सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

होम (घर) / कृषि / फसल उत्पादन / फसल उत्पादन की उन्नत कृषि प्रणाली
शेयर
Views
  • अवस्था संपादित करने के स्वीकृत

फसल उत्पादन की उन्नत कृषि प्रणाली

इस लेख में फसल उत्पादन की उन्नत कृषि प्रणली, जो आज देश में प्रचलित है, की जानकारी उठा सकते है।

खाद्यान्न

उन्नत प्रभेद(Advanced Variety)

समय

विलम्ब

समय पर बुआई के लिए (सिंचित) : एच.डी.- 2733, एच.यू. डब्ल्यू– 468, एच.डी- 2402, पी. बी. डब्ल्यू -343, के-9107, के- 8804, एन, डब्ल्यू -1012, (उपज क्षमता 40-50 क्विं / हे.)

विलंब से बुआई के लिए (सिंचित) : एच.डी- 2402, एच.यू. डब्ल्यू – 234, एच. पी. 1744, एच.यू. डब्ल्यू –2045, एच.डी- 2643 (गंगा), एन डब्ल्यू - 1014, पी. बी. डब्ल्यू -373, (उपज क्षमता 35-40 क्विं/ हे.)

समय पर (अक्तूबर से नवम्बर प्रारम्भ) बोआई के लिए (असिंचित): सी-306, के-8027, एच.डी. आर -77, के-8962, उपज क्षमता (20-25 क्विं/ हे.)

देर से (नवंबर का द्वितीय पखवाड़ा) बोआई के लिए (असिंचित) : के-8962 (इन्द्रा), जी. डब्ल्यू-173, डी.एल.-788-2, उपज क्षमता (15-20 क्विं/ हे.)

बीज दर : 125 किलोग्राम/ हेक्टेयर। पिछात बुआई के लिए बीज दर से 25 किलो वृद्धि करें। उपचारित बीजों का व्यवहार करें बीटावेक्स या बैविस्टीन की 2.5 ग्राम मात्रा एक किलो बीज हेतु पर्याप्त है।

बोआई हल के पीछे

अवस्था

समय

दूरी

सिंचित

(क) समय से

(ख) पिछात

असिंचित

नवम्बर माह प्रथम पखवारा

25 दिसम्बर तक

अक्टूबर के अन्त से 10 नवंबर तक

22 सें.मी.

18-20 सें.मी.

22 सें.मी

उर्वरकों की मात्रा एवं प्रयोग विधि

प्रति हेक्टेयर 50-100 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालें। अधिक उत्पादनशील प्रभेदों के लिए (220 किलो यूरिया, 312 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट, 42 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश) प्रति हेक्टेयर में दें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय दें। नाइट्रोजन की बची मात्रा प्रथम सिंचाई (20-25 दिन) के बाद, जब खेत में चलने लायक नमी हो, दें। सिंचित अवस्था में विलम्ब से बोआई वाली किस्मों के लिए 174 किलो यूरिया 250 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट 34 किलो म्यूरिएट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से दें।

असिंचित अवस्था के लिये 70 किलो यूरिया तथा 125 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट

सिंचाई

जल की उपलब्धता एवं फसल की आवश्यकतानुसार सिंचाई निम्नलिखित अवस्थाओं पर करें :

एक सिंचाई : क्राउन रूट निकलने और कल्ले पूर्ण होने के बीच।

दो सिंचाई : क्राउन रूट निकलते समय और बालियाँ निकलते समय।

तीन सिंचाई : क्राउन रूट निकलते समय और बालियाँ निकलते समय और दानों में दूध आते समय

चार सिंचाई : क्राउन रूट निकलते समय, कल्ले पूर्ण होने पर, बालियाँ निकलते समय तथा दानों में दूध भरते समय।

पाँच सिंचाई : क्राउन रूट निकलते समय, कल्ले पूर्ण होने पर, तने में गाँठ बनते समय, बालियाँ निकलते समय एवं दानों में दूध आते समय

: सिंचाई : क्राउन रूट बनते समय, कल्ले पूर्ण होने पर, तने में गाँठ बनते समय, बालियों में फूल आते समय, दानों में दूध भरते समय और दानों के सख्त होते समय।

निकाई-गुडाई : प्रथम सिंचाई के बाद मिट्टी भुरभुरी होने पर घास-पात निकाल दें।

कटनी-दौनी : फसल पकते ही सुबह में कटनी करें।

भंडारण : भंडार में रखने के पूर्व बीज को पूरी तरह धूप में सुखा लें।

गेहूँ

जौ

सिंचित अवस्था

असिंचित अवस्था

उन्नत प्रभेद

ज्योति, डी. एल. 36

बी.आर 32, रत्ना

बी.आर.के 125, रत्ना

बुआई

नवंबर से दिसंबर

नवंबर से दिसंबर, अगर

खेत में नमी हो।

बीज दर

100 क्विंटल/ हेक्टेयर)

100 क्विंटल/ हेक्टेयर)

उर्वरक

88 किलो यूरिया

125 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट

34 किलो म्यूरियट ऑफ पौटाश / हेक्टेयर नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस

और पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय दें।

नाईट्रोजन की बची मात्रा प्रथम सिंचाई के समय दें।

44 कि.यूरिया, 125 किलो

सिंगल सुपर फॉस्फेट मात्रा बोने

के समय दें।

सिंचाई

प्रथम सिंचाई बोने के 30-35

दिनों बाद तथा दूसरी 60 दिनों

के बाद

उपज

30-35 क्विंटल/ हेक्टेयर)

12-18 क्विंटल/ हेक्टेयर)

जौ की उन्नत खेती

मक्का

झारखण्ड राज्य में मक्का की उन्नत खेती

मक्का एक महत्वपूर्ण मोटे अनाज की फसल है। चारा तथा दाने के रूप में मक्का की खेती व्यापक पैमाने पर की जाती है। झारखण्ड राज्य में लगभग 1.91 लाख हेक्टेयर भूमि में मक्का की खेती होती है एवं इसकी उत्पादकता करीब 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। सामान्य मक्का के साथ-साथ आजकल बेबी कॉर्न, पॉप कॉर्न, स्वीट कॉर्न तथा गुणवत्ता प्रोटीन युक्त मक्का की खेती प्रायोगिक तौर पर की जा रही है।

जमीन का चुनावः मक्का रेतीली से भारी मिट्टी तक, सभी प्रकार की जमीन में उगाया जा सकता है। जल धारण करने की बेहतर क्षमता के कारण मध्यम-भारी मृदाएँ उपयुक्त समझी जाती है। लवणीय और अम्लीय मृदाओं से बचना चाहिए, क्योंकि इसमें फसल के अंकुरण के तुरन्त बाद प्रतिकूल असर होने लगता है।

खेतों की तैयारीः रबी फसल कटने के बाद एक गहरी जुताई करने से मिट्टी में बरसात के पानी का अच्छा संचय, खरपतवार एवं कीट नियंत्रण तथा मिट्टी जनित बीमारी का नाश होता है। पहली गहरी जुताई के बाद देशी हल से दो से तीन बार जुताई करने से खेत बोआई के लिए तैयार हो जाता है। अन्तिम जुताई के समय 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के दर से कम्पोस्ट या गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता में वृद्धि होती है।

किस्में:

सुआन-1: यह 105 दिन में तैयार हो जाने वाली किस्म है जो खरीफ में 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा रबी में 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है।

बिरसा मक्का- 1 : यह 85 दिनों में तैयार हो जाता है, इसकी उपज क्षमता 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

बिरसा विकास मक्का 2 : यह किस्म 80 दिनों में तैयार हो जाता है। इसमें प्रोटीन लगभग 7.5 प्रतिशत होता है तथा ट्रिप्टोफेन 0.53 प्रतिशत होता है। इसकी उपज क्षमता 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

उपर्युक्त किस्मों के अलावा प्रोटीन युक्त मक्का के लिए HQPM-1 संकर मक्का की अनुशंसा की जा रही है।

बोआई का समयः अगर सिंचाई का उचित प्रबंध हो तो मक्का को दिसम्बर या जनवरी माह छोड़कर किसी भी समय बोया जा सकता है।

खरीफः मई के अन्तिम से जून के अन्तिम सप्ताह तक सिंचित क्षेत्रों में वर्षा आने से 10 से 15 दिन पहले ही बुआई कर लेनी चाहिए। इससे उन खेतों से 15 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है।

रबीः अक्टूबर के अन्तिम से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक

गरमाः मध्य जनवरी से फरवरी के पहला सप्ताह तक।

बोआई की विधिः बीज बोआई के लिए 70 सें.मी. की दूरी पर हल से कतार खोलने के बाद 20 सें.मी. की दूरी पर दो-दो दानों को 5 सें.मी. गहरा डालें एवं मिट्टी से ढक दें। खेत में नमी होने पर ही बुआई करें। कतार उत्तर से दक्षिण की ओर रखने से पौधा सौर ऊर्जा को ज्यादा अवशोषित करता है, फलतः ज्यादा उपज प्राप्त होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में रूके हुए जल के कारण होने वाली क्षति से बचाने के लिए फसल को मेड़ पर बोना चाहिए।

रबी व गरमा के मौसम की बुआई के लिए कतार से कतार की दूरी 60 सें.मी. तथा पौधों के बीच की दूरी 20 सें.मी. होती हैं। बेबीकार्न के लिए पौधा से पौधा की दूरी 15 सें.मी. रखते हैं।

बीज उपचारः बीज को रातभर पानी में भींगोने तथा सुबह छायादार जगह पर सुखाकर बोने से अंकुरण जल्दी हो जाता है। बीज को थीरम या कैप्टन (75 प्रतिशत) सूखे पाउडर के 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने से पौधों में रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ता है।

बीज दरः 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (खरीफ में) तथा 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (रबी मौसम की खेती के लिए) एवं 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बेबीकार्न के लिए अनुशंसित है। चारा के लिए 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज का प्रयोग करते हैं।

उर्वरकों की मात्रा एवं प्रयोग विधिः किस्म की पकने की अवधि के आधार पर प्रति हेक्टेयर 80 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन की सिफारिश की जाती है। बोआई के समय फॉस्फोरस एवं पोटाश के संतुलित प्रयोग की सिफारिश की जाती है। बोआई के समय फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की 30 प्रतिशत मात्रा कतार में 5 से.मी. गहराई पर डालें। नाइट्रोजन की बाकी 40 प्रतिशत बोआई के 20 से 25 दिनों बाद एवं शेष 30 प्रतिशत नरमंजरी निकलते समय साइड ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग की जाती है।

मिट्टी में बोरान कि कमी से पौधों में क्षति न पहुँचे, इसके लिए 18 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। मिट्टी की अम्लीयता में सुधार लाने के लिए एक से डेढ़ क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कतार में चूना का प्रयोग करें।

पौधों की संख्याः खरीफ के दौरान मक्का की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए प्रति हेक्टेयर 70 हजार पौधे होने आवश्यक है जबकि रबी में पौधों की संख्या 90 हजार प्रति हेक्टेयर तक बढ़ाई जा सकती है। बेबीकार्न के लिए प्रति हेक्टेयर एक लाख पौधा होना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रणः बीज बोने के 20 दिनों के बाद पहली निकाई, तथा 40 दिनों के बाद दूसरी निकाई करें। खरपतवार का नियंत्रण रासायनिक विधि से करने के लिए बोआई के तुरन्त बाद एट्राजिन या सिमैजीन का 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोल कर स्प्रेयर द्वारा छिड़काव करें।

मिट्टी चढ़ानाः पौधों को हवा के झोकों से गिरने से बचाने के लिए तथा बरसात में अत्यधिक पानी के निकास के लिए एवं अन्य में सिंचाई करने के लिए बोआई के 20 से 25 दिनों के बाद नाईट्रोजन उर्वरक देकर मिट्टी की चढ़ाई कर दें । बोआई के 40 से 50 दिनों के बाद नाईट्रोजन उर्वरक की शेष मात्रा देने के बाद दूसरी बार फिर से मिट्टी चढ़ाना चाहिए।

जल प्रबंधनः मक्का का पौधा जल जमाव व सूखा दोनों के प्रति अति संवेदनशील है इसलिए खरीफ मौसम में खेतों में पानी ज्यादा देर तक रूकने न दें। सूखे की स्थिति में नरमंजरी तथा सिल्क निकलने व दाना भरते समय पानी की कमी न होने दें। यदि इस समय वर्षा न हो तो फसल की सिंचाई की जाती है। रबी व गरमा के मौसम के दौरान फसल के बढ़वार की स्थितियों में 8 से 10 सिंचाई आवश्यक होती है।

पौधा संरक्षणः बोआई के समय बीजों का उपचार क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. की 5 मिली लीटर या थायामेथोक्साम 25 ई.जी. की 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें, इससे दीमक तथा धड़छेदक कीटों से पौधों की प्रारम्भिक सुरक्षा होगी।

हानिकारक कीटः खरीफ मौसम में मक्के का तना छेदक (Chilo Partellus) तथा रबी मौसम में Sesamia inferens मुख्य कीट है। इस कीट के नियंत्रण के लिए कार्बोफयुरान 3 जी. दवा 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 8 से 10 दाना प्रत्येक पौधों की गाभा में डाल दें। इस कीट के जैविक नियंत्रण के लिए अंकुरण के 12 एवं 22 वे दिन पर ट्राईकोग्रामा किलोनिस नामक परजीवी कीट का प्रयोग करें। इसके लिए 8 ट्राईकोकार्ड/ हेक्टेयर की दर से पत्तों में चिपका देना चाहिए।

रोगः खेत के वे हिस्से जो कि फूल आने से पहले की स्थिति के दौरान जलक्रांत रहते है, उनमें समय-समय पर Maydis और Turcicum leaf blight उभर आते है, इस बीमारी के नियंत्रण के लिए 10 से 15 दिन के अन्तराल पर 2.5 ग्राम zineb प्रति लीटर पानी में मिलाकर दो या तीन छिड़काव करें। खेत की साफ-सफाई रखने से इन रोगों का प्रकोप कम होता है।

