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तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि हेतु दिशा-निर्देश

इस पृष्ठ में तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि हेतु दिशा-निर्देश की जानकारी दी गयी है।

परिचय

मीठे पानी की जल-कृषि के संसाधनों से मत्स्य-उत्पादन बढ़ाने की प्रबल संभावना विद्यमान है जो देश की लम्बाई और चौड़ाई में सर्वत्र चारों ओर फैले हुए हैं। मछली की कृषि अपनाने के लिये किसानों को गतिमान करने के ठोस प्रयासों, धारणीय मत्स्य-कृषि करने के लिये समुचित प्रौद्योगिकियों के प्रयोग तथा मत्स्य-बीज उत्पादन और संस्थागत वित्त की उपलब्धता से, 5 से 6 वर्षों की सीमा के अंदर जल-कृषि के क्षेत्र से वार्षिक मत्स्य उत्पादन में ठोस बढ़ोत्तरियाँ लाना संभाव होगा। सन् सत्तर के दशक के मध्य से, जब मत्स्य-कृषकों के विकास के अभिकरण (एफ.एफ.डी.एओ.) के माध्यम से मिश्रित मत्स्य-कृषि करने का प्रदर्शन किया गया था और मत्स्य-बीज के उत्पादन के अभ्यासों का मानकीकरण कर दिया गया था, तब से मत्स्य-उत्पादन के स्तरों में लगभग 500 कि.ग्रा./हे./वर्ष से लगभग 2200 कि.ग्रा./हे./वर्ष की वृद्धियाँ हुई हैं। वर्तमान में, अंतरदेशीय जल-कृषि से लगभग 3.0 मिलियन टन के उत्पादन का अनुमान लगाया गया है। पिछले दो दशकों की अवधि में, क्षेत्र के परिचालन और घनत्व के पैमाने में लचीलेपन और कृषि करने की अन्य प्रणालियों के साथ मीठे पानी की जल-कृषि के अभ्यासों की अनुकूलता ने भी मीठे पानी की जल-कृषि को देश में तेजी से बढ़ने वाला क्रिया-कलाप बना दिया है।

भारतीय मेजर कार्प (आई.एम.सी.) और विदेशी कायँ (सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प) भारतीय मीठे पानी की जल-कृषि का मुख्याधार बनाती हैं और मीठे पानी की जल-कृषि के कुल उत्पादन में 90 प्रतिशत का अंशदान देती हैं। आई.एम.सी. और विदेशी कार्यों के अतिरिक्त, अनेक अन्य तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियाँ भी हैं जिनमें माइनर कार्पे (लेबिया कालबासु, एल.बाटा), कैटफिशे (सिंधी, मागुर) और मुल चन्ना की प्रजातियाँ) शामिल हैं जिनकी कृषि भी की जा सकती है। क्योंकि ऐसी मछलियों की प्रजातियों की मांग देश के कुछ क्षेत्रों में ऊंची है। लगभग 2.41 मिलियन हेक्टेयर के जल निकाय, मीठे पानी की जल - कृषि के लिये देश में उपलब्ध है जिनका अधिकांश क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय गर्म जल की दशाओं के अंदर पड़ता है और वह लगभग 5 टन/हे./वर्ष के उत्पादन और उत्पादकता के स्तरों को बढ़ाने के लिये उत्तरदायी है। बीजों, भोजन और उर्वरकों की बेहतर लागतों के निबंधनों के साथ, सघन जल-कृषि के अंतर्गत 5-6 वर्षों की सीमा में इसे लगभग 8 लाख हेक्टेयर में लाना संभव हो सकता है। अगले और पिछले पर्याप्त संयोजनों के माध्यम से, 50,000 हेक्टेयर का दूसरा नया क्षेत्रफल सघन जल-कृषि के लपेट के अंतर्गत लाया भी जा सकता है। ऐसे संयोजनों को अन्य बातों के साथ-साथ, गुणवत्तापरक मत्स्य-बीज की उपलब्धता और मत्स्य-कृषि करने के वैज्ञानिक तरीके अपनाने के लिये कृषकों और उद्यमियों की क्षमता की वृद्धि और मछलियों का सुरक्षित और स्वच्छ दशाओं में विपणन करने के लिये शीत -श्रृंखला के आधुनिक और कुशल साधनों की आवश्यकता होती है।

इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिये राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (एन.एफ.डी.बी) को अधिदिष्ट किया गया है। तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि के विकास के लिये रु.620 करोड़ की धनराशि निर्धारित की जा चुकी है और इन प्रस्तावित क्रिया-कलापों से मूल पूंजी-निवेशों का सृजन किये जाने की आशा की जाती है जिसके परिणामस्वरूप 26.5 लाख टन मछलियों का वार्षिक उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। तालाबों और टैंकों में सघन जल- कृषि पर वर्तमान दिशा-निर्देश, क्रिया-कलापों की एक विस्तृत श्रृंखला का आच्छादन करते हैं और यह श्रृंखला मत्स्य-बीज से लेकर मेज पर परोसी जाने वाली मछली के उत्पादन से लेकर मानव संसाधन विकास तक फैली हुई है। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य और अधिक स्पष्टता और निष्पक्षतावाद लाना है, इस प्रकार देश में सघन जल-कृषि के विकास के लिये सहायता प्रदान करने के लिये एन.एफ.डी.बी. के द्वारा विकसित मापदंडों के साथ तालमेल बिठाते हुए उपयुक्त प्रस्तावों की तैयारी और प्रस्तुतीकरण में लागू करने वाले अभिकरणों को सहायता प्रदान करना है।

