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मिश्रित मछली पालन संस्कृति

इस भाग में मिश्रत मछली पालन संस्कृति और उससे होने वाले फायदे बताये गये हैं।

मिश्रित मछली-सह-बतख पालन

तालाब में मछलीपालन के साथ बतख पालन का समन्वित खेती लाभप्रद व्यवसाय है।

मछली सह बतख पालन से प्रोटीन उत्पादन के साथ बतखों के मलमूत्र का उचित उपयोग होता है। मछली सह बतख पालन से प्रति हेक्टयर प्रतिवर्ष 2500-3000 किलोग्राम मछली, 15000-18000 अण्डे तथा 500-600 किलोग्राम बतख के मांस का उत्पादन किया जा सकता है। इस प्रकार के मछलीपालन में न तो जलक्षेत्र में कोई खाद उर्वरक डालने की आवश्यकताहै, और न ही मछलियों को पूरक आहार देने की आवश्यकता है। मछलीपालन पर लगने वाली लागत 40 से 60 प्रतिशत कम हो जाती है। पाली जाने वाली मछलियां और बतखें एक दूसरे की अनुपूरक होती हैं। बतखें पोखर के कीड़े-मकोड़े, मेढ़क के बच्चे टेडपोल, धोंधे, जलीय वनस्पति आदि खाती हैं। बतखों को पोखर के रूप में साफ-सुथरा एवं स्वस्थ परिवेद्गा तथा उत्तम प्राकृतिक भोजन उपलब्ध हो जाता है तो बतख के पानी में तैरने से पानी में आक्सीजन की धुलनशीलता बढ़ती है जो मछली के लिए आवश्यक है।

मछलीपालन संबंधित व्यवस्थाएं

पोखर का चयन

मछली सह बतख पालन हेतु बारहमासी तालाब चयन किया जाता है, जिसकी गहराई कम से कम 1.5 मीटर से 2 मीटर होना चाहिए।

इस प्रकार के तालाब कम से कम 0.5 हेक्टर तक के हो सकते हैं। अधिकतम 2 हेक्टेयर तक के तालाब इस कार्य हेतु उपयुक्त होते हैं।

2. तालाब की तैयारी

मछली सह बतख पालन हेतु निम्न तरीके से तालाब की तैयारी करते हैं:-

(1) तालाब में पायी जाने वाली जलीय वनस्पति को निकाल देना चाहिए। तालाब में जलीय वनस्पति, मछलियों के विचरण तथा जाल चलाने में बाधक, मछली के शत्रुओं को प्रश्रय, आँक्सीजन संतुलन को प्रभावित तथा तालाब में उपलब्ध पोषक तत्व का शोषण करती है। जलीय वनस्पतियां, यंत्र से या मजदूर से निकलवा देना चाहिए। रासायनिक विधि 2-4 डी, अमोनिया आदि का प्रयोग कर जलीय वनस्पतियों की सफाई की जा सकती है। जैविक विधि अंतर्गत ग्रासकार्प जलीय वनस्पतियों को भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं। अतः ग्रासकार्प के संचयन से जलीय वनस्पति का उन्मूलन हो जाता है।

(2) मांसाभक्षी तथा अवांछित मछलियों का उन्मूलन  तालाब में बार-बार जाल चलाकर मांसभक्षी तथा अवांछित मछलियों को निकाल देना चाहिए। शत प्रतिशत मछलियो को निकालना संभव नहीं हो, तो महुआ खली 200 से 250 पी.पी.एम. या 2000 से 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टयर अथवा ब्लीचिंग पाउडर 25-30 पी.पी.एम. प्रति हेक्टर की दर से उपयोग करने पर इन मछलियों का उन्मूलन किया जा सकता है। सबसे अच्छा तरीका महुआ खली का प्रयोग है।

3. चूने का प्रयोग

यह पोषक तत्व कैल्द्गिायम उपलब्ध कराने के साथ जल की अम्लीयता बढ़ने पर नियंत्रण हानिकारक धातुओं का अवक्षेपित विभिन्न परजीवियों के प्रभाव से मछलियों को मुक्त रखने, तालाब के घुलनद्गाील आँक्सीजन स्तर को ऊंचा उठाने में प्रभावकारी है। साधारणतः 250 से 350 किलोग्राम प्रति हेक्टयर की दर से चूने का प्रयोग करना चाहिए।

