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जैविक प्रमाणीकरण

इस पृष्ठ में हिमाचल प्रदेश में प्रचलित जैविक खेती के अंतर्गत जैविक प्रमाणीकरण की विस्तृत जानकारी दी गयी है।

परिचय

जैविक प्रमाणीकरण एक प्रक्रिया आधारित प्रणाली है जिसमें किसी भी तरह के कृषि उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन तथा वितरण प्रणाली का प्रमाणीकरण किया जा सकता है इसके निर्धारण के लिए अलग-अलग देशों के अपने मानक हैं और अलग-अलग प्रमाणीकरण किया जाता है। मोटे तौर पर इस प्रक्रिया के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं-

  • सभी संश्लेषित व रसायनिक आदानों तथा परिवर्तित अनुवांशिकी के जीवों का प्रयोग प्रतिबंधित है।
  • केवल ऐसी भूमि जिसमें कई वर्षों से किसी भी प्रतिबंधित आदान का प्रयोग न किया ही प्रमाणीकरण प्रक्रिया के अंतर्गत लाई जा सकती है।
  • सभी प्रक्रियाओं व कार्यकलापों का प्रलेखन।
  • जैविक व अजैविक उत्पादन इकाइयों को एक-दूसरे से बिलकुल अलग रखना तथा
  • समय-समय पर निरीक्षण कर जैविक मानकों का पालन सुनिश्चित करना।

प्रमाणीकरण की आवश्यकता

ग्राहकों को उच्च गुणवत्ता का उत्पाद सुनिश्चित करने तथा धोखाधड़ी से बचाने के लिए प्रमाणीकरण  एक आवश्यकता प्रक्रिया है। उत्पादकों के लिए प्रमाणीकरण जहाँ बाजार को सुलभ बनाता है वहीं ग्रहकों को यह सुरक्षा व गुणवत्ता की गारंटी है। हमारे देश में अनेक उत्पादों पर जैसे ISI मार्क लगाया जाता है या खाद्य सामग्री पर “एगमार्क” लगता है ठीक उसी प्रकार जैविक उत्पादों पर प्रमाणीकरण के पश्चात ‘इंडिया आर्गेनिक’ मारक लगाया जाता है जो उन उत्पादों के जैविक मानकों पर खरा होने की गारंटी है।

प्रमाणीकरण हेतु अलग-अलग देशों के अपने मानक है और अधिकृत प्रमाणीकरण संस्थाएं हैं। ये संस्थाएं अपने-अपने अलग या एक राष्ट्रीय मानक कार्यक्रम के तहत कार्य करती हैं।

प्रमाणीकरण प्रकिया

किसी भी फार्म या खेत को प्रमाणीकृत करने के लिए किसान को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत सारे क्रिया-कलाप नियंत्रित करने होते हैं तथा सभी क्रिया-कलापों का लेखा-जोखा रखना होता है। प्रमाणीकरण प्रकिया के प्रमुख चरण इस प्रकार है;-

मानकों का ज्ञान

पूरी जैविक उत्पादन प्रकिया हर स्तर  व् कार्य के लिए निर्धारित मानकों के अधीन करनी होती है अतः उत्पादन मानकों व्  उनके प्रचालन की पूरी जानकारी आवश्यक है।

अनुपालना

सभी प्रक्रियाओं के प्रचालन में मानकों व दिशा-निर्देशों की पूर्ण अनुपालना करनी होती है इसमें सभी उपकरणों व भंडारण स्थलों की सफाई अलग से उनकी देखभाल निश्चित स्रोतों से आदानों का क्रय, केवल अनुमत आदानों का प्रयोग इत्यादि शामिल हैं। जैविक उत्पादन इकाइयों को अजैविक से अलग करना तथा प्रतिबंधित आदानों के पूर्ण निषेध का पालन भी आवश्यक है।

प्रक्रिया प्रलेखन - सभी क्रियाकलापों व प्रकियाओं का स्वीकृत रूप में प्रलेखन प्रमाणीकरण की सबसे महत्वपूर्ण प्रकिया है। इस प्रक्रिया में फार्म या उत्पादन इकाई का कई वर्ष पूर्व तक का इतिहास भी प्रलेखित कर रखना आवश्यक है।

