 33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश डाल देना चाहिए। शेष 80 किलो किसान खाद दो बर में आधा-आधा करके पौधे लगाने के 20 तथा 35 दिन बाद लगा लेनी चाहिए।

मटर की फलियों की अधिक पैदावार लेने के लिए कितना व कौन सा उर्वरक आवश्यक है?

मटर की फलियों की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए मटर की बिजाई से 20-25 दिन पहले 8 टन / एकड़ गोबर की गली-सड़ी खाद का प्रयोग करें। फिर बिजाई के समय 24 किलो किसान खाद तथा 125 किलो सिंगल सुपर फास्फेट को बीज से 5-7 सै.मी. नीचे ड्रिल कर दें। फिर जब फसल में फूल आने शुरू हो जाएं तो सिंचाई के साथ 24 किलो किसान खाद और बखेर दें।

फूलगोभी की फसल में कितनी खाद तथा उर्वरक की पर्याप्त मात्रा होती है?

सभी प्रकार की गोभी की फसलों को लगाने से 20-25 दिन पहले खेत में 20 टन गोबर या कम्पोस्ट की खाद / एकड़ अवश्य डालें। पौधे लगाते समय 70 किलो किसान खाद, 125 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश डालें। खड़ी फसल में पौधे लगाने के 3 तथा 6 सप्ताह बाद 65-56 किलो किसान खाद पानी के साथ लगाएं।

प्याज की फसल में खादों व उर्वरकों की कितनी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए?

प्याज की फसल को लगाने से 20-25 दिन पहले खेत में 20 टन देसी खाद / एकड़ डालें। फिर प्याज के पौधे लगाते समय 20 किलो नाइट्रोजन (80 किलो किसान खाद), 20 किलो फास्फोरस (125 किलो सिंगल सुपर फास्फेट) तथा 10 किलो पोटाश (17 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) प्रयोग करें। फिर 60 किलो किसान खाद पौधे लगाने के 20-25 दिन बाद शेष 60 किलो 40-45 दिन बाद पानी के साथ प्रयोग करें।

भिन्डी उगाने का विचार कर रहा हूं, इसके लिए कौन-कौन सी खादें, कब और कितनी डालें?

भिन्डी की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए प्रति एकड़ 10 टन देसी खाद, 40 किलो नाइट्रोजन ( 160 किलो किसान खाद /88 किलो यूरिया), 20 किलो फास्फोरस (125 किलो सिंगल सुपर फास्फेट) तथा 33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश की सिफारिश की जाती है। देसी खाद बिजाई से एक माह पहले, पूरी फास्फोरस, पोटाश तथा आधी नाइट्रोजन बिजाई के समय डालें। देसी खाद को एकसार भूमि में मिलाकर जुताई कर दें। बिजाई के समय उर्वरकों को पोर दें। शेष आधी नाइट्रोजन दो बराबर भागों में बांटकर बिजाई से 3 व 6 सप्ताह बाद उचित नमी में डालें।

बेल वाली सब्जियों में नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की खाद कितनी मात्रा में देनी चाहिए?

बेल वाली सब्जियों में 20 किलो नाइट्रोजन, 10 किलो फास्फोरस व 10 किलो पोटाश / एकड़ की सिफारिश की जाती है। पहले खेत तैयार करते समय 6 टन/एकड़ गोबर की खाद एक साथ बखेरकर भूमि में मिला दें। बिजाई के समय पूरी फास्फोरस और पोटाश तथा आधी नाइट्रोजन ड्रिल कर दें। शेष नाइट्रोजन की मात्रा एक महीने बाद खड़ी फसल में दें।

पपीते से अच्छी पैदावार लेने के लिए प्रति पौधा कितनी खाद दें?

प्रत्येक पौधे की वर्ष में दो बार (फ़रवरी तथा अगस्त) आधा-आधा किलोग्राम एन.पी.के. (12 : 32 :16)रासायनिक खाद तथा वर्ष में एक बार फ़रवरी या अगस्त माह में 20 किलो गोबर की गली-सड़ी खाद का प्रयोग करें।

नीला फूलणू को (एजिटेरम) के नियंत्रण के बारे में विस्तृत जानकारी दीजिए?

नीला फूलणू को नीचे लिखी किसी एक विधि द्वारा आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। घासनियों, बागीचों, खेत की मेढ़ों या अन्य ऐसी किसी जगह जहां से घास मिलने की सम्भावना हो वहां पर उगे बहुवर्षीय नीले फूलणू को 2,4डी नामक रसायन जो कि अनेक व्यापारिक नामों से उपलब्ध है के प्रयोग से पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यह रसायन दो अवस्थाओं मे मिलता है। 2,4डी (सोडियम साल्ट) पाऊडर तथा 2,4डी (इथाईल ईस्टर) तरल अवस्था मे होता है। 2,4डी सोडियम साल्ट की 50 ग्राम मात्रा 32 लीटर पानी मे घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करने से नीला फूलणू को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। अथवा 2,4डी (इथाईल ईस्टर) तरल की 105 मिलीलीटर मात्रा 32 लीटर पानी में घोल कर प्रति कनाल के हिसाब से छिड़काव करने से भी नीला फूलणू का नियंत्रण किया जा सकता है। यदि किसी कारणवश 2,4डी रसायन उपलब्ध ना हो सके तो एट्राजीन जो की एट्राटाफ, रसायनघिन, धातुधिन इत्यादि नामों से मिलता है कि 160 ग्राम मात्रा 32 लीटर पानी मे घोलकर नीला फूलणू के पौधों पर उस समय छिड़काव करें जब इसमें 2-4 पत्तियां निकली हों। इसके अतिरिक्त सड़कों के किनारे, बेकार भूमि या ऐसी किसी जगह जहां घास या अन्य उपयोगी पौधे ना हों वहां पर रौंडअप या ग्लाईसेल (बलाफोलेट) की 80 मिलीलीटर मात्रा 32 लीटर पानी में घोलकर नीला फूलणू के पौधों पर छिड़काव करने से भी इसे जड़ तक समाप्त किया जा सकता है । परन्तु इस रसायन का प्रयोग घासनियों, मेढ़ों इत्यादि में नहीं करना चाहिए क्यूंकि यह उपयोगी घास को भी खत्म कर देता है । छिड़काव के समय ध्यान रखने योग्य बातें :  यदि छिड़काव फ़रवरी- मार्च और अगस्त-सितम्बर में फूलणू के उगने के 10-15 दिन बाद किया जाता है तो यह बहुत ही प्रभावशाली होता है । रसायन का छिड़काव उस समय करें जब असमान साफ हो और 8-10 घंटो तक वर्षा की संभावना ना हो ।

सफेद फूलणू की रोकथाम के उपायों के बारे में जानकारी दीजिए?

