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विभिन्न फसलों के मुख्य रोग, लक्षण एवं प्रबंधन

इस पृष्ठ में विभिन्न फसलों के मुख्य रोग, लक्षण एवं प्रबंधन सम्बन्धी जानकारी दी गयी है।

विभिन्न बीजों के मुख्य रोग, लक्षण एवं प्रबंधन

फसल

रोग

लक्षण

प्रबंधन

धान

झुलसा या बलास्ट रोग

पत्तियों पर लगभग 1 सें.मी. चौड़े नाव आकार के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। इनके बीच का भाग राख के रंग का होता है और परिधि पर गहरे भूरे रंग की पतली पट्टी पाई जाती है। बालियों के नीचे डण्ठल पर भूरा काला धब्बा दिखाई पड़ता है। काले भाग में धान के बाल टूट जाते है।

(अ) कार्बेगन्डाजिम अथवा ट्राइसायक्लाजोल (बिज दो ग्राम) दवा प्रति किलोग्र. बिज की दर बीजोपचार करें।

(ब) बैविस्टीन (250 ग्राम) + इंडोफिल एम. (1.25 किग्रा.) या बीम (0.05%); बैविस्टीन 500 ग्राम पानी में घोलकर 10-11 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें।

(स) रोग निरोधक किस्मों की खेती करें।

 

 

पत्र लांछन या भूमि चित्ती रोग

पत्तियों और दानों पर छोटे-छोटे भूरे रंग के अंडाकार धब्बे बन जाते हैं। बीज का भाग धूसर रंग का हो जाता है।

(अ) बीजोपचार झुलसा की तरह करें।

(ब) ढाई ग्राम डायथेन जेड-78 या कवच (२%) प्रतिलीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

(स) रोग निरोधक किस्में उगायें।

 

जीवाणु पर्ण अंगमारी

पीले या पुआल के रंग के लहरदार धब्बे पत्तियों के एक या दोनों किनारों के सिरे से प्रारम्भ होकर नीचे की ओर बढ़ते हैं। क्षत सील पत्तियों की नसों के समानांतर होते हैं। बाद में ये लम्बाई और चौड़ाई दोनों में बढ़ते हैं और पत्तियाँ सूख जाती है।

(अ) 6 घंटे तक बीज को स्ट्रेप्टोसाक्लिन (10 पी.पी.एम.) भिगोंयें तत्पश्चात तप्त जल उपचार (51 सें. पर 15 मिनट) करें।

(ब) रोग ग्रस्त खेत का पानी दूसरे खेत में बहायें।

(स) रोगरोधी किस्में उगायें।

 

जीवाणु पर्ण रेखा

पीली या नारंगी कत्थई रंग की धारियाँ शिराओं से घिरी पायी जाती हैं। कई धारियाँ आपस में मिलकर बड़े धब्बे का रूप लेती हैं, जिससे पत्तियाँ समय से पहले सूख जाती है।

जीवाणु पर्ण अंगमारी की तरह।

 

धड़ सड़न

इस रोग के लक्षण तना तथा पर्णच्छद पर पानी की सतह के पास भूरे काले रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं, जो कई सेंटीमीटर तक नीचे और उपर फैलता है और पूरे तने को घेर लेता है। बालियाँ निकलते समय सभी कमजोर तने गिर जाते हैं, जिससे बालियों में आधे से अधिक दाने खाली रह जाते हैं।

(अ) बीज को बैविस्टीन (2 ग्राम प्रति किलोग्राम बिज की दर से) द्वारा उपचारित कर लगायें।

(ब) दो किलो इंडोफिल एम.45 को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। 15 दिनों पश्चात दुबारा छिड़काव करें।

 

आभासी कंड (फ़ॉल्स स्मट)

रोगग्रस्त दानों के अंदर कवक अंडाशय को एक बड़े कूटरूप में बदल देता है, पहले पीले से लेकर संतरे के रंग का और बाद में जैतूनी-हरा। रोगी दाने आकार में धान के दानों से दुगुने से भी बड़े हो जाते हैं और मखमली दिखाई पड़ते हैं।

