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मूलवर्गीय सब्जियाँ

इस लेख में मूलवर्गीय सब्जियों की किस प्रकार से बागवानी की जा सकती है इसकी जानकारी दी गयी है।

भूमिका

मूलवर्गीय सब्जियों में मुख्यत: मूली, गाजर, शलजम और चुकन्दर का स्थान प्रमुख है। इनके उगाने का मुख्य मौसम जाड़ा ही माना जाता है।

मूली

मूली जड़वाली सब्जियों में मूली का भोजन के अंतर्गत उगाने की सिफारिश की जाती है। इसका उपयोग कच्ची अवस्था में सलाद के रूप में और अन्य सब्जियों के साथ पकाकर किया जाता है।

आहार मूल्य

मूली का आहार मूल्य इस प्रकार है

(प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

नमी

94.4 ग्राम

लोहा

0.4 मि. ग्राम

प्रोटीन

0.7 ग्राम

सोडियम

33.0 मि. ग्राम

वसा

0.1 ग्राम

पोटेशियम

138.0 मि. ग्राम

खनिज

0.8 ग्राम

कैरोटीन

3.0  माइक्रो ग्राम

रेशा

0.8 ग्राम

थियामिन

0.06 मि. ग्राम

कार्बोहाइड्रेटस

3.4 ग्राम

राइवोफ्लेविन

0.02 मि. ग्राम

ऊर्जा

17.0 कैलोरी

नियासिन

0.5 मि. ग्राम

कैल्शियम

35.0 मि. ग्राम

विटामिन सी.

0.5 मि. ग्राम

फास्फोरस

22.0 मि. ग्राम

 

 

बुवाई की प्रक्रिया

भूमि : मूली हर प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है। यहाँ तक की हल्की अम्लीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है परंतु अधिक पैदावार के लिए बलूई दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त सर्वाधिक उपयुक्त मानी गई है। भुरभुरापन और समुचित जल निकास का होना नितांत आवश्यक है।

बुवाई का समय दर – यद्यपि मूली पूरे साल उगाई जा सकती है फिर भी व्यवसायिक तौर पर जाड़े का मौसम बहुत उपयुक्त है। छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में इसके बोने का समय अगस्त से नवंबर तक सबसे उपयुक्त है।

बीज दर : 4-5 किलोग्राम प्रति एकड़

बुवाई की विधि – मूली को दूसरी सब्जियों के साथ मिलाकर या अकेले बोया जाता है। अधिकांशMuliक्षेत्रों में मूली की खेती मेड़ों पर की जाती है। इस विधि से समतल बोआई की अपेक्षा जड़ों का विकास अच्छा और अधिक होने के कारण उपज अधिक मिलती है। यदि समतल भूमि में बोआई करनी हो तो तैयार की गई क्यारियों में 10-12 सें मी. की दूरी पर बोआई की जाती है। मेड़ों पर बोआई करने के लिए क्यारियों में 45 सें. मी. की दूरी पर बोआई की जाती है। मेड़ों में बोआई करने के लिए क्यारियों में 45 सें. मी. की दूरी पर सभी मेड़ों पर 1-2 सें. मी. की गहराई पर बीज बोये।

खाद एवं उर्वरक – चूंकि मूली शीघ्र तैयार होने वाली फसल है अत: इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक खाद तथा उर्वरक की आवश्यकता होती है। प्रति एकड़ खाद एवं उर्वरक की मात्रा निम्नलिखित है –

गोबर की खाद

80 क्विंटल

यूरिया

80 - 100 किलो

म्यूरिएट ऑफ पोटाश

40 किलो

गोबर की खाद भूमि तैयार करते समय डाले। यूरिया की आधी मात्रा एव सिंगल सुपर फास्फेट  और पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोआई के समय डाले। यूरिया की अधि मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रूप में निराई- गुड़ाई एवं मिट्टी चढाते समय करें।

सिंचाई – आवश्यकतानुसार 8-10 दिनों में सिंचाई करें।

पौधा संरक्षण - मूली में कभी – कभी लाही का प्रकोप होता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगर (1 ½ मी. ली. प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करें।

