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प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण (टी.डी.ई.टी.) मार्गदर्शी सिद्धांत

इस पृष्ठ में प्रोद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण (टी.डी.ई.टी.) मार्गदर्शी सिद्धांत के बारे में विस्तृत जानकारी दी गयी है।

पृष्ठभूमि

बंजरभूमि विकास विभाग की स्थापना जुलाई, 1992 में की गयी थी और इसे ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत रखा गया था और किफायती पद्यति में योजनाबद्ध आयोजन और कार्यान्वयन के जरिये वनेतर बंजरभूमि के समेकित विकास हेतु,विशेष रूप से ईंधन, लकड़ी और चारे के सम्बन्ध में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रक्रिया विकसित करने का विशिष्ट उत्तरदायित्व सौंपा गया था। प्रौद्योगिकी विकास, विस्तार एवं प्रशिक्षण (टी.डी.ई.टी) योजना को खाद्यान्न, इंधन लकड़ी, चारे आदि के सतत उत्पादन के लिए बंजरभूमि को विकसित करने हेतु किफायती और प्रमाणित प्रोद्योगिकियों को विकसित करने के लिए बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1993-94 में आरम्भ किया गया था। उस समय से विस्तृत कार्यात्मक आदेश के साथ वाटरशेड विकास में अन्य क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। वाटरशेड विकास की पद्यतियों में परिवर्तन किया गया है, जिसे समुदाय तथा एनी भागीदारों को अधिकार संपन्न बनाने को प्राथमिक प्रदान करते हुए तैयार किया गया है। सशक्त समन्वय के लिए समेकित बंजरभूमि विकास कार्यक्रम (आई.डब्ल्यू.डी.पी.) सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (डी.पी.ए.पी.) तथा मरुभूमि विकास कार्यक्रम (डी.डी.पी.) की सम्बंधित योजनाओं का समेकन और समेकित आयोजना,सतत परिणाम तथा समुदायों के ग्रामीण जीविकाओं की स्पष्ट अवधारणा कार्यक्रम का महत्वपूर्ण संघटक बन गए है, इसे अब समेकित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (आई.डब्ल्यू.डी.पी.) के रूप में जाना जाता है। वाटरशेड कार्यक्रम में इस परिवर्तित पध्यती के कारन देश में विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अंतर्गत वाटरशेड क्षेत्रों के बहु-आयामी जटिल प्रबंधन को वैज्ञानिक,समग्र तथा नविन प्रौद्योगिकी सहायता उपलब्ध कराने के लिए पुराने मार्गदर्शी सिधान्तों के स्थान पर (टी.डी.ई.टी) के नए मार्गदर्शी सिधांत तैयार करना आवश्यक हो गया है।

उद्देश्य

2.1 पैकेज कार्यकलाप,जिसमें नवीन प्रौद्योगिकी विकास, प्रायोगिक तथा कार्य अनुसन्धान परियोजनाएं,पुनः प्रायोग में लाए जाने वाले प्रदर्शन मॉडलों, विस्तार तथा प्रशिक्षण शामिल हैं, आरम्भ करना तथा इसका स्पष्ट निर्धारित उद्देश्य आयोजना,कार्यान्वन,निगरानी तथा परियोजनापरांत उपयोग के स्तरों पर वाटरशेड प्रबंधन में आने वाली समसामयिक समस्याओं को हल करना होना चाहिए।

2.2 सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आई.सी.टी.), स्थानिक और गैर स्थानिक आंकड़ों के संग्रहण, जिससे वाटरशेड विकास कार्यक्रमों को और बेहतर बनाने में नीतिनिर्धारकों, नियोजोकों, प्रबंधकों, कार्यान्वयकर्त्ताओं, निगरानीकर्त्ताओं/मूल्यांकनकर्त्ताओं, प्रशिक्षकों तथा अंतिम प्रयोक्ताओं को सहायता मिलेगी, के आधार पर समेकित वाटरशेड प्रबंधन हेतु नए वैज्ञानिक साधन तैयार करना तथा इन्हें प्रदर्शित करना।