बाली निकलने से पहले टिल्ट (0.1%) अथवा बैविस्टीन 500 ग्राम अथवा ब्लाइटॉक्स-50 (किलोग्राम) को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। 15 दिनों पश्चात दुबारा छिड़काव करें।

गेहूँ

काला किट (हरदा)

तनों, पत्तियों एवं पर्णच्छदों पर लम्बे, लाल भूरे से काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं जो जल्द फट जाते हैं और उनसे भूरा चूर्ण निकलता है।

इसके नियंत्रण हेतु जिनेब या इंडोफिल एम-45 या प्रोपिकोनाजोल (टिल्ट) (0.1%) का 0.2% प्रतिशत घोल बनाकर 15 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें। रोग निरोधक किस्मों की खेती करें।

 

पीला किट

पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार, हल्के पीले रंग के धब्बे कतारों में पाये जाते है। अन्य किटों के तुलना में पीला किट देर से आता है। धब्बों के फटने पर चमकीले पीले बीजाणु बाहर आ जाते हैं।

काला किट की तरह रोकथाम करें।

 

भूरा किट

धब्बे छोटे, गोल, चमकीले और नारंगी रंग के होते हैं एवं कतारों में न होकर सतह पर बिखरे होते हैं। इस रोग में धब्बों का आकार पीले किट के धब्बों की अपेक्षा कुछ बड़ा होता है। धब्बे शीघ्र फट जाते है एवं असंख्य बीजाणु बाहर निकलते हैं।

इसके नियंत्रण हेतु जिनेब, इंडोफिल एम-45 का 0.2 प्रतिशत प्रयोग करें।

 

अनावृत कंड (लूज स्माट)

रोगी पौधों की सभी बालियाँ काले चूर्ण का रूप लेती है। उनमें दाने नहीं बनते है।

बीजों की (रैक्सिल) टेबुकोनाजाल-1.5 ग्राम अथवा वीटावैक्स या बैविस्टीन या अन्य सर्वागी कवक नाशक दवा से 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार उपचार करें।

 

अल्टरनेरिया पत्र लांछण अंगमारी

पत्तियों पर छोटे अंडाकार धब्बे बिखरे होते हैं, इसका रंग शुरू में पीला-भूरा होता है।

(अ) उपर्युक्त दवा से बीजोपचार करें।

(ब) इंडोफिल एम-45 या डायथेन जेड-78 दवा का 2.5 किलोग्राम 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

 

हेल्मिंथोस्पोरिम

पत्तियों पर पीली धारियाँ पैदा हो जाती है। बाद में धारियों का रंग भूरा हो जाता है।

बैविस्टीन, कैप्टान या थीरम के 2 ग्राम चूर्ण से प्रति किलोग्राम बीज का उपचार करें।

जौ

आवृत्त कंड (कवर्ड स्मट) अनावृत कंड (लूज स्मट)

संक्रमित बालियाँ काली दिखाई देती हैं तथा दाने काले रंग के बीजाणु पुंजों से भर जाते हैं। पौधों की सामान्य बालियों के बदले काली कंडयुक्त बालियाँ निकलती हैं। काले चूर्ण पतली झिल्ली से ढके रहते हैं जो जल्दी फट जाती हैं।

वीटावैक्स 2 ग्राम अथवा बीटावैक्स पावर प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें। उपर्युक्त दवा से बीजोपचार करें।

मक्का

हेल्मिंथोस्पोरियम ब्लाइट

पत्तियों पर लम्बे अथवा नाव के आकार वाले भूरे कत्थई रंग के धब्बे पाये जाते हैं। धब्बों का किनारा गहरा भूरा रंग का होता है। मध्य भाग धीरे-धीरे काले रंग में बदल जाते है।

(अ) थीरम के 3 ग्राम चूर्ण से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें।

