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संशोधित राष्ट्रीय किसान नीति

इस भाग में संशोधित राष्ट्रीय किसान नीति से सम्बन्धित जानकारी उपलब्ध कराई गई है|

किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति क्यों?

जो लोग भूखे हैं, उनके लिए रोटी भगवान है- महात्मा गाँधी, 1946

दूसरी हर बात इंतजार कर सकती है किन्तु खेती नहीं- जवाहर नेहरु, 1947

अधिकांश भूखे लोग ग्रामीण भारत में रहते हैं और अपनी आजीविका के लिए भी खेती पर निर्भर करते हैं, इसलिए तेज गति से कृषि की प्रगति उनकी आमदनी और उनके आहार के लिए जरुरी है| इस प्रकार ऊपर दिए गए दो वाक्य इस नीति के मार्गदर्शी सिद्धांत हैं|

कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार को मजबूत बनाने के लिए और साथ ही बीज, खाद और बिजली जैसे जरूरी आदान का उत्पादन करने के लिए भी, 1947 के बाद से अनेक कदम उठाए गए हैं| किसानों को सिंचाई सुविधाओं से लाभ उठाने में मदद प्रदान करने के उद्देश्य से 1960 के दशक के प्रारंभ में कृषि विकास का एक एकीकृत कार्यक्रम शुरू किया गया था| फिर भी खाने की कमी बनी रही जो आंशिक रूप से रोकथाम और उपचारात्मक औषधियों में हुई प्रगति के फलस्वरूप आबादी में तेजी से वृद्धि के कारण थी| हर वर्ष खाद्यानों के आयात में वृद्धि हुई और 1966 में यह 10 मिलियन टन के स्तर तक पंहुच गया, जो मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका के पी एल 480 कार्यक्रम के अंतर्गत था| सौभाग्यवश, हमारे वैज्ञानिकों ने, अंतर्राष्ट्रीय भागादारों की मदद से गेहूं, चावल, मक्का, ज्वार और बाजरे की उच्च पैदावार वाली किस्में/संकर प्रजातियाँ विकसित की| उन्हें 1966 में उच्च पैदावार वाले प्रजाति कार्यक्रमों के जरिए किसानों तक पहुँचाया गया| उत्पादकता और उत्पादन  में एक बड़ी प्रगति गेंहू में 1968 में हुई जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा “गेंहू क्रांति” नामक एक विशेष डाक टिकट जारी किया गया| तभी से कृषि उत्पादन में प्रगति स्थिर बनी रही और खाद्य उत्पादन में वृद्धि दर जनसंख्या वृद्धि के स्तर से ऊँची बनी रही| इसे “हरित क्रांति युग” के नाम से जाना जाने लगा| प्रौद्योगिकी, सेवाओं, सरकारी निति के बीच तालमेल और किसानों का उत्साह इस युग की विशेषता थी और इसलिए इसे ‘हरित क्रांति सिम्फनी” का नाम दिया गया| दुर्भाग्यवश. पिछले दस वर्षों के दौरान उत्पादन और उत्पादकता स्थिर बनी रही है और यहाँ तक कि धीमी हो गई है| इसके कारण सर्वविदित हैं और अब इस गिरावट को उलटने के लिए और अपनी खेती को फिर से आगे की ओर प्रगति करने के लिए पर्याप्त किये जा रहे हैं|

सरकार द्वारा समय-समय पर खेती के सम्बन्ध में अनेक नीतियाँ तैयार की गई हैं, पिछली बार यह प्रयास 2002 में किया गया था| कृषि में विकास में गिरावट के कारण अब किसानों के परिवारों, नीति तैयार करने वालों और आम जनता के बीच निराशा का वातावरण पैदा हो गया है| महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटका और केरल राज्यों में कुछ क्षेत्र गंभीर कृषि संकट से प्रभावित हुए हैं जिसकी वजह से कभी-कभी किसानों द्वारा आत्महत्याएं की जाती हैं| इसलिए अब समय आ गया है जबकि हमें मात्र उत्पादन की बजाय, राष्ट्र को खाना खिलाने वाले पुरुषों और महिलाओं के आर्थिक कल्याण पर अधिक ध्यान देना चाहिए| यह स्पष्ट है कि मानव आयाम कृषि सम्बन्धी नीतियों का मुख्य निर्धारक होना चाहिए और न कि भौतिक दृष्टि से मात्र उत्पादन| इस नीति का उद्देश्य ऐसी अभिवृत्तियों और कार्रवाई को बढ़ावा देना है जिसके फलस्वरूप किसान परिवारों की वास्तविक आय की दृष्टि से कृषि प्रगति को आँका जाए, न कि उत्पादित मिलियन टन कृषि जिन्सों की दृष्टि से इससे आंकड़ों के बजाय वास्तविकता को सामने रखने में मदद मिलेगी|

निराशा में आशा की किरण

सौभाग्यवश, कृषि उत्पादन में गिरती हुई प्रवृत्ति को उलटने और कृषि संकट का कोई स्थायी हल खोजने के लिए पिछले 2 वर्षों के दौरान अनेक महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं| कुछेक महत्त्वपूर्ण नई पहलें हैं:

  1. भारत निर्माण अथवा ग्रामीण भारत के लिए एक नई पहल
  2. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी  कार्यक्रम
  3. राष्ट्रीय बागबानी मिशन
  4. कृषि ऋण का विस्तार
  5. ब्याज दरों कम करना
  6. राष्ट्रीय वर्षापोषित क्षेत्र प्राधिकरण
  7. राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड
  8. कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में बदलाव जिससे कि उन्हें  किसान- अनुकूल बनाया जा सके|
  9. एकीकृत खाद्य कानून

10.  वेयरहाउस रसीद अधिनियम वेयरहाउस रसीदों को एक निगोशिएबल दस्तावेज बनाना, जिससे कि मजबूरन बिक्री को रोकने में मदद मिल सके|

11.  100,000 ग्रामीण आम सेवा केन्द्रों (सीएससी) के जरिए संयोज्यता|

उपरोक्त कार्यक्रमों का किसान परिवारों के कल्याण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, यदि उन्हें प्रकृति के अनुकूल, गरीबोन्मुखी, महिलोन्मुखी और आजीविका के अनुकूल कार्य रूप दिया जाए|

इसलिए कृषि समवृद्धि और खाद्य सुरक्षा और प्रभुसत्ता को सरकारी नीतियों और कृषि तथा ग्राम विकास में प्राथमिकताओं को आधारभूत बनाकर हमारी कृषीय प्रगति का पुनरुद्धार करने का यह सही अवसर है| पर्याप्त मात्रा में निवेश करके और छोटे किसानों के पक्ष में सरकारी नितियाँ अपनाकर हम इस गिरावट को उलट सकते हैं और अपनी कृषीय क्षमता में विश्वास बहाल कर सकते हैं| छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) के दौरान, कृषि में वृद्धि दर 5.7% थी जबकि जी डी पी वृद्धि दर 5.5% थी यह अंशतः सिंचाई के लिए छठी योजना में 12.5% के आबंटन के कारण थी|

नौवीं योजना अवधि के दौरान कृषि की वृद्धि दर लगभग 2% थी तथा दसवीं योजना के दौरान यह घटकर 1.8% प्रति वर्ष होने की उम्मीद है| परिणामस्वरूप, कृषि पर जनसंख्या निर्भरता में पर्याप्त बदलाव किये बगैर कुल जी डी पी में कृषि के घटते हिस्से की वजह से पहले से ही विपरीत व्यक्ति प्रति गैरकृषि आय अनुपात की तुलना में प्रति व्यक्ति कृषि आय में गिरावट आई है| ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान एक बड़ी समस्या रोजगार अवसरों का आभाव है| 1993-94 से 1999-2000 के दौरान कृषि क्षेत्र में रोजगार में वृद्धि केवल 0.2% थी| यद्यपि, संभव सीमा तक और अधिक गहन फसलें व प्रथाएं अपनाकर कृषि क्षेत्रक में रोजगार बढ़ाकर और सिंचाई, वाटरशेड विकास, परती भूमि विकास, भूमि पुनरुद्धार आदि के लिए अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए| बढ़ते कृषि क्षेत्रक में रोजगार बढ़ाने और सिंचाई, वाटरशेड विकास, परती भूमि विकास, भूमि पुनरुद्धार आदि के लिए अधिक निवेश करने के लिए भरसक प्रयास किये जाने की जरुरत है| किन्तु ग्रामीण कृषि-भिन्न क्षेत्रक के तीव्र विकास और नगरों के इर्द-गिर्द संकुलों/बाजार केन्द्रों के विकास पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए| बढ़ते कृषि क्षेत्रक, बेहतर ग्रामीण ढांचे, विशेष रूप से ग्रामीण संयोज्यता, बिजली, नियमित  बस सेवा, ऋण की सहज उपलब्धता और प्रशिक्षित जनशक्ति की उपलब्धता से ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्रक के विकास तथा और रोजगार अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है|

राष्ट्रीय किसान नीति का मसौदा

दस प्रमुख लक्ष्य

  • यह सुनिश्चित करके कि किसान एक “न्यूनतम शुद्ध आय” अर्जित करें, खेती की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार करना और यह सुनिश्चित करना कि कृषीय प्रगति उस आय को सुधारने में हुई प्रगति द्वारा मापी जाए|
  • सभी कृषि नीतियों और कार्यक्रमों में मानव और लैंगिक आयाम को मुख्य धारा के साथ जोड़ना और कृषि में महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों पर स्पष्ट रूप से ध्यान देना|
  • भू-सुधारों के अधूरे एजेण्डे को पूरा करना तथा ग्रामीण भारत में व्यापक परिसम्पत्ति  व जलीय सुधार प्रारंभ करना|
  • किसानों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा पद्धति और समर्थनकारी सेवाएं विकसित और लागू करना|
  • संरक्षण में आर्थिक हित के सृजन हेतु प्रमुख कृषि प्रणालियों की उत्पादकता, लाभप्रदता और टिकाऊपन में लगातार प्रगति के लिए जरूरी भूमि, जल, जैव-विविधता और जलवायु संसाधनों का संरक्षण और सुधार|
  • ग्रामीण भारत में समुदाय-केन्द्रित खाद्य, जल और उर्जा सुरक्षा प्रणालियों को बढ़ावा देना तथा प्रत्येक बच्चे, महिला और पुरुष स्तर पर पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना|
  • ऐसे उपाय लागू करना जिनसे खेती को बौद्धिक रूप से प्रेरक व आर्थिक रूप से लाभप्रद बनाकर, छोटे और सीमांत किसानों को खेती के उत्पादन और फसलोत्तर चरणों में पूरे पैमाने पर  बिजली और आर्थिक लाभ प्रदान करके, युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित करने और उसमें बनाए रखने में मदद मिल सके|
  • किसान परिवारों के काम और आय सुरक्षा तथा राष्ट्र की स्थिति व व्यापार सुरक्षा दोनों को सुरक्षित रखने के लिए फसलों, कृषि पशुओं, मछलियों और वन वृक्षों की जैव-सुरक्षा को मजूबत बनाना|
  • प्रत्येक कृषि और गृह विज्ञान स्नातक को एक उद्यमी बनाने व कृषि को लिंग संवेदी बनाने के लिए शिक्षाशास्त्रीय विधियों और कृषि पाठ्यचर्या की पुनर्संरचना करना|
  • संधारणीय कृषि के लिए जरुरी आदानों के उत्पादन और सप्लाई तथा जैव-प्रौद्योगिकी व सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकियों के माध्यम से विकसित उत्पादों व प्रक्रियाओं में भारत को एक विश्व आउटसोर्सिंग हब बनाना|