योजना - प्रत्येक वर्ष के लिए एक लिखित योजना बनाकर प्रमाणीकरण संस्था से उनकी अनुमति ली जाती है फिर वर्ष बाहर के क्रियाकलाप उसी योजना के तहत चलाए जाते हैं।

निरीक्षण – प्रत्येक फार्म या उत्पादन इकाई का वर्ष में कम से कम बार अवश्य निरीक्षण किया जाता है। इस निरीक्षण में सभी प्रलेखन दस्तावेजों, उत्पादन योजना इत्यादि की जाँच की जाती है और उत्पादकों व उसके कार्यकर्ताओं से साक्षात्कार कर मानकों की अनुपालना सुनिश्चित की जाती है।

प्रमाणीकरण शुल्क - उत्पादकों को पूरी प्रमाणीकरण प्रक्रिया के लिए प्रमाणीकरण संस्था को वांछित शुल्क देना होता है। पूर्ण शुल्क के भुगतान था सफल निरीक्षण के पश्चात ही प्रमाणीकरण प्रदान किया जाता है।

पूर्ण प्रकिया प्रलेखन - आदानों के क्रय से लेकर, उत्पादन तक तथा उनेक प्रसंस्करण व् विपणन तक पूरी प्रणाली का रिकार्ड रखा जाता है। यह सारा रिकार्ड प्रमाणीकरण प्रक्रिया का प्रमुख आधार है तथा विपणन पश्चात भी उस उत्पाद का उत्पादन विवरण जानने में सहायक है। प्रमाणीकरण संस्थाएं समय-समय पर निरीक्षण करती है। ये निरीक्षण पूर्व स्वीकृत समय पर या बिना बताये भी अचानक किए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर मिट्टी फसल या उत्पादों के नमूनों की भी जाँच कराई जाती है।

किसी भी फार्म पर जब जैविक प्रबन्धन अपनाया जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाता है कि उस फार्म की मिट्टी प्रमाणीकृत किये जाने से पूर्व सभी रसायनों के अवशिष्ट से मुक्त हो। इसके लिए जैविक प्रबन्धन शुरू करने के बाद 2-3 वर्ष का समय परिवर्तन कालाविधि का रखा जाता है। इस अवधि में भी सभी मानकों की पूर्ण अनुपालना आवश्यक है। ऐसे फार्म जहाँ पहले से कोई भी प्रतिबंधित  आदान नहीं उपयोग किया गया है या प्रतिबंधित प्रक्रिया नहीं अपनाई है वहाँ परिवर्तन कालाविधि की आवश्यकता नहीं होती है।

अन्य प्रक्रियाओं जैसे प्रसंस्करण, भंडारण तथ परिवहन का भी प्रमाणीकरण इसी प्रकार किया जा सकता है। प्रसंस्करण में उपकरणों की शुद्धता, कच्चे माल का स्रोत तथा प्रक्रिया में प्रयोग किए जाने वाले तत्वों या योजकों का उपयोग मानकों के अनुरूप होता है। भंडारण में यह सुनिश्चित किया जाता है कि जैविक उत्पाद अन्य उत्पादों के साथ न मिलने पाए और उनकी सुरक्षा केवल अनुमत पदार्थों के प्रयोग से हो तथा किसी भी स्तर पर जैविक उत्पाद प्रतिबंधित रसायनों के सम्पर्क में न आयें।

भारत में प्रमाणीकरण तंत्र

भारत सरकार के विपणन मंत्रालय के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम’ के अधीन जैविक प्रमाणीकरण तंत्र कार्य कर रहा है। कृषि प्रसंस्करण उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण  द्वारा यह तंत्र प्रचालित होता है। हालाकिं यह कार्यक्रम निर्यात के लिए नियमित किया गया था परन्तु घरेलू प्रमाणीकरण तंत्र के आभाव में इस तंत्र का घरेलू बाजार हेतु भी प्रयोग किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 प्रमाणीकरण संस्थाओं को प्राधिकृत किया जा चुका है। इस पूरे कार्यक्रम की जानकारी तथा राष्ट्रीय मानकों का वितरण आपदा की वेबसाइट www.apeda.com/npopपर उपलब्ध है।