सहायता के घटक

तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि का समर्थन करने के लिये, एन.एफ.डी.बी. निम्नलिखित पांच घटकों में सहायता प्रदान करेगी:

  • विद्यमान तालाबों और टैंकों में सघन जल- कृषि
  • नये तालाबों और टैंकों में सघन जल- कृषि
  • तालाबों और टैकों में सघन जल- कृषि के लिये प्रथम वर्ष की एकबारगी लागते
  • मत्स्य-बीज का उत्पादन करने के लिये हैचरियों की स्थापना
  • मत्स्य - अंगुलिकाओं के उत्पादन के लिये मत्स्य बीज पालन की इकाइयों की स्थापना
  • प्रशिक्षण और प्रदर्शन

2.1 विद्यमान टैंकों और तालाबों में सघन जल-कृषि

2.1.1 परिचय

यह अनुमान लगाया गया है कि देश में मीठे पानी की जल- कृषि के अंतर्गत वर्तमान में 24.1 लाख हेक्टेयर का क्षेत्रफल है। एन.एफ डी.बी. ने इस क्षेत्रफल का लगभग एक-तिहाई (33%) अर्थात् लगभग 8.0 लाख हेक्टेयर, अगले छ: वर्षों में सघन जल-कृषि के अधीन लाने का प्रस्ताव रखा है। सामान्यतया, बोर्ड इस कार्यक्रम के लिये सहायता प्रदान नहीं करेगा। किंतु, उन क्षेत्रों में जहाँ मीठे पानी की जल- कृषि की संभावना विद्यमान है परंतु विभिन्न कारणों से यह क्रिया-कलाप नहीं किया गया है, वहाँ अनुमानित 8.0 लाख हेक्टेयर का 25% भाग छः वर्षों की सीमा की अवधि में सहायता से आच्छादित किया जायेगा।

2.1.2. पात्रता के मापदंड

विद्यमान तालाबों और टैंकों में सघन जल- कृषि के लिये अनुमानित 8.0 लाख हेक्टेयर का 25% भाग शामिल करने के लिये सहायता हेतु किसानों का चयन करने के लिये निम्नलिखित मापदंडों का प्रयोग किया जायेगा:

  • मीठे पानी की जल- कृषि करने में किसान का पिछला कार्य-निष्पादन।
  • वैज्ञानिक तरीकों से मत्स्य-कृषि करने के लिये किसान की सम्मति /उद्यमिता।
  • प्रथम वर्ष की इनपुट की लागतों के लिये एन.एफ.डी.बी. की सहायता का विधिवत् उपयोग करके पहली फसल की बिक्री से प्राप्त कार्यशील पूँजी की धनराशि दूसरे वर्ष से लेकर आगे तक पूँजी -निवेश करने के लिये किसान का आश्वासन /सम्मति
  • ऋण देने की बैंक की सहमति/किसान का अपनी निजी पूँजी पर इकाई की लागत का 80% पूँजी -निवेश करने की प्रतिबद्धता

2.1.3. इकाई की लागत (पूँजी-निवेश करने की प्रतिबद्धता)

एक हेक्टेयर (जल-विस्तार क्षेत्र) के विद्यमान जल के टैंक/तालाब के पुनरुद्धार/मरम्मत की इकाई की लागत का रु. 30,000/हे. के रूप में अनुमान लगाया गया है। वे किसान जो बैंक से ऋण की सुविधा का लाभ उठाना चाहते हैं या जो अपना निजी पूँजी-निवेश करना चाहते हैं, उन्हें अनु. जा./अनु.जनजाति एवं उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर जिनके लिये यह इकाई की लागत (7500/हे.) का 25% होगी, सभी किसानों के लिये इकाई की लागत अर्थात् (रु.6000/हे.) की 20% सहायता दी जायेगी।

2.2 नये तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि

2.2.1.परिचय

देश में मीठे पानी की जल-कृषि के विकास की बड़ी संभावना है। अनेक कारणों से, अभी तक इस संभावना का उपयोग नहीं हुआ है। एन.एफ.डी.बी. विद्यमान टैंकों और तालाबों से उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के अतिरिक्त, मीठे जल की जल-कृषि के अधीन अतिरिक्त क्षेत्रों का उपयोग करने की परिकल्पना भी करता है जो देश के मत्स्य-उत्पादन को न केवल बढ़ायेगा बल्कि अतिरिक्त रोजगार का सृजन भी करेगा, विशेष रूप से ग्रामीण और आंतरिक क्षेत्रों में। 5-6 वर्षों की सीमा में, देश में सघन जल कृषि के अधीन 50,000 हे. का अतिरिक्त क्षेत्रफल लाना प्रस्तावित किया गया है। इस विकास को प्रोत्साहित करने के लिये, अगले 5-6 वर्षों की सीमा में क्षेत्रफल का 50% अर्थात् 25,000 हेक्टेयर का आच्छादन करने के लिये सहायता बढ़ाई जायेगी।

2.2.2. पात्रता के मापदंड

किसानों का चयन करने के लिये निम्नलिखित मापदंड का प्रयोग किया जायेगा। जो नये तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि करने के लिये सहायता हेतु अनुमानित 50,000 हेक्टेयर का 50% आच्छादन करने में समर्थ बनायेगा:

  • उक्त क्रिया-कलाप में उसके/उसकी प्रशिक्षण के रिकार्ड को शामिल करते हुए मीठे पानी की जल-कृषि में किसान का पिछला कार्य-निष्पादन
  • वैज्ञानिक तरीकों पर मत्स्य-कृषि करने के लिये किसान की सम्मति/उद्यमिता
  • जमीन का पूर्ण स्वामित्व
  • यदि तालाब/टैंक पट्टे पर लिया गया है, तो न्यूनतम 10 वर्ष के पट्टे की अवधि को वरीयता दी जायेगी
  • प्रथम वर्ष की इनपुट की लागतों के लिये एन.एफ.डी.बी. की सहायता का विधिवत् उपयोग करके पहली फसल की बिक्री से प्राप्त कार्यशील पूँजी की धनराशि दूसरे वर्ष से लेकर आगे तक पूँजी -निवेश करने के लिये किसान का । आश्वासन/सम्मति।
  • ऋण देने की बैंक की सहमति/किसान का अपना निजी पूँजी पर इकाई की लागत का 80% पूँजी-निवेश करने की प्रतिबद्धता

2.2.3. इकाई की लागत (पूँजी-निवेश की लागत)

एक हेक्टेयर (जल विस्तार क्षेत्र) के मैदानी क्षेत्रों में जल-कृषि के लिये नये तालाब के विकास के लिये इकाई की लागत का रु.2,00,000/हे. के रूप में अनुमान लगाया गया है। वे किसान जो बैंक से ऋण की सुविधा का लाभ उठाना चाहते हैं या जो अपना पूँजी-निवेश करना चाहते हैं, उन्हें अनु.जा./अनु.जन.जाति एवं उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर जिनके लिये यह इकाई की लागत (रु.50,000/हे.) का 25% होगी, सभी किसानों के लिये इकाई की लागत अर्थात् (रु.40,000/हे.) की 20% सहायता दी जायेगी।

2.3 प्रथम वर्ष की लागते

2.3.1 परिचय

सघन जल-कृषि में, लागते, कुल व्यय के प्राय: 60% का गठन करती हैं। किसान को वैज्ञानिक कृषि करने के अभ्यासों को अंगीकार करने और प्रति हेक्टेयर की पैदावार को अनुकूलतम बनाने में समर्थ बनाने के लिए, परिचालन के प्रथम वर्ष की अवधि में इनपुट की लागतों के लिये आंशिक सहायता देना अनिवार्य हो जाता है। यह कल्पना की जाती है कि पहली फसल की बिक्री से प्राप्त लाभ उत्तरवर्ती वर्षों में किसान द्वारा घुमाये जाते रहेंगे और कृषि करने के परिचालनों को धारणीय बनाते रहेंगे।

2.3.2 पात्रता के मापदंड

प्रथम वर्ष के इनपुटों की सहायता उन किसानों के लिये एकबारगी उपलब्ध होगी जिन्होंने तालाबों/टैंकों के निर्माण/पुनरुद्धार के लिये सहायता का लाभ उठाया है।

2.3.3 इकाई की लागत (इनपुट की लागत)

प्रथम वर्ष के इनपुटों की इकाई की लागत दोनों श्रेणियों के किसानों के लिये अर्थात् तालाबों और टैंकों के निर्माण/तालाबों और टैंकों के पुनरुद्धार के लिये रु.60,000/हे. अनुमानित की गई है। वे किसान जिन्होंने बैंक से ऋण की सुविधा का लाभ उठाया होगा/उन्होंने स्वयं पूँजी-निवेश किया होगा, उन्हें इकाई की लागत की 20% सहायता, रु.12,000/हे. अनु.जा./अनु.जन.जाति एवं उ.पू. के राज्यों को छोड़कर, जिनके लिये यह इकाई की लागत की 25% (रु.15,000/हे.) होगी, प्रदान की जायेगी।

मीठे पानी की झींगा मछली की कृषि की प्रथम वर्ष की इनपुटों की इकाई की लागत रु.1,20,000/प्रति हे. अनुमानित की गई है। वे किसान जिन्होंने बैंक से ऋण की सुविधा का लाभ उठाया होगा/उन्होंने स्वयं पूँजी-निवेश किया होगा, उन्हें इकाई की लागत की 20% सहायता 24,000/हे. अनु.जा./अनु.जन.जाति एवं उ.पू.के राज्यों को छोड़ कर, जिनके लिये यह इकाई की लागत की 25% (रु. 30,000/हे.) होगी।

2.4 मत्स्य बीज का उत्पादन करने के लिए हैचरियों की स्थापना

2.4.1 परिचय

कृषि की जाने योग्य मीठे पानी की मछलियों की प्रजातियों के गुणवत्तापरक बीज की उपलब्धता मत्स्य-कृषि करने के तीव्रीकरण के लिये और जल-कृषि के अंतर्गत अतिरिक्त क्षेत्रफल के अच्छादन के लिये एक सीमित करने वाला कारक रहता चला आया है। देश के कुछ भागों में मत्स्य-बीज की उपलब्धता संतोषजनक है, जबकि अन्य क्षेत्रों में किसान अपेक्षित मात्राओं में गुणवत्तापरक बीज की प्राप्ति में कठिनाइयों का सामना करते हैं। इससे आगे, अभाव वाले क्षेत्रों में बीज लम्बी दूरी से परिवहन कर लाया जाता है जो इनपुटों की लागत में जोड़ा जाता है। अत: बीज के अभाव वाले क्षेत्रों और जलकृषि के नये क्षेत्रों में किसानों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, गुणवत्तापरक मत्स्य-बीज के उत्पादन के लिये लगभग 500 हैचरियों की स्थापना करने में उद्यमियों/किसानों को सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव रखा गया है।

