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झारखण्ड में प्रमुख सब्जियों का बीज उत्पादन

इस पृष्ठ में किस प्रकार से झारखण्ड में प्रमुख सब्जियों का बीज उत्पादन हो रहा है और क्या संभावनाएं हैं, इसकी जानकारी दी गयी है।

परिचय

सफल सब्जी उत्पादन के लिए उत्तम बीज की महत्ता से हम भलीभांति परिचित है। सन 1952 ई० में गठित रॉयल एग्रीकल्चर कमीशन के द्वारा प्रथम बार बीज उत्पादन व वितरण कार्य की विस्तृत रूप से समीक्षा की गई थी। इसमें प्रमुख रूप से अनाजों, दलहन व तिलहन तथा रेशे वाली फसलों को लिया गया । इसके बाद समय-समय पर अन्य समितियों तथा विशेषज्ञों  द्वारा भारतीय कृषि एवं बीज उद्योग की समीक्षाएं की जाती रही हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा में वांछनीय प्रगति हुई है और राज्य बीज फार्म योजना व राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना की गई। भारतीय राज्य फार्म निगम तथा तराई बीज निगम के अस्तित्व में आने के साथ ही निजी उद्योगों का इस क्षेत्र में आगमन हुआ और राष्ट्रीय बीज कार्यक्रम बनाया गया।

वर्तमान में सब्जी बीज उत्पादन एवं वितरण की व्यवस्थाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि की अपार संभावनाएं है। झारखंड राज्य के लिए सब्जियों के क्षेत्रफल के आधार पर अनुमानस्वरुप निम्नलिखित मात्रा में बीज की आवश्कता होगी।

झारखण्ड राज्य में विभिन्न सब्जियों के अंतर्गत प्रयुक्त क्षेत्र फल एवं अनुमानित बीज की आवश्यकता

फसल

क्षेत्रफल (हेक्टेयर)

अनुमानित बीज की मात्रा (कि० ग्रा०)

बैंगन

8190

4914

फूलगोभी

9075

5445

पत्तागोभी

5510

3031

भिन्डी

15385

230775

प्याज

5296

42368

टमाटर

11091

5546

कद्दू वर्गीय सब्जियां

8700

43500

मिर्च

4021

2011

अन्य

12724

127240


क्षेत्र में उगाई जाने वाली प्रमुख सब्जियों की अनुशंसित किस्में

फसल

क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्में

बैंगन

स्वर्ण श्री, स्वर्ण मणि, अर्का केशव, अर्का निधि, पन्त ऋतुराज, पन्त सम्राट, पूसा क्रांति

टमाटर

पूसा शीतल, बी.टी.17, बी.टी.-20-2-1, एन.डी.टी.-3, के. एस., एन.डी.टी.-9, शक्ति, अर्का आभा, सी. एच.आर.टी.-4, सी.एच.डी.टी.-1, सी.एच.डी.टी.-2

फूलगोभी

अर्ली कुँवारी, पूसा अर्ली सिंथेटिक, पूसा दीपाली

फ्रेंचबीन

अर्का कोमल, पन्त अनुपमा, कन्टेन्डर, स्वर्ण प्रिया, स्वर्ण लता।

भिन्डी

अर्का अनामिका, अर्का अभय, परभनी करतानी, वर्षा उन्नत, वर्षा उपहार

मटर

अर्केल आजाद मटर-1, आजाद मटर-3, बोनविले, वी. एल. अगेती मटर-7, विवेक-6

लोबिया

अर्का गरिमा, पूसा फाल्गुनी, पूसा दोफसली

प्याज

अर्का निकेतन, अर्का कल्याण, पूसा माधवी, नासिक रेड, पटना रेड

मिर्च

अर्का लोहित, पूसा ज्वाला, पंजाब लाल, भाग्यलक्ष्मी, आंध्र ज्योति

शिमला मिर्च

अर्का गौरव, अर्का मोहिनी, बुलनोज, कैलिफोर्निया वंडर।


उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि झारखण्ड में सब्जी उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। अच्छे बीज में आनुवांशिक व भौतिक शुद्धता, उच्च अंकुरण क्षमता, बीज ओज, उचित आर्द्रता की मात्रा एवं बीज स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है। क्षेत्र में बैंगन, फूलगोभी, फ्रेंजबीन, भिन्डी, लोबिया, प्याज, मिर्च एवं शिमला मिर्च की खेती बड़े क्षेत्रफल में की जाती है।

भूमि का चुनाव

उपरोक्त सभी सब्जियों की सफल खेती के लिए यहाँ की भूमि उपयुक्त पाई गई है। बीज उत्पादन हेतु अच्छी उवर्रता वाली जैव पदार्थ-युक्त मिट्टी का चुनाव करना चाहिए। साथ ही ऐसी भूमि का चुनाव किया जाना चाहिए जिसमें गत दो वर्षों तक वह फसल न लगाईं गई हो जिसका बीज उत्पादन किया जाना है अथवा फसल बीज-प्रमाणीकरण के लिए निर्धारित स्तरों के अनुरूप रही हो।