अभी तक किसानों के पास सफेद फूलणू के उन्मूलन का एकमात्र ढंग जड़ से उखाड़ना है। लेकिन यह वहां संभव है जहां इसका प्रकोप अभी कम है जहां इसका प्रकोप अधिक हो गया है वहां पर खरपतवार नाशी रसायनों के प्रयोग से इसका नियंत्रण किया जा सकता है इसके लिया 2,4डी (सोडियम साल्ट) नामक रसायन की 50 ग्राम मात्रा को 32 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करना चाहिए अथवा 2,4डी तरल की 105 मि.ली. मात्रा को 32 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव कर सकते है। यह छिड़काव अक्टूबर-नवम्बर में, जब सफेद फूलणू में 3-4 पत्तियां हो तब करना चाहिए। इसके अतिरिक्त ग्लाईसेल या रौंडअप (ग्लाईफोसेट) 50 मि.ली. को 30-32 लीटर पानी में घोल कर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करना चाहिए।

गाजर घास या कांग्रेस घास का नियंत्रण के लिए कौन-कौन से उपाय आवश्यक है?

गाजर घास या कांग्रेस घास का नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक है।

1. जिन स्थानों में अभी कुछ ही पौधे हैं वहां पर इन पौधों को उगने न दें फूल आने से पहले ही जड़ से उखाड़कर गढे में दबा दें।

2. जिन स्थानों पर खरपतवार फैल चुका है वहां पर इसे फूल बनने से पहले बार-बार काट या उखाड़ देना चाहिए। उखाड़े गये पौधों को 6 से 3 फुट के गड्ढों में गोबर के साथ मिलाकर दबा देना चाहिए । इससे अच्छी किस्म की खाद तैयार होती है।

3. सड़क व रेल के किनारों, अनुपयोगी भूमि तथा जंगलों में एलू (केशिया टोरा) के बीज बोने मानसून शुरू होने से पहले बिखेर दें । ऐसा करने से गाजर घास के पौधे उग नहीं पाते।

4. चारागाहों में सटाइलोसेन्थस नामक घास जो कि एक पौष्टिक चारा है के बीज बोने से खरपतवार का नियंत्रण किया जा सकता है।

5. रासायनिक नियंत्रण में 2,4डी या एट्राजीन जो एट्राटाफ के नाम से बाज़ार में उपलब्ध होती है कि 120 मि. ली. मात्रा को 30-32 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से, जब गाजर घास के पौधे 3-4 पत्तों कि अवस्था में हो छिड़काव करना चाहिए । इन रसायनों के प्रयोग से संकरी पत्ती वाले घास पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। अथवा ग्लाईसिल 150 मि. ली. प्रति कनाल के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

लाल फूलणू के नियंत्रण के उपायों के बारे में जानकारी दीजिए?

लाल फूलणू के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित विधि का पालन किया जा सकता है। अगस्त से अक्टूबर माह में पहले पखवाड़े तक किसी भी समय लाल फूलणू की झाड़ियों को जमीन की सतह से 2-4 इंच की ऊंचाई तक काट लें। जब इन काटे हुए पौधों में नई कोपलें निकल आएं तथा कोपलें आधा से एक फुट ऊंची हो जाए तो रौंडअप या ग्लाईसेल (ग्लाइफोसिट) नामक खरपतवार नाशक की 150-160 मि.ली. मात्रा 30-32 लीटर पानी में प्रति कनाल के हिसाब से इन पौधों पर छिड़काव करें। लाल फूलणू के समाप्त हो जाने पर उस जगह की क्षमता के अनुसार वहां घास या अन्य पौधे शीघ्र लगा दें ताकि वहां पर फिर से नए खरपतवारों का आक्रमण कम हो।

आलू में खरपतवार का नियंत्रण किस प्रकार करेंगे?

बसन्त ऋतु में उगाई जाने वाली फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्रामैक्लोस (ग्लाइसिल) 100 मि.ली. 32 लीटर पानी में घोलकर खरपतवारों के उगने के बाद तथा आलू के पौधे निकलने से पहले प्रति कनाल के हिसाब से छिड़काव करने से खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बासालिन 30 मि.ली. बिजाई से पहले या स्टाम्प 180 मि.ली. या लासो 120 मि.ली. या एट्राटाफ / मासटाफ / रसायनजीन 80 ग्राम प्रति कनाल 32 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के 40 घंटे के अन्दर छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त एरिलोन / मासलोन, हिमएग्रीलोन का छिड़काव 70 ग्राम प्रति कनाल बिजाई के 30 दिन बाद किया जा सकता है।

मटर में खरपतवार नियंत्रण के उचित उपाय के बारे में बताईए ?

मटर में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए स्टाम्प 180 मि.ली. या लासो 120 मि.ली., डयूल 20 मि.ली. प्रति कनाल बिजाई के बाद 48 घंटों के अन्दर का बासालिन 20 मि.ली. बिजाई से पहले प्रति कनाल 38 लीटर पानी घोलकर छिड़काव करें। अथवा 55 ग्राम एरिलोन / मासलोन / हिमएग्रीलोन परतों कनाल की दर से 32 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के 30 दिन बाद छिड़काव करने से भी खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।

गोभी फूल की फसलों में खरपतवारों का नियंत्रण किस प्रकार किया जा सकता है?