4. मत्स्यबीज संचय

प्रति हेक्टर 6 हजार से 8 हजार मिली फिंगरलिंग (अंगुलिकाएं) संचय करना चाहिए। सतह का भोजन करने वाली मत्स्यबीज की मात्रा 40%(कतला 25%, सिल्वरकार्प 15%) तथा मध्यम सतहों का भोजन करने वाली मत्स्यबीज की मात्रा 30%(रोहू 20%,ग्रासकार्प 10%) तथा तलीय का भोजन करने वाली मत्स्य बीज की मत्रा 30%(मृगल 20%, कामनकार्प 10%) संचय किया जाना चाहिए।

5. ग्रासकार्प के लिए ऊपरी आहार

ग्रासकार्प के लिए जलीय वनस्पति हाइड्रिला, नाजाम, वरसीम नेपियर आदि भोजन के रूप में देना चाहिए। ग्रासकार्प को भोजन उसके वजन के आधे भार के बराबर दिया जाना चाहिए।

6. मछली वृद्धि की जांच

प्रतिमाह जाल चला कर मछलियों की वृद्धि बीमारी और परजीवियों के आक्रमण की जांच करें, ऐसी कोई समस्या आए तो उपचार करें। जाल चलने से पोखर के तल में एकत्रित दूषित गैस निकल जाती है और पोषक तत्व मुक्त होकर खाद्य श्रृंखला आरंभ करते हैं।

बतखपालन से संबधित व्यवस्थाएं

1. बतखों के लिए बाड़ा (घर)

बतख दिन के समय पोखर में विचरण करती हैं, रात में उन्हें घर की जरूरत होती है। पोखर की मेढ़ पर बांस, लकड़ी से बतख का बाड़ा बनाना चाहिए। बाड़ा हवादार व सुरक्षित हो। तालाब के पानी के सतह के ऊपर तैरता हुआ बतख घर भी बनाया जा सकता है, इसके लिए मोबिल आयल के ड्रमों का उपयोग किया जा सकता है। तैरते हुए धर का फर्द्गा इस प्रकार होना चाहिए कि बतख की विष्ठा सीधे पानी में गिरे। बतख धर को हमेद्गाा साफ-सुथरा एवं सूखा रखना चाहिए। बतखों का बाड़ा इतना बड़ा होना चाहिए कि प्रति बतख कम से कम 0.3 से 0.5 वर्गमीटर की जगह हो।

2. बतखों का चयन

भारतीय प्रजातियों में सिलहेट मेटे और नागेद्गवरी महत्वपूर्ण हैं। मछलियों के साथ बतखपालन हेतु इंडियन रनर प्रजाति सबसे उपयुक्त पाई गई है। खाकी केम्पबेल प्रजाति भी लोकप्रिय है। 2-3 माह में बच्चों को आवद्गयक बीमारी रोधक टीके लगवाने के बाद पालन हेतु उपयोग में लाना चाहिए। सामान्यतः एक हेक्टर के लिए 200-300 बतख पर्याप्त होती है, जो एक हेक्टर जलक्षेत्र हेतु खाद के रूप में विष्ठा देने के लिए पर्याप्त होती हैं। एक बतख, एक दिन में करीब 125 ग्राम विष्ठा का त्याग करती है।

3. बतखों के लिए पूरक आहार

पोखर में उपलब्ध प्राकृतिक भोजन बतखों के लिए पर्याप्त नहीं होता, इसलिए बतखों को पूरक आहार भोजन के रूप में देना चाहिए। पूरक आहार के रूप में बतख मुर्गी आहार और राइसब्रान कोढ़ा 1:2 के अनुपात में 100 ग्राम प्रति बतख प्रतिदिन खिलाया जाता है। आहार बतखों के घर या मेड़ पर दिया जा सकता है। बतख घर में काफी गहरे 15 सेंटीमीटर चौड़े, 5 सेटीमीटर लम्बे बर्तनों मे पानी रखना चाहिए।