पृथक्करण

बीज उत्पादन हेतु उगाई गई फसल को प्रदूषण स्रोतों से कितनी दूरी पर रखा जाए इसका निर्धारण बीज फसल की परागण प्रकृति तथा बीज वर्ग के अनुसार किया जाता है। समान्यतः स्वपरागित फसलों की दो या अधिक  किस्मों को पास उगाया जा सकता है। बीज फसल से इन किस्मों को दूर रखने का प्रमुख कारण कटाई के समय होने वाले यांत्रिक मिश्रण से बचाना है। अंतः इन फसलों के बीच 10 मीटर की दूरी रखना पर्याप्त होगा। कीड़ों और वायु की सहायता से परागित होने वाली फसलों को प्रदूषण स्रोत से पर्याप्त पृथक्करण दूरी रखना आवश्यक है। इस क्रिया के बिना शुद्ध बीज उत्पादन संभव नहीं। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए मटर के आधार बीज उत्पादन हेतु 25 मी. जबकि टमाटर, फ्रेंचबीन और लोबिया के लिए 50 मी., बैंगन के लिए 200 मी. तथा फूलगोभी के लोए 1600 मी. पृथक्करण दूरी रखी जाती है।

विभिन्न सब्जियों के लिए आधार और प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु अनुशंसित पृथक्करण दूरी

 

फसल

पृथक्करण दूरी (मी.)

टिप्पणी

आधार बीज

प्रमाणित बीज

बैंगन

200

100

बैंगन की अन्य किस्मों से दूर रखें

टमाटर

50

25

अन्य किस्मों से समान दूर रखें

फूलगोभी

1600

1000

सरसों वर्गीय एवं गोभी वर्गीय फसलों से समान दूर रखें

फ्रेंचबीन

50

25

अन्य किस्मों से समान दूर रखें

भिन्डी

500

200

अन्य किस्मों के खेतों से समान दूर रखें

मटर

25

10

मटर अन्य किस्मों से समान दूर रखें

लोबिया

50

25

एस्परागस तथा बीज से समान पृथक्करण दूरी रखें।

प्याज

1000

800

प्याज की अन्य किस्मों से पृथक्करण आवश्यक है।

मिर्च

400

200

मिर्च एवं शिमला मिर्च की अन्य किस्मों से समान पृथक्करण दूरी रखें।

शिमला मिर्च

400

200

मिर्च एवं शिमला मिर्च की अन्य किस्मों से समान पृथक्करण दूरी रखें।


अवांछनीय पौधों का निष्कासन (रोगिंग)

बीज की फसल से खरपतवारों, फसल के अवांछनीय पौधों का निष्कासन कहा जाता है। इस क्रिया में फसल से अवांछनीय पौधों को फूलने से पहले ही निकाल देना अनिवार्य है अन्यथा वे अन्य पौधों को परागित कर बीज को संदूषित कर देते हैं। खरपतवारों के बीज फसल के बीज की भौतिक  शुद्धता को कम करते हैं तथा फसल पर कुप्रभाव डालते हैं। रोगिंग क्रिया बोये गये बीज के वर्ग तथा बीज के वर्ग तथा बीज फसल की वर्धन अवस्था के अनुसार तीन-चार बार की जा सकती है।

खेत की तैयारी

भूमि की 3-4  बार जुताई करके पाटा लगाकर समतल कर लें। सिंचाई की व्यवस्था  के अनुसार उचित आकार की क्यारियाँ बनाएं। पूर्व की फसल के अवशेष अथवा खरपतवारों के अवशेषों को खेत से चुन का हटा दें।

बीज बुआई का समय

विभिन्न सब्जियों के लिए बीज बुआई का समय भिन्न-भिन्न होता है। साधारणतः बीज उत्पादन हेतु फसल की बुआई सर्वोत्तम मौसम में की जानी चाहिए। इस अवधि में फसल लेने से बीज की पैदवार अधिक मिलती है तथा बीज के भौतिक गुण भी सर्वोत्तम होते हैं। छोटानागपुर एवं संथाल परगना क्षेत्रों में बीज उत्पादन के लिए विभिन्न सब्जियों की रोपाई का उचित समय तालिका-4 में दर्शया गया है। इस क्षेत्र में बैंगन की रोपाई जुलाई से अगस्त माह के बीच, टमाटर की रोपाई सितम्बर में और फूलगोभी की रोपाई अगस्त में की जानी चाहिए। फ्रेंचबीन की बुआई के लिए सितम्बर-अक्तूबर, भिन्डी एवं लोबिया के लिए जुलाई तथा मटर के लिए अक्तुबर -नवम्बर का समय अच्छा माना गया है। क्षेत्र में प्याज का बीज उत्पादन करने के लिए कंदों को अक्तूबर से नवम्बर माह तक लगाना उचित पाया गया। मिर्च की रोपाई जनवरी-फरवरी एवं अगस्त-सितम्बर में की जा सकती है जबकि शिमला मिर्च को अगस्त-सितम्बर में लगाने से अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।

विभिन्न सब्जियों के बीज उत्पादन हेतु अनुशंसित बुआई/रोपाई का समय, उपयुक्त दूरी तथा बीज की मात्रा

फसल

बुआई/रोपाई का समय

बीज की मात्रा/हे.

बुआई/रोपाई की दूरी (से.मी.)

बैंगन

जुलाई-अगस्त

400-500 ग्रा.

75x60

टमाटर

सितम्बर

600-700 ग्रा.

60 x 40

फूलगोभी

अगस्त

600-700 ग्रा.

45 x 30

फ्रेंचबीन

सितम्बर-अक्तूबर

80-100 ग्रा.

40 x 10

भिन्डी

जुलाई

8-10 कि.ग्रा.

40 x 20

मटर

अक्तुबर -नवम्बर

70-80 कि.ग्रा.

