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सब्जी फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन – एक सफल कहानी

इस भाग में फसलों में तकनीकियों का क्रियान्वय: सब्जी फसलों में समेकित नाशीजीव प्रबंधन जानकारी दी जा रही है।

परिचय

सब्जी उत्पादन भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह पोषण सुरक्षा प्रदान करने के अलावा देश को आर्थिक योगदान भी प्रदान करती है। सब्जियां हमारे आहार का एक अनिवार्य हिस्सा है, यह अनाज फसलों की तुलना में प्रति यूनिट समय एवं क्षेत्र में अधिक भोजन प्रदान करती है जो उत्पादकों की आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकती है। भारत देश की विभिन्न कृषि जलवायु परिस्थितियों के कारण, हम अपने अलग – अलग भू – भागों में 70 से अधिक प्रकार की सब्जियां का उत्पादन करने में सक्षम है। भारत लगभग 10.2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 172.9 मिलियन टन सब्जी उत्पादन करता है। भारत सब्जी उत्पादन में चीन के बाद दुसरे नबंर पर है जो विश्व के लगभग 15 प्रतिशत सब्जी उत्पादन करता है। काफी उत्पदान के बावजूद भविष्य में हमारी बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा  करने के लिए हमें 190 मिलियन टन/ वर्ष सब्जी उत्पादन की आवश्यकता होगी। अन्य फसलों की तुलना में सब्जियों की कोमलता और उच्च उर्वरता स्थिति के कारण कीटनाशकों और रोगों से संक्रमित  होने की संभावना अधिक रहती है। अनुदारवादी आधार  पर कीटनाशकों के कारण सब्जियां में लगभग 25 से 30 प्रतिशत हानि होती है जो +10 हजार मिलियन से अधिक हो सकता है।

भारत में सब्जियों के क्षेत्र का समस्तरीय विस्तार की संभावना बहुत सीमित है, इसक आरं एकमात्र विकल्प उनकी उत्पादकता में वृद्धि और विभिन कीटों के कारण होने वाले नुकसान को रोकना ही है। नई विकसित कम अवधि की सब्जी फसलों की किस्में जैसे, गोभी (ब्रैसिका ओलेरैलेसी कैपिटाटा), टमाटर, कैप्सिकम (कैप्सिकम एसपी), मटर (पिसम सैटिबूम), फ्रेंच बिन फेशोलस बूल्गारिस), चावल और गेहूं आधारित प्रणाली में अच्छी तरीकें से समायोजित  होती है, जिससे फसल सघनता कई गुना बढ़ाई जा सकती है।

उच्च उपज वाली किस्में और संकरों की शुरूआत से उत्पदान  में निसंदेह  बढ़ोतरी हुई है लेकिन इसके परिणाम स्वरुप कीट परिदृश्य में बदलाव आया है, जिसे कि नए कीटों की समस्या पैदा हो गई है। तना छेदक, हेलुला अन्डैलिस फूलगोभी में एक गंभीर समस्या, गाल मिड्ज, एस्पोंडेलिया बैंगन में एक नियमित कीट बन गया है, सर्पिलाकार पर्ण सुरंगक, लिरिओमेजा त्रिफोली संकर टमाटर इलाकों में विनाशकारी हो गये हैं, डायमंड बैक मोथ में पहले ही कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, गर्मियों में भिन्डी की लाल मकड़ी कहर पैदा कर रही है, आदि। इन कीटों के कारण उपज में नुकसान को  कम करने के लिए उत्पादक मुख्य रूप कीटनाशकों की खपत का 13 से 14 प्रतिशत सब्जियों में उपयोग होता है जबकि इसका क्षेत्रफल केवल 7 प्रतिशत ही है।  कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मित्र कीटों की मृत्यु, कम महत्व के हानिकारक कीटों का प्रकोप, वनस्पति में प्रतिरोध, पयार्वरण प्रदूषण और कीटनाशक अवशेषों से कई पारिस्थितिक समस्याएं पैदा हो गई है। पूरे देश में फैले संस्थानों द्वारा किये गये सर्वेक्षण से पता चलता है कि 50 – ७0 प्रतिशत सब्जियां कीटनाशकों के अवशेषों से दूषित हैं। कीटनाशक अवशेषों सब्जियों के निर्यात में प्रमुख बाधा है। सब्जियों को तो कच्ची और बहुत कम प्रसंस्करण के साथ उप्य्गो किया जाता है। डब्ल्यूटीओ जैसे कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा एक गंभीर चिंता व्यक्त हकी गई है जिससे उपभोग्य वस्तुओं के आयात और निर्यात पर बहुत कठोर प्रतिबंध लगाया गया है और बहुत ही कम कीटनाशक अवशेष की सीमा तय की गई है। यह रसायनों के अलावा  दुसरे नियंत्रण के तरीकों को खोजने के लिए इंगित  करता है जिनको कीट प्रबंधन मॉड्यूल में एक संगत तरीके से एकीकृत किया जा सके।  इसलिए, वर्तमान परिदृश्य में कीटनाशकों पर पूर्ण निर्भरता वांछनीय नहीं है। कीट प्रबंधन के लिए एकल दृष्टिकोण को बहुविकल्पी दृष्टिकोण से बदला जा सकता है यह वास्तविक समेकित नाशीजीव (आईपीएम) प्रबंधन है।

देश में प्रमुख सब्जी उप्तादन क्षेत्र

फसल

प्रमुख राज्य

टमाटर

उत्तरप्रदेश, (यूपी), कर्नाटका, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, बिहार

मिर्च

आंध्रप्रदेश (एपी), बिहार, महाराष्ट्र

बैंगन

ओड़िशा, बिहार, पश्चिमी बंगाल (पश्चिम बंगाल), कर्नाटक, गुजरात और मध्य प्रदेश

गोभी

पंजाब, ओड़िशा, पंजाब, पश्चिमी बंगाल और बिहार

फूलगोभी

उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, बिहार, पश्चिमी बंगाल और बिहार

भिन्डी

उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, बिहार, पश्चिमी बंगाल और आंध्र प्रदेश

प्याज

उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश , उत्तर प्रदेश, कर्नाटका, पश्चिमी बंगाल और पंजाब

गाजर

उत्तर प्रदेश, कर्नाटका और पंजाब

ककड़ी

ओड़िशा, आंध्रप्रदेश, पंजाब

मटर

उत्तर प्रदेश, पंजाब, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश और हरियाणा

पत्तेदार सब्जियां

उत्तर प्रदेश, कर्नाटका और पश्चिम बंगाल

 

पिछले दशक (2006 – 2016) के आंकड़ों बताते हैं कि सभी प्रमुख सब्जियों के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। क्षेत्र में सबसे अधिक वृद्धि प्याज के अधीन थी, जिसके बाद फूलगोभी और आलू (सोलेनम ट्यूबरोसम) का स्थान था। लगभग सभी सब्जियों के उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई। उत्पादन में सबसे अधिक वृद्धि प्याज द्वारा दर्ज की गई। उसके बाद टमाटर और फूलगोभी का स्थान आता है। उत्पादकता में प्याज और टमाटर ने सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की उसके बाद भिन्डी और बैंगन है। अधिकांशतय सब्जियों में उत्तर प्रदेश का प्रमुख स्थान है। मिर्ची का सर्वाधिक क्षेत्र आन्ध्र प्रदेश और उड़ीसा में हैं, जबकि बैंगन का ज्यादातर उत्पादन बिहार में होता है। गोभी का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र पंजाब है।

