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मृदा एवं पत्ती विश्लेषण

इस लेख में मृदा एवं पत्ती विश्लेषण की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है।

परिचय

सभी जीवों का अस्तित्व किसी न रूप में मृदा से जुड़ा हुआ है| धरती की ऊपरी सतह जिसे मृदा या मिट्टी कहा जाता है इस दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है| जहाँ से पौधे आवश्यक पोषक पदार्थों के रूप में पोषक तत्वों को ग्रहण करते हैं| वैसे तो नीचे की परतों में चट्टानों तथा खनिज पदार्थों के रूप में पोषक तत्व काफी मात्रा में मौजूद होते हैं परन्तु इनकी रचना बहुत जटिल होने के कारण पौधे इन्हें सीधे रूप में प्राप्त नहीं कर पाते| इसके विपरीत मृदा में सभी पोषक तत्व सरल रूप में पाए जाते हैं और पौधे इन्हें आवश्यकतानुसार आसानी से ग्रहण कर लेते हैं| चूँकि पौधों की जड़ें इसी भू-भाग में केन्द्रित रहती है| इसलिए मृदा का महत्त्व सभी पेड़ पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए बहुत अधिक बढ़ जाता है| अतः सफल कृषि एवं बागवानी के लिए इनका प्रंबधन अति आवश्यक हो जाता है| ज्ञात है कि सभी प्रकार की मृदायें एक ही स्तर पर पौधों का सफल पालन पोषण करने में असमर्थ होने के साथ-साथ मृदा गुणों में कुछ विकार पैदा हो जाते हैं| फसलों की अच्छी उपज के लिए मृदा स्वास्थ्य का उत्तम होना बहुत आवश्यक है| जिसकी सही जानकारी मृदा परीक्षण से प्राप्त हो सकती है| मिट्टी का विशलेषण करना ही मिट्टी परीक्षण कहलाता है| हिमाचल प्रदेश में पिछले कुछ समय से बागवानी क्षेत्र के प्रोत्साहन में सराहनीय प्रगति होने के बावजूद फूलों की पैदावार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर से काफी कम है| इसके अनेक कारणों में पोषक तत्वों की कमी, मिट्टी की गुणवत्ता को जाने बिना बगीचों एवं खेतों में खाद एवं उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग इत्यादि प्रमुख हैं|

मृदा परीक्षण के उद्देश्य

मिट्टी या मृदा परीक्षण के मुख्य निम्नलिखित है:

  1. मृदा में सुलभ पोषक तत्वों की सही मात्रा ज्ञात करना|
  2. परीक्षण के आधार पर फसल पौधों की आवश्यकतानुसार उर्वरकों की सही मात्रा का निर्धारण करना|
  3. मृदा के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लिए मिट्टी उर्वरता का मानचित्र तैयार करना|
  4. समस्यागत मिट्टियों के लिए मृदा सुधारकों को सही मात्रा का निर्धारण करना|

मृदा परीक्षण के लाभ

  1. मृदा परीक्षण से जैविक कार्बन, सुलभ पोषक तत्वों की मात्रा, मिट्टी का पी एच मान, घुलनशील लवण या विद्युत चालकता का पता चलता है|
  2. खादों तथा उर्वरकों का संतुलित प्रयोग किया जा सकता है जिससे उत्तम उपज के साथ खादों एवं उर्वरकों के प्रयोग पर उचित व्यय का निर्धारण किया जा सकता है|
  3. खादों तथा उर्वरकों का संतुलित प्रयोग से भूमिगत जल प्रदूषण से बचाव होता है|
  4. मृदा परीक्षण में उर्वरकों के साथ-साथ गोबर या कम्पोस्ट खाद की भी संस्तुति की जाती है जिससे उर्वरकों की क्षमता में भी वृद्धि होती है|
  5. असिंचित क्षेत्रों  में भी उर्वरकों की उपयुक्त मात्रा का निर्धारण होता है|
  6. समस्याग्रस्त मिट्टियाँ जैसे अम्लीय या क्षारीय के लिए चूना तथा जिप्सम की सही मात्रा का निर्धारण भी मृदा परिक्षण द्वारा ही होता हैं|