4. अण्डों की प्राप्ति

सामान्यतः बतख 24 सप्ताह की आयु होने पर अण्डे देने प्रारंभ करती है तथा 2 वर्ष तक बतख अण्डे देती है। बतख रात में ही अण्डे देती है। अण्डे देने के लिए बतख धर मे कुछ सूखी धास या पैरा विछाना चाहिए। सुबह अण्डे एकत्रित कर लेवें।

5. बतखों की विष्ठा का उपयोग खाद के रूप में किया जाता है बतख की अपनी विष्ठा तालाब में त्यागती रहती है। ऐसी स्थिति में अन्य कोई खाद या उर्वरक तालाब में डालने की आवश्यकतानहीं है। बतख बाड़ा में रात्रि में एकत्र हुई विष्ठा सुबह तालाब में डाल देना चाहिए। एक बतख एक दिन में लगभग 125 से 150 ग्राम विष्ठा का त्याग करती है। इस प्रकार प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष 1 हजार किलोग्राम से डे़ढ़ हजार किलो ग्राम विष्ठा प्राप्त हो जाएगी। विष्ठा में 81%नमी, 0.51%नाइट्रोजन तथा 0.38%फास्फेट होती है। विष्ठा मछली के वृद्धि के लिए लाभदायक है।

6. बतखों के स्वास्थ्य की रक्षा

प्रत्येक माह बतखों का स्वास्थ्य संबंधी परीक्षण करना चाहिए। बतख की आवाज में परिवर्तन, सुस्त चाल, कम मात्रा में भोजन ग्रहण करना, नाक व आंख से लगातार पानी का बहना इत्सादि लक्षण पाए जाने पर बीमार बतख को पोखर में नहीं जाने देना चाहिए और तुरन्त पशु चिकित्सक से सलाह लेकर उपचार करवाना चाहिए।

स. उत्पादन

मछली सह बतखपालन से प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष 2500 किलो मछली का उत्पादन सम्मलित है साथ ही 14 हजार से 15 हजार अण्डे तथा 500-600 किलोग्राम बतख का मांस उपलब्ध होगा। इस प्रकार मछली के साथ-साथ बतखपालन करने से मत्स्य कृषकों को अतिरिक्त आय मिल सकेगी।

मछली सह-बतखपालन से लाभ

1. मछली सह बतखपालन से तालाब में अतिरिक्त खाद डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

2. मछलियां बतख की गिराई गई खुराक तथा विष्ठा को भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं, जिसके कारण अतिरिक्त कृत्रिम आहार मछलियों को नहीं देना पड़ता।

3. बतखें जलीय वनस्पति पर नियंत्रण रखती हैं।

4. बतखों को अपने भोजन का 50-60%भाग जलक्षेत्र से ही प्राप्त हो जाता है तथा कीड़-मकोड़े, पौधे, मेढ़क के बच्चे भोजन के रूप में ग्रहण करती हैं, जो कि मछलियो के लिए हानिकारक है।

5. तालाब में बतख के तैरते रहनेसे वायुमण्डल की आँक्सीजन निरंतर पानी में धुलती है।

6. बतख भोजन के लिए तालाब के तल की मिट्‌टी को उछालती रहती हैं, जिसके कारण उसमें विद्यमान पोषक तत्व पानी में आते रहते हैं, जिससे जलक्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि होती है।

आर्थिकी, एकीकृत मछली सहबतखपालन 0.5 हेक्टर पोखर

 

क्रं.

मद

मात्रा

दर

 

राशि

 

(अ)

आवर्ती व्यय

 

 

 

 

 

1.

तालाब पट्‌टा राद्गिा

 

1000/-

 

500/-

 

2.

महुआ खली (तालाब की तैयारी)

1250 किलो

250/- प्रति क्विंटल

 

3150/-

 

3.

मत्स्य अंगुलिकाएं (100 मि.मी.)

2500

400/- प्रति हजार

 

1000/-

 

4.

बतख बाड़ा निर्माण

 

अनुमानित

 

500/-

 

5.

बतख के चूजे का मूल्य

100 नग

12/- प्रति नग

 

1200/-

 

6.

आहार

3650 किलो

5/- प्रति किलो

 

18250/-

 

7.