गोभी फूल की फसलों जैसे फूलगोभी, बन्दगोभी, गांठगोभी में खरपतवार नियंत्रण के लिए लासों 120 मि.ली.या स्टाम्प 180 मि.ली.या बासालिन 20 मि.ली. या गोल 40 मि.ली. प्रति कनाल पौधे रोपण से पहले 32 लीटर पानी में घोल कर कनाल में छिड़काव करने से खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता है।

प्याज व लहसुन में खरपतवार नियंत्रण किस प्रकार करेंगे?

इन फसलों में स्टाम्प 180 मि.ली. या रोनसटार 180 मि.ली. या लासों 120 मि.ली. बासालिन 30 मि.ली. प्रति कनाल पौधे रोपण से पहले 32 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

खरपतवार नियंत्रण की समन्वित विधि क्या है?

रासायनिक विधि तथा यांत्रिक विधि को एक साथ खरपतवारों के नियंत्रण के लिए प्रयोग करना समन्वित विधि कहलाता है। इस विधि में रसायनों की आधी मात्रा प्रयोग करते है तथा साथ में यांत्रिक विधि से एक निराई - गुड़ाई छिड़काव के 40-45 दिन बाद करते है। तथा उन्नत कृषि विधियों को समन्वित रूप से प्रयोग करते है।

गाजर घास के काटते समय कौन-2 सी सावधानियां रखनी चाहिए?

गाजर घास के कटते समय निम्नलिखित सावधानियां रखनी चाहिए।

1. इस खरपतवार को उखाड़ते तथा काटते समय हाथ मुहं तथा पांव को ढक कर रखना चाहिए। 2. खरपतवार को सुबह व शाम के समय ही उखाड़ें।

3. उखाड़ते समय या काटते समय सिगरेट या अन्य खाने पीने वाली वस्तुओं का प्रयोग ना करें। 4.नियंत्रण सामूहिक रूप से करें।

5. खरपतवार नाशियों को हाथ से ना छुएं।

गेहूं में खरपतवार नियंत्रण के उपाय बताएं?

गेहूं में संकरी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण के एरीलान/ मासलोन की 60 ग्राम मात्रा को 30-32 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के 30 दिन बाद छिड़काव करें । तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण के लिए 2,4डी (सोडियम साल्ट) की 50 ग्राम मात्रा 30-32 लीटर पानी में घोल कर बिजाई के 30-35 दिन बाद छिड़काव करें अथवा एरीलोन, मासलोन + 2,4डी 50 + 50 ग्राम मात्रा का छिड़काव प्रति कनाल के हिसाब से करें।

मक्का में खरपतवार नियंत्रण के बारे में जानकारी दें?

मक्का के खेत को सदैव खरपतवार से मुक्त रखने के लिए मक्का में 2-3 निराई - गुड़ाई करना चाहिए। गुड़ाई कभी 4-5 सै.मी. गहरी नही करनी चाहिए। गहरी गुड़ाई करने से फसल की जड़ें कटने का डर रहता है। रासायनिक विधि से खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए एट्राजिन 1.5 कि.ग्रा. (एट्राटाफ 3.0 कि.ग्रा.) प्रति हैक्टेयर या 120 ग्राम प्रति कनाल की दर से बुवाई के तुरन्त बाद या फसल के अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए।

धान में खरपतवार के नियंत्रण के लिए उपाय?

धान में खरपतवार के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय है।

  • बत्तर धान में रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए मचैटी या मासक्लोर की 120 मि.ली. मात्रा को 30-32 लीटर पानी में मिलाकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करना चाहिए छिड़काव बिजाई के 48 घंटो के अन्दर करनी चाहिए तथा बिजाई के 20 दिन बाद हलोड़ करना चाहिए।
  • मच धान में रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए मचैटी की 120 मि.ली. मात्रा को 6 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर प्रति कनाल के हिसाब से बिजाई के 7 दिन बाद खेत में डालें तथा खेत में पानी अवश्य खड़ा होना चाहिए।
  • रोपित धान में खरपतवार नियंत्रण के लिए सेफिट/सोफिट 60 मि.ली. मात्रा को 6 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर प्रति कनाल के हिसाब से रोपाई के 7 दिन बाद खेत में डालें।

अलसी में खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के बारे में जानकारी दीजिए?

अलसी में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए एरिलान / मासलोन / हिमएग्रिलोन की 68 ग्राम मात्रा को 32 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से बिजाई के 30 दिन बाद छिड़काव करें।

मक्का तथा सोयाबीन की मिश्रित फसल में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए क्या–क्या उपाय करना चाहिए?

मक्का तथा सोयाबीन की फसल में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए लासों 120 मि.ली. मात्रा को बिजाई के बाद 48 घंटो के अन्दर या स्टाम्प की 190 मि.ली. मात्रा या बासालिन की 100 मि.ली. को 32 लीटर पानी में घोलकर बिजाई से पहले प्रति कनाल की दर से छिड़काव करना चाहिए।

फ्रांसबीन में खरपतवार का नियंत्रण किस प्रकार करेंगे?

फ्रांसबीन में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए लासों की 120 मि.ली. मात्रा या स्टाम्प 180 मि.ली. मात्रा को 32 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के बाद 48 घंटे के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।

बैंगन में खरपतवार का नियंत्रण किस प्रकार करेंगे?

बैंगन में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए स्टाम्प की 180 मि.ली. मात्रा को 30 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से बिजाई के 48 घंटों के अन्दर या रोपाई से पहले छिड़काव करें।

सरसों में खरपतवारों के नियंत्रण के बारे में जानकारी दीजिए?

सरसों में खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए स्टाम्प 180 मि.ली. को बिजाई के 48 घंटे के अन्दर या एरीलान/मासलोन/हिमएग्रीलोन की 50 ग्राम मात्रा को 32 लीटर पानी में घोलकर परतों कनाल की दर से बिजाई के 30 दिन बाद प्रयोग करें।

मक्का तथा गेहूं के खेतों में दीमक का प्रकोप है नियन्त्रण कैसे हो सकता है?