मृदा परीक्षण के लिए नमूना लेने का समय

मिट्टी की जाँच फसल की बुआई या बगीचा लगाने के 5-6 महीने पूर्व करवानी चाहिए ताकि मृदा सुधारकों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सके| फलदार बगीचे से मिट्टी का नमूना फल तोड़ने के बाद तथा खाद एवं उर्वरक डालने से पूर्व लेना  चाहिए| बरसात में मिट्टी का नमूना नहीं लेना चाहिए| बगीचों के उचित रख रखाव के लिए कम से कम तीन वर्ष में एक बार मिट्टी परीक्षण आवश्यक होता है|

परीक्षण के लिए नमूना लेने की विधि

मिट्टी का नमूना लेते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए”

यदि एक या दो एकड़ तक का खेत देखने में एक जैसा लगता हो तो उसमें एक नमूना लिया जा सकता ही| यह नमूना उस खेत का सच्चा प्रतिनिधि होना चाहिए| रंग, ढाल, फसलोत्पादन आदि गुणों की दृष्टि से असमान खेतों से अलग-अलग नमूना लेना चाहिये| समस्याग्रस्त खेतों या भागों से भी अलग-अलग नमूना लेना चाहिए|

नमूना की गहराई

धान फसलों, सब्जियों, चारे, दहलन व तिलहन जैसी फसलों के लिए ऊपरी सतह (9-15 सेंटीमीटर) तथा बहुवर्षीय वृक्षों जैसे फल-वृक्ष आदि के लिए ऊपरी सतह के साथ निचली सतह (15-30 सेंटीमीटर) गहरी परतों से भी अलग-अलग नमूना लेना चाहिये| फलोद्यान में वृक्षों की जड़ें अधिक गहराई तक जाती हैं इसलिए विभिन्न गहराई की मिट्टी का परीक्षण आवश्यक होता है|

प्रयुक्त औजार

सबसे साधारण औजार खुरपी है| फावड़ा या बेलचा भी इसके लिए प्रयोग किया जा सकता है| नमूना लेने के लिए उपलब्ध विभिन्न प्रकार के औजार का इस्तेमाल उत्तम रहता है|

विधि यदि खेत समतल हो तथा पूरे खेत में एक फसल उगाई गई हो और खाद एवं उर्वरक समान मात्रा में डाले गये हो तो खेत से एक ही संयुक्त नमूना लिया जा सकता है| नमूना लेने से पहले आवश्यक है कि जिन स्थानों से नमूना लेना है वहाँ जमीन की ऊपरी सतह से घासपात साफ करके 15-20 स्थानों से रैंडम सैप्लिंग करनी चाहिए|

सामान्य एवं सब्जियों वाली फसलों के लिए एक पूरे खेत से वाछित गहराई (0-15 सेंटीमीटर) तक 15-20 नमूने लिए जाते हैं| खड़ी फसलों  में पंक्तियों के बीच से नमूना लेना चाहिए| एक खेत के सभी स्थानों से एकत्र की गई मिट्टी को साफ कागज, कपड़े यह फर्श पर रखकर अच्छी तरह मिला लेना चाहिये| तत्पश्चात मिट्टी को खूब अच्छी तरह मिलाकर चार भागों में विभाजित कर लें एवं दो भागों की मिट्टी रख लें एवं दो भागों की फ़ेंक दें| यह प्रक्रिया तब तक करें जबतक मिट्टी का नमूना 500 ग्राम रह जाए|

फल उत्पादन हेतु मिट्टी परीक्षण के लिए नमूना लेने की विधि अलग है| इसमें कम से कम 4-5 स्थानों पर 3 फुट गहरा गड्ढा बनायें| गड्ढे की एक तरफ की दीवार से एक-एक फुट गहराई के तीन अलग-अलग नमूने बनाएं (0-30, 30-30  तथा 60-90 सेंटीमीटर) प्रत्येक गड्ढे की मिट्टी को उसकी उसी गहराई के अनुसार एक साथ अच्छी तरह मिला लें| इस प्रकार पूरे खेत से तीन नमूने तैयार करें| यदि किसान चाहें तो प्रत्येक गड्ढे व गहराई के नमूनों को अलग-अलग भी परीक्षण करा सकते हैं| यदि मिट्टी का नमूना पहले से स्थापित बगीचे से लेना हो तो तौलियों के बीच से तीन चार जगह से मिट्टी लेकर मिला लेना चाहिए| तीन से दस पेड़ों के तौलिये से मिट्टी का नमूना लेना चाहिए|

