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लीची की वैज्ञानिक खेती

इस पृष्ठ में लीची की वैज्ञानिक खेती की विस्तृत जानकारी दी गयी है।

परिचय

बिहार का लीची उत्पादन के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान है। यहाँ देश को सर्वोत्कृष्ट लीची पैदा होती है। भारत में लीची के अंतर्गत कुल क्षेत्र का आधा से अधिक भाग इसी राज्य खासकर इसके उत्तरी हिस्से (मुजफ्फरपुर, वैशाली, चम्पारण एवं समस्तीपुर) में स्थित है। आज इस राज्य में करीब 25,000 हेक्टेयर क्षेत्र में लीची के बाग़ हैं।

लीची के ताजे फल में 70 प्रतिशत भाग गुद्दा का होता है, जो खाने में स्वादिष्ट एवं मीठा होता है। इसमें चीनी 10-15 प्रतिशत तथा प्रोटीन 1.1 प्रतिशत होती है। यह विटामिन ‘सी’ का अच्छा स्रोत है।

जलवायु

लीची की फसल बागवानी के लिए आर्द्र जलवायु उपयुक्त है। वर्षा की कमी में भी आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है। इसके लिए हर दृष्टिकोण से उत्तरी बिहार उपयुक्त क्षेत्र है।

मिट्टी

लीची विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में सफलतापूर्वक उगायी जा सकती है, परन्तु इसके लिए दोमट अथवाबलुवाही दोमट मिट्टी, जिसका जलस्तर 2 से 3 मीटर नीचे हो, उपयुक्त समझी जाती है। भूमि काफी उपजाऊ, गहरी एवं उत्तम जल निकास वाली होनी चाहिए। इसके लिए हल्की क्षारीय एवं उदासीन मिट्टी अधिक उपयुक्त समझी जाती है।

लीची की जड़ों में लीची माइकोराईजा नामक फफूंद पाये जाते है। ये फफूंद अपना भोजन पेड़ से प्राप्त करते है एवं बदले में पेड़ों के लिए खाद्य पदार्थ तैयार करते है। साथ-ही-साथ ये कुछ अप्राप्य पोषक तत्वों को भी प्राप्य रूप में परिवर्तित कर देती है जिससे पेड़ों की वृद्धि अच्छी होती है एवं फल अधिक लगते हैं। अत: पौधा लगाते समय फरानी लीची के पौधों की जजड़ के पास की थोड़ी मिट्टी का व्यवहार करना चाहिए।

नया बाग़ लगाना

अप्रैल के शुरू में जमीन का चुनाव कर दो-तीन बार जुताई कर समतल कर दें। लीची का बाग़ वर्गाकार पद्धति में लगायें अर्थात वृक्षों की कतारों तथा हर कतार में दो वृक्षों के बीच की दूरी बराबर हो। मई के प्रथम या द्वितीय सप्ताह में 9 या 10 मी. की दूरी पर 90 से.मी. व्यास एवं 90 सें.मी. गहराई वाले गड्ढ़े खोदकर खुला छोड़ दें।

जून के द्वितीय सप्ताह में निम्नलिखित खाद गड्ढ़े से निकाली गई मिट्टी में मिलाकर पुन: गड्ढ़े में भर दें।

कम्पोस्ट                             : 40 किलोग्राम

चूना (जहाँ चूने की कमी हो)             : 2-3 किलोग्राम

सिंगल सुपर फास्फेट                   : 2-3 किलोग्राम

मयूरियेट ऑफ़ पोटाश                   : 1 किलोग्राम

थीमेट                               : 50 ग्राम

किस्में

  1. मई के प्रथम पक्ष में पकने वाली-देश, अर्ली बेदाना।
  2. मई के दूसरे पक्ष में पकने वाली-शाही, रोजसेंटड एवं पूर्वी।
  3. मई के अंत से जून के प्रथम सप्ताह में पकने वाली-चायना, कसबा, मंदराजी, लेट-बेदाना।

मन पसंद किस्मों का चुनाव कर पौधे जून-जुलाई में लगायें। 1-2 वर्ष उम्र के गुट्टी द्वारा तैयार किये गये भरपूर जड़ वाले स्वस्थ पौधों का चुनाव करें। बाग़ में लीची की विभिन्न किस्में जिससे फल शुरू से अंत तक मिलते रहें। गड्ढ़े की मिट्टी बैठने पर ही पौधे लगायें। पौधे लगाने के बाद जड़ की बगल में मिट्टी अच्छी तरह भर दे एवं शीघ्र सिंचाई कर दें। अगर वर्षा नही हो तो हर 3-4 दिनों के अंतर पर पानी दें।