विशेष गुणवत्ता वाली मक्काः

बेबी कॉर्नः पराग से पहले निकाली गई अपरिपक्व बाली को ही बेवकॉर्न कहते हैं। आजकल विशेष सब्जी तथा सलाद के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका सूप, पकौड़ा तथा अन्य व्यंजन भी बनाया जा सकता है। देश की विभिन्न प्रतिष्ठानों के द्वारा विशेष रुप से विकसित किए गए किस्मों में एच.एम. 4, बिरसा विकास मक्का 2 तथा वी.एल. 42 मक्का प्रमुख है। बेबीकॉर्न के फसल से बाली 10 क्विंटल तथा हरा चारा 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की उपज ली जा सकती है।

मीठी मक्का (स्वीट कार्न)- सामान्य मक्का की तुलना में मीठी मक्का में शर्करा की मात्रा अधिक (25-30 प्रतिशत तक) होती है। माधुरी व प्रिया अनुशंसित किस्में है। मीठी मक्का की फसल को परागण के 20 से 22 दिन बाद भुट्टा की तोड़ाई कर लेनी चाहिए। देर से तोड़ने पर शर्करा की मात्रा घट जाती है। भुट्टों की यह अवस्था बाजार में बिक्री के लिए उपयुक्त होता है। भुट्टा तोड़ने के बाद हरा चारा के लिये पौधों को काट लेना चाहिये।

चारा मक्काः अफ्रीकन टालकिस्म चारा वाली मक्का के लिये उपयुक्त है। चारा के लिए 40 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। पंक्ति से पंक्ति 30 सें.मी. रखते हैं। भुट्टा लगने से पहले तक चारा काटकर जानवरों को खिलाते है। उपज क्षमता 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा है।

सूचना प्रदाता- बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006

दूरभाष – 0651 – 2450610, फैक्स – 0651 -2451011/ 245085

मड़ुआ (Ragi)

उन्नत किस्में

तैयार होने का समय (दिन)

औसत उत्पादन (क्विंटल हेक्टेयर में)

अन्य गुण

बिरसा मड़ुआ -1

80-90

20-25

अगात

बिरसा मड़ुआ -2

105-110

24-26

मध्य अगात

एच.आर. 374

100-105

24-28

मध्य अगात

ए. 404

115-120

30-32

मध्य अगात

कृषि कार्य:

(क) जमीन की तैयारी : तीन-चार बार खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। गोबर को सड़ी खाद 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला दें। चूँकि मड़ुआ टाँड जमीन में बोया जाता है इसलिए जल-निकास का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए।

(ख) बुआई के समय: मध्य जून से बिचड़े के लिए बीज नर्सरी में गिरा दें। तीन-चार सप्ताह बाद बिचड़ी को उखाड़ कर रोपनी करें। कतार से कतार की दूरी 15-20 सेन्टी मीटर होनी चाहिए।

(ग) बीज दर: 8 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

(घ) उर्वरक का प्रयोग :

उर्वरक

बोने के समय

रोपनी का समय

यूरिया

44 क्विंटल/ हेक्टेयर

44 क्विंटल/ हेक्टेयर

सिंगल सुपर फॉस्फेट

187 क्विंटल/ हेक्टेयर

-

म्यूरिएट ऑफ पोटाश

34 क्विंटल/ हेक्टेयर

 

(ड़) निकाई-गुडाई: दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है। प्रथम निकाई के 5 दिन बाद 45 किलो यूरिया/ हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में डालें।

(च) कटनी तथा दौनी : बाली पक जाने पर पहले बाली को काटा जाता है। बाली को 2-3 दिन तक धूप में अच्छी तरह सूखाकर बैल द्वारा दौनी की जाती है। उसके बाद अनाज को ठीक से हवा में उड़ाकर दाना अलग किया जाता है।

दलहनी फसलें

खरीफ दलहनी फसलें(kharif’s Pulses Crops)

  • अरहर
  • उड़द
  • मूंग
  • कुलथी

रबी की दलहनी फसलें(Rabi’s Pulses Crops)

  • चना (Bengal Gram)
  • मटर(Peas)
  • मसूर (Massor Dal)
  • अरहर (Red Gram)

अरहर

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो-तीन बार खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। गोबर की सड़ी खाद 5 गाड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला दें। अरहर टाँड़ जमीन की फसल है, इस लिए खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए।

(ख) बोआई के समय: अरहर की बोआई मध्य जून से मध्य जुलाई तक कर देनी चाहिये।

(ग) उत्रत किसम:

उन्नत किस्में

बोआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

टी-21

बी. आर.65

बिरसा अरहर-1

बहार, शरद

नरेन्द्र अरहर-1

एवं लक्षमी

50x15 सें.मी.

60 x20 सें.मी.

75 x25 सें.मी.

 

150 दिन

180 दिन

 

220 दिन

8-10

12-15

 

20-25

जल्द तैयार होने वाली किस्म

मिश्रित खेती के लिए उपयुक्त

 

मिश्रित खेती के लिए उपयुक्त

 

(घ) बीज दर: 20 किलो प्रतf हेक्टेयर

(ङ) उर्वरक:

उर्वरक

मात्रा

जीवाणु खाद

यूरिया

 

सिंगल सुपर फॉस्फेट

 

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 क्विंटल/ हेक्टेयर

 

250 क्विंटल/ हेक्टेयर

 

34 क्विंटल/ हेक्टेयर

 

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

(च) निकाई-गुडाई: दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता है। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 25 से 30 दिनों बाद एवं दूसरी 40 से 45 दिनों बाद।

(छ) कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : अरहर की फली जब पक जाये तो हँसुए से पौधों को काटकर धूप में सुखा दें। डंडे के सहारे पौधों को पीटकर दाना अलग कर लें। अरहर के दानें धूप में अच्छी तरह सुखाकर भंडारण करें।

उरद (Black Gram)

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो तीन बार देशी हल से खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। जुताई के समय गोबर को सड़ी खाद 5 गाड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला दें। उरद ऊँची जमीन की फसल है, अत : खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए।

(ख) बोआई के समय : बुआई का उचित समय मध्य जून से मध्य जुलाई तक

2. उरद विलम्ब से बुआई के लिए भी उपयुक्त है। मध्य अगस्त तक बुआई करके अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

(ग) उत्रत किसम :

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

टी-9, पंत,यू-19

बिरसा उरद-1

शेखर, पंत.यू-30

पंत.यू -35

30 x10 सें.मी.

 

75 से 80 दिन

 

15-20

रोग अवरोधी फल्लियों का एक

बार पकना एवं

मिश्रित खेती के लिए उपयुक्त

 

(घ) बीज दर : 30 किलो प्रतिहेक्टेयर

(ङ) उर्वरक :

उर्वरक

बोने के समय

रोपनी के समय

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

निकाई-गुडाई : दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता है। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 20 दिनों बाद एवं दूसरी 40 दिनों बाद करना लाभप्रद है ।

कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : उरद की फलियाँ एक बार पक कर तैयार हो जाती है। पकने पर फल्लियों का रंग काला हो जाता है एवं पौधा भी पीला होने लगता है।

पौधों की कटाई एक बार हँसुए के द्वारा करके धूप में सुखाने चाहिए। दौनी करके दाना अलग कर लेना उचित है। दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाकर भंडारण करें।

मूंग (Green Gram)

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो-तीन बार देशी हल से खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। जुताई के समय गोबर की सड़ी खाद 5 गाड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह मिला दें। मूंग ऊँची जमीन में लगाई जाने वाली फसल है, अत : खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए।

(ख) बोआई के समय : बुआई का उचित समय मध्य जून से मध्य जुलाई है।

मूंग गर्मी में बुआई के लिए उपयुक्त है। जिसकी बोआई मध्य फरवरी से मध्य मार्च तक करना उत्तम होता है।

(ग) उत्रत किस्म :

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

के- 851, पी.एस

-16 पूसा विशाल,

पंत मूंग -2

एवं पी.डी.एम.-11

30 x10 सें.मी.

 

60 से 65 दिन

 

12-15

रोग अवरोधी बोआई के

लिए उपयुक्त

(घ) बीज दर : 30 किलो प्रति हेक्टेयर

(ङ) उर्वरक :

उर्वरक

मात्रा

जिबाणु खाद

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

निकाई-गुडाई : दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता है। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 15-20 दिनों बाद एवं दूसरी 35 दिनों बाद।

कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : मूंग की फलियाँ एक बार पक कर तैयार नहीं होती है। पकी हुई फलियों की तोड़ाई 2-3 बार में पूरा होता है। फलियों को धूप में अच्छी तरह सुखा कर दौनी करके दाना अलग कर लें। मूंग के दानों को धूप में सुखाकर भंडारण करें।

कुलथी (Cowpea)

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो तीन बार देशी हल से खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। कुलथी की खेती ऊपर वाली जमीन में होती है जिसमें पानी का जमाव नहीं होना चाहिए।

(ख) बुआई के समय : बुआई के लिए उचित समय अगस्त है।

(ग) उत्रत किसम:

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

बिरसा कुलथी -1

मधु एवं बी.आर,

- 10

30 x10 सें.मी.

 

100 से 105 दिन

 

10 - 12

विलम्ब से बुआई के

लिए उपयुक्त

 

(घ) बीज दर : 20 किलो प्रति हेक्टेयर

(ङ) उर्वरक :

उर्वरक

मात्रा

जीवाणु खाद

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

निकाई-गुडाई : दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता है। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 15-20 दिनों बाद एवं दूसरी 35-40 दिनों बाद करना लाभप्रद है।

कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : कुलथी की फलियाँ एक बार पक कर तैयार हो जाती है। पकने पर फलियों का रंग भूरा हो जाता है तथा पौधे भी पीले पड़ने लगते है। पके हुए पौधों को हँसुए से काट कर धूप में सुखा कर दौनी करके दाना अलग कर लें। कुलथी के दानों को धूप में अच्छी तरह सूखाकर भंडारण करें।

रबी की दलहनी फसलें (Rabi’s Pulses Crops)

  • चना (Bengal Gram)
  • मटर (Peas)
  • मसूर (Massor Dal)

झारखण्ड में चना (Bengal Gram) की उन्नत खेती

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : अगात खरीफ फसल एवं धान की कटनी के बाद खेत की अविलम्ब तैयारी जरूरी है। दो तीन बार देशी हल से जुताई करके पाटा चला दें। चना की बोआई मध्यम जमीन, जिसमें पानी का जमाव नहीं होता हो, उपयुक्त होता है।

(ख) बुआई का समय :मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर

(ग) उत्रत किस्म :

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

पंत जी.-114,राधे

बी.जी. 256,

एच.-208

एवं सी. 235

30 x10 सें.मी.

 

130 से 135 दिन

 

15 - 20

विलम्ब से बोआई के

लिए उपयुक्त एवं रोग अवरोधी

 

(घ) बीज दर : 75 किलो प्रति हेक्टेयर

(ङ) उर्वरक:

उर्वरक

मात्रा

जीवाणु खाद

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

(च) निकाई-गुड़ाई : दो बार निकाई-गुड़ाई करना जरूरी है। पहली बार बुआई के 20-25 दिनों बाद एवं दूसरी 40-45 दिनों बाद।

(छ) सिंचाई : दो हल्की सिंचाई करने से उपज में काफी वृद्धि हो जाती है। एक सिंचाई फूल आने से पहले एवं दूसरी फल्लीयाँ निकलने पर।

(ज) कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : फसल तैयार होने पर फलियाँ पीली पड़ जाती हैं तथा पौधा भी सूख जाता है। पौधों को हँसुए के द्वारा काट कर धूप में सुखा दें एवं दौनी करके दाना अलग कर लें। चना के दानों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर ही भंडारण करें।

मटर (Peas)

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो तीन बार देशी हल से खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। मटर की खेती मध्यम जमीन में करें जहाँ पानी का जमाव नहीं हो।

(ख) बोआई के समय : बोआई के लिए उचित समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर है।

(ग) उत्रत किसम :

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

विशेष गुण

आरकेल,

रचना, बी.आर.-12

स्वर्ण रेखा

25 x 15 सें.मी.

30 x 15

90 दिन

130 दिन

90 (हरी छीमी)

20-22 दाना

जल्दी तैयार होने वाली

किस्म रोग अवरोधी

 

बीज दर : 75 किलो प्रतिहेक्टेयर

(ङ) उर्वरक :

उर्वरक

मात्रा

जीवाणु खाद

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

राईजोबियम कल्चर से उपचारित करें।

(च) निकाई-गुड़ाई :दो बार निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है। पहली निकाई -गुडाई बुआई के 25 दिनों बाद एवं दूसरी 40 दिनों बाद करना लाभप्रद है।

(छ) सिंचाई: मटर की अच्छी उपज के लिए 2-3 हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है।

(ज) कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : हरी छीमी की तोड़ाई 60-65 दिनों में शुरू हो जाता है। बीज प्राप्त करने के लिए मटर के पौधों की कटाई उस समय करें जब फलियाँ एवं पौधे पूर्ण रूप से सूख जाए। पौधों को धूप में अच्छी तरह सूखाकर दौनी करें। मटर को धूप में सूखाकर भंड़ारण करें।

मसूर (Massor Dal)

कृषि कार्य :

(क) जमीन की तैयारी : दो तीन बार देशी हल से खेत की अच्छी तरह जुताई करके पाटा चला दें। अगात खरीफ की फसल एवं धान काटने के बाद मध्यम जमीन मसूर के लिए उपयुक्त है।

(ख) बुआई के समय : बुआई के लिए उचित समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर है।

(ग) उत्रत किस्म :

उन्नत किस्में

बुआई की दूरी

तैयार होने का

समय

औसत उत्पादन

(क्विं.हे.)

बी.आर-25, पी.एल-

406,

पी.एल,-639,एल.

9-12, डी.पी.एल.-15,एवं,

डी.सी. एल.-62

25 x 8 सें.मी.

 

8 x 10 सें.मी.

125-130 दिन

15-20 क्विंटल

(घ) बीज दर : 75 किलो प्रति हेक्टेयर

(ड.) उर्वरक :

उर्वरक

मात्रा

जीवाणु खाद

यूरिया

सिंगल सुपर फॉस्फेट

म्यूरियट ऑफ पोटाश

44 कि./ हे.

250 कि./ हे.