2.4.2 पात्रता के मापदंड

मत्स्य- हैचरियों की स्थापना करने के वास्ते उद्यमियों/किसानों के चयन के लिये निम्नलिखित मापदंड अपनाये जायेंगे:

  • जल-कृषि के विद्यमान क्षेत्र जहाँ वर्तमान में बीज उत्पादन का अभाव है लेकिन अन्यथा आशाजनक हैं।
  • जल-कृषि के नये क्षेत्र जहाँ बीज एक बाधा हो सकती है।
  • भावी उद्यमियों/किसानों को हैचरी के परिचालनों में वरीयत: प्रशिक्षण प्राप्त किया हुआ होना चाहिये।
  • वैज्ञानिक पद्धतियों पर मत्स्य- बीज उत्पादन करने की सम्मति/उद्यमिता।
  • उस जमीन के स्वतंत्र विलेख जहाँ हैचरी स्थापित की जायेगी।
  • यदि जमीन पट्टे पर ली गई है, तो पट्टे की न्यूनतम 10 वर्ष की अवधि वांछनीय होगी।
  • कार्यशील पूँजी की धनराशि का अंशदान करने की किसान की प्रतिबद्धता।
  • ऋण देने की बैंक की सम्मति/उद्यमी की इकाई की लागत का अपना निजी 80% पूँजी-निवेश करने की प्रतिबद्धता।

2.4.3 इकाई की लागत

लगभग 8-10 मिलियन मछलियों के बच्चों की उत्पादन क्षमता वाली मछली की प्रत्येक हैचरी की इकाई की लागत का अनुमान रु.दस लाख मात्र (रु.10 लाख) लगाया गया है। उद्यमी/किसान इकाई की लागत की 20% सहायता का, वशर्ते अधिकतम 2.0 लाख रुपये, पात्र होगा। उद्यमी/किसान को दी गई सहायता बाद में समाप्त होने वाली होगी और बैंक के ऋण की अंतिम किश्त की वसूली के विरुद्ध समायोजित होगी/कार्यों के पूर्ण होने की समाप्ति के बाद प्रदान की जायेगी।

2.5 मत्स्य अंगुलिकाओं के उत्पादन के लिये मत्स्य-बीज पालन की इकाईयों की स्थापना

2.5.1 परिचय

100 मि.मी. और इससे अधिक आकार की गुणवत्तापरक अंगुलिकाओं की आवश्यकता, जलाशय के विकास के लिये एक पूर्वापेक्षा होती है। मछलियों की उगाही उस समय और अधिक होगी यदि जलाशयों में 100 मि.मी. या इससे अधिक आकार की अंगुलिकाएं भंडारित की जाती हैं। वर्तमान समय में, अंडों/फ्राई को अंगुलिकाओं तक पालन करने के लिये बीज-पालन की सुविधाएं अपर्याप्त हैं, फिर भी स्टॉक करने के आकार की अंगुलिकाओं की माँग है। अतः अंडों/फ्राई को अंगुलिकाओं तक पालने के लिये बुनियादी ढाँचे की सुविधाओं के सृजन की बहुत अधिक जरूरत है। इस प्रकार, जलाशयों में भंडारण करने के लिये मीठे पानी में कृषि की जाने योग्य प्रजातियों की भंडारण की जाने वाली अंगुलिकाओं की उपलब्धता, जलाशयों से सीमित मात्स्यिकी उत्पादन के लिये एक सीमित करने वाला कारक रहा है। मत्स्य-अंगुलिकाओं की उपलब्धता, देश के कुछ भागों में संतोषजनक है, जबकि अन्य क्षेत्रों के किसान गुणवत्तापरक अंगुलिकाओं की अपेक्षित मात्राओं में प्राप्ति में कठिनाईयों का सामना करते हैं। इससे आगे, ऐसे अभाव वाले क्षेत्रों में मत्स्य-अंगुलिकाओं का एक लम्बी दूरी से परिवहन करना पड़ता है जो इनपुटों की लागत में जोड़ी जाती है। अतः जलाशयों, तालाबों/टैंकों में पूरक भंडारण करने के लिये मत्स्य-अंगुलिकाओं की माँग को पूरा करने के लिये, गुणवत्तापरक मत्स्य-अंगुलिकाओं के उत्पादन के लिए मत्स्य-बीज पालन की इकाइयों की स्थापना करने में उद्यमियों/किसानों की सहायता करने का प्रस्ताव रखा गया है।

2.5.2 पात्रता के मापदंड

मिट्टी वाले तालाबों में अंडों/फ्राई को अंगुलिकाओं तक पालन करने के लिये बुनियादी ढाँचे की सुविधाओं के सृजन करने के लिए सहायता के लिये किसानों / उद्यमियों का चयन करने के लिये निम्नलिखित मापदंडों का पालन किया जायेगा:

  • किसान के उसके/उसकी उक्त क्रिया-कलाप में प्रशिक्षण के रिकार्ड को शामिल करते हुए मीठे पानी की हैचरी/जल-कृषि में किसान का पिछला कार्य-निष्पादन।
  • वैज्ञानिक पद्धतियों पर मत्स्य-बीज को अंगुलिकाओं तक पालन करने की किसान की सहमति/उद्यमिता।
  • पूरे वर्ष भर पर्याप्त पानी की सुविधा।
  • जमीन का स्वतंत्र विलेख।
  • यदि तालाब/टैंक पट्टे पर लिया गया है तो न्यूनतम 10 वर्ष की अवधि का पट्टा वांछनीय होगा।
  • कार्यशील पूंजी का अंशदान करने के लिये किसान की सहमति।
  • ऋण देने की बैंक की सहमति/इकाई की लागत का अपना निजी 80% पूंजी-निवेश करने की उद्यमी की प्रतिबद्धता।

2.5.3 इकाई की लागत

(1) मत्स्य-बीज पालन की नई इकाइयों की स्थापना:

लगभग 2.50 लाख अंगुलिकाओं (40 लाख अंडों/16 लाख फ्राई से) की उत्पादन क्षमता वाली मत्स्य बीज पालन की प्रत्येक इकाई (2.5 एकड़) की इकाई की लागत रु.3.00 लाख प्रति एकड़ मात्र के रूप में अनुमानित की गई है।

उद्यमी/किसान, इकाई की लागत की 20% सहायता वशर्ते रु.60,000/प्रति व्यक्ति अधिकतम के लिये पात्र होगा और अनु.जा./अनु.जन.जाति एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिये जिनके लिये यह 25% की दर से अर्थात् रु. 75,000/हे., होगी। उद्यमी/किसान को दी गई सहायता बाद में समाप्ति पर होगी।

(2) विद्यमान मत्स्य-बीज पालन की इकाइयों का पुनरुद्धारः | वे किसान जो बीज-पालन की इकाईयों के स्वामी हैं और बीज-उत्पादन की इकाई का पुनरुद्धार करने के लिये इच्छुक हैं, रु.50,000/प्रति हेक्टेयर की लागत के पात्र होंगे। किसान, ऋण की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं या अपने निजी धन से पुनरुद्धार करते हैं, वे इकाई की लागत की 20% सहायता के पात्र हैं वशर्ते रु.10,000/हे. की अधिकतम सीमा तक और अन.जा./अनु.जन.जाति एवं उत्तर-पूर्व राज्यों के लिये जिनके लिये यह 25% की दर से अर्थात् रु.12,500/हे.

पालन करने की इकाईयों के विभिन्न घटकों में निम्नलिखित शामिल होते हैं :

1. खुदाई, मेंड का निर्माण, संघनन एवम् समेकन को शामिल करते हुए मिट्टी के तालाबों का निर्माण। 2. मिट्टी के प्रत्येक तालाबों के लिये प्रवेश मार्ग।

3. ईंट की चिनाई, लोहे के दरवाजे और लकड़ी के पटरों वाले निर्गम-द्वार।

4. मोटर एवं पम्प।

5. जाल और अन्य औजार।

6. पम्प-घर/भंडार कक्ष इत्यादि।

2.5.4 प्रथम वर्ष की लागते

2.5.1 परिचय

फ्राई से अंगुलिकाओं तक के मत्स्य-बीज पालन के अभ्यासों में लिप्त किसानों को परिचालन के प्रथम वर्ष की अवधि में इनपुट की लागतों के लिये आंशिक सहायता प्रदान की जायेगी। यह मान लिया गया है कि पहली फसल की बिक्री से प्राप्त लाभों को उत्तरवर्ती वर्षों में किसान द्वारा घुमाया जायेगा और कृषि करने के परिचालनों को धारणीय बनाया जायेगा।

2.5.2 पात्रता के मानदंड

प्रथम वर्ष के इनपुटों के लिये सहायता उन किसानों को एक बार उपलब्ध होगी जो एन.एफ.डी.बी. के कार्यक्रम के अंतर्गत फ्राई से अंगुलिकाओं तक मत्स्य-पालन की इकाई का निर्माण/पुनरुद्धार करते हैं।

2.5.3 इकाई की लागत (इनपुट की लागत)

प्रथम वर्ष के इनपुटों की इकाई की लागत रु.60,000/हे. उन किसानों के लिये अनुमानित की गई है जो एन.एफ.डी.बी. कार्यक्रम के अंतर्गत फ्राई से अंगुलिकाओं तक मत्स्य-बीज पालन की इकाई का निर्माण/पुनरुद्धार करते हैं। वे किसान जिन्होंने बैंक से ऋण की सुविधा का लाभ लिया है/या जिन्होंने अपना निजी पूँजी-निवेश किया है, उन्हें इकाई की लागत की 20% अर्थात् रु.12,000/हे. की सहायता, अनु.जा./अनु.जन.जाति एवं उ.पू. के राज्यों को छोड़ कर जिनके लिये यह 25% की दर से अर्थात् रु.15,000/हे. होगी, प्रदान की जाएगी।

2.6 प्रशिक्षण और प्रदर्शन

2.6.1 परिचय

कौशल का स्तरोन्नयन, किसी उत्पादन की ओर उन्मुख क्रिया-कलाप का एक प्रमुख घटक होता है। इसका उस समय अधिक महत्व माना जाता है जब आशयित लाभार्थी का/की निहित तकनीकी कौशल/क्षमता कम होती है और इस प्रकार यह क्रिया-कलाप की सफलता या असफलता की प्रमुख विशेषता हो सकती है। एन.एफ.डी.बी. के विद्यमान तालाबों और टैंकों से मत्स्य की उपज के स्तर बढ़ाने और नये क्षेत्रों को जल-कृषि के लपेट में लाने के उद्देश्यों पर तब प्रभाव पड़ सकताहै जब किसानों/उद्यमियों के तकनीकी कौशल अपर्याप्त होते हैं। अतः मीठे पानी की जल-कृषि में मानव संसाधन विकास की इस प्रमुख जरूरत को पूरा करने के लिये, बोर्ड देश में मत्स्य-कृषकों/उद्यमियों को प्रशिक्षण देने के लिये सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के अंतर्गत उपलब्ध विद्यमान सुविधाओं को गतिमान करने की परिकल्पना करता है।