(ब) रोग का प्रकोप शुरू होते ही डाइथेन जेड-78 या मैंकोजेब या इंडोफिल एम-45 का 2.5 किलोग्राम प्रति 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर 7-10 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें।

 

शीथ ब्लाइट

पत्तियों के आधार तथा भुट्टों के छिलकों पर हल्के हरे गीले, राख के रंग के धब्बे बनते हैं।

बैविस्टीन 0.5 किग्रा/हेक्साकोनाजाल (कोनटाफ) (1 लीटर) या इंडोफिल एम-45 की 2 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

मडुआ

झुलसा

धान के झुलसा रोग की तरह पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे, गोल या अंडाकार हल्के भूरे या गहरे रंग के उभरे हुए धब्बे बन जाते हैं। बीज का भाग राख जैसा रहता है।

धान के झुलसा रोग की तरह रोकथाम करें। साफ़ (0.2 प्रतिशत) अथवा बीम (0.03 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

चना

उकठा

पौधे पीले पड़ने लगते हैं और उपर से नीचे की ओर पत्तियाँ सूखने लगती है। अंत में पौधे सूखकर मर जाते हैं।

(अ) बीज को कर्बोंन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।

(ब) फसल चक्र तथा रोग अवरोधक प्रभेद जैविक पन्त-जी 114 के बीज बोएं।

अरहर

उकठा

रोगी पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं तथा पौधे मुरझाकर सूख जाते है। पौधों के तने का निचला भाग काला पड़ जाता है।

(अ) अरहर के साथ ज्वार की बुआई करें।

(ब) रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला दें।

(स) बसंत, बहार, शरद तथा बिरसा अरहर – रोगरोधी किस्में लगायें।

(द) बीजोपचार बैविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें।

(ध) खेत में प्रचुर मात्रा में गोबर की सड़ी खाद एवं खली का प्रयोग करें।

उड़द, मूंग

मोजैक तथा पीला मोजैक

पत्तियों तथा फलियों पर बैंगनी लाल वृत्ताकर अथवा अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं, जिसका मध्य भाग पूरे रंग का होता है।

0.25 प्रतिशत डायथेन जेड-78 का 10 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें।

 

 

अनियमित हल्की या पीली चित्तियाँ पत्तियों पर दिखाई देती है। पत्तियाँ छोटी हो जाती हैं, पौधों की सामान्य वृद्धि कम हो जाती है।

(अ) रोगी पौधों से प्राप्त बीज बोने के काम में लायें।

(ब) रोगरोधी प्रभेदों का व्यवहार करें।

(स) कीट नियंत्रण हेतु मेटासिस्टॉक्स -1 मि.ली. प्रति लीटर अथवा ट्राइक्योर-5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

 

जालीदार अंगमारी

पौधे के सभी हरे भागों पर गीले-भूरे रंग के धब्बे बन जाते है जिससे पूरा पौधा सूख जाता है। नम मौसम में कवक जाल पौधों पर दिखाई पड़ते हैं।

(अ) बीजोपचार बैविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्रा. बीज की दर से करें।

(ब) बैविस्टीन 0.5 कि. या इंडोफिल एम 45 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

मटर

चूर्णिल फफूंदी या पाउड्रीमिल्ड्यू

पत्तियों, फलियों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ता हैं। पत्तियों, तने एवं फलियों पर पीले गोल या लम्बे पाये जाते हैं, जो चूर्ण की तरह हल्के भूरे रंग के होते है।

0.1 प्रतिशत कैराथेन अथवा 0.3 प्रतिशत सल्फेक का छिड़काव करें। इंडोफिल एम-45 के 1.0 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। रोगरोधी किस्म रचना, पूसा प्रगति लगायें।

 

किट (हरदा)

पौधों की पत्तियों, तने एवं फलियों पर पीले गोल या लम्बे धब्बे पाये जाते हैं। धब्बे पत्तियों की दोनों सतहों पर बनते हैं। जो चूर्ण की तरह हल्के भूरे रंग के होते है।

ऊपर जैसा

सोयाबीन

किट (हरदा)

पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे पाये जाते हैं, जो शीघ्र ही पत्तियों पर फ़ैल जाते हैं। पत्तियाँ झुलस जाती हैं।

इंडोफिल एम-45 के 1.5 प्रतिशत घोल वाले छिड़काव करें।

 

जीवाणु अंगमारी

पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं जिसके चारों ओर जलयुक्त किनारा दिखाई देता है। अत्यधिक संक्रमण होने पर पत्तियाँ गिर जाती है।

बीज को 0.2 प्रतिशत बीटावैक्स से उपचारित करना तथा स्ट्रेप्टोसायक्लिन 0.01 प्रतिशत का छिड़काव करें।

विभिन्न बीजों के मुख्य रोग, लक्षण एवं प्रबंधन

फ्रेंचबीन

किट (हरदा)

पत्तियों पर छोटे, गोल, भूरे रंग के धब्बे पाये जाते हैं। रोगग्रस्त पौधे सूखने लगते हैं।

इंडोफिल 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

आलू

अगेती अंगमारी

पत्तियों पर छोटे फीके-भूरे चमकदार धब्बे बनते हैं। नीचे वाली पत्तियाँ पहले संक्रमित होती है जहां से रोग ऊपर की ओर बढ़ता है। सूखे मौसम में धब्बे कड़े हो जाते हैं एवं पत्तियाँ सिकुड़कर गिर जाती है।

रोग निरोधक प्रजातियों की खेती करें।

 

पछेती अंगमारी

पत्तियों पर किनारे वाले भाग पर भूरे धब्बे शुरू होकर पौधों के अन्य भागों पर फ़ैल जाते है। अनुकूल परिस्थितियों में पौधों का सम्पूर्ण भाग नष्ट हो जाता है।

(अ) बोने से पहले आलू के बीज को मेटलैक्जिल के 0.15 प्रतिशत घोल में डुबो लें।

(ब) रिडोमिल एम. जेड 0.2 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 2-3 बार करें।

(स) रोगरोधी प्रजातियों (कुफरी बादशाह, कुफरी जवाहर, कुफरी ज्योति) को लगायें।

 

काली रूप (ब्लैक स्कर्फ)

कंदों पर भूरी काली पपड़ी छोटी-बड़ी गोल का पाया जाना इस रोग की मुख्य पहचान है।

(अ) स्वस्थ आलू के बीजों को लगायें।

(ब) बीज को कार्बेन्डाजिम के 0.1 प्रतिशत अथवा बोरिक अम्ल (0.3) घोल से उपचारित कर लें।

(स) खेत में करंज या नीम या अरंडी या महुआ की खली डालें।

 

पत्ती-मुंडल (लीफ रौल)

पत्तियों का मध्य शिराओं के ऊपर की ओर मुड़ जाना। ऐसी पत्तियाँ मोटी एवं भंगुर होती हैं और छुने मात्र से पत्ती के उत्क टूटने लगते हैं। यहीं इसके रोग-वाहक कीट होते है।

(अ) स्वस्थ एवं प्रमाणित आलू की बुआई करें।

(ब) रोगी पौधों को आलू सहित खोदकर नष्ट करें।

(स) सर्वागी कीटनाशी का छिड़काव करें।

भिण्डी

पीला शिरा (मोजैक)

पत्तियों की शिराएं पीले रंग की हो जाती है। फलियाँ छोटी, हल्के रंग की विकृत और कड़ी हो जाती है।

रोग सहनशील किस्मों (पंजाब-7, अर्का अभय,ए-4, अर्का अनामिक) को उगायें। कुंडों में कर्बोफुरॉन 3 जी की 3 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से प्रयोग करें।

 

उकठा

पौधा छोटा पीला होकर सूख जाता है।

बीज को थीरम या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करें।

फूलगोभी तथा पत्ता गोभी

मृदुरोमिल असिता

पत्तियों की निचली सतह तथा तनों पर छोटे-छोटे नीललोहित रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। धब्बों पर फफूंद की सफेद मृदुरोमिल की वृद्धि होती पाई जाती है।