परिभाषा

इस निति के प्रयोजनार्थ, “किसान” शब्द के अंतर्गत भूमिहीन कृषि श्रमिक, बटाईदार, काश्तकार, लघु, सीमांत और उप-सीमांत खेतिहन, बड़े धारणों वाले किसान, मछुवारे, कुक्कुट व पशुपालन में लगे अन्य किसान, चारणिक, बगान कामगार और साथ ही वे ग्रामीण तथा  जनजातीय किसान भी शामिल हैं जो अनेक प्रकार के खेती से जुड़े  व्यवसायों में लगे हैं, जैसे कि मधुमक्खी पालन, रेशमपालन और कृमिपालन| इस शब्द के अंतर्गत वे जनजातीय परिवार भी शामिल होंगे जो झूम खेती के कार्य और गैर-इमारती वन उत्पादों के संग्रहण व उपयोग  के कार्य में लगे हैं| फसल और पशुपालन, मत्स्यिकी और कृषि-वानिकी के जरिए अपनी आजीविका कमाने वाले कृषि और गृह विज्ञान स्नातकों को किसानों व खेती के क्षेत्र में उनका सही स्थान प्राप्त होगा| प्रत्येक श्रेणी में महिलाओं की लिंग-विशिष्ट जरूरतों को भी स्वीकारा जायेगा|

परिसम्पत्ति सुधार

परिसम्पत्ति सुधार का प्रयोजन यह सुनिश्चित करना है कि गाँवों में हर पुरुष और स्त्री के पास  उत्पादक परिसम्पति हो या वह उसे सुलभ हो जैसे कि भूमि, पशुधन, मत्स्य तालाब, घरेलू फार्म अथवा किसी उद्यम के जरिए आय अथवा बाजार प्रेरित दक्षता जिससे कि पारिवारिक पोषाहार सुरक्षा संरक्षित रहे और बच्चे स्कूल जाने में समर्थ हो सकें|

भूमि

भूमि का स्वामित्व बड़ा असंतुलित है, जहाँ 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवारों के पास एक हेक्टेयर से भी कम भूमि है| एक एकड़ से अधिक भूमि रखने वाले ग्रामीण परिवारों का प्रतिशत लगभग 28 है| ग्रामीण परिवारों में भूमिहीन ग्रामीण परिवारों का प्रतिशत 11.24 बैठता है| ये आंकड़े 1991-92 से सम्बन्धित हैं और यह स्पष्ट है कि अब तक जोतों का और छितराव हो गया होगा जिसका परिणाम बहुत छोटी जोतों की संख्या का विस्तार होना है|

किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति का पहला  महत्वपूर्ण कार्य, काश्तकारी कानूनों, भूमि को पट्टे पर देने, अधिकतम सीमा से अधिशेष भूमि और परती भूमि का वितरण, साझा सम्पत्ति और परती भूमि संसाधनों की पर्याप्त सुलभता की व्यवस्था करने पर ध्यान और जोतों की चकबंदी के विशेष सन्दर्भ में, भू-सुधार के क्षेत्र में किया जाना चाहिए| पड़त भूमि विकास के सम्बन्ध में मोहन धारिया समिति की सिफारिशों को कार्यान्वित किया जाना चाहिय क्योंकि परती भूमि को बर्बाद भूमि के रूप में पुकारा जाना अधिक उपयुक्त होगा| हिन्दू उतराधिकार संशोधन अधिनियम (2005) के अंतर्गत महिलाओं को भू-अधिकार प्रदान किये जाने के बाद, महिला कृषकों के लिए उपयुक्त सहायक सेवाएं प्रदान करना एक आवश्यक कार्य हो गया है| ऋण प्राप्त करने के लिए पट्टे जारी होने तक वैकल्पिक समर्थन के साथ महिलाओं के लिए मकानों ओंर खेती की भूमि दोनों के सम्बन्ध में संयुक्त पट्टा एक अनिवार्यता है| भू-अधिप्राप्ति अधिनियम की, विशेष रूप से हर्जाने की गणना करने के लिए, समीक्षा की जानी चाहिए और उसमें संशोधन किया जाना चाहिए|

विशेष उपजाऊ कृषि भूमि को कृषि के लिए संरक्षित रखा जाना चाहिए और इसे गैर-कृषि  प्रयोजनों के लिए तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र जैसे कार्यक्रमों के लिए नहीं लिया जाना चाहिए| ऐसे विशेष कार्यक्रमों के लिए परती भूमि और/अथवा क्षारीयता व अन्य अजैविक प्रभाव वाली भूमि उपलब्ध कराई जानी चाहिए जिनसे खेती  के प्रयोजनार्थ भूमि की जैविक क्षमता कम होती है| प्रत्येक राज्य को एक भू-अनुक्षेत्र वर्गीकरण टीम गठित करनी चाहिए जिसमें मृदा वैज्ञानिक, कृषिशास्त्री और दूरवर्ती-संवेदी विशेषज्ञ शामिल हों और जो जैविकीय क्षमता वाली भूमियाँ, जैसे कि परती भूमि, लवणीयता, क्षारीयता प्रभावित भूमि, आदि का औद्योगिक कार्यकलापों और निर्माण के लिए चिन्हित करें| यह हमारे राष्ट्रीय हित में है कि कृषि और उद्योग दोनों ही परस्पर सहयोगात्मक ढंग से विकसित हों|

भूमिहीनों के लिए भूमि

छोटे भूमि खण्ड की मिलकियत से परिवार आय और पोषाहार सुरक्षा सुधारने में मदद मिलेगी| जहाँ संभव हो, भूमिहीन श्रमिक परिवारों को कम से कम एक एकड़ प्रति परिवार उपलब्ध कराई जानी चाहिए जिससे उन्हें घरेलू उद्यान कायम करने व पशुपालन के लिए स्थान उपलब्ध होगा| ऐसी भूमि का आबंटन महिला के अथवा पति व पत्नी दोनों के संयुक्त नाम में किया जाना चाहिए| भूमिहीनों को भूमि आबंटन के तमिलनाडु के हाल ही के उदारहण का अध्ययन व देशभर में उसका अनुकरण किया जाना चाहिए|

पानी

पानी एक सार्वजनिक भलाई और सामाजिक संसाधन है, न कि निजी सम्पत्ति| पानी सुलभ कराने तथा जल संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों को शामिल करने के लिए नया न्यायोचित व एकसमान पद्धति विकसित करने को प्राथमिकता प्रदान की  जानी चाहिए| महिलाओं को उन तक पहुँच व प्रबंधन में, जल उपभोक्ताओं और प्रबंधकों के रूप में, पर्याप्त भूमिका निभानी| सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में सिंचाई जल, देश के अनेक भागों में खेती में ऊँची उत्पादकता और स्थिरता दोनों प्राप्त करने में एक गंभीर बाधा बनती जा रही है| जल स्वराज अथवा सिंचाई जल उपलब्धता में आत्मनिर्भरता आज की जरुरत है| यद्यपि हमारे देश में कुल वर्षा संतोषजनक होती है, तथापि इसका वितरण अत्यंत असमान है जबकि पूरे वर्ष में केवल 100 घंटे के अंतर्गत ही सारी वर्षा हो जाती है| यह भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण  है कि अधिकांश किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए भू-जल पर निर्भर रहते हैं| यह संसाधन, जिसमें किसानों ने अपने परिश्रम से अर्जित बचतों का निवेश किया है, आज दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि भूजल स्तर गिरता जा रहा है| इसलिए, आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वर्षाजल दोहन और जलाशयों का  पुनर्भरण एक अनिवार्यता बन गई है| भारत निर्माण कार्यक्रम के अंतर्गत 10 मिलियन हेक्टेयर के नए क्षेत्र को सिचाई के तहत लाने के लिए एक राष्ट्रीय रूप से चर्चित और स्वीकृत कार्यनीति तैयार की जानी चाहिए| केवल संवाद और सर्वसम्मति कायम करके परियोजनाओं के विकास के बारे में भिन्न-भिन्न मतों को मिलाया जा सकता है|

पानी के उपयोग की कार्यकुशलता में सुधार करने की काफी गुंजाइश हिसाब लगाया गया है कि सिंचित परियोजनाओं में जल उपयोग कार्यकुशलता के वर्तमान स्तर में 10% वृद्धि से भी बड़े क्षेत्रों में फसल जीवन बचत वाली सिचाई की व्यवस्था करने में मदद मिल सकती है| पानी, किस्म, पोषकों (मेक्रो तथा माइक्रो) और खेती के औजारों के बीच तालमेल पैदा करके भी उच्च कार्यकुशलता प्राप्त की जा सकती है| जल की प्रति इकाई आय और पैदावार को अधिकतम बढ़ाने की विचारधारा को सभी फसल उत्पादन कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए|

जल की गुणवत्ता पर भी ध्यान देने के जरुरत है क्योंकि पानी प्रायः स्रोत पर ही उर्वरकों, कीटनाशी अवशिष्टों और विषाक्त रसायनों द्वारा प्रदूषित हो जाता है| उदाहरण के लिए, भू-जल में आर्सेनिक विष की समस्या अब भी बनी हुई है क्योंकि प्रचुर सतही पानी वाले क्षेत्रों में, जैसे कि पश्चिम बंगाल में लोग पेयजल और सिंचाई प्रयोजनों के लिए भू-जल अधिकाधिक निर्मर करते हैं| अन्य सुरक्षित पेयजल विकल्प उपलब्ध कराकर इस निर्भरता को दूर किया जा सकता है| नदियों, नहरों, जलाशयों, झीलों, तालाबों और वर्षाजल सहित सतही पानी के प्रभावी प्रबंधन से भू-जल निर्भरता में कमी आ सकती है|

पर्याप्तता और गुणवत्ता से सम्बन्धित समस्याओं के अलावा, जल वितरण में साम्यता से सबन्धित गंभीर मुद्दे हैं| जल आपूर्ति वितरण के निजीकरण के अनेक खतरे हैं और इससे स्थानीय समुदायों के बीच जल संघर्ष हो सकते हैं|

आपूर्ति में वृद्धि करने और मांग प्रबंधन के लिए निम्मलिखित उपाय जरुरी है:

  1. वर्षाजल दोहन और जलस्थलों का पुनर्भरण अनिवार्य बनाया जाना चाहिए तथा किसानों को उनके नवीकरणों स्रोतों के पुनर्भरण में निवेश करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए| खेती को संरक्षित रखने के लिए यह एक अनिवार्यता है|
  2. सभी मौजूदा कुओं और तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए|
  3. सुधरी सिंचाई प्रथाओं के जरिए, जिनमें छिड़काव व ड्रिप सिंचाई शामिल है, मांग प्रबंधन पर प्राथमिकतापूर्ण ध्यान दिया जाना चाहिए|
  4. एक जल साक्षरता अभियान शुरू किया जाना चाहिए तथा भू-जल के संधारणीय उपयोगार्थ विनियम तैयार किये जाने चाहिए|
  5. उपलब्ध जल संसाधनों के प्रभावी  उपयोग के लिए तथा जल की प्रत्येक बूंद से आय बढ़ाने के लिए, वर्षा, नदी, जमीनी, समुद्री और उपचारित सीवेज पानी का मिला-जुला उपयोग एक प्रमुख पद्धति होनी चाहिए|
  6. जल दुर्लभ क्षेत्रों में, भू-उपयोग पद्धति के अंतर्गत उच्च मूल्य-न्यून जल चाहने वाली फसलों की खेती पर बल दिया जाना चाहिए, जैसे कि दालें और तिलहन|
  7. प्रत्येक गाँव में एक पानी पंचायत से उपलब्ध पानी को समानता के आधार पर वितरित करने में मदद मिल सकती है|
  8. जिन क्षेत्रों में बड़े बांधों के निर्माण अथवा नदियों को जोड़ने के परिणामस्वरूप वहाँ रहने वाले परिवारों का बड़े पैमाने पर विस्थापन होने की संभावना हो, वहाँ प्रभावित गाँवों की ग्राम सभाओं को पुनर्वास योजनाएँ तैयार करने में शामिल किया जाना चाहिए| ऐसा, बड़े बांध अथवा नदियों को परस्पर जोड़ने जैसे अन्य उपायों की योजना तैयार करने के समय किया जाना चाहिए|