34 कि./ हे.

बुआई से पहले बीज को

जीवाणु खाद (राईजोबियम

कल्चर) से उपचार करना लाभदायक है।

(च) निकाई-गुडाई : दो बार निकाई-गुडाई की आवश्यकता होती है। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 20-25 दिनों बाद एवं दूसरी 40-45 दिनों बाद करना आवश्यक है।

(छ) सिंचाई : दो हल्की सिंचाई करने से उपज में वृद्धि हो जाती है। पहली सिंचाई 25-30 दिनों बाद एवं दूसरी सिंचाई 40-45 दिनों बाद करनी चाहिए।

(ज) कटनी, दौनी एवं बीज भंडारण : पौधों एवं फलियाँ जब पककर पीली पड़ जायें तो हँसुए से कटाई करके फसल को धूप में सुखा कर दौनी करें एवं दाना अलग करके साफ कर लें । मसूर के दानों को धूप में सुखाकर भंडारण करें।

दलहन उत्पादन सुरक्षा एवं प्रसंस्करण

तिलहन फसलें

तिल

उन्नत प्रभेद : काँके सफेद, टी.सी.-25 तथा कृष्णा।

बोआई : वर्षा आरम्भ होने पर जून माह के मध्य जुलाई तक।

पौधों की दूरी : 10 सें.मी.

बीज दर : 5-6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर.

उर्वरक (प्रतिहे.) : 88 किलो यूरीया, 500 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट एवं 34 किलोग्राम म्यूरियट ऑफ पोटाश ।

पौधा सरक्षण : पौधा संरक्षण अनुच्छेद देखें।

उपज : 3-4 क्विं./ हे.

तेल की मात्रा : 47 से 50 प्रतिशत

मूंगफली Groundnut

झारखण्ड में मूंगफली की उन्नत खेती --

बिरसा बोल्ड

मूंगफली खरीफ की एक महत्वपूर्ण तेलहनी फसल है। झारखण्ड में इसकी खेती 14 जिलों में की जाती है, जिसमें प्रसुख गुमला और सिमडेगा जिले है। झारखण्ड में इसकी खेती वर्ष 2004 में 18,340 हेक्टेयर में की गई थी तथा इसका उत्पादन 16,700 टन एवं उत्पादकता 911 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। मूंगफली के दानों में औसतन 45 प्रतिशत तेल पाया जाता है इसके अलावा अन्य पोषक तत्व जैसे प्रोटीन 29 प्रतिशत एवं कार्बोहाइड्रेट 10.2 प्रतिशत पाया जाता है। तेल निकालने के बाद खल्ली का उपयोग पौष्टिक पशु आहार एवं जैविक खाद के रूप में किया जाता है। इतना ही नहीं मूंगफली की फसल वातावरण के नाइट्रोजन को जमीन में स्थिर कर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है। इसकी हरी पत्तियाँ पशु चारे के रूप में उपयोग की जाती है तथा फली का छिलका इंधन के रूप में प्रयोग होता है।

भूमि का चुनावः मूंगफली की खेती के लिए हल्की बलूआही मिट्टी जिसमें जल का अच्छा निकास हो, उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारीः खेत को मई महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से पहली जुताई करनी चाहिए। 15 दिन बाद दूसरी जुताई के समय खेत में 30 क्विंटल गोबर या कम्पोस्ट डालकर फिर तीसरी जुताई एक सप्ताह बाद करनी चाहिए तथा पाटा चलाकर भूमि को समतल कर देना चाहिए। दीमक के प्रकोप से बचने के लिए खेत में सूखे डंठल,घास,पत्ती आदि को हटा देना चाहिए। यदि दीमक का प्रकोप दिखाई पड़े तो लिण्डेन धूल 25 किलोग्राम हेक्टेयर की दर से बुआई से पूर्व खेत में डालना चाहिए। चूँकि झारखण्ड की मिट्टी अम्लीय है। अतः 3-4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से चूने का प्रयोग लाइन में बुआई से पहले करना चाहिए।

बोआई का समयः जून के प्रथम सप्ताह से 30 जून तक।

बीज दरः

फैलने वाली किस्मों के लिए 80 किलो दाना प्रति हेक्टेयरः गुच्छे वाली किस्मों के लिए 90 किलो दाना प्रति हेक्टेयर, तथा बड़ा दाना (बिरसा बोल्ड) किस्म के लिए 110 किलो दाना प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।

उन्नत किस्में: बिरसा बोल्ड (BAU-13) निर्यात के लिए सर्वोतम वर्जीनीया किस्म है इसकी अवधि 125 दिन है तथा इसमें 69 प्रतिशत दाने होते है एवं उपज क्षमता 22 क्विन्टल प्रति हेक्टयर है। यह किस्म Asperggillus Fugus के लिए अवरोधी है तथा इसमें Aflatoxin B1 का प्रकोप नहीं होता है। AK 12-24 उन्नत स्पेनिश किस्म है। इसकी अवधि 105 दिन है तथा उपज क्षमता 20 क्विन्टल प्रति हेक्टेयर है।

बीजोपचारः बीज जनित रोगों एवं कीटों से फसल को बचाने के लिए फफूंदनाशक एवं कीटनाशक दवाओं से बीजों को उपचारित करना जरूरी है। बोआई से पहले बीज को 2.5 ग्राम कारवेन्डाजिम (बैटिस्टीन) 50 WP प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। यदि खेत में दीमक या तना छेदक का प्रकोप होता है तो फफूंदनाशक से उपचारित करने के बाद बीज को क्लोरपायरीफास 20EC 6 मि.ली. प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करनी चाहिए।

उर्वरकः उर्वरक के रूप में नाईट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश क्रमशः 25:50:20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए। नाईट्रोजन-यूरिया के रूप में, फॉस्फोरस-सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में, और पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय कतारों में डालनी चाहिए। झारखंड राज्य की मिट्टी में गंधक व बोरान की कमी है। 45 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से गंधक तथा बोरान 1.25 किलेग्राम (बोरेक्स 15 किलो) प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के पहले खेत में कुड़ों में प्रयोग करने पर अच्छी उपज मिलती है। यदि फॉस्फोरस को सिंगल सुपर फॉस्फेट के रूप में लेते हैं तो फसल को गंधक भी उपलब्ध हो जाता है जो तेलहनी फसलों के लिए जरूरी है। IFFCO मिश्रित NP खाद (20:20:0:13) जिसमें सल्फर है,उसका भी प्रयोग कर सकते हैं।

बुआई की विधिः गुच्छे वाली किस्मों के लिए कतारों के बीच की दूरी 10 से.मी. होनी चाहिए। फैलने वाली किस्मों के लिए कतारों की दूरी 45 से. मी. एवं पौधे के बीच की दूरी 15 से.मी. रखें।

खरपतवार नियंत्रणः खेतों को खरपतवार से मुक्त रखना अति आवश्यक है। बोआई के 1-2 दिन के अन्दर तृण-नाशक दवा Metalachior @1.0 किलो प्रति हेक्टेयर या Tok-E 25, 4 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से 3-4 सप्ताह तक खरपतवार का प्रकोप कम रहता है। बुआई के 20-25 दिनों के बाद ही खेतों की पहली निकाई गुड़ाई कर लेनी चाहिए और दूसरी आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। यह ध्यान रहे की Peg निकलने की अवधि (35-45 दिनों) के बाद निकाई-गुड़ाई नहीं करनी चाहिए।

रोग के लक्षण एवं नियंत्रणः इस क्षेत्र में पत्र लांक्षण (Tikka) मूंगफली की प्रमुख बीमारी है। Cercospora फफूंद इस बीमारी का रोग कारक है। जिनकी वृद्धि अपेक्षित आर्दता (>80%) और अधिक तापमान (25-30°c) तथा देर तक पत्तियों का भींगा रहने पर उग्र रूप धारण कर लेता है। यह बीमारी दो अवस्थाओं में पौधे को संक्रमित करता है।

पहली अवस्था जब पौधा 30 दिन के आस-पास का हो जिसे अगात पत्र लांक्षण कहते हैं, इसका रोग कारक Micosphaerella Arachidis है। इसमें पौधे की निचली सतह पर गोलाकार से अनियमित आकार के गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते है। जिनके चारों और पीला घेरा होता है। ये धब्बे 1-10 मिली मीटर व्यास के हो सकते हैं। ये धब्बे बाद में काले रंग के हो जाते है। ऊपर की पत्तियों में भी इसका प्रकोप उग्र अवस्था में देखने को मिलता है। दूसरा पिछात पत्रलांक्षण Phaeosoriopsis Personata के द्वारा होता है। इसमें भी पौधे की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के गोल धब्बे बनते हैं जिनका व्यास 1-6 मिली मीटर का होता है पर इसमें पीला घेरा नहीं बनता है। इस बीमारी से 20-25 प्रतिशत उपज में कमी हो जाती है। इस बीमारी से बचने के लिए पौधों के 20-25 दिन होने पर Compaion या SAFF की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बना कर 15 से 20 दिनों के अंतराल में दो बार छिड़काव करनी चाहिए।

Collar rot: इसे Seedling Blight भी कहते हैं। इसका रोग कारक Aspergillus Niger नामक फफूँद हैं। इस रोग से 28-50 प्रतिशत पौधे मर जाते हैं। इस रोग के लक्षणों में अंकुरण से पहले बीजों का सड़ना तथा हाइपोकोटाइल का सड़ना प्रमुख है परन्तु अंकुरण के बाद पौधा का सड़न भी मुख्य लक्षण है; रोग कारक मिट्टी में पनपते है। ये बीज के अन्दर या सतह पर भी चिपके रहते हैं। इसके प्रबंधन हेतु Tricoderma Harzianum अथवा Trichoderma Virdie @ 4 ग्राम/कि.ग्रा. बीज दर से बीज उपचार करने से इस रोग का निदान संभव है। मिट्टी में नीम या अंडी की खल्ली 5 क्विटल/हेक्टेयर के दर से मिलाने पर इस रोग की तीव्रता में कमी पाई गई है।

हरदा रोग (Rust): इसका रोग कारक Puccinia Arachnids है। इस रोग में पत्तियों पर नारंगी रंग के उभरे हुए Pustules बनते हैं जो कि पत्तियों के निचली सतह पर विद्यमान होते है। बाद में फटकर यूरेडास्पोर लाली लिए हुए भूरे रंग का दिखता है। जब पौधो में फूल एवं फली आने प्रारम्भ होते हैं तो इनका संक्रमण होता है। रोग के लक्षण दिखते ही Tilt 25 EC@1.0 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बना कर दो बार 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करने से रोग से छुटकारा पाया जा सकता है।

कीट एवं नियंत्रणः

भूआ पिल्लूः इस कीट के पिल्लू का सर, पीठ एवं शरीर पीले रंग का होता है तथा काले मटमैला रंग के बाल से ढका होता है। इस कीट का आक्रमण सितम्बर के दूसरे सप्ताह में फसल में दिखने लगता है। नवजात शिशु झुंड में पत्तियों के ऊपरी सतह कागज के समान दिखाई पड़ती है। इसके नियंत्रण हेतु प्रारंभिक अवस्था में ही भुआ पिल्लू से ग्रसित पत्तियों को जमा करके मिट्टी में दबा देना चाहिए। क्योंकि बड़े एवं रोंयेदार होने पर इस कीड़े को नियंत्रित कर पाना बहुत कठिन होता है। अतः प्रारंभिक अवस्था में Dichlorophos (0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव या Quinialphos या Endosulphan तरल (1.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी), तथा टिपोल 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर के साथ घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

तना बेधकः इस कीट के शरीर पर धारीदार चमक होती है तथा गहरा भूरा रंग का होता है। नवजात भृंगक तने में छेद करके अंदर घुस जाता है एवं उसे भीतर ही भीतर खाते रहता है। कभी-कभी भृंगत तना से नीचे की तरफ खाना शुरू करता है जिसके कारण तने में सुरंग बन जाती है फलतः पौधा सूख जाता है। इस कीट से बचाव के लिए बुआई से पहले बीज को क्लोरपारीफॉस 20 ई.सी से बीजोपचारित करना चाहिए।

कटाई एवं भंडारणः झारखण्ड में फसल की कटाई अक्टूबर-नवम्बर माह में होती है। फसल तैयार होने की अवस्था में पौधों की निचली पत्तियाँ सूख कर झड़ने लगती है। फलियों के छः - सात दिन तक 40 डिग्री से कम तापमान पर सुखाना चाहिए। भंडारण के दौरान फली छेदक (Bruchid Beetle) फली को हानि पहुँचाते है। इसलिए जिस स्थान पर मूंगफली रखना हो वहाँ Dichlorophos तरल (3मि.ली. प्रति लीटर पानी) या Malathion 50EC (5मि.ली. प्रति लीटर पानी) के साथ घोल बनाकर 5 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर क्षेत्र में छिड़काव करे। फिर फलियों को साफ बोरों में भरकर लकड़ी की तख्तियों के ऊपर रखना चाहिए।

उपजः 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

सूचना प्रदाताःबिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष – 0651 – 2450610 फैक्स – 0651 -2451011/ 2450850

तीसी

तीसी की खेती

तीसी या अलसी (Linseed) का वानस्पतिक नाम Linum usitatissimum है। यह Linaceae कुल का पौधा है। यह झारखण्ड राज्य की प्रमुख रबी तेलहनी फसल है। सूखा रोधी होने के कारण इस फसल का महत्व और बढ़ जाता है। इसे राज्य़ में असिंचित अवस्था में सफलतापूर्वक उगाय़ा जाता है। शुद्ध फसल के अलावे धान की खड़ी फसल में तीसी पैरा (उत्तरा) फसल के रूप में ली जाती है।