अन्य आकस्मिक ब्यय एवं दवाईयां

 

अनुमानित

 

500/-

 

(अ)

योगः-

 

-

 

25,100/-

 

(ब)

बैंक की किस्त पर ब्याज 12:

 

-

 

6597/-

 

 

रू.3585़रू.3012/-

 

 

 

 

 

(क)

कुल ब्यय (अ़ब)

 

-

 

31,697/-

 

(ख)

सकल आय

 

 

 

 

 

1.

1250 किलोग्राम मछली के विक्रय से

1250

30/-

 

37,500/-

 

2.

बतख के अण्डे

7930

2.0/- प्रतिनग

 

15,860/-

 

3.

बतख मांस विक्रय

250किलो

45/- प्रतिकिलो

 

11,250/-

 

(ख)

योगः-(1़+2 +3)

 

-

 

64610/-

 

(ग)

शुद्ध आय (ख-क)

 

 

 

 

 

 

रू. 64,610 - 21,697 त्र रू. 32,913

 

-

 

32 ,913

 

एक हेक्टयर जलक्षेत्र में मछली सह बतख पालन से शुद्ध आय रू. 65,826/- प्रतिवर्ष अनुमानित है।

 

 

एकीकृत मछली सह मुर्गीपालन

मछलीपालन के साथ मुर्गीपालन व्यवसाय लाभप्रद है। इस तकनीक के अंतर्गत मुर्गी की पोल्ट्री लीटर (मुर्गीधर के फर्श का विष्ठायुक्त भूसा) मछलीपालन पोखर में खाद के रूप में डाला जाता है। इस प्रकार के मत्स्यपालन में न तो जलक्षेत्र में कोई अलग से खाद डालने की आवश्यकता पड़ती है, और न ही पूरक आहार  देने की। मुर्गी सह मछलीपालन से प्रति  हेक्टर प्रतिवर्ष लगभग 2000 स  2500 किलोग्राम  मछली 60000 से 72000 तक अण्डे तथा 550-600 किलोग्राम मुर्गी का मांस प्राप्त होता है।

1. मुर्गीपालन संबंधित व्यवस्थाएं:-

1.  मुर्गियों के घर

मुर्गियों के लिए घर का इंतजाम तालाब के किनारे भूमि पर  या तालाब के अन्दर झोपड़ी बनाकर किया जा सकता है। मुर्गी के धर को आरामदायक गर्मियों में ठण्डा और सर्दियों में गरम रखने की ब्यवस्था होनी चाहिए। मछली सह मुंर्गीपालन अंतर्गत मुर्गियों को रखने की आधुनिक सघन प्रणाली अपनाई जाती है। इसमें पक्षियों को मुर्गी के लिए बनाये गए धर के अन्दर ही निरंतर रखा जाता है। इसमें बैटरी सिस्टम (पिंजरों का कतार) की तुलना में डीप लीटर सिस्टम को प्राथमिकता दी जाती है। डीप लीटर सिस्टम में 10 सेटीमीटर ऊंची बारीक किन्तु सूखी धान की भूसी, कुट्‌टी किया गया धान का पैरा, लकड़ी का बुरादा, गेहूं की भूसी आदि किसी चीज की बिछाई जाती है। यही डीप लीटर है। मुर्गियों का मलमूत्र नीचे बिछाए गए तह पर गिरता है। यदि नीचे का लीटर कुछ गीला सा हो जाता है, तो उसे सूखाने के लिए चूना डाला जाता है तथा उसमें हवा लगती रहे। जरूरत पड़ने पर भूसी आदि भी डाली जाती है। लगभग दो माह में यह डीप लीटर बन जाता है, और 10-12 माह में पूर्णतया विकसित लीटर बन जाती है। जो परिपूर्ण खाद है। मुर्गियों की विष्ठा में 1: नाइट्रोजन होता है तथा निर्मित विकसित लीटर में यह 3: होता है।

2.  पोल्ट्री लीटर का मछलीपालन तालाब में खाद के रूप में उपयोग

मुर्गी धर से निकाले गए पोल्ट्री लीटर का भंडारण कर लिया जाता है। मछलीपालन हेतु तालाब में इसे प्रतिदिन सुबह 50 किलो प्रति हेक्टर की दर से डाला जाता है। यदि शैवाल पूंज (काई अधिक) होने पर पोल्ट्री लीटर कुछ दिन नहीं डालना चाहिए। 25-30 मुर्गियों से एक वर्ष मे एक मेट्रिक टन पोल्ट्री लीटर बनता है। अतः एक हेक्टर जलक्षेत्र के लिए 500-600 मुर्गियां रखना पर्याप्त होता है। इतने पक्षी 20 मेट्रिक टन (खाद) लीटर  देगें। पूर्णतया तैयार लीटर में 3: नाइट्रोजन, 2: फास्फेट और 2: पोटाश रहता है।