इस तरह से प्राप्त नमूनों को एक साफ कपड़े की थैली में भर लेते हैं| दो मोटे कागज के टुकड़ों पर कृषक का नाम व पता, खेत या बगीचे की संख्या, एक कागज थैली के अंदर तथा दूसरा कागज थैली के मुहं पर बाँध दें| प्रयोगशाला  को विशलेषण के लिए 20-30 दिन का समय देना अनिवार्य है|

नोट: नमूना लेने के पश्चात इनको छाया में सुखाना चाहिए क्योंकि धुप में सुखाने से नमूने में उपस्थित तत्वों में अवांछनीय परिवर्तन हो जाते हैं| छाया में सुख जाने के पश्चात ढेलों को फोड़कर बारीक बना लेते हैं तथा खरपतवार, पौधे की जड़ें, कंकड़-पत्थर आदि को निकाल आकर फेक देते हैं|

सावधानियां

नमूना किसी भी दशा में राख, दवाई, रासायनिक खाद या प्रयोग में लाये गये थैलों, डिब्बों अथवा ट्रैक्टर के बैटरी इत्यादि के सम्पर्क नहीं आना चाहिए| नमूना केवल कपड़ा या कागज की नई थैली में डालना चाहिए| नमूना गीला हो तो उसे छाया में सुखाकर  शीघ्र ही प्रयोगशाला भेज देना चाहिए|

पत्ती विशलेषण

हिमाचल प्रदेश भारतवर्ष का एक प्रमुख  राज्य कहा जाता है जहाँ किसानों तथा बागवानों का आर्थिक स्तर तथा जीवन समृद्धता  फलों एवं सब्जियों के उत्पादन पर निर्भर है| फल उत्पादन के बढ़ते लक्ष्य की पूर्ति हेतु भविष्य में फसल की उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए पौधों का समुचित विकास आवश्यक होती है| पौधों में  पोषक तत्वों की आवश्यक एंव संतुलित मात्रा की उपलब्धता बहुत आवश्यक होती है| अतः  फल-पौधों में इन पोषक तत्वों की उपलब्धता की सही जानकारी मृदा एवं पत्ती विशलेषण द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है| पत्ती विशलेषण से पत्तियों में ऊप पोषक तत्वों की मात्रा के अनुसार आपूर्ति को उर्वरकों द्वारा सुनिश्चित किया जा सकता है| अतः किसान एंव बागवान पत्ती विशलेषण के आधार पर पोषक तत्वों की पूर्ति करके अच्छी पैदावार ले सकते हैं|

पत्ती विशलेषण के लिए उचित समय, विशेष ढंग और विशिष्ट पत्तियों का विशलेषण ज्ञान भी आवश्यक होता है| ऐसे फल पौधे जिनकी पत्तियां पतझड़ के दौरान झड़ जाती हैं जैसे सेब, नाशपाती, आडू, खुरमानी व प्लम आदि की पत्तियां का नमूना 1 जुलाई से अगस्त के बीच नई शाखाओं के मध्य से 60-80 पत्तियां लेनी चाहिए| नींबू प्रजातीय फल-पौधों से पत्तियों का नमूना अगस्त-सितम्बर में लेना चाहिए| बसंत में आई शाखाओं में से 5-6 माह बाद आई 60-70 पत्तियों की टहनियों के मध्य भाग से लेने चाहिए| आम में जब पौधों पर बौर (कुर) पड़ गया हो तो नई शाखाओं से पत्तियां और बौर न आने वाली टहनियों के बीच से 60-80 पतियाँ तोड़नी चाहिए| अमरुद के पौधों की पतियों का नमूना लेने का उचित समय जुलाई के अंत तक होता है| बागवान इसी मौसम में पैदा हुई शाखा के अंतिम छोर से पत्तियों का नमूना ले सकते हैं| अंगूर के लिए धुप से प्रभावित मुख्य फल शाखा से नई पत्तियों का चुनाव  1 जुलाई से 15 अगस्त के मध्य किया जाता है|