तीसी, तेल और रेशा उत्पादन करने वाली फसल है। तीसी के दानों का प्रयोग तेल निकालने के लिए किया जाता है। तीसी में 35 से 45 प्रतिशत तेल हेता है। इसका बीज खाने के काम में भी आता है। औषधि में भी इसका प्रय़ोग होता है। किसान उसके उत्पादन का 20 प्रतिशत ही तेल के रूप में उपय़ोग करते हैं और 60 प्रतिशत तेल का प्रय़ोग, उद्योग व्यवसाय में पेंट, वार्निस, तैलीय कपड़ा, लीनोलियम, पैड इंक और प्रिटिंग इंक बनाने के काम में लाया जाता है। इसकी तेल की खल्ली दुधारू गय के लिए बहुत उपयोगी है। तीसी की खल्ली खाद के रूप में भी प्रयोग की जाती है। इसमें 5 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है। तीसी के तने के रेशे बहुत मजबूत और टिकाऊ होते हैं। इसके रेशा मुलायम होने के कारण ऊन, सिल्क और सूती कपड़ों में मिलाया जाता है। तीसी के तने के टुकड़े एवं‌ छोटे रेशों से अछी गुणवत्ता वाली कागज तैयार की जाती है। नया रुखड़े और मजबूत तने के रेशों से कम कीमत के टाइल्स और प्लास्टिक आधारित पॉलिस्टर बनाये जाते हैं।

तीसी का क्षेत्रफल वर्ष 2003-04 में वि•श्व में 2.45 मिलियन हेक्टेयर, उत्पादन 2.1 मिलिय्न मिलियन टन, एवं‌ उत्पादकता 851 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था। भारत वर्ष में तीसी का क्षेत्रफल करीब 5.25 लाख हेक्टेयर है, तथा उत्पादन 2.12 लाख टन एवं उत्पादकता 403 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। झारखण्ड राज्य में वर्ष 2004-05 में तीसी का क्षेत्रफल करीब 16 हजार हेक्टेयर, उत्पादन 6 ह्जार टन एवं‌ उत्पादकता 379 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। झारखण्ड में पश्चिमी सिंहभूम, गोड्डा, पलामू व गढ़वा मुख्य तीसी उगाने वाले जिले हैं।

जलवायु: तीसी रबी मौसम की फसल है जो अक्टूबर-नवम्बर में बोई जाती है तथा मार्च-अप्रैल में तैयार हो जाती है। फसल उगाने के समय अधिक तापक्रम का उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही, तेल की गुणवता भी प्रभावित होती है। रेशों वाली फसल की वृद्धि के लिए ठंडा वातावरण लाभप्रद है। फसल तैयार होने के समय सूखा वातावरण फसल की परिपक्वता में सहायक होता है।

भूमि का चुनाव एवं तैयारी: तीसी की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जाती है, परन्तु मध्यम जमीन की भारी एवं गहरी मिट्टी, जिसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है, तीसी के लिए उपयुक्त्त है। खेत की अच्छी तैयारी हेतु दो-तीन जुताई करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चलाना आवश्यक है जिससे नमी संरक्षित रहे तथा अंकुरण अच्छा हो। तीसी को दीमक के प्रकोप से बचाने के लिए खेत की अन्तिम जुताई के समय लिन्ड़ेन धूल 25 किलाग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें।

उन्नत प्रभेद: क्षारखण्ड राज्य के लिए अनुशंसित प्रभेद हैं-

  • टी 397: भूरा एवं छोटा बीज, मध्यम एवं नीले रंग के फूल, फसल तैयार हेने की अवधि 125 दिन, सिंचित अवस्था में औसत उपज 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा तेल की मात्रा 44 प्रतिशत होती है। यह किस्म सिंचित, असिंचित तथा पैरा (उत्तरा) खेती के लिए उपयुक्त्त है।
  • श्वेता: भूरा एवं छोटा बीज, मध्यम एवं सफेद रंग के फूल, फसल तैयार होने की अवधि 135 दिन, औसत उपज 900 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा तेल की मात्रा 44 प्रतिशत होती है। यह सिंचित व असिंचित खेतों के लिए उपयुक्त्त है।

बीज दर: 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सत्यापित या प्रमाणित बीज बोयें। धान की खड़ी फसल में बालियाँ पकने की अवस्था में कटाई से 15 दिन पूर्व खड़ी फसल में पैरा खेती के लिए 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज का छिड़काव करें।

बीजोपचार: फसल को रोगों से छुटकारा के लिए 2 ग्राम बेविस्टीन या 3 ग्राम थीरम अथवा 3 ग्राम केपटॉन कवकनाशी से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर बोयें।

बुआई का समय: असिंचित अवस्था में बुआई मध्य अक्त्तूबर में करें, अन्यथा बीज अंकुरण में नमी की कमी बाधा बन जाती है। यदि खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध हों तो

बोने की अवधि मध्य नवम्बर तक बढ़ाई जा सकती है। सिंचित अवस्था में इसकी बुआई मध्य नवम्बर तक की जा सकती है।

बुआई की विधि: बीजों की बुआई नमी की उपलब्धता के अनुसार 4 से 5 सेंटी मीटर की गहराई में करनी चाहिये। पंक्तियों के बीच की दूरी 25 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिये।

उर्वरक की मात्रा: तीसी की खेती के लिए किसान जैविक खाद या गोबर खाद या उर्वरक का प्रयोग नहीं करते हैं। जिसके अभाव में पौधे को उचित मात्रा में पोषक तत्व नहीं मिल पाता है। अंतत: पौधों का विकास ठीक से नहीं होता और उपज में भारी कमी आ जाती है। गोबर खाद 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिये जिससे 25 प्रतिशत उर्वरक का बचत हो जाता है। असिंचित अवस्था में नेत्रजन 30 किलोग्राम, स्फुर 20 किलोग्राम, पोटाश 20 किलोग्राम और स्ल्फर २० किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुआई के समय ही देनी चाहिए। सिंचित अवस्था में नेत्रजन 50 किलोग्राम, स्फुर 30 किलोग्राम, पोटाश 20 किलोग्राम, तथा सल्फर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर डालना चाहिये। सिंचित अवस्था में नेत्रजन की आधी मात्रा, स्फुर पोटाश एवं गंधक की पूरी मात्रा बुआई के समय डालें। नेत्रजन की शेष मात्रा बुआई के 30-35 दिनों बाद पहली सिंचाई के बाद टॉपड्रेसिंग के द्वारा डालें। पैरा खेती के लिए धान की फसल कटने के बाद खेत में पर्याप्त नमी रहने पर 25 किलोग्राम नेत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के 25-30 दिन बाद यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें। स्फुर की मात्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट या इफको (IFFCO) (20:20:0:13) के द्वारा दें जिसमें गंधक भी होता है।

तीसी का अन्तरवर्ती खेती: तीसी की तीन कतारों के बाद एक कतार चना या सरसों बोना चाहिए। इससे कीटों का प्रकोप कम होता है तथा अच्छी उपज मिलती है। चना की पंत G-114 तथा सरसों की शिवानी अच्छी पायी गयी है।

सिंचाई: इस फसल के लिए एक या दो सिंचाई पर्याप्त होती है। सिचाई पौधे के बढ़ने, फूल आने तथा फली बनने के समय करनी चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण: एक या दो निकाई-गुड़ाई खेतों में खरपतवार के मुताबिक कर देने से इसका नियंत्रण हो जाता है तथा पौधों की जड़ों में वायु संचार भी ठीक हो जाता है।

पौधा रोग नियंत्रण: तीसी में मुख्य रूप से उकठा (Wilt), पत्ती अंगमारी (Leaf Blight), हरदा (Rust) तथा चूर्णी असमिता (Powdery Mildew) रोग लगते है। उकठा, पत्ती अंगमारी, हरदा तथा चूर्णी असमिता फकूँद रोग है। रोग नियंत्रण के लिए बीजोपचार का व्यवहार अवश्य करें। T-397, Leaf Blight तथा Rust रोग के लिए रोगग्राही (Susceptible) है। उकठा रोग बुआई के 15-20 दिनों बाद आता है तथा इसमें पौधा पहले मुरझाकर फिर सूख जाते हैं। पत्ती अंगमारी रोग बुआई के 25 से 45 दिन बाद आता है। इसमें पत्तों पर भूरे रंग के छोटे-छोटे गोल धब्बे दिखाई देते है। चूर्णी असमिता रोग जनवरी के अंत से फरवरी अंत तक दिखाई देता है। इसमें पौधों पर सफेद रंग का चूर्ण दिखई देता है। हरदा रोग फरवरी-मार्च में आता है तथा पौधों की पत्तियों व डंठलो पर गहरे भूरे रंग का Postules दिखाई देतें है। खड़ी फसल में पत्ती अंगमारी तथा हरदा रोग नियंत्रण के लिए 2 ग्राम इन्डोफिल M-45 या 3 ग्राम ब्लाईटाक्स 50 प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। चूर्णी असमिता रोग नियंत्रण के लिए 3 ग्राम सलफेक्स (Sulfex) प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करें।

कीट नियंत्रण: कली मक्खी (Bud Fly) तीसी का प्रमुख हानिकारक कीट है। तीसी की आगात बुआई, यथासंभव अक्टूबर के तृतीय सप्ताह तक अवश्य करें। तीसी की कीट रोधी प्रभेद टी-397, श्वेता, शुभ्री, लक्ष्मी, नीला, रश्मी, व मुक्त्ता है। इस कीट के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रीड 17.8 EC का 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर कली (Bud) बनने से पहले 15 दिनों के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करें। कली मक्खी की रोकथाम के लिए बरानी व पैरा खेती की अवस्था में मिथाईल पाराथियान 2 प्रतिशत अथवा क्वीनालफॉस 1.5 प्रतिशत धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह की बेला में खड़ी फसल में दो बार भुरकाव करें। पौधों में कली बनने की प्रारंभिक अवस्था में कीटनाशी धूल का पहला भुरकाव तथा 15 दिनों के बाद दूसरा भुरकाव करें। इसके अलावे भूआ पिल्लू (Bihar Hairy Catterpiler) का प्रकोप बुआई के एक माह तक की अवस्था में होता है। इसकी रोकथाम के लिए मिथाईल पैराथियान या क्वीनालफास धूल का उपरोक्त्त दर से भुरकाव करें।

कटनी एवं दौनी: तीसी फसल की कटाई मार्च महीने में की जाती है। पौधों को हँसियें से जमीन के नजदीक से काटा जारा है। कटाई तब शुरू करनी चाहिये जब इसके तने निचले भाग से पीला होने लगे, उपरी भाग हरा ही रहे तथा फलियाँ भूरे रंग की होने लगे। काटी गई फसल को भली भाँति सुखा लेना चाहिये। सूखने के बाद लकड़ी की छड़ी एवं डंडों से पीट-पीट कर दौनी करनी चाहिय। तीसी को तेज बहती हुई हवा में थोड़ी ऊँचाई से धीरे-धीरे इस प्रकार गिराया जाता है कि भूसी उड़कर दूर चली जाती है और दाने नीचे इकट्ठे हो जाते हैं।

भंडारण: बीज को अच्छी तरह सुखाया जाता है तथा वायुरुध पैकेट में भंडारित किया जाता है। भंडरण के समय बीजों में नमी की मात्रा 7 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिये।

उपज क्षमता: सिंचित: 9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

असिंचित या पैरा: 5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

सूचना प्रदाताः

बिरसा कृषि वि•श्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष- 0651 240610, फैक्स- 0651 2451011/2450850
मोबाईल- 94319 58566

तोरी-राई

उन्नत प्रभेद

: बी.आर.-23,टी-9

पी.टी.-303

शिवानी,वरुणा,पूसा,बोलड,क्रन्ति

बी.आर.-40

बोआई

: बीस सितम्बर से

दस अक्टूबर तक।

पहली अक्टूबर से

बीस अक्टूबर तक।

कतारों की दूरी

: 30 सें.मी.

30 सें.मी.

पौधों की दूरी

: 10 सें.मी.

10 सें.मी.

बीज दर

: 4-5 कि./ हे.

6-8 कि./ हे.

उर्वरक

: यूरीया 55 कि,एस.एस.पी.156 किलो तथा एम.ओ.पी.33 किलो./ हे.।

 

खाद की पूरी मात्रा बोआई के समय। सिंचित अवस्था में मात्रा दूनी दें।

 

उपज

: 4-5 क्विं./ हे.

8-10 क्विं./ हे.

तेल की मात्रा

: 49.2 प्रतीशत

42 प्रतीशत

कटाई

: पौधों के 75 प्रतीशत भाग

पीले पड़ने पर कटाई

पौधों के 75 प्रतीशत भाग

पीले पड़ने पर कटाई

कुसुम (Safflower-Kusum)

जमीन की तैयारी : अगात धान काटने के तुरंत बाद दो-तीन जुताई करें एवं पाटा देना ना भूले। ऐसा करने से भूमि की नमी संरक्षित रहेगी।

बोआई का समय : मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक बोआई अवश्य कर डालें। अधिक ठंडक पड़ने से अंकुरण पर बुरा असर पड़ता है।

बीज दर : 15-20 कि.ग्राम./ हे.

