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पॉलीहाउस में मृदा स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन

इस लेख में पॉलीहाउस में मृदा स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है|

परिचय

नवीनतम अनुमानों के अनुसार विश्व की जनसंख्या लगभग सात अरब हो चुकी है तथा इस बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए धरती पर कृषि योग्य भूमि की कमी अब दिखने लगी है| इसके साथ-साथ शहरों में बढ़ती आबादी व औद्योगिकरण न केवल कृषि योग्य भूमि पर आघात कर रहे हैं बल्कि वातावरण में बदलाव के भी मुख्य कारण बन रहे हैं| कृषि के लिए  उपलब्ध जलस्रोत भी कम हो रहे हैं| संरक्षित खेती इन सब कारकों को पूरा कर सकती है| पिछले कुछ वर्षों में भारत में तथा विशेषकर हिमाचल प्रदेश में संरक्षित खेती अर्थात पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस में सब्जियों तथा फूलों की खेती का चलन काफी बढ़ा है| इसके द्वारा किसानों की आर्थिक स्थिति में बढ़ोतरी हो हुई ही है साथ ही साथ ग्राहक को अच्छी सब्जी तथा त्यौहारों के मौसम में अच्छे तथा सस्ते फूल उपलब्ध होने लगे हैं| संरक्षित खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें वर्ष भर लगातार फसल (जैसे सब्जियों तथा फूलों) का उत्पादन हो सकता है|

पॉलीहाउस में मृदा स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन

पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस में वर्ष भर फसलों की अच्छी पैदावार तथा गुणवत्ता के लिए पोषक तत्वों की उचित मात्रा की पूर्ति करने के लिए फर्टिगेशन द्वारा घुलनशील खादों का प्रयोग निरतंर किय जा सकता है| इस कारण से 3-4 वर्षों में ही पॉलीहाउस की मिट्टी का स्वास्थ्य ख़राब होने लगा है| अच्छे बीज, उचित पोषक तत्व तथा सभी सावधानियों के बावजूद फसल की पैदावार तथा गुणवत्ता में भरी कमी आनें लगी है| चूँकि अभी किसानों को मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता न होने के कारण फसल में उत्पादन की गिरावट के सही कारणों का पत्ता नहीं चल पा रहा है| अतः यह आवश्यक है कि  वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के लिए किसान मिट्टी के स्वास्थ्य की लगातार जाँच करवाएं और उसके बारे में सम्पूर्ण जानकारी रखें| मिट्टी की जाँच के लिए सही तरीके से नमूना लेना बहुत महत्वपूर्ण है| अगर नमूना सही ढंग से नहीं लिया गया तो जाँच के परिणाम भी ठीक नहीं होंगे| सही ढंग से नमूना सही ढंग से नमूना  लेने के लिए विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें| यह नमूना पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस के अंदर से अलग-अलग स्थानों सलिए जाता है| फिर इसे अच्छी तरह मिलाकर चार भागों में बाँट दिया जात है| सामने से एक भाग को हटाते हुए शेष भाग को फिर से उपर्युक्त वर्णित विधि से मिलाया जाता है| इस प्रक्रिया को तब तक दोहराते रहते हैं जब तक नमूना आधा किलोग्राम न रह जाए| इस नमूने को छाया में सुखाने के बाद कपड़े की थैली में डालकर अपना नाम, पता तथा कौन सी फसल लगाई थी एवं कोण सी लगानी है इत्यादि के बारे में सूचित करना आवश्यक होता है| इस तरह से प्राप्त किये गये नमूने को जाँच केंद्र में भेज दिया जाता है| जाँच के आधार पर प्राप्त जानकारी के बाद ही खाद एंव उर्वरक इत्यादि का प्रयोग किया जाता है| संरक्षित खेती करते समय ध्यान रखें कि मिट्टी की जाँच समय-समय पर अवश्य करवाते रहें| सबसे पहली जाँच पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस लगाने के बाद तथा फसल लगाने से पूर्व करवाएं| इसके बाद प्रति वर्ष अथवा प्रत्येक फसल के बाद मिट्टी की जाँच करवानी चाहिए|

मिट्टी की जाँच रिपोर्ट के आधार पर प्राप्त मृदा स्वास्थ्य के विभिन्न परिमाप निम्नलिखित हैं जिनके उचित प्रंबधन द्वारा पॉलीहाउस में फसल उत्पादन किया जा सकता है|

i) मिट्टी की बनावट: पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस में सबसे पहले मिट्टी के प्रकार की जानकारी पाप्त की जाती है जो मुखयतः तीन प्रकार जैसे चिकनी, दोमट तथा रेतीली होती है| संतुलित पोषक तत्वों पोषक तत्वों तथा जल धारण क्षमता अधिक होने के कारण दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है| चिकनी तथा रेतीली मिट्टी में पोषक तत्वों तथा जलधारण क्षमता की कमी रहती है|  मिट्टी की बनावट के अनुसार ही जल तथा फर्टिगेशन की मात्रा एवं समय निर्धारित किया जाता है| उसी प्रकार गोबर की खाद तथा वर्मीकम्पोस्ट की मात्रा भी निर्धारित होती है|