बगीचे की देखभाल

  1. लीची के पौधे कोमल होते हैं, अत: इसे जाड़े में पाले या गर्मी में तेज धूप से बचायें। यदि पाला गिरने की संभावना हो तो बाग़ की सिंचाई कर दें। छोटे पौधे को गर्मी एवं धूप से बचाने के लिए पूरब दिशा को छोड़कर तीन ओर से सरकंडे, टाट या ताड़ के पत्ते लगा दें।
  2. प्रारंभ में नये पौधों की जानवरों से बचाएँ। इसके लिए बाग़ के चारों तरफ घेरा लगा दें या गढ़ा खोद दें।
  3. वर्षा के पानी का निकास रखें। जाड़े में 15-20 दिनों पर एवं गर्मी में 10 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।
  4. बाग़ के उत्तरी एवं पश्चिमी किनारे पर हवा अवरोधक वृक्ष जैसे शीशम, जामुन, बीजू आम आदि की 2 या 3 कतार लगावें।
  5. प्रतिवर्ष वर्षा के शुरू तथा अंत में और जनवरी में नये बाग़ की जुताई करें।
  6. नये बाग़ में अन्तर्वर्ती फसल (जैसे विभिन्न सब्जियाँ, दलहनी फसल आदि लगायें) ।
  7. अगर पूरी सड़ी खाद उपलब्ध न हो तो कमी की पूर्ति खल्ली से करें।

खाद एवं उर्वरक

प्राय: लीची 5-6 वर्षो में फूलने लगती है, लेकिन अच्छी फसल 9-10 वर्षो के बाद मिलती है। खाद देने का उपयुक्त समय वर्षा ऋतु का आरम्भ है। वृक्ष रोपने के बाद तालिका 1 में बतायी गई मात्रा के अनुसार खाद डालें।

ऐसी मिट्टी में जहाँ जस्ते की कमी होती है और पत्तियों का रंग काँसे का सा होने लगता है, वृक्षों पर 4 किलो जिंक सल्फेट तथा 2 किलो बुझे चूने का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

पौधों का आकार

प्रारम्भिक अवस्था में पौधों को अच्छा आकार देने की दृष्टि से शाखाओं को समुचित दूरी पर व्यवस्थित करने हेतु छंटाई करें जिससे पौधों को सूर्य की रोशनी एवं हवा अच्छी तरह मिल सके।

तालिका 1: लीची के लिए खाद की मात्रा

खाद का नाम

प्रथम वर्ष

प्रतिवर्ष बढ़ाने वाली मात्रा (5-6 वर्ष तक)

प्रौढ़ वश्क्ष के लिए खाद की मात्रा

कम्पोस्ट या सड़ी खाद

20 किलो

10 किलो

60 किलो

अंडी की खल्ली

1 किलो

½ किलो

5 किलो

नीम की खल्ली

½ किलो

½ किलो

3 किलो

सिंगल सुपर फास्फेट

½ किलो

¼ किलो

5 किलो

मयूरियेट ऑफ़ पोटाश

100 ग्राम

50 ग्राम

1 किलो

कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट

-

½ किलो

4 किलो

फूलते हुए वृक्षों में किये जाने वाले कार्य

  1. लीची के बाग़ की वर्ष में तीन बार (वर्षा के आरम्भ, अंत तथा जनवरी) जुताई-कोड़ाई करें।
  2. जाड़े में सिंचाई न करें। लौंग के आकार के बाराबर फल होने पर सिंचाई शुरू करे और गर्मी में हर 10-15 दिनों पर आवश्यकतानुसार पानी दें। पौधे में फूल लगते समय कदापि सिंचाई न करें। फल पकने लगे तो सिंचाई बंद कर दें।
  3. जबतक बाग में पूरी छाया न हो तबतक अन्तर्वर्ती फसल उगा सकते हैं। परन्तु फरवरी से मार्च तक सिंचाई वाली फसल न लगायें अन्यथा फूल एवं फल गिर जायेंगे।
  4. जून के अंत तक पौधों में खाद अवश्य डाल दें क्योंकि जून के बाद खाद देने से फलन कम होने की संभावना रहती है।