उपलब्ध जल के लाभों को अधिकतम बनाने में विशेषज्ञता प्राप्त करने के वास्ते जल उपभोक्ता एसोसिएशनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| वैज्ञानिक जल दोहन, संधारणीय तथा समतापूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करने तथा उपयोग की सुचारू पद्धतियां लागू करने में राष्ट्रीय वर्षापोषित क्षेत्र प्राधिकरण मददगार हो सकता है| राष्ट्रीय वर्षापोषित क्षेत्र प्राधिकरण, राष्ट्रीय बागबानी मिशन, तिलहन व दाल सम्बन्धी प्रौद्योगिकी मिशनों और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के बीच परस्पर तालमेल किया जाना चाहिए|

मानसून का व्यवहार प्रायः अनियमित रहता है| सूखा प्रधान क्षेत्रों में एक सूखा कोड लागू किया जा सकता है जिसमें प्रतिकूल मानसून के प्रभाव को कम से कम करने के लिए और अच्छे मौसम का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाने के लिए की जाने वाली कार्रवाई का उल्लेख हो| इसी प्रकार, भारी बारिश की अधिकता वाले क्षेत्रों में एक बाढ़ कोड लागू किया जा सकता है जिससे कठिनाई कम होगी तथा बाढ़-मुक्त मौसम को एक प्रमुख कृषि उत्पादन अवधि में बदलने में मदद मिलेगी| राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में पारिस्थितिकीय ढांचे के सुदृढीकरण के लिए कभी-कभी होने वाली भारी बारिश का लाभ उठाने के लिए जो संधारणीय पशुधन के उत्पादन, पेय जल सुरक्षा और बालू रेत के टीलों के स्थिर बनाने के लिए जरुरी एक उत्तम मौसम कोड लागू किया जा सकता है| सूखा, बाढ़ और उत्तम मौसम कोडों के एकीकृत रूप से तैयार और लागू करने के लिए राष्ट्रीय वर्षापोषित क्षेत्र प्राधिकरण तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है|

पशुधन

पशुधन, जिसमें कुक्कट शामिल है, दूसरी बड़ी भू-आधरित आजीविका का साधन है जिसका 2004-05 में कृषि जीडीपी में 26% का योगदान था| यह स्पष्ट है कि पशुधन और आजिवाकाओं का हमारे देश में बड़ा निकट का सम्बन्ध है और फसल-पशुधन एकीकृत खेती किसानों के कल्याण का एक मार्ग है|

पशुधन का स्वामित्व कहीं अधिक  समतावादी है क्योंकि संसाधनविहीन किसानों के परिवारों के पास अधिकांशत-पशु, भैंस, भेड़ और बकरियां होती हैं| पशुधन की देखभाल और प्रबंधन में महिलाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं| किन्तु हो सकता है कि उनके पास मालिकाना अधिकार न हों और इसलिए उत्पादन के सहकारी माडल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| ऐसे परिवारों को पेश आने वाली बड़ी बाधाएँ चारे, स्वास्थ्य देखरेख और लाभप्रद कीमतों की हैं| उत्तम चारे और खाद्य की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्य स्तर पर पशुधन खाद्य और चारा निगम स्थापित किये जाने की तत्काल आवश्यकता है| स्थानीय स्तर पर उत्पादन के लिए स्वयं-सेवी समूह को सुधरे किस्म के बीज रोपण सामग्री प्रदान करने के लिए ऐसा निगम एक सुविधा प्रदानकर्ता संस्था हो सकता है| हमारे पशुओं की उत्पादकता न्यून है और बेहतर पोषाहार व स्वास्थ्य देखरेख के जरिए इसमें सहज रूप में सुधार किया जा सकता है| उच्च उत्पादकता के जरिए पशुओं के मालिकों की आय बढ़ाने में पशु चिकित्सकों और कृषि विज्ञान स्नातकों द्वारा संचालित कृषि-क्लिनिक अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं| इसके साथ, फसल पशुओं की एकीकृत खेती प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि इससे न केवल आय और पारिवारिक पोषाहार सुरक्षा सुधारने में मदद मिलेगी बल्कि ओर्गानिक खेती करने में भी मदद मिलेगी| पशुओं के बीमे की भी पुनर्संरचना किये जाने की जरूरत है और इसे छोटे पशु स्वामियों के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए|

इस  महत्वपूर्ण क्षेत्रक के सभी पहलुओं पर, जैसे की प्रजनन निति, खाद्य और चारा, अर्ध-पशु चिकित्सकों के जरिए स्वास्थ्य देखरेख, विपणन, मूल्यवर्धन, बायोमास उपयोगिता (चमड़ा, हड्डी और रक्त्त) पर और पशु ऊर्जा के सुचारू उपयोग, उदाहरणार्थ सुधरी बैलगाड़ियों के जरिए एकीकृत रूप से ध्यान देने के लिए एक राष्ट्रीय पशु विकास परिषद स्थापित की जा सकती है|

कुक्कट पालन के मामले में, निम्नलिखित उपाय करने की जरुरत है|

  1. प्रवेश के सभी बंदरगाहों पर संघरोध (क्वांरटाइन) और परीक्षण सुविधाएँ स्थापित और सुद्रढ़ की जानी चाहिए क्योंकि सुरक्षा उपाय कुक्कट उद्योग को बनाए रखने के लिए तथा जीवन व आजिवाकाओं के संरक्षण के लिए नितान्त जरुरी है|
  2. कम से कम छः सप्ताह की अवधि के लिए सभी आयातित पक्षियों का 100% संघरोध (क्वांरटाइन) किया जाना चाहिए, जैसा कि अन्य  देशों में होता है|
  3. बाजार में बेचे जाने से पूर्व आयातित कुक्कट टीकों की सुरक्षा और कार्यकुशलता के सम्बन्ध में परीक्षण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, जैसा कि मानव टीकों के मामले में किया जाता है|
  4. कुक्कट पालन को एक कृषि कार्यकलाप के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए तथा लघु धारक कुक्कट सम्पदाएँ स्थापित करने के लिए पिछवाड़े के कुक्कट किसानों को उपयुक्त सहायता प्रदान की जानी चाहिए|

  5. मात्स्यिकी

तटवर्ती  और अंतर्देशीय  मात्स्यिकी दोनों ही लाखों के परिवारों को रोजगार और आजीविका प्रदान करती है| एकीकृत तटवर्ती क्षेत्र प्रबंधन तथा वैज्ञानिक ढंग से मत्स्य पालन, दोहन और प्रसंस्करण लागू करके pryavrnपर्यावरणीय संधारणीय आधार पर मछुवारे परिवारों की आय सुधारने की काफी गुंजाइश है| सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान देते हुए एक सुनियोजित जलीय सुधारों की आवश्यकता है ताकि भूमिहीन श्रमिक परिवारों को मत्स्यपालन के लिए गाँवों के तालाब व सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य जलीय स्थल सुलभ कराए जा सकें|

राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) की स्थापना एक स्वागत योग्य कदम है| एन एफ डी बी के मार्गदर्शी सिद्धांत होने चाहिए पारिस्थितिकी, अर्थशास्त्र, लिंग साम्यता और रोजगार सृजन| ऐसे बोर्ड में मत्स्य कृषि के पकड़ और पालन पहलुओं में लगे मछुवारे समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए| इसे, जलीय सुधारों के सम्बन्ध में मार्गनिर्देश तैयार करने के वास्ते एक अंतर-विषयक कार्य बल गठित करना चाहिए| इसके अलावा, निम्नलिखित क्षेत्रों में विवादों के निपटान के लिए एन एफ डी बी को तत्काल ध्यान देना चाहिए:

  1. मशीनीकृत और पारंपरिक मत्स्य उद्यमों के बीच विवाद
  2. लवण जल के जलस्थलों में प्रवेश करने और गहन मात्स्यिकी पद्धतियों के कारण उत्पन्न प्रदूषण के कारण मत्स्य पालकों और कृषकों तथा साथ ही स्थानीय जनता के बीच विवाद
  3. भूमिहीन श्रमिकों और दलित परिवारों को संयुक्त मत्स्य पालन पर आधुनिक मत्स्य पालन अपनाने के लिए तालाबों और जलाशयों के आबंटन के लिए सुपरिभाषित नीतियों का आभाव
  4. समुद्री खरपतवार के बारे में तथा विदेशी कार्पों व अन्य विदेशी आक्रामक प्रजातियों को लागू किये जाने के बारे में पर्यावरणीय की चिन्ताएं

संसाधनविहीन मछेरों और भुमिहीन श्रमिक परिवारों को एक संधारणीय ढंग से मत्स्य पकड़ और कल्चर मात्स्यिकी द्वारा अपनी आजीविका कमाने में समर्थ बनाया जाना चाहिए| नीति के अन्य पहलू जिनपर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, निम्न प्रकार है:

  1. सभी के लिए मीन प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण केन्द्र स्थापित  किये जाने चाहिए जो पकड़/कल्चर उपभोग श्रृंखला के सभी परिवारों को प्रशिक्षण प्रदान कर सकें|
  2. पकड़ी गई मछलियों को सलमोनेल्ला व अन्य संक्रमण, जो माइकोटोक्सिनों का उत्पादन करने में असमर्थ हैं से बचाने हेतु गुणवत्ता की जानकारी
  3. मातृ पोत, जिनसे समुद्र के बीच में पकड़ की स्वच्छतापूर्वक संभाल सुनिश्चित हो सके
  4. मत्स्य अवतरण केन्द्रों की कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के लिए छोटे आकार के ड्रेजर
  5. विकेंद्रीकृत पकड़ और पालन मात्स्यिकी क्षेत्रकों की सहायतार्थ केंद्रीयकृत सेवाएं
  6. मछुवारे महिलाओं की प्रशिक्षण जरूरतों पर भी विशेष ध्यान दिए जाने की जरुरत है जो पकड़ी गई मछलियों को संभालते हैं|
  7. अंतर्देशीय मात्स्यिकी जिसमें सजावटी मछली और वायु श्वसन मीन भी शामिल है, जिससे कि तालाबों/जलाशयों में आवश्यक स्थान उपलब्ध कराकर अतिरिक्त आय अर्जित हो सके|
  8. प्राकृतिक प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) की हानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु कृत्रिम प्रवाल भित्ति|
  9. एकीकृत तटवर्ती क्षेत्र प्रबंधन नीति के अंतर्गत लगभग 10 किलीमीटर भू-सतह और 10 किलीमीटर तट से समुद्री सतह के प्रबंधन पर साथ-साथ ध्यान दिया जाना चाहिए| इससे यह सुनिश्चित होगा कि भू-आधारित व्यवसायों से निस्सारों व अन्य प्रदूषकों के छोड़े जाने के फलस्वरूप समुद्री मात्स्यिकी को कोई क्षति न हो

10.  तटवर्ती समुदायों को बायोकवच का निर्माण करने के लिए भी समर्थ बनाया जाना चाहिए, जैसे कि मैंनग्रोव्ज, केजुरीना, सलीकोर्निआ, एट्रीप्लेक्स व अन्य होलोफाइटिक पौधे| इससे चक्रवाती तूफानों और समुद्र जल भराव की स्थिति में, जैसे कि 26 दिसम्बर 2004 को आया सुनामी, तटवर्ती मछेरों व फार्म परिवारों का जीवन और आजिविकाएं सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी|

11.  “राष्ट्रीय जलीय कृषि प्राधिकरण” और राष्ट्रीय मात्स्यिकी बोर्ड विकास बोर्ड को मिलकर काम करना चाहिए ताकि पकड़ मात्स्यिकी और जलीय कृषि दोनों मछुवारे परिवारों और उपभोक्ताओं के पोषण कल्याण और आर्थिक कल्याण में सुधार करने के लिए परस्पर रूप से सहायक बन सकें| सभी संरचनाओं में महिलाओं की विशेष जरूरतों और चिंताओं को शामिल किया जाना चाहिए और उन्हें प्रतिनिधित्व दिया  जाना चाहिए|