फसल

कीट

रोग

टमाटर

सफेद मक्खी, पर्ण सुरंगक, फल छेदक, चेंपा

पत्ती मोडक, अगेती अंगमारी, पछेती झुलसा, बक आंख विगलन

पत्ता गोभी/फूल गोभी

तना छेदक, पर्ण, सुरंगक, डायमंड बैक, मौथ, तंबाकू सुंडी, चेंपा, पेंटेड बग

मृदुल असिता, काला विगलन

बैंगन

चेंपा, हड्डा बीटल, तना और फसल छेदक, तना मक्खी

जीवाणु म्लानि, फोमोप्सिस, अंगमारी, छोटी पति रोग

भिंडी

फुदका, सफेद मक्खी,चेंपा, तना और फल छेदक, तना मक्खी

पिला सिरा मोजेक विषाणु

शिमला – मिर्च

थ्रिप्स, चेंपा, फल – छेदक

फ्यूजेरियम म्लानि, पत्ती मोडक,

मिर्च

थ्रिप्स, चेंपा, फल - छेदक

सर्कोस्पोरा पट्टी धब्बा, प्यूजेरियम म्लानि, पत्ती मोड, एन्थ्राक्नोज

प्याज

थ्रिप्स

स्तेम्पिप्लयम झुलसा

लौकी

लाल, पंपकिन बीटल, छेदक, फल मक्खी

पीथयम रोट, चूर्णिल असिता, सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बा

 

प्रमुख सब्जियों में किसानों की साझदारी से आईपीएम प्रौद्योगिकी का वैधीकरण

एक किसान केन्द्रित और किसान आधारित भागीदारी कार्यक्रम, आईपीएम प्रौद्योगिकी के वैधीकरण के लिए मुख्य फसलें जैसे – टमाटर, गोभी, फूलगोभी, बैंगन और शिमला मूर्च में 250 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 1350 किसान परिवारों को सम्मिलित करके उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड में 15 वर्ष (2001 -2015) में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के विभिन्न संस्थानों और राज्यों की कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग के साथ किया गया। विभिन्न महत्वपूर्ण सब्जी फसलों के लिए आईपीएम तकनीकों का विकास और वैधीकरण क्षेत्रीय कार्यक्रम के तहत देश के विभिन्न स्थानों पर किया गया और इन तकनीकों को लगातार परिष्कृत किया गया।

टमाटर की फसल में आईपीएम

टमाटर कई कीटों से क्षतिग्रस्त होता है। मुख्य नाशीजीव में फल छेदक, पर्ण सुरंगक और सफेद मक्खी (जो पत्ती मोड़क रोग की वाहक भी आते हैं)। रोगों में पूर्व जमाव आद्र गलन, जमाव पश्चात् आद्र गलन, पछेती झुलसा, बक आँख सड़न  और विषाणु रोग हैं।

मान्य समेकित नाशीजीव प्रबंधन युक्तियाँ

नर्सरी अवस्था

  • आद्र गलन रोग की रोकथाम के लिए अच्छी जल निकासी की अवस्था करें, तथा इसके लिए जमीन से 10 सेंमी ऊंची क्यारी बनाकर ही नर्सरी तैयार करें।
  • नर्सरी की बुवाई से पहले मिटटी को 0.45 मिमी मोटी पालीथीन शीट से 2 – 3  सप्ताह तक ढककर मिट्टी का सूर्य तापीकरण करें। ऐसा करने से मृदाजनित रोगों के नियंत्रण में सहायता मिलती है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे।
  • विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त 50 ग्राम ट्राईकोडरमा की सक्षम स्ट्रेन (कॉलनी इकाइयों के गठन/सीएफ यू/ 2x100/ग्राम ) को किलो ग्राम गोबर की खाद, में मिलाएं और 7 – 14 दिनों के लिए संवर्धन के लिए छोड़ दें व उसके पश्चात् 3 वर्ग मीटर क्यारी में ट्राईकोडर्मा संवर्धित खाद को मिट्टी में मिला दें।
  • सफेद मक्खी जैसे रोगवाहकों के नियंत्रण के लिए मलमल जाली (40 गेज) का इस्तेमाल करें।
  • आद्र – गलन के नियंत्रण हेतु 10 ग्रा. प्रति किग्रा बीज ट्राईकोडर्मा या कैप्टान 75 डब्लू पी के साथ (0.25  प्रतिशत स. त.) की दर से बीजोपचार करें। आवश्यकता होने पर कैप्टान 70 डब्ल्यू पी 0.25 प्रतिशत की दर से मिट्टी में मिला दें।
  • टमाटर नर्सरी से 20 दिन पूर्व अलग से गेंदा की पौध तैयार करें।

मुख्य फसल के दौरान

  • चूसक कीटों तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु रोपाई से पूर्व, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल के 7 मिली प्रति ली पानी के मिश्रित घोल में टमाटर पौध की जड़ों को 15 मिनट तक डूबोकर रखना चाहिए।
  • पुष्पन के समय टमाटर की प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद 45 दिन पुराने गेंदा के पौधों की एक पंक्ति फसल प्रपंच के रूप से लगानी चाहिए। पहली व अंतिम पंक्ति गेंदा फसल की होने चाहिए और इन पर 250 एलई प्रति हे. एचएएन पीवी का छिड़काव करना चाहिए।
  • रोगों के फैलने की संभावना को कम करने के लिए टमाटर की किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी 60x45 सेंमी तथा संकर किस्मों के इए 90 x 60  सेंमी की दूरी रखें।
  • पर्ण सुरंगक, चेंपा तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात् 5 प्रतिशत नीम अर्क का छिड़काव करें।
  • आवश्यकता पड़ने पर सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु पौध रोपण के 25 दिन पश्चात् इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 150 मिली अथवा थिओमेथाक्सम 25 डब्ल्यू जी का 200 ग्रा अथवा स्पायरोमेसिफिन 22.9 एससी का 625 मिली अथवा डायमिथोएट 30 ईसी 990 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल बेधक, पर्ण सुरंगक एवं सूत्रकृमियों के प्रकोप को कम करने के लिए पौध रोपण के 20 दिन पश्चात् 250 किग्रा प्रति हे. की दर से नीम की खली का मृदा में प्रयोग करें।
  • कुटकी के नियंत्रण हेतु फेनाजैकवीन 10 ईसी 1250 मिली अथवा स्पायरोमेसिफिन 22.9 एससी का 625 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फल बेधक की निगरानी के लिए 2 फेरामोन प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगाएं। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अन्तराल पर पुराने ल्योर के स्थान पर ताजा ल्योर लगायें।
  • पौधों के शीर्ष तीन पर्णों की निगरानी फल बेधक के अण्डों के लिए करें।
  • अंडे के परजीवी ट्राईकोग्रामा प्रैटीयोसम को 1.0 लाख प्रति हे. की दर से एक सप्ताह के अन्तराल पर फूल आरंभ होने की अवस्था से 4 – 5 बार छोड़ें।
  • गेंदा के फूलों और कलियों में फल बेधक नष्ट करने के लिए एचएएनपीवी (250 एल ई) (2x100 पीओबी) का शाम के समय छिड़काव करें।
  • टमाटर की पौध रोपने के 28, 35 एवं 42 दिनों पश्चात् एचएएनपीवी (2x100 पीओबी) (250 एल ई) प्रति हे. का शाम के समय छिड़काव करें। सूर्या की अल्ट्रा – वायलेट किरणों से तीव्र अपघटन रोकने के लिए 2 प्रतिशत गुड़ मिलाकर छिड़काव करें।
  • फल बेधक क्षतिग्रस्त फलों के समय समय पर एकत्रित कर नष्ट कर एडं। ऐसा करना सुंडी का एक फल से दुसरे फल में पहुँचने से रोकने के लिया अनिवार्य है।
  • फल बेधक का अधिक प्रकोप होने पर केवल आवश्यकता होने पर रासायनिक कीटनाशक जैसे क्लोरेट्रंनीलिप्रोल 18. 5 एससी का 150 मिली या नोवाल्यूरोन 10 ईसी 750 मिली की दर से इन्डोक्सकार्व 14. 5 एससी 400 मिली की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पर्ण कुंचन संक्रमित पौधों को नियमित रूप से एकत्रित कर नष्ट कर दें।
  • अगेती एवं पछेती झुलसा का नियंत्रण हेतु केप्टान 50 डब्ल्यू पी 2.5 किग्रा प्रति हे. 1000 लीटर पानी के साथ या मेनकाजेब 75 डब्ल्यू 1.5 – 2 किग्रा. प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी के साथ सुरक्षात्मक छिड़काव करें और आवश्यकतानुसार एजोक्सीस्ट्रोबिन 23 प्रतिशत एससी का 500 मिली प्रति हे. कि दर से 500 लीटर पानी के साथ या मेटालेक्सिल 3.3  प्रतिशत + क्लोरोथेलोनील 33.1 प्रतिशत एससी 1000 मिली प्रति हे. मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ मौसम और फसल अवस्थानुसार छिड़काव करें। सायमोक्सनिल 8 प्रतिशत + मेन्कोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1.5 किग्रा या ट्यूबिकोनाजोल 50 प्रतिशत + ट्राईफलोक्साईट्रोबिन  25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 350 ग्रा प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • वक अक्षु सड़न के प्रकोप को कम करने के लिए टमाटर के पौधों में डंडे लगाकर उनका सहारा दें और आवश्यकतानुसार मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी 1.5 – 2.0 किग्रा 750 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • बैक्टीरियल सूखा रोग के नियंत्रण हेतु पौध पर स्ट्रैप्टोसायक्लीन (40 – 100 पी पी एम) घोल का छिड़काव खेत में करें।