ii) जैविक पदार्थ: मिट्टी में जविक पदार्थ की मात्रा 1.5 से 2.0% तक लगातार बनाये रखनी चाहिए| इससे कम होने पर मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| मिट्टी की अच्छी सेहत बनाये रखने के लिए गोबर की सड़ी-गली खाद (4 कि.ग्रा/वर्ग मी) एवं वर्मीकम्पोस्ट (2 कि.ग्रा/वर्ग मी) की दर से प्रयोग कर सकते हैं| यह तीनों प्रकार की मिट्टी में पानी एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और उसे भुरभूरा बनाएं रखने में मदद करते हैं|

iii) पी. एच.: मिट्टी का सामान्य पी. एच. मान 6.5 से 7.5 के मध्य होता है यदि यही मान 6.5 से कम हो तो इसे अम्लीय तथा 7.5 से अधिक हो तो इसे लवणीय या क्षारीयता की गणना में रखते हैं| मिट्टी की आम्लता की दशा में बुझा हुआ चूना तथा क्षारीयता जिप्सम का प्रयोग मृदा जाँच के आधार पर ही किया जाता है|

iv) विद्युतचालकता: दूसरा महत्वपूर्ण परिमाप विद्युतचालकता है जो मिट्टी में उपलब्ध लवणों विशेषकर कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा सोडियम की मात्रा को दर्शाता है|

v) प्रमुख पोषक तत्व: यह फसल को अधिक मात्रा में चाहिए| नत्रजन, पोटाशियम तथा फास्फोरस मुख्य पोषक तत्व हैं जो फसल की बढ़ोत्तरी, स्वास्थ्य, पैदावार तथा उत्पाद की गुणवत्ता की प्रभावित करते हैं|  मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी या प्रचुरता फसल की गुणवत्ता तथा पैदावार पर हानिकारक प्रभाव डालती है| कमी के साथ-साथ किसी पोषक तत्व की मिट्टी में प्रचुरता भी हानिकारक होती है| जैसे कि यदि मिट्टी में फास्फोरस की मात्रा आवश्यकता से अधिक है तो वह पौधों द्वारा पोटाशियम के अवशोषण को प्रभावित करता है| इसलिए मिट्टी की जाँच के बाद विशेषज्ञ द्वारा अनुमोदित मुख्य पोषक तत्वों क मात्रा का प्रयोग करना चाहिये|

vi) सूक्ष्म पोषक तत्व: संरक्षित खेती में सूक्ष्म पोषक तत्वों का बहुत महत्व है| यह मिट्टी में बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होते हैं, लेकिन पौधों के लिए आवश्यकता के दृष्टिकोण से सभी पोषक तत्व बराबर  महत्व रखते हैं| बोरोन, जिंक, कॉपर, लोहा, मैगजीन एवं मोलीबडेनम इत्यादि महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जिनकी आवश्यकतानुसार पूर्ति अच्छी फसल के लिए अत्यंत लाभदायक होती है| मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति फसल की आवश्यकतानुसार ही विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार की जाती है| इनकी पूर्ति पर्णीय छिड़काव के रूप में भी कर सकते हैं|

vii) मिट्टी का बदलना एवं उपचार: उपर्युक्त उपायों को अपनाने के पश्चात् भी यदि मृदा स्वास्थ्य में सुधार न हो तो मिट्टी को बदलना आवश्यक हो जाता है| इसके लिए ऐसी जगह से मिट्टी लायें जहाँ खेती न की गई हो| इसके लिए 1000 वर्ग.मी. पॉलीहाउस में 30 ट्रक मिट्टी लगती है| मिट्टी के साथ यदि हो सके हॉट 2 टन भूसा, 3 ट्रक सड़ी-गली गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी बेहतर हो जाती है| यदि बाहर अच्छी मिट्टी न मिले तो पॉलीहाउस की ही मिट्टी (३० सेंटीमीटर) ऊपर से नीचे पलट दें| इसके पश्चात् 70 लीटर फार्मलीन 700 लीटर पानी में मिलाकर मिट्टी का उपचार करें ताकि उसमें कोई मृदा जनित रोग यह कीटाणु न रह जाएँ| तत्पश्चात मिट्टी को पारदर्शी पोलिथीन से 6-7 दिनों के लिए ढकना चाहिए| पोलीथीन हटाने के बाद 100 लीटर/वर्ग मी. पानी से मिट्टी को भिंगोने से मिट्टी से फार्मलीन की सफाई हो जाती है|

स्रोत: मृदा एवं जल प्रबंधन विभाग, औद्यानिकी एवं वानिकी विश्विद्यालय; सोलन

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