12.  मछुवारे परिवारों को, कुक्कट पालन, मीन आचार निर्माण, अगर उत्पादन, पर्ल ओयिस्टर पालन व अन्य उद्यमों जैसे अतिरिक्त आया सृजक कार्यकलाप आयोजित करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है|

समुद्री सतह के लगभग २ मिलियन किलोमीटर के अन्दर फैले, जो भारत को उपलब्ध भू-सतह का लगभग दो-तिहाई भाग बैठता है, एकमात्र आर्थिक क्षेत्र ( ई ई जेड ) के प्रबंधन और आर्थिक इस्तेमाल के सम्बन्ध में एक गतिशील निति रिपोर्ट तैयार किए जाने की भी जरूरत है| यह. राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड का एक प्राथमिकतापूर्ण कार्य हो सकता है|

जैव संसाधन

जैव संसाधनों का सम्बन्ध वनस्पति और जीव जन्तुओं की प्रचुर सम्पदा से है, जिसमें, मृदा, लघु वनस्पति और छोटे जीव-जंतु सम्मिलित हैं, जो भूमि और जल के बाद किसानों के लिए तीसरा महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं| इस निति का उद्देश्य इन संसाधनों को संरक्षण प्रदान करना व इनमें वृद्धि करना. एकसमान सुलभता की व्यवस्था करना तथा लोगों के एकसमान हिस्सेदारी के साथ संधारणीय उपयोग करना है| उपरोक्त कुछेक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दो प्रमुख विधान विद्यमान हैं|

पादप प्रजाति संरक्षण और कृषक अधिकार अधिनियम (पी वी पी.एफ आर), 2001 में अधिनियम किया गया था | पी. वी. पी. एफ आर के अंतर्गत किसानों को खेतिहरों , संरक्षकों और प्रजननकर्ताओं की बहु भूमिका को स्वीकार किया गया है| यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसानों के अधिकारों का, उनकी अलग-अलग भूमिकाओं में अधिकारों का संरक्षण किया जाये, विस्तृत मार्गनिर्देश तैयार किये जाएँ| उदाहारणार्थ,  अधिकांश किसान जो खेतिहर हैं, “पादप समर्थित अधिकारों (प्लांट बैक राइट्स)” के  हकदार हैं| इसका अर्थ है कि वे अपने बीज अपने पास रख सकते हैं और अपने आस-पास सिमित आदान-प्रदान भी कर सकते हैं| पालकों के रूप में किसानों के अधिकारों के भी वही अधिकार हैं जो व्यायसायिक प्रजननकर्ताओं के हैं और वे पंजीकरण तथा संरक्षण के लिए अपनी किस्मों को दर्ज कर सकते हैं| संरक्षकों के उर्प में किसान राष्ट्रीय जीनविधि और राष्ट्रीय जैव-विधिता विधि दोनों से ही मान्यता और पुरस्कार के हकदार हैं| प्रायः अत्यंत मूल्य वाली संरक्षित सामग्री में किसी समुदाय का, न कि किसी एक व्यक्ति का योगदान होता है| इसलिए, अपनाई जानेवाली प्रक्रियाएं ऐसी होनी चाहिय जिनमें सामुदायिक योगदान की पहचान हो और उन्हें उपयुक्त रूप से पुरस्कृत किया जाये| जीन और जैव-विधिता निधियों का उपयोग विशुद्ध रूप से जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं व पुरुषों को सम्मान  देने व पुरस्कृत करने के लिए तथा ऐसे समुदायों की स्थान पर ही संरक्षण परम्पराओं के पुनरुद्धार को समर्थन प्रदान करने के किये किया जाना चाहिए|

प्रजननकर्ताओं को, पंजीकरण हेतु अपना आवेदन-पत्र प्रस्तुत करते समय जिस प्रजाति का वे संरक्षण चाह रहे हैं, उसकी पैतृकता और भू-प्रजातियों के नाम और जहाँ से उन्हें एकत्र किया गया है, उनके नाम का उल्लेख करना आवश्यक होना चाहिए|

जैव-विविधता अधिनियम, 200२ के प्रावधान भी, पहले सुविज्ञ सहमति और लाभ हिस्सेदारी के सम्बन्ध में,, जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं व पुरुषों के लिए बराबर महत्वपूर्ण हैं| इसलिए मान्यता सम्बन्धी प्रक्रियाओं में जैव-संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन में लैंगिक भूमिका को ध्यान में रखा जाना चाहिए| दोनों अधिनियमों की कार्यान्वयन प्रक्रियाओं की जेंडर मेनस्ट्रीमिंग महत्वपूर्ण है| जीन और जैव विविधता निधियों के संचालन में जेंडर आडिट प्रावधान लागू किया जा सकता है|

निम्मलिखित को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए-

  1. पारंपरिक जानकारी का प्रलेखन (टी.के.) महिलाओं को शामिल करके सामुदायिक जैव-विविधता रजिस्टरों के माध्यम से किया जाना चाहिए जी इसका काफी ज्ञान रखती है|
  2. स्थान पर ही संरक्षण परम्पराओं का पुनरुद्धार करने के लिए जनजातीय और ग्रामीण महिलाओं तथा पुरुषों की मदद करने की जरुरत है|
  3. सहभागी प्रजनन प्रक्रियाएँ, जुमें वैज्ञानिक और स्थानीय संरक्षकों को शामिल किया जाय, भू-प्रजातियों की उत्पादकता सुधारने के लिए विशेष रूप से उपयोगी होंगी|
  4. सार्वजानिक हित में कार्यरत संस्थान, जेनेटिक इंजीनियर्स को, प्रजनन-पूर्व भूमिका निष्पादित करनी चाहिए, अर्थात महत्वपूर्ण आर्थिक गुण के समबन्ध में नूतन जेनेटिक मिश्रण का विकास, जैसे कि जैविक और अजैविक दबावों का प्रतिरोध| उसके बाद उन्हें भागीदारीपूर्ण प्रजनन कार्यक्रमों में किसानों के साथ काम करना चाहिए ताकि जेनेटिक कार्यकुशलता और जेनेटिक विविधता को प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जा सके|
  5. जेनेटिक समरूपता से कीटों और बीमारियों के प्रति जेनेटिक भेद्यता में वृद्धि होती है| यही कारण है कि प्रजनन-पूर्व और सहभागी प्रजनन के एकीकरण से छोटे किसानों को कीट महामारी के जोखिमों से बचाव में मदद मिलेगी|
  6. कृषि जैव-विविधता वाले समृद्ध क्षेत्रों में जेनेटिक और विधिक जानकारी प्रदान किये जाने की भी जरुरत है, जैसे कि पूर्वोत्तर क्षेत्र, पशिचमी और पूर्वी  घाट तथा शुष्क क्षेत्र|
  7. जेनेटिक संसाधन के महत्व की समझ प्रदान करने के लिए ग्रामीण स्कूलों में जीनोम क्लब स्थापित किये जा सकते हैं|
  8. विधिक जानकारी प्रदान करने से जनजातीय और ग्रामीण परिवारों को पी वी पी एफ आर और जैव-विवधिता अधिनियमों के प्रावधानों को, उनकी हकदारी से सम्बन्ध में समझने में मदद मिलेगी|
  9. संरक्षण की पारंपरिक विधियों, जैसे कि सेक्रेड ग्रोव्ज, को भी समर्थन और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए|

10.  तटवर्ती जैव-विविधता की भी, जिसमें प्रवाल भित्ति और समुद्र घास तल शामिल हैं, तत्काल संरक्षण की जरुरत है|

11.  औषधीय पौधों के संरक्षण और संधारणीय उपयोगार्थ पशिचमी घाटों, विन्ध्या और हिमाचल क्षेत्र में हर्बल बायोवैलिज कायम की जा सकती हैं| ऐसी बायोवैलिज में युवा किसान महिलाओं और पुरुषों की एक प्रकार की उद्यम पूंजी व अन्य सहयोग के जरिए मदद की जा सकती है ताकि स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए मूल्यावान औषधीय पौधों के संरक्षण, चयन और बहुगुणन में उनकी मदद की जा सके|

12.  खेत/किसान स्तर पर बाह्य स्थाने और तत्स्थाने पादप जेनेटिक संसाधनों के संरक्षण के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम शुरू किये जाने की जरूरत है| जिन क्षेत्रों में पारम्परिक प्रजातियाँ समाप्ति के कारगार पर हैं, वहाँ किसान स्तर पर जीन/बीज बैंक स्थापित किये जाने जरुरत है| कुछ राज्य सरकारें “बीज आदान-प्रदान कार्यक्रम” प्रोत्साहित कर रही हैं जिसके तहत किसानों को उनकी पारंपरिक चावल प्रजातियों के बदले में संकर किस्म का चावल दिया जाता है| यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस प्रक्रिया में पारंपरिक चावल जीन पूल नष्ट न हो जाये| नेशनल पार्कों, बायोस्फीयर रिजर्वों और जीन आश्रयस्थलों के भागीदारीपूर्ण प्रबंधन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए|

पशु जेनेटिक संसाधन

संरक्षण का बोझ प्रमुख रूप से उन गरीब समुदायों पर नहीं पड़ने दिया जाए तो पशु जेनेटिक विविधता बनाए रखते हैं| पुरस्कारों और प्रोत्साहनों की एक पद्धति विकसित की जानी चाहिए ताकि लोगों को जैव-विविधता अधिनियम के अंतर्गत अपनी प्रजातियों को संरक्षित रखने के लिए समर्थ और प्रेरित किया जाए| ऐसे प्रयोजनों के लिए जैव-विविधता निधि का उपयोग किया जाना चाहिए| पशुधन पालकों को अपने प्रजनन भण्डार और प्रजनन प्रथाओं के उपयोग और विकास को जारी रखने के अंतर्निहित अधिकारों को स्वीकारा जाना चाहिए| सरकार को इन अधिकारों को मान्यता प्रदान करनी चाहिए, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन पालकों के अंशदान को स्वीकार जाना चाहिए और तदनुसार अपनी नीतियों व विधिक रूपरेखाओं को अनुकूल बनाना चाहिए| यह उन पशु संसाधनों पर नियत्रण करने के लिए बौद्धिक सम्पदा पद्धति को नाकाम करने के प्रयासों की दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो देश की खाद्य और आजीविका  सुरक्षा प्रणालियों का एक महत्वपूर्ण घटक हैं|

जेनेटिक विविधता के संरक्षण और पशुधन पालकों की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकारते हुए, पशु अनुरक्षण और प्रजनन के बारे में देशज ज्ञान को प्रलेखबद्ध करने की जरुरत है| समुदाय-आधारित देशज पशुओं की प्रजातियों और प्रजातियों के संरक्षण और विकास को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| उष्ण और शीत शुष्क तथा अर्ध-शुष्क दोनों क्षेत्रों पर, जहाँ जेनेटिक विविधता और सम्बद्ध देशज ज्ञान विशेष रूप से सुविकसित है, विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए| राज्य फार्मों का उपयोग, गैर-स्थानिक संरक्षण के प्रति अनुकूल पशु प्रजातियों के सम्बन्ध में भी स्थल पर ही संरक्षण प्रोत्साहित करने के लिए किया जा सकता है| पशु जेनेटिक संसाधनों को संरक्षण प्रदान करने के लिए चारागाह भुमियों का सुनिश्चित किया जाना चाहिए| विशेष परम्पराओं का प्रलेखन नए जीवविज्ञान और नई पोषाहार जरूरतों अथवा चर्म/चमड़े की गुणवत्ता जैसी अन्य आर्थिकी प्रजातियों के सन्दर्भ में, किया जाना चाहिए| एवियन इन्प्लुएंजा वायरस के एच5एन1 जैसी गंभीर बीमारियों के प्रतिरोध के सम्बन्ध में जर्मप्लाज्म की जाँच करने के लिए तटवर्ती जेनेटिक संसाधन केन्द्र स्थापित किये जाने चाहिए|