खेतों में अच्छी तरह से गली - सड़ी गोबर को खाद का प्रयोग करें। पिछले वर्ष की फसलों के अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें। दीमक प्रभावित खेतों में बिजाई से पहले बीज का निन्मलिखित विधी से उपचार करें। 250 मि.ली. पानी में 40 मि.ली. 20 क्लोरपाईरीफास ई.सी. मिलाकर 10 कि.ग्रा. बीज के ऊपर छिड़कें। बीज छाया में सुखा लें तथा अगले दिन बिजाई करें।

मक्का में कटुआ कीट एवं सफेद गिडार के नियन्त्रण के बारे में बताएं?

हमेशा अच्छी तरह से गली - सड़ी गोबर खाद का प्रयोग करें। बीज की मात्रा अधिक रखें। इन कीटों की रोकथाम के लिए 1 कि.ग्रा. रेत में 80 मि.ली. क्लोरपाईरीफास 20 ई.सी. प्रति कनाल की दर से मिलाकर खेतों में डालें तथा हल चलाकर मिला लें।

मक्का में तना छेदक कीट की रोकथाम कैसे करें?

जिन क्षेत्रों में कीट का आक्रमण प्रति वर्ष होता हो, वहां बीज की मात्रा थोड़ी ज्यादा रखें। बिजाई के समय 800 ग्रा. थिमेट खाद के साथ हल के पीछे लाइनों में डालें। यदि बिजाई के 2-3 सप्ताह बाद पौधों के बीच के पत्तों में छेद दिखाई दें तो 2 ग्राम फोरेट 10 जी. प्रति मीटर पंक्ति में मिट्टी में मिलाएं। चारे की फसल में किसी भी कीटनाशक का प्रयोग ना करें। फसल कटाई के पश्चात पौधों के अवशेषों को जलाकर नष्ट कर दें।

धान के पत्तों को काले रंग के कीट नष्ट कर रहे हैं। और उनमें लम्बी सफेद धारियां भी पड़ सकती हैं। क्या उपाय है?

उपरोक्त समस्या आने पर फसल में पानी रोक लें। एक लम्बी रस्सी को दोनों किनारों के खेत से आर-पार पकड़ कर घुमाएं। काले रंग के छोटे-छोटे कीड़े (भृंग) जिन्हें ‘हिस्पा’ के नाम से जाना जाता है, पानी में गिरकर मर जाते हैं। फसल में 20 लीटर पानी में 20 मि.ली. मिथाइल पैराथियन 50 ई.सी. या 20 मि.ली. फैनिट्रोथियान 50 ई.सी. घोलकर छिड़काव करें। रोपाई के 10 दिन बाद या 40 दिन की फसल में 600 ग्राम कारटप 4 जी. प्रति कनाल की दर से 3-4 सैं.मी. खड़े पानी में डालें। यदि फसल में 10 प्रतिशत से अधिक कीट प्रकोप हो तभी कीटनाशक छिड़कें।

धान की फसल में तना छेदक कीट के समस्या का क्या उपाय करें?

रोपाई के 10 दिन बाद 1.2 कि.ग्रा. कार्बोफ्युरान 3 जी. प्रति कनाल की दर से 3-4 सैं.मी. खड़े पानी में डालें। या फसल में रोपाई करने के 15-20 दिन बाद यदि नए पत्तों में छेद दिखाई दें तो 20 ली.पानी में 20 ली. मिथाइल पैराथियान 50 ई.सी. या 30 मि.ली. एन्डोसल्फान 35 ई.सी. का घोल बनाकर प्रर्ति कनाल के हिसाब से छिड़काव करें।

धान के पत्ता लपेट कीट की रोकथाम कैसे करें?

कीट ग्रसित पत्तों को काट दें। फसल में कीट का प्रकोप होने पर 50 मि.ली. क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. का 20 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें।

खरीफ मौसम की दालों वाली फसलों में बालदार सुन्डियां पत्तों को नष्ट कर रही है। उपाये क्या है?

पत्तों पर यदि छोटी सुन्डियां झुंडों में दिखाई दें तो उन्हें नष्ट कर दें। यदि सुन्डियां पूरे खेत में बिखर गई हो तों 25 ली. पानी में 50 मि.ली. इन्डोसल्फान 35 ई.सी. घोल बनाकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें।

काले व सन्तरी रंग के कीड़े दाल वाली फसलों में फूल आने की अवस्था में नुकसान पहुंचाते है। उपाय क्या है?

भृंगों के पंखों पर काले व सन्तरी रंग की धारियां होती है। उन्हें ब्लिस्टर बीटल के नाम से जाना जाता है। इनके नियन्त्रण के लिए 50 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. या 25 मि.ली. मिथाइल पैराथियान 50 ई.सी या 50 मि.ली. क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. को 25 ली.पानी में घोल बनाकर प्रति कनाल की दर से फसल पर छिड़काव करें। वयस्क भृंगों को हाथ से पकड़कर मिट्टी के तेल मिले पानी में डाल कर नष्ट कर दें।

चने की फलियों में छेदक कीट के प्रकोप को कैसे नियंत्रित करें?

हरे काले रंग की सुन्डियां फली में घुसकर दोनों को खा जाती है। इनके नियन्त्रण के लिए फसल पर 25 ली. पानी में 50 ग्राम कार्बारिल 50 डब्ल्यू पी., या 50 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. घोलकर छिड़काव करें हरी फलियां छिड़काव के 7-10 दिनों तक ना खाएं।

सरसों में कीड़ों का प्रकोप है। रोकथाम कैसे करें?