30 x 5

लोबिया

जुलाई

15-17 कि.ग्रा.

40 x 10

प्याज

अक्तुबर -नवम्बर

15 किवंटल (2.5-3.० से. मी. व्यास के कंद)

40 x 30

मिर्च

जनवरी-फरवरी, अगस्त-सितम्बर

600-700 ग्रा.

45 x 30

शिमला मिर्च

अगस्त-सितम्बर

600-700 ग्रा.

45 x 45


बीज की मात्रा

उचित मात्र में बीज का उपयोग करने से अधिक पैदावार मिलती है। झारखण्ड में सब्जी बीज उत्पादन हेतु बैंगन के लिए 400-500 ग्रा./हे. की दर से बीज की आवश्यकता होगी। (तालिका-4) जबकि टमाटर, फूलगोभी, मिर्च तथा शिमला मिर्च के लिए 600-700 ग्रा./हे. बीज की आवश्यकता होती है। बड़े बीजों वाली फसलों जैसे फ्रेंचबीन तथा मटर के लिए क्रमशः 80-100 कि. ग्रा, तथा 70-80 कि. ग्रा./हे. की दर से बीज लगते है जबकि लोबिया के लिए 15-17 कि.ग्रा./हे. बीज आवश्यकता होगी। प्याज के बीज उत्पादन के द्विवर्षीय प्रणाली में 2.5 से 3.0 से.मी. व्यास के लगभग 15 किवंटल/हे. कंदों की रोपाई के लिए लिए आवश्यकता होती है।

बुआई/रोपाई की दूरी

बीज की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि फसल की बुआई/रोपाई उचित दूरी पर की जाए। जलवायु को ध्यान में रखते हुए झारखण्ड क्षेत्र में बैंगन के लिए 7560 से.मी., टमाटर के लिए 6040 से. मी., फूलगोभी एवं मिर्च के लिए 4530 से.मी., फ्रेंचबीन एवं लोबिया के लिए 4010 से.मी., भिन्डी के लिए 4020 से.मी., मटर के लिए 305  से.मी., प्याज के लिए 4030 से. मी. तथा शिमला मिर्च के लिए 4545 से. मी. रोपाई/बुआई की दूरी रखने की अनुशंसा की गई है (तालिका-4)

उर्वरीकरण

विभिन्न सब्जी फसलों के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता अलग-अलग होती है। यहाँ की भूमि पर्याप्त मात्रा में जैव पदार्थ उपलब्ध न होने के कारण यह अत्यंत आवश्यक है कि उचित मात्रा में गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट (20-25 टन/हे.) का प्रयोग किया जाए। इनके प्रयोग से भूमि  की उर्वरा शक्ति बढ़ती है साथ ही उसमें जलधारण क्षमता का विकास होता है। खेत में हरी खाद अथवा खल्ली का प्रयोग करने से वांछित लाभ होता है। इसके अतिरिक्त फूलगोभी में 150 की.ग्रा./हे., बैंगन, टमाटर, फ्रेंचबीन और भिन्डी में 120 कि. ग्रा./हे., मटर व प्याज में 80 कि.. ग्रा. लोबिया, मिर्च व शिमला मिर्च में 60 कि. ग्रा./हे. नत्रजन की आवश्यकता होगी जैसा कि तालिका-5 में दर्शाया गया है।

इस क्षेत्र में फास्फोरस उर्वरीकरण की आवश्यकता भी सब्जी फसलों में होती है। फूलगोभी और शिमला मिर्च में 100 कि.ग्रा./हे. व बैंगन और भिन्डी के लिए 80 कि.ग्रा./हे. की दर से देना पर्याप्त होगा जबकि टमाटर, प्याज और मटर के लिए 60 कि.ग्रा./हे. फास्फोरस/हे. की अनुशंसा की गई है। फ्रेंचबीन, लोबिया और मिर्च में 50 कि.ग्रा./हे. की दर से फास्फोरस उर्वरीकरण पर्याप्त होगा। फसल की उचित बढ़वार के लिए पोटाश देना आवश्यक है। यहाँ की भूमि में, फूलगोभी, फ्रेंचबीन, लोबिया, मिर्च के लिए 50 कि.ग्रा./हे., बैगन, टमाटर, मटर और भिन्डी के लिए 60 कि.ग्रा./हे.  और प्याज के लिए 80 कि.ग्रा./हे. पोटाश देना पर्याप्त होगा। नत्रजन की आधी मात्रा बुआई/रोपाई के एक दिन पूर्व फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा के साथ मिला कर दें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा का प्रयोग खड़ी फसल में एक माह पश्चात करना उचित होगा।