ब्राजील व अन्य लातिन अमरीकी देशों तथा अफ्रीका में भी भारतीय प्रजाति के पशुओं और भैसों की मांग है| निर्यात अवसर बढ़ाने के प्रयोजनार्थ इन प्रजातियों के प्रजाति पशुओं के अनुरक्षण हेतु पशु विज्ञान स्नातकों और एस एच जी को प्रोत्साहित किया जा सकता है| तथापि, सभी जैवकीय सामग्री का निर्यात, जिसमें पशु शामिल है, कठोरता: जैवविविधता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया जाना चाहिए|

समर्थन सेवाएं

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

विज्ञान  और प्रौद्योगिकी, फार्म कामकाज और उत्पादन में परिवर्तन के प्रेरक हैं| विद्यमान प्रौद्योगिकी क्लान्ति पर काबू पाने के लिए आवश्यक भूमि और जल की प्रति यूनिट उत्पादकता बढ़ाने में नई प्रौद्योगिकी मददगार हो सकती है| उत्तम प्रौद्योगिकियां, जैसे कि जैव-प्रौद्योगिकी, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आई सी टी), नवीकरणीय उर्जा प्रौद्योगिकियां, अन्तरिक्ष अनुप्रयोग और नैनो-प्रौद्योगिकी, सदैव-हरित प्रारंभ करने के लिए अत्युत्तम अवसर प्रदान करती हैं जो पारिस्थितिकीय नुकसान के बिना स्थायी रूप से उत्पादकता सुधारने में समर्थ हैं| इसी प्रकार, दूरवर्ती संवेदी प्रौद्योगिकी के उपयोग से किसानों के खेतों में बोरवैल स्थलों का पता लगाने में मदद मिल सकती है| नई प्रद्योगिकियों  की सुलभता ने सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पद्धति (एन ए आर एस) के छत्र के तहत सामाजिक रूप से संगत कृषि अनुसंधान में सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की जानी चाहिए, जिसमें बड़ी संख्या में आई सी ए आर संस्थान, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, अखिल भारत समन्वित अनुसंधान परियोजनाएं और राष्ट्रीय ब्यूरो सम्मिलित हैं| एन जी ओ तथा प्राईवेट क्षेत्रक आर एन्ड डी संस्थानों को भी एन ए आर एस छत्र के तहत शामिल किया जाना चाहिए|

अनुसंधान कार्यनीति प्रकृति-अनुकूल और लघु कृषक-अनुकूल होनी चाहिए| उदाहरणार्थ, बी टी कपास के मामले में, सार्वजानिक हित वाले संस्थानों को अपना ध्यान प्रजातियाँ विकसित करने पर, न कि संकर प्रजाति विकसित करने पर देना चाहिए ताकि किसान अपने बीज रख सकें| अब भी, कृषि में उपयोग में लाया जाने वाला 80% बीज कृषक-बीज पद्धतियों से प्राप्त होता है| इन्हें समुदाय प्रबंधित बीज ग्रामों और बीज प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण केन्द्रों के समबन्ध में आधारभूत ढाँचे के जरिए मजबूत और समर्थित करना होगा, जिसमें महिलाएं, बीज प्रबंधन के अपने पारंपरिक ज्ञान के कारण, विशेष रूप से जनजातीय महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाएं| वैज्ञानिक जानकारी के प्रसार और जैव-प्रौद्योगिकी व अन्य नई प्रौद्योगिकियों से जुड़े  जोखिमों और लाभों के बारे में अपर्याप्त रूप से जानकारी की आशंकाओं को दूर करने के उद्देश्य से, प्रत्येक पंचायत से कम से कम एक महिला और एक पुरुष सदस्य को फार्म विज्ञान प्रबंधक के रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए| वे अपने-अपने गाँवों में फार्म विज्ञान प्रबंधकों  के रूप में कार्य करेंगे|

पुन:संयोज्य डी एन ए प्रौद्योगिकी अथवा जेनेटिक इंजीनियरी के सुरक्षित और जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग के लिए विश्वसनीय तथा समर्थ विनियामक तंत्र की जरूरत है| इस प्रयोजनार्थ, एक राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण स्थापित किया जाना  चाहिए जिसमें किसानों के जोखिमों और लाभों का आकलन उद्देश्यपरक ढंग से किया जा सके| किसी भी जैव-प्रौद्योगिकी नियामक निति के सम्बन्ध में निम्नलिखित आधार होने चाहिए:

  1. पर्यावरण की सुरक्षा
  2. किसान परिवारों का कल्याण
  3. कृषि प्रणालियों की पारिस्थतिकीय तथा आर्थिक संधारणीयता
  4. उपभोक्ताओं की स्वास्थ्य और पोषाहार सुरक्षा
  5. घरेलू और विदेशी व्यापार की सुरक्षा, और
  6. राष्ट्र की जैव-सुरक्षा

फसल प्रजातियों का प्रजनन करने, विशेष रूप से प्रसंस्करण गुणवत्ता हेतु फलों और सब्जियों की पैदावार को बढ़ाने की तत्काल जरूरत है| इसके साथ ही, पर्यावरणीय सुरक्षित ढंग से उच्च पैदावार हेतु खाद्य फसलों के सम्बन्ध में अनुसंधान को मजबूत किये जाने की जरूरत है|

आर्गेनिक खेती के लिए  रसायनिक खेती की तुलना में अधिक वैज्ञानिक आदानों की जरुरत है| इसलिए, अनुसंधान के इस क्षेत्र पर उच्चस्तरीय बहु-विषयक ध्यान दिए जाने की जरूरत है| किसानों के लिए प्रोद्योगिकीय मार्गदर्शन की जरुरत है किन्तु सावधानीपूर्वक क्षेत्र प्रयोगों के आधार पर अनुसंधान कार्य फिलहाल अपर्याप्त है| फसल-पशु-सह-मत्स्य एकीकृत उत्पादन पद्धतियों के अंतर्गत आर्गेनिक खेती के सिद्धांतों और विधियों को अपनाने की गुंजाइश है|

एकल फसल वाले जैसे कृषि जैसे कृषि क्षेत्रों में, परिस्थितिकी, अर्थशास्त्री और रोजगार सृजन की दृष्टि से, फसल विविधिकरण लाभप्रद हो सकता है| तथापि, फसल विविधीकरण के सम्बन्ध में सलाह के साथ-साथ वैकल्पिक फसलों के लिए प्रभावी बाजार सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए|  फसल विविधीकरण  के लिए योजना तैयार करने में, विशेष रूप से खाद्य फसलों से गैर-खाद्य फसलों के सम्बन्ध में, जैसे कि बायो-ईंधन के उत्पादन के सम्बन्ध में, राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखा जाना चाहिए|

बौद्धिक सम्पदा अधिकार (आई पी आर) नीतियों में, अनुसंधान उत्पादों और संसाधनविहीन किसान परिवारों के लिए मूल्य की प्रक्रियाओं में अधिकारों के अनिवार्य लाइसेंसिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए| स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के सभी मामलों में, सामाजिक समावेश आई पी आर के विकास में एक मार्गदर्शी कारक होना चाहिए|

कृषि जैव-सुरक्षा

फसलों, वृक्षों और फार्म तथा जलीय जानवरों एवं अन्य प्राणियों की कृषि जैव-सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 70 प्रतिशत आबादी की कार्य और आय सुरक्षा तथा राष्ट्र की खाद्य और व्यापार सुरक्षा से सम्बन्धित है| निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ एक राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा पद्धति (एन ए बी एस) विकसित करने की जरुरत है:

  1. प्रभावी और समेकित निगरानी, सतर्कता, रोकथाम और फसलों, फार्म पशुओं, मछलियों और वन वृक्षों की उत्पादकता और सुरक्षा को संरक्षित करने के उद्देश्य से नियंत्रण प्रणालियों के माध्यम से फार्म और किसान परिवारों की आय और आजीविका सुरक्षा तथा साथ ही राष्ट्र की भी खाद्य, स्वास्थ्य और व्यापार सुरक्षा|
  2. मानीटरन, पूर्व चेतावनी, शिक्षा, अनुसंधान, नियंत्रण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्रों में सक्रिय उपाय लागू करने में राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरीय क्षमता बढ़ाना|
  3. विनियामक उपायों, शिक्षा, सुधरी स्वच्छता और पादप-स्वच्छता उपायों को मिलकर एक एकीकृत जैव-सुरक्षा पॅकेज लागू करना|
  4. देश के प्रमुख कृषि-पारिस्थितिकीय और कृषि पद्धति क्षेत्रों को कीटों, रोगजनकों और खरपतवार की आक्रामक विदेशी प्रजातियों और साथ ही जी एम ओ के लागू और जारी होने से बचाव में समर्थ प्रभावी घरेलू और क्षेत्रीय संगरोध सुविधाओं के साथ और अब तथा स्पोक्स मॉडल के आधार पर एक समन्वित राष्ट्रीय कृषि जैव सुरक्षा कार्यक्रम आयोजित करना|

एन ए बी एस के निम्नलिखित तीन परस्पर पुन पुनर्बलनकारी संघटक होने चाहिए:

  1. राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा परिषद (एन ए बी सी), केन्द्रीय कृषि मंत्री की अध्यक्षता में, जो एक शीर्ष निति निर्माण और समन्वयन निकाय के रूप में कार्य करे|
  2. राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा परिषद (एन ए बी सी), जिसके चार स्कंध हैं जो फसलों, फार्म पशुओं, सजीव जलीय संसाधनों और कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण लघु-अंगों के साथ डील करे और साथ ही पूर्व चेतावनी पद्धति का संचालन भी करे| एन सी ए बी, राष्ट्रीय कृषि जैव सुरक्षा परिषद् के लिए सचिवालय का काम करेगा|
  3. राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा नेटवर्क (एन ए बी एन) एन सी ए बी, राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा नेटवर्क के लिए एक समन्यवक और सुविधा प्रदानकर्ता केन्द्र के रूप में भी कार्य करेगा जिसका उद्देश्य  पहले से विद्यमान वैज्ञानिक विशेषज्ञता और संस्थागत विशेषताओं की उपलब्धियों और लाभों को अधिकतम बनाने के लिए जैव-मानीटरन, जैव-सुरक्षा, संगरोध व अन्य जैव-सुरक्षा कार्यक्रमों में लगे सार्वजनिक, निजी, अकादमिक तथा सिविल क्षेत्रकों में बहुत से विद्यमान संस्थानों के बीच वैज्ञानिक भागीदारी को सुविधाजनक बनाना है|

कृषि-मौसमविज्ञान

अल्प, मध्यावधि और दीर्घाविधि मौसम पूर्वानुमान में राष्ट्रीयता क्षमता काफी अधिक है| महत्वपूर्ण बात समान्य जानकारी को फसल पद्धतियों और जल उपलब्धता पर आधारित स्थान-विशिष्ट भू-उपयोग सलाह में बदलने की है| समुचित भू-उपयोग सुझाव प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित पंचायत स्तर फार्म विज्ञान प्रबंधक, भारतीय कृषि-मौसम सलाहकार सेवा केंद्र, पुणे द्वारा जारी कृषि-मौसमविज्ञानीय सलाह का उपयोग कर सकते हैं| एक राष्ट्रीय भू-उपयोग सलाहकार सेवा कायम की जानी चाहिए जो किसान परिवारों को प्रत्याशित मौसम विज्ञानीय व बाजार कारकों के आधार पर अपनी बुवाई करने में सहायता हेतु समय रहते सलाह प्रदान करेगी| समुद्रीय मत्स्यिकी के मामले में. लहरों की ऊँचाइयों और मत्स्य शोआलों के स्थान के सम्बन्ध में डाटा उपलब्ध है| मछेरों द्वारा समुद्र में जाने से पहले उन्हें सम्प्रेषित किया जाना चाहिए| एक एकीकृत इंटरनेट एफ एम अथवा एच ए एम रेडियो सेवा मछेरों के लिए दूरवर्ती समुद्र में बहुत सहायक होगी|