1  मुर्गियों का चयन

अच्छे पक्षियो में रोड आईलैंड या सफेद लेगहार्न प्रजाति उपयुक्त है। मुर्गी के आठ सप्ताह के चूजों को रोग प्रतिरोधक टीके लगााकर रखा जाता है। प्रति हेक्टर जलक्षेत्र के लिए 500-600 मुर्गी रखना उपयुक्त है।


4 मुर्गियों के लिए आहार

मुर्गियों को आयु के अनुरूप संतुलित मुर्गी आहार दिया जाता है। आहार फीड हापर में रखा जाता है, ताकि आहार बेकार न जाए। 9-20 सप्ताह तक ''ग्रोअर मेद्गा'' 50-70 ग्राम प्रति पक्षि प्रति दिन की दर से और तत्पद्गचात्‌ लेयर मेद्गा 80-120 ग्राम प्रतिदिन की दर से आहार दिया जाता है।

5 अण्डे देना

मुर्गियां 22 सप्ताह बाद अण्डे देना प्रारंभ कर देती हैं। मुर्गियों को 18 माह तक अण्डे की प्राप्ति हेतु रखना चाहिए।

2.मछलीपालन हेतु व्यवस्थाएं:-

1.  तालाब का चयन

तालाब बारहमासी कम से कम 2 मीटर गहरे तथा ताल में पानी भरने के लिए जलश्रोत हो, एसे तालाब का चयन करना चाहिए।

2. जलीय वनस्पति का उन्मूलन

तालाब से जलीय वनस्पति को निकलवा देना चाहिए।

3 अनचाही एवं मांसभक्षी मछलियों को मत्स्यबीज संचयन के पूर्व तालाब से निकलवा देना चाहिए।

इन्हें निकालने हेतु बार-बार जाल चलाकर निकाल सकते हैं, इन्हें निकालने हेतु 2500 किलो ग्राम प्रति हेक्टर महुआ खली का उपयोग किया जा सकता है।

४ चूने का प्रयोग        
एक हेक्टर जलक्षेत्र में 250-350 किलोग्राम चूना डालना चाहिए।

5 मत्स्य बीज संचयन        
मछली सह मुर्गीपालन के लिए तालाब में प्रति हेक्टर 5000 अंगुलिकाएं प्रति हेक्टर  की दर से संचय करना चाहिए।

६ मछली की वृद्धि        
समय-समय  पर  प्रतिमाह  जाल  चलाकर  इनकी  वृद्धि  एवं  बीमारी  का  पता  लगाते  रहें।  बीमारी  की जानकारी होने की दशा में उचित उपचार करें।    

७ मत्स्य उत्पादन        
एक हेक्टर जलक्षेत्र के पोखर से प्रतिवर्ष 2500 से 3000 किलोग्राम मत्स्य उत्पादन लिया जा सकता है।            

3. एकीकृत मछली सह मुर्गीपालन से लाभ
1. मछली सह मुर्गीपालन से मछली अण्डे एवं मांस प्राप्ति से अधिक आय होती है।    
2. तालाब में मछलियों के लिए अतिरिक्त खाद देने की आवद्गयकता नहीं पड़ती क्योंकि मुर्गियों द्वारा त्यागे गए लीटर से इसकी पूर्ति हो जाती है।

मछली सह मुर्गी पालन की आर्थिक 0.5 हेक्टर जलक्षेत्र

स.क्रं.

 

मद

मात्रा

दर

राशि

 

 

 

आवर्ती व्यय

 

 

 

 

1.

 

तालाब पट्‌टा

-

रू.1000/-प्रति हेक्टर

500.00

 

2.

 

महुआ खली

1250 किलोग्राम

रू.250/- क्विंटल

3150.00

 

3.

 

मत्स्य अंगुलिकाएं

2500

रू.400/- प्रतिहजार

1000.00

 

.