अन्य आवश्यक पोषक तत्वों एवं वृद्धि नियामकों का प्रयोग

प्रायः देखा गया है कि कुछ सब्जियां सूक्ष्म तत्वों के प्रति काफी संवेदनशील होती है। इनकी कमी से फसल में कई प्रकार की भौतिक अनियमिताओं देखने में आती हैं। जिन्हें इनके अनुशंसित प्रयोगों द्वारा सुधारा जा सकता है और वांछित उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। टमाटर में 0.3% बोरान के छिड़काव् अथवा जमीन में 20-30 कि.ग्रा./हे., की दर से बोरेक्स के प्रयोग से पैदावार में वांछित वृद्धि पाई गई। 10 पी.पी.एम्. जिंक के प्रयोग द्वारा पौधों की आच्छी बढ़वार के साथ-साथ पैदावार में वृद्धि दर्ज की गई (तालिका-5) फूलगोभी में 0.2% बोरेक्स का 10 दिन के अतंराल पर दो बार छिड़काव अथवा जमीन में 20 कि.ग्रा./हे.,  की दर से बोरेक्स का प्रयोग फसल में लगने वाले विगलन तथा तने के खोखलेपन को दूर करता है जिससे पैदावार में वृद्धि होती है। फसल में तीव्र कमी की दशा में शीघ्र लाभ प्राप्त करने के लिए 0.25% बोरोन के छिड़काव की संस्तुति की गई है। फूलगोभी में पत्तियों की संकरी एवं कटी-फटी होने की समस्या (विह्पटेल ) का निदान भूमि में 1.5 कि.ग्रा./हे., की दर से मोलीब्डेनम के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है। अत्यंत कमी के लक्षण दिखाई देने पर फसल में 0.2% मोलीब्डेनम घोल के दो छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करने से पैदावार में वृद्धि होती है एवं फूल के गुण में वांछित सुधार होता है।

प्याज की फसल में 3 पी.पी. एम . की दर से जिंक का प्रयोग करने पर शल्क कंदों की पैदावार एवं गुणता पर सार्थक प्रभाव पड़ता है। मिर्च की फसल में 50 पी. पी. एम्. की दर से एन. ए.ए. का प्रयोग फूलों के गिरने को रोकता है। अतः पैदावार में वांछित वृद्धि होती है। शिमला मिर्च की फसल में कॉपर, बोरोन तथा जिंक के प्रयोग से फलों की गुणता में सुधार होता है।

बीज उत्पादन के लिए सब्जियों में अनुशंसित पोषण

फसल

नत्रजन (कि.ग्रा./हे.,)

फास्फोरस (कि.ग्रा./हे.,)

पोटाश (कि.ग्रा./हे.,)

अन्य आवश्यक पोषक तत्वों/वृद्धि नियामकों का प्रयोग

बैंगन

120

80

60

-

टमाटर

120

60

60

फसल में 0.3% बोरेक्स का छिड़काव् करें अथवा 20-30 कि.ग्रा.  बोरेक्स/हे. की दर से जमीन में प्रयोग करें। 10 पी. पी. एम्. जिंक का छिड़काव् करें।

फूलगोभी

150

100

50

फसल में 20 कि. ग्रा.  बोरेक्स/हे. की दर से प्रयोग करें अथवा 0.25% घोल का फसल पर छिड़काव करें। 1.5 कि. ग्रा. अमोनियम मोलीबडेट/हे. की दर से भूमि में दें अथवा 0.2% की दर  15 दिन के अन्तराल में दो बार छिड़काव् करें।

फ्रेंचबीन

120

50

50

-

भिन्डी

120

80

60

-

मटर

80

60

60

-

लोबिया

60

50

50

-

प्याज

80

60

80

फसल में 3 पी. पी. एम्. जिंक का छिड़काव् करें।

मिर्च

60

50

50

फसल में 50 पी. पी. एम्., एन. ए.ए. का छिड़काव् पैदावार में वृद्धि करता है।

शिमला मिर्च

60

100

50

कॉपर, बोरोन तथा जिंक का छिड़काव्  फलों की गुणवत्ता बढ़ाता है।


फसल की देखरेख

नियमित निकाई-गुड़ाई करने से फसल में खरपतवारों पर नियंत्रण किया जा सकता है। इन क्रियाओं के करने से भूमि में वायु संचार होता है तथा पौधों की उचित वृद्धि होती है। फसल की मांग के अनुसार नियमित रूप से सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए।

रोग नियंत्रण

सब्जी फसलों में रोगों के कारण बहुत हानि होती है। अतः यह आवश्यक है कि समय पर रोग के निदान हेतु कदम उठाये जाएँ। उग्र रूप धारण कर लेने पर रोग पर नियंत्रण कठिन होता है वही पैदावार एवं गुणवत्ता पर कुप्रभाव पड़ता है। बैंगन की फोमोप्सिस अंगमारी तथा मिर्च एवं सेम वर्गीय फसलों में एन्थ्रेकनोज घात्तक बीमारियाँ हैं जो बीज को संक्रमित कर अगली फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। अतः. इनका समुचित नियंत्रण करना चाहिए तथा रोगग्रस्त फलों से बीज नहीं निकालने चाहिए। विभिन्न सब्जियों में लगने वाले प्रमुख रोगों, उनके लक्षणों तथा नियंत्रण हेतु किये जाने वाले उपायों के बारे में तालिका-6 में विस्तृत जानकारी दी गई है।

विभिन्न सब्जियों में लगने वाले रोग, मुख्य लक्षण एवं नियंत्रण के उपाय

फसल एवं रोग

लक्षण

नियंत्रण के उपाय

बैंगन

मुरझा (जीवाणु जनित)

पौधे का अचानक मुरझा कर सुखना

रोग प्रतिरोधी किस्में स्वर्ण श्री, स्वर्ण मणि, अर्का केशव, अर्का निधि लगाएं।

फोमोप्सिस अंगमारी

पत्तों एवं तने पर मटमैले, भूरे गोलाकार धब्बे, पत्तों के पीला पड़ना तथा फलों पर धब्बे एवं सड़ना ।

गर्म पानी (52)डि. से.) से बीजोपचार (30 मिनट) यह बैविस्टीन से बीजोपचार (2 ग्रा./कि. ग्रा. बीज) एवं इसका 10 दिनों के अंतराल पर 1 ग्रा.ली. की दर से 2-3  बार छिड़काव् करें।