बीज को बोने से पहले कार्बेन्डाजिम (1.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज) में उपचारित करें।

बैंगन

म्लानि रोग

पानी की कमी न होने पर भी पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। जड़ें काली हो जाती है।

(अ) रोग सहिष्णु किस्मों (स्वर्णश्री, मणि, स्वर श्यामली, स्वर्ण प्रतिभा, अर्का सेश्व, अर्का निधि का चयन करें।)

(ब) फसल चक्र में 3 वर्षों तक सोलेनेसी कुल की सब्जियां नहीं लगायें।

(स) खेत में गोबर की सड़ी खाद तथा करंज की खली डालें।

(द) गर्मियों में खेत की गहरी जुताई (15-18) सें.मी. कर खेत को खुला छोड़ दें।

टमाटर

म्लानि रोग

बैंगन के म्लानि रोग की तरह

अ) रोग सहिष्णु किस्मों (अर्का आभा, अर्का आलोक, अर्का श्रेष्ठा, स्वर्ण नवीन, स्वर्ण वैभव, स्वर्ण लालिमा) का चयन करें।

(ब) 3 वर्षीय फसल चक्र अपनाएं।

(स) गोबर की सड़ी खाद एवं खली डालें।

(द) गर्मियों में खेत की गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ दें।

मूंगफली

टिक्का रोग

पत्तियों, तनों तथा पर्णवृतों पर हल्के पीले दाग देखे जाते हैं जो बाद में गहरे रंग के वृताकार हो जाते है।

इंडोफिल एम-45 (1.25 किलोग्राम) कार्बेन्डाजिम (0.5 किलोग्राम) अथवा साफ़ 0.2 प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

 

किट (हरदा)

पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं जो बाद में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले या नारंगी रंग के धब्बे के रूप के रूप में दिखाई देते है।

मैंकोजेब एम-45 0.2 या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 प्रतिशत या कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें। 5:5:50 के अनुपात में चना तूतिया:पानी का घोल भी काफी लाभदायक पाया गया है।

सरसों

श्वेत किट

रोगग्रस्त पौधों की पत्तियाँ एवं तनों पर उठे हुए सफेद फफोले के रूप में धब्बे दिखाई पडतें हैं जो बाद में अनियमित आकार के हो जाते हैं। फफोले की वाह्य त्वचा फट जाती है एवं जीवाणु चूर्ण के रूप में दिखाई पड़ते है।

अ) 0.2 प्रैत्ष्ट थीरम से बीजोपचार करें और 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब एम-45 का छिड़काव करें।

(ब) 0.25 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड/ डायथेन जेड-78 अथवा रिडोमिल- 0.15 का छिड़काव करें।

 

 

पत्र लांक्षण

पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे-पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये धब्बे संकुचित अंगूठीनुमा दिखाई पड़ते हैं।

0.25 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड अथवा मैंकोजेब एम-45 का छिड़काव करें।

 

किट (हरदा)

पत्तियों पर हल्के पीले रंग या नारंगी रंग के छोटे-छोटे गोल धब्बे तथा तने पर लम्बे काले धब्बे दिखाई पड़ते है। ऐसी पत्तियाँ समय से पहले ही सूखकर गिर जाती है।

मैकोजेब एम-45 के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

अलसी या तीसी

उकठा

रोगी पौधों की पत्तियाँ पीली या भूरी हो जाती हैं तथा मुरझाकर ऐंठ जाती हैं। पौधा सूख जाता हैं और पत्तियाँ झड़ जाती है।

(अ) रोगग्रस्त खेतों में 2-3 वर्ष तक अलसी न बोयें।

(ब) किरण और आर-552 जैसी रोगरोधी किस्मों का व्यवहार करें।

 

गन्ना

लाल सड़न रोग

रोगी तने के गूदे लाल रंग के हो जाते हैं। पत्तियों की मध्य शिराओं में भी लाल धब्बे बनते हैं।