आठ सप्ताह आयु के चूज

275

रू.8/- प्रति नग

2200.00

 

5.

आहार

9175

रू.2.50 प्रतिकिलो

22937.00

 

6.

अन्य आकस्मिक व्यय

 

 

1000.00

 

(अ)

कुल आवर्ती व्यय

-

-

30,787.00

 

(ब)

बैंक की किस्त व्याज 12:   रू.

-

-

8355.00

 

 

4541 ़ रू.3814

 

 

 

 

(स)

मुर्गीघर निर्माण (एकबार)

-

-

10,000.00

 

(क)

कुल व्यय (अ़ब़स)

-

-

49,142.00

 

(ख)

सकल आय

 

 

 

 

1.

मछली विक्रय

किलोग्राम 1250

रू.30/- प्रति किलोग्राम

37500.00

 

2.

अण्डा विक्रय

35000 अण्डे

रू.100/- प्रति सैकड़ा

35000.00

 

3.

मुर्गी

625 किलोग्राम

रू.45/- प्रति किलोग्राम

28125.00

 

(ख)

योग सकल आय(1़2़3)

-

-

100625.00

 

(ग)

शुद्ध आय (ख-क)रू..

-

-

51483.00

 

 

रू.100625-49142रू. 51483

 

 

 

 

नोटः- आधा हे0 जलक्षेत्र में मछली सह मुर्गी पालन से प्रथम वर्ष लगभग रू0 51000 तथा अगले वर्ष से प्रति वर्ष रू0 61,000/- आय अनुमानित है क्यों कि अगले वर्ष मुर्गी घर का निमार्ण नहीं करना पड़ेंगा।

मछली सह सिंघाड़ा उत्पादन

 

छोटे-छोटे तालाबों जिनकी गहराई 1 से 2 मीटर रहती है में मछली पालन के साथ-साथ सिंधाडे की खेती भी की जा सकती है। सिंघाडा एक खाद्य पदार्थ है। वर्षा के शुरू होते ही तालाबों की सफाई कर सिंघाड़े की छोटे पौधे (रोपा) तालाब की तली में लगाया जाता है एवं अक्टूबर से फरवरी तक इसकी फसल ली जाती है। सिंघाड़े की खेती से जहां मछलियों को अतिरिक्त भोजन प्राप्त होता है, वहीं मछली पालन सिंघाड़े की वृद्धि में सहायक होता है। सिंघाड़े की पत्तियां एवं शाखाऐं, जो समय-समय पर टूटती हैं,वें मछलियों के भोजन के काम आती हैं। ऐसे तालाबों में मृगल एवं कालबासू मछली अधिक बढ़ती हैं। पौधे के वह भाग जो मछलियां नहीं खाती है वे तालाब में विघटित होकर तालाब की उत्पादकता बढ़ाती है, जिससे प्लवका (प्लेंगटान) की वृद्धि होती है, जो  कि  मछलियों  का  प्राकृतिक  भोजन  है। मछली-सहसिंघाड़ा की  खेती  (प्लंगटान) से  जहां 1000-1200 किलोग्राम सिंघाडा प्राप्त होगा दूसरी ओर 1500 किलोग्राम मछली का उत्पादन होगा।

नोटः- आधा हे0 जलक्षेत्र में मछली सह मुर्गी पालन से प्रथम वर्ष लगभग रू0 51000 तथा अगले वर्ष से प्रति वर्ष रू0 61,000/- आय अनुमानित है क्यों कि अगले वर्ष मुर्गी घर का निमार्ण नहीं करना पड़ेंगा।

1.  तालाब की तैयारी
मछली सहसिंघाड़ाकी खेती हेतु छोटे तालाब जलक्षेत्र 0.5 हेक्टर से 1 हेक्टर का होना चाहिए तथा गहराई 1.5 से 2 मीटर तक उपयुक्त है। बारहमासी तालाब के लिए अवांछित मछलियों को बार-बार जाल चलवाकर सफाई करनी चाहिए। यदि पूर्ण सफाई संभव न हो तो 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टर महुआ खली डालकर अवांछित मछली निकाली जा सकती है। जलीय वनस्पति की सफाई करा लेवे। तालाब में गोबर खाद प्रति माह किस्तों में डालें मछली पालन हेतु तालाब की तैयारी पूर्व में उल्लेखित विधि की तरह करना चाहिए।