कतार से कतार : 30 -45 सें.मी. की दूरी

उन्नत प्रभेद : ए., -300 अक्षागिरी -59-2-1

उर्वरक : 44 कि. यूरिया,125 कि. सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 34 कि. म्यूरियट ऑफ पोटाश प्रतिहे.की दर से बोआई के समय ही व्यवहार करें।

निकाई-गुड़ाई : प्रारम्भ में इसकी वृद्धी बहुत कम होती है । इस लिये खर-पतवार में फसल की प्रतिस्पर्द्धा अधिक होती है । अंत : एक माह के अन्दर इनकी निकाई गुडाई आवश्यक है।

पौधा सरक्षण : इस फसल में बीमारी तथा कीड़ों का प्रकोप कम होता है,लेकिन कभी-कभी काली लाही का आक्रम होता है । अत : इसके नियंत्रण के लिये क्लोपाईरीफॉस , रोगर -35 ई.सी. का छिड़काव पंद्रह दिनों के अंतराल पर दो बार करें।

सोयाबीन

उन्नत किस्में : बिरसा सोयाबीन -1, जे.एस. 80-21,अलंकार

बीज दर : 75-80 किलोग्राम प्रति हेक्टयर ।

कतार से कतार : 45 सें.मी. की दूरी

बोआई का समय : 20 जून से 10 जुलाई तक । मानसून की वर्षा के शिध्र बाद, परन्तु खेत में पानी की मात्रा बीज उगने के उपयुक्त होनी चाहिए।

बीज उपचार : बीज में 2.5 -3 ग्राम थीरम या केप्टान अथवा बैविस्टीन प्रती किलोग्राम बीज के हिसाव से मिलादें । ऐसा करने से बीज द्वारा आनेवाली बीमारियाँ नष्ट हो जाती हैं।

खाद की मात्रा : जिस खेत में सोयाबीन पहली बार बोई जा रही हो , वहाँ बीज को जीवाणु खाद (राईजोबियम कल्वर) से उपचारित करने से अच्छी उपज होती है। जीवाणु खाद बिरसा कृषि विश्वविद्यालय से प्राप्त की जा सकती है। इस जीवाणु खाद के इस्तेमाल की विधि पैकट के ऊपर लिखी होती है। अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 8-10 बैलगाड़ी कम्पोस्ट प्रतिहेक्टेयर डालकर 44 किलोग्राम यूरीया , 500 सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 34 किलोग्राम म्यूरियट ऑफ पोटाश बीज बोने वाली लाइनों में डालकर मिट्टी में मिला दें । खाद के साथ ही 25 किलोग्राम 10 प्रतीशत लिण्डेन की धूल भी मिला दें।, जिससे खेत से दीमक आदि कीड़े नष्ट हो जायें।

भूमी तथा मिट्टी उपचार : पानी के अच्छे निकास वाली हलकी दोमट मिट्टी ,जिसका पी.एच 6.5 या अधिक हो, सोयाबीन की खेती के लिए उत्तम हैं। पठारी अम्लिक भूमी से मिट्टी परीक्षण के अनुसार चूना 3-4 क्वि./ हे. बोने के समय ही नालियों में डाल दें।

कटनी और भंडारण : जब सभी पत्तियाँ पीली हो कर झड़ जायें तो कटनी कर लेनी चाहिए। कटे हुये पौधों को दो-तीन दिनों तक सूखाने के बाद डण्डे से पीटकर बीज निकालें। बीजों को अच्छी तरह सूखा कर ही भंडारण करें।

सरगुजा

सरगुजा (Niger) झारखण्ड राज्य की एक प्रमुख तेलहनी फसल है। सरगुजा को रामतिल के नाम से भी जाना जाता है। इसका क्षेत्रफल करीब 7 हजार हेक्टेयर है और औसत उपज 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। झारखण्ड राज्य में इसकी खेती खरीफ में कुछ विलम्ब से की जाती है। पठारी क्षेत्रों के किसान इसकी खेती सदियों से करते आ रहे हैं। इसके तेल को खाने के अलावा दवाई के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। किसान इसकी खेती अधिकतर कम उपजाऊ वाले जमीन में करते हैं। इसलिए इसकी उत्पादकता काफी कम हो जाती है। यह फसल जनजातीय क्षेत्रों की सीमांत और उप-सीमान्त भूमि में व्यापक पैमाने पर लगाई जाती है। अच्छी गहराई और अच्छी बनावट वाली दोमट मिट्टी में जहाँ पानी की निकासी की अच्छी व्यवस्था होती है, यह फसल अच्छी उपज देती है। विषम परिस्थितियों में द्वितीय फसल के रूप में गुन्दली, उड़द व गोड़ा धान काटने के बाद इसकी खेती इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर की जाती है। तेल की मात्रा 35 से 45 प्रतिशत एवं प्रोटीन की मात्रा 25 से 35 प्रतिशत होने के कारण यह फसल महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्नत कृषि तकनीकों को नहीं अपनाने के कारण उन्हें कम उपज प्राप्त होती है। किसानों द्वारा सरगुजा की कम उपज प्राप्त होने के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-

  • उन्नत किस्मों के बीजों का अभाव
  • खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग न करना,
  • बीजों को छींटकर लगाना,
  • पौधा संरक्षण के उपाय नहीं अपनाना तथा
  • प्रशिक्षण एवं प्रसार कार्यों का अभाव।

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उन्नत कृषि तकनीकों पर ध्यान देना आवयक है।

खेत की तैयारी: देशी हल के द्वारा खेतों को दो बार गहरी जुताई कर पाटा लगा देने से खेत सरगुजा की बुआई के लिए अच्छी तरह तैयार हो जाती है। अंतिम जुताई के समय लिंडेन धूल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन में मिला देने से दीमक का प्रकोप कम होता है।

उन्नत किस्में: झारखण्ड राज्य के लिए बिरसा नाईजर- 1 एवं बिरसा नाईजर- 2 उन्नत किस्मों को अनुशंसित किया गया है। बिरसा नाईजर- 1 किस्म 100 दिनों में पक जाती है। इसकी उपज क्षमता 7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है एवं बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है। बिरसा नाईजर-2, 90 दिनों में पकने वाली सबसे कम अवधि की किस्म है। इसकी उपज क्षमता 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है एवं बीजों में 39 प्रतिशत तेल पाया जाता है।

बीज दर: इस फसल के लिए पक्तियों में लगाने पर 6 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है, परन्तु छिड़काव विधि से बुआई करने पर प्रति हेक्टेयर 8 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है।

बीज उपचार: बीज जनित या मृदा जनित रोगों से फसल को बचाने के लिए बोने से पहले बीजों को थीरम या कैप्टन 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

बुआई का समय: सरगुजा की बुआई मुख्यत: दो समय पर की जाती है। खरीफ की फसल के लिए बुआई का उपयुक्त समय जुलाई से अगस्त का तीसरा सप्ताह, तथा द्वितीय फसल के लिए सितम्बर के दूसरे सप्ताह से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह का समय उपयुक्त है।

बुआई की विधि: फसल को छिड़काव विधि से लगाने की अपेक्षा कतारों में लगाने से अधिक उपज प्राप्त होती है। अत: फसल को कतारों में ही लगाये। कतारों से कतारों की दूरी 30 सेंटीमीटर, तथा पौधो से पौधों की दूरी 10-15 सेंटीमीटर रखने से पौधों की संख्या 2 से 2.5 लाख प्रति हेक्टेयर होती है। बीजों के समान वितरण हेतु बीज को दस गुने गोबर की खाद या बालू में मिलाकर बुआई करनी चाहिए।

रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग: अच्छी उपज के लिए 20:20:20 किलोग्राम नाइट्रोजनःफॉस्फोरसःपोटैशियम प्रति हेक्टेयर (45 किलो ग्राम यूरिया, 130 किलो ग्राम सिंगल सुपर फॉस्टफेट, एवं 32 किलो ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश) प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए। नेत्रजन की आधी तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा बुआई के 25-30 दिनों के बाद निकाई-गुड़ाई करने के बाद यूरिया द्वारा डालनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण: बुआई के 20-25 दिनों बाद खेत से खरपतवार खुरपी द्वारा निकाल देनी चाहिए। साथ ही, अनावश्यक पौधों की छंटनी कर देनी चाहिए। दो बार गुड़ाई कर खरपतवार पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

पौधा संरक्षण: अधिक उपज के लिए पौधा संरक्षण बहुत जरूरी है। वैसे इस फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप बहुत कम होता है। कीटों में मुख्यत: भुआ पिल्लू का आक्रमण होता है। छोटी अवस्था में यें अधिकतर पत्तियों के नीचे गुच्छों में रहते हैं। ये नई पत्तियों को खा जाते हैं, जिससे पौधों की बढ़वार नहीं हो पाती है। इस अवस्था में उनकी रोकथाम करना आसान होता है। ऐसे समय में उन पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देनी चाहिए या फसल के ऊपर कीटनाशक दवा के रूप में Nuvan 100 का 300 मिली लीटर, 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करनी चाहिए।

चूर्णी फफूँद (Powdery Mildew) रोग फसल को प्राय: नुकसान पहुँचाती है। इस रोग में पत्तियों पर छोटे-छोटे रुई के समन सफेद धब्बे बनते है जो बाद में पूरी पत्तियों में फैल जाते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पत्तियाँ पूरी तरह सड़ जाती है। इस रोग से फसल को बचाने के लिए 0.3 प्रतिशत सल्फेक्स का छिड़काव करना चाहिए। चूर्णी फफूँद रोग के अतिरिक्त Cercospora और Alternaria फफूँद के कारण पत्र लाँछन रोग का आक्रमण होता है। रोग के कारण पत्तियों पर अनियमित आकार के गोल धब्बे बनते हैं। रोग के लक्षण देखते ही इन्डोफिल M-45 के 2 ग्राम फफूँद नाशक को प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 बार छिड़काव करें।

कटाई एवं गुड़ाई: फसल पकने पर पौधों की पत्तियाँ तथा सिरे भूरे रंग के हो जाते हैं और सूखने लगते है। ऐसे समय में फसल की कटाई करनी चाहिए। पौधों को कुछ दिनों के लिए सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए। सूखने पर डंडा से पीटकर बीजों को अलग करके सफाई कर लेनी चाहिए। बीजों को भली-भाँति साफ एवं सुख़ाकर भंडारण करनी चाहिए। इसके लिए मिट्टी के बर्त्तनों य़ा कोठी या Bins का उपयोग करना चाहिए।

संभावित उपज: उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाने से फसल की औसत उपज 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो सकती है।

फसल पद्धति: क्रमिक फसल के रूप में गुंदली-सरगुजा, आगात घान (गोड़ा)- सरगुजा, तथा उड़द- सरगुजा की खेती सफलतापूर्वक की सकती है।

सूचना प्रदाताः

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष- 0651 2450610, फैक्स- 0651 2451011/2450850
मोबाईल - 94319 58566

कम लागत की मूँगफली उत्पादन तकनीकी

राई-सरसों में एकीकृत नाशीकीट प्रबंधन

सोयाबीन आधारित भोज्य पदार्थ उद्यमिता विकास में सहायक

तिलहनी फसलों की उत्पादन तकनीक

न्यूनतम समर्थन मूल्य

वाणिज्यिक फसलें

गन्ना

झारखण्ड में ईंख की खेती Sugarcane Production

झारखण्ड प्रदेश में ईंख की व्यावसायिक खेती गुड़ बनाने एवं इसका रस पीने के लिए की जाती है। ईंख एक नकदी फसल है, इसे एक वर्ष रोपकर दो खूँटी फसल के साथ लगातार तीन वर्षों तक उपज लिया जा सकता है। झारखण्ड राज्य के करीब 500 हेक्टेयर में गन्ना की खेती होती है। प्रमुख जिलों जैसे राँची, गुमला, गोड्डा, गढ़वा, कोडरमा, लोहरदगा आदि में इसकी खेती ज्यादातर की जाती है।

मिट्टी एवं खेत की तैयारीः ईंख की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जाती है परन्तु दोमट मिट्टी तथा ऊँची या मध्यम जमीन, जहाँ जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो अधिक उपयुक्त है। ईंख की जड़े मिट्टी में काफी गहराई तक जाती है इसके लिए खेत की गहरी जुताई आवश्यक है। साधारणतया दो जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रैक्टर से करनी चाहिए। उसके बाद देशी हल से जुताई कर पाटा चला देना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी होकर उसमें अच्छा वायु संचार हो जाय।

रोपाई का समयः रोपाई का समय तापमान पर निर्भर करता है, इसके लिए औसत तापक्रम 24 डिग्री से 32 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त पाया जाता है। इस आधार पर दो मौसमों यानी शरदकालीन में 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक एवं बसंतकालीन में 15 फरवरी से 15 मार्च तक इसकी बुवाई की जाती है। शरदकालीन रोपाई में ईख की उपज बसंतकालीन रोप की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक होती है।

अनुशंसित प्रभेद: अनुशंसित प्रभेद की ही बुवाई करनी चाहिए जिसकी उपज क्षमता अच्छी हो, एवं उसमें रस की प्रचूर मात्रा के साथ-साथ खूटी फसल भी ली जा सके। BO 147 एक मुख्यकालीन प्रभेद है जिसे विश्वविद्यालय ने अनुसंधान के बाद अनुशंसित किया है। यह 12 महीने में तैयार हो जाती है, इसकी उपज क्षमता एवं रस में सुक्रोज की मात्रा अधिक है।

कुछ उन्नत प्रभेद:

जलदी पकने वाली किस्में

बी.. 90: यह एक मध्य मोटाई एवं जल्दी पकने वाली लाल विगलन रोग रोधी तथा 850 क्विं हे.उपज देने वाली प्रजाति है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।

सी..पी.-2: इस प्रजाति में ज्यादा कल्ले निकलतें हैं। यह लाल विगलन रोधी हैं तथा उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।

मध्यम तथा देर से

बी.. 70: लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में कटने योगय तैयार हो जाती है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत।

बी.. 90: मध्यम मोटाई, हरा रंग, लम्बा व अधिक कल्ले पैदा करने वाली प्रजाति ।रोग रोधी उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत।

सी..पी.-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर।

बी..-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। पेड़ी के के लिये उपयुक्त।

बी..-88: लाल विगलन रोग रोधी । अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1000 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत होती है।

सी.. 1158 तथा : लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 950 क्विंटल/ हेक्टेयर। अधिक कल्ले, सी.ओ. 1148 औसत शर्करा की मात्रा 10.3 प्रतिशत होती है।

बीज का चुनाव: ऐसे बीज का चुनाव करें जिसकी आँख स्वस्थ हो एवं रोग कीट रहित हो। दस महीने की फसल बीज के लिए उपयुक्त होती है। जहाँ तक संभव हो पौधे के उपरी दो-तिहाई हिस्से को ही बीज के रूप में लेना चाहिए एवं कोशिश यह करनी चाहिए कि खूटी फसल से बीज नहीं लें।

रोपाई का समय: शरदकालीन गन्ना – अक्टूबर

बसन्तकालीन गन्ना – फरवरी

गन्ने की फसल की बोआई में गन्ना के तीन आँख वाला टुकड़ा अच्छा रहता है। बीज टुकड़ों को कवक आदि से बचाने के लिये 1 ग्राम थिरम व 1 ग्राम बैविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर दो घंटो के लिये डुबो दिया जाता है। बीज टुकड़ों को विषाणु मुक्त करने के लिये 540 से.ग्रे. तापमान वाले पानी में 2 घंटे उपचारित करना आवश्यक है।

