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मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन

इस पृष्ठ में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) – दिशा-निर्देश की जानकारी दी गयी है I

भूमिका

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) के अंतर्गत प्रमुख घटक है । मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) से संबंधित मिशन कार्यकलापों का कार्यान्वयन कृषि एवं सहकारिता विभाग के आईएनएम प्रभाग दवारा किया जाएगा।

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) से संबंधित मिशन हस्तक्षेप का कार्यान्वयन

  1. एनएमएसए के अंतर्गत 4 हस्तक्षेपों में से मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों में से एक है। एसएचएम का लक्ष्य बृहत-सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन, भूमि क्षमता पर आधारित उचित भू उपयोग, उर्वरकों का न्यायसंगत अनुप्रयोग तथा मृदा अपरदन को न्यूनतम करने के साथ मृदा उर्वरता मानचित्र बनाकर तथा उनसे संपर्क स्थापित करके अवशेष प्रबंधन, जैव कृषि प्रणालियों सहित स्थान तथा साथ ही फसल विशिष्ट सतत् मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को बढ़ावा देना है। विस्तृत फील्ड स्तरीय वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के माध्यम से भू-उपयोग तथा मृदा विशेषताओं से संबंधित थीम मॉनचित्र तथा डाटाबेस आधारित भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के माध्यम से सृजित भू-उपयोग तथा मृदा विशेषताओं के आधार पर विभिन्न उन्नत पद्धति पैकेज के लिए सहायता प्रदान की जाएगी। इस घटक का कार्यान्वयन राज्य सरकार, राष्ट्रीय जैव कृषि केंद्र (एनसीओएफ), केंद्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीएफक्यूसी एंड टीआई) दवारा किया जाएगा तथा आईएनएम प्रभाग दवारा संस्वीकृति प्रदान की जाएगी। इसके अलावा, यह घटक मृदा समस्याओं (अम्लीय/क्षारीय/लवणीय) के पुनरूद्धार के लिए सहायता प्रदान करेगा तथा राज्य सरकारों, भारतीय मृदा एवं भू-उपयोग सर्वेक्षण (एसएलयूएसआई)/एनआरएम प्रभाग के माध्यम से उचित भू-उपयोग को बढ़ावा देगा। इस घटक विशिष्ट नियोजन के लिए निम्नलिखित दृष्टिकोण होगा-
  • कार्यक्रमों के नियोजन तथा कार्यान्वयन के लिए व्यापक मृदा डाटाबेस तैयार करने के लिए एसएचएम विभिन्न प्रकार की मृदाओं तथा भू-संसाधन सर्वेक्षणों को सहायता प्रदान करेगा;
  • अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी आविष्कारों को ध्यान में रखते हुए तथा गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था के अंतर्गत जैव आदानों को शामिल करते हुए मानकों तथा परीक्षण प्रोटोकॉल के संशोधन सहित उर्वरक (नियंत्रण) आदेश (एफसीओ), 1985 के अंतर्गत उर्वरकों, जैव उर्वरकों तथा जैविक उर्वरकों की गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यकताओं को सुनिश्चित करना;
  • मृदा स्वास्थ्य एवं उत्पादकता में सुधार करने के लिए जैविक खाद तथा जैव उर्वरकों के सहयोग से गौण एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित रासायनिक उर्वरकों के विवेकसंगत उपयोग के माध्यम से समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) को बढ़ावा देना;
  • मृदा उर्वरता में सुधार करने तथा किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ देने के लिए मृदा सुदृढ़ीकरण हेतु सहायता देना एवं उर्वरक जांच सुविधा तथा किसानों के लिए मृदा जांच आधारित सिफारिश करना। इससे मृदा स्वास्थ्य देखभाल से संबंधित फार्मर फील्ड प्रदर्शन सहित प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन के माध्यम से मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं/विस्तार कर्मचारियों एवं किसानों तथा उनकी क्षमता निर्माण के लिए दक्षताओं तथा जानकारी का उन्नयन करने में भी मदद मिलेगी।
  • वृद्धित उत्पादकता एवं कम लागत पर खेती के लिए मृदा/फसल आवश्यकता के अनुसार मृदा पोषक तत्व प्रबंधन एवं उर्वरकों विवेकसंगत वितरण से संबंधित उचित उपायों पर प्रशिक्षण;
  • उचित मृदा सुधारकों एवं भू-विकास के माध्यम से मृदा समस्याओं (अम्लीय/क्षारीय/ लवनीय) का पुनरोद्धार,
  • यह नोट किया जाए कि पुनरूद्धार एवं भू उपयोग सर्वेक्षण एवं नियोजन का कार्यान्वयन एसएल यूएसआई दवारा एनआरएम प्रभाग के माध्यम से किया जाएगा।

हस्तक्षेप के विभिन्न घटक

मृदा स्वास्थ्य

मृदा स्वास्थ्य के अंतर्गत विभिन्न घटक निम्नलिखित हैं -

1)  बृहत पोषक तत्व तथा सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण के लिए नई मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं (एसटीएल) एवं मोबाइल मृदा जांच प्रयोगशालाओं (एमएसटीएल) की स्थापना करना।

2)  सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण के लिए वर्तमान राज्य मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण।

3)  एसटीएल स्टाफ/ विस्तार अधिकारीयों/ किसानों के प्रशिक्षण तथा फील्ड प्रदर्शन/प्रयोगशाला आदि के माध्यम से क्षमता निर्माण।

4)  उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए डाटा बैंक का सूजन जो स्थान विशिष्ट है।

5)  फ्रंट लाइन फील्ड प्रदर्शन के माध्यम से एसटीएल (10 गांव प्रत्येक) दवारा गांव को शामिल करना।

6)  डिजिटल जिला मृदा मानचित्र (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम का उपयोग करते हुए) तथा आईसीएआर/राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (एसएयू) दवारा मृदा उर्वरता मॉनिटरिंग प्रणाली तैयार करना।

7)  राज्य सरकार के फील्ड स्तरीय अधिकारियों को पोर्टेबल मृदा परीक्षण किट प्रदान करना ।

8)  सूक्ष्म पोषक तत्वों को प्रोत्साहन एवं उनका वितरण ।

9)  उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण ।

  • वर्तमान राज्य उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण/उन्नयन।
  • राज्य सरकारों दवारा नई उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं की स्थापना करना।
  • क्षारीय/लवणीय मृदाओं का पुनरूद्धार।
  • अम्लीय मृदाओं का पुनरूद्धार।
  • एसएफक्यूसी एवं टीआई को अपने कार्य निष्पादन में सहायता करना।
  • एसएल यूएसआई को अपने कार्य निष्पादन में सहायता करना।

आरएडी घटक के अंतर्गत क्षारीय/लवणीय/अम्लीय मृदाओं का पुनरूद्धार शुरू किया जाएगा। एसएल यूएसआई से संबंधित कार्य का कार्यान्वयन एनआरएम प्रभाग द्वारा किया जाएगा।

समेकित पोषक तत्व प्रबंधन एवं जैव कृषि

आईएनएम एवं जैव कृषि के अंतर्गत विभिन्न घटक निम्नलिखित हैं;

1) यंत्रीकृत फल/सब्जी मंडी अपशिष्ट/कृषि अवशिष्ट कम्पोस्ट इकाई की स्थापना करना।

2)अत्याधुनिक द्रवीय/वाहक आधारित/जैव उर्वरक/जैव नाशीजीवमार की स्थापना करना।

3) जैव उर्वरक एवं जैविक उर्वरक परीक्षण गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला (बीओक्यूसीएल) की स्थापना करना।

4) एफसीओ के अंतर्गत वर्तमान जैव उर्वरक एवं जैविक उर्वरक परीक्षण/ गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला (बीओक्यूसीएल) की स्थापना करना।

5) फार्मर फील्ड से संबंधित जैविक आदानों (खाद/वमीं कम्पोस्ट, जैव उर्वरक, द्रवीय/ठोस, अवशिष्ट कम्पोस्ट, वनस्पति अर्क आदि) को बढावा देना ।

6) भागीदारी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणीकरण के अंतर्गत क्लस्टर दृष्टिकोण के माध्यम से जैव कृषि को अपनाना।

7) ऑन लाइन डाटा प्रबंधन एवं अवशेष विश्लेषण के लिए पीजीएस प्रणाली को सहायता देना ।

8) खाद प्रबधन एवं जीव विज्ञानीय नाईट्रोजन हार्वेसटिंग के लिए जैविक ग्राम को अपनाना।

9) राज्य  एवं फसलन प्रणालियों के लिए विशिष्ट पद्धतियों के जैविक पैकेज के विकास के लिए अनुसंधान सहायता।

10) अलग से जैविक कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण विभाग की स्थापना करना।

11) एनसीओएफ को अपने कार्य करने में सहायता प्रदान करना।

परियोजना संस्वीकृति प्रणाली

  1. राज्य सरकारें एसएचएम हस्तक्षेप से संबंधित प्रस्ताव तैयार करेगी एवं कृषि एवं सहकारिता विभाग, भारत सरकार के आईएनएम प्रभाग को प्रस्तुत करेंगी। संयुक्त सचिव, आईएनएम की अध्यक्षता वाली परियोजना संस्वीकृति समिति (पीएससी) जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, एनसीओएफ, सीएफक्यूटीआई, आईएफडी, एनआरएम, फसल प्रभाग के प्रतिनिधि हैं। इस प्रकार से प्राप्त परियोजनाओं का अनुमोदन करेंगी।
  2. आईएनएम प्रभाग समय-समय पर प्रगति की रिपोर्ट एनएमएसए के अंतर्गत गठित राष्ट्रीय परामर्शदात्री समिति को करेगा। स्थायी तकनीकी समिति दवारा तकनीकी बैकस्टॉपिंग समय-समय पर प्रदान की जाएगी।
  3. कवरेज- हस्तक्षेप देश भर में प्रचालित किया जाएगा। तथापि, कुछ घटक/हस्तक्षेपों में कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्रों के उपयुक्त स्थान विशिष्ट दृष्टिकोण होगा।

निधि प्रवाह तंत्र

  1. परियोजना के अनुमोदन के पश्चात राज्य दवारा अधिसूचित राज्य अमिनामित एजेंसी को निधियों निर्मुक्त की जाएंगी। राज्य स्तरीय कार्यान्वयक एजेंसी समयबद्ध ढंग से कार्यान्वयन सुनिश्चित करेगी। प्रगति रिपोर्ट, पहले से संस्वीकृत परियोजनाओं के उपयोगिता प्रमाण पत्रों के प्रस्तुतीकरण, विशिष्ट आपातकालीन आवश्यकता आदि के आधार पर निधियां निर्मुक्त की जाएंगी।
  2. राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासनिक खचों के लिए लगभग 3 प्रतिशत वार्षिक परिव्यय नामत: कृषि एवं सहकारिता विभाग व इसके अधीनस्थ कार्यालय/संस्थानों के स्थापना खर्चे, तकनीक सहायता इकाईयां (टीएसयू), मॉनिटरिंग व मूल्यांकन, क्षमता निर्माण, व अन्य आकस्मिक खर्चे आदि। इसी प्रकार, एसएचएम संबंधी मिशन हस्तक्षेप के कार्यान्वयन के प्रशासनिक व अन्य आकस्मिक खर्चे पूरा करने के लिए भी राज्यों को कुल आवंटन का 5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया जाएगा।

मॉनिटरिंग व मूल्यांकन

  1. राज्य स्तर पर कार्यान्वयन प्रक्रिया की मोनिटरिंग राज्य स्थायी तकनीकी समिति (एसएसटीसी) व राज्य सतत कृषि मिशन (एसएमएसए)/राज्य स्तरीय समिति (एसएलसी) दवारा की जाएगी। राष्ट्रीय स्तर पर एसएचएम संबंधी हस्तक्षेप की मॉनिटरिंग आईएनएम प्रभाग दवारा की जाएगी। वैब आधारित मॉनिटरिंग, वीडियो कान्फ्रेंसिंग, डैस्क समीक्षा, फील्ड दौरों, कार्यक्रम कार्यान्वयन का मूल्यांकन प्रभावी मॉनिटरिंग के लिए किया जाएगा। राज्य सरकार मध्यावधि संशोधन, यदि कोई हो, की सुविधा प्रदान करने के लिए समवर्ती मूल्यांकन कर सकती है।
  2. राज्य अगली तिमाही के पहले माह की दस तारीख तक विस्तृत वैमासिक प्रगति रिपोर्ट (क्यूपीआर) का प्रस्तुतीकरण सुनिश्चित करेंगे। इसी प्रकार वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात तीन माह के भीतर कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय को विस्तृत वार्षिक प्रगति रिपोर्ट (एपीआर) भेजी जानी चाहिए।
  3. फील्ड अथवा ग्राम स्तर पर कार्यान्वयन दैनिक प्रक्रिया की जांच करने में पंचायत शामिल होगी। जिला स्तर पर संबंधित जिला पंचायत राज संस्थाओं के सहयोग से संयुक्त निदेशक/उप निदेशक, कृषि दवारा मॉनिटरिंग की जाएगी।
  4. क्लस्टर/ग्राम स्तर पर अनुमोदित कार्यक्रम, शुरू किए गए सभी कार्यकलापों, लाभार्थियों के नाम, वहन किए गए व्यय आदि के ब्यॉरे पंचायत भवन/मोहल्ले के प्रख्यात सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शित किए जा सकते हैं।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) के तहत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के घटकों का ब्यौरा

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन

मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण

  1. नये मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना (स्थायी और चल)-रासायनिक उर्वरकों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग पर आधारित मृदा जांच का बढ़ावा देने के लिए 100 नई स्थायी/चल एसटीएलएस 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देश में स्थापित की जायेंगी।
  2. सहायता के मानदण्ड - परियोजना लागत के 75% सहायता, 56 लाख रूपये की सीमा के अध्यधीन मशीन एवं उपकरण, रासायनिक एवं शीशा सामग्री, विविध प्रयोगशाला वस्तुएं खरीदने के लिए तथा आकस्मिकताए विभाग की निर्देश में दी गई है , के लिए राजसहायता के रूप में दी जाएगी । गतिशील एसटीएस के मामले में, कृषि एवं सहकारिता विभाग से वित्तीय सहायता प्रत्येक गतिशील एसटीएल के लिए 56 लाख रूपये की अधिकतम सीमा के अध्यधीन परियोजना की लागत की 75% होगी, निर्देशात्मक सूची के अनुसार । उपकरणों की सुझाई गई सूची को केवल आईएनएम प्रभाग के विशिष्ट अनुमोदन के साथ ही विशिष्ट परिस्थितियों में ही बदला जा सकता है ।
  3. संभावित परिणाम- यह आशा की जाती है कि एएएस के साथ स्थायी एसटीएल एनपीके और सुक्ष्म पोषकों के लिए प्रति वर्ष लगभग 10000 मृदा नमूनों का विश्लेषण कर सकती है । यह सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाने की आवश्यकता है कि प्रत्येक तीन नमूनों में से एक (समान क्षेत्रों से विशेषतः) सूक्ष्म पोषकतत्वों के लिए भी जांच की जाएगी । इसी तरह से प्रत्येक एमएसटीएल की क्षमता प्रति वर्ष 5000 नमूने हैं जिनका अनूकूल उपयेाग होना चाहिए । आईसीपी के साथ प्रयोगशाला मामले में, यह दक्षता को कम से कम 1 लाख नमूनों तक बढ़ाया जाएगा ।
  4. निजी क्षेत्रों की भागीदारी -चूंकि सामान्य रूप से मृदा जांच प्रयोगशालाएं राज्य एजेंसियों के माध्यम से राज्य सरकारों दवारा स्थापित की जाएंगी, यह आशा की जाती है कि राज्य सरकार दूसरे अभिकरणों जैसे संगठनों, सहकारी समितियों एवं निजी उदयमियों (कृषि-उदयमियों) की भागीदारी को बढ़ावा देगी । राज्य सरकार को इन मृदा जांच प्रयोगशालाओं के परिचालन तथा प्रबंधन में इनके निजी क्षेत्र के अभिकरणों की 3भागीदारी के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन की घोषणा करने की आवश्यकता है । इन दिशा निर्देशों में अन्य बातों के साथ-साथ किसानों से लिए जाने वाले अधिभारों तथा इन निजी एजेंसियों के साथ किए जाने वाला समझौता ज्ञापन/करार, स्पष्ट निगरानी लक्ष्यों सहित सभी निबंधन एवं शताँ को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। राज्य सरकारें समय-समय पर निजी क्षेत्र की इन प्रयोगशालाओं के निष्पादन का मानीटरन और समीक्षा करेंगी ।

मौजूद मृदा जांच प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण

  1. वर्तमान में, देश में कार्यरत लगभग 12 मिलियन मृदा नमूनों के वार्षिक विश्लेषण क्षमता के साथ 1087 मृदा जांच प्रयोगशालाएं (930 एसटीएलएस और 157 एमएसटीएलएस) है । मौजूदा एसटीएलएस से कई में सूक्ष्म पोषक तत्वों विश्लेषण के लिए सुविधाएं नहीं हैं तथा एनपीके विश्लेषण की वर्तमान क्षमता भी पूरी तरह उपयोग नहीं की जा रही है । जिंक, लौह, ताम्बा, मैगनीज, बोरोन आदि जेसे सूक्ष्म पोषक तत्वों के विश्लेषण की सुविधा के निर्माण के लिए एकमुश्त अनुदान दिया जाएगा । कम से कम 125 विद्यमान एसटीएलएस का 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सुदृढ़ीकरण किया जाएगा ।
  2. सहायता के मानदण्ड- निर्देशित सूची के अनुसार मानक गुणवत्ता के अपेक्षित रसायनों एवं शीशे की सामग्री के साथ उसके सहायक उपकरणों, इनडक्टिव कपल्ड प्लाजमा स्पेक्ट्रोफोटोमिटर (आईसीपी)/एटोमीक एबसोरप्सन स्पेक्ट्रामिटर (एएएस) की खरीद के माध्यम से सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण सुविधाओं के सूजन के लिए प्रति/प्रयोगशाला 30 लाख रूपए ।
  3. सामान्यता राज्य सरकारें/संघ राज्य क्षेत्र के नियंत्रण के तहत कार्यरत विदयमान एसटीएलएस/एमएसटीएलएस सुदृढीकरण के पात्र होंगे । बिना सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण सुविधाओं के एसटीएलएस के सुदृढ़ीकरण के लिए, कोई भी सहायता दिए जाने से पहले विद्यमान स्टाफ को ध्यान में रखते हुए निष्पादन आकलन बनाए जाने चाहिए । केवल कार्यरत एसटीएलएस को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । सरकार को एसटीएलएस के विद्रयमान निष्पादन स्तर का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि इसमें उच्च दक्षता प्राप्त करने के लिए किसी प्रक्रिया को बदलने की आवश्यकता है या नहीं । इसके अलावा, बेंच-मार्किग की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी चाहिए । राज्य सरकारों को स्कीम के तहत सुदृढ़ीकरण के साथ विद्यमान एसटीएल तथा एमएसटीएल के प्रचालन तथा प्रबंधन के लिए उपरोक्त पेरा 1.4 में यथा वर्णित निजी क्षेत्रों से मदद लेने के लिए स्पष्ट वर्णित एवं पारदर्शी दिशा-निर्देश घोषित करने को प्रोत्साहित किया जाता है ।

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन/आईएनएम/उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर एसटीएल कर्मियों/विस्तार अधिकारियों/किसानों तथा फोल्ड प्रदर्शनियों के प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता निर्माणं

1)  कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम- उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर एसटीएल कर्मचारियों तथा क्षेत्र कर्मचारियों के लिए आयोजित किया जाने वाला प्रशिक्षण कार्यक्रम दो दिन का होगा । अन्य बातों के साथ, यह पाठ्यक्रम मृदा उर्वरकता प्रबंधन में मृदा प्रशिक्षण, नमूना पद्धति; परिक्षण प्रोटोकॉल; मृदा परिक्षण परिणाम की व्याख्या तथा पोषक आवश्यकताओं की गणक: फसलन प्रणाली आधारित पोषक प्रबंधन तथा उत्पादक के उत्पादन तथा गुणवत्ता पर संतुलित पोषक के महत्व और मृदा स्वास्थ्य रख रखाव आदि तथ्यों को शामिल करेगा ।

2)  किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम- उर्वरक के संतुलित उपयोग पर किसानों के लिए आयोजित किए जाने वाला प्रशिक्षण कार्यक्रम दो दिनों का होगा । उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर किसानों के लिए गठित दो दिनों के प्रशिक्षण के लिए, अन्य बातों साथ साथ पाठ्यक्रम सामग्री मृदा स्वास्थ प्रबंधन पर मृदा परिक्षण, फसल उत्पादकता तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन में संतुलित उर्वरक के महत्व समप्लिंग प्रोटोकॉल तथा प्रशिक्षण प्रयोगशाला के लिए भेज गए नमूनें, संतुलित पोषक में जैविक खाद्य तथा जैव उर्वरकों के महत्व; फसल के आवश्यकता के अनुसार मृदा उर्वरक प्रबंधन के लिए मृदा प्रशिक्षण परिणाम का कार्यान्वयन आदि जैसे विषयों को शामिल करेगा ।

3)  फील्ड प्रदर्शन-उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर फील्ड प्रदर्शन किसानों के खेतों पर किये जाने चाहिए । उर्वरकता को छोड़कर पद्धति पैकेज एकरूप होना चाहिए। कृषि जैसे जुताई, डिस्कींग, लेबलिंग आदि बुआई/पौध रोपण के पहले किया जाना चाहिए । प्रदर्शन प्लाट प्रत्येक एक खण्ड में एक एकड़ (4000 वर्ग मी. ) की वरियता पर होना चाहिए। कुल एक एकड़ का दो या अधिक सुविभाजित प्लाट्स का भी चयन किया जा सकता है । प्रत्येक प्रदर्शन प्लाट को 2 समान भागों में विभाजित किया जाना चाहिए अर्थात नियंत्रण भाग जो किसानों दवारा विद्यमान प्रणालियों पर आधारित तथा उपचारित भाग जो एसएसपी, नीम परत यूरिया, सल्फर परत यूरिया, जिंकयुक्त यूरिया, अनुकूलित उर्वरकें, सूक्ष्म पोषकें तथा जैव-उर्वरकें एवं मृदा सुधार जैसे आर्थिक उर्वरकों सहित संतुलित उर्वरकों आधारित मृदा प्रशिक्षण यदि आवश्यकता हो, पर आधारित होगा। सभी दूसरी कृषि पद्धति को कटाई तक एकरूपता बनाए रखनी चाहिए ।

4)  किसान मेले- एक दिवसीय किसान मेले का आयोजन उस समय किया जाना चाहिए जब फसलों में लगभग दाने बन रहे/फल लग जाए या कटाई के दिन । आस-पास के गांवों से लगभग 50 किसानों का संतुलित तथा उर्वरक प्रणाली आधारित मृदा परिक्षण के प्रभाव तथा लाभप्रदतता प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किए जाने चाहिए। क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी साहित्य उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। उचित प्रौद्योगिकियों  स्थानांतरण तथा किसानों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए दो विषय विशेषज़ आमंत्रित किए जाने चाहिए ।

5)  राज्य सरकारें किसी भी चयनित अभिकरण जैसे आईसीएआर संस्थाएं/एसएयूकेवीके/ कृषि विभाग / राज्य अभकरण/उर्वरक उद्योग के माध्यम से इस तथ्यों को कार्यान्वित कर सकती हैं या किसी कृषि स्नातक या इसके कार्यान्वयन में प्रगतिशील किसान को भी शामिल कर सकती हैं । राज्यों तथा संघ शासित राज्य क्षेत्रों से प्राप्त प्रस्तावों पर आधारित आईएनएम प्रभाग दवारा कार्यक्रमों की संख्या निश्चित की जाएगी । सहायता तथा अवधि के लिए मानदण्ड का ब्यौरा अनुबंध vi में दिया है ।

6)  भारत सरकार या राज्य सरकार मृदा स्वास्थ्य, प्रबधन, समेकित पोषक प्रबंधन या उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए केन्द्रीय अभिकरण या राज्य अभिकरण के माध्यम से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय कार्यशाला/सम्मेलन/प्रदर्शनियों को आयोजित करेगी अथवा इसमें सहायता करेंगी ।

उर्वरकों के स्थान विशिष्ट संतुलित उपयोग के लिए डाटा बैंक का निर्माण

  1. उद्देश्य - उर्वरता के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए, मृदा उर्वरकता पर क्षेत्रीय  विशिष्ट तथा स्थानीय विशिष्ट बनाए रखने के लिए आवश्यक है । जैसा कि वर्तमान में, स्थल विशिष्ट पोषक आवश्यकताएं तथा द्वितीय  एवं सूक्ष्म पोषक कमियों की रूपरेखा के सुझाव के लिए देश में प्रक्रियाबद्ध आकड़े या प्रक्रिया मौजूद नहीं है । एक राष्ट्रीय डाटा बैंक का गठन किया जाना प्रस्तावित है ।
  2. राज्य सरकार उनके चुनाव के किसी अभिकरण जैसे आईसीएआर संस्थाएं/एसएयूएस/ राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र आदि या फिर निजी क्षेत्र के दवारा इन कार्यों को कार्यान्वित कर सकती है, लेकिन प्रस्ताव में किसानों को शिक्षा देने के लिए इस डाटा के उपयेाग हेतु कार्य योजना शामिल की जानी चाहिए । निजी क्षेत्र के चुनाव के लिए प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए दिशा-निर्देश की आवश्यकता होगी ।

नोट:  सहायता के लिए मानदण्ड दिशा निर्देश के अनुबंध III पर दिए गए है ।

फ्रन्टलाइन फील्ड प्रदर्शन (एफएफडी) के माध्यम से एसटीएलएस (प्रत्येक एसटीएल अधिकतम 10 गांव) दवारा गांवों को अपनाना

  1. उद्देश्य- उर्वरता के संतुलित उपयोग की उपयोगिता के बोर में किसानों को विश्वास जगाने के लिए, यह आवश्यक है कि एसटीएलएस के सुझाव गांवों में प्रभावी ढंग से प्रदर्शित की जाती है । उर्वरकता के संतुलित उपयोग पर फ्रोन्टलाइन फील्ड प्रदर्शन संचालन के लिए 800 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं दवारा 8000 गांवों को अपनाने का प्रस्ताव किया गया है । इनके 800 एसटीएलएस राज्य सरकार दवारा चुनी जाएगी, प्रस्ताव के साथ एक सूची भारत सरकार को भेज दी जाएगी ।
  2. अपनाए गए गांवों से संबंधित लगभग 10 किसान चयनित किए जाने चाहिए । एक फील्ड दिवस किसानेां के लिए उनके या नजदीकी गांवों में निरंतर रूप से व्यवस्था करनी होगी । विषय वस्तु विशेषज्ञ मृदा परिक्षण आधारित उर्वरता की आवश्यकता तथा उपयोग और मृदा सुधार के महत्व को विस्तारपूर्वक बताना चाहिए ।
  3. सहायता के मानदण्ड - अनुबंध VIII पर ब्यौरों के अनुसार प्रति एफएफडी रूपए 20,000

मृदा उर्वरकता मोनिटेरिंग आधारित डिजिटल जिला मृदा मैप्स तथा ग्लोबल पोजिसनिग प्रक्रिया (जीपीएस) का आयोजन

  1. उद्देश्य- जीपीएस आधारित जिला मृदा उर्वरकता मैप्स के अलावा उर्वरता के संतुलित उपयोग को अपनाने में प्रमुख रूकावट है । आई आई एस एस के 11 वीं योजना के दौरान, भोपाल के 19 प्रमुख राज्यो के 171 जिलों के उर्वरकता मैप्स तैयार करने का कार्य सौंपा गया था । 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बचे हुए कृषि जिलों में डिजिटल जिला मृदा मैप्स तथा जीपीएस आधारित मृदा उर्वरकता मोनिटेरिंग प्रक्रिया तैयार करने का प्रस्ताव किया जाता है ।
  2. राज्य सरकारें/ एसएयूएस /आईसीएआर संस्थाएं/राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र/केवीकेएस या अन्य केन्द्रीय/राज्य सरकार अभिकरण इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए संयुक्त किए जा सकते हैं ।
  3. सहायता के मानदण्ड प्रति जिला 6.00 लाख रूपये लगभग तक सीमित किए जाएगें ।

उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए सुबाहय मृदा परिक्षण किट

उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए मृदा पोषक के तीव्र तथा खेत पर परीक्षण के लिए राज्य सरकार को रूपये 0.15 लाख/प्रति किट की अधिकतम सहायता राशि प्रदान किया जाएगा । 12 वीं योजना अवधि के दौरान फील्ड कार्मियों को 3000 मृदा परीक्षण किट वितरण का प्रस्ताव किया जाता है । सूक्ष्म पोषक सुविधाएं रखने वालों की किट के लिए प्राथमिकता दी जाएगी । आईसीएआर संस्थाएं जैसे आईएआरआई, नई दिल्ली के साथ परामर्श से किटों की प्रोदयोगिकी उपयुक्त निर्धारित की जाएगी ।

सूक्ष्म पोषक तत्वों का बढ़ावा एवं वितरण

गहन कृषि में लोह, मैग्निज, बोरोन, जिंक आदि पोषकतत्वों की कमियां बृहद स्तर पर देखी जा रही है । समग्र 12 वीं पंचवर्षोंय योजना के दौरान पोषक तत्वों को बढ़ावा तथा वितरण का प्रस्ताव किया जाता है । सहायता 500 रूपये प्रति हैक्टेयर अधिकतम के अध्यधीन अपेक्षित पोषकतत्व की लागत के 50% तक सीमित होगी ।

उर्वरता गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली का सुदृढीकरण

विद्यमान राज्य उर्वरक गुणवता नियंत्रण प्रयोगशालाओं का सुदृढीकरण/उन्नयन

  • देश में विक्रय किये जाने वाले उर्वरकों की गुणवत्ता की जांच के लिए, वर्तमान में विभिन्न राज्य सरकारों के नियंत्रण में 74 एफक्यूसीएल कार्यरत हैं । चूंकि गुणवत्ता परीक्षण उर्वरक नियंत्रण आदेश (एफसीओ) के तहत सांविधिक आवश्यकता है, यह सभी उपकरणों तथा यंत्रों के रख-रखाव आवश्यक है तथा विश्लेषण के लिए गुणवत्ता रासायनिक तथा शीशे की सामग्री की आपूर्ति को सुनिश्चित करना अनिवार्य है । इसके लिए समय समय पर यंत्रों के उन्नयन तथा प्रतिस्थापन की आवश्यकता है । राज्य प्रयोगशालाओं में से कई इन सुविधाओं के रख रखाव के लिए अत्यन्त वित्तीय समस्या से जूझ रहे हैं । इसलिए, विश्लेषण क्षमता के उच्च मानकों को बनाए रखने के लिए, विद्यमान एफक्यूसीएलएस के उन्नयन तथा सुदृढ़ीकरण का प्रस्ताव है ।
  • सक्षम अभकिरण- राज्य सरकार के तहत एफक्यूएलएस, केवल ऐसी राज्य प्रयोगशालाओं को सहातया प्रदान करेंगी, जो प्रचालन में हे तथा सही ढंग से काम कर रही है और केंद्र  सरकार के भाग पर देनदारी देयता नहीं है ।
  • सहायता के मानदंड – प्रत्येक प्रयोगशाला को मशीनों एवं यंत्रों, रसायनों, शीशे के सामान तथा विविध प्रयोगशाला सामग्री की खरीद के लिए 30 लाख रूपये प्रदान किए जाते हैं जैसा अनुबंध IX में दर्शाया गया है ।
    • इस पर विचार करते हुए कि 12 वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश में डीलरों की कुल संख्या 3.25 लाख होगी, गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उर्वरक परीक्षण किये जाने वाले नमूनें न्यूनतम आवश्यकता 6.50 लाख रूपये हैक्टेयर (खरीफ एवं रबी के दौरान प्रत्येक डिलर को शामिल करने के लिए) हैं । विद्यमान परीक्षण सुविधाओं की क्षमता (1.25 लाख) काफी अपर्याप्त है तथा आवश्यकता की लगभग केवल 20 प्रतिशत है । इस लिए प्रत्येक 4000 नमूनों की वार्षिक विश्लेषण क्षमता के साथ गुणवत्ता परीक्षण के लिए राज्य सरकारों दवारा 20 नये एफक्यूसीएलएस स्थापित किये जाने का प्रस्ताव है । राज्य सरकारों को 75 लाख रूपये/प्रयोगशाला की दर से एकमुश्त वित्तीय सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव है । यह 0.80 लाख नमूनों का अतिरिक्त वार्षिक विश्लेषण क्षमता प्रदान करेगी ।
    • स्थापित की जाने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या - 12 वीं पंचवर्षोंय योजना के टोरान 20 नये एफकयूसीएल स्थापित की जाएगी ।
    • सहायता के मानदण्ड- एनपीके, गौण तथा सूक्ष्म पोषकों के विश्लेषण के लिए सुविधाएं सूजन के लिए अनुबंध-X के अनुसार मशीनों एवं यंत्रों, रसायन, शीशे के सामान तथा विविध प्रयोगशाला वस्तुओं की खरीद के लिए प्रति प्रयोगशाला 75 लाख रूपये का एकमुश्त अनुदान प्रदान किया जाएगा
  • राज्य सरकारों द्वारा नये उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं की स्थापना-
  • क्षारीयालवणीय मृदा तथा अम्लीय मृदा का सुधारआरएडी घटक के तहत समस्याग्रस्त मृदा (क्षारीय /लवणीय/अम्लीय मृदा) के सुधार का प्रस्ताव किया जाना है। सहायता के मानदण्ड एनएमएसए दिशा-निर्देशों के परिशिष्ट-। पर दिए गए हैं ।

सीएफक्यूसी एवं टीआई को सहायता

गुणवत्ता नियंत्रण के लिए उर्वरक नमूनों का विश्लेषण

उर्वरक डिलरों तथा अन्य स्रोतों से उर्वरक निरीक्षकों दवारा लिए गए उर्वरक नमूनों के विश्लेषण के लिए एफसीओ की धारा 29 के तहत सीएफक्यूसी एवं टीआई और इसकी 03 क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं अधिसूचित प्रयोगशाला है । 12 वीं योजना के दौरान उर्वरक नमूनों के

विश्लेषण को जारी रखने जाने का प्रस्ताव है ।

सीएफक्यूसी एवं टीआई एवं इसकी 03 क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं के द्वारा सीधे प्रशिक्षण के माध्यम से मानव विकास संसाधन

सीएफक्यूसी एण्ड टी आई/आरएफसीएल पर

उर्वरक विश्लेषण के लिए उर्वरक गुणवतता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम-12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 20 प्रतिभागियों के साथ चार सप्ताह की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

10.2.2 उर्वरक परीक्षकों के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम-12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 20 प्रतिभागियों के साथ दो सप्ताह की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

उत्तर-पूर्व राज्यों के उर्वरक प्रवर्तन अधिकारी के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम- 12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 20 प्रतिभागियों के साथ दो सप्ताह की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

अधिसूचित प्राधिकरण के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम-12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 20 प्रतिभागियों के साथ एक सप्ताह की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

विदेशी प्रतिभागियों के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम-12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 20 प्रतिभागियों के साथ पांच सप्ताह की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

राज्यों में

उर्वरक प्रवर्तक/विस्तार अधिकारी के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यकम-12 वीं योजना के टोरान प्रत्येक पाठयक्रम में 50 प्रतिभागियों के साथ 2 दिनों की अवधि के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

उर्वरकों डीलरों के लिए के लिए उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रणपर प्रशिक्षण कार्यक्रम-12 वीं योजना के दौरान प्रत्येक पाठयक्रम में 50 प्रतिभागियों के साथ एक दिन के पाठ्यक्रम आयोजित किये जाएगे ।

एसएचएम के लिए नवाचारी घटक - इस स्कीम के उद्देश्य को बढ़ावा देने के लिए किसी राज्य सरकार दवारा प्रस्तुत कोई नवाचारी परियोजना पर समग्र परिव्यय तथा बजट सीमा के भीतर इस स्कीम के तहत वित्त पोषण के लिए विचार किया जाएगा । इस तरह के नवाचारी घटकों पर किसी वर्ष में व्यय की गई कुल राशि उस वर्ष के लिए कुल बजट का 10% से अधिक नहीं होगी ।

आईएनएम एवं जैविक कृषि

एनसीओएफ को सहायता

1)  राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र (एनसीओएफ) ने अब तक केवल जेव उर्वरक एक केन्द्र के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य किया है । 12 वीं योजना में एनसीओएफ राष्ट्रीय केन्द्र के रूप में कार्य करेगा तथा देश में जैव उर्वरकों पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक सभी गतिविधियों को समन्वित किया है । एनसीओएफ में घरेलू क्षेत्र विस्तार मण्डी विपणन में विपणन को बढावा देने, प्रमाणीकरण, मानव संसाधन विकास सहित सभी पणधारियों की तकनीकी क्षमता निर्माण, प्रोदयोगिक अंतरण, गुणवत्ताप्रद कार्बनिक तथा जैविक आदानों को बढ़ावा एवं उत्पादन, राज्यों के सहयोग से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से जागरूकता सूजन तथा प्रचार, पर ध्यान दिया जायेगा । एनसीओएफ में डाटा संग्रहण एवं जैविक कृषि के क्षेत्र में प्रतिष्ठित निजी कंपनियों से सहायता लेते हुए राज्यों के सहयोग से जैविक कृषि के पहलुओं पर डाटा संग्रहण की बहुत ही प्रभावी प्रणाली का विकास करेगी ।

2)  एनसीओएफ एवं इसके छह आरसीओएफ द्वारा प्रशिक्षण के माध्यम से मानव संसाधन विकास

  • अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षक प्रशिक्षण/सहयोग तथा अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ सम्पर्क देश में इसके विशेष रूप से थोड़ी विशेषज्ञता के साथ केवल नये फील्ड होने के कारण, कृषि एवं सहकारिता विभाग एनसीओएफ, राज्य अभिकरणों (जैविक कृषि कार्यान्वयन कार्यक्रम में सम्मिलित ), प्रमाणीकरण अभिकरणों तथा आईसीएआर के वैज्ञानिकों तथा एसएयू (पिछले 3 वर्षों से पद्धतियों की जैविक पैकेज को विकास में कार्यरत) के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिये जाने तथा अंतर्राष्ट्रीय विगोपन दिए जाने की आवशयकता है । इसमें विदेशी विशेषज्ञों का 3भारत में आवश्यकता आधारित टोरा तथा 3भारतीय कार्रकारी अधिकारियो/तकनीकी विशेषजों के विभिन्न देशों में टोरे भी शामिल हैं ताकि भारतीय जैविक उत्पाद, संगोष्ठी / सम्मेलन में भाग लेने, पदर्शनियों में भाग लेने तथा जैविक खेती पर अंतराष्ट्रीय निकायों के साथ सम्पर्क विकसित करने में जागरूकता पैदा की जा सके । कृषि एवं सहकारिता विभाग तथा एनसीओएफ के चयनित समूहों दवारा किये गये बायोफैंच और न्यूरेम्बर्ग के लिए दौरे जैविक कृषि में अंतर्राष्ट्रीय रूप जानने में भी लाभदायक हो सकते हैं ।
  • प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम-
    • जैविक कृषि पर प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम- जैविक कृषि के क्षेत्र में विस्तार कर्मियों तथा खेत कर्मियों के पहली पीढ़ी की जैविक कृषि निर्माण करने के लिए तथा तीव्र मृदा परीक्षण किट के माध्यम से मृदा परीक्षण उदयमियों की ग्रामीण शक्ति का निर्माण करने के लिए जैविक उत्पादन पद्धतियों, कृषि इनपुट प्रबंधन, प्रमाणपत्र प्रक्रिया (तीसरा पक्ष तथा पीजीएस दोनो), प्रयोजन, फसलोपरान्त प्रसंस्करण, भण्डारण एवं विपणन पर एक महीने का प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आयोजित करने का प्रस्ताव है । यह पाठ्यक्रम ग्रामीण युवकों जिनके पास जीव विज्ञान के साथ कृषि विज्ञान में डिग्री/डिप्लोमा हो, के लिए खोले जाएंगे । एसएयूशिक्षण संस्थान ऐसे पाठ्यक्रम के लिए अपने स्नातक छात्रों को भी प्रायोजित कर सकता है । एनसीओएफ, गाजियाबाद में ऐसे दस पाठ्यक्रम( प्रतिवर्ष दो) आयोजित किए जाएंगे ।
    • उत्पादन तथा जैविक आदानों के गुणवतता नियंत्रण पर प्रशिक्षण/पुनश्चर्या पाठ्यक्रम -विश्लेषणात्मक कौशल, नमूना संग्रहण जैव उर्वरकों और कार्बनिक उर्वरकों हेतु एफसीओ के अनुसार गुणवत्ता विश्लेषण आवश्यकता पर जैविक आदान उत्पादन यूनिटों के राज्य सरकार के अधिकायों/कार्मिकों की आवश्यकता को देखने को सामयिक बनाने के लिए तथा कार्बनिक एवं जैविक आदानों के उत्पादन से जुड़े व्यक्तियों को समुचित उत्पादन प्रौदयोगिकी के अंतरण के लिए 10 दिसवसीय प्रशिक्षण /पुनश्चर्या पाठयक्रमों का प्रस्ताव है।
    • प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण - जैविक कृषि प्रशिक्षकों का काडर तैयार करने के लिए पर उत्पादन एवं गुणवत्ता नियंत्रण पर उर्वरक निरीक्षकों, वरिष्ठ स्तर के विस्तार अधिकारियों, केवीके प्रशिक्षकों, एनजीओ प्रशिक्षकों, पीजीएस क्षेत्रीय  परिषद सदस्य तथा उत्पादन एवं गुणवत्ता नियंत्रण इकाईयों के तकनीकी कार्मिकों आदि के लिए पांच दिन का अनुकूलित प्रशिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करने का प्रस्ताव है।
    • गुणवत्ता नियंत्रण पर जैविक कृषि, पीजीएस इंडिया कार्यक्रम, मृदा स्वास्थ्य प्रबधन पर खेत कर्मियों/विस्तार अधिकारियों तथा डीलरों के लिए प्रशिक्षण - कयोंकि जैविक कृषि तथा धारणीय मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पद्धतियां मुख्यतः खेत पर प्रबंधन पद्धतियां हैं । सरकारी तथा एनजीओ टो क्षेत्रों में खेत कर्मियों तथा विस्तार अधिकारियो के लिए उचित प्रबंधन प्रोटोकॉल का प्रसार करने के लिए दो दिनों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम प्रस्तावित है ।

नाबार्ड द्वारा कार्यान्वित किये गए घटक

1)  वाणिज्यिक आदान उत्पादन इकाईयों की स्थापना के लिए पूंजी निवेश राजसहायता के माध्यम से पोषण संघटीकीकरण तथा पौंध संरक्षण के लिए जैविक आदान के लिए सहायता तथा इसके उत्पादन एवं उपयोग को प्रोत्साहित करना;

2)  यंत्रीकृत फल/सब्जी मण्डी/कृषि अपशिष्ट कम्पोस्ट उत्पादन इकाई (100 टीपीडी क्षमता) की स्थापना: पीपीपी या दूसरे तरीको से फल तथा सब्जी अपिशिष्ट/कृषि, अपशिष्ट कम्पोस्ट इकाई के लिए राज्य सरकार/एपीएमसी/नगर पालिकाओं/दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम/उर्वरक कम्पनियों/निजी उदयोगों/ निजी उदयमी/वैयक्तिक आदि दवारा वृहद यंत्रीकृत कम्पोस्ट संयंत्रों की स्थापना के लिए । प्रत्येक इकाई का मॉडल परियोजना परिव्यय 190.00 लाख रूपये का प्रस्ताव है । नाबार्ड के के माध्यम से राज्य सरकार/सरकारी एजेंसियों के 190 लाख रूपये/यूनिट को अधिकतम सीमा तक 100% तथा व्यक्तियों /निजी एजेसियों के लिए पंजी निवेश राजसहायता के रूप में 63 लाख रूपये तक सीमित कुल वित्तीय परिव्यय का 33% की दर पर ऋण सम्बद्ध पाश्वत राजसहायता के रूप में दी जाएगी । मॉडल वित्तीय परिव्यय के संबंध में ब्यौरा अनुबंध-iv पर दिया गया है ।

3)  अत्याधुनिक लिक्विड/कैरियर आधारित जैव उर्वरक/जैव कीटनाशी उत्पादन इकाईयों की स्थापना किया जाय (200 टीपीए क्षमता) पीपीपी या दूसरे तरीके से राज्य सरकार/एपीएमसी/नगर पालिका/अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम/उर्वरक कम्पनियाँ /निजी उद्योग/निजी उदयम/व्यक्ति आदि दवारा अत्याधुनिक अनुर्वर लिक्विड/कैरियर आधारित 200 टीपीए जैव उर्वरक तथा माइक्रोबियल जैव कीटनाशक उत्पादन इकाईयों की स्थापना के लिए । प्रत्येक इकाई का मॉडल परियोजना परिव्यय 175.00 लाख रूपये के लिए प्रस्तावित की जाती है । नाबार्ड के माध्यम से ऋणसम्बद्ध पाश्र्वान्त राजसहायता के रूप में कुल वित्तीय परिव्यय (टीएफओ) की 25% या 40 लाख रूपये जो भी कम हो की दर से पूंजी निवेश राजसहायता के रूप में व्यक्तियों/निजी अभिकरणों के लिए तथा 160 लाख रूपये की अधिकतम सीमा तक राज्य सरकार/सरकारी अभिकरणों की 100% सहायता प्रदान की जाएगी ।

राज्य सरकारे/आईसीएआर एसएयू आदि द्वारा कार्यान्वित किए गए घटक

1)  एफसीओ के तहत जैव उर्वरक तथा जैविक उर्वरक परीक्षण/गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला (बीओक्यूसीएल) की स्थापना - जैव उर्वरक तथा जैविक उर्वरक परीक्षण/गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए राज्य सरकार को अनुदान सहायता के रूप में प्रदान को जाएगी ।

2)  एफसीओ के तहत विद्यमान जैव उर्वरक तथा जैविक उर्वरक परीक्षण/गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला (बीओक्यूसीएल) का सुदृढ़ीकरण- एफसीओ के तहत राज्य सरकार दवारा स्थापित की गई विद्यमान, जैव उर्वरक/जैविक उर्वरक परीक्षण/ गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला के लिए उपकरणों/यंत्रों आदि के संबंध में उनके सुदृढ़ीकरण के लिए प्रति इकाई 45.00 लाख रूपये की दर से वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी । 12 वीं योजना अवधि के दौरान ऐसी सभी इकाईयों को 36000 लाख रूपए की कुल लागत के साथ वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है ।

3)  ऑनलाईन डाटा प्रबंधन के लिए पीजीएस प्रणाली को समर्थन तथा एक अवशेष विश्लेषण - क्षेत्रीय  परिषद के स्थानीय समूह के तहत पंजीकृत किसानों से प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद तथा अवशेष विश्लेषण मृदा के अधीन पंजीकृत समूह के डाटा प्रबंधन के लिए अनुदान सहायता के रूप में पीजीएस- इण्डिया कार्यक्रम के तहत प्राधिकृत क्षेत्रीय परिषदों की सहायता के लिए राज्य सरकार को सहायता प्रदान की जाएगी।

4)  खाद प्रबंधन तथा जैविक नाइट्रोजन उत्पादन के लिए जैविक गांवों को अपनानाजेविक गांवों को अपनाने के लिए राज्य विशिष्ट परियोजना प्रस्ताव के विरूद्ध जैविक गांवों को अपनाने के लिए अनुदान सहायता के रूप में राज्य सरकार को सहायता प्रदान की जाएगी।

5)  राज्य एवं फसल प्रणाली के लिए विशिष्ट प्रणाली के जैविक पैकेज के विकास के लिए अनुसंधान को समर्थन- प्रणाली के जैविक पैकेज विकास के लिए अनुसंधान सुविधाओं के साथ पात्र आईसीएआर/एसएयू/अन्य अनुसंधान संस्थाएं/राज्य सरकार के अभिकरणों को अनुदान सहायता के रूप में फसल प्रणाली एवं राज्य विशिष्ट जैविक प्रणाली पैकेज के विकास के लिए विशिष्ट प्रस्तावों के आधार पर सहायता प्रदान की जाएगी ।

6)  अलग जैविक कृषि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण विभाग की स्थापना - जैविक कृषि को उचित लोकप्रिय बनाने के लिए , राज्य कृषि विश्वविद्यालय के तहत अलग विभाग की स्थापना करने की आवश्यकता है जहां जैविक कृषि पर डिप्लोमा/डिग्री पाठ्यक्रम संचालित किया जा सके । इस उद्देश्य के लिए एसएयू से विशिष्ट प्रस्ताव की तुलना में एसएयू को सहायता अनुदान के रूप में सहायता प्रदान की जाएगी । 12वीं योजना अवधि के दौरान विभिन्न विश्वविदयालयों में 8 ऐसे विभागों की स्थापना प्रस्तावित है । इस कार्य के लिए 800.00 लाख रू. की राशि 12वीं योजना अवधि के लिए निर्धारित है ।

7)  किसान फील्ड पर जैविक आदानों का प्रोत्साहन (खाद, वमों कंपोस्ट, जैव उर्वरक द्रव/धन, अपशिष्ट कंपोस्ट, हर्बल एक्स्ट्राक्ट आदि) - जैव आदानों के प्रोत्साहन के लिए 5000 रू. प्रति हेक्टेयर की सीमा के अधीन लागत की 50 प्रतिशत और प्रति लाभार्थी के लिए 10,000 रू. की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी । 12वीं योजना अवधि के दौरान 1 मिलियन है. क्षेत्र को कवर किए जाने का प्रस्ताव है।

8)  सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणीकरण के तहत क्लस्टर दृष्टिकोण के जरिए जैविक खेती को अपनाना - सहभागी गारंटी प्रणाली (पीजीएस) प्रमाणीकरण के तहत कलस्टर दृष्टिकोण के जरिए जैविक खेती को अपनाने के लिए अधिकतम 40,000 रू. प्रति लाभार्थी के अध्यधीन 20,000 रू. प्रति है. की वित्तीय सहायता 3 वर्ष अवधि के लिए प्रदान की जाएगी ।

9)  फील्ड प्रदर्शनियां सह फील्ड दिवस - पीजीएस कलस्टर/किसान फील्ड में जैविक खेती पैकेजों के प्रदर्शन के लिए एक जैविक कृषि करने वाले किसान का चयन किया जाए और फील्ड दिवसों की व्यवस्था की जाए । बहु फसलन, फसल चक्र, रूपांतरण, दस्तावेजीकरण आदि सहित सभी जैव पैकेजों का प्रदर्शन किया जाएगा ।

10) पीजीएस का क्षमता निर्माण और प्रचालन, इंडिया कार्यक्रम - किसान समूह केन्द्रित प्रमाणीकरण कार्यक्रम के रूप में, वर्ष 2011-12 के दौरान पीजीएसइंडिया की शुरूआत की गई है जिसके लिए निरंतर मॉनिटरिंग, निगरानी और समन्वय की जरूरत है । वेबसाइट प्रबंधन और आनलाइन मॉनिटरिंग नियमित कार्य रहेगी । पीजीएस - इंडिया प्रमाणित उत्पादों की निर्मुक्ति होने पर रेंडम अवशेष परीक्षण भी शुरू किया जाए । एनएबीएल प्रत्यायित प्रयोगशालाओं के जरिए अवशेष विश्लेषण किया जाए । उसके वेबसाइट प्रचालन, प्रबंधन, निगरानी, गैर सरकारी पीजीएस-एनएसी सदस्यों के लिए यात्रा शुल्क और अवशेष विश्लेषण परीक्षण की लागत के भुगतान के लिए निधियों की आवश्यकता होगी ।

11) जैविक आदानों के उत्पादन और गुणवत्ता नियंत्रण पर प्रशिक्षण/पुनश्चर्या पाठ्यक्रम - जैव उर्वरक और आर्गेनिक उर्वरकों के लिए एफसीओ के अनुसार गुणवत्ता विश्लेषण आवश्यकता पर राज्य सरकारी अधिकारियों की विश्लेषण क्षमता, नमूना संकलन और संचालन आवश्यकताओं को अदयतन करने और आर्गेनिक और बयोलिजिकल आदानों की उत्पादन के साथ जुड़े हुए व्यक्तियों के लिए उपयुक्त् उत्पादन प्रौद्योगिकी के अंतरण के लिए 10 दिन की प्रशिक्षण/पुनश्चर्या कोर्स प्रस्तावित किया गया है । 14.12 फील्ड कर्मियों और विस्तार कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण - चूंकि जैविक खेती और सतत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली मुख्य रूप से आन फार्म प्रबंधन प्रणाली है, सरकारी और एनजीओ दोनों क्षेत्रों में कार्यरत फील्ड कर्मियों और विस्तार अधिकारियों के लिए उचित प्रबंधन प्रोटोकाल के प्रसार के लिए दो दिन का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम प्रस्तावित है ।

स्रोत: नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर(एनएमएसए)

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