बंदगोभी/फूलगोभी की फसल में आईपीएम

कई कीट – नाशीजीव और रोग इन फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रमुख कीटों में हीरक पृष्ठ शलभ, तना छेदक, तम्बाकू की इल्ली, मृदुला असिता, जीवाणु काला विगलन, जड़ – गाँठ सूत्रकृमि आदि हैं। तम्बाकू की इल्ली अगस्त – अक्टूबर के दौरान सक्रिय होती है। वयस्क पतंगा रात्रिचर और रोशनी से अत्यधिक आकर्षित होते हैं। गोभी में हीरक पृष्ठ शलभ का नर्सरी 4 लार्वा और मुख्य फसल में 10 लार्वा/पौधे आर्थिक दहलीज स्तर होता है।

बीज/नर्सरी अवस्था

  • अच्छी जल निकासी हेतु एवं डंपिंग ऑफ आदि से बचने के लिए जमीन की सतह से लगभग 10 सेंमी ऊपर उठी हुई क्यारी तैयार करें।
  • नर्सरी की बुवाई से पहले मिट्टी को 0.45 मिमी मोटी पालीथिन शीट से 2 – 3 सप्ताह तक ढककर मिट्टी सूर्य तापिकरण करें। इसके लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  • क्यारी की मिट्टी जी 50 ग्रा. प्रति वर्ग मीटर नीम की खली से उपचारित करें।
  • सड़न रोग से बचाव हेतु बीज को ट्राईकोडर्मा के प्रभावी स्ट्रेन से 4 ग्रा, प्रति किग्रा बीज से उपचार करें। ट्राईकोडर्मा 1 प्रतिशत डब्ल्यू पी में 10 ग्राम प्रति ली की दर से पानी मिलाकर इस घोल में पौध को 30 मिनट डूबाएँ ताकि सड़न रोग से बचाव किया जा सके।
  • नर्सरी के दौरान रोगों के नियंत्रण हेतु ट्राई कोडर्मा की 250 ग्राम मात्रा को 3 किग्रा गोबर की सड़ी हुई बारीक खाद में अच्छी प्रकार मिलाकर एक सप्ताह के लिए छोड़ दें। बाद में 3 वर्ग मीटर क्यारी में मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला दें।
  • डैम्पिंग ऑफ के नियंत्रण के लिए कैप्टान 75 डब्ल्यूपी 0.25 प्रतिशत अथवा कैप्टान  75 डब्ल्यू एस 0.2 से 0.3  प्रतिशत की दर से प्रयोग करें।
  • बरसाती मौसम में पेंटेड बैग एवं पछेती रबी मौसम में चेंपा से बचाव हेतू इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस 5 ग्राम प्रति किग्रा की दर से बीज उपचार करें।
  • यदि फसल में 1 लार्वा/पत्ती की दर से हीरक पृष्ठ शलभ उपस्थित हो तो 3 गम प्रति लीटर की दर से बेसिलस थ्रूजयानसिस का छिड़काव करें।
  • मृदुरोमिल फफूंद के लिए 2.5 ग्रा प्रति लीटर जल की दर से मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी या मेटालेक्सिल मेन्कोजेब 35 एससी का छिड़काव करें।
  • कभी – कभी बरसात के मौसम में नर्सरी में दिखाई देने वाले तना छेदक की रोकथाम के लिए एनएसकेई 5 प्रतिशत या कर्बेनिल 50 डब्ल्यूपी का 1600 ग्रा प्रति हे, की दर छिड़काव करें।

मुख्य फसल

  • रोगों के फैलाव को कम करने के लिए पंक्ति से पंक्ति व पौधे की दूरी 60 x 45 सें.  मी रखें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ तथा चेंपा के लिए बंदगोभी की प्रत्येक 25 कतारों के बाद फंदा फसल के रूप में सरसों की एक कतार उगायें (बंदगोभी की रोपाई के 15 दिन पूर्व सरसों की एक कतार बोई जाती है) खेत में पहली और आखिरी कतार सरसों की होनी चाहिए। सरसों की फसल जैसे ही अंकुरित हो उस पर 0.1 प्रतिशत की दर से डाइक्लोरोवास 76 ईसी या क्यूनालफास 25 ईसी का 1.5 मिली प्रति ली जल के जल के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के लिए रोपाई के 10 दिन बाद 3 ग्रा. प्रति ली. की दर से बेसिलस थारूजायानसिस का छिड़काव करें तथा 3 प्रकाश पाश अर्थात बल्ब/एकड़ की दर से लगायें। कीट के वयस्क प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं और पानी से भरी बाल्टी में गिर जाते हैं। 3 – 4 दिनों में अधिकांश कीट मर जाते हैं।
  • हीरक पृष्ठ शलभ की निगरानी के लिए 2 फेरोमोन प्रपंच प्रति एकड़ की दर से लगायें। प्रत्येक 20 – 25 दिन के अंतराल पर फेरोमोन ल्यूर को बदलें।
  • एक सप्ताह  के अन्तराल पर 1.0 लाख प्रति हे. की दर से 3 – 4 बार एंड परजीव्याभ (पैरासिटायड) ट्राईकोडर्मा बैक्ट्री फसल में छोड़ें।
  • आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा के लिए मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी अथवा जिनेब 75 डब्ल्यूपी डब्ल्यू पी का 1.5  - 2.0 किग्रा प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी पानी के साथ छिड़काव करें। संक्रमित पत्तियों को पौधों से तोड़कार हटा देना प्रभावी  होता है।
  • तना बेधक के लिए एनएसकेई  5 प्रतिशत या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू पी का 1000 ग्राम अथवा मलाथियोन 50 ईसी का 1500 मिली प्रति हे. की दर से 1000 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • हीरक पृष्ठ शलभ के नियंत्रण के लिए आरंभिक अवस्था (रोपाई के 18 – 25 दिन बाद) में एनएसकेई 5 प्रतिशत का छिड़काव करें। प्रति पौधा कीट की एक से अधिक संख्या होने पर 10 – 15 दिन के अन्तराल यह छिड़काव दोहराएँ। एक फसल मौसम में अधिक से अधिक 3 – 4 एनएसकेई छिड़कावों की आवश्यकता होती है।  एनएसके ई का छिड़काव किया जाना आवश्यक है। छिड़काव के साथ किसी स्टीकर का प्रयोग करें। इससे चेंपा का भी नियंत्रण होगा। इसके लिए 40 किग्रा प्रति हे एनएसके ई  पाउडर की आवश्यकता होगी।
  • हीरक पृष्ठ शलभ का नियंत्रण के लिये आवश्यकता के अनुसार साईपरमेथ्रिन 10 ईसी का 650 मिली प्रति हे. या स्पिनोसेड 2. 5 एससी का 10 ग्रा प्रति हे. या इमेमेक्टिन बेंजोएट 5 एसजी का 150 ग्रा. प्रति हे. अथवा क्लोरएन्ट्रानीलिप्रोल 18.5 एससी 50 मिली प्रति हे. अथवा नोवेल्यूरान 10 ईसी 750 मिली प्रति हे. अथवा इन्डोक्साकार्ब  15.8 एससी का 266 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • फूलगोभी की पछेती फसल में चेपा के नियंत्रण के लिए 75 ग्रा प्रति हे. की दर से एसिटामाईप्रीड 20 ईसी या डायमिथयोएट 30 ईसी का 650 मिली प्रति हे. की दर से 500 – 1000 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • पंखदार चेंपा को फंसाने के लिए पीले चिपचिपे ट्रैप लगायें।
  • तम्बाकू की इल्ली के एंड समूहों तथा लार्वा को एकत्रित करें क्योंकि ये झूंड में रहने वाली प्रकृति के होते हैं। वयस्क भृंगों की निगरानी तथा इनके झुंडों  को फंडों में फंसाने के लिए 5 प्रति हे. की दर से फिरोमोन फंदे लगायें।
  • जब सूँडियों युवा हो तो एसएलएनपीवी (2x109 पीओबी)  250 एलई प्रति हे. की दसे 2 प्रतिशत गुड़ के साथ 2 – 3 बार छिड़काव करें।
  • तम्बाकू की इल्ली के नियंत्रण के लिए साईंएन्ट्रानीलीप्रोल 10.26 ओडी  600 ग्रा प्रति हे. या ट्राईक्लोरोफोन 50 ईसी 750 ग्रा प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।
  • पेंटिड बग के नियंत्रण के लिए आवश्यकतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी का 660  मिली प्रति हे. की दर से छिड़काव करें।