कटाई-छंटाई

साधारणत: लीची में किसी प्रकार की कटाई-छंटाई की आवश्यकता नहीं होती है। फल तोड़ने समय लीची के गुच्छे के साथ टहनी का भाग भी तोड़ लिया जाता है। इस तरह इसकी हल्की कांट-छांट अपने आप हो जाती है। ऐसा करने से अगले साल शाखाओं की वृद्धि ठीक होती है और नयी शाखाओं में फूल-फल भी अच्छे लगते है। घनी, रोग एवं कीटग्रस्त, आपस में रगड़ खाने वाली, सूखी एवं अवांछित डालो की छंटाई करते रहें।

फलों का फटना

लीची की कुछ अगात किस्मों, जैसे शाही, रोजसेंटेड, पूर्वी आदि में फल पकने के समय फट जाते है जिससे इनका बाजार भाव कम हो जाता है। लीची की सफल खेती में फल फटने की समस्या अत्यंत घातक है। इसके लिए निम्न उपचार करे: 1. फल लगने के बाद पेड़ों के नजदीक नमी बनायें रखे। 2. जब फल लौंग के आकार के हो जाएं तब नेफ्थेलीन एसीटीक नामक वृद्धि नियामक के 20 पी.पी.एम. घोल का छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें। इससे फल कम गिरेगे एवं नहीं फटेंगे।

फलन एवं आय

प्राय: 5-6 वर्ष बाद फूल लगना आरम्भ हो जाता है। फल तैयार हो जाने पर इसे गुच्छे में तोड़ें और अच्छी तरह पैकिंग कर बाजार में भेजें। प्रत्येक वृक्ष से 4000 से 6000 तक फल प्राप्त होते है। लीची में अनियमित फलन की समस्या आम की तरह गंभीर नहीं है। अत: इसकी खेती से हर साल आय मिलती रहती है। लीची के बागों से प्रतिवर्ष औसतन 50,000 से 60,000 रूपये प्रति हेक्टेयर की आमदनी होती है।

औद्योगिक दृष्टिकोण

लीची के फलों से जैम, शरबत, डिब्बा-बंदी एवं सुखौता आदि तैयार किया जा सकता है। पर्याप्त लीची फलों का उत्पादन बढ़ाकर उत्तर बिहार में लीची पर आधारित उद्योग खड़े किये जा सकते है एवं इनका निर्यात कर विदेशी मुद्रा का अर्जन किया जा सकता है।

लीची से संबंधित एक महत्वपूर्ण उद्योग मधुमक्खी पालन है। लीची के बाग़ के मधु का मूल्य साधारण मधु से अधिक होता है। लीची के बाग़ में मधुमक्खी पालने से फूलों के परागण में काफी सहायता मिलता है जिससे अधिक फल प्राप्त होते हैं।

कीड़ों एवं रोगों की रोकथाम

(क) लीची माइट: इस सूक्ष्म कीट द्वारा रस चूसने पर पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं और उनकी निचली सतह पर लाल मखमली गद्दा बन जाता है। आक्रान्त पत्तियाँ मिलकर गुच्छे बना लेती है।

नियंत्रण

  1. ग्रसित टहनियों को कुछ स्वस्थ हिस्सा के साथ जून एवं अगस्त माह में काटकर जला दें।
  2. डॉयकोफोल या केलथेन (18.5 ई.सी.) नामक दवा का 30 मी.ली. 10 मी.ली. 10 लीटर पानी में घोलकर प्रति पेड़ की दर से छिड़काव करें। यदि बाग़ आक्रान्त न हो तो भी पहला छिड़काव मार्च-अप्रैल तक अवश्य हो कर दें। आक्रान्त बागों का 15 दिनों के अंतराल पर 2 या 3 बार छिड़काव करें।

(ख) धड़छेदक: लीची वृक्ष के तना तथा शाखाओं के अंदर ये कीड़े रहते हैं और स्थान-स्थान पर छेद से इन्हें पहचाना जा सकता है।

नियंत्रण

  1. इन छेदों में लम्बा तार डालकर कीड़ों को मार डालें।
  2. छेद के अंदर नुभान या भेपोना नामक दवा का 0.2% घोल की 2-3 बूंदें छेद के अंदर डालें। तत्पश्चात छेद के मुँह को सीमेंट या गीली मिट्टी से बंद कर दें।