टमाटर

मुरझा (जीवाणु जनित)

बैंगन की तरह

रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे-अर्का आलोक, अर्का आभा, शक्ति, बी.टी.17 लगाएं।

अगेती अंगमारी

पत्तों, तने एवं फलों पर काले, भूरे रंग के धब्बे जो संकेन्द्रीय छल्ले नुमा आकार में दिखाई पड़ते हैं।

कवच (2 ग्रा./ली.)  इंडोफिल एम्-45 (2 ग्रा./ली.) का छिड़काव् 10 दिनों पर अंतराल पर 3-4  करें।

पिछेती अंगमारी एंव फल विगलन

कच्चे फलों पर जलयुक्त धब्बे तथा पीलापन लिए धब्बों से बरसात में सड़न, जाड़े के मौसम में पत्तों एवं तने पर जलयुक्त धब्बे दिखाई देना।

बरसात में पौधों को खूंटी के सहारे उगाएं, जल निकास का समुचित प्रबंध, ब्लू कॉपर या ब्लाईटॉक्स का 3 ग्रा./ली) या इंडोफिल एम्-45 (2 ग्रा./ली.) का छिड़काव् करें।

पर्ण कुचन (लीफ कर्ल)

रोगग्रस्त पौधों की पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं, बढ़वार रुक जाती है तथा फूल व फल कम लगते हैं।

रोग विस्तारक कीट  का नियंत्रण  नुवाक्रान,  मोनोक्रोटोफस अथवा रोगर अथवा मोनोसिल  (1.5 मि.ली.) का छिड़काव्  करें।

फूलगोभी

आर्द्रपतन

पौधशाला में पौधों का मिट्टी की सतह के पास से गलना

ब्लू कॉपर (3 ग्रा./ली.) या कैप्टान (2 ग्रा./ली.) के घोल से सिंचाई करें।

श्याम विगलन

पत्तों के किनओर्ण का “वी” (V)  पीला पड़ना एवं सड़ना।

बिरोक एसिड (5 ग्रा./20ली.) का छिड़काव्  3 से 4 बार साबुन के घोल के साथ मिलाकर करें।

डाउनी  मिल्ड्यू

 

ब्लू कॉपर या बलाईटॉक्स (3 ग्रा./ली.) का छिड़काव् साबुन मिलकर करें।

फ्रेंचबीन

एन्थ्रेकनोज

पत्तियों, तने तथा फलों पर गोल से अंडाकार धंसे हुए धब्बे दिखाई पड़ना।

बाविस्टिन (२ग्रा. ./कि. ग्रा.) से बीजोपचार या इंडोफिल एम्-45 (2 ग्रा./ली.) का छिड़काव् 10 दिनों पर अंतराल पर करें।

किट्ट (रस्ट)

पत्तियों की निचली सतह पर गाढ़े, भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं। पत्तियों का झड़ना तथा पीला पड़ना।

इंडोफिल एम्-45(2 ग्रा./ली.) यह केलिक्सिन (1 ग्रा./ली.) का छिड़काव् करें।

मोजेक

पत्तियों का सिकुड़ना, शिराओं का चमकीला पीला पड़ना तथा फलियों में विसंगतियों  पैदा होना उग्र अवस्था में फलों का पीला पड़ना।

यह रोग विस्तारक कीट द्वारा फैलता है। इसके नियत्न्त्रण के लिए नुवाक्रान या मोनोक्रोटोफस (1 मि.ली./ली.) का छिड़काव्  करें। रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जमीन में दबा दें  अथवा जला दें।

भिन्डी

पीत शिरा मोजेक

फ्रेंचबीन  की तरह

रोग प्रतिरोधी किसमें अर्का अनामिका, अर्का अभय, परभनी क्रांति लगाएं। रोग विस्तारक कीट के नियंत्रण हेतु फ्रेंचबीन में दिए अनुसार उपाय करें।

पत्र-धब्बा

पत्तियों  की निचली सतह पर काली फुफुन्द का उग्र रूप में दिखाई पड़ना

बाविस्टिन (1 ग्र./ ली..) का छिड़काव् करें।

पाउडरी मिल्ड्यू

पत्तियों  की निचली सतह पर सफेद मटमैले पाउडर की तरह फुफुन्द का नजर आना।

बाविस्टिन (1 ग्रा./ली.) का कारथेन (1 मि.ली/ली.) यहस सल्फेक्स ( 2 ग्रा..ली. ) का  छिड़काव् करें।

मटर

पाउडरी मिल्ड्यू

फूल तथा फल लगने के समय पौधों की निचली पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी फुफुन्द का दिखाई पड़ना जो धीरे-धीरे फैल कर पूरी पत्तियों एवं फिलियों में ढक लेती है।

सल्फेक्स (2ग्रा./ली.) या बाविस्टिन (1 ग्रा./ली..) का कारथेन (1 मि.ली/ली.) का छिड़काव लक्षण दिखाई देते ही करें। रोग प्रतिरोधी किसमें लगायें।

जड़ विगलन या मुरझा

पौधे का आरंभिक अवस्था में पीला पड़ना तथा मर जाना।

पौधों की जड़ में ब्लूकॉपर( 3  ग्रा./ली. ) या फाईटोलोन ( 3  ग्रा./ली.)घोल से सिंचाई करें।