छोटे-छोटे कीट जो पौधों से चिपके रह कर रस चूसते है, इन्हें तेले या माहू के नाम से जाना जाता है। इन कीड़ों की रोकथाम के लिए शाम के समय निम्नलिखित कीट नाशक दवाइयों का छिड़काव करें। 30 मि.ली. साइपरमेथरिन 10 ई.सी. या 30 मि.ली. मिथाइल डेमेटान 25 ई.सी. या 30 मि.ली. डायमेथोएट 30 ई.सी. को 30 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें। यदि मधुमक्खियां निकट हो तो उन्हें अगले दिन घर से बाहर न निकलने दें। यदि फसल ‘साग’ के लिए उगाई गई हो तो केवल मैथालियान 50 ई.सी. 30 मि.ली. प्रति 30 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें तथा 7 दिनों तक साग का प्रयोग न करें।

तिल में बालों वाली सुण्डीयां लगी है, उपाय क्या है?

झुण्ड में पल रही सुण्डीयां को इकट्ठा कर नष्ट कर दें। फसल में 40 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. या 20 मि.ली. साईपरमेथरिन 25 ई.सी. 20 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें।

आलू भण्डार गृह में सड़ जाता है और उनमें से छोटे-छोटे पतंगे उड़ते रहते हैं। कारण तथा रोकथाम क्या है?

इस कीड़े को आलू का पतंगा कीट (पी.टी.एम) के नाम से जाना जाता है यह कीट के खेतों में तथा भण्डार गृह में रखी फसल को नुकसान पहुंचाता है। इस कीट का प्रकोप कांगड़ा घाटी में अधिक पाया जाता है कीट की रोकथाम के लिए स्वस्थ कीट रहित बीज का प्रयोग करें। बीज को गहरा बोएं तथा बाद में मेढ़ों पर मिट्टी अच्छी तरह चढ़ाएं ताकि आलू बाहर ना दिखाई दें। मार्च महीने में पत्तों के अन्दर सुण्डीयों दिखने पर 50 मि.ली. डेकामेथरिन 2.8 ई.सी. या 50 मि.ली. मोनोक्रोटाफास 36 एस.एल. को 30 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें। भण्डार गृहों में रखें आलुओं को नीला फूलनू या लाल फूलनू के सूखे पत्तों से ढक दें। या सूखी रेत की 2 सैं.मी. तह से ढक दें ताकि मादा पतंगा अण्डे न दे सके। इसके अलावा 8 मि.ली. साइपरमैथरिन 25 ई.सी. को 1 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर 100 कि.ग्रा. आलुओं पर भुरकने से भी भण्डार में रखें आलुओं को इस कीट के प्रकोप सेबचाया जा सकता है।

आलू के पत्तों को हरे-काले रंग की सुण्डीयां खा रही हैं। रोकथाम के उपाय क्या है?

फसल पर 45 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. या 30 मि.ली. डेल्टामैथरिन 2.8 ई.सी. को 30 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें।

आलू उखाड़ते समय आलूओं में बड़े-बड़े छेद होते हैं तथा जमीन में सफेद रंग की सुण्डीयां होती हैं। उपाय?

आलू में यह लक्षण सफेद गिडार कीट के प्रकोप से होते होते हैं। इस कीट का प्रकोप गर्मियों में लगाई गई फसल में अधिक होता है। कीट की रोकथाम के लिए खेतों में अच्छी तरह से गली-सड़ी देसी खाद का प्रयोग करें। बिजाई से पहले 80 मि.ली. क्लोरपाईरीफास 20 ई.सी. को 1 कि.ग्रा. रेत में मिला कर खेत में भुरकें तथा मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें।

सब्जियों के पौधे को कोई कीट काट रहा है। नियन्त्रण कैसे करें?

इस कीट को कटुआ कीट कहा जाता है। इस कीट की मटमैले रंग की सुण्डीयां मिट्टी में रहती हैं तथा रात के समय मिट्टी की सतह से पौधों को काट देती है। कभी-कभी यह पौधों के बड़े पत्तों को भी काटती है। इस कीट की रोकथाम के लिए 80 मि.ली. क्लोरपाईरीफास 20 ई.सी. को 1 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर प्रति कनाल मिट्टी में डालें तथा खाद में हल चलाकर मिट्टी में मिला दें। पौधे लगाने के बाद यदि कीट का प्रकोप हो तो 30 मि.ली. साइपरमैथरिन 10 ई.सी. या 60 मि.ली. क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. को 30 मि.ली. पानी में घोलकर पौधों पर तथा मिट्टी की सतह पर छिड़काव करें।

बैंगन, टमाटर तथा भिन्डी में फलछेदक कीटों की रोकथाम के उपाय बतलाएं?

कीट ग्रसित पौधों में फूल आने की अवस्था में या प्रकोप होने पर 60 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. या 20 ग्राम एसीफेट 75 एस.पी. या 60 ग्राम कार्बारिल 50 डब्ल्यू पी. या 20 मि.ली. फेनवेलरेट 20 ई.सी. या 30 मि.ली. डेल्टामेंथ रिन 2.8 ई.सी. को 30 लीटर पानी में घोल का प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें।

खीरे व घीया के फलों में सड़ना तथा उनमे सफेद रंग की सुण्डीयां निकलना, क्योँ होता है उपाय बतलाएं?

यह लक्षण फल मक्खी के कारण होता है । खीरा, घीया व कददू में फल आने की अवस्था में इस कीट की वयस्क मक्खियां छोटे कोमल फलों पर अण्डे देती है, जिनमे से छोटी-छोटी सुण्डीयां निकलती है जो फलों के अन्दर गुड़ों को खा जाती है । जून- जुलाई में कीट का प्रकोप होने पर या फसल पर प्रौढ़ मक्खियां दिखने पर बेलों व आसपास की फसलों पर 50 ग्रा. गुड़ या चीनी तथा 10 मि.ली. मेलाथियान 50 ई.सी. को 50 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

लाल रंग के कीट कददू प्रजाति की बेलों के पत्तों को नष्ट कर रहे हैं, नियन्त्रण बतलाएं?