उपज – मूलियों की उपज किस्मों पर निर्भर करती है। देशी किस्मों की उपज 60 – 80 क्विंटल प्रति एकड़ तथा उन्नत किस्मों की उपज 30 – 35 क्विंटल होती है।

गाजर

सम्पूर्ण भारतवर्ष में मानव उपयोग तथा चारे के रूप में उगाई जाने वाली फसलों में गाजर का प्रमुख स्थान है। इसे कच्चा या पकाकर दोनों तरह से खाया जाता है। काली गाजर औषधि के रूप में क्षुधावर्धन का कार्य भी करती है। नारंगी रंग की गाजर में विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में पायी जाती है।

आहार मूल्य

गाजर का आहार मूल्य इस प्रकार है -

(प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

नमी

86.0 ग्राम

फास्फोरस

530.0 मि. ग्राम

प्रोटीन

0.9 ग्राम

लोहा

2.2 मि. ग्राम

वसा

0.2 ग्राम

कैरोटीन

1890.0 माइक्रो ग्राम

खनिज

1.1 ग्राम

पोटेशियम

138.0 मि. ग्राम

रेशा

1.2 ग्राम

थियामिन

0.04 मि. ग्राम

कार्बोहाइड्रेटस

10.6 ग्राम

राइवोफ्लेविन

0.02 मि. ग्राम

ऊर्जा

48.0 कैलोरी

नियासिन

0.6 मि. ग्राम

कैल्शियम

80.0 मि. ग्राम

विटामिन सी.

3.0 मि. ग्राम

बुवाई की प्रक्रिया

भूमि – अच्छी उपज के लिए गहरी दोमट, भुरभुरी मिट्टी उपयुक्त पाई गई है। साथ ही मिट्टी में उचित जल निकास का होना अति आवश्यक है। अधिक अम्लीय भूमि में उपज अच्छी नहीं होती है। भूमि का पी.एच. मान 6.5 के आसपास हो तो गाजर की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

प्रभेद – गाजर के उन्नत प्रभेद है पूसा केशर, नैन्टीश देशी इत्यादि।

बोआई का समय और बीज दर – छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र के लिए गाजर की बोआई का समय अक्टूबर से दिसंबर तक सबसे उपयुक्त है। अच्छा और स्वस्थ बीज 1.5 – 2.5 किलो प्रति एकड़ के लिए पर्याप्त है।

बोआई की विधि – गाजर की बोआई क्यारियों में या मेड़ों पर 45 सें. मी. की दूरी पर लगभग एक सें. मी. गहरी नालियों में बोई जाती है। बोने के बाद बीज को मिट्टी से ढँक देना चाहिए। इसकी बोआई छिड़ककर भी की जाती है। जब पौधे अच्छी तरह निकल आये तो छंटाई कर पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सें मी. कर लेनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक – जड़ वाली सब्जियों में गाजर अपेक्षाकृत अधिक आवश्यक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता रखती है। इसके लिए खेत तैयार करते समय खाद एवं उर्वरक निम्नलिखित मात्रा में देना चाहिए।

उर्वरक खाद की मात्रा (प्रति एकड़)

गोबर की खाद              -  80 क्विंटल

यूरिया                    -  80-100 किलो

सिंगल सुपर फास्फेट        - 100- 120 किलो

म्यूरिएट ऑफ पोटाश        - 40 किलो

यूरिया की आधी मात्रा एवं सिंगल सुपर फास्फेट एवं म्यूरिएट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय खेत में डाले। चूंकि गाजर का बीज धीरे – धीरे अंकुरित होता है इसलिए अंकुरित होने के समय तक भूमि में नमी बनाये रखना बहुत आवश्यक है। बाद में आवश्यकतानुसार 8-10 दिनों में सिंचाई करें।

उपज – देशी किस्मने की उपज 80-10 क्विंटल प्रति एकड़ एवं उन्नत किस्मों की उपज 40-50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। गाजर की ऊपरी सिरा जब 2.5 से 3.5 सें. मी. व्यास हो जाए तो इसकी खुदाई कर लेनी चाहिए।