जलवायु परिवर्तन

तापमान, वर्षा और समुद्र स्तर में प्रतिकूल परिवर्तनों के कारण जलवायु परिवर्तन मात्र सैद्धांतिक संभावना नहीं रह गए हैं| ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं की हमें विश्व ऊष्मा का पहले से ही अनुभव हो रहा है, जैसा कि हिमनदों और अंटार्कटिका तथा आर्कटिका शिखरों के पिघलने से स्पष्ट है| तटवर्ती तूफानों और चक्रवातों की संख्या और बारम्बारता में भी वृद्धि हो रही है| सूखे और बाढ़ की प्रायः अधिक संभावना रहती है| यद्यपि जलवायु में परिवर्तन होने की वजह औद्योगीकृत देशों द्वारा उर्जा के गैर-नवीकरणीय स्वरूपों की अत्यधिक खपत करना है किन्तु जलवायु परिवर्तन का हानिकारक प्रभाव गरीब देशों द्वारा अधिक महसूस किया जायेगा जो उनकी सहन करने की सिमित क्षमता के कारण है| जलवायु परिवर्तन के नुकसान को कम करने के लिए सक्रिय उपाय विकसित किये जाने चाहिए| कम्प्यूटर परिणाम माडलों के आधार पर प्रत्येक प्रमुख कृषि-जलवायु क्षेत्र के सम्बन्ध में आकस्मिक योजनाएँ और वैकल्पिक भूमि तथा जल उपयोग नीतियाँ तैयार करनी होंगी| सुखा और बाढ़ प्रधान क्षेत्रों में अन्भुवी किसान महिलाओं और पुरुषों को, सूखे, बाढ़ और अनियमित मानसून के प्रबंधन की कला में :जलवायु प्रबंधकों” के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता है|

आदान और सेवाएं

बीज: उत्तम कोटि के बीज और रोग मुक्त रोपण सामग्री जिसमें विट्रो कल्चर्ड प्रोपेगुल्स शामिल हैं, फसल उत्पादकता और सुरक्षा के लिए अनिवार्य है| अब बहुत सी फसलों में संकर प्रजातियाँ उपलब्ध होती जा रही हैं| बीज प्रौद्योगिकी में समुचित तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के साथ महिला एस एच जी, बीज कम्पनियों के साथ संविदे के आधार पर उनके लिए संकर प्रजातियों के बीज तैयार किये जा सकते हैं| परस्पर रूप से लाभप्रद कृषक-बीज कम्पनी भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सकता है| नई प्रजातियों के मामले में फाउंडेशन बीजों के व्यवस्था एस एच जी को कराई जा सकती है| कृषि विश्वविद्यालय को सभी व्यवहारिक पाठयक्रमों में बीज प्रौद्योगिकी और व्यवसाय तथा मुख्य व्यवसाय/सिद्धांत के बारे में पाठ्यक्रम आयोजित करने चाहिए|

मृदा स्थिति: मृदा स्थिति संवर्धन छोटे किसान की उत्पादकता को बढ़ाने की कुंजी है| प्रत्येक फार्म परिवार को एक मृदा स्थिति पासबुक जरी की जानी चाहिए, जिसमें उनके खेतों की मिट्टी के समबन्ध में भौतिकी, रसायन और माइक्रोबायोलॉजी के बारे में समेकित रूप से जानकारी दी जाये| मिट्टी में विशिष्ट लघु पोषक कमियों का पता लगाने के लिए और अधिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने की तत्काल जरुरत है| मिट्टी में फसल अवशिष्टों को शामिल करके मृदा आर्गेनिक पदार्थ नियंत्रण में वृद्धि करनी होगी| परती भूमियों के पुनरुद्धार तथा उनकी जैवकीय क्षमता सुधारने के सम्बन्ध में तकनीकी सलाह देने की भी जरुरत है| कीमत पद्धति ऐसी होनी चाहिए जिससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग प्रोत्साहित हो|

कीटनाशी: कीटों, रोगजनकों और खरपतवार तीनों के गठजोड़ के कारण प्रत्येक वर्ष 10 से 30% तक की फसल की हानि होती है| पर्यावरणीय सुरक्षा और कारगर कीटनाशकों के विकास, शुरुआत और प्रसार को प्राथमिकता प्रदान की जानी चाहिए| रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को एकीकृत कीट प्रबंधन (आई पी एम) पद्धति में शामिल किये जाने की जरुरत है| किसानों को फसल देखभाल और आई पी एम में प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए| उपयुक्त कोटि नियंत्रण, सुरक्षा आकलन व अन्य विनियामक पद्धतियों को मजबूत किया जाना चाहिए| नकली और घटिया स्तर के कीटनाशकों की बिक्री रोकी जानी चाहिए| वनस्पति कीटनाशकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| प्रत्येक ब्लाक में, उत्पादनकर्ताओं, किसानों, कीटनाशी विनिर्माताओं और विस्तार कार्मिकों द्वारा एक फसल देखरेख परिसंघ कायम किया जाना चाहिए|

यंत्र: छोटे किसानों को यत्रों की जरुरत होती है जिससे कि वे सही समय पर फसल बोने और खरपतवार का प्रबंधन करने व सुधरी फस्लोतर प्रौद्योगिकी अपनाने में समर्थ हो सकें| पर्वतीय क्षेत्रों में उनकी जरुरत अधिक है| महिलाओं को विशेष रूप से उनके अनुकूल यंत्रों की जरुरत है जिनसे नीरसता कम हो सके और उत्पादन बढ़ सके और समय बच सके तथा उनका उपयोग सरलता से किया जा सके| कृषि स्नातक कृषि-व्यवसाय केन्द्र आयोजित करके प्रथा-किराया आधार पर ट्रैक्टर व अन्य बड़े फार्म यंत्र उपलब्ध करा सकते हैं|

टीके तथा सीरम निदानशास्त्र: इस समय उपलब्ध सुविधाओं में बड़ी कमियों को महत्वपूर्ण पशु रोगों से सम्बन्ध में दूर करना होगा| टीका विकास के क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगकी अनुसंधान में तेजी लाये जाने की जरूरत है| इस क्षेत्र में सरकारी-निजी भागीदारियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए|

मत्स्य बीज और खाद्य: उतम कोटि और रोग-मुक्त मत्स्य बीज सफल अंतर्देशीय मत्स्य पालन की कुंजी है| प्रजनन तथा मत्स्य बीज उत्पादन में उपयुक्त एस एच जी को प्रशिक्षित किया जा सकता है| इसी प्रकार, वहनीय कीमतों पर खाद्य की उपलब्धता एक अन्य जरुरत है| मत्स्य कृषक सहकारिताएं, राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड की तकनीकी सहायता से खाद्य और बीज का उत्पादन आयोजित कर सकती हैं|

पशु खाद्य: अपर्याप्त पोषाहार, डेयरी पशुओं में दूध की कम पैदावार का प्रमुख कारण है जहाँ कि अल्पपोषण और कुपोषण दोनों की विद्यमान हैं| यदि गायों और भैसों की पोषणात्मक जरूरतें पूरी हो जाएं तो देश में दूध का वार्षिक उतपादन सौ मिलियन टन से अधिक तक पहुँच सकता है| इस क्षेत्र में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों ही उपायों की जरुरत है| बहुत से सेलुलोसिक अपशिष्टों को उपयुक्त उपचार और संवर्धन के जरिए उत्तम पशु खाद्य के रूप में बदला जा सकता है| पोषण समृद्ध चारा पौधों के रोपण को उच्च प्राथमिकता प्रदान की जानी चाहिए| बालिग और एनसिलिंग जैसी स्थापित प्रौद्योगिकियों का व्यापक रूप से प्रसार किये जाने की जरुरत है|

उच्च फार्म पशु उत्पादकता के लिए आवश्यक कुछ अन्य अनिवार्य सहायक सेवाएं है: देशज प्रजातियों और संकर प्रजातियों के सम्बन्ध में जेनेटिक मूल्यांकन पद्धतियों की स्थापना करना जिससे की चयन के फलस्वरूप उत्पादन लक्षणों में जेनेटिक सुधार हो सके| कृत्रिम गर्भधारण के जरिए प्रजाति का उन्नयन, संकर प्रजनन, जो किसानों के संसाधनों के लिए उपयुक्त हो, और सुधरा  प्रसंस्करण वविपणन| पशु शेत्रक को स्वछता उर पादप-स्वच्छता के अनुकूल बनना होगा| अर्ध-पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित करना होगा| उनसे बीमारियों का शीध्र पता लगाने, उनका इलाज करने और अन्य पशु-चिकित्सा सेवाओं में मदद मिलेगी|

वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत किसानों को, अपनी फसल बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प उपलब्ध न होने पर, जंगली शुकर और नील गाय को मारने की अनुमति दी जानी चाहिए|

रबी मौसम के दौरान पशुओं की मुफ्त चराई किसानों के लिए दूसरी फसल लेने में एक बड़ी बाधा है और इसे ग्राम पंचायत द्वारा रोका जाना चाहिए|

महिलाओं के लिए सहायक सेवाएं: गृह निर्माण, बाल पालन-पोषण और आय अर्जन जिम्मेदारियों की वजह से महिलाओं के समय पर अनेक प्रकार का बोझ पड़ता है| पूरे दिन खेतों में और वनों में काम करने के लिए उन्हें शिशु गृह और बाल देख-रेख केन्द्रों की जरुरत है| पर्याप्त पोषाहार भी महत्वपूर्ण है| एक ग्राम पंचायत महिला निधि कायम की जानी चाहिए जिससे की स्वयंसेवी समूहों व अन्य महिला समूहों को सामुदायिक कार्यकलाप आयोजित करने में मदद मिल सके जिनसे अनिवार्य लिंग-विशिष्ट  जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सके| पुरुषों के बाहर पलायन कर जाने पर कृषि के स्त्रीकरण पर लिग संवेदी कृषि और ऋण पालिसियों के सन्दर्भ में विशिष्ट ध्यान दिए जाने की जरूरत है| कृषि में सभी अनुसंधान, विकास और विस्तार कार्यक्रम तथा सभी सेवाओं को समन्वित किया जाना चाहिए|

ऋण बीमा

ग्रामीण बैंकिंग पद्धति की कार्यकुशलता और आउटरीच में सुधार किया जाना चाहिए| वित्तीय सेवाएं उसके उपभोक्ताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचनी चाहिए, ऋण समय पर उपलब्ध होनी चाहिए और वह भी जरुरी मात्रा में और उचित ब्याज दर पर| ब्याज दर यथासंभव न्यूनतम होना चाहिए| बैंकिग पद्धति के प्रचालन में आडम्बरों के सभी स्वरूपों को समाप्त करके लेन-देन की लागत में काफी कमी करना संभव हो सकता है| वितरण पद्धति में अकार्यकुशलता का बोझ प्रभारित ब्याज पर नहीं डाला जाना चाहिए| वितरण प्रणाली सक्रिय होनी चाहिए और उसे ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राहकों की वित्तीय सेवाओं की जरूरतें पूरी कानी चाहिए| बैंकिंग पद्धति के अंतर्गत, उच्च शिखर तक कृषि को ऊँचा उठाने, ग्रामीण और कृषि-व्यवसाय उद्यमों और रोजगार के विकास को बढ़ावा देने के लिए पूरी न हुई बड़ी ऋण क्षमता का पता लगाने की जरुरत है|

राज्य की जिम्मेदारी है कि वह किसानों की ऋण खपाने की क्षमता में सुधार करे और वितीय सेवाओं का विस्तार करने और उन्हें व्यापक बनाने के लिए अनुकूल परिवेश कायम करके बैंकिंग पद्धति को समर्थन प्रदान करे|