(ग) फल एवं पत्तीछेदक: यह कोमल पत्तियों की दोनों सतहों को बीच से खाता है एवं टहनियों में छेद कर देता है। फलस्वरूप कोमल टहनियाँ मुरझाकर लटक जाती है। पिल्लू निकलते ही फल में छेद कर देता है जिससे कच्चा फल पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाता है।

नियंत्रण

  1. सुंडी सहित टहनियों को तोड़कर जला दें।
  2. पेड़ में फूल लगने के पहले रोगर 30 प्रतिशत घोल की। लीटर या मोटासिस्ट्रोक्स 25 प्रतिशत घोल की 650 मी.ली. दवा 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

(घ) लीचेन: वृक्ष के तनों तथा शाखाओं पर सफेद या हरे रंग का कई जैसा लीचेन लगता है। जुलाई-अगस्त में एक बार कास्टिक सोडा का 1 प्रतिशत (1 लीटर पानी में 10 ग्राम) घोल बनाकर ग्रसित अंगों पर छिडकें।

(ङ) गमोसिस: विशेषकर बाढ़ के इलाकों में शाखाओं की छाल फटकर रस निकालती हैं जो बाद में काली गोद जैसा हो जाता है। ग्रसित स्थान के आसपास की छाल छीलकर हटा दें। कटे स्थान पर ब्लाइटांक्स का पेस्ट बनाकर लेप दें। बगीचे से पानी का निकास ठीक रखें।