जैविक कृषि के राष्ट्रीय कार्यक्रम

जैविक कृषि के राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत व्यापार मंत्रालय ने जैविक कृषि के राष्ट्रीय मानक निर्धारित किये हैं।

1. बदलाव आवश्यकताएं

जैविक कृषि प्रबन्धन शुरू करने के समय से लेकर वास्तविक जैविक कृषि फसल के उगाने या पूर्ण जैविक कृषि पशुपालन शुरू करने के बीच के समय को बदलाव समय के रूप में जाना जाता है। एक समयबद्ध कार्यक्रम के अंतर्गत पूरे फार्म को उसके पशुधन समेत मानकों के अनुरूप ढाल देना चाहिए यदि पूरे फार्म को बदलना संभव न हो तो दोनों भागों को अलग-अलग रखना चाहिए और निरीक्षण करवाना चाहिए। बदलाव समय सीमा में समय-समय पर निरीक्षण अति आवश्यक है।

एक ही फार्म पर साधारण कृषि द्वारा, बदलाव समय के अंतर्गत या जैविक कृषि उत्पादन विधि द्वार उत्पादन ऐसी अवस्था में जहाँ उन्हें  बिलकुल अलग-अलग न किया गया हो का उत्पादन पूर्ण रूप से वर्जित है। इसे सुनिश्चित करने के लिए प्रमाणीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत पुरी उत्पादन प्रकिया का निरीक्षण अति आवश्यक है। यदि किसी स्थान पर पहले से जैविक कृषि तकनीकों का प्रयोग हो रहा है तो प्रमाणीकरण संस्था अपने विवेक से बदलाव समय को कम भी कर सकती है।

जैविक कृषि प्रबन्धन

जैविक कृषि प्रमाणीकरण एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है अतः प्रमाणीकरण कार्यक्रम में अंतर्गत उसी उत्पादन प्रक्रिया को प्रमाणीकृत करना चाहिए जो लंबी अवधि के लिए की जा ही हो। बदली गई भूमि एवं पशु बार-बार साधारण प्रबन्धन या जैविक कृषि प्रबन्धन की बीच नहीं आने चाहिए।

भूदृश्य

जैविक कृषि पर्यावरण के लिए निश्चित रूप से लाभकारी होनी चाहिए। पूरे क्षेत्र के उचित प्रबन्धन एवं जैव विविधता के निर्वहन के लिए कुछ आवश्यकताएं निम्नानुसार हैं।

1. दूर-दूर तक फैले घास के मैदान।

2. सभी क्षेत्रों का फसल चक्र के अंतर्गत न होना और अधिक खाद न डालना।

3. चारागाह, घास के मैअदान, फलों के बगान एवं वानस्पतिक बाड़ घेरा लगाना।

4. पर्यावरणीय एंव पारिस्थितिकी से समृद्ध भूमि।

5. जैव विविधता से परिपूर्ण क्षेत्र।

6. जल निकासी, तालाब, झरने, पोखर, गड्डे, डूब की जमीन इत्यादि।

प्रमाणीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक का कुछ भाग जैव विविधता के निर्वहन एवं प्रकृति संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा जाए।

2. फसल उत्पादन

फसलों एंव प्रजतीयों का चयन - सभी चयनित फसल प्रजातियों के बीज एवं कंद इत्यादि प्रमाणित जैविक कृषि उत्पाद कृषि उत्पाद होने चाहिए। चयनित प्रजातियाँ स्थानीय पर्यावरणीय अवस्थाओं के अनुकूल हों और कीट व् बिमारी प्रतिरोधी हों। यदि प्रमाणित जैविक कृषि बीज व् कंद इत्यादि उपलब्ध न हो तो बिना रसायन उपचार के अन्य बीज व् कंद भी प्रयोग किये जा सकते हैं। परिवर्तित अनुवांशिकी वाले बीजों, कंदों, परागण तथा ट्रांसजैनिक पौधों का प्रयोग वर्जित है।