2.6.2 पात्रता के मानदंड

प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये तालाब/टैंक की मात्स्यिकी से जुड़े हुए एक किसान/उद्यमी/मछुआरा/शेयरहोल्डर के चयन के लिये निम्नलिखित मानदंड लागू होंगे:

  • उत्कृष्ट रिकार्ड के साथ उसे एक अभ्यासरत अंतर्देशीय मत्स्य-कृषक होना चाहिये।
  • उसका एक तालाब का अपने नाम में स्वामित्व या एक वैध पट्टा होना चाहिये या उस कृषकों के समूह/सहकारी समिति/संघ/स्वयं सहायता समूह का भाग होना चाहिये जिसको ग्राम/समुदाय का टैंक पट्टे पर दिया गया है।
  • विद्यमान मत्स्य-कृषि के अभ्यासों के स्तरोन्नयन करने का इच्छुक होना चाहिये।
  • बकाया पूँजी-निवेश की लागत प्रदान करने का इच्छुक होना चाहिये या संस्थागत वित्त की सुविधा का लाभ उठाने का इच्छुक होना चाहिये।
  • उसे एन.एफ.डी.बी. के कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण से कम से कम छ: माह पूर्व मीठे पानी की जल-कृषि पर मत्स्य-कृषक विकास अभिकरण द्वारा आयोजित किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया हुआ नहीं होना चाहिये। इससे आगे, ऐसा किसान इस प्रशिक्षण के बाद एक वर्ष तक किसी अन्य केन्द्रीयकृत प्रायोजित योजना के अंतर्गत या एफ.ई.डी.ए. द्वारा आयोजित मीठे जल की जल-कृषि से संबंधित प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये भी पात्र नहीं होगा।
  • उसे किसी वित्तीय संस्थान का चूककर्ता नहीं होना चाहिये।

2.6.3 इकाई की लागत (प्रशिक्षण और प्रदर्शन)

इस इकाई की लागत में दस(10) दिनों की एक मानक प्रशिक्षण अवधि शामिल है और इस कार्यक्रम के अंतर्गत निम्नलिखित क्रिया-कलापों को वित्त-पोषित किया जाएगा:

(1) कृषक को सहायता :

किसान रु.125/दिन के दैनिक भत्ते और आने-जाने की यात्रा(रेल/बस/ऑटोरिक्शा) की प्रतिपूर्ति हेतु पात्र होगा और उसकी वास्तविकता के अनुसार वशर्ते रु.500/अधिकतम की प्रतिपूर्ति होगी।

(2) संसाधन वाले व्यक्ति को मानदेय :

प्रशिक्षण आयोजित करने के लिये लागू करने वाला अभिकरण संसाधन वाले एक व्यक्ति की प्रति प्रशिक्षण कार्यक्रम सेवाएं ले सकता है। संसाधन वाले व्यक्ति को रु.1250/- का मानदेय दिया जा सकता है और आने-जाने की यात्रा के व्यय (रेल/बस/ऑटोरिक्शा) वास्तविक के अनुसार, वशर्ते रु.1000/- अधिकतम की प्रतिपूर्ति की जायेगी।

(3) लागू करने वाले अभिकरणों को सहायता:

लागू करने वाला अभिकरण, प्रशिक्षण आयोजित करने के लिये अधिकतम 10 दिनों की अवधि के लिये रु.75/प्रशिक्षु/दिन के हिसाब से धनराशि प्राप्त करने का पात्र होगा। इस लागत में प्रशिक्षुओं के परिचय और गतिमान करने तथा पाठ्यक्रमसामग्री/प्रशिक्षण की किटें इत्यादि उपलब्ध कराने के व्यय शामिल होंगे।

(4) प्रशिक्षण/प्रदर्शन का/के स्थल का विकास :

(क) राज्य सरकार (मात्स्यिकी विभाग) नियमित आधार पर प्रशिक्षण/प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित करने के लिये अपने विद्यमान मत्स्य-फार्म के विकास के लिये केवल एक लाख रुपये (रु.1,00,000/-) एकबारगी अनुदान प्राप्त करने का पात्र होगी। राज्य सरकार पाँच(5) वर्षों तक एन.एफ.डी.बी. या किसी अन्य वित्तपोषण करने वाले अभिकरण से उसी उद्देश्य और उसी प्रशिक्षण स्थल के लिये किसी उत्तरवर्ती अनुदान के लिये पात्र नहीं होगी।

(ख) यदि राज्य सरकार के पास उसकी अपनी निजी सुविधा नहीं है जिसे प्रशिक्षण/प्रदर्शन के लिये उपयोग किया जा सके तो वह प्रशिक्षण/प्रदर्शन आयोजित करने के लिये ग्राम पंचायत का एक तालाब या टैंक पट्टे पर लेकर सुविधा का विकास करने के लिये पात्र होगी और प्रशिक्षण देने/प्रदर्शन करने के लिये सुविधा का विकास करने के लिये और पट्टे की धनराशि का भुगतान करने के उद्देश्य से रु.पचास हजार मात्र (रु.50,000/-) की एकबारगी अनुदान के लिये पात्र होगी। यह पट्टा न्यूनतम पाँच (5) वर्ष की अवधि के लिये होगा और जल-विस्तार का क्षेत्रफल न्यूनतम 0.5 हे. या इससे अधिक का होना चाहिये।