लोबिया

एन्थ्रेकनोज

गोल से अंडाकार धंसे हुए धब्बों का मुख्यतः तने, फलियों या पत्तियों पर दिखाई पड़ना। पत्तियों का झड़ना एवं बीज का रोग ग्रस्त होना

कैप्तोफ या कवच या इंडोफिल एम्-45 ( 2  ग्रा./ली.) का  10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।

किट्ट (रस्ट)

पत्तों की निचली सतह पर गाढ़े  भूरे रंग के उठे हुए धब्बे बनते हैं जिन्हें छूने से ऊँगली में ला कणयुक्त फुफुन्द लग जाती है।  पत्तियां पीली पड़ कर झड़ जाती है।

इंडोफिल एम्-45 ( 2  ग्रा./ली. ) या कैलिक्सन (1 मि.ली/ली.) का छिड़काव 10 दिनों के अंतर पर तीन बार करें।

मोजेद

पत्तियों का सिकुड़ना, शिराओं का चमकीला पीला पड़ना था फलियों में बिसंगतियाँ पैदा होना।

रोग विस्तारक कीट की रोकथाम के ली नुवाक्रान या मोनोक्रोटोफॉस (1 मि.ली/ली.) का छिड़काव 10 दिनों के अंतरल पर करें। रोगग्रस्त पौधों के उखाड़ का जमीन में गाड़ दें अथवा जला दें।

प्याज

पर्पल ब्लोच या धब्बा

पत्तियों पर फुलवृंत पर सफेद, मटमैले धंसे हुए धब्बे जिनके मध्य भाग बैंगनी या काले रंग के होते हैं। रोगग्रस्त भाग में संकेन्द्रीय छल्लेनुमा आकृति दिखाई देती है। रोग की उग्रता में पत्तियों या फूलवृंत का टूटकर गिरना या सुखना।

इंडोफिल एम्-45 या फोल्टाफ ( 2  ग्रा./ली. ) घोल का तरल साबुन मिलकर छिड़काव् करें। जल निकास की अच्छी व्यवस्था करें। रोगग्रस्त गिरे पत्तों को चुनकर हटा दें।

मृदु विगलन (सॉफ्ट राट)

शल्क कंदों का ऊपरी भाग से मुलायम होकर सड़न तथा भंडारणगृह में दुर्गन्ध देना।

शल्क कंदों को खुदाई के बाद अच्छी तरह सुखाएं। कते शल्क कंदों का भंडारण नहीं करें। फसल में अनुशंसित मात्रा में पोटाश का प्रयोग शल्क कंदों को भण्डारण में सड़ने से बचाता है।

मिर्च या शिमला मिर्च

एन्थ्रेकनोज

लोबिया की तरह

लोबिया की तरह

आर्द्रपतन

फूलगोभी की तरह

फूलगोभी की तरह

पत्र धब्बा

टमाटर में अगेती अंगमारी की तरह

टमाटर में अगेती अंगमारी की तरह

बैक्टीरियल मुरझा रोग

बैंगन की तरह

रोग प्रतिरोधी किस्में प्रयोग करें।


कीट नियंत्रण

बीज की फसल में कित्तों का प्रकोप प्रायः देखा जाता है। समय पर नियंत्रण न किये जाने से यह पूरी फसल को नष्ट का देते हैं। अतः आवश्यक है कि उचित मात्रा मने अनुशंसित दवाओं का प्रयोग किया जाना आवश्यकता से कम मात्रा में एक ही दवा का प्रयोग करने पर पूर्ण नियंत्रण नहीं हो पाता साथ ही बार-बार प्रयोग करण पर संबंधित कीट दवा के प्रति रोधक क्षमता पा लेते हिं जो अह्दिक हानिप्रद परिस्थित हो सकती है। सब्जियों इमं डायमंड बैक मोथ, लीफ वेब्बर, सेमी लूपर, लाही तथा तना छेदक आदि कीटों का प्रकोप आम बात है। इनकी पहचान एंव रोकथाम हेतु तालिका-7 में दिए जा रहे हैं।

सब्जियों के मुख्य कीट, पहचान एवं नियंत्रण के उपाय

कीट एवं प्रभावित फसल

पहचान

नियंत्रण के उपाय

डायमंड बैक मोथ

फूलगोभी

इसके छोटे, पतले, मटमैले हरे रंग के पिल्लू पौधों पर शुरू से ही सक्रिय हो जाते हैं। प्रारंभ में ये पत्तियों को खुरचकर या काटकर खाते हैं और बाद में गोभी के अंदर रहकार हानि पहुंचाते हैं।

गोभी के साथ सरसों की खेती करें तथा सायपरमेथ्रिन (0.2 मि.ली.) तथा पाडान 1 ग्रा./लितार घोल का 7 से 10 दिनों पर बारी-बारी से 4 बार छिड़काव करें।

लीफ बोरार

फूलगोभी, भिन्डी, लोबिया, फ्रेंचबीन

इसके पिल्लू डायमंड बैक मौथ के पिल्लू से बड़े और हरे रंग के होते हैं, जिनके पिल्लू पौधों के मध्य भाग को खाते है और जाला बनाकर रहते हैं।

यथावत

सेमी लूपर

गोभी, लोबिया, भिन्डी, फ्रेंचबीन

इसके पिल्लू उचक-उचक कर चलने वाले लंबे और हरे रंग के होते हैं।ये पत्तियां काटकर खाते हैं।

