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पिंजरों में मछली पालन की भौगोलिक स्थिति – एक अवलोकन

इस भाग में पिंजरों में मछली पालन को उस प्रदेश के भौगोलिक स्थिति के अनुसार प्रस्तुत किया गया है।

पिंजरों में मछली पालन की भौगोलिक स्थिति – एक अवलोकन

पिंजरों में जलीय जीवों का पालन हाल में शुरू की गयी मछली पालन प्रणाली है। पिछले 20 वर्षो से पिंजरों में मछली पालन चल रहा है, मछली की बढ़ती माँग के अनुसार पालन पद्धति में कई परिष्कार भी लाया जाता है। इस सेक्टर की बढ़ती के सम्बंध में विश्वसनीय सांख्यिकी सूचनाएँ अनुपलब्ध है, फिर भी एफ ए ओ के कुछ सदस्य देशों द्वारा पालन एककों व उत्पादन पर उनको प्रस्तुत किया डाटा देखने को मिलता है, जो इस प्रकार है। वर्ष 2005 में पिंजरा पालन पद्धति से मिला उत्पादन 3.4 मिलयन टन है (टाकन व हालवर्ट 2007) । मुख्य उत्पादक देश और प्रतिशत उत्पादन इस प्रकार हैं। चीन – 29%, नार्वे – 19%, चिली – 17%, जापान-8%, यू.के. – 4%, कनाडा- 3%, टर्की – 2%, ग्रीस – 2%, इंडोनेशिया – 2%, फिलिप्पीन्स-2%, कोरिया-1%, डेनमार्क-1%, ऑस्ट्रेलिया-1%, थायलैंड- 1% और मलेशिया-1% (टाउन और हालवर्ट, 2007) । प्रत्येक कुटुम्ब (फामिली) की मछलियों का उत्पादन देखे जाएँ तो साल्मोनिडे कुटुम्ब की मछलियों का पालन सब से अधिक हुआ जो कि 66% था, नीचे के, क्रम में स्पेरिड़े-7%, करंजिडे -7%, पंगासिडे-6%, चिचिलिडे-4%, मोरोनिडे-3%, स्कोरपेनिडे-1%, सिप्रिनिडे-1% और सेंट्रोपोनिडे-1% उत्पादित हुआ। दुनिया भर हाल में 80 जाति की पख मछलियों का पालन पिंजरों में होता है। इन सब से अधिक उत्पादित होनेवाली मछली सालमो सालार है। कुल पिंजरा पालन में 27% सिरियोला क्विनक्वियेराडियाटा, पांगासियस जातियाँ और ओंकोरिंकस किसुच का योगदान है। इनके अतिरिक्त ओरियोक्रोमिस निलोटिकस ने 4%, स्पारस अरेटा ने 4%, पाग्रस अराट्स ने 3% और डयासेंट्राकस लब्राक्स ने 2% योगदान दिया (टाकन और हालवर्ट 2007) ।

सालमन के पिंजरों में पालन सफल हो जाने के कई कारण हैं। इन्हें प्लवक पिंजरों में पालन करने की पद्धति मानकीकृत व सरल बनायी गयी है। नार्वे, चिली जैसे देशों के तटीय विशाल समुद्र इनके पिंजरा पालन के लिए अनुयोज्य वातावरण है। सालमन की हैचरी पालन पद्धति भी सरल है, इनके संतति पंजरों में तेज बढ़ जाते हैं मांस स्वादिष्ट है। मांस से अन्य स्वादिष्ट विभव तैयार किया जा सकता है। सरकार और अन्य अभिकरणों के सहयोग से बाजार में जल्दी बिक्री हो जाती है।

सामने आए प्रश्न व चुनौतियाँ

पिंजरा पालन पद्धति के विकास के साथ कई समस्याएं भी सामने आई। मछली द्वारा पूरा आहार न खाने की स्थिति में होनेवाला नष्ट, उच्चिष्टों से पानी में होनेवाला मैलापन और तद्वारा होनेवाला पर्यावरणिक ह्रास आदि मुख्य समस्याएं हैं। कुछ पिंजरा मछलियों के हैचरी में उत्पादन न होने पर बीजों का संग्रहण खुले समुद्रों से करना पड़ता है जो आसान नहीं है। पिंजरों से बचनेवाली मछलियों से खुले समुद्री दी मछलियों में आनुवंशीय, पारिस्थितिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी प्रतिकूल असर हो सकता है।

स्वीकार्य सुलझन उपाय

उपतटीय क्षेत्रों से हटकर गहरे समुद्रों में पंजरा पालन परीक्षण करने पर पर्यावरण संबंधी समस्याएं कम होने के साथ ही साथ विविध प्रकार की मछली जातियों का संयोजन भी साध्य हो जायेगा याने कि एक जाति के सहवास से दूसरी जाति का पोषण हो सकता है। निम्न पोषण स्तर की मछलियों के पालन की युक्ति यह है कि पंजरों में पालित मछलियों के अपशिष्ट को, दूसरे जाति वर्गो की मछली याने कि समुद्री शैवाल, निस्यंदक भोजी मोलस्काई, समुद्री ककड़ी, अनलिड या इकिनोडर्माजैसे नितलस्थ अकेशुरुकी अपने वांछित वस्तु के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है।

पिंजरों में पालित मछलियों का आरोग्य का परिपालन उचित प्रबंधन रीतियों के किया जाना चाहिए। मछलियों को खिलाने के लिए कूड़ा कचड़ा मछलियों द्वारा फिश का उपयोग रोकना अच्छा होगा क्योंकि इससे कई मारक रोग हो सकता है।

पिंजरा पालन पद्धति में सरकारी तौर पर कई मामलें जैसे इस सेक्टर का विकास, पर्यावरण का मोनिटरिंग, अच्छी पालन पद्धतियों का कार्यान्वयन पर नियंत्रण लगाना उचित होगा।

निष्कर्ष

भूमंडल का 97% पानी समुद्रों में है यहाँ से मछली उत्पादन बढ़ाने की सफल पद्धति के रूप में पिंजरा पालन को देखा जा सकता है। इस भूमण्डल का 71% महासागर और महासागरों का 99% जीवंत होने पर भी इस पारिस्थितिक तंत्र के अधिकांश भागों के संबंध में हम अज्ञात है, अत: इस तंत्र का केवल 10% ही मानव द्वारा समझा जा सका है। विश्व की आबादी प्रतिवर्ष 80 मिलियन के तादाद में बढ़ रहा है, वर्ष 2050 पहुँचने पर यह 9 बिलियन पहुँचने का अनुमान है, इन्हें खिलाने को हमें जरुर समुद्र की ओर देखना पड़ेगा। दोनों समुद्र तटों और गहरे समुद्रों में पिंजरों में मछलियों का पालन करके मछली उत्पादन बढ़ाने का कारगार समय आ गया है।

 

स्रोत: केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, वेरावल क्षेत्रीय केंद्र, गुजरात

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