इन कीड़ों की रोकथाम के लिए 30 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. या 50 मि.ली.एण्डोसल्फान 35 ई.सी. को 30 ली. पानी में घोलकर प्रति कनाल के हिसाब से छिड़काव करें। वयस्क भृंगों के हाथ से पकड़कर नष्ट कर दें।

जो सब्जियां, बाज़ार में भेजने को तैयार है, उन में कीट समस्यायों के नियन्त्रण के लिए कैसा कीट नाशक प्रयोग करें?

जो सब्जियां तैयार हों उन्हें तोड़ लें तथा कीट नियन्त्रण के लिए ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग करें जिन का असर ज्यादा दिन तक न रहे। जैसे कार्बारिल, मेलाथियान, एण्डोसल्फान, डेल्टामेथरिन इत्यादि। छिड़काव के बाद बताई गई प्रतीक्षा अवधि का पालन करें।

हमारे खेत में कीड़ों का प्रकोप हैं परन्तु नजदीक ही मधुमक्खी पालन भी किया जा रहा है। कीड़ों के नियन्त्रण के लिए क्या करें?

जहां मधुमक्खियां नजदीक हों तथा फसल पर छिड़काव करना आवश्यक हो, वहां छिड़काव शाम के समय करें तथा अगले दिन मधुमक्खियों को बन्द रखें। अपेक्षाकृत सुरक्षित कीटनाशकों जैसे फोसोलोन, आदि का प्रयोग करें। मखियों के लिए एण्डोसल्फान अनुमोदित मात्रा में सुरक्षित माना गया है।

बीज उपचार का क्या महत्व है?

बीज उपचार बीज जन्य रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है। अत: बीज को बोने से पहले उसका उपचार अवश्य कर लेना चाहिए। उदाहरणत: गेहूँ (खुली कांगियारी) -बीटावैक्स, धान (ब्लास्ट) – बैवीस्टीन, मक्का (कांगियारी) – बीटावैक्स।

बीज उपचार कैसे किया जाता है?

सामान्यत: किसान अपने घरों में कच्चे घड़ों का प्रयोग करते हैं। इन घड़ों में बीज व रसायन को डालकर उसे अच्छी तरह हिलाकर बीजोपचार किया जाता है।

सस्य विधियाँ जिससे किसान फसलों में लगने वाले रोगों पर नियंत्रण कर सकते है?

ऐसी सस्य विधियाँ जिससे किसान फसलों में लगने वाले रोगों पर नियंत्रण कर सकते है, निम्नलिखित है :-

  • फसल अवशेषों की सफाई।
  • स्वस्थ्य बीज, बीज की मात्रा एवं बिजाई का समय।
  • खाद एवं उर्वरकों का संतुलित प्रयोग।
  • उचित जल प्रबंध।
  • फसल – चक्र।
  • प्रतिरोधी किस्में।
  • रोगी पौधे उखाड़ना।
  • पौधों को सीधा खड़ा करना।
  • पंक्तियों तथा पौधों में सही दूरी।

दवाईयों का छिड़काव करते समय ध्यान रखने योग्य बातें?

दवाईयों का छिड़काव करते समय ध्यान रखने योग्य निम्नलिखित बातें :-

  • भूमि से पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।
  • हवा चलते हुए, जिस ओर हवा चल रही हो उस ओर दवाई का छिड़काव करना चाहिए।
  • दवाई के डिब्बे में दर्शाए गए त्रिकोण का रंग दवाई के जहरीलेपन को अंकित करता है।
  • धूम्रपान व खाने पीने से परहेज करें।
  • छिड़काव के बाद हाथ पांव साबुन से अच्छी तरह साफ़ कर लें।
  • छिड़काव के उपरांत प्रतिक्षा अवधि के बाद ही तुड़ाई करें ।

पौधे में लगने वाले कमरतोड़ रोग का नियंत्रण कैसे करें?

पौधे में लगने वाले कमरतोड़ रोग का नियंत्रण निम्नलिखित रूप से करें :-

1. क्यारियों को फार्मलिन (1 भाग फार्मलिन 7 भाग पानी ) से रोपाई से 15-20 दिन पहले शोधित करें तथा पालीथीन चादरों से ढक कर रखें।

2. क्यारियों को डायथेन एम - 45 (25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी ) और बैवीस्टीन (5 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी ) के घोल से बीज से पौधे निकलने पर रोग के लक्षण देखते ही सींचे।

अदरक बीज उपचार कैसे करें?

बिजाई से पहले अदरक को डायथेन एम -45, 250 ग्राम बैवीस्टीन, 100 ग्राम, डरमीट 200 मि.ली. के घोल में 1 घण्टा उपचार करें । 48 घण्टे छाया में सुखाएं फिर बिजाई करें।

आलू में लगने वाले पछेता झुलसा रोग का नियंत्रण कैसे करें?

आलू में लगने वाले पछेता झुलसा रोग का नियंत्रण निम्नलिखित तरीके से करें :-

  • बिजाई के लिए स्वस्थ्य बीज का प्रयोग करें ।
  • बीजाई से पहले बीज का 200 मिनट के लिए डायथेन एम - 45 ( 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में उपचार कर लें ।
  • आलू की बिजाई ऊँची मेढ़ों पर करें ।
  • बीमारी आते ही रिडोमिल एम जैड (100 ग्राम प्रति 60 लीटर पानी प्रति बीघा ) के 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें ।
  • रोग रोधी किस्में – कुफरी ज्योति, गिरिराज, बादशाह आदि ही लगाएं ।

प्याज व लहसुन का जामनी धब्बा रोग की रोकथाम कैसे करें?

प्याज व लहसुन का जामनी धब्बा रोग की रोकथाम निम्नलिखित रूप से करें :-

  • खेतों में जल निकास का उचित प्रबन्ध करें।
  • बीज की थीरम 2.5 ग्राम प्रति कि. बीज) से उपचार कर लें।
  • रोपाई से पहले कन्दो का डायथेन एम – 45 (25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में डुबोएं।
  • रोग प्रकट होते ही डायथेन एम – 45 का छिड़काव करें।

प्रदेश की घासनियों एवं चारागाहों के लिए उन्नत घास व फलीदार चारा फसलों की प्रजातियां कौन-कौन सी है?