बैंगन की फसल में आईपीएम

नर्सरी अवस्था से लेकर फसल की कटाई तक कीट नाशीजीव फसल को प्रभावित करते हैं। प्ररोह तथा फल बेधक इस फसल का मुख्य कीट है जो पूरे भारतवर्ष में पाया जाता है। इसका प्रकोप पौध रोपण से शुरू होकर फल की तुड़ाई तक लगातार जारी रहता है। लाल मकड़ी कुटकी और पत्ती फूद्का का फसल की विभिन्न चरणों प्रकोप उपज में काफी हानि का कारण बनते हैं। अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा में पत्तियां पर वलयाकार वृत्त बनते हैं।

नर्सरी अवस्था

  1. जुलाई अगस्त के दौरान सण/ढेंचा का हरी खाद के रूप में प्रयोग करें।
  2. आद्र गलन आदि को रोकने, तथा अच्छी जल निकासी के लिए जमीन से 10 सेंमी ऊंची क्यारी बनाकर ही नर्सरी तैयार करें।
  3. जून के महीने में मृदा सौर्यीकरण के लिए 3 सप्ताह तक 45 गेज (0.45 मिली) मोटी पालीथीन की चादर बिछाएं जिससे मृदावाहित कीटों, जीवाणु मुर्झान जैसे रोगों तथा सूत्रकृमियों को कम करने में सहायता मिलती है। तथापि यह ध्यान रखना चाहिए कि सौर्यीकरण के लिए मृदा में पर्याप्त नमी मौजूद हो।
  4. 3 किग्रा. गोबर की खाद में 250 ग्रा कवकीय विरोधी ट्राईकोडर्मा को मिलाएं तथा कल्चर को समृद्ध बनाने के लिए तीन सप्ताह तक ऐसे ही रखा रहने दें। 21 दिनों के पश्चात् इस सामग्री को 3 वर्ग मीटर की क्यारी में मिलाएं।
  5. फसल बेधक प्रतिरोधी/संकर प्रजाति आदि का चुनाव करें।
  6. आद्र – पतन एवं जड़ गलन के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडर्मा 1 प्रतिशत के साथ बीजोपचार (5 ग्रा प्रति किग्रा बीज की दर से) नर्सरी उपचार (400 वर्ग मी. क्षेत्र का 250 ग्रा प्रति 50 लीटर पानी की दर से), पौध जड़ उपचार (1 प्रतिशत 15 मिनट तक) करें और आवश्यकतानुसार कैप्टान 75 डब्ल्यूपी से 0.25 प्रतिशत की दर से मृदा उपचार करें।

मुख्य फसल

7. सफेद मक्खी आदि के लिए पीले चिपचिपे फंदे या डेल्टा फंदे 2 – 3 प्रति एकड़ की दर से लगायें।

8. चूसक नाशीजीवों तथा पत्ती मोड़क कीट को नियंत्रित करने के लिए एक- एक सप्ताह के अन्तराल पर एनएसकेई  5 प्रतिशत के 2 – 3 छिड़काव करें।

9.यदि सफेद मक्खी तथा अन्य चूसक कीट नाशीजीवों का प्रकोप अब भी आर्थिक हानि सीमा से अधिक हो तो 250 -340  मिली प्रति हे. की दर से 1000 लीटर पानी में फेनप्रोपेथिन 30 ईसी या डाईफेनथाओयूरान 50 डब्ल्यूपी 600 मिली प्रति हे. या फोस्फामिडोन 40 एसएल का 650 ग्रा प्रति हे.की दर से 500 – 750 लीटर पानी के साथ या फोस्फामीडोन  40 एसएल 750 मिली प्रति हे. की दर से 500  लीटर पानी के घोल में छिड़काव करें।

10.  छोटी पत्ती रोग से प्रभावित पौधों की छंटाई की जानी चाहिए।

11.  बेधक शलभों को बड़े पैमाने पर पाश में  फंसाने के लिए 100 प्रति हेक्टेयर की दर से गंधपाश लगाये जाने चाहिए। प्रत्येक 15 – 20 दिन के अंतराल पर पुराने ल्योर के साथ पर ताजा ल्योर लगायें।

12.  आरंभिक अवस्थाओं में समय – समय पर क्षतिग्रस्त प्ररोहों को काट देना चाहिए।

13.  10 प्रति एकड़ की दर से पक्षियों को आकर्षित करने के लिए पक्षी ठिकाने बना देने चाहिए।

14.  एनएसकेई  के छिड़काव से भी बेधक कीटों का प्रकोप बहुत कम हो जाता है। नीम के तेल (1 प्रतिशत) का प्रयोग करना भी बेधकों के संक्रमण को कम करने में सहायक सिद्ध होता है। यद्यपि  यह बहुत कम प्रभावी पाया गया है।

15.  प्ररोह तथा फल बेधक के लिए एक – एक सप्ताह के अंतराल पर 4 – 5 बार 1 – 1.5 लाख प्रति हे. की दर से टी ब्रेसिलियेन्सिस के अंड पर्जिव्याभ को छोड़ें।

16.  सूत्रकृमियों तथा बेधकों से होने वाली क्षति को कम करने के लिए रोपाई के 25 और 60 दिन बाद पौधों की कतारों के साथ – साथ मिट्टी में 250 किग्रा प्रति हे. की दर से नीम की खली का उपयोग (दो खुराकों में)। यदि पवन की गति तेज हो तथा तापमान 30 डिग्री सैल्सियस से अधिक हो तो खली का उपयोग न करें।