चुकन्दर

चुकन्दर सब्जी के रूप में अमेरिका एवं यूरोप में काफी प्रचलित है लेकिन भारत में चुकंदर सब्जी के रूप में उतना प्रमुख नहीं है। चुकंदर को कच्ची सलाद के रूप में, दूसरी सब्जियों के साथ मिलकर तथा मांस के साथ मिलकर पका कर खाया जाता है। आजकल चुकन्दर की खेती शर्करा प्राप्त करने के लिए भी की जाती है। चुकन्दर में खनिज पदार्थ एवं विटामिन ‘सी’ की प्रचुर मात्रा पायी जाती है।आहार मूल्य

आहार मूल्य

(प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

जल

87.7 ग्राम

मैग्नीशियम

1.0 मि. ग्राम

प्रोटीन

1.7 ग्राम

सोडियम

59.8 मि. ग्राम

वसा

0.2 ग्राम

पोटाशियम

138.0 मि. ग्राम

खनिज

0.8 ग्राम

तांबा

0.20 मि. ग्राम

रेशा

0.9 ग्राम

गंधक

14.0 मि. ग्राम

कार्बोहाइड्रेटस

8.8 ग्राम

क्लोरिन

24.0 मि. ग्राम

ऊर्जा

43.0 कैलोरी

थियामिन

0.04 मि. ग्राम

कैल्शियम

80.0 मि. ग्राम

राइवोफ्लेविन

0.09 मि. ग्राम

फास्फोरस

55.0 ग्राम

नियासिन

0.4 मि. ग्राम

लोहा

0.1 मि. ग्राम

विटामिन सी

0.1 मि. ग्राम

चुकन्दर शीतकाल की फसल मानी जाती है परंतु इसकी खेती गर्म मौसम में भी की जाती है। ऐसा देखा गया है कि कम तापमान में चुकन्दर की खेती करने से उनकी जड़ों में शर्करा की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। जड़ों में शर्करा संग्रहित होने के लिए उचित तापमान 200 से 220 सें. होता है।

बुवाई की प्रक्रिया

प्रभेद – भारत में प्रमुख रूप से सब्जी के लिए दो जातियाँ उगायी जाती है।

1. क्रिमसन ग्लोव – यह गोल स्वादिष्ट एवं खूबसूरत होता है इसकी पत्तियाँ छोटी एवं गुदा बिल्कुल सूर्ख होता है। जल्दी तैयार होने के कारण सलाद एवं सब्जियाँ के लिए बहुत ही उपुयूक्त एवं लाभकारी है।

भूमि – चुकन्दर की खेती के लिए बलूई दोमट या दोमट भूमि उपयुक्त होती है। चुकन्दर की खेती क्षारीय मृदा में की जा सकती है। इसकी खेती अम्लीय मिट्टी के लिए उपयुक्त नहीं होती है। इसके लिए चूना का व्यवहार जरूरी है। खेत की तैयारी के लिए उसकी दो – तीन जोताई करके उसे तैयार कर लेना चाहिए।

बोने का समय - चुकन्दर की बोआई अक्टूबर में की जाती है।

बीज दर – एक एकड़ के लिए 2 से 2.5 किलो ग्राम बीज पर्याप्त होता है।

बोआई की विधि – इसकी बोआई समतल क्यारियां में या मेड़ों पर की जाती है। पंक्ति की दूरी या मेड़ों की दूरी 45 सें. मी. 65 सें, मी. तथा पौधा की दूरी 20-25 सें. मी. रखनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक – औसत उर्वरक वाली मिट्टी के लिए अच्छी उपज हेतु 40-60 क्विंटल गोबर की खाद, 80-100 किलो ग्राम यूरिया, 200 किलो ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 70 किलो ग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश की आवश्यकता होती है। उर्वरक और खाद देने की विधि ठीक अन्य जड़ वाली सब्जियों की भांति ही होनी चाहिए।

सिंचाई और निराई – गुड़ाई – पहली सिंचाई बोआई के तुरंत बाद करनी चाहिए। जाड़ों में कम पानी की आवश्यकता होती है। सूखे मौसम में 10-15 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए।

खुदाई और उपज – जब जड़े 3 से 5 सें. मी. व्यास की हो जाए तब अन्य जड़ों वाली फसलों की तरह खुदाई कर लेनी चाहिए। इसकी उपज लगभग 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