2.3 वाटरशेड कार्यों की आयोजना, परियोजना कार्यान्वयन में लागत तथा समय का अधिकतम उपयोग करने के लिए अद्यतन वैज्ञानिक साधनों जैसे सैटेलाइट इमेजरियों का दूर संवेदी विश्लेषण, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी.आई.एस.) का प्रदर्शन करना।

2.4 समेकित वाटरशेड प्रबंधन के द्वारा वर्षा सिंचित कृषि की सही क्षमता का आंकलन करने के लिए फसल अनुरूपण मॉडलों के सम्बन्ध में आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना।

2.5 संरचना का निर्माण करने तथा अन्य स्वरुप के कार्यकलापों के लिए अपेक्षित भूमि सुधार के स्वरुप की आयोजना हेतु मौसम सम्बन्धी पूर्ववर्ती आंकड़ों के आधार पर बहने वाले अतिरिक्त जल की गुणवत्ता का आंकलन करने के लिए अनुरूपण मॉडलों प् प्रयोग करके जल संतुलन अध्ययन आरम्भ करना।

2.6 उपयुक्त भूमि फसल आरम्भ करने तथा उचित पध्यती का अनुसरण करने हेतु किसानों को अपनी भूमि की मृदा की उर्वरता की स्थिति के बारे में जागरूक करने के लिए उर्वरता की कमी के सन्दर्भ में मृदा की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए जी.आई.एस. तकनीक काप्रयोग करना।

2.7 प्रयोगशाला और क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच उत्पादकता/उपज के अंतर और इस अंतर को पाटने के लिए प्रौद्योगिकीय विकास का आकलन करना।

2.8 प्रभावशाली तकनीकी निविष्टियों के बारे में अनुसन्धान निष्कर्षों को प्रदर्शित करना तथा वाटरशेड विकास को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसी प्रोद्योगिकियों को प्रयोग में लाना।

2.9 मौजूदा वाटरशेड विकास मॉडलों की प्रचलित प्रोद्योगिकियों, आयोजना, पद्यतियों, प्रबंधन सूचना प्रणाली (एम.आई.एस.) आदि की प्रभावशीलता और उपयोगिता की जांच करना।

2.10 परियोजना क्षेत्र में भू-जलीय क्षमता, मृदा तथा फसल आच्छादन, कटाव आदि में परिवर्तनों के सन्दर्भ में वाटरशेड विकास कार्यक्रमों में विभिन्न कार्यकलापों के वास्तविक प्रभाव के आकलन में अत्यधिक योगदान देना।

2.11 पशु पालन, मत्स्यपालन, डेरी उद्योग तथा कृमि पालन आदि जैसे कार्यकलापों की जीविका सहायता के साथ उपयुक्त सिंचाई पध्यती के जरिये वाटरशेड विकास हेतु प्रायोगिक परियोजना आरम्भ करना।

वित्तीय सहायता का विस्तार तथा पद्धति

3.1 टी.डी.ई.टी. योजना में नविन प्रोद्योगिकियां विकसित करने, उनकी अनुसंधान परियोजनाओं/विस्तार के प्रदर्शन तथा संवर्धन के सम्बन्ध में कार्यवाई की जाती है। अत: ऐसी परियोजनाओं को कठोर मानदंडों,विशेष रूप से लागत मानदंडो और क्षेत्रीय मानदंडों के द्वारा सीमित करना व्यवहार्य नहीं होगी। तथापि, तकनीकी सलाहकार समिति (टी.ए.सी.) की तकनीकी संवीक्षा के दौरान प्रत्येक परियोजना के सम्बन्ध में विशिष्ट टिप्पणियों के साथ इन पहलुओं की विस्तार से जाँच की जाएगी।

3.2 इस योजना के अंतर्गत सरकार/विश्वविद्यालयों और ग्राम पंचायत सहित सरकारी संस्थाओं की स्वामित्व वाली भूमि पर कार्यान्वित की जा रही परियोजनाओं के सम्बन्ध में परियोजना की लागत का वहन भूमि संसाधन विभाग और किसान /निगमित निकाय के बीच 60:40 के अनुपात में किया जायेगा। तथापि, छोटे और सीमान्त किसानों के मामले में लाभार्थी का अंशदान क्रमशः 10 और 5 होगा। लाभार्थियों को अपना अंशदान वास्तु और / या श्रम के रूप में देने की अनुमति होगी।

वैज्ञानिक प्रकृति की परियोजनाओं या /और अनुसूचित जाती /अनुसूचित जनजाति के समुदायों को शामिल करने के मामले में लाभार्थियों को अंशदान को पूर्णत: समाप्त करने के लिए आई.डब्ल्यू.एम.पी. की संचालन समिति (परियोजना अनुमोदन प्राधिकरण) को अधिकार प्रदान किये जायेंगे।

3.3 वित्तपोषित की जाने वाली मदें :

  • समस्याग्रस्त भूमि कैसे लवणीय,क्षारीय,बीहड़ी,जल-जमाव वाले क्षेत्रों आदि जैसी भूमि की मृदा की दशा में अपेक्षित सुधर लाने के लिए कुछेक अतिरिक्त निविष्ठियों सहित विशेष विट्टी प्रावधान की अत्यंत आवश्यकता होती है। वित्तपोषण की ऐसी आवश्यकताओं को परियोजना के प्रवर्तकों द्वारा पर्याप्त औचित्य दर्शाने पर ही अनुमोदित किया जायेगा।
  • इस योजना के अंतर्गत प्रौद्योगिकी, क्षेत्र और समस्या समाधान के सन्दर्भ में एक जैसी परियोजनाओं को पुनः आरम्भ नहीं किया जायेगा।
  • टी.डी.ई.टी. योजना के अंतर्गत स्थायी संरचना के लिए निधियां उपलब्ध नहीं करायी गयी जाएँगी। विशिष्ट अनुसन्धान प्रयोजन हेतु केवल आवशयकता के आधार पर उपस्करों की सहायता प्रदान की जाएगी।
  • आकस्मिक व्यय, पी.ओ.एल., यात्रा भत्ता/ दैनिक भत्ता अतिरिक्त प्रभार के अंतर्गत उपलब्ध कराये जाने चाहिए और सामान्यत इस परियोजना लागत के 20 प्रतिशत तक सीमित रखा जाना चाहिए।

3.4 कर्मचारी

इस योजना के अंतर्गत स्थायी कर्मचारियों के लिए स्वीकृति नहीं दी जाएगी। परियोजना कार्यान्वित करने वाली एजेंसी कार्यान्वयन के लिए कर्मचारी उपलब्ध कराएंगी। परियोजना के अंतर्गत केवल आवशयकता के आधार पर संविदात्मक अनुसन्धान कर्मचारी की सहायता उपलब्ध करायी जाएगी।

कार्यान्वन एजेंसियां

4.1 कार्यान्वन एजेंसियों में सरकारी एजेंसियां, तकनीकी विश्वविद्यालय/संस्थाएं,कृषि विश्वविद्यालय, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, गैर सरकारी संगठन, संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.) की संस्थाएं आदि शामिल होगी। विश्वविद्यालयों के प्रस्तावों, जीने किसानों/एनी लाभार्थियों/ पंचायत की भूमि पर कार्यान्वित किया जाना हां, पर वित्तीय सहायता हेतु विचार किया जायेगा। सिफारिश करने से पूर्व तकनीकी परामर्शदात्री समिति परियोजना कार्यान्वित करने के सम्बन्ध में परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी की क्षमता की विशेष रूप से जांच करेगी। केवल उन्ही पंजीकृत गैर सरकारी संगठनों के प्रस्तावों पर विचार किया जायेगा जिनका प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थाओं के साथ समन्वय हो, परन्तु यदि गैर सरकारी संगठन स्वयं अनुसन्धान संस्था हो और वाटरशेड विकास में न्यूनतम 10 वर्ष का अनुभव प्राप्त हो तो उसके प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है और प्रस्ताव की अनुशंसा राज्य सरकार के सम्बंधित विभाग द्वारा की जाएगी। निधियां उस संस्था को जारी की जाएगी जिसका गैर सरकारी संगठन के साथ तकनीकी समन्वय होगा, निधियों के समुचित उपयोग के लिए संस्था उत्तरदायी होगी, जो गैर सरकारी संगठन को निधियां जारी करने की जिम्मेवारी लेगी। गैर सरकारी संगठन द्वारा विशिष्ट शपथ पत्र प्रस्तुत किया जायेगा की उन्हें कालीसूची में नहीं डाला गया है या किसी सरकारी एजेंसी द्वारा वित्तीय कार्यकलाप निष्पादित करने से उन्हें वंचित निया गया है।

4.2 राज्य सरकारों/एजेंसियों की परियोजनाओं की अनुशंसा राज्य सरकार के सम्बंधित विभाग के प्रमुख द्वारा की जानी चाहिए जिसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया हो कि परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी की निधियां सरकार की बजटीय प्रक्रिया के जरिये या अन्य स्वशासी निकायों की तरह भूमि संसधन विभाग द्वारा बैंक ड्राफ्ट के रूप में सीधे ही उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

4.3 राज्य सरकार की एजेंसियों के मामले में परियोजना को राज्य सरकार में वाटरशेड कार्यक्रमों के सम्बन्ध में कार्य करने वाले विभागों के जरिये प्रस्तुत किया जाये। विश्वविद्यालयों, अनुसन्धान/तकनीकी संस्थाओं जैसी एनी एजेंसियों के मामले में परियोजना प्रस्ताव सम्बंधित एजेंसियों के प्रमुख के जरिये प्रस्तुत करना होगा।

परियोजना अवधि

परियोजना की अवधि सामान्यतया 2 से 5 वर्षों की होगी। परियोजना अवधि को बढ़ाने सम्बन्धी अनुरोध पर सामान्तया विभाग में विचार नहीं किया जायेगा। तथापि, अपवाद्त्मक मामले में, जहाँ परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी पर्याप्त औचित्य दे सकती हो, विभाग द्वारा मामला दर मामला आधार पर परियोजना अवधि में विस्तार किया जायेगा। यदि, परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी बढ़ाई गयी अवधि में भी परियोजना को पूरा नहीं कर पति है तो उसे परियोजना की पूरी लागत, उक्त राशि पर उपार्जित बैंक, ब्याज सहित, वापिस करनी होगी।

प्रक्षिक्षण और विस्तार

वाटरशेडों को विकसित करने हेतु भूमि उपयोग प्रौद्योगिकी की अनुकूलनीयता मुख्यतः भूमि उपयोग की नयी और उन्नत पद्यतियों को अपनाने के सम्बन्ध में किसानों और एनी भागीदारियों की दक्षता और क्षमता पर निर्भर करती है। अत: प्रशिक्षणों और विस्तार के जरिये भागीदारों का क्षमता निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण भाग होगा। किसानों और कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण और अभिविन्यास पाठ्यक्रमों को भूमि संसाधन विभाग द्वारा निम्नानुसार वित्तपोषित किया जायेगा :-

  • किसानों के प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रम को प्रत्यक्ष लागतों अर्थात प्रशिक्षण सामग्री, संसाधन कर्मियों के लिए शुल्क और प्रशिक्षुओं के प्रत्यक्ष व्ययों के सम्बन्ध में वित्तपोषित किया जायेगा। स्थायी संरचनाएं तैयार करने, महंगे उपकरणों और वाहनों की खरीद, स्टाफ के वेतन आदि जैसी मदों की लागतों को परियोजना में वित्तपोषित नहीं किया जायेगा।
  • प्रशिक्षण को पृथक कार्यकलाप के रूप में शुरू नहीं किया जायेगा और इसे टीडीईटी योजना के अंतर्गत कार्यान्वित की जा रही परियोजना के साथ सम्बन्ध किया जाना होगा।
  • परियोजना के सफलतापूर्वक पूरे होने पर उस परियोजना से सम्बंधित प्रशिक्षण और विस्तार को परियोजना से बहार के एनी क्षेत्रों में भी शुरू किया जायेगा।
  • यदि परियोजना के मध्यावधिक मूल्याङ्कन के समय स्पष्ट हो जाये कि परियोजना सफल नहीं होगी और वांछित परिणाम नहीं दे रही है तो ऐसी परियोजना के अंतर्गत प्रशिक्षण और विस्तार कार्यकलापों को शुरू नहीं किया जायेगा और परियोजना में इन मदों के लिए उपलब्ध/ अनुमोदित निधियों को पीआईए द्वारा प्रयुक्त/ जारी नहीं किया जायेगा।
  • चूँकि प्रशिक्षण और विस्तार टीडीईटी योजना के अनिवार्य और महत्वपूर्ण संघटक है, अतः कुल परियोजना लागत का कम से कम 10 भाग इन कार्यकलापों पर खर्च किया जायेगा।

प्रस्तावों का अनुमोदन

परियोजना प्रस्तावों की संवीक्षा के लिए भूमि संसाधन विभाग में एक तकनीकी सलाहकार समिति (टीएससी) होगी, जिसमें विशेष आमंत्रिती के रूप में विशेषज्ञों को शामिल किया जायेगा। तकनीकी सलाहकार समिति में निम्नलिखित शामिल होंगे :-

  • निदेशक के स्तर से अन्यून स्तर के, राष्ट्रीय वर्षासिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के प्रतिनिधि – सदस्य
  • निदेशक के पद से अन्यून पद के, कृषि और सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय के प्रतिनिधि - सदस्य
  • परियोजना के विषय से सम्बंधित प्रतिष्ठित सरकारी संस्थाओं से दो विशेषज्ञ (जो अपर सचिव (भू.सं.) द्वारा नामित किये जायेंगे) – सदस्य
  • उप महानिरीक्षक (टीडीईटी)/निदेशक (टी.ई.) – संयोजक

नामित विशेषज्ञों को सलाहकार (टीएससी) की सिफारिशों पर विभाग की समेकित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) सम्बन्धी संचालन समिति द्वारा अनुमोदन हेतु विचार किया जायेगा।

निधियां जारी करना

8.1 आईडब्ल्यूएमपी की संचालन समिति द्वारा अनुमोदित परियोजनाओं पर आगे कार्यवाई की जाएगी और परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी (पी.आई.ए) को निधियां जारी करने से पूर्व एकीकृत वित्त प्रभाग (आई.एफ.डी.) की सहमती प्राप्त की जाएगी। परियोजना के अनुमोदित होने पर और आई.एफ.डी की सहमती से विभाग स्वीकृति आदेश और परियोजना की प्रथम क़िस्त जारी करेगा।

8.2 विभाग द्वारा परियोजना की स्वीकृति जारी किये जाने से पूर्व परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी (पी.आई.ए.) परियोजना को शुरू करने (परियोजना की बुनियाद) की विशिष्ट तिथि सूचित करेगी।

8.3 परियोजना की स्वीकृति आदेस्ग जारी करने से पूर्व कार्यान्वयन एजेंसी द्वारा परियोजना की समस्त अवधि के लिए एक परियोजना समन्वयक की पहचान की जाएगी और उसके बारे में भूमि संसाधन विभाग को सूचित किया जायेगा। पी.आई.ए. समन्वयक के रूप में केवल ऐसे व्यक्ति का ही चयन करेगी, जो परियोजना अवधि के दौरान सेवानिवृत नहीं हो रहा हो और जिसके परियोजना की समस्त अवधि के दौरान इस पद पर बने रहने की सम्भावना हो। ऐसे मामलों में जहाँ राज्य सरकार के विभाग कार्यान्वयन एजेंसियां हैं, स्वीकृति आदेश जारी करने से पूर्व परियोजना समन्वयक के रूप में नामित अधिकारी को समस्त परियोजना अवधि के लिए बांये रखने के सम्बन्ध में एक वचनबंध प्राप्त किया जायेगा। एनी एजेंसियों के सम्बन्ध में इस शर्त को समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.) में शामिल किया जायेगा। तात्कालिक आवश्यकताओं के मामलों में समन्यवक में किसी भी प्रकार का परिवर्तन भूमि संसाधन विभाग विबाग की सहमति से किया जाएगा।

8.4 राज्य सरकार के अलावा किसी अन्य एजेंसी की निधियां जारी करने से पूर्व भूमि संसाधन विभाग और परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी के द्वारा समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.) हस्तारक्षित होना चाहिए। समझौता ज्ञापन में विचारार्थ विषयों को पूरा नहीं कर पाने के सम्बन्ध में शास्ति सम्बन्धी उपयुक्त धाराएं शामिल होंगी।

8.5 निधियों को सामान्यत: तीन किस्तों में जारी किया जाना चाहिए,जिसके अनुपात निम्नानुसार होगा: प्रथम क़िस्त 50,दूसरी क़िस्त 30 और अंतिम क़िस्त 20। तथापि, आईडब्ल्यूएमपी की सञ्चालन समिति, परियोजनाओं को अनुमोदित करते समय परियोजना की विशिष्ट आवशयकता के अनुसार किस्तों में परिवर्तन कर सकती है। प्रथम क़िस्त परियोजना की स्वीकृति के समय जारी की जाएगी। बाद की किस्तें, परियोजना के लिए पूर्व में जारी की गयी निधियों के कम से कम 80 भाग का उपयोग कर लिए जाने के उपरांत परियोजना के लिए अनुमोदित कार्य योजना के अनुसार जारी की जाएँगी। परियोजना के अंतर्गत स्वीकृत कुल राशि के 50 से अधिक निधियों को केवल तभी जारी किया जायेगा जब भूमि संसाधन विभाग द्वारा स्वतंत्र एजेंसी/ मूल्यांकनकर्ता के जरिए मध्यावधिक मूल्यांकन करवाया गया हो। अंतिम क़िस्त परियोजना के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद जारी की जाएगी।

8.6 भूमि संसाधन विभाग द्वारा विनिर्धारित किये गए अनुसार, प्रथम क़िस्त जारी किए जाने के उपरांत बाद की किस्तों को जारी किया जाना, अनुमोदन के समय परियोजना में यथापरिकल्पित वास्तविक और वित्तीय निष्पादन के संतोषजनक स्तर को प्राप्त करने और प्रगति रिपोर्टों,उपयोग प्रमाण-पत्रों,लेखों के लेखापरीक्षित विवरण आदि जैसे अन्य दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के अध्यधीन होगा।

परियोजना को समयपूर्व बंद करना

परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी (पीआईए) के उत्कृष्ट इरादों के बावजूद,ऐसी परियोजना के उदहारण भी सामने आ सकते है जो उनके नियंत्रण से बाहर के कारणों से बंद हो सकती है। पीआईए से विशिष्ट अनुरोध प्राप्त होने पर भूमि संसाधन विभाग द्वारा यथानिर्णित शर्तें जैसे – जारी की गयी अथवा अप्रयुक्त राशि की वापसी और प्रयोग में लायी गयी निधियों से प्राप्त उपलब्धियों के सम्बन्ध में रिपोर्ट आदि को ध्यान में रखते हुए ऐसी परियोजनाओं को समयपूर्व बंद करने के बारे में विचार किया जायेगा।

इसके अलावा, परियोजना के प्रति पीआईए की लगातार उदासीनता, विनिर्धारित समय-सीमा के भीतर प्रगति रिपोर्टें, उपयोग प्रमाण-पत्र और एनी दस्तावेज़ प्रस्तुत न करने, परियोजना को अनुमोदित कार्य योजना के अनुसार कार्यान्वित न करने और समय-समय पर भूमि संसाधन विभाग द्वारा यथानिर्णित ऐसा कोई भी एनी कारणों जो परियोजना को समय-पूर्व करने को औचित्यपूर्ण ठहराता हो, जैसी परिस्थितियों के मामले में विभाग स्वत: भी उन्हें समय-पूर्व बंद करने की कार्यवाई शुरू कर सकता है। ऐसी परिस्थितियों के पीआईए को जारी की गयी कुल राशि बैंक ब्याज़ और विभाग द्वारा लगायी गयी शास्ति सहित वापिस करनी होगी। इस संबंध में विभाग और पीआईए के बीच समझौता ज्ञापन में विशिष्ट उपबंध किये जायेंगे।

निगरानी और मूल्यांकन

10.1 कार्यान्वयन एजेंसी, समझौता ज्ञापन में उल्लेख किये गए अनुसार अनुमोदित कार्यक्रम के संबंध में विनिर्धारित प्रारूप में अर्ध-वार्षिक आधार पर प्रगति रिपोर्टों प्रस्तुत करेंगे। इसके अतिरिक्त, निधियों के उपयोग प्रमाण-पत्र और लेखों के लेखापरीक्षित विवरण (ए.एस.ए.) के साथ पूरे वित्तीय वर्ष के लिए एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी। अनुसंधान संस्थाओं और विश्वविद्यालयों सहित सरकारी संगठनों के मामले में लेखापरीक्षित विवरण के स्थान पर उस संगठन के उपयुक्त लेखांकन प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित वित्तीय उपयोग प्रमाण-पत्र स्वीकार्य होगा।

10.2 सम्बंधित एजेंसी परियोजना के लिए एक पृथक खाता बनाएगी,जो भूमि संसाधन विभाग के अधिकारी/अधिकारीयों तथा नियंत्रक और महा लेखापरीक्षक (सी.ए.जी.) के प्राधिकारियों द्वारा निरिक्षण हेतु उपलब्ध रहेगा।

10.3 कार्यान्वयन एजेंसी अपनी स्वयं की आंतरिक समीक्षा और रिपोर्टिंग प्रणाली तैयार करेगी। पीआईए द्वारा परियोजना की प्रगति की समीक्षा करने के लिए प्रत्येक छः माही में एक बार एक तकनीकी समिति का गठन किया जायेगा।

10.4 भूमि संसाधन विभाग परियोजना की ऑनलाइन तथा क्षेत्र दौरों के जरिए निगरानी की प्रणाली को अपनाएगा।

10.5 भूमि संसाधन विभाग परियोजना के कार्यान्वयन के दौरान किसी भी अवस्था में उसके मूल्यांकन कानिदेश दे सकता है।

10.6 परियोजना के पूरे होने पर, सम्बंधित एजेंसी प्राप्त परिणामों के सम्बन्ध में परियोजना के पूरा होने सम्बन्धी विस्तृत रिपोर्ट (पीसीआर) तैयार करेगी और परियोजना के पूरे होने के 3 माह भीतर इस रिपोर्ट को एक सॉफ्टकॉपी के साथ भूमि संसाधन विभाग को प्रस्तुत करेगी।

प्रलेखन और प्रकाशन

परियोजना के पूरे होने के उपरांत, पीआईए भूमि संसाधन विभाग में एक प्रस्तुतीकरण देगी। प्रस्तुतीकरण दिए जाने और इसके उपलब्धियों को विभाग द्वारा अनुमोदित किये जाने के बाद महत्वपूर्ण परिणामों/आंकड़ों और पुनः प्रस्तुत्य मॉडलों का संकलन, प्रलेखन और मुद्रण करवाया जायेगा तथा पीआईए द्वारा एक सॉफ्टकॉपी सहित भूमि संसाधन विभाग को इनकी 5 प्रतियाँ उपलब्ध करायी जाएँगी। यदि विभाग चाहे तो पीआईए, विभाग द्वारा दिए गए सुझाव के अनुसार राज्य सरकार के अधिकारियों सहित अन्य श्रोताओं के समक्ष भी पूरी हो चुकी परियोजना के सम्बन्ध में प्रस्तुतीकरण देगी। कार्यान्वयन के जरिये और परियोजना के पूरा होने के सम्बन्ध में तैयार की गयी सभी रिपोर्टों, परिणामों, आंकड़ों और मॉडलों आदि का कॉपीराइट भूमि संसाधन विभाग के पास होगा।

स्त्रोत: कृषि विभाग, भारत सरकार

 

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