17.  प्ररोह तथा फल बेधक के प्रभावी नियंत्रण के लिए 15 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार क्लोरेएन्ट्रानीलीप्रोल18.5 एससी का 200 मिली प्रति हे. अथवा ईमेमेकटिन बेंजोएट 5 एससी का 200 ग्रा अथवा ट्राईकलोरफोन 50 ईसी का 1.0 किग्रा अथवा फोसेलोन 35 ईसी का 300 मिली प्रति हे. की दर से 500 – 600 लीटर पानी में 15 दिन के नियमित अन्तराल पर छिड़काव करें।

18.  फोमाप्सिस एवं छोटी पत्ती रोग से संक्रमित पौधों को एकत्रित करके नष्ट करें और खेत को साफ  - सुथरा रखें।

19.  फोमाप्सिम प्रभावित फल और पर्ण धब्बा रोग के नियंत्रण के लिए खेत में 1.5 – 2.0 किग्रा. प्रति हे. की दर से जिनेब 75 डब्ल्यूपी 750 – 1000 लीटर पानी के घोल में अथवा कर्बेन्दाजाजिम 50 डब्ल्यू पी 300 ग्रा प्रति हे. 600 लीटर पानी के घोल के साथ छिड़काव करें।

20.  बैंगन की फसल लगातार उगाने से बेधकों तथा मुर्झान रोग का संक्रमण अधिक होता है। अत: गैर सोलेनेसी प्रजाति की फसलों को अपनाते हुए उचित फसल क्रम का पालन करना चाहिए।

शिमला, मिर्च/मिर्च की फसल में आईपीएम

शिमला मिर्च (कैप्सिकम एन्युअम) – थ्रिप्स और फल बेधक, शिमला मिर्च के गंभीर कीट हैं। थ्रिप्स की आबादी को अगर प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रित नहीं किया जाता है तो उन्हें 370 C  से अधिक तापमान पर यह फलन को गंभीर नुकसान पहुँचाती है और इससे होने वाले नुकसान को कीटनाशकों के छिड़काव से कम नहीं कर सकते हैं।

मिर्च – मिर्च मुख्य रूप से चूसने वाले कीट और फल बेधक द्वारा क्षतिग्रस्त होतीहैं। मिर्च से चूसने वाले नाशीजीवों थ्रिप्स और कटुकी सूखी परिस्थितियों में मुख्य कीट हैं। थ्रिप्स के कारण होने वाली क्षति 30 – 50 प्रतिशत हो सकती है। चेंपा मुख्यत: शुष्क. बादलों वाले ठंडे और आर्द्र मौसम की स्थितियों में प्रकट होते हैं। एफिस गॉसिपी और माइजस पर्सिकी, रस को चूसते हैं तथा पौधों की वृद्धि को कम करते हैं। गाल मिड्ज (एस्पोंडिलिया  कैप्सिकिया) मिर्च के फल टेड़ा – मेड़ा करते हैं। फसल को चना फल बेधक और  तंबाकू कैटरपिलर (स्पोडोप्टेरा लिट्यूरा) द्वारा भी क्षतिग्रस्त किया जाता है डैम्पिंग ऑफ पाथियम एफीनिडारमैटम  के कारण होता है।

प्रबंधन युक्तियाँ

नर्सरी अवस्था

  1. आर्द्र पतन से बचने के लिए अच्छी जल निकासी आवश्यक है जिसके लिए भूमि स्तर से लगभग 10 सेंमी ऊपर उठी हुई नर्सरी की क्यारियां तैयार करें।
  2. मृदा से पैदा होने वाले नाशीजीवों के लिए मृदा सौर्यीकरण के लिए क्यारियों को 45 गेज (0. 45 मिमी) मोटाई की पालीथीन शीट से तीन माह सप्ताह के लिए ढकें। मृदा सौर्यीकरण के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  3. तीन किग्रा की गोबर की खाद में कवकीय विरोधी टी हरजेनियम (सी. एफ. यू. 2 x 109 प्रति ग्रा) मिलाएं और समृद्धिकरण के लिए उसे लगभग 7 दिनों के लिए छोड़ दें। 7 दिनों के बाद 3 मी2 की क्यारियों में मिट्टी में मिलाएं।
  4. आर्द्र पतन और चूसकनाशिक जीवों का प्रबंधन करने के लिए विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त ट्राईकोडर्मा से 10 ग्रा प्रति किग्रा बीज की दर से तथा इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू एस का 10 ग्रा प्रति किग्रा बीज की दर से बीजोपचार करें जिससे कि प्रारंभिक स्थितियों में ही नाशीजीवों का प्रबंधन किया जा सके।
  5. स्यूडोमोनास पलूओरिसेन्स (टीएनऐयु, स्ट्रेन, आईटीसीसी बीई 0005 का 10 ग्राम प्रति किग्रा बीज) अथवा ट्राईकोडर्मा विरिडी से बीजोपचार  करें)
  6. आर्द्र पतनसड़न के प्रबंधन के लिए आवश्यकतानुसार कैप्टान 70 डब्ल्यूपी 0.25 प्रतिशत या 70 डब्ल्यूएस 0.2 – 0.3 प्रतिशत अथवा मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी 0.3 प्रतिशत की दर से मृदा उपचार के लिए प्रयोग करें।
  7. सर्दी के मौसम के दौरान (दिसंबर – जनवरी) ठण्ड पाले से बचाने के लिए नर्सरी की क्यारियों के एक सिरे पर खसखस का शेड लगायें। क्यारियों को पाले से होने वाली क्षति से बचाने के लिए रात के समय पालीथीन की शीटों से ढक दें। तथापि दिन के समय इन शीटों को हटा दें जिससे की वे सूर्य की गर्मी प्राप्त कर सकें।

मुख्य फसल

8.   रोपाई के समय दस मिनट के लिए पौधों को 5 मिली प्रति ली की दर से स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस के घोल में डूबोयें।

9.    परभक्षी पक्षियों की सुविधा के लिए 10 प्रति एकड़ की दर से पक्षियों के ठिकाने स्थापित करें।

10.  हापर, चेंपा और सफेद मक्खी आदि के लिए 2 प्रति एकड़ की दर से डेल्टा जाल स्थापित करें।

11.  चेंपा, थ्रिप्स, हापर और सफेद मक्खी के विरूद्ध नीम उत्पादन एनएसककेई 5 प्रतिशत का छिड़काव करें। प्रतिरोपण के 15 – 20 दिनों के बाद जबकि रेटिंग 1 – 2 के बीच होती है थ्रिप्स के विरूद्ध एनएसकेई 5 प्रतिशत का छिड़काव 2 – 3 बार करें। यदि थ्रिप्स और सफेद मक्खी की संख्या फिर भी अधिक रहे तब फेंप्रोथ्रिन 30 ईसी का 250  - 340 मिली प्रति हे. 750 – 1000 लीटर पानी अथवा पाइ रिप्रोक्सिफेन 10 ईसी का 500 मिली अथवा स्पिनोसेड 45 एससी का 160 ग्रा प्रति हे./ 500 ली (थ्रिप्स के लिए) अथवा फिप्रोनिल 5 एससी का 800-1000 मिली प्रति हे. की दर से 1000 लीटर पानी का साथ छिड़काव करें।

12.  यदि थ्रिप्स और कूटकियाँ दोनों एक साथ दिखाई दें तो फेनप्रौथपैथ्रिन 30 ईसी का 250 मिली प्रति हे. अथवा इथियोन 50 ईसी का 1.5 ली प्रति हे. की दर से छिड़काव उपयोगी होता है।

13.  पर्ण कूंचन रोग/मोजेक काप्म्लैस्क से प्रभावित पौधों किन नियमित रूप से छटाई करते हुए उन्हें नष्ट करना चाहिए।

14.  अंडे देने के दौरान वयस्कों की निगरानी के लिए एच, आर्मीजेरा. एस लिट्यूरा के लिए 5 प्रति हे. की दर से फेरोमोन जाल लगायें।

15.  फल बेधक के लिए 1.5 लाख प्रति हे. की दर से ट्राईकोडर्मा प्रजाति के परजीवी अण्डों को आवधिक रूप से छोड़ें।