2    सिंघाड़ा पौध रोपण
सिंघाड़े की बीज किसी नर्सरी में डालकर पौधे तैयार करते हैं। वर्षात आने पर जुलाई में सिंघाड़े का पौधा रोपण 3-4 फिट गहरे पानी में तालाब के तल में लगाना चाहिए। मछली का निष्कासन सिंघाड़े के फसल लेने के बाद करना चाहिए।

3.    मत्स्य बीज संचयनः-

मत्स्य  बीज  का संचयन  प्रतिशत  कतला, रोहू,  मृगल 3:2:5  के अनुपात में करना चाहिए। प्रति हेक्टर 3500 मत्स्य अंगुलिकाएं(50-60 मि.मी. लम्बी) संचयन करें।


4.    कृत्रिम आहारः           
मछलियों के बाढ़ के लिए कृत्रिम आहार के रूप में सरसो या मूंगफली की खली एवं चावल का काढ़ा 1:1 के अनुपात में मिलाकर मछलियों के वजन का 2 प्रतिशत देना चाहिए।                

5. फसल उत्पादन                   
सिंघाड़ा अक्टूबर से जनवरी फरवरी तक निकाल  लेना चाहिए  उसके बाद मछली का निष्कासन कर लेवें। सिंघाड़े के साथ मछलीपालन से सिंघाड़े का उत्पादन 1000 से 1200 किलोग्राम एवं 1500 किलोग्राम मत्स्य उत्पादन ले सकते हैं।

 

मछली सह सिंघाड़ा की खेती की (एक हेक्टयर जलक्षेत्र में ) आर्थिकी

क्रं.

मद

 

मात्रा

 

दर

राशि

(अ)

आवर्ती व्यय

 

 

 

 

 

1.

तालाब पट्‌टा

 

हेक्टयर

 

1000/-

1000/-

2.

जलीय वनस्पतियांें का उन्मूलन

 

-

 

अनुमानित

500/-

3.

कीट नाद्गाक

 

-

 

रू.25/- अनुमानित

500/-

4.

सिंघाड़ा बीज

किलोग्राम

 

रू.25/-प्रति कि.ग्रा.

225/-

5.

मत्स्य बीज

 

3500

 

रू.200/-प्रति हजार

700/-

6.

गोबर

 

10 टन

 

रू.300/-प्रति टन

300/-

.

पूरक आहार

 

2 टन

रू.5000/-प्रति टन

10000/-

8.

पारिश्रमिक व्यय

 

-

-

1000/-

9.

अन्य आकस्मिक ब्यय

 

-

-

500/-

(अ)

योगः- आवर्ती व्यय

 

-

-

17425/-

(ब)

बैंक किस्त ब्याड 12 %

 

-

-

4580/-

 

2490 +रू.2090)

 

 

 

 

(स)

लागत कुल योग (अ़+ब)

 

-

-

22005/-

 

सकल आय

 

 

 

 

1.

सिंघाड़ा विक्रय 1200 किलोग्राम

 

1200 किलोग्राम

20/-प्रतिकिलोग्राम

24,000/-

2.

मछली विक्रय 1500 किलोग्राम

 

1500 कि.ग्रा.

25/- प्रति कि.ग्रा.

37,500/-

(द)

सकल आय (1़2)

 

-

-

61,500/-

(ई)

शुद्ध आय (द-स)

 

 

 

 

61500 - रू. 22005

 

-

-

38,500/-

 

 

नाटः- एक हेक्टयर जलक्षेत्र में मछली सह सिंघाड़ा खेती से प्रतिवर्ष लगभग रू. 38,500/- की आय अनुमानित है।

स्त्रोत  मध्यप्रदेश शासन, मछुआ कल्याण और मत्स्य विकास

3.03225806452

Anonymous Mar 23, 2017 07:35 AM

May fish farming Karna chants hun par mere pass talab nahi hai talab banwane ke liye govt. Se loan milta hai ki Nahi

श्याम राज Dec 11, 2015 07:07 AM

मै एक चिज क जंकरी लेना चाहत हू की समिश्रीत मे मुर्गी का बिस्त रेहू और कत्ला को देन है कि नही.

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