बदलाव समय की अवधि - वर्षिक रूप से उगाये जाने वाले पौध उत्पादों के लिए बदलाव समय उस विशिष्ट फसल की बुआई से 12 महीने पूर्व शुरू होना चाहिए। अन्य लंबी अवधि की फसलों एवं बागवानी पौधों के ली बदलाव समय जैविक प्रबन्धन शुरू करने की तिथि से 18 महीने पूर्व से शुरू होना चाहिए। पूर्व में की जाने वाली खेती पद्धति एवं स्थानीय आवश्यकताओं के मद्देनजर प्रमाणीकरण संस्था इस अवधि को घटाने या बढ़ाने की अनुशंसा कर सकती है।

फसल उत्पादन में विविधता - फसल उत्पादन में एवं उस क्षेत्र विशेष में पौध विविधता बनाये रखने के लिए यह जरुरी है कि विभिन्न लेग्यूम फसलों के फसल चक्र अपनाएं जाएं और आसपास की अन्य खुली भूमि पर विभिन्न प्रकार की स्थानीय पौध प्रजातियाँ उगाई जाएँ। इन प्रकियाओं से न केवल भुनी स्वस्थता एवं उर्वरा शक्ति में सुधार होगा बल्कि विभिन्न कीट पतंगों, खरपतवार एवं बीमारियों के प्रकोप को भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

खाद प्रबन्धन - जैविक कृषि फार्म पर ही उत्पादित पौध एवं पशु अवशिष्ट का स्थान खाद प्रबन्धन में सर्वोपरि है क्य्हद प्रबन्धन में जिन बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना है उनमें प्रमुख हैं पौध पोषणों के क्षरण को रोकना, भारी धातु अवयवों को न जमा होने देना तथा मृदा पी.एच, को मान्य स्तर पर बनाये रखना। जहाँ तक संभव हो सके उसी फार्म पर उत्पादित जैविक अवशेष खादों का ही प्रयोग करना चाहिए। जैविक खादों के अधिक उपयोग से बचना चाहिए।मानव मल युक्त खाद का प्रयोग उन फसलों में जिनके उत्पादों का प्रयोग मानवों के लिए निश्चित हों में नहीं करना चाहिए। ऐसी खाद का प्रयोग जैविक पशुओं के आहार वाली फसलों में किया  जा सकता है।

पोषणों की कमी की स्थिति में कुछ खनिज उत्पादों का पूरक खाद के रूप में  प्रयोग किया जा सकता है। ध्यान रहे ये उत्पाद अपने प्राकृतिक रूप में ही होने चाहिए। ऐसे खनिज उत्पाद जिनमें भारी धातु अवशिष्ट होने की संभावना हो उनके प्रयोग से बचना चाहिए।

जैव उर्वरक या जीवाणु खाद सभी फसलों व सभी पर्यावरणीय परिस्थितियों में सुरक्षित रूप से प्रयोग किये जा सकते हैं।

खरपतवार, कीट व बिमारी प्रबन्धन एवं होरमोंस का प्रयोग - खरपतवार, कीट व बीमारियों की रोकथाम विभिन्न कृषि तकनीकों जैसे उपयुक्त फसल चक्र, हरी खाद का प्रयोग समन्वित एवं संतुलित मात्रा में खादों का प्रयोग, जल्दी बुवाई, सही ढंग से भूमि की तैयारी, मल्चिंग एवं विभिन्न कीटों के जीवन विकास चक्र में व्यवधान इत्यादि के सम्मलित प्रयोग से की जा सकती है।