कृषि और ग्रामीण ऋण के अग्रणी के अग्रणी के रूप में नाबार्ड को ऋण उपलब्धता और किसानों व अन्य ग्रामीण उधारकर्ताओं की ऋण खपत क्षमता के बीच अभिसरण और एक सुचारू ऋण प्रदाय पद्धति सुनिश्चित करनी चाहिए| नाबार्ड को संस्थान निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और अनुसंधान व विकास पहलों के जरिए पृष्ठ सहायता प्रदान करनी चाहिए| नाबार्ड को किसानों के लिए राष्ट्रीय बैंक के रूप में कार्य करना चाहिए| इसे सौपें गए कार्य, भूमिका और व्यवसाय माडल पर फिर से गौर करने की जरुरत है क्योंकि इसे स्थापित हुए 25 वर्ष बीत गए हैं तथा हालात में बहुत बदलाव आ गया है|

रिजर्व बैंक और भारत सरकार को बहु-एंजेसी पद्धति में मोटे तौर पर विभिन्न एजेसियों को भूमिका और जिम्मेदारियां सौपनी होंगी और अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना होगा| एक कृषि ऋण निति की जरुरत है| ग्रामीण वितीय पद्धति में ऋण सहकारिताओं की महत्वपूर्ण स्थिति है और वैद्यनाथ समिति की सिफारिशों पर अमल करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए|

कृषि एक बहुत जोखिम वाला आर्थिक कार्यकलाप है| बिना बीमे के ऋण एक अतिरिक्त जोखिम कारक है| किसानों को उपभोक्ता-अनुकूल बीमा साधनों की जरुरत है जिनके अंतर्गत बुवाई से लेकर फसलोत्तर कामकाज को और साथ ही किसानों को वित्तीय संकट  से बचाने के लिए देशभर में सभी फसलों के सम्बन्ध  में बाजार जोखिमों को भी कवर किया जाए और इस प्रकार कृषि को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाया जाए| फसल हानि का आकलन करने के लिए  उपग्रह छवि और कृषि-जलवायु विश्लेषण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और इस प्रकार दावों के निपटान की प्रक्रिया में तेजी आ सकती हैं|

गांवों  में ऋण और बीमा दोनों प्रकार की जानकारी की जरुरत है| इस काम में ज्ञान चौपाल सहायक हो सकती हैं|

महिलाओं पर उनकी भू-हकदारी/समर्थन के आभाव के कारण विशेष ध्यान दिए जाने की जरुरत है| महिलाओं को समर्थन के रूप में घर/कृषि के संयुक्त पट्टे के साथ किसान ऋण शीघ्रतापूर्वक जारी किये जाने चाहिए| तब तक, पति, पुरुष रिश्तेदार तथा स्थानीय मुख्य हस्तियों से इंडेमनिटी बांड/गारंटी को स्वीकार किया जाना चाहिए|

सुखा प्रधान क्षेत्रों में, फसल ऋणों के लिए जोखिम के प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए, 4-5 वर्ष की वापसी अदायगी का चक्र होना चाहिए|

सहकारिताएं

सहकारिताओं को, विशेषरूप से बैंकिंग, विपणन, कृषि-प्रसंस्करण व अन्य कृषि-व्यवसाय में, किसानों को आदानों की आपूर्ति, उत्पादन, मूल्यवर्धन और विपणन  आदि में विद्यमान विसंगतियों को कठिनाइयों से बचाने के लिए, एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है| सहकारिताएं बुनियादी तौर पर आर्थिक उद्यम हैं (राज्य का विस्तारित अंग नहीं) उन्हें उद्यमशीलता दृष्टिकोण की जरुरत है| पारंपरिक प्रथमिकता मूल्यसृजन कार्यकलापों के समबन्ध में उपयुक्त उद्यम बल प्रदान करके प्रतिस्पर्द्धात्मक प्राथमिकता प्राप्त करनी है और निजी व सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों के साथ उपयुक्त महत्वपूर्ण गठबंधनों का निर्माण करना है| ऐसे साधन और उपाय खोजने की जरुरत है जिनके जरिए किसान बाजार माध्यमों पर अधिक नियंत्रण प्राप्त कर सकें तथा अपने अवसरों में सुधार कर सकें|

नीति और क़ानूनी रुपरेखा की समीक्षा करनी होगी जिसके अंतर्गत सहकारिताएं कार्य कर रही हैं जिससे कि उनके लिए समर्थनकारी परिवेश कायम हो सके और राज्य कानूनों द्वारा आरोपित कठोर नियंत्रणों और विनिमयों के बगैर अपने कामकाज व्यवसायिक जैसे ढंग से चलाने के लिए स्वायत्तता प्राप्त हो सके| किसानों को अपनी पूर्ण क्षमता के साथ किसानों की सेवा करने तथा सफल होने के लिए सहकारिताओं को स्वैच्छिक, सदस्य प्रेरित और मुख्यतः स्वःविनियामक संगठनों के रूप में, स्व-सहायता के सिद्धांतों पर कार्य करते हुए, कार्य करने के जरूरत है| सहकारिताओं के प्रबंधन को व्यवसायीकृत बनाने की जरुरत है जिसमें चुने गए सदस्यों के कार्य और व्यवसायिक प्रबंधकों के कार्य का स्पष्ट रूप से सीमांकन किया जाए| आडिट तथा लेखांकन पद्धतियों में भी सुधार करना होगा जिससे कि उन सभी को अधिक विश्वास प्राप्त हो सके जो उनसे सम्बन्ध हैं|

आर्थिक उदारीकरण और बाजार प्रतिस्पर्द्धात्मकता को देखते हुए, सहकारिताओं की सफल होने के लिए कहीं अधिक पूंजी व अन्य वित्तीय संसाधनों की जरुरत होगी| क़ानूनी रुपरेखा और विनियामक पद्धति में परिवर्तनों से पूंजी/वित्तीय संसाधनों तक सहकारिताओं के लिए और अधिक सुलभता में मदद मिलेगी|

विस्तार, प्रशिक्षण और ज्ञान संयोज्यता:

वैज्ञानिक जानकारी और धरातल पर कार्य के बीच काफी अधिक अंतर है| इस ज्ञान आभाव को तेजी से दूर किया जाना चाहिए जिससे कि छोटे खेतों की उत्पादकता और लाभप्रदता में वृद्धि हो सके और एक लघु फार्म प्रबंधन क्रांति शुरू की जा सके| कृषि विज्ञान केन्द्रों में तत्काल फसलोत्तर प्रौद्योगकी स्कंध और प्रयोगशालाएं जोड़ी जानी चाहिए और फसलोत्तर प्रौद्योगिकी, कृषि प्रसंस्करण व प्राथमिक उत्पादों में मूल्यवर्धन का काम शुरू किया जाना चाहिए ताकि भुमिहीन श्रमिक परिवारों को गाँवों में दक्ष नौकरियां प्रदान की जा सकें| विद्यमान विस्तार कार्मिक के पुनः प्रशिक्षण व पुनः सज्जित करने के अलावा, किसान तक जानकारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| इस प्रयोजनार्थ उत्कृष्ठ किसानों  के लिए राष्ट्रीय रूप से मान्य पुरस्कारप्राप्त किसानों के खेतों में फार्म स्कूल स्थापित किये जा सकते हैं| किसान से किसान तक जानकारी से फसल और पशुपालन, मत्स्यपालन और कृषि वानिकी के प्रौद्योगिकीय उन्नयन की प्रक्रिया में तेजी आएगी| प्रख्यात बागबानिविदों के खेतों में भी फार्म स्कूल स्थापित किये जा कसते हैं जिनमें वे किसान भी शामिल हैं जो आर्गनिक रूप से सब्जियां तथा टिशु कल्चर प्रचारित रोपण सामग्री उगा रहे हैं|

प्रत्येक गाँव में एक ज्ञान चौपाल स्थापित करके आई सी टी का उपयोग किया जाना चाहिए| सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डी आई टी), भारत सरकार के साझा सेवा केन्द्र कार्यक्रम का उद्देश्य इस महत्वपूर्ण प्रोद्योगिकी के उपयोग में सामाजिक समावेश का होना चाहिए| आई सी टी आधारित ज्ञान पद्धति की संरचना निम्न प्रकार होगी:

  1. ब्लॉक स्तर: भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन की सहायता से ग्राम संसाधन केंद्र (वी आर सी) की सथापना
  2. ग्राम स्तर: सी एस सी कार्यक्रम की मदद से स्थापित ज्ञान चौपाल
  3. अंतिम मील और अंतिम व्यक्ति तक संयोज्यता : इसे या तो इंटरनेट-सामुदायिक रेडियो अथवा इंटरनेट-मोबाइल फोन तालमेल के जरिए पूरा किया जा सकता है|

छोटे पैमाने की खेती की कार्यकुशलता और अर्थशास्त्र में सुधार करने के लिए ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों को सही समय और स्थान पर ही सूचना से सज्जित करना जरुरी है| इस क्षेत्र में, जन संचार साधनों, विशेष रूप से रेडियो, दूरदर्शन और स्थानीय भाषा समाचार-पत्रों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है|

सामाजिक सुरक्षा

आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, किसानों को, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों और भूमिहीन कृषि श्रमिकों को, एक व्यापक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा स्कीम के अंतर्गत लाना जरुरी है| ऐसी स्कीम के अंतर्गत, परिवार के किसी सदस्य की बीमारी के मामले में अस्पतालीकरण के लिए अधिकतम सीमा तक प्रसूति, जीवन बीमा और वृद्धावस्था पेंशन के सम्बन्ध में व्यव को शामिल किया जाना चाहिए| इसके तहत व्यवसायिक खतरों से बचाव को भी शामिल किया जाना चाहिए| इसके अलावा, “बंद मौसम” अवधि के दौरान मछुवारे परिवारों के लिए निर्वहन भत्ता कम से कम 1500 रूपये प्रति मास होना चाहिए| असंगठित क्षेत्रक में किसानों के लिए ऐसी एक व्यापक स्कीम शुरू करने के लिए सरकार को आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए जिससे किसान परिवारों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित हो सके| कम से कम असंगठित क्षेत्रों में उद्यमों हेतु अर्जुन सेनगुप्ता आयोग की सिफारिशों को किसान परिवारों की जरूरतों के अनुसार उपयुक्त रूप से अपनाया जा सकता है|

आश्वस्त और लाभ विपणन अवसर

कृषि उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने में आश्वस्त और लाभप्रद विपणन अवसर सतत प्रगति की कुंजी है| पहले ही केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा अनेक महत्वपूर्ण बाजार सुधार प्रारंभ किये गए हैं| राज्य सरकारों को शीघ्रता से ऐसे सुधार आयोजित करने होंगे जिससे कि किसानों को अपना उत्पाद बेचने, सहकारिताओं सहित निजी क्षेत्रक को छूट देने, उपभोक्ताओं को सीधे ही बिक्री प्रोत्साहित करने और बाधाओं व भष्टाचार और उत्पीड़न को दूर करने के लिए और अधिक अवसर प्राप्त हो सकें| किसानों को बाजार उतार-चढ़ाव से अधिक संरक्षण प्रदान करना होगा| आवश्यक महत्वपूर्ण उपाय है:

  1. न्यूनतम समर्थन कीमत (एम एस पी) पद्धति को देशभर में और अधिक प्रभावी ढंग से विकसित, कार्यान्वित और संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए| एम एस पी में बढ़ती आदान लागतों के अनुरूप वृद्धि की जानी चाहिए|
  2. इसी प्रकार, बाजार हस्तक्षेप स्कीम (एम एस पी) को आकस्मिकताओं की स्थिति में, विशेष रूप से वर्षापोषित क्षेत्रों में संवेदनशील फसलों की मामले में, शीघ्रता के साथ अमल में लाया जाना चाहिए|
  3. सामुदायिक खाद्यान बैंकों की स्थापना से अल्प प्रयुक्त फसलों के विपणन में मदद मिलेगी और इस प्रकार कृषि जैव-विविधता के संरक्षण में आर्थिक रूचि पैदा होगी|
  4. भारतीय किसान बड़ी मात्रा में स्वास्थ्य खाद्य और जड़ी-बूटी औषधियां पैदा कर सकते हैं और कठोर कोटि नियंत्रण तथा प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं के तहत उनका विपणन कर सकते हैं|
  5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी डी एस) व्यापक होनी चाहिए और इसके तहत पोषक मिलेट्स व अन्य अल्प-प्रयुक्त फसलों को भंडारित व बेचने के जरिए खाद्य सुरक्षा समूह (बास्केट) के विस्तार का काम किया जाना चाहिए|