निम्न व मध्यवर्ती क्षेत्र :-

संकर हाथी घास (एन.बी.-37. आई. जी. एफ. आर. आई -5) (a) आरचर्ड घास, (b) फेस्कयू, (c) टिमोथी, (d) कनैरी ग्रास, कोमल सुमैक्स, हिमा-1, हिमा – 4, कलेयर, कॉमन कैन ग्रास सिटेरिया, पी. एस. एस. – 1, एस. 92, फेस्क्यू घास, ग्रीन पैनिक, कान्गोसिगनल घास, -----फलीदार चारा फसलें:-1. सिराट्रो, 2. स्टाइलों,3. डेस्मोडियम, 4. मखमली बीन, उच्च पर्वतीय क्षेत्र घास प्रजाति

फलीदार चारा फसलें :-

1. रेडक्लोवर (पी.आर.सी.-3) 2. व्हाईटक्लोवर(पी.डब्ल्यू.सी.-3) 3. लुर्सन  (आनन्द-३)।

उन्नत घास की किस्मों की बिजाई व रोपाई का समय तथा उत्तम विधियाँ कौन सी है?

प्रदेश के निचले व मध्यपर्वतीय क्षेत्रों में उन्नत घास की सफल स्थापना के लिए घास की बिजाई या रोपाई का उचित समय वर्षा ऋतु है तथा ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में यह समय अक्तूबर-नवम्बर (बर्फ पड़ने से पहले) या मार्च- अप्रैल (बर्फ पिघलने के साथ) उचित रहता है। बीज द्वारा बिजाई के लिए छोटे-छोटे गढ्ढ़े तैयार करके उनमे गोबर की खाद नत्रजन फासफोरस व पोटाश खाद का मिश्रण डाल कर बीज को मिला दें । अब ये बीज सुगमता से अंकुरित व स्थापित होने को तैयार है। जड़ मुक्त कमलों से भी रोपाई के लिए 40+40 सैं.मी. की दूरी पर गढ्ढ़े बनाकर उनमें 4-5 ग्राम नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश खाद का मिश्रण तथा 100-150 ग्राम गोबर की खाद डालकर 1-2 जड़मुक्त कलमें लगाकर अच्छी तरह दबा दें।

चारागाह में खाद प्रबन्ध का क्या महत्व है?

अधिक चारा उत्पादन के लिए खाद प्रबन्ध ही सबसे ज्यादा असरदार तरीका है । निचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों में प्राकृतिक घासनियों व चारागाहों में 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. फासफोरस व 20 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से डालें । उन्नत चारागाहों एवं घासनियों में 80 कि.ग्रा., फासफोरस 40 कि.ग्रा. व 30 कि.ग्रा. पोटाश खाद डालना उचित रहता है । पोटाश व नत्रजन कॉ आधा भाग मौनसून के साथ तथा शेष आधा नत्रजन दो भागों में बांटकर प्रत्येक कटाई के बाद डालें । ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक घासनियों में 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व 30 कि.ग्रा. फासफोरस तथा सुधरी घासनियों में फासफोरस 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30 कि.ग्रा. फासफोरस व 30 कि.ग्राम. पोटाश डालें । उन्नत चरागाहों व घासनियों में फासफोरस व पोटाश एक साल छोड़कर डालनी चाहिए।

प्राकृतिक एवं सुधरी घासनियों में कटाई प्रबन्ध कैसे करें?

लगातार कटाई व चराई के कारण उत्तम व पौष्टिक घास की कमी के साथ-साथ पैदावार में भी कमी आ जाती है । अत: एक कटाई से दूसरी कटाई/चराई में अन्तराल रखना जरूरी है । प्राकृतिक घासनियों में कटाई का उचित अन्तराल 60-65 दिन व सुधरी घासनियों में 40-45 दिन उपयुक्त रहता है ।ठीक समय पर कटाई काटने पर निचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों में प्राकृतिक घासनियों में से दो कटाईयों में 150 क्विंटल तथा सुधरी चारागाहों/घासनियों से 4 कटाईयों 500 क्विंटल ताल हरा चारा प्रति हैक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है। उच्च पर्वतीय क्षेत्रों की उन्नत घासनियों से दो कटाईयों में 300-400 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सकता है।

उन्नत घासों की बिजाई व रोपाई कहाँ – कहाँ की जा सकती है?

घास को अधिकतर घासनियों, चारागाहों, बगीचों, बंजर भूमि, खरपतवारों से ग्रसित क्षेत्र व मौसमी नाडी क्षेत्र तथा खेतों की मेढ़ों पर लगाया जा सकता है। उन्नत किस्में प्राकृतिक प्रजातियों की अपेक्षा चारा पैदावार को 5 गुणा तक बढ़ा सकती है। साथ ही साथ फलीदार प्रजातियों का समावेश न केवल चारे की पौष्टिकता बढ़ाती है बल्कि मिट्टी की गुणवता में भी सुधार करती है।

खेत की मेढ़ों पर लगने के लिए कौन-कौन सी घास उपयुक्त है?

खेत की मेढ़ें खेती के कुल क्षेत्रफल का आधा भाग घेरती हैं। नेपियर बाजरा हाइब्रिड और सिटेरिया घास मेढ़ों पर लगाने के लिए उत्तम किस्में है।

मौसमी नाडी क्षेत्रों में कौन सा घास लगाया जा सकता है?

मौसमी नाडी भूमि में सिटेरिया घास को सफलता पूर्वक स्थापित किया जा सकता है। नाडी भूमि में फड़वें से मेढ़ बनाकर के उसमें 4-5 ग्राम नत्रजन, फासफोरस व पोटाश का मिश्रण डालें व सिटेरिया की 2-3 जड़युक्त कलमें लगाएं ।

फलीदार चारे का घासनियों में क्या महत्व है?