(अ) फसल चक्र अपनाएँ ।

(ब) रोग रोधी किस्में लगायें।

(स) ब्लाइटॉक्स-50 (0.2) अथवा कार्बेन्डाजिम (0.05) का छिड़काव करें।

(द) कार्बेन्डाजिम (0.1) युक्त तप्त जल (50 सें.ग्रे.) से ३० मिनट तक पोरियों का उपचार करें।

 

अमरुद

उकठा

रोग ग्रस्त पौधों की टहनियों ऊपर से सूखने लगती हैं। पत्तियाँ ताम्बे के रंग की होकर गिर जाती हैं। धीरे-धीरे पूरा पेड़ सूख जाता है।

(अ) रोगग्रस्त टहनियों को काटकर शीघ्र हटा दें।

(ब) पेड़ के चारों ओर मिटटी में चूना और समुचित खाद-पानी दें।

(स) फफूंदीनाशी बैविस्टीन (0.2) से जड़ों के पास की मिटटी को सिचिंत करें तथा मेटासिस्टॉक्स (0.05) और जिंक सल्फेट का छिड़काव करें।

(द) रोग रोधी जातियों, जैसे बनारसी, नासिक, लखनऊ 49 का चयन करें।

 

 

कैंकर रोग

छोटे-छोटे फलों पर उठे हुए दाने दिखाई पड़ते हैं और फल विकृत हो जाते हैं।

पेड़ पर ब्लाइस्टॉक्स-50 या फाइटोलान 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करें।

नींबू

कैंकर रोग

पेड़ की पत्तियों, तनों एवं फलों पर छोटे-छोटे उकठे दाने दिखाई पड़ते हैं। पेड़ों की टहनियां ऊपर से सूखने लगती हैं।

रोगग्रस्त टहनियों को काटकर जला दें और पेड़ पर 4:4:50 तुतिया:चूना:पानी का घोल अथवा ब्लाइस्टॉक्स 50 (0.3) अथवा स्ट्रप्टोमाइसिन सल्फेट 0.05 का छिड़काव करें।

पपीता

धड़ सड़न

सतह से कुछ ऊपर पेड़ के तने सड़ने लगते हैं और धीरे-धीरे पेड़ खोखला होकर गिर जाता है।

तनों पर 2:2:5 तुतिया:चूना: पानी का गाढ़ा घोल लेप कर दें और पेड़ों के चारों ओर मिटटी में 0.3 प्रतिशत कैप्टान के घोल का छिड़काव करें।

 

वलय चित्ती वाँयरस

रोगग्रस्त पेड़ों की पत्तियाँ विकृत हो जाती हैं और पेड़ों का बढ़ना रुक जाता है। फल छोटे-छोटे और विकृत हो जाते है।

(अ) रोगरोधक किस्मों, वाशिंगटन, हनीड्यू की खेती करें।

(ब) पपीते का पौधा अक्टूबर माह में लगाने से बीमारी कम होती है।

अदरक

प्रकंद सड़न

प्रकंद खेत में या भंडार में सड़ जाते हैं।

(अ) खेत में पानी का जमाव न होने दें।

(ब) प्रकंदों को बुआई से पूर्व ब्लाइस्टॉक्स-50 (0.2) प्रतिशत के घोल में 30 मिनट तक भिंगायें।

(स) खेत में 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से ब्लीचिंग पाउडर डालें।

(द) खड़ी फसल में मेटालैक्जिल (0.2) को छिड़काव जड़ के पास की मिटटी भिंगोते हुए करें।

 

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

3.01724137931

Arjun ajmeriya Nov 21, 2018 12:04 PM

मटर की खेती मे बहुत से पौधे पिले पड कर सुख रहे हमे क्या करना चाहिए को नसी दवा का उपयोग करना चाहिए

सत्यपाल सिंह prabhakar Oct 08, 2018 01:33 AM

Dhan में khra रोग ,मक्का में वाइट rog, Matar में मार्श rog , आलू में bilek rog

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