किसानों को भू-उपयोग निर्णयों/निवेशों आदि के सम्बन्ध में मौसमविज्ञानीय, विपणन और प्रबंधन सूचना के आधार पर प्रमाणिक सलाह की जरूरत है| पुनर्गठित भू-उपयोग बोर्डों को, जिनकी तकनीकी विशेषज्ञों/एजेंसियों के एक दल द्वारा सहायता की जाए, यह सेवा प्रदान करनी चाहिए| फसलोत्तर हानियों को न्यूनतम करने के लिए आधाभूत ढांचा कायम करना होगा| किसान संगठन व सहकारिताओं तथा छोटे किसान संपदाओं जैसी अन्य इकाइयों की स्थापना करके किसानों की सामूहिक शक्ति को मजबूत बनाना होगा ताकि उनके साथ उचित बर्ताव हो और वे सही पैमाने पर अर्थव्यवस्थाओं का लाभ उठा सकें | किसानों को, विशेष रूप से छोटे सीमांत किसानों को, रेहन ऋणों की जरूरत है ताकि वे मजबूरन बिक्री से बच सकें और अपने उत्पाद को कीमत अनुकूल होने पर बेच सकें| भाण्डागार रसीदों  की परक्राम्यता  सुधारने में आने वाली बाधाओं को भी दूर करने की जरूरत है|

एक भारतीय व्यापार संगठन (आई टी ओ) की स्थापना करने की जरूरत है, जो आजीविका सुरक्षा वर्ग उपलब्ध कराकर किसानों और मछुवारे परिवारों के हितों की रक्षा करेगा| आजीविका सुरक्षा वर्ग में, उन स्थितियों में आयातों पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाने और अथवा आयात टैरिफ में वृद्धि करने का प्रावधान होना चाहिए जब कतिपय  जिन्सों का आयात बड़ी संख्या में किसान परिवारों के कार्य और आय के लिए हानिकारक होगा| इस बात पर बल दिया जाता है कि औद्योगीकृत देशों में पूंजी, सब्सिडी और प्रौद्योगिकी प्रेरित विपुल उत्पादन वाली कृषि तथा भारत में कमजोर समर्थन सेवाओं, भारी ऋण और “संसाधन व प्रौद्योगिकी अभाव” से पीड़ित ‘जन समूह उत्पादन वाली” कृषि में कोई बराबरी नहीं हैं| भारतीय एकल बाजार से भी किसान-अनुकूल गृह-बाजार के प्रोत्साहन में मदद मिल सकती है| कृषि में हमारी व्यापार नीतियों की आधार रेखा कृषि परिवारों का आर्थिक कल्याण और आजीविका सुरक्षा होनी चाहिए| ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे ग्रामीण भारत में रोजगार अवसरों में कमी आये|

उन जिन्सों के सम्बन्ध में जिनका निर्यात किया जाता है, उनका डब्ल्यू टी ओ विनियमों  के अनुरूपों होना अनिवार्य है| इस समय, ऐसी वस्तुएँ देश में कुल कृषि उत्पादन का लगभग 7% हैं| देशभर में गुणवत्ता और व्यापार जानकारी कार्यक्रम शुरू करने होंगे|

विदेश कृषि व्यापार के लिए उपलब्ध अवसरों के बारे में जानकारी का प्रसार करके प्रतिस्पर्द्धात्मक शर्तों पर निर्यात करने में किसान एसोसिएशनों और एस एच जी की मदद की जानी चाहिए| कृषि-निर्यात क्षेत्रों को और मजबूत बनाया जाना चाहिए और वे स्थान ऐसे हों जहाँ किसानों को अपने उत्पाद के लिए संभव सर्वाधिक कीमत प्राप्त होगी| भारतीय कृषि का भविष्य उस कार्यकुशलता और गम्भीरता पर निर्भर करेगा जिसके साथ किसान-अनुकूल विपणन पद्धितियां लागू की जाएँगी|

किसानों को उनके  उत्पाद के लिए लाभप्रद कीमतों की दृष्टि से और उपभोक्ताओं को खाद्यानों के लिए उचित और वहनीय कीमत की दृष्टि से न्याय सुनिश्चित करने के दोहरे लक्ष्य को (65% उपभोक्ता किसान भी है) निम्नलिखित समेकित कार्यनीति के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है:

  1. एम एस पी तथा खरीद सम्बन्धी कामकाज दो अलग-अलग बातें हैं और इन्हें इसी प्रकार से चलाया जाना चाहिए| सरकार को यह सुनिश्चित करने के जरूरत है कि किसानों (जो अधिकांश उपभोक्ताओं का एक बड़ा भाग भी है) और शहरी उपभोक्ताओं, दोनों के साथ उचित बर्ताव हो| एम एस पी की घोषणा किये जाने के बाद इसके संचालन की लागत में वृद्धि होने की बात पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाए| सरकार को पी डी एस के लिए आवश्यक खाद्यानों की खरीद किसानों को निजी व्यापारियों द्वारा अदा की जाने वाली कीमतों पर करनी चाहिए| इस प्रकार, खरीद कीमतें एम एस पी से अधिक हो सकती हैं और वे बाजार की स्थितियों को परिलक्षित करेंगी| देशभर के सभी क्षेत्रों में एम एस पी को संरक्षण प्रदान करने की जरुरत है|
  2. खाद्य सुरक्षा वर्ग का विस्तार करके उसमें शुष्क कृषि क्षेत्रों की फसलों को शामिल किया जाना चाहिए, जैसे की बाजरा, ज्वार, रागी, लघु मिलेट्स और दालें| पी डी एस के अंतर्गत, उचित एम एस पी पर ख़रीदे गए ये पोषक अनाज और दालें समिल्लित की जानी चाहिए| यह शुष्क भूमि किसान और उपभोक्ता दोनों के लिए ही एक सुखद स्थिति  होगी| हम न तो दूसरी हरित क्रांति प्राप्त कर सकते हैं और न ही शुष्क भूमि खेती में कोई खास प्रगति हो सकती है जब तक की किसान अपने उत्पाद के लिए आश्वस्त  न हों और उन्हें लाभप्रद कीमतें प्राप्त न हों|
  3. कृषि लागत और कीमत आयोग (सी ए सी पी) एक स्वायत्त सांविधिक संगठन होना चाहिए जिसका मुख्य कार्य शुष्क-खेती और सिंचित क्षेत्रों दोनों की प्रमुख कृषीय जिन्सों की लाभप्रद कीमतों की सिफारिश करना प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए| न्यूनतम समर्थन कीमत (एम एस पी) उत्पादन की भारित औसत लागत से कम से कम 50% अधिक होनी चाहिए| किसानों की “वास्तविक घर ले जाने वाली आय” सिविल सेवकों के तुलनीय होनी चाहिए| सी ए सी पी, किसानों और खेती की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज होना चाहिए| आश्वस्त बाजार संयोजनों के जरिए फसल के विविधिकरण के लिए सुझाव पहले दिए जाने चाहिए| सी ए सी पी के सदस्यों में कुछेक अभ्यासरत महिलाएं और पुरुष किसान सम्मिलित होने चाहिए| सी ए सी पी के सन्दर्भ विषयों और दर्जें की समीक्षा करने तथा उसमें उपयुक्त रूप से संशोधन करने की जरूरत है|

  4. पाठ्यक्रम सुधार

कृषि/पशु विज्ञान विश्वविद्यालय

“प्रत्येक छात्र एक उद्यमी” इन विश्वविद्यालयों का लक्ष्य होना चाहिए| इसके लिए व्यवसाय प्रबंधन सिद्धांतों को प्रमुख अनुप्रयुक्त पाठ्यक्रमों के साथ एकीकृत करने की जरुरत होगी| इसके साथ ही, कृषि विश्वविद्यालयों को अपनी पाठ्यचर्या इस ढंग से तैयार करनी चाहिए कि खेती में महिलाओं और पुरुषों की सापेक्ष भूमिका को स्वीकारा जाए तथा इन्हें प्रौद्योगिकीय रूप से सशक्त बनाया जाये| विश्वविद्यालयों के गृह विज्ञान कॉलेजों का मानव विज्ञान कॉलेजों के रूप में पुनर्गठन किया जाए जहाँ पुरुष और महिला दोनों पोषाहार और फसलोत्तर प्रौद्योगिकी जैसे विषयों में निपुणता प्राप्त करें| खाद्य की सुरक्षित हेन्डलिंग तथा गाँवों में गुणवत्ता जानकारी अभियान प्रोत्साहित करने के लिए क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा और संरक्षण संस्थानों की एक कड़ी स्थापित करने के जरुरत है| इससे, मापदंडों से खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित स्वच्छता व पादपस्वच्छता तथा कोडेक्स एलिमेनटेरियस मानकों से निपटने में हमारी क्षमता को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी|

विस्तार व अन्य सेवाएं प्रदान करने के लिए कृषि स्नातकों को पंजीकृत कृषि अभ्यासकर्ताओं के रूप में मान्यता प्रदान करके उन्हें सम्मान प्रदान करने की एक पद्धति तैयार की जानी चाहिए| ऐसा प्रत्यायन प्रदान करने के लिए मेडिकल और वेटीरीनरी परिषदों की तरह ही एक अखिल भारत कृषि परिषद कायम करने की जरुरत है जो कृषि अभ्यासकर्ताओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता व विश्वसनीयता सुनिश्चित करने का एक एक निगरानी तंत्र भी होगा| स्नातकों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाने के लिए आई आई टी और आई आई एम की तरह कुछ कृषि उत्कृष्टता केन्द्र (फसल और पशुपालन, मात्स्यिकी और वानिकी) स्थापित किये जाने चाहिए| आई सी टी द्वारा प्रस्तुत नए अवसरों को ध्यान में रखते हुए देश के छात्रों के बीच एक अध्ययन क्रांति प्रोत्साहित करने के वास्ते नई शिक्षाशास्त्रीय पद्धति लागू की जानी चाहिए| विश्वविद्यालय केन्द्रों में रोजगार और व्यवसाय परामर्श केन्द्र तथा स्व-रोजगार अवसरों में बारे में जागरूकता पैदा करने के वास्ते एक एक-स्थल खिड़की भी कायम की जानी चाहिए|

किसानों की विशेष श्रेणियां

जनजातीय किसान

देश की कुल आबादी में अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा 8.6 प्रतिशत है| देशभर में अधिकांश जनजातीय समुदाय अपनी आजीविका के लिए वनों और पशुपालन पर निर्भर हैं इनमें खेती करना (बहुत से भागों में झूम खेती), ईंधन, चारा और अनेक प्रकार के गैर-इमारती वन उत्पाद एकत्र करना शामिल है| किसानों की श्रेणी के अन्दर जनजातीय किसान सर्वाधिक अलाभ की स्थिति में हैं|

इन समुदायों के पास वन क्षेत्रों  के स्वामित्व के लिए परम्परागत मानदंड हैं और उनके पास संरक्षण व पुनरुद्धार के सम्बन्ध में समुदाय आधारित पद्धतियां भी हैं| इसके साथ ही, वन क्षेत्रों का संरक्षण और परिरक्षण राज्य वन विभागों के नियंत्रण और प्रशासन के तहत है| उन क्षेत्रों का सीमांकन करने के लिए, जिनका उपयोग और प्रबंधन वन निवासी समुदायों द्वारा किया जाता है अथवा इन समुदायों को क़ानूनी अधिकार और हक प्रदान करने के लिए कोई व्यवस्थित प्रयास नहीं किये गए हैं, वन विभाग और वन निवासी समुदायों के बीच सम्बन्ध मुख्यतः विवादास्पद और मुकाबलापूर्ण रहे हैं, जिसमें वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों को ‘अतिक्रमणