सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

होम (घर) / कृषि / फसल उत्पादन / पैरा कृषि - कम लागत से ज्यादा आमदनी
शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

पैरा कृषि - कम लागत से ज्यादा आमदनी

इस पृष्ठ में पैरा कृषि कम लागत से ज्यादा आमदनी संबंधी जानकारी दी गई है।

परिचय

हमारे देश में सदियों से दोहरी फसलोत्पादन की अनेकों कृषि पद्धतियाँ प्रचलन में हैं। इनमें से बहुत ही प्रचलित तथा महात्वपूर्ण कृषि पद्धति है – पैरा कृषि वेगबवद्ध खेती। आधार फसल के कटनी से पूर्व अन्य फसल की बुआई आधरित फसल के खड़ी खेत में करना ही पैरा कृषि पद्धति या “वेगबद्ध” कहलाता है तथा अनुवर्ती फसल “पैरा फसल कहलाता है। इस कृषि प्रणाली का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अनुवर्ती पैरा फसल के अंकुरण तथा वृद्धि के लिए करना है।

झारखंड जैसे क्षेत्रों में जहां की कृषि वर्षा पर आधारित हैं तथा सिंचाई के सीमित साधन के कारण रबी मौसम में खेत परती पड़ी रहती है वैसे क्षेत्रों के लिए “पैरा कृषि” एक उपयोगी विकल्प हो सकता है।

पैरा कृषि पद्धति से प्राय: सभी किसान परिचित होंगे, लेकिन इनसे जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं तथा आधुनिक जानकारियों के अभाव के कारण उनका पैदावार काफी कम है। अत: पैदावार बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों तथा जानकारियों का व्यापक उपयोग अति आवश्यक हैं।

जमीन का चुनाव

पैरा खेती के लिए केवल या मटियार दोमट जैसी भारी मिटटी उपयुक्त होती है। अत: मध्यम तथा निचला जमीन (दोन) का चुनाव करना चाहिए। भारी मिटटी में जलसाधारण क्षमता होती है साथ ही काफी लम्बे समय तक मिटटी में नमी बरकरार रहती है। टांड या उपरी जमीन पैरा खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है क्योंकि यह जल्दी सूख जाता है।

फसल का चुनाव

आधार फसल तथा अनुवर्ती पैरा फसल के बीच समय का सामंजस्य अति आवश्यक है। दोनों फसलों के बीच समय का तालमेल इस तरह से हों कि हथिया नक्षत्र में पड़ने वाली वर्षा का लाभ दोनों फसलों को मिले साथ ही पैरा फसल की वृद्धि के लिए पर्याप्त समय भी मिले। अत: आधार फसल के लिए मध्यम अवधि वाली अर्थात 120 से 125 दिन में पकने वाली उन्नत प्रभेद का चुनाव करना चाहिए।

लम्बे अवधि वाले आधार फसल का चुनाव करने से पैरा फसल को वृद्धि के लिए कम समय मिला है तथा नमी के अभाव के कारण उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इस पठारी क्षेत्र में धान ही मुख्य फसल है इसलिए धान को आधार फसल के रूप में लिया जा सकता है। धान की उन्नत तथा मध्यम अवधि वाली किस्में जैसे – आई.आर.-36, आई.आर.-64, बिरसा धान-202, पूसा बासमती इत्यादि की खेती खरीफ में आधार फसल के रूप में की जानी चाहिए। पैरा फसल के रूप में तीसी, मसूर, चना, मटर एवं खेसारी इत्यादि का चुनाव किया जा सकता है।

बीज दर

पैरा फसल के लिए बीज दर उस फसल के सामान्य अनशंसित मात्र से डेढ़ गुणा अधिक होता है। उदाहरण के लिए तीसी का अनुशंसित बीज दर 8 किलो प्रति एकड़ है। पैरा खेती हेतु 8 किलो का डेढ़ गुणा (1.5) अर्थात 12 किलो तीसी प्रति एकड़ चाहिए। प्रति क्षेत्रफल पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव अत्यंत जरूरी है।

आधार फसल धान तथा पैरा फसलों के उन्नत किस्में तथा बीज दर

आधार फसल धान की किस्में

पैरा फसल

पैरा फसल की किस्में

बीज दर (किलो/एकड़)

आई.आर.-36

तीसी

टी.-397 शुभ्रा

12

आई.आर.-64

मसूर

बी.आर.-25, पी.एल.-406

18

बिरसा धान-202

चना

पन्त जी.-114, सी.-235

45

पूसा बासमती

छोटा मटर (केरव)

रचना, स्वर्णरेखा

48

एम.टी.यु.-7029

खेसारी

रतन, पूसा-24

36

 

कब और कैसे लगाएँ

धान में पचास प्रतिशत फूल आने के दो सप्ताह बाद अर्थात अक्टूबर के मध्य माह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच पैरा फसल का बुआई छींट कर करना चाहिए।

बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना चाहिए। नमी इतनी होनी चाहिए की बीज गीली मिटटी में चिपक जाये।

जहाँ ध्यान दें कि खेत में पानी अधिक न हो अन्यथा बीज सड़ जाएगी। आवश्यकता से अधिक पानी को निकाल दें। जल निकासी का उचित व्यवस्था रखें।

खाद एवं उर्वरक

दलहनी फसलों में नेत्रजन (नाइट्रोजन) की आवश्यकता पौधे के प्रारम्भिक अवस्था में होती है। अत: यूरिया 2 किलो, डी.ए.पी.20 किलो तथा पोटाश 6 किलो प्रति एकड़ बुआई के समय देना चाहिए। 4 क्विंटल गोबर खाद भी अच्छी तरह से भूरकाव कर देना चाहिए।

तीसी या अन्य तिलहनी फसलों के लिए नेत्रजन की अतिरिक्त मात्रा देने की आवश्यकता होती है। अतिरिक्त 10 किलो यूरिया का व्यवहार बुआई के 20 दिन बाद करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

धान कटनी के 40-45 दिन बाद पैरा फसल में एक निकौनी करना चाहिए। तीसी में खरपतवार नियंत्रण के लिए आइसोप्रोटोरान धूल (25 प्रतिशत) का छिड़काव बुआई के 15 दिनों बाद किया जा सकता है। दलहनी फसलों में खरपतवार नियंत्रण हेतु एलाक्लोर 50 ई.सी. का प्रयोग बुआई के 2 दिन बाद किया जा सकता है।

पौधा संरक्षण

दलहनी फसलों जैसे चना, मटर, मसूर, खेसारी तथा तिलहनी फसल तीसी में उकठा रोग होने पर उक्त खेत में 2 से 3 साल तक इन फसलों की खेती रोक देनी चाहिए अथवा रोग रोधी किस्मों का व्यवहार करना चाहिए।

मटर के फफूदी रोग नियंत्रण हेतु कैराथेन (0.1 प्रतिशत) या सल्फेक्स (0.3 प्रतिशत), इंडोफिल एम-450 0.2 प्रतिशत के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।

तीसी में गोल मीज का प्रकोप होने पर मिथाइल डियेटोन (10 मिली./10 ली.पानी) या मोनोक्रोढ़ोफास (10 मिली/10 ली. पानी) का छिड़काव करना चाहिए।

दलहनी फसलों में फली छेदक नियंत्रण हेतु डेल्फिन या डिपेल (1 ग्राम/ली.पानी) या इंडोसल्फान तरल (1.2 मिली./ली.पानी) का छिड़काव करना चाहिए।

उपज

किसान भाई अगर आधार फसल धान जैसा ही पैरा फसल के खेती पर ध्यान दें तो निश्चित रूप से प्रति क्षेत्रफल पैदावर बढ़ेगी। पैरा कृषि अपनाकर काफी कम लागत में निम्नलिखित उपज प्रति एकड़ प्राप्त किया जा सकता है।

उपज

क्विंटल/एकड़

तीसी

2.5

मसूर

1-1.5

चना

1-1.5

छोटी मटर (केख)

3-4

खेसारी


3-4

 

सावधानियाँ

पैरा कृषि के अंतर्गत कुछ सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता होती है, जैसे –

  1. अंकुरण के समय खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। पानी के जमाव से बीज के सड़ जाने का खतरा रहता है। अत: जल निकासी का उचित व्यवस्था करके रखना चाहिए।
  2. बीज बुआई के समय फसल, किस्म तथा मिटटी के प्रकार का ध्यान देना चाहिए।
  3. आधार फसल के बुआई के समय ही पैरा खेती के लिए भी योजना बना लेना चाहिए।
  4. आधार फसल मध्यम अवधि वाली उन्नत किस्म की होनी चाहिए।
  5. आधार फसल का कटाई पैरा फसल को बचाते हुए बड़ी सावधानी से की जानी चाहिए।
  6. चना तथा खेसारी जैसी पैरा फसल की शीर्षक शाखाओं को तोड़ देना चाहिए।

पैरा खेती से लाभ

पैरा खेती के निम्नलिखित लाभ है-

  1. पैरा कृषि अन्य दोहरी कृषि पद्धतियों से कम लागत वाली सस्ती कृषि पद्धति है।
  2. इस कृषि पद्धति से खेत में मौजूद नमी का पूर्ण उपयोग हो जाता है।
  3. कम लागत से ही दलहन तथा तिलहन का अतिरिक्त उपज प्राप्त होता है, अर्थात अधिक लाभ प्राप्त होता है।
  4. पैरा कृषि के अंतर्गत दलहनी फसलों के खेती से मिटटी में नेत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे किसान को अनुवर्ती अन्य फसल के खेती में नेत्रजनीत खाद की कम मात्रा देनी पड़ती है।
  5. तेलहनी फसलों से खल्ली के रूप में कार्बनिक खाद की प्राप्ति होती है।
  6. पैरा कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि रबी मौसम में जो खेत परती रहता है, उसका समुचित उपयोग हो जाता है।

स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखंड सरकार

3.05882352941

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
Back to top

T612018/02/21 02:42:13.388366 GMT+0530

T622018/02/21 02:42:13.412488 GMT+0530

T632018/02/21 02:42:13.559445 GMT+0530

T642018/02/21 02:42:13.559877 GMT+0530

T12018/02/21 02:42:13.365520 GMT+0530

T22018/02/21 02:42:13.365728 GMT+0530

T32018/02/21 02:42:13.365870 GMT+0530

T42018/02/21 02:42:13.366015 GMT+0530

T52018/02/21 02:42:13.366101 GMT+0530

T62018/02/21 02:42:13.366174 GMT+0530

T72018/02/21 02:42:13.366861 GMT+0530

T82018/02/21 02:42:13.367048 GMT+0530

T92018/02/21 02:42:13.367253 GMT+0530

T102018/02/21 02:42:13.367454 GMT+0530

T112018/02/21 02:42:13.367499 GMT+0530

T122018/02/21 02:42:13.367589 GMT+0530