(ग) उपरोक्त (क) और (ख) के अभाव में, राज्य सरकार एक निजी किसान का/के तालाब काम में लगा सकती है जिसके लिये सुविधा उधार लेने के वास्ते रु.5,000/- की धनराशि प्रति प्रशिक्षण कार्यक्रम शुल्क के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी।

उपरोक्त के अलावा, राज्य सरकारें और लागू करने वाले अन्य अभिकरण निम्नलिखित शर्तों का भी पालन करेंगीं/करेंगे।

  • राज्य सरकार द्वारा विकसित की गई सुविधाएं एन.एफ.डी.बी. के कार्यक्रम के अंतर्गत मत्स्य-कृषकों के प्रशिक्षण के लिये लागू करने वाले अन्य अभिकरणों के लिये भी उपलब्ध होंगीं।
  • लागू करने वाले अभिकरण के द्वारा विकसित प्रशिक्षण/प्रदर्शन की सुविधायें , प्रशिक्षण स्थल से 25 कि.मी. से अधिक की दूरी पर नहीं होंगीं। किंतु, यदि ऐसी सुविधा 25 कि.मी. के अंदर विकसित नहीं की जा सकती हैं, तो पूर्ण औचित्य प्रदान किया जायेगा।
  • एन.एफ.डी.बी. एक से अधिक किसी अन्य प्रशिक्षण/प्रदर्शन स्थल का वित्तपोषण नहीं करेगा जिसे उसके अनुकूलतम उपयोग के लिये विकसित किया गया है।
  • प्रत्येक प्रशिक्षण दल में 25 प्रशिक्षणार्थी होंगे और यह किसी भी स्थिति में 30 प्रशिक्षणार्थी प्रति बैच से अधिक नहीं होंगे।
  • सभी राज्यों/संघ शासित क्षेत्रों की सरकारों को प्रारंभिक रूप से अधिकतम पाँच (5) प्रशिक्षण/प्रदर्शन स्थलों की स्थापना के साथ सहायता दी जाएगी। अतिरिक्त स्थलों की केवल तभी संस्वीकृति दी जाएगी जो पहले से ही संस्वीकृत स्थल (स्थलों) के कार्य -निष्पादन और अनुकूलतम उपयोग पर निर्भर होगी। अतिरिक्त स्थलों की स्थापना, प्रशिक्षित किये गये कृषकों की संख्या, शामिल किये गये क्षेत्रफल और जल-कृषि के क्रिया-कलाप अपनाने के लिये प्रशिक्षित किसानों द्वारा संस्थागत वित्त की सुविधा का लाभ उठाने से भी जोड़ी जाएगी।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के अधीन मात्स्यिकी के संस्थानों और राज्य के कृषि विश्वविद्यालय के अधीन मात्स्यिकी के महाविद्यालयों के अधीन मात्स्यिकी के महाविद्यालयों को शामिल करते हुए लागू करने वाले सभी अभिकरण अपनी निजी सुविधाओं का लाभ उठायेंगे जिसके लिये रु.पाँच हजार मात्र(रु.5,000/) प्रति प्रशिक्षण कार्यक्रम की एकमुश्त धनराशि प्रदान की जाएगी। किंतु यदि ऐसे अभिकरणों के पास उनकी अपनी सुविधा नहीं है तो वे राज्य सरकार द्वारा विकसित सुविधा का उपयोग करेंगे या एक निजी किसान की सुविधा का उपयोग करेंगे जिसके लिए रुपये पाँच हजार मात्र (रु.5,000/) प्रति प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान किया जाएगा।
  • राज्य सरकार प्रति वर्ष कम से कम 25 प्रशिक्षुओं / उद्यमियों का एक बैच प्रशिक्षित करेगी जिन्हें केवल मत्स्य-बीज की हैचरियों की स्थापना करने और परिचालन करने के लिये प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • लागू करने वाला अभिकरण प्रत्येक प्रशिक्षु का अभिलेख सुस्थापित करेगा और प्रत्येक प्रशिक्षित किसान द्वारा कृषि किये गये क्षेत्रफल, किये गये पूँजी-निवेश, सृजन किये गये रोजगार और उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि के बारे में सूचना प्रदान करेगा। उपरोक्त के संबंध में समेकित सूचना। पाँच वर्षों तक की अवधि तक तिमाही अंतरालों पर एन.एफ.डी.बी. को दी जाएगी।
  • लागू करने वाला अभिकरण मत्स्य-कृषकों को संस्थागत वित्त उपलब्ध कराने के लिए भी उत्तरदायी होगा। * प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिये निधियाँ जारी करने से पहले, लागू करने वाला अभिकरण और एन.एफ.डी.बी. एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। दिशा-निर्देशों में निर्धारित की गई शर्ते अन्य बातों के साथ-साथ समझौता ज्ञापन का एक भाग बनेंगीं।।

प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण

लाभार्थियों से प्राप्त सभी प्रस्ताव राज्य सरकार द्वारा संकलित किये जायेंगे और प्रत्येक तिमाही (अर्थात् अप्रैल,जुलाई, अक्टूबर, जनवरी) के शुरू में एन.एफ.डी.बी. को अनुमोदन और वित्त जारी करने के लिये प्रस्तुत किये जायेंगे।