16.  प्रारंभिक स्थिति में या जब और जैसे आवश्यकता हो तो एचएएनपीवी/एसएलएनपीवी (250 एलई प्रति हे.) (2x109 पीओबी) के 2 – 3 छिड़काव करें।

17.  फूल एवं फल की प्रारंभिक अवस्था के दौरान फल बेधक के लिए स्पिनोसेड 45 एस

का 60 मिली अथवा एमेमेकटिन बेंजोएट 5 एसजी का 200 ग्रा अथवा इन्डोकासकार्ब  14.5 एससी का 400 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ केवल आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। ये एच अर्मिजेरा के छोटे लार्वे पर अधिक प्रभावी हैं।   हैं इन कीटनाशकों का शाम के समय प्रयोग करना ही उचित है।

18.  बेधक के कारण क्षतिग्रस्त फलों को समय – समय पर हटाकर उनको नष्ट किया जाना चाहिए।

19.  फल सड़न और डाई बैक के प्रबंधन हेतु मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी अथवा प्रोपीनेब 70 डब्ल्यूपी का 1.5 – 2.0 किग्रा प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी के साथ या जिनेब 70 डब्ल्यूपी का 0.5 प्रतिशत की दर से सुरक्षात्मक छिड़काव  व आवश्यकता आधारित डायफेनकोनाजोल 25 ईसी का 0.05 प्रतिशत अथवा मायक्लोब्यूटानिल 10 डब्ल्यूपी का 0.04 प्रतिशत या केप्टान 70 प्रतिशत + हेक्साकोनाजोल 5 डब्ल्यूपी का 500 -1000 ग्रा प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानीं के साथ छिड़काव करें।

20.  चूर्णिल आसिता के प्रबंधन के लिए सल्फर 52 एससी का 2 ली प्रति हे. की दर से 400 लीटर पानी में या सल्फर 80 डब्ल्यूपी का 3.13 किग्रा प्रति हे. की दर से 1000 लीटर पानी के घोल के साथ छिड़काव करें।

21.  चूर्णिल असिता और फल सड़न के प्रबंधन के लिए आवश्यकता आधारित हेक्सकोनाजोल 2 एससी का 3 ली प्रति हे. या टेब्यूक्यूनाजोल 25.9  प्रतिशत ईसी का 500 मिली या एजोक्सीट्रोबिन 11 प्रतिशत +टेब्यूक्यूनाजोल  18.3 प्रतिशत एससी का 600 – 700 मिली प्रति हे. की दर से 500 – 700 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।

22.  डाई – बैक के लिए पी. फ्लोरोसेंस (जैविक दवाइयां) का सामान्य छिड़काव भी किया जा सकता है।

23.  विभिन्न रोगों के लिए पी फ्लोरोसेंस या ट्राई कोडर्मा का सामान्य रूप से छिड़काव किया जा सकता है।

24.  फ्यूजेरियम मुर्झान प्रबंधन के लिए खेत तैयार समय मृदा में गोबर की खाद (250 किग्रा.) में विश्वसनीय श्रोत से लिए गये ट्राईकोडर्मा (5 किग्रा प्रति हे.) को मिला कर प्रयोग करें।

25.  यदि मुर्झान प्रतिवर्ष नियमित रूप से होता है तो फसल चक्रण किया जा सकता है।

भिन्डी की फसल में आईपीएम

भिन्डी मालवेशी कुल की आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण सब्जियों में से एक है। प्रमुख कीट में पत्ती फुदका (अम्रारकासा बीगूटूला) प्ररोह तथा फल बेधक (ईरायस विटेटला) सफेद मक्खी (बेमिशिया टैबेसी) शिरा चित्ती रोग की वाहक, लाल मकड़ी कुटकी एफीड (एफिड्स गौस्पेपी), चूर्णिल आसिता जो एरिसेफे सिकोर्सएरम से होता है।

प्रबंधन युक्तियाँ

 

  • पीला शिरा चित्ती रोग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
  • ट्राईकोडर्मा 4 ग्रा प्रति किग्रा बीज की दारफ से बीजोपचार करें।
  • सफेद मक्खी तथा फसल बेधक के वयस्क शलभों के लिए अवरोधक फसल के रूप में भिन्डी के खेत के चारों ओर ज्वार या मक्का की फसल की बुवाई करें।
  • चुसक कीट नाशिजिवों के लिए एक सप्ताह के अन्तराल पर 2 – 3 बार 5 प्रतिशत की दर से एनएसकेई (अजादीरोक्टिन आधारित) का छिड़काव करें।
  • पीले चिपचिपे फंदे/डेल्टा फंदे  2 प्रति एकड़ की दर से लगायें।
  • लाल मकड़ी कुटकी के नियंत्रण के लिए 2 मिली  प्रति की दर से प्रोपरजाईट  57 ईसी या डाईकोफोल 18.5 ईसी का छिड़काव करें।
  • परभक्षी पक्षियों की सूविधा के लिए खेत में 10 प्रति एकड़ की दर से डंडे खड़े करें।
  • फुदका, चेंपा व अन्य चुसक कीटों के लिए 100 मिली प्रति हे. की दर से इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू जी या 100 ग्रफा प्रति हे. की दर से थियोमैथाक्सेम 25 डब्ल्यूजी का 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव दो सप्ताह के पश्चात् करें।
  • समय – समय पर पीली शिरा चित्ती विषाणु से प्रभावित पौधों को खेत से हटाकर नष्ट करते रहें।
  • 10.  सफेद मक्खी के प्रबंधन के लिए फेन्प्रोपैथ्रिन 30 ईसी का 250 मिली या ओक्सिडेमेटों  मिथाइल 25 ईसी का 1 ली प्रति हे. की दर से       छिड़काव करें।

    11.  चूर्णिल आसिता के नियंत्रण के लिए अजादिरेक्टीन आधारित नीम तेल 0.03 प्रतिशत का 2 -2.25 लीटर प्रति हे. 500 लीटर पानी के       साथ या सल्फर 80 डब्ल्यूपी 3.13 किग्रा प्रति हे. की दर से 1000 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।

    12.  बेधक की सक्रियता की निगरानी के लिए 2 प्रति एकड़ की दर से गंधपाश लगायें। प्रत्येक 15-20 दिनों बाद फंदे के ल्यूर को बदलें।

    13.  अंड परजिव्याभ, ट्राईकोडर्मा किलोनिस को प्रति सप्ताह के अन्तराल पर 4 – 5 बार 1. 0 लाख प्रति हे. की दर से खेत में छोड़ें।

    14.  प्रभावित प्ररोहों को खेत को हटाकर नष्ट करें।

    15.  प्ररोह और फल बेधक की संख्या यदि ईटीएल (5.3 प्रतिशत संक्रमण) से अधिक हो जाये तो इमेमेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत 150 ग्रा        प्रति हे. या कोलरएन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी 125 मिली प्रति हे. या क्यूनाल्फोस 25 ईसी का 800 मिली प्रति हे, की दर से 500          लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।

    16.  समय – समय पर पीली शिरा चित्ती विषाणु रोग से प्रभावित पौधों को खेत से हटायें व फसल की कटाई के पश्चात् खेत की गहरी        जुताई करें।

    17.  फसल अपशिष्टों, भिन्डी के पौधों को ठूंठों को खेत से हटाकर नष्ट करना।

    18.  सफेद मक्खी को प्रारंभिक अवस्था में रोकने के लिए 7 माइक्रोन मोटाई के स्लेटी काले रंग की पारदर्शी मल्चिस का प्रयोग करें।

    प्याज की फसल में आईपीएम

    प्याज की फसल मुख्यतया थ्रिप्स से संक्रमित होती है जो उपज में काफी नुकसान करता है, स्टैम्फिलियम झुलसा और मैगट कभी – कभी संक्रमित करते हैं।