निर्यात से संबंधित कुछ आवश्यक निर्देश

  • हमेशा उन्नत किस्मों की ही खेती के लिए चुने। उत्तरी बिहार में अधिक उपज देने वाली किस्में है – शाही, चाइना एवं रोजसेंटेड इत्यादि।
  • बाग लगाने के लिए पौधे-हमेशा किसी विश्वसनीय सरकारी/प्राइवेट नर्सरी से ही प्राप्त करें। हमेशा उन्नत किस्में ही लगायें।
  • बाग़ लगाने के लिए एक वर्ष या अधिक से अधिक दो वर्ष के पौधे ही उपयुक्त है।
  • प्रारम्भिक अवस्था में यदि वानस्पतिक वृद्धि सामान्य से अधिक हो तो 4-5 वर्ष के बाद नाइ ट्रोजन वाले उर्वरक का इस्तेमाल बंद कर दें। इससे वृक्षों के फलन में शीघ्रता आती है। यदि पौधे सामान्य हैं तो नाइट्रोजन वाले उर्वरकों का प्रयोग जारी रखें। इससे उनका संतुलित विकास होगा।
  • अक्टूबर माह से लेकर फूल आने एवं फल लगने तक बाग़ की सिंचाई नहीं करें। फल लगने के उपरांत सिंचाई आरंभ करें एवं बगीचे की मिट्टी सदैव नम रखें। एक सप्ताह के अंतराल पर सिंचाई करें।
  • लीची में खाद देने का उचित समय जून-जुलाई है। तोड़ाई के उपरांत वृक्षों की आयु एवं जमीन की उर्वरता के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करें। 15 जुलाई तक खाद आवश्य डाल दें। कोशिश करें कि खाद तुड़ाई के उपरांत शीघ्र ही जून के शुरू में डाल दिया जाय।
  • फलों का गिरना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन जब फल अधिक गिरने लगें तब प्लानोफिक्स नामक दवा एक मी.ली. प्रति 4½ लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें। मिट्टी में समुचित नमी रहने से फल कम गिरते है।
  • फलों का फटना कम करने के लिए बाग़ की मिट्टी में आवश्यक नमी बनायें रखें। इसके लिए फल बनने के बाद 6-7 दिनों के अंतराल पर बाग़ की सिंचाई करें। पछुआ हवा से बचाव के लिए वायु-अवरोधक वृक्षों, यथा शीशम, जामुन, शाल आदि को दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगायें। 10 पी.पी.एम. नैफ्थलीन एसेटिक एसिड या 1 मी.ली. प्लानोफिक्स 4½ लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त जिंक (0.5 प्रतिशत) या बोरॉन (0.1 प्रतिशत) का इस्तेमाल लाभप्रद पाया गया है। सोलबर नामक दवा का 1 ग्राम एक लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।
  • लीची के फलों में तोड़ाई के बाद मिठास की वृद्धि नहीं होती है। अत: इसे पूर्णतया परिपक्व हो जाने के बाद हो तोड़े। परिपक्वता का निर्धारण फलों के रंग के साथ-साथ किस्म विशेष की मिठास का आधार पर किया जा सकता है। कुछ फलों को चख कर यह देख लें कि लाली लिए हुए फल स्वाद में मीठे हुए है या नही।
  • फलों की तोड़ाई ठंढे वातावरण में किया जाना लाभप्रद रहता है, अत: इसका उचित समय 4 बजे सुबह से 8 बजे तक है या फिर रौशनी की उचित व्यवस्था रहने पर रात्रि के अंतिम पहर में भी तोड़ाई की जा सकती है। तोड़ाई करते समय यह ध्यान रखें कि अनावश्यक रूप से वृक्षों की टहनियां नहीं टूटे। फलों के गुच्छे के साथ 40 से.मी. से अधिक लम्बी टहनी तोड़ने से अगले वर्ष के फलने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • फल या गुठली से बचाव के लिए साइपरमेथ्रिन या डेल्टामेथ्रिन (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में) या फेनभेल (1 मि.ली. प्रति 3 लीटर पानी में घोलकर) 15 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव करें। फलों की तुड़ाई के 12-15 दिन पूर्व कीटनाशी दवाओं का छिड़काव आवश्य बंद कर दें। अन्यथा दवा का अवशेष फलों को निर्यात के लायक नहीं रहने देगा।
  • माइट से नियंत्रण के लिए डाइकोफ़ॉल (या केलथेन) नामक दवा (2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर) छिड़काव के पूर्व आक्रांत टहनियों को छाँटकर अलग कर दें एवं छांटे गये भाग को जला दें।
  • तोड़े गये फलों को धरती पर कदापि न रखें। प्लास्टिक या पोलीथीन की साफ़ चादर बिछा कर फलों को एकत्र करें या सीधे प्लास्टिक क्रेट या टोकरी में रखकर पैकिंग गृह या स्थान पर भेज दे ताकि वहाँ फलों की ग्रेडिंग एवं पैकिंग हो सकें।
  • पैकिंग स्थान पर सबसे पहले अनावश्यक पत्तियाँ एवं डंठल आदि को अलग कर दिया जाता है। तब फलों को गुच्छे से अलग किया जाता है। अलग करते समय यह ध्यान दें कि हरेक फल को ऊपर 2 या 3 मी.मी. डंठल अवश्य लगा रहे। फलों को हाथ से अलग करने के बजाय उन्हें तेज कैंची की मदद से काट कर अलग करना बेहतर होता है।
  • ग्रैडिंग के दौरान आकार के अनुसार फलों को छाँटकर अलग-अलग वर्गो में विभक्त किया जाता हैं आमतौर पर छोटे (वजन में 20 ग्राम से कम) और फटे या दागदार फलों को छांट कर अलग कर देते हैं।
  • आकार में 25 ग्राम या उससे बड़े फलों को अलग एकत्र कर ‘एक्ट्रा लार्ज’ साइज़ के फल की अलग श्रेणी बनायी जा सकती है। वर्गीकृत फल बाजारों में अधिक शीघ्रता से बिकते हैं तथा उनकी कीमत भी अच्छी मिलती है। निर्यात के लिए ग्रेडिंग आवश्यक है।
  • ग्रेडिंग के उपरांत फलों को छिद्रयुक्त प्लास्टिक क्रेट/बास्केट में रखकर सल्फर डाईऑक्साइड गैस से धुम्रित करते है। इसके लिए फलों को एक प्रकोष्ठ में रखकर 500-600 ग्राम सल्फर (गंधक का चूर्ण प्रति टन फल के लिए) जलाया जाता है जिससे फलों को उपचारित करने हेतु वंछित गैस प्राप्त होती है। इस गैस युक्त प्रकोष्ठ में 30-40 मिनट तक फलों को रखा जाता है। उपचार के उपरांत फल पीले हो जाते है। यह उपचार भंडारण के दौरान फलों को जीवाणुओं से बचाव के लिए आवश्यक है।
  • सल्फर डाईऑक्साइड से धुम्रित करने के उपरांत फलों को 1 से 2 किलो के डब्बो में पैक किया जाता है। प्लास्टिक के छोटे प्यूनेट्स (250 से 500 ग्राम साइज़ वाली छोटी डालियाँ या खदोने में) रखकर भी इसे पैक किया जाता है। पैकिंग के उपरांत पैकेट पर किस्म का नाम, ग्रेड एवं पैकिंग की विधि का उल्लेख आवश्यक है ताकि खरीददार को फलों की गुणवत्ता का पता चल सके।
  • ढुलाई में सहूलियत के लिए छोटे-छोटे डिब्बों को एक जगह रखकर प्लास्टिक की पतली पट्टियों से बांधकर 800 से 1000 किलो तक के बड़े पैकेट बना लिये जाते है।
  • पैकिंग स्थान/गृह का तापक्रम 8-100 सेल्सियस रखा जाता है। फलों को चार-पाँच घंटा इस तापक्रम पर रखने के उपरांत ही डब्बे में भरा जाता है। डिब्बों में भरने के बाद भी करीब 1-2 घंटे तक इस तापक्रम पर रखते है ताकि फल के भीतरी भाग (गूदा) का तापक्रम 1000 सेल्सियस हो जाय। इसे प्रिकुलिंग की संज्ञा दी जाती है और शीत भंडारण के लिए फलों को तैयार करने के लिए यह एक आवश्यक प्रक्रिया है।
  • प्रीकुलिंग के बाद पैक किये हुए फलों को शीतगृह में भंडारित किया जाता है। शीतगृह के अंदर का तापक्रम 40 सेल्सियस एवं सापेक्षिक आद्रता 90 प्रतिशत से अधिक होती है।
  • निर्यात के लिए रीफर भान या रेफ्रीजेरेटेड ट्रक द्वारा पैकेट को हवाई अड्डा या बंदरगाह पर ले जाया जाता है। रेफ्रीजेरेटेड हवाई या समुद्री जहाज द्वारा उसे नियत देश एवं स्थान पर पहुंचा दिया जाता है।
  • दूसरे देश में पहुँचने पर भी उसे शीतगृह में ही भंडारित किया जाता है जिसका तापक्रम 40 सेल्सियस होता है। यह भंडारण तबतक किया जाता है जबतक कि बिकने के उपरांत फल उपभोक्ता तक न पहुंच जाय। यह सुनिश्चित किया जाता है कि शीत-भंडार का यह क्रम उपभोक्ता तक पहुँचने के पूर्व टूटने न पाये क्योंकि फलों को 30-40 दिनों तक ताजा एवं आकर्षक बनाये रखने का यही राज है।