किसानों और लागू करने वाले अभिकरणों के द्वारा दिये गये विवरणों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिये, प्रार्थनापत्र, निम्नलिखित फार्मों में प्रस्तुत किये जायेंगे।

(1) फार्म 1- विद्यमान तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि

(2)फार्म 2- नये तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि

(3)फार्म 3- मत्स्य-बीज का उत्पादन करने के लिये हैचरियों की स्थापना।

(4)फार्म 4- मत्स्य-अंगुलिकाओं के उत्पादन के लिये मत्स्य-बीज पालन की इकाईयों की स्थापना।

(5) फार्म 5- प्रशिक्षण और प्रदर्शन

क्रम सं.(1) से लेकर (4) तक के प्रार्थना-पत्र, आवेदक द्वारा भरे जायेंगे और लागू करने वाले अभिकरण द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित कियदे जायेंगे। किंतु, प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए निर्धारित क्र.सं.(5) का आवेदन-पत्र लागू करने वाले अभिकरण के द्वारा भरा जायेगा और निधियाँ जारी करने के लिये एन.एफ.डी.बी. को विचारार्थ प्रस्तुत किया जायेगा। यदि लागू करने वाला अभिकरण, गैर-सरकारी संगठन है, तो यह प्रार्थना-पत्र संबंधित राज्य के आयुक्त/मात्स्यिकी निदेशक के माध्यम से भेजा जाना चाहिए।

निधियों का जारी किया जाना

विद्यमान तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि, नये तालाबों और टैंकों में सघन जल-कृषि और मत्स्य-बीज के उत्पादन के लिए हैचरियों की स्थापना से संबंधित क्रिया-कलापों के लिये सहायता सामान्यतया दो समान किश्तों में जारी की जायेगी। पहली किश्त एन.एफ.डी.बी. द्वारा प्रस्ताव के अनुमोदन किये जाने पर जारी की जायेगी और दूसरी किश्त कृषि/बीज उत्पादन का क्रिया-कलाप शुरु किए जाने पर और सहायता की पहली किश्त के लिए लागू करने वाले अभिकरण से उपयोग प्रमाण-पत्र प्राप्त हो जाने पर जारी की जाएगी। किंतु, यदि लागू करने वाला अभिकरण यह अनुभव करता है। कि सहायता तीन किश्तों में जारी की जानी चाहिये, तो वे एन.एफ.डी.बी.. को प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय ऐसा संकेत कर सकते हैं। सहायता की सारी किश्तें किसान के बैंक के खाते में जमा की जायेंगीं।

प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिये अनुदान संस्वीकृत किया जायेगा और एन.एफ.डी.बी. द्वारा प्रस्ताव के अनुमोदन पर लागू करने वाले अभिकरण को संसूचित किया जायेगा और शर्तों के पूरा किये जाने पर एक, एकल किश्त में जारी किया जायेगा।

उपभोग प्रमाण-पत्र एवं अनुपालन रिपोर्ट का प्रस्तुतीकरण

लागू करने वाले अभिकरण, बोर्ड द्वारा उनको जारी की गई निधियों के संबंध में सुसंगत बिलों/वाउचरों द्वारा समर्थित उपभोग प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करेंगे। ऐसे प्रमाण-पत्र अर्द्ध-वार्षिक आधार पर अर्थात् प्रत्येक वर्ष की जुलाई और जनवरी की अवधि में फार्म-4 में प्रस्तुत किये जायेंगे। उपभोग प्रमाण-पत्र उस अवधि के दौरान भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि यदि वे क्रिया-कलाप जिनके लिये निधियाँ पहले ही जारी की गई थीं, वे पूरे हो चुके हैं और सहायता की अगली खुराक किसान द्वारा शेष कार्य पूरा करने के लिये अपेक्षित है।

लागू करने वाला अभिकरण प्रत्येक क्रिया-कलाप के पूर्ण होने पर अनुपालन रिपोर्ट अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करेगा। अनुपालन रिपोर्ट में शामिल हो सकते हैं - संक्षीप्त परिचय, क्रिया-कलाप के विभिन्न स्तर एवं कार्यक्रम का सारांश, समाचारपत्र की कतरनें एवं फोटोग्राफ।

अनुश्रवण और मूल्यांकन

राज्य सरकारें एन.एफ.डी.बी. के वित्तपोषण के अंतर्गत क्रियान्वित किये गये क्रिया-कलापों की प्रगति का आवधिक आधार पर अनुश्रवण और मूल्यांकन करने के लिये मात्स्यिकी विभाग में एक समर्पित अनुश्रवण और मूल्यांकन कक्ष (एम.एंड.ई.) की स्थापना करेंगीं। यह कक्ष मात्स्यिकी के प्रभारी सचिव की अध्यक्षता में स्थापित की जा सकती है और इसमें राज्य के वित्त और मात्स्यिकी के प्रतिनिधि और एफ.ई.डी.ए. तथा वाणिज्यिक बैंक/नाबार्ड के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। एम.एंड.ई. कक्ष, एन.एफ.डी.बी. के परामर्श से उन वित्तीय और भौतिक लक्ष्यों की स्थापना भी करेगा जिनके विरुद्ध कार्य-निष्पादन और निधियों के उपयोग का अनुश्रवण किया जायेगा।

स्त्रोत: पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय

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