घासनियों में फलीदार प्रजातियों का मिश्रण लगाना बहुत ही लाभदायक रहता है । ये मिट्टी में नत्रजन की मात्रा बढ़ाने के साथ - साथ चारे की पौष्टिकता में भी चार चाँद लगा देते है । घास के साथ उगाने पर ये घास को भी नत्रजन उपलब्ध करवाते है । अत: उर्जा का बचाव करके चारागाह और घासनी में अलग से नत्रजन डालने की आवयश्कता नहीं पड़ती । हमें निम्न व मध्यवर्ती क्षेत्रों में सिराट्रो, स्टाइलों, डेस्मोडियम, सेमफली आदि को बढ़ावा देना चाहिए व उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में लाल क्लोवर, व्हाइटक्लोवर, लुर्सन आदि लगाने चाहिए ।

हरे चारे के लिए कौन – कौन से वृक्ष लगायें?

सर्दियों में वृक्ष चारे का एक उत्तम साधन है। अत: चारागाहों तथा घासनियों में, घरों के नजदीक, खेतों के बीच या सीमा पर, बंजर भूमि पर अधिक से अधिक चारे वाले वृक्ष लगाने चाहिए। निम्न एवम् मध्यवर्ती क्षेत्रों में ब्यूल, शहतूत, ल्यूसिनिया, कचनार, ढीयू, खिढ़क, बांस तथा उच्च क्षेत्रों में रोबिनिया, सैलिक्स व पापुलर उत्तम किस्म के चारे वाले पेड़ है । वृक्षों के पत्तों में 15-20 प्रतिशत प्रतिशत प्रौटीन पाई जाती है तथा इन्हें सूखे घास या भूसे में मिलाकर भी पशुओं को खिलाया जा सकता है ।

निचले व मध्यवर्ती इलाकों के लिए काश्त की जाने वाली चारे की फसलें व उनकी प्रजातियाँ कौन- कौन सी?

खरीफ मौसम

1. मक्की - अफ्रीकन टाल

2. ज्वार व बाजरा--संकर किस्में। मक्की के साथ रौंगी या या सोयाबीन की मिश्रित खेती ज्यादा लाभदायक रहती है।

रबी मौसम

(अ) सिंचित क्षेत्रों के लिए: बरसीम -      बी. एल. -22, बी.एल. -80, वरदान शफतल      - एस. एच. -48।

(ब) असिंचित क्षेत्रों के लिए: जई -  पालमपुर – 1।

सिंचित क्षेत्रों में बरसीम या शफ़तल के साथ जई की मिश्रित खेती अधिक चारा देती है जबकि असिंचित क्षेत्रों के लिए जई सरसों का मिश्रण उत्तम है।

क्या मक्की को भी चारे के रूप में प्रयोग किया जा सकता है?

बिलकुल, मक्की को भी चारे के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। चारे की फसल प्राप्त करने के लिए अफ्रीकन टाल नामक किस्म की बिजाई 40 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की दर से 30 सैं.मी. की दूरी पर कतारों में करें बिजाई के समय 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व 60 कि.ग्रा. फासफोरस डालें। 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एक से डेढ़ महीने बाद डालें। मक्की को दूध वाली अवस्था में काट कर 500 से 600 क्विंटल हर पौष्टिक चारा प्राप्त हो जाता है।

प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों में कौन – कौन से फसल चक्र अपनाकर वर्ष भर हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है?

(1) निचले क्षेत्रों के लिए :- (क) जई – मक्की मखमली सेम – मक्की रौंगी (ख) बरसीम, जापानी सरसों, जई- मकचारी, मखमली सेम (ग) जई, मटर-बजरा, मखमली सेम।

(2) मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए :- (क) संकर नेपियर बजरा, मखमली सेम-बरसीम, जापानी (ख) मक्की, रोगी – बरसीम, जई (ग) सिटेरिया, मखमली सेम – बरसीम, सरसों, जई।

क्या ज्वार (सोरघम) चारे में कुछ हानिकारक तत्व पाए जाते है?

ज्वार की प्रजातियों में ‘साईनाइड’ इकट्ठा करने वाला ‘हाइड्रोसाईनेमिक, अम्ल होता है। यह पशुओं के लिए घातक पाया गया है। इससे ‘ज्वार जहर’ नामक बीमारी पशुओं में हो जाती है । यह रसायन निम्नलिखित परिस्थितियों में अधिक पाया जाता है :- 1.     छ: सप्ताह से कम आयु के पौधों में, 2. कटाई के बाद नई उपज (कोपलों) में और 3. प्रतिकूल परस्थितियों जैसे वातावरण में नमी का काम होना या अधिक गर्मी पड़ना व नत्रजन की खाद का अधिक मात्रा में प्रयोग करना आदि अत : इसके बचाव के लिए ऊपरलिखित बातों का आवश्यक ध्यान रखें।

बरसीम के पौधों का गोल दायरों में मरना क्या है?

यह बीमारी एक फफूंद द्वारा होती है। इसकी रोकथाम के लिए बिजाई से पहले 2 ग्राम बैविस्टीन दवाई प्रति लीटर पानी में घोलकर बीज का उपचार करें। बाद में खेतों में बीमारी आने पर 1 ग्राम बैविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोलकर जड़ों को सिंचित करें।

सफेद चूर्ण किस रोग के लक्षण होते है?

यह सफेद चूर्ण फफूंदी रोग के लक्षण होते है । इस बीमारी के लक्षण आने पर कन्टाफ या सितारा नामक दवाई 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें। जई के पी.एल.पी. -1 किस्म में रोग प्रतिरोधी क्षमता अधिक है।

लाल क्लोवर के पौधे जड़ सड़ने के साथ गिर जाते है तथा पत्तों का रंग सफेद हो जाता है। बचाव कैसे करें?

पौधों का मुरझाना शुरू हो जाने पर बैविस्टीन नामक दवाई का 1 ग्रा. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर जड़ों को सिंचित करें। पी.आर.सी. – 3 किस्म में रोग प्रतिरोधी क्षमता अधिक है। यदि पत्ते सफेद होने लगे तो कन्टाफ या सितारा नामक दवाई का 0.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

स्त्रोत: कृषि विभाग, भारत सरकार

 

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