बीज की मात्राः करीब 40,000 से 45,000 तीन आँखों वाले गुल्ले एक हेक्टर के लिए उपयुक्त है, जो करीब 60 क्विंटल गन्ने से प्राप्त होते हैं।

रोपनी की दूरी : पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेन्टी मीटर तक रखते हैं एवं बीज को 30 सें.मी. की गहराई पर डालते हैं।

बीजोपचार: बीज (गुल्लों) को 0.2% कार्बेन्डाजिम (दो ग्राम प्रति लीटर पानी में) आधा घंटा तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। दीमक,जड़ छेदक एवं धड़ छेदक के रोकथाम के लिए क्लोरपाईरीफास 20 EC का 3 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 500 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से नालियों में बिछाई गई गेड़ियों पर छिड़काव कर मिट्टी से ढक दें।

रोपाई की विधिः ईंख रोप की दो अनुशंसित विधियाँ है : सिराउर विधि तथा ट्रेंच विधि। सिराउर विधि में 90 सें.मी. की दूरी पर खोले गये सिराउर (Furrow) के अनुशंसित खाद की मात्रा डालकर देसी हल से मिट्टी में मिला दें एवं उपचारित गुल्लियों को आँख से आँख मिलाकर बिछा देना चाहिए। उसके बाद शीघ्र ही सिराउर को ढ़क कर पाटा चला देना चाहिए। ट्रेंच विधि में भी 90 सें.मी. की दूरी पर रीजर द्वारा सिराउर खोला जाता है। इसके बाद कुदाली से 30 सें.मी. चौड़ी तथा 30 सें.मी. गहरी ट्रेंच या नाली बनाई जाती है एवं गुल्लियों को बिछा कर ढक दी जाती है।

खाद एवं उर्वरक: 10 टन कम्पोस्ट या सड़े हुए गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में एक माह पहले डालकर अच्छी तरह मिला दें। रासायनिक खाद यानि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की क्रमशः 170 किलो, 85 किलो एवं 60 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए। रोपाई के समय फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा डाल देनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची मात्रा को दो बराबर भागों में बाँटकर देना चाहिए। पहली टॉपड्रेसिंग 60 किलो नेत्रजन शरदकालीन गन्ने में बुवाई के दो महीने बाद तथा बंसत कालीन गन्ने में बुआई के 45 दिनों बाद करनी चाहिये। टॉपड्रेसिंग से पहले खरपतवार निकालकर पहले सिचाई करें फिर उसके दो दिन बाद यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें। दूसरी टॉपड्रेसिंग (60 किलो नेत्रजन) जून माह के दूसरे पखवाड़े में वर्षांत के बाद खरपतवार निकालकर यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें तथा मिट्टी चढ़ा दें।

निकाई-गुड़ाई: साधारणतया ईंख में दो कमौनी, एक 45-50 दिनों के बाद एवं दूसरा 65-70 दिनों के बाद फसल के लिए उपयुक्त है। खरपतवार नष्ट करने के लिए रसायन एट्राजीन का ढाई से 3 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के तीन दिनों के अन्दर छिड़काव करना चाहिए। पुनः 60 दिनों के बाद 2-4D तृण नाशक दवा 1.25 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से काफी लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त मई के मध्य में एक गुड़ाई से खरपतवार नियंत्रण रहता है।

सिंचाई: रोपाई के लगभग 25 दिनों के बाद सिंचाई करें एवं 20 दिनों के अन्तराल पर बराबर पानी डालें। शरदकालीन रोप में 6-7 सिंचाई एवं बसंतकालीन में 4-5 सिंचाई की आवश्यकता मानसून के पहले तक होती है।

मिट्टी चढ़ाना: मानसून की पहली वर्षा में यूरिया का टॉपड्रेसिंग कर मिट्टी चढ़ा दी जाती है एवं बरसात का पानी निकलने की नाली बना दी जाती है।

सूखी पत्तियों को हटानाः सूखी पत्तियों को पाँचवे से सातवें महीने में धीरे से पौधे से अलग कर देना चाहिए।

स्तम्भनः फसल को बरसात के दिनों में तेज हवा एवं आँधी के कारण गिरने से बचाने के लिए अगस्त से मध्य सितम्बर तक पत्ती रस्सी विधि से स्तम्भन कर दें। इसके लिए ईख की आमने- सामने की पत्तियों को एक दूसरे तक झुकाकर उसी की कुछ सूखी एवं पत्तियों से बाँध दें।

पौधा संरक्षण: स्वस्थ बीज एवं रोगरोधी प्रभेद को ही लगावें। रोग का सर्वेक्षण खड़ी फसल में करते रहना चाहिए। यदि कोई झुड़, लालसड़न या कलिका रोग से ग्रसित दिखें तो शुरू में ही सावधानी से उखाड़कर नष्ट कर दें। लाल सड़न रोग में रोगी तने के गूदे लाल रंग के हो जाते हैं। पत्तियों की मध्य शिराओं में भी लाल धब्बे बनते हैं।

कीट: कीटों में शीर्ष छेदक, पायरीला तथा श्वेत मक्खी आदि का प्रकोप ईंख फसल पर पाया जाता है। कल्ला, मूल एवं शीर्ष छिद्रक के प्रकोप के कारण बीच की पत्तियाँ सूख जाती है जिसे पिहका कहते हैं। निजात के लिए इमिडाक्लोप्रीड तरल (17.8%) या मोनोक्रोटोफाँस (368% तरल) या मिथाईल डिमेटान (25 EC) का एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव जून के अंतिम सप्ताह में तथा दूसरा अगस्त के प्रथम सप्ताह में अवश्य कर दें जिससे सभी कीटों का नियंत्रण हो जायेगा।

कटाई: मुख्यतया 12 महीनों में फसल तैयार हो जाती है। मुख्यकालीन प्रभेदो की कटाई 15 जनवरी से करें।

खूटी : मुख्य फसल की कटाई के सप्ताह भर के अन्दर खूटियों को तेज धार वाले यंत्र से काट देना चाहिए। मेड़ों को तोड़ देना चाहिए, इस प्रकिया से खूटी में कल्ले स्वस्थ तथा एक साथ निकलते हैं। खेत की खाली जगहों को अंकुरित टुकड़ों की रोपाई से भर देना चाहिए एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए।

उपज: शरद रोप से करीब 100 टन एवं वसंत रोप से 75 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।

सूचना प्रदाता-

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष- 0651 2450610, फैक्स- 0651 2451011/ 2450850

जटरोफा

रतनजोत का उपयोग जैव ईंधन, औषधि,जैविक खाद, रंग बनाने में, भूमि सूधार, भूमि कटाव को रोकने में, खेत की मेड़ों पर बाड़ के रूप में, एवं रोजगार की संभावनाओं को बढ़ानें में उपयोगी साबित हुआ है। यह उच्चकोटि के बायो-डीजल का स्रोत है जिसमें गैर विषाक्त, कम धुएँ वाला एवं पेट्रो-डीजल सी समरूपता है।

सामान्य नामः जंगली अरंड, व्याध्र अरंड, रतनजोत, चन्द्रजोत एवं जमालगोटा आदि।

वानस्पतिक नामः जैट्रोफा करकस (Jatropha Curcas)

जलवायु एवं मिट्टीः यह समशीतोष्ण, गर्म रेतीले, पथरीले तथा बंजर भूमि में होता है। दोमट भूमि में इसकी खेती अच्छी होती है। जल जमाव वाले क्षेत्र उपयुक्त नहीं हैं।

बीज दरः 5 किलो प्रति हेक्टेयर

बीजोपचारः जड़ सड़न तथा तना बिगलन के रोकथाम हेतु बीज उपचार 2 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के अनुसार थाइरेम, बेबिस्टीन तथा वाइटावेक्स के (1:1:1) मिश्रण को बीज में मिलाकर बोयें।

बोआई एवं रोपणः बीज अथवा कलम द्वारा पौधे तैयार किए जाते हैं। मार्च-अप्रैल माह में नर्सरी लगाई जाती है तथा रोपण का कार्य जुलाई से सितम्बर तक किया जा सकता है। बीज द्वारा सीधे गड्डों मे बुवाई की जाती है।

पौधे से पौधे की दूरीः असिंचित क्षेत्रों में 2x2 मीटर और सिंचित क्षेत्रों में 3x3 मीटर की दूरी रखी जाती है। गड्ढे का आकार 45x45 x45 (लम्बाई x चौडाई x गहराई) से.मी. होता है। रतनजोत के पौधों को बाड़ के रूप में लगाने पर दूरी 0.50 x 0.50 मी.(दो लाइन) रखी जाती है।

पौधशाला

(1) समतल क्यारीः 15 x15 से.मी. दूरी पर बीज बोयें। बोने के पूर्व बीज को 12 घंटो तक भिगोयें। तीन माह बाद स्वस्थ पौधों को रोपें।

(2) पॉली बैंगः बालू मिट्टी तथा कम्पोस्ट खाद (1:1:1) के मिश्रण को पॉली बैग (16"x12") में भरें। 2-3 बीज बोयें, सिंचाई करें तथा स्वस्थ पौधों की 3 माह बाद रोपाई करें।

रोपण की विधिः गड्डे में रेत, मिट्टी तथा कम्पोस्ट की खाद का मिश्रण 1:1:1 के अनुपात में भरें। नर्सरी में तैयार पौधों की रोपाई जुलाई माह से शुरू करें। कलम द्वारा तैयार करने हेतु लम्बाई 30-50 सेंटी मीटर व्यास, स्वस्थ, सुडौल चमकदार कई आँखों वाली निचली टहनियाँ चुनें।

परीक्षण में लगाई गई उन्नत किस्मे : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में देश के विभिन्न भागों से निम्न 12 किस्मों का परीक्षण चल रहा है।

GIE – नागपुर

PKVJ-DHW

PKVJ – MKV

TFRI -1

TFRI -2

RJ- 117

पंत जी – सेल 1

पंत जी – सेल 2

कल्याणपुर

मानकेश्वर

चाण्डक

बामुण्डा

RJ- 117, GIE- नागपुर बरमुण्डा अच्छी पाई गई। सरदार कृषि विश्वविद्यालय, बनासकान्ठा से विकसित SDAUJI किस्म भी अच्छी है।

खाद एवं उर्वरकः रोपण से पूर्व गड्ढे में मिट्टी (4 किलो), कम्पोस्ट की खाद (3 किलो) तथा रेत (3 किलो) के अनुपात का मिश्रण भरकर 20 ग्राम यूरिया 120 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 15 ग्राम म्युरेट ऑफ पोटाश डालकर मिला दें। दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरो पायरिफॉस पाउडर (50 ग्राम ) प्रति गड्डा में डालें, तत्पश्चात पौधा रोपण करें।

सिंचाई एवं गुड़ाईः शुष्क मौसम (मार्च से मई) में दो सिंचाई उत्तम रहती है। प्रत्येक तीन माह के अन्तराल पर खाद का प्रयोग तथा गुड़ाई करें।

खरपतवार नियंत्रणः नर्सरी के पौधों को खरपतवार नियंत्रण हेतु विशेष ध्यान रखें तथा रोपा फसल में फावड़े, खुरपी आदि की मदद से घास हटा दें। वर्षा ऋतु में प्रत्येक माह खरपतवार नियंत्रण करें।

रोग नियंत्रणः कोमल पौधों में जड़-सड़न तथा तना बिगलन रोग मुख्य है। नर्सरी तथा पौधों में रोग के लक्षण होने पर 2 ग्राम बीजोपचार मिश्रण प्रति लीटर पानी में घोल को सप्ताह में दो बार छिड़काव करें।

कीट नियंत्रणः कोमल पौधों में कटूवा (सूंडी) तने को काट सकता है। इसके लिए Lindane या Follidol धूल का सूखा पाउडर भूरकाव से नियंत्रण किया जा सकता है। माइट के प्रकोप से बचाव के लिए 1 मिली लीटर मेटासिस्टॉक्स दवा को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

कटाई-छँटाईः पौधों को गोल छाते का आकार देने के लिए दो वर्ष तक कटाई-छँटाई आवश्यक है। प्रथम कटाई में रोपण के 7-8 महीने पश्चात पौधों को भूमि से 30-45 से.मी. छोड़कर शेष ऊपरी हिस्सा काट देना चाहिए। दूसरी छँटाई पुनः 12 महीने बाद सभी टहनियों में 1/3 भाग छोड़कर शेष हिस्सा काट देना चाहिए। प्रत्येक छँटाई के पश्चात 1 ग्राम बेविस्टीन 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। अप्रैल और मई महीनों में छँटाई का कार्य करते हैं।

उपजः बरसात के समय में पौधे में फूल आना प्रारंभ हो जाता है तथा दिसंबर-जनवरी माह में हरे रंग के फल काले पड़ने लगते हैं। जब फल का ऊपरी भाग काला पड़ने लगे तब तोड़ा जा सकता है।

प्रथम वर्षः कोई बीज उत्पाद नहीं

द्वितीय वर्षः कोई बीज उत्पाद नहीं

तृतीय वर्षः 500 ग्राम/ पेड़ (12.5 क्विंटल/हेक्टेयर)

चतुर्थ वर्षः 1 किलो ग्राम/ पेड़ (25 क्विंटल/हेक्टेयर)

पंचम वर्षः 2 किलो ग्राम/ पेड़ (50 क्विंटल/हेक्टेयर)

छठे वर्षः 4 किलो ग्राम/ पेड़ (100 क्विंटल/हेक्टेयर) एवं आगे।

आय साधारणतया 6रुपये प्रति किलो ग्राम बीज की विक्रय दर से गणना करें।

सूचना प्रदाता- बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष- 0651 2450610, फैक्स- 0651 -2451011/ 2450850

कपास

किस्मों और रोपण के समय का चयन

जैविक कपास की खेती में प्रतिरोधी / सहिष्णु किस्मों और रोपण के समय का चयन पौधों को कीटों के हमले बर्दाश्त करने या हानिकारक कीटों से बचने में मदद करता है। LRA 5166, सुरभि और सुमंगला चूसने वाले कीटों के प्रतिरोधी हैं और सुप्रिया, कंचना और LPS 141 सफेद मक्खी के प्रतिरोधी हैं। अभादित किस्म सुंडी के प्रति सहिष्णु है। उचित समय पर एक सन्निहित ब्लॉक में संकालित बुवाई बढती कीट समस्या, विशेषकर घुन और गुलाबी सुंडी को कम करेगी।