नमूना लेते समय ध्यान रहे कि पत्तियाँ पूरे बगीचे का प्रतिनिधित्व कर सके| चुनी हुई पत्तियां बीमारी तथा रोगग्रस्त नहीं होनी चाहिए तथा किसी अन्य प्रकोप जैसे छन्द, कटी-फटी या असामान्य नहीं होनी चाहिए| पौधों से लगभग 5 फुट तक ऊंचाई में पाई गई शाखाओं से पौधे के चारों तरफ घूमकर डंठल सहित पत्तियों का नमूना लेना उपयुक्त होता है|

पत्तियों को पोंछकर एवं सुखाकर प्रयोगशाला में भेजना चाहिए| हिमाचल प्रदेश में पत्ती विशलेषण की प्रयोगशालाओं नव बहार शिमला), कोटखाई, बजौरा तथा धर्मशाला में है जहाँ पर बागवान पत्तियों का विशलेषण करवा सकते हैं| डॉ यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन एवं क्षेत्रीय फल अनुसन्धान केंद्र, मशोबरा में भी यह सुविधा उपलब्ध है| नमूना भेजते समय नमूने की पूरी जानकारी जैसे बागवान का नाम व पत्ता, फल का नाम, किस्म पौधे की उम्र, डाली गई खादों का नाम एवं मात्रा अवश्य भेजें|

अम्लीय भूमि का प्रंबधन

ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 490 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि अम्लीय है अर्थात कुल कृषि योग्य क्षेत्रफल का 30% भाग अम्लीय है जिसमें लगभग 259 हैक्टेयर भूमि की पी एच 5.6 से भी कम है| आसाम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, पशिचमी बंगाल, बिहार, जम्मू एवं कश्मीर, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटका, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश में अम्लीय मिट्टियाँ पाई जाती हैं| अम्लीय मिट्टियों के निर्माण आर्द्र जलवायु तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में चट्टानों के विघटन के फलस्वरूप होता है|

हिमाचल प्रदेश में लगभग 1 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि अम्लीय है| यह भूमि चम्बा, कांगड़ा, कुल्लू, मंडी, सिरमौर व शिमला जिलों के कुछ भागों में पाई जाती है| अम्लीय भूमि को समस्याग्रस्त भूमि कहते हैं| क्योंकि अम्लीयता के कारण उपजाऊ शक्ति में कमी आ जाती है|

अम्लीयता के कारण

अधिक वर्षा के कारण मृदा की ऊपरी सतह से क्षारीय तत्व जैसे कैल्शियम एवं मैग्नीशियम आदि पानी द्वारा बह जाते हैं जिसके फलस्वरूप मृदा का पी एच मान 6.5 से कम हो जाता है| इसके अतिरिक्त जहाँ चीड़ प्रजातीय के जंगल हैं उसकी पत्तियां भूमि में मिलने से या भूमि में ग्रेनाइट के अधिकता से भी अम्लीयता पैदा होती है| अम्लीयता के कारण भूमि में  हाइड्रोजन व एल्युमिनियम की घुलनशील बढ़ जाती है जो कि पौधों के स्वास्थ्य एवं पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है|  औद्योगिक क्षेत्र में यह अम्लीयता सल्फर व नाइट्रोजन आदि गैसों के कारण होती है जो वर्षा जल (एसिड रेन) द्वारा भूमि में प्रवेश करती है|

अम्लीय भूमि की समस्याएँ

  1. अम्लीय भूमि में हाइड्रोजन एंव एल्युमिनियम की अधिकता  के कारण पौधों की जड़ों की सामान्य वृद्धि रुक जाती है जिसके कारण जड़ें छोटी, मोटी और एकत्रित हो जाती है|
  2. भूमि में मैगनीज एवं लोहा की मात्रा बढ़ जाती है जिससे पौधे कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं|
  3. मृदा में फास्फोरस एंव मोलिबडेनम की उपलब्धता भी कम हो जाती है|
  4. कैल्शियम, मैग्नीशियम व पोटाश की कमी हो जाती है|
  5. पोषक तत्वों के असंतुलन से पैदावार कम हो जाती अहि|
  6. सूक्ष्मजीवों की संख्या व कार्यकुशलता में कमी आ जाती है जिसके फलस्वरूप विशेष रूप से नाइट्रोजन की स्थिरीकरण व कार्बनिक पदार्थों का विघटन कम हो जाता है|

स्रोत: मृदा एवं जल प्रबंधन विभाग, औद्यानिकी एवं वानिकी विश्विद्यालय; सोलन

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