    नर्सरी अवस्था

  • पानी की अच्छी निकासी के साथ व धान की भूसी की राख के साथ जमीनी सतह से 10 सेंमी ऊपर तक नर्सरी की क्यारी बनायें।
  • जनवरी – फरवरी के दौरान संभावित वर्षा के कारण होने वाले पीलेपनी को कम करने के लिए यूरिया का 0.2 प्रतिशत से आवश्यकता       आधारित छिड़काव करें।
  • पौध की क्यारी में गोबर की खाद/वर्मीकम्पोस्ट से संवर्धित ट्राईकोडर्मा 50 ग्रा. प्रति 3 सें मी की दर से मिलाये।
  • मुख्य फसल

     

  • प्याज की थ्रिप्स के खिलाफ बाधा फसल के रूप में बाहरी पंक्ति में मक्का की बुवाई करें।
  • रोपाई से पहले स्यूडोमोनास फ़्लूओरिसेन्स के 5 मिली प्रति लीटर घोल में पौध को डुबायें।
  • भली प्रकार सड़ी हुई गोबर की खाद 2.5 ग्राम टी. हरजियेनाम प्रति 10 वर्ग मीटर की हिसाब से मिलाएं।
  • थ्रिप्स के प्रबंधन के लिए नील रंग के ट्रैप्स 20 प्रति एकड़ के दर से स्थापित करें।
  • सल्फर की कमी दूर करने के लिए आवश्यकता आधारित सल्फर 80 डब्ल्यूपी का 0.2 प्रतिशत की दर से प्रयोग करें।
  • फसल मौसम के दौरान पर्याप्त सिंचाई करें क्योंकि निंरतर नमी के कारण मृदा में विद्यमान थ्रिप्स सड़ जाते हैं।
  • 10.  थ्रिप्स के प्रबंधन के लिए स्प्रिंकलर के द्वारा खेती की सिंचाई करें।

    11.  थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए डायमिथिओएट 30 ईसी का 660 मिली या फिप्रोनिल 80 डब्ल्यूजी का 75 ग्रा या ओक्सिडेमेटोन मिथाईल 25 ईसी का 1.2 ली प्रति हे. के दर 500 लिटर पानी के साथ छिड़काव करें। बल्ब बनने की प्रारंभिक अवस्था यानी रोपाई के 7 सप्ताह बाद या 50 दिन के पश्चात् थ्रिप्स को नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है।

    12.  नीम की खली को सूत्रकृमि प्रबंधन के लिए 250 किलो प्रति हे. के हिसाब से डालें।

    13.  डाऊनी मिल्ड्यू व ब्लाईट से बचाव के लिए जिनेब 75 डब्ल्यू पी का 1.5  - 2.0  किग्रा प्रति हे. की दर से 750 – 1000 लीटर पानी के साथ आवश्यकता आधारित छिड़काव करें।

    14.  बैंगनी ब्लाच के नियंत्रण के लिए डाईफ़ेन्कोनजोल  का 0.1  प्रतिशत, टेब्यूक्यूनाजोल  25.9 प्रतिशत एम/एम ईसी का 625 – 750 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के घोल में आवश्यकता आधारित छिड़काव करें।

    कद्दूवर्गीय सब्जियां की फसल के आईपीएम

    कद्दूवर्गीय सब्जियां कूकरबीटेसिय्सी से संबंधित है, जिसमें 118 वंश और 825 प्रजातियाँ को शामिल किया गया है, जिनमें से 36 वंश और लगभग 100 प्रजातियाँ भारत में पायी जाती है\ कद्दू (क्यूक्यूमिसा मेलों), कद्दू (क्यूकूराबिटा माँस्साटा), तरबूज (सिटूलस लैनाटस), एश ग्रौर्ड  (बेनिस्कोसा हियारपीड़ा), करेला (मोमोर्डिका चर्निताया), लौकी (लेगेनेरिया सिसरेरिया), तोरी (लूफा एक्यूटीगूला), ककड़ी, ग्रीष्म स्कवैश (क्यूकूर्बिटा पेपो), विंटर स्क्वैश, उठाई लौकी और कून्दरू (कोकसीनिया कोर्दिफोलिया) समान्यत: पूरे देश में उगते हैं। ककड़ी की पैदवार 28,000  हेक्टेयर में होती है, जिसका वार्षिक उत्पादन 0.161 मिलियन टन का होता है, जबकि कद्दू स्क्वाश और लौकी 0.5 मिलियन हेक्टेयर पर उगाये जाते है वार्षिक उत्पादन 4.6 9 मिलियन टन कहा जाता है कद्दूवर्गीय सब्जियां को गर्मी, प्रकाश के लंबे दिन और बहुत नमी की आवश्यकता होती है। कद्दूवर्गीय सब्जियां पाले का सामना नहीं कर सकती है और कम तापमान पर निम्न गुणवत्ता वाले फल का उत्पादन होता है} फल मक्खी एक अत्यधिक विनाशकारी कीट है। रोग फलों की संख्या और आकार को कम करके फसल उपज को कम करते हैं और फल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। डंपिंग ऑफ झुलसा, ग्लानी और म्लानि पूरे देश भर में कद्दूवर्गीय सब्जियां कम उपज का कारण है।

    प्रबंधन युक्तियाँ

     

  • ट्राईकोडर्मा के सक्षम स्ट्रेन से 10 ग्राम प्रति किग्रा की दर से बीजोपचार करें।
  • करेले पर हट्टा बीटल, लौकी के लाल पमकिन बीटल के लिए फसल की प्रारंभिक अवस्था में नीम 300 पीपीएम का 10 मिली प्रति लीटर की दर से 2 छिड़काव करें।
  • करेले की ककड़ी मोथ से सुरक्षा के लिए बेसिलस थ्रूंजीसेंस के 2 ग्राम प्रति ली की दर से 2 छिड़काव करें।
  • फल मक्खी के बृहत क्षेत्र में प्रबंधन के लिए क्यूलोर ट्रैप 10 प्रति एकड़ की दर से स्थापित करें। लकड़ी के छोटे टूकड़े को इथोनिल: क्यूल्योर कीटनाशी (डीडीविपी) 8:2:1  के अनुपात के घोल में 48 घंटे तक डूबोयें।
  • फल मक्खी के प्यूपे व परजीवियों को धुप में लाने के लिए मिट्टी को समतल करें।
  • फल मक्खी के प्रबंधन के लिए पीले रंग के चिपचिपे ट्रैप को 10 प्रति एकड़ की दर से स्थापित करें।
  • मृदुल असिता व नमी में कमी लाने व हवा के आसान आवागमन के लिए ककड़ी को बांस के सहारे या ग्रीन हाऊस में लगायें।
  • लौकी और ककड़ी की प्रारंभिक अवस्था में लाल पाम्किन बीटल के प्रबंधन के लिए डीडीविपी 76 ईसी का 500 ग्राम सत प्रति हे. अथवा ट्राईक्लोरोफोन 50 ईसी का 1.0 किग्रा प्रति हे की दर से आवश्यकता अनुसार छिड़काव करें।
  • करेले और खीरे की लाल मकड़ी कुटकी के प्रबंधन के लिए डाईकोफोल 18.5 एससी का 1.5 ली प्रति हे. की दर से छिड़काव की नमी बनाये रखने के लिए स्टीकर (0.1 प्रतिशत) का प्रयोग आवश्यक है। सफेद मक्खी, पर्ण सुरंगक, थ्रिप्स, लाल पम्किन बीटल के लिए साईएन्ट्रानीलिप्रोल 10.8  ओडी का 900 मिली प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  • 10. सूत्रकृमि प्रबंधन के लिए नीम खली का 250 किग्रा प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार प्रयोग करें।