फसल की विविधता

जाल फसल:

एक अतिसंवेदनशील या अनुशंसित फसल के छोटे पौधे एक जाल के रूप में मुख्य फसल के निकट स्थापित किये जा सकते हैं। कीट फसल के प्रति आकर्षित होने के बाद, नष्ट हो जाता है या पीड़ित पौधों के भाग या पौधों को ही हटाया जा सकता है। कपास के आसपास अरंडी लगाना स्पोडोप्टेरा को अंडे देने के लिए आकर्षित करेगा। अरहर और गेंदा, कपास के अस्थिर यौगिकों से उत्पन्न गन्ध को ढंकते हैं और कपास में हेलिकोवर्पा की अंडे देने की प्राथमिकता को कम करते हैं।

अंतर फसल:

काले चने और मिर्च के साथ अंतर फसल कपास में सुंडी के संक्रमण की तीव्रता कम करेगी।

मेड की फसल

मेड की फसल के रूप में लोबिया लगाना कॉक्सिनेल्लिड्स, सिर्फिड्स आदि जैसे शिकारियों को प्रोत्साहित करता है, जो चूसने वाले कीट पर नियंत्रण रखता है।

पर्यावर्णीय फसल:

मेड के साथ-साथ मक्का लगाने से कई चार पंखों वाले धारीदार (लेपिडोप्टेरन) परजीवियों को भोजन और आश्रय प्राप्त होता है और इस प्रकार यह पर्यावर्णीय फसल होती है। यह चूसने वाले कीट के लिए बाधा फसल के रूप में भी काम करता है। लोबिया भी एक अच्छी पर्यावर्णीय फसल होती है जो कॉक्सिनेल्लिड्स तथा अन्य शिकारी जंतुओं की वृद्धि को प्रोत्साहित करती है।

कृषिविज्ञान प्रथाएं:

बारी-बारी से फ़सल लगाना (फ़सल रोटेशन):

बारी-बारी से फसल लगाना एक बड़ी हद तक कीट प्रकोप को कम करता है। कपास के बाद बॉडी फसलें लगानी चाहिये जो कपास कीटों के अनुकूल नहीं होती हैं या जिन्हें वे पसंद नहीं करते हैं। कपास के बाद मक्का / ज्वार जैसा अनाज लगाने से सफेद मक्खी, सुंडी, मिट्टी के कीडों और सूत्रक्रमि का प्रकोप कम होता है।

कपास मुक्त अवधि:

कपास एक साल में केवल एक बार लगाया जाना चाहिए। कपास की दोहरी फसल और रैटूनिंग से कीटों की जनसंख्या की बढत रोकने के लिये बचना चाहिये क्योंकि ये कीटों की वृद्धि के लिये निरंतर खाद्य आपूर्ति करती है।

सांस्कृतिक प्रथाएं:

उचित दूरी:

कम दूरी और अधिक घने छप्पर से सुंडी और कपास के अन्य कीडों के तीव्र गुणन को बढावा मिलता है। इसलिए अनुकूलतम दूरी और घनत्व को बनाए रखा जाना चाहिये।

पोषण प्रबंधन:

उचित पोषण प्रबंधन का पालन किया जाना चाहिए। मृदा परीक्षण पर आधारित उर्वरक इस्तेमाल किया जाना चाहिये। अत्यधिक वनस्पति की वृद्धि (लहलहाती हरी वृद्धि) को रोकने के लिये नाइट्रोजन उर्वरक की उच्च खुराक से बचना चाहिये, जो अन्यथा अधिक कीटों को आकर्षित करती है।

खेत की स्वच्छता:

ग्रीष्मकालीन जुताई से मिट्टी में विश्राम की अवस्था में मौज़ूद कीड़े नष्ट हो जाते हैं। वैकल्पिक मेजबान घास जो कपास के कीटों को पनाह देती है, हटायी जानी चाहिये। प्रभावित स्क्वेयर्स, सूखे फूलों और बडे हो कुखे लार्वा का संग्रह और और नाश काफी हद तक कीट प्रकोप और धीरे-धीरे उनकी संख्या में वृद्धि को कम कर देगा।
समय पर फसल की कटाई और डंठल विनाश गुलाबी सुंडी की सबसे प्रभावी प्रबंधन पद्धति में से हैं। इन प्रथाओं से गुलाबी सुंडी, हेलिकोवर्पा और स्पोडोप्टेरा को उपलब्ध आवास और भोजन कम हो जाते हैं। मौसम के अंत में हरे बोल्स, टूटे बोल्स और पौधों के अन्य मलबे को नष्ट करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

यांत्रिक उपाय

टॉपिंग:

हेलिकोवर्पा द्वारा अंडे देने को कम करने और साथ ही जुडी हुई शाखाओं को जिनमें फल के अधिक हिस्से लगते हैं, प्रोत्साहित करने के लिये कपास की फसल के ऊपरी छोर (“टॉपिंग”) को विकास के 80-90 दिनों में ("टॉपिंग") में निकाला जाना चाहिये।

पक्षियों के डेरे:

पक्षियों के डेरों के निर्माण (२५ प्रति हेक्टेयर की दर) से मांसाहारी पक्षियों का आगमन प्रोत्साहित होता है।

लार्वा को हाथों से निकालना:

बड़े हो चुके लार्वा को हाथों से सुबह ६.३०-१०.०० बजे के बीच और शाम के समय निकालना चाहिये। इससे कीटनाशक के प्रति प्रतिरोध की सम्भावना समाप्त हो जायेगी। इससे भविष्य में आबादी का भारी बढत को कम करने में भी मदद मिलती है।

निगरानी और फसल संरक्षण के निर्णय

खेत में नियमित रूप से घूम कर देखना / निगरानी करना किसी भी कीट प्रबंधन कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि यही एक रास्ता है जिसके द्वारा यह तय करने के लिये विश्वसनीय जानकारी एकत्रित की जा सकती है कि क्या कीट आर्थिक सीमा के स्तर तक पहुँच गये हैं और यदि हां, तो कब। यह मानकीकृत नमूना तकनीकों के उपयोग द्वारा कीट घनत्व और क्षति के स्तर को निर्धारित करेगा। नियंत्रण के उपाय उस समय किये जाने चाहिए जब कीट आबादी ऐसे स्तर पर पहुंच जाये जिसके आगे वृद्धि होने पर सहन करने योग्य स्तर से अधिक नुकसान होगा।

फेरोमोन की निगरानी:

किसी प्रजाति के एक लिंग द्वारा छोडे गये फेरोमोन से उस प्रजाति के दूसरे लिंग द्वारा व्यवहार पैटर्न की एक श्रृंखला आरम्भ हो जाती है। इसे लिंग आकर्षण के रूप में संदर्भित किया जाता है। आम तौर पर मादाएं लिंग फेरोमोन का उत्पादन करती हैं जो नरों को आकर्षित करती हैं। लिंग फेरोमोन उनकी जैविक गतिविधि में विशिष्ट होते हैं, नर समान प्रजाति की मादा के एक विशिष्ट फेरोमोन के लिए ही प्रतिक्रिया देते हैं। कीटनाशक के प्रयोग को समेकित करने और परजीवियों को छोडने के लिये उद्भव की पहचान हेतु ५ प्रति हेक्टेयर की दर से फेरोमोन ट्रैप लगाएं।

वानस्पतिक कीटनाशक:

स्थायी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए और जैव विविधता का उपयोग करने के लिए, स्थानीय रूप से उपलब्ध नीम बीज को एक वानस्पतिक कीटनाशक के रूप में बढ़ावा देने की आवश्यकता है। नीम भोजन के विरुद्ध और अंडे देने की प्रवृत्ति के निवारक के रूप में कार्य करता है। अत: हेलिकोवर्पा द्वारा अंडे दिये जाने और वयस्क पतंगों को भी कपास से दूर रखने के लिये NSKE (नीम की निबोली का सत्व) ५% और नीम तेल 0.५% का इस्तेमाल किया जा सकता है।

नीम की निबोली का सत्व तैयार करने की विधि

  • छिडकाव के एक दिन पहले सूखे और साफ किये गये नीम के बीज की पांच किलो मात्रा पीसकर पाउडर बना लें।
  • १० लिटर पानी में रात भर पाउडर भिगो कर रखें. सुबह घोल को तब तक काष्ठफलक से हिलायें जब तक वह दूधिया सफेद न हो जाये।
  • मलमल के कपड़े की दोहरी परत से छानकर, साफ पानी मिलाकर मात्रा को १०० लीटर कर दें। २०० ग्राम साबुन मिलाएं और फसल के ऊपरी आवरण के साथ ही निचले अंशों पर छिडकाव करें।

जैवकारक:

परजीवी भक्षक और शिकारी जीव कीट आबादी को दबाने में प्रभावी होते हैं। सरेसयुक्त एक कागज़ की पट्टी पर लगाये गये कोर्सिरा के परजीवीयुक्त अंडों को पिन से कपास की पत्तियों के नीचे लगाना चाहिये। उभरते हुए ट्राइकोग्रामा के वयस्क खोजकर सुंडी के अंडों पर परजीवी बन जाते हैं और कुछ हद तक सुंडी की आबादी को दबा देते हैं। हेलिकोवर्पा तथा अन्य सुन्डी द्वारा अंडे देने के चरम समय पर ट्राइकोग्रामा किलोनिस अंडा परजीवी को 1.5 लाख प्रति हेक्टेयर की दर से दो से तीन बार छोडने पर होने सुंडी के प्रकोप को नियंत्रित करने में काफी हद तक मदद मिलेगी।

फसल वृद्धि के २०-२५ दिनों में हरा मच्छर द्वारा नुकसान की तीव्रता के अनुसार ५००-१००० प्रति हेक्टेयर की दर से क्रिसोपर्ला डालने से हरे मच्छर की जनसंख्या कम हो जाएगी।

कीट रोगजनक:

एंटोमोपैथोजेनिक प्रकृति में व्यापक रूप से प्रचलित हैं और कीटों के लिये विशिष्ट हैं इसलिये एच.आर्मिगेरा (हरी इल्ली) के विरुद्ध प्रभावी एन. पी. व्ही. विषाणु का इस्तेमाल किया गया। एच.आर्मिगेरा के युवा लार्वा के विरुद्ध एच- एन. पी. व्ही. विषाणु का छिड़काव १.०-१.५ लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से लक्षित होगा। कभी कभी, वायरस प्रभावित लार्वा को सिर नीचे की ओर लटका कर शरीर सूखते हुए देखा जाएगा. रोगज़नक़ के अच्छे रोग प्रतिरोध को बनाए रखने के लिए इसे १५ दिनों के बाद दोहराया जा सकता है। इसे वाणिज्यिक बी.टी. यौगिकों के साथ बारी-बारी से १.५१ प्रति हेक्टेयर प्रयोग में लाना चाहिये।

स्रोत: www.cicr.org.in

फल

सब्जियाँ

आलू

झारखंड में आलू उत्पादन

झारखंड राज्य में करीब 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती की जाती है जिसमें करीब 4 हजार हेक्टेयर में राँची व हजारीबाग जिले में खरीफ मौसम में बोया जाता है।

रबी मौसम में आलू उत्पादन: दोमट और बलुई दोमट मिट्टीवाले खेतों में जिसमें जैविक पदार्थों की बहुलता हो, आलू की खेती के लिए चयन करें। अच्छी जल निकासवाली समतल तथा उपजाऊ जमीन आलू की खेती के लिए अच्छी होती है। खरीफ फसलें जैसे मकई, धान आदि की कटाई के बाद खेत की अच्छी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनायें तथा जमीन को पाटा देकर समतल बना लें। खेत तैयारी के समय ही सड़ी हुई गोबर की खाद 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से देकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। इसी समय दीमक से बचाव के लिए 20 किलोग्राम अल्ड्रीन धूल प्रति हेक्टेयर देकर मिट्टी में मिला दें।

उन्नत किस्में: आगात किस्मों (80 दिन) में कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी आशोका, कुफरी बहार तथा कुफरी जवाहर मुख्य हैं। मध्यम आगात (100 दिन) में कुफरी बादशाह, कुफरी लालिमा, कुफरी कंचन, कुफरी चिप्सोना-1, तथा कुफरी चिप्सोना-2, एवं पिछात किस्मों (120 दिन) में कुफरी सिन्दूरी अच्छी किस्म है।

बीज दर: 25 से 30 ग्राम आकार के आलू कन्द का 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

बुआई का समय: 20 अक्टूबर से 5 नवम्बर तक।

उर्वरकों का प्रयोग: अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 120 किलोग्राम नेत्रजन, 100 किलोग्राम स्फूर, 100 किलोग्राम पोटाश तथा 24 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से रासायनिक खाद का प्रयोग करें। नेत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की कुल मात्रा बोआई के समय क्यारियों में दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा बुआई के 25-30 दिनों बाद मिट्टी चढ़ाने के समय टॉप ड्रेसिंग करें। सल्फर के लिये सिंगल सुपरफॉस्फेट (12 प्रतिशत सल्फर) का प्रयोग करना चाहिए।

बुआई: तैयार समतल खेत में 50 सेंटीमीटर की दूरी पर हल्की क्यारियाँ बना लें। रासायनिक खादों का मिश्रण क्यारियों में देकर मिट्टी में मिला दें तथा 20-20 सेंटीमीटर की दूरी पर अंकुरित बीज कन्दों की बुआई कर उस पर 10 सेंटीमीटर मिट्टी चढ़ा दें। उसी समय सिंचाई की नालियाँ बना लें।

सिंचाई: रोपाई के एक सप्ताह बाद पहली सिंचाई करें तथा उसके बाद प्रत्येक आठ से दस दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करें। सिंचाई हर बार हल्की करनी चाहिये, जिसे मेड़ों के ऊपर पानी न लगे। मेड़ के ऊपर पानी लगने से उपज कम हो जाती है। कोड़ाई के 10-15 दिन पहले सिंचाई बन्द कर दें।