बिहार राज्य के अंतर्गत फलों का क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता

क्रसं

वर्ष 2005-06

वर्ष 2006-07

वर्ष 2007-08

वर्ष 2009 – 010

 

 

क्षेत्रफल हे.

उत्पादन टन

उत्पादकता टन/हे.

क्षेत्रफल हे.

उत्पादन टन

उत्पाद्का टन/हे.

क्षेत्रफल हे.

उत्पादन टन

उत्पाद्का टन/हे.

क्षेत्रफल हे.

उत्पादन टन

उत्पाद्का टन/हे.

1

आम

140221

12222727

8.72

140786

1306944

9.28

142.21

870.35

6.12

146032

995938

6.81

2

अमरुद

27709

198951

7.18

27994

247960

8.86

82.67

255.72

8.92

292260

231478

7.92

3

लीची

28428

200133

7.04

28758

211905

7.37

29.84

223.23

7.48

30602

215132

7.03

4

नींबू

16844

112349

6.67

17122

121601

7.12

17.57

125.84

7.16

17853

131219

7.35

5

केला

28042

959317

34.21

29013

1125099

38.78

30.46

1329.36

43.64

31456

1435337

45.63

6

अन्नास

4227

107958

25.54

4454

121057

27.18

44.64

126.77

27.31

4737

124962

26.38

7

नारियल

15166

123755

8.16

-

-

-

15.19

7755.54

51.03

15226

780028

51.23

8

अन्य

30973

266987

8.62

29014

255894

8.80

30.25

278.65

9.21

30717

281693

9.71

 

स्त्रोत: कृषि विभाग,बिहार सरकार

लीची में कीट और रोग नियंत्रण


लीची में कीट और रोग नियंत्रण
2.9552238806

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