शलजम

शलजम की खेती मुख्य रूप से उत्तरी भारत में की जाती है। इसकी खेती इसकी जड़ों के लिए की जाती है। इसकी पत्तियों को सब्जियों के लिए कभी भी प्रयोग नहीं किया जाता है। इसकी पत्तियों को पशुओं के चारे के लिए प्रयोग किया जाता है। शलजम सलाद के रूप में या पकाकर प्रयोग किया जाता है।

आहार मूल्य

शलजम का आहार मूल्य इस प्रकार है-

(प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

नमी

91.6 ग्राम

कैल्शियम

30.0 मि. ग्राम

प्रोटीन

0.5 ग्राम

फास्फोरस

40.0 मि. ग्राम

वसा

0.2 ग्राम

लोहा

0.4 मि. ग्राम

खनिज पदार्थ

0.6 ग्राम

थियामिन

0.04 मि. ग्राम

रेशा

0.9 ग्राम

राइवोफ्लेविन

14.0 मि. ग्राम

कार्बोहाइड्रेटस

6.2 ग्राम

निकोटिन एसिड

0.05 मि. ग्राम`

कैलोरीज

29.0 कैलोरी

विटामिन सी.

43.0 मि. ग्राम

जातियाँ : मूली की तरह इसकी भी जातियाँ दो प्रकार की होती है।

1. शीतोष्ण                              2. उष्ण कटिबंधी

- परपिल टाइप व्हाइट ग्लोब                - पूसा कंचन

- स्नोबाल                               - पूसा श्वर्निमा

- गोल्डनवाल                            - पूसा श्वेती

- अर्ली मिलन रेड टाप

- पूसा चन्द्रिमा

जलवायु – यह जाड़े की फसल है। अत: ठंडे नम जलवायु में इसकी खेती अच्छी होती है। यह पाले के लिए अधिक अवरोधी फसल है। गर्म मौसम में या जब पानी की कमी हो जाती है, तब शलजम कड़ा और तीखा हो जाता है।

बुवाई की प्रक्रिया

भूमि – यद्यपि यह कई प्रकार में भूमि में उगाया जा सकता है, परंतु बालुआही मिट्टी में इसकी खेती होती है। भूमि को अच्छी तरह जुताई करके भूमि को समतल बना लेना चाहिए तथा खाद की अच्छी मात्रा भूमि में बोने से पहले मिला लेनी चाहिए, जिससे पौधों की प्राथमिक अवस्था में अधिक मात्रा में तत्वों की उपलब्धि हो सके।

बोने का समय :

1. शीतोष्ण – जुलाई से सितंबर तक

2. उष्णकटिबंधी – सितंबर से दिसंबर तक

बीज दर : 1-2 किलो प्रति एकड़

बोने की विधि – यह मेड़ों पर तथा  चौरस खेत दोनों प्रकार से बोयी जाती है।

कतार से कतार की दूरी – 30 सें. मी.

पौधा से पौधा की दूरी - 15 सें. मी.

खाद एवं उर्वरक – 8-10 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से भूमि तैयार करने से पहले मिट्टी में मिला देना चाहिए। 60 किलो यूरिया, 150 किलो सिंगल सुपर फास्फेट एवं 40 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालना चाहिए। शुरू में यूरिया की आधी मात्रा जब जड़े बनना शुरू हो जाए तो डालना चाहिए।

सिंचाई – प्रथम सिंचाई बोने के तुरंत बाद देनी चाहिए यदि खेत में नमी की कमी हो। यदि बोते समय नमी पर्याप्त हो तो प्रथम सिंचाई थिनिंग के बाद देनी चाहिए। इसके बाद की सिंचाई गर्मियों में 3-6 दिन के अंतर पर तथा जाड़े या ठंडे मौसम 10-12 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।

कटाई – जब जड़े 5 से 7.5 सें. मी. ब्यास की हो जाए तब कटाई कर लेनी चाहिए क्योंकी कटाई में देर करने सी जड़े कठोर तथा रेशे वाली हो जाती है।

उपज – एक एकड़ में 80 से 160 क्विंटल तैयार पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

 

स्रोत : रामकृष्णा मिशन आश्रम, राँची

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