कीट तथा रोग प्रबंधन: आलू की फसल में लाही (Aphid) कीड़ा अधिक नुकसान पहुंचानेवाला होता है। ये कीड़े पौधों का रस चूसते हैं तथा विषाणु रोग भी फैलाते हैं। रोपाई के 45 दिन बाद फसल पर 0.1 प्रतिशत रोगर या मेटासिस्टोक्स का घोल 2-3 बार 15 दिनों के अन्तराल पर छिड़कव करनी चाहिये। अगात तथा पीछात झुलसा रोग से बचाव के लिए इन्डोफिल M-45 या रिडोमिल MZ दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव 2-3 बार करें।

पाला से फसल का बचाव: पीछात आलू में दिसम्बर तथा जनवरी माह में अधिक ठंडा की आशंका होने पर फसल की सिंचाई कर देनी चाहिये। जमीन भींगा रहने पर पाला का असर कम हो जाता है।

फसल की कोड़ाई: आलू पौधे के पत्ते जब पीले पड़ने लगे तथा तापक्रम बढ़ने के पहले कोड़ाई कर देनी चाहिये। कोड़ाई के बाद आलू कन्दों को छप्परवाले घर में फैला कर कुछ दिन रखना चाहिए ताकि छिलके कड़े हो जाय। 50 ग्राम के ऊपर तथा 20 ग्राम से कम आकारवाले कन्दों को बेच देना चाहिये तथा 20 से 50 ग्राम के बीच वाले कन्दों को 50 किलोग्राम वाले झालीदार हेसियन बोरे में भरकर मार्च के अंत तक उसे शीतगृह में पहुंचा देना चाहिये। इसी आलू को बीज के लिए व्यवहार करना चाहिये। रबी मौसम में आलू की ऊपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है।

खरीफ में आलू उत्पादन: राँची तथा हजारीबाग के इर्द-गिर्द क्षेत्रों में बरसाती आलू खरीफ मौसम की एक व्यावसायिक खेती मानी जाती है तथा बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है। बरसात का मौसम शुरू होते ही पहाड़ी क्षेत्रों का तापक्रम कम होने लगता है तथा पूरा वातावरण आलू खेती के लिए अनुकूल हो जाता है। इन क्षेत्रों मे मध्य जुलाई से सितम्बर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बोआई की जाती है। बरसाती आलू के लिए अच्छी जल निकासवाली, बलुई दोमट मिट्टी, ऊँचा तथा ढालुआ खेत का चयन करें। जून में प्रथम वर्षा के बाद 2-3 बार खेत की जुताई कर उसी समय 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट देकर मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला दें। जल निकास का भी उपयुक्त इंतजाम कर लें। मध्य जुलाई में बोने के लिए कुफरी चन्द्रमुखी, तथा अगस्त माह के मध्य तक कुफरी कुबेर (ओ० एन० 2236) तथा कुफरी अशोका लगावें। अगस्त के अन्त से सितम्बर मध्य तक कुफरी अशोका, कुफरी लालिमा तथा अल्टीमस लगायें।

बीज दर: 20 ग्राम के आकर का स्वस्थ अंकुरित कन्द 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से बोयें। बरसात में काट कर आलू कन्द कभी नहीं लगायें।

रासायनिक खाद की मात्रा: 120 किलोग्राम नेत्रजन, 100 किलोग्राम स्फूर तथा 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। नेत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय दें। 10 किलोग्राम फ्यूराडॉन दवा के साथ मिला कर क्यारियों में बोआई के समय दें। आधी नेत्रजन की मात्रा एक महीना बाद मिट्टी चढ़ाते समय दें।

आलू का सूखा रोग एवं नियंत्रण: सूखा रोग (Brown rot) खरीफ आलू फसल में ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इस बीमारी में पौधे प्रौढ़ अवस्था में पहुंचते ही मुरझा कर फिर सूख जाते हैं। यही लक्षण बैगन तथा टमाटर में भी दिखाई देता है। जिस खेत में यह रोग आता है उस खेत में कम से कम दो साल तक आलू, बैगन तथा टमाटर नहीं लगानी चाहिये। फसल चक्र द्वारा, गोड़ा धान या रागी उगाकर ही इस रोग से मुक्ति पायी जा सकती है। बोआई के समय 10 किलोग्राम फ्यूराडॉन प्रति हेक्टेयर देने से तथा खड़ी फसल की जड़ों में दो किलोग्राम ब्लीचिंग पाउडर का घोल प्रति हेक्टेयर देने से इस रोग को कम किया जा सकता है। देरी से बोआई की गयी फसल में यह बीमारी कम आती हैं।

आलू की कोड़ाई: बरसाती आलू की फसल 60-70 दिनों में तैयार हो जाती है। फसल तैयार होते ही तुरन्त कोड़ाई कर लेनी चाहिये तथा चार-पाँच दिनों के अन्दर ही इसको बाजार में बेच देनी चाहिए। बरसाती आलू की संरक्षण क्षमता बहुत कम होती है।

आलू बीज उत्पादन तकनीक: बीज के लिए आलू रोपाई से कोड़ाई तक का समय मध्य अक्टूबर से मध्य जनवरी तक ही उत्तम सिद्ध हुआ है। स्वस्थ, रोगरहित, प्रमाणित बीजकन्द जानकार संस्था से प्राप्त कर उसे पूर्णरूपेण अंकुरित करा लें। 40 से 50 ग्राम आकार के अंकुरित बीजकन्दों की रोपाई 20 अक्टूबर से 5 नवंबर तक अवश्य कर लें। रासायनिक उर्वरकों, नेत्रजन, स्फूर और पोटाश की पूरी मात्रा तथा 15 किलोग्राम की दर से थिमेट 10G की मात्रा प्रति हेक्टेयर एक साथ मिश्रण बनाकर बनी हुई क्यारियों में देकर ऊपर से सड़ी हुई गोबर की खाद डालें तथा उसके ऊपर आलूकन्दों को बीछा कर उस पर 10 सेंटीमीटर मिट्टी एक ही बार में चढ़ा दें। बीज के लिए लगाये गये आलू के खेत में दोबारा मिट्टी न चढ़ायें तथा लगायी गयी फसल में बार-बार न जायें अन्यथा सम्पर्क से विषाणु रोग फैलने का डर रहता है। आलू के खेत से रोगग्रस्त पौधों तथा आलू की अन्य किस्मों के मिश्रित पौधों को ज्योंही देखे, निकाल दें। जब लाही कीड़ों की संख्या 20 प्रति 100 आलू की पत्तियों पर पहुँच जाये, तो पौधों को जड़ से काटकर खेत से बाहर कर देना आवश्यक है। पाराक्वेट घासनाशक दवा का छिड़कव पौधे काटने के बाद एक बार 2 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर देने पर पुन: पत्तियां नहीं निकल पाती हैं। कोड़ाई के बाद आलू कन्दों को 10-15 दिनों तक ठंड़ी जगह पर फैलाकर रखें। भंडार से कटे, सड़े तथा रोग ग्रसित बीजों को चुनकर निकाल दें।

मूल बीज (TPS) से आलू की खेती: आलू के फलों से निकाले गये छोटे-छोटे दानों को मूल बीज कहते हैं। मूल बीज से आलू का उत्पादन करने में लागत कम आती है तथा फायदा ज्यादा होता है। 150 ग्राम बीज से एक हेक्टर में आलू उगाया जा सकता है। मूल बीज से उत्पादित कन्दों की उपज क्षमता अधिक होती है तथा फसल पिछात झुलसा रोग से प्रतिरोधी होती है। बीज बोआई का उपयुक्त समय नर्सरी में 15 से 20 अक्टूबर है, जब रात्रि क तापमान लगभग 22०C रहें। मूल बीज को 24 घंटे पानी में भिंगोने के बाद गोबर की सड़ी खाद में तथा कपड़े में लपेट कर अंकुरण के लिए 4-5 दिनों तक ठंडी जगह में रखें। एक हेक्टेयर खेती के लिए 50 वर्गमीटर नर्सरी तैयार करें, जिसमें 5 क्विंटल कम्पोस्ट, 250 ग्राम नेत्रजन, 300 ग्राम स्फूर तथा 500 ग्राम पोटाश डालें। नर्सरी को समतल कर ऊपर से 2 सेंटीमीटर सड़ी गोबर की खाद की सतह बनाकर अंकुरित बीज डालते हैं। अंकुरित बीज की बोआई नर्सरी में शाम को करें तथा उस पर फुहारे से पानी दें। 25-30 दिनों में पौधा तैयार हो जाते हैं। रोपाई के लिये तैयार खेत में 50-50 सेंमी की दूरी पर मेड़े बना ले। मेड़ पर 60 किलोग्राम नेत्रजन, 60 किलो स्फूर तथा 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देकर मिट्टी में मिला दें। नाली में पानी भरने के तुरन्त बाद बिचड़ों को अंगुली या लकड़ी से नाली की मेड़ की तरफ 10-10 सेंमी की दूरी पर लगावें। 30-35 दिन बाद, 60 किलो नेत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से देकर मिट्टी चढ़यें। 110 दिन बाद आलू की कोड़ाई करें तथा कन्दों को शीतगृह में रखें। उपज करीब 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

ट्यूबरलेट (Tuberlet) से आलू की खेती: इसकी खेती साधारण आलू की खेती जैसे की जाती है। इसमें मटर के आकार का बीजकन्द मूलबीज (TPS) से तैयार करते है। इस फसल से आलू की पैदावर 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है। इस फसल में झुलसा रोग नहीं लगता है।

सूचना प्रदाताः

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, काँके, राँची- 834006
दूरभाष- 0651 2450610, फैक्स- 0651 2451011/2450850
मोबाईल - 94319 58566

सब्जियाँ

प्याज की खेती

सीआईपीसी के उपचार से आलू के कंदों की भंडारण क्षमता बढ़ाना

मसाले

औषधीय पौधे

    भारत में उपयुक्‍त क्षेत्र

    उपोष्‍णकटिबंधीय और हल्‍के समशीतोष्‍ण इलाकों में सदाबहार रूप से उगता है लेकिन मध्‍य और ऊंचे इलाकों में वार्षिक रूप से पैदा होता है। इसे हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू कश्‍मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तरांचल, मध्‍य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि में प्रस्‍तुत किया जा चुका है।

    मृदा और मौसम

    फसल के बढ़ने के समय औसत अधिकतम और निम्‍नतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से 37 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। नमी 65 से 85 प्रतिशत तक होनी चाहिए। स्‍टेविया बारिश को तो सह सकता है लेकिन पाला उसके लिए समस्‍या है। यह सूखी लाल मिट्टी में और रेतीली चिकनी बलुई मिट्टी में पीएच 5.5 से 7.7 में अच्‍छी तरह पनपता है।

    संचरण

    इसे स्‍टेम कटिंग या बीजों द्वारा भी लगाया जा सकता है। जड़ों के प्रत्‍यारोपण के बाद कटाई से अधिक अच्‍छे परिणाम सामने आते हैं। 4-5 सप्‍ताह पुरानी कटी हुई जड़ों को खेत में मार्च-अप्रैल और जून और जुलाई में 45 सेमी x 45 सेमी की दूरी पर लगाना चाहिए।

    कृषि पद्धति

    पौधारोपण के बाद साप्‍ताहिक अंतराल पर लगातार सिंचाई की जानी चाहिए। खेत की तैयारी के समय 25-30 टन प्रति हेक्टेयर एफवाईएम कार्बनिक खाद डाल कर भूमि को उपजाऊ बनाना चाहिए। पहली फसल प्रत्‍यारोपण के बाद 75 से 90 दिन लेती है और उसके बाद की फसल, पहली फसल के बाद 60 से 75 दिन लेती है। इसका आर्थिक जीवन 3 से 4 साल है।

    फसल

    दो फसलों से प्राप्‍त उपज 25 से 30 टन प्रति हेक्‍टेअर/वर्ष की औसत ताजा बायोमास से 13 से 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी पत्तियों की पैदावार होती है।

    स्रोत: www.ihbt.res.in

सुगंधित पौधे

रंग प्रदान करने वाले पौधे (रंजक पौधे)

3.1125

Sharik Ahmed Jun 04, 2017 08:33 PM

Aapke dwara di gai kheti ki jankari se bhut mdd mili. Ummeed h aage b hme aapse uhi nyi nhi kheti ki jankari milti rhegi.aap or aapki puri team ka bhut bhut shukriya.

Anonymous Feb 22, 2017 03:47 PM

साइंटिस्ट एक माह में तैयार होने वाली फसलो की किसमे तैयार करे ताकि किसानों के पास हर महीना पैसा आ सके

Anonymous Feb 22, 2017 03:46 PM

साइंटिस्ट एक माह में तैयार होने वाली फसलो की किसमे तैयार करे ताकि किसानों के पास हर महीना पैसा आ सके

Bhanun Jan 15, 2017 09:10 AM

अगर चने बढ़ते जा रहे हो और फल मतलब फार ना रहे हो तोह क्या करना चाहिए कृपया उचित जानकारी दे ।

कुलदीप सैनी Jan 10, 2017 06:58 AM

केसेस ऑफ़ लौ यील्ड ऑफ़ ओइलसीड्स

अपना सुझाव दें

(यदि दी गई विषय सामग्री पर आपके पास कोई सुझाव/टिप्पणी है तो कृपया उसे यहां लिखें ।)

Enter the word
नेवीगेशन
Back to top

T612017/12/18 20:18:41.246705 GMT+0530

T622017/12/18 20:18:41.701482 GMT+0530

T632017/12/18 20:18:41.709484 GMT+0530

T642017/12/18 20:18:41.709836 GMT+0530

T12017/12/18 20:18:41.170447 GMT+0530

T22017/12/18 20:18:41.170772 GMT+0530

T32017/12/18 20:18:41.170926 GMT+0530

T42017/12/18 20:18:41.171082 GMT+0530

T52017/12/18 20:18:41.171187 GMT+0530

T62017/12/18 20:18:41.171260 GMT+0530

T72017/12/18 20:18:41.172559 GMT+0530

T82017/12/18 20:18:41.172845 GMT+0530

T92017/12/18 20:18:41.173105 GMT+0530

T102017/12/18 20:18:41.173348 GMT+0530

T112017/12/18 20:18:41.173412 GMT+0530

T122017/12/18 20:18:41.173519 GMT+0530