यथावत

रोयेंदार पिल्लू

सभी सब्जियां

इसके पिल्लू छोटी अवस्था में पीले या मटमैले रंग के झुण्ड में पाए जाते हैं क्योंकि मादा झुण्ड में नहीं अंडे देती है। बड़े होने पर जब पास की पत्तियां भोजन के लिए कम पड़ जाती है, तो दूर जाना प्रारंभ करते हैं।

कार्बराइल 2 ग्रा. तथा पाडान 1 ग्रा./ली. पानी के घोल का बारी-बारी से छिड़काव् करें। जैविक कीटनाशक बी.टी. का छिड़काव् करें।

एपिलैकना बीटल

बैंगन

इसके कीड़े के व्य्यस्क एवं नवजात दोनों पत्तियाँ खरोच कर खाते हैं और पत्तियों को जाली जैसा बना देते हैं

कार्बराइल 2 ग्रा. तथा पाडान 1 ग्रा./ली. पानी के घोल का बारी-बारी से छिड़काव् करें।

लीफ माइनर

मटर, टमाटर

पत्तियों की ऊपरी सतह पर टेड़ी-मेढ़ी सुरंग बनाकर हानि पहुंचाते हैं।

मोनोक्रोटोफॉस 1.5 मि.ली, या पाडान 1 ग्रा./ली/ का छिड़काव् 7 दिनों के अंतर पर दो बार करें

एफिड या लाही

गोभी, भिन्डी, बैगन, मिर्च, मटर, फ्रेंचबीन, शिमला मिर्च

इसके नवजात एवं वयस्क दोनों ही छोटे, हरे, भूरे या काले रंग के होते हों जो पत्तियों की निचली सतह या कोमल टहनियों से चिपककर रस चूसते हैं। ये विषाणु  भी फैलाते हैं।

मोनोक्रोटोफॉस 1 मि.ली. या या मेटासिस्टोक्स  1.5 मि.ली, या पाडान 1 ग्रा./ली/ का छिड़काव् 7 दिनों के अंतर पर दो बार करें

थ्रिप्स

प्याज

ये सूक्ष्म कीट पत्तियों की सतह पर चिपक कर चूसते हैं जिससे पत्तियों पर दाग दिकाई देते हैं बाद में हल्के सफेद हो जाते अहिं।

प्रतिरोधी किस्में लगायें। मोनोक्रोटोफॉस 1 मि.ली. या या मेटासिस्टोक्स 1 .5 मि.ली, या पाडान 1 ग्रा./ली/ का छिड़काव् 7 दिनों के अंतर पर दो बार करें

लीफ हॉपर

भिन्डी, टमाटर, फ्रेंचबीन, मिर्च,  शिमला मिर्च

इसके नवजात एवं वयस्क दोनों पत्तियों पर चिपककर रस चूसते हैं। अधिकता की अवस्था में पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे उभर आते हैं और पत्तियाँ पीली तथा कमजोर हो जाती हैं।विषाणु भी फैलाते हैं।

मोनोक्रोटोफॉस 1 मि.ली. या या मेटासिस्टोक्स 1 .5 मि.ली, की दर से छिड़काव् 7 दिनों के अंतर पर दो बार करें

उजली मक्खी

भिन्डी, टमाटर, फ्रेंचबीन, लोबिया, मिर्च,  शिमला मिर्च

 

ये बहुत ही छोटे आकार की होती है जो पौधों के स्पर्श मात्र से उड़ जाती है। ये कीट ज्यादा दूरी की उड़ान भरने में असमर्थ होते हैं। ये मक्खियाँ विषाणु जनित रोग फैलाती हिया।

यथावत

मकड़ी (माईट)

भिन्डी, बैंगन  फ्रेंचबीन

ये मकड़ी पत्तियों की निचली सतह पर पतली जाली की परत के निचे सुरक्षित रहती हैं और रस चूसकर पत्तियों को पीली कर देती हैं।

डायोकोफाल 3 मि.ली. या केलथेन 1 मि.ली. प्रति लीटर 10 दिनों के अंतराल पर दो बार छिडकें।

फल वेधक या शीर्ष छेदक

भिन्डी, टमाटर, बैंगन, गोभी, मटर, प्याज

 

इसके पिल्लू फल में या शीर्ष पर पत्ती के जुड़ने के स्थान में छेद बनाकर धड़ में घुस जाते हैं और उसे खाते हैं। जब पिल्लू निचे के ओर बढ़ते हैं तो पौधे सूखने लगते हैं। प्रभावित फलों की बढ़वार रुक जाती है और वे खाने लायक नहीं रहते। टमाटर के फलों को खाने वाला कीड़ा हेलियोथिस होता है, जिसके कारण पूरी फसल बर्बाद हो जाती है।

सायपरमेथ्रिन  0.2  मि.ली.या पाडान 1 ग्रा. या कार्बराइल 2 ग्रा. प्रति लीटर का छिड़काव् करें। रोपाई के समय फ्यूराडान-3 जी. का 33 कि.ग्रा./हे. की दर से प्रयोग करें।


फलों की तुड़ाई-अथवा कटाई की मानक अवस्था

सब्जियों के बीजों में उचित ओज, ऊत्तम गुणवत्ता और ऊँची अंकुरण दर प्राप्त करने कली यह बहुत ही आवश्यक है कि उनकी तुड़ाई अथवा कटाई उचित व्यवस्था में नकी जाय। अधिक सूखने पर फलियों से बीजों चिटकने का भय रहता है टो दूसरी ओर पूर्ण परिपक्वता से पूर्व तुड़ाई करने पर बीज-ओज, गुणवत्ता तथा अंकुरण दर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न सब्जी फसलों के बीज उत्पादन हेतु परिपक्वता अवस्था एवं तुड़ाई/कटाई के समय की जानकारी दी गई है।