    11. चूर्णिल असिता और एन्थ्राक्नोज के प्रबंधन के लिए कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी 300 ग्रा प्रति हे. की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। लौकी में एन्थ्राक्नोज के प्रबंधन के लिए थायोफिनेट 70 डब्ल्यूपी का 1430 ग्रा प्रति हे. की दर से 750 लीटर पानी के साथ प्रयोग किया जा सकता है।

    12.ककड़ी में मृदुल आसिता के प्रबंधन हेतु अजोक्सिट्रोबिन 23 प्रतिशत का 500 मिली की दर से या साइमोक्सनिल 8 प्रतिशत + मेन्कोजेब 64 प्रतिशत का 1.5 किग्रा प्रति हे. की दर से 500 लीटर पानी के साथ आवश्यकता अनुसार छिड़काव करें। कद्दूवर्गीय सब्जियों में एन्थ्राक्नोज और मृदुल आसिता के प्रबंधन हेतु जिनेब 75 डब्ल्यू पी का 1.5 – 2.0 किग्रा प्रति हे. की दर से प्रयोग किया जा सकता है और कद्दूवर्गीय सब्जियां में मृदुल आसिता के प्रबंधन हेतु अमेक्टोडसि _ डाईमेथोमौर्फ 20.27  प्रतिशत एससी का 420 – 525 मिली प्रति हे. के दर से 500 लीटर पानी के साथ आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।

    13. मिट्टी में बेरों की कमी दूर करने के लिए 10 किग्रा प्रति हे. की दर से बोरेक्स का प्रयोग करें। बोरेक्स का 100 ग्रा. प्रति 100 ली की दर से पर्ण छिड़काव भी किया जा सकता है।

    अदरक की फसल आईपीएम

    अदरक का प्रमुख नाशीजीव सफेद लट खरीफ मौसम (जून से अक्टूबर) के दौरान गंभीर होआ है। रोगों में प्रकंद सड़न और जीवाणु विल्ट है।

    प्रबंधन युक्तियाँ

     

  • ट्राईकोडर्मा हर्जियेनम को गोबर की खाद के साथ मिलाकर 250 ग्रा प्रति. क्विंटल के हिसाब से मिलाएं।
  • बीजाई से 15 - 20 दिन पहले 0.45 मिमी मोटाई की पारदर्शी पोलीथिन शीट से मृदा तापीकरण करें।
  • बीज प्रकंदों को 2 घंटों के लिए प्लास्टिक की पोलीथिन थैलियों में डालकर भी तापीकरण किया जा सकता है।
  • बुवाई से पहले 10 मिनट तक बीज प्रकंदों को 51 डिग्री सेंटीग्रेड पर गर्म पानी में उपचारित करें।
  • बुवाई से पहले बीज प्रकंदों को फफूंदीनाशक जैसे की कार्बनडाई जिम ५० डब्ल्यू पी 100 ग्राम + मेन्कोजेब 75 डब्ल्यू पी (250 ग्राम) या ट्राईकोडर्मा हरजियम के साथ 6 – 8 ग्राम लीटर पानी में 30 मिनट तक डुबो के रखें।
  • सफेद लत के नियंत्रण के लिए कर्बेरायल 50 डब्ल्यू पी का 2 ग्राम प्रति ली पानी की दर से छिड़काव करें। जुलाई के मध्य तक 3 – 4 बार तक इस छिड़काव को दोहराया जा सकता है।
  • खड़ी फसलों में कारबेनडाइजीम 50 डब्ल्यूपी का 0.2 प्रतिशत या मेन्कोजेब 64 प्रतिशत + मेटालेक्सिल 8 प्रतिशत का 0.3 प्रतिशत की दर एक महीने की पुरानी खड़ी फसल में या एक वर्षा के बाद इनको घोल बना कर खेतों को गीला करे इस दौरान, प्रकंद पर से मिट्टी हटा लेनी चाहिए ताकि फफूंदीनाशक का प्रकंदों से बेहतर संपर्क हो सके।
  • प्रकंदों से बीज (7 – 80 किग्रा) बनाने के उद्देश्य से प्रकंदों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी (100 ग्रा) + मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी 250 ग्रा क्लोर पायरीफोस 20 ईसी  250 मिली प्रति 100 लीटर पानी के घोल में 1 घंटे तक डुबो कर छाया में सुखायें व भंडारण करें।
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    आईपीएम को अपनाने से बढ़ी हुई आय का उपयोग विभिन्न सामाजिक गतिविधियों और परिवर की सामान्य कल्याण जैसे शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य और अतिरिक्त कृषि मशीनरी की खरीद, जानवरों और अन्य सुविधाओं पर किया जाता है।

    आईपीएम को अपनाने के परिणामस्वरूप, किसान व्यवासायिक स्तर पर नर्सरी की शुरूआत करके आईपीएम के संदेश फ़ैल रहे हैं। आईपीएम का विवरण कुशल किसानों और नर्सरी कर्मियों को उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि आईपीएम को अपनाने में अन्य किसानों को मार्गदर्शन किया जा सके। आईपीएम गांवों में कीटनाशक की खपत में काफी कमी आई है और नतीजतन, फसल कटाई पर भिन्डी और बैंगन में कीटनाशक के अवशेषों में पर्याप्त कमी आई है। कई कीटनाशक की दूकानें आईपीएम के प्रभाव के कारण नीम और एनपीवी बेच रही हैं। सब्जी फसलों में खतरनाक कीटनाशकों के उच्च अवशेषों को देखते हुए, किसान अब मोनोक्रोटोफास जैसी लंबे समय और सतत अवशेषों वाले कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर रहे हैं। जोरदार प्रचार, किसान बैठकें और गोष्टी आदि के कारण, अधिक से अधिक किसान आईपीएम को अपनाने के साथ – साथ रासायनिक कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से अवगत हुए हैं।

    बहु – संस्थागत समर्थन के साथ अंत: विषयी टीम का प्रतिभागी दृष्टिकोण,सब्जी फसलों में आईपीएम वैधीकरण कार्यक्रम की मुख्य ताकत रही है। बड़े क्षेत्र में आईपीएम के वैधीकरण के कारण इसकी प्रभावशीलता की दृश्यता बढ़ाने तथा विभिन्न क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के प्रसार में काफी मदद मिली हैं, हालांकि, यह अनुभव किया गया है कि सब्जी फसलों में आईपीएम को बढ़ावा देना एक चुनौती है क्योंकि सब्जी फसलों के तहत कम क्षेत्र, कच्ची उपयोग में लिया जाना, कम अंतराल पर फसल की कटाई और कटाई से प्रयोग में लाने में कम समय अंतर है। अल्पकालिक संकर की उपलब्धता, 2 से 3 फसलों का उगाया जाना और वे – मौसम में खेती, पूरे वर्ष विभिन्न कीटों को नियमित जगह प्रदान करते हैं। जैव कारकों और जैव कीटनाशकों पर किसान का विश्वास बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है इसलिए, रासायनिक कीटनाशकों और मिश्रणों के अंधाधुंध उपयोग अच्छी तरह से स्थापित हो गया है जो इनकी आसानी से उपलब्धता के कारण अब भी किसानों का भरपूर साथ पा रहे हैं। हालाँकि , यह परिदृश्य कई बीजों के लिए निजी कंपनियों द्वारा विकसित बीमारी प्रतिरोधी संकरों और जैवकारकों के बारे में प्रारंभिक जागरूकता के साथ बदल रहा है। सब्जियों में रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव जो आम तौर पर 8 से 10 होते हैं, आईपीएम में वैध विकल्प प्रदान करके 4 – 5 तक कम हो जाते है जैसे एनएसकेई, ट्राईकोडर्मा, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस, एचएएनपीवी, एसएलएनपीवी, ट्राईकोडर्मा, फेरोमोन जाल, डेल्टा जाल, जैव कीटनाशकों जैसे रामोन और फसल ज्यामिति।

    लेखन: एच. आर. सरदाना, एम. एन. भट और मनोज चौधरी

    स्त्रोत: राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान केंद्र

     

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