स्थानीय रूप से वानस्पतिक एवं पशु स्रोतों से तैयार किये गये कीटनाशकों एवं सूक्ष्मजीव कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। खरपतवार को जलाकर एवं कीट बीमारियं का विभिन्न भौतिक तरीकों से भी नियंत्रण किया जा सकता है। संश्लेषित रसायनों जैसे रासायनिक कीटनाशक, फफूँदीनाशक, खतपतवार नाशक, वृद्धि उत्प्रेरक हारमोंस तथा रासायनिक रंगों का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। परिवर्तित आनुवंशिकी की जीवों व् उनके उत्पादों का प्रयोग भी वर्जित है।

संदूषण - जैविक कृषि प्रबन्धन में पूरे प्रयास किये जाने चाहिए कि उत्पादन के किसी भी स्तर पर फार्म के अंदर एवं बाहर के उत्पादनों का किसी भी रूप में कोई मिश्रण न हो सके।

भू एवं जल संरक्षण - भू एवं जल संसाधनों का उपयोग सही एवं टिकाऊ ढंग से होना चाहिए तथा प्रयास किये जाने चाहिए कि उनके दोहन से किसी भी प्रकार का क्षरण, लवनीकरण, जल का अत्यधिक दोहन तथा भू जल में किसी भी प्रकार का प्रदूषण न हो सके। आग लगाकर जमीन साफ करने के तरीके को कम से कम प्रयोग करना चाहिए। जंगल काटकर खेती की जगह बनाना सर्वथा वर्जित प्रक्रिया है।

3. शहद एवं अन्य वानस्पतिक उत्पादों को इकट्ठा करना - प्राकृतिक जंगल व अन्य गैर कृषि भूमि से किए गये उत्पादों को जैविक कृषि उत्पाद के रूप में तभी प्रमाणित किया जा सकता है जब वे क स्थायी एवं टिकाऊ प्राकृतिक वातावरण से इकट्ठा किये गये हों और उतनी ही मात्रा में इकट्ठा किए गये हों जितनी उस प्राकृतिक अवस्था में बिना पर्यावरण को असंतुलित किए व बिना विभिन्न प्रजातियों की जीवन क्षमता को प्रभावित किए संभव हो। जिस स्थान से ये प्राकृतिक उत्पाद इकट्ठा किए गये हों वह स्थान कृषि भूमि, मानव बस्ती, प्रदूषण स्रोतों इत्यादि से उचित दूरी पर होना चाहिए और उसके आसपास के क्षेत्र में किसी भी प्रकार के प्रतिबंधित रसायन का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

4. खाद्य प्रसंस्करण एवं संचालन –

सामान्य सिद्धांत - तोड़कर इकट्ठा करते मस्य, भण्डारण में तथा प्रसंस्करण में इस बात का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए कि जैविक कृषि उत्पाद अन्य उत्पादों के साथ न मिल सकें प्रमाणीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत वांछित सफाई, तथा अभी उपकरणों के निष्कीटन के लिए मानक निर्धारित कर प्रक्रिया तो नियमित किया जा सकता है। उपयुक्त तापमान पर भंडारण के अलावा निम्न विशिष्ट प्रक्रियाओं को भंडारण में प्रयोग किया जा सकता है।

नियंत्रित वातवारण, ठंडा करना, बर्फ जमाना, सुखाना तथा नमी नियंत्रण

कीट नियंत्रण - कीट प्रबन्धन एवं कीट नियंत्रण के लिए प्राथमिकता के आधार पर निम्न उपाय किये जा सकते हैं।

  • निवारण उपाय जैसे कीटों के जीवन चक्र में व्यवधान उनके पलने व् बढ़ने के स्थानों की समाप्ति तथा अच्छी सुविधाओं की उपलब्धता।
  • यांत्रिक, भौतिक एवं जैविक नियंत्रण उपाय।
  • मानकों के अंतर्गत स्वीकार्य कीटनाशकों का प्रयोग
  • कीट ट्रेप में अन्य पदार्थों का प्रयोग।

विकिरणों का प्रयोग वर्जित है। जैविक कृषि पदार्थों का प्रतिबंधित रसायनों के साथ सीधे या परोक्ष संपर्क बिलकुल नहीं होने देना चाहिए।

स्त्रोत:  कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार

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