सब्जियों के बीजों के परिपक्वता मानक अवस्था एवं उनकी तुड़ाई/कटाई का समय

फसल

परिपक्वता मानक

तुड़ाई/कटाई का समय

टिप्पणी

बैंगन

बीज पकने पर फल का रंग मटमैला अथवा गाढ़ा पीइला हो जाता है।

किसी भी समय

-

टमाटर

जब फल पक आर पूरी तरह लाल हो जाएं टो तुड़ाई करें।

किसी भी समय

-

फूलगोभी

फलियों के पकने पर पौधे सुखना प्रारंभ कर देते हैं

प्रातः काल

बीज छिटकने की की समस्या पाई जाती है।

फ्रेंचबीन

फलियों  सूखने पर बीज पककर तैयार हो जाते  हैं। इस अवस्था में फसल काटें।

प्रातःकाल

बीज छिटकने की समस्या पाई जाती है।

भिन्डी

बीज पकने पर फलियाँ भूरे रंग की हो जाती हैं तथा बीज काले रंग के होने लगते हैं।

किसी भी समय

तुड़ाई में देरी करने से फलियाँ फटने लगती हैं और बीज छिटकने लगते हैं।

मटर

फलियाँ पक कर भूरे रंग की हो जाती हैं एवं पौधे सूखने लगते हैं।

दिन में कटाई करें

-

लोबिया

पूर्णतया तैयार होने पर फलियाँ सुख जाती हैं। इस अवस्था में इनकी तुड़ाई करें।

दिन में

-

प्याज

पकने पर कैप्सूल के अंदर बीज काले हो जाते अहिं।

प्रातःकाल

प्याज के बीज की कटाई सावधानी पूर्वक करें। बीज बहुत छिटकते हैं।

मिर्च

जब फल पूरी तरह लाल अथवा पीले हो जाएं तो  उन्हें तोड़ना चाहिए।

दिन में

फलों को सुखाकर बीज निकालें।

शिमला मिर्च

जब फल पौधों पर पूरी तरह लाल हो जाएँ एवं सिकुड़ने लगें तो तुड़ाई करें।

दिन में

फलों को छायादार स्थान पर कुछ दिन तक रखें और बीज निकालें।


बीज निकालना एवं भंडारण

टमाटर के पूरी तरह पके फलों को प्लास्टिक अथवा मिट्टी के बर्तन में डाल कर कुचला जाता है। गुदा 24 घंटे तक रखने पर गल जाता है। टमाटर का बीज निकालने के लिए व्यापारिक हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की 15-20 बूंद प्रति कि. ग्रा. गूदे में डालने से गुदा शीघ्र गल जाता है। तत्पश्चात गूदे को साफ पान से धोकार बीज निकाले लेते हैं। अतिरिक्त पानी को हटाने के लिए बीजों को कपड़े में बांध का लटका दें। बीज को पहले छाया में एवं पुनः धुप में सुखाकर  नमी को वांछित स्तर तक ले आएं। बैंगन के फलों से बीज निकालने के लिए इन्हें पतले टुकड़ों में काटकर पानी में मसलते है जिससे बीज गूदे से अलग हो जाते हैं। इन्हें छान कर पहले छाया में एवं पुनः धुप में सुखा लिया जाता है। फूलगोभी, लोबिया एंव फ्रेंचबीन के बीज निकालने के लिए फसल की कटाई के पश्चात हल्की छायादार जगह पर 2-3 दिन तक रखकर अच्छी तरह सुखाते हैं। इस क्रिया से बीज पहली के अंदर सुडौल हो जाते हैं एवं सूखने लगते हैं। शिमला मिर्च के बीज फल तोड़ने के तुरंत बाद निकालने पर चमकदार नहीं रहते हैं तथा उनमें अंकुरण क्षमता एवं गुणवत्ता कम हो जाती हैं। अतः फलों की पूरी तरह  पकने के बाद तोड़ कर 4-6दिन छाया में रखते अहिं और बीज निकालते हैं। सब्जियों के बीज निकालने के पश्चात सीधे तीव्र धुप में नहीं सुखाने चाहिए इससे बीज की गुणवत्ता में कमी आती है। अतः इन्हें प्रांरभ में कम छाया दार स्थान में सुखाएं तत्पश्चात  धूप में सुखाना चाहिए। सामान्य भण्डारण के लिए बीजों में 8% नमी की मात्रा रखी जाती है। नमी रोधी भंडारण की अवस्था में 6% आर्द्रता रखी जानी चाहिए। अधिक मात्रा में नमी रहने पर बीजों के सड़ने की संभावना बढ़ जाती है साथी उनकी अंकुरण क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आनुवांशिक शुद्धता का स्तर आधार बीज में 99.5% तथा प्रमाणित  बीज में 99.0% रखा जाना चाहिए। बीज की अंकुरण क्षमता 70% से कम नहीं होनी चाहिए। केंद्र के गत 20 वर्षों के अनुभव से यह ज्ञात हुआ है कि झारखण्ड में सभी सब्जियों के बीज उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। जल छाजन कार्यक्रम के साथ-साथ किसानों के बीच उत्पादन की तकनीक का प्रसारण अतिआवश्यक है जिससे कि क्षेत्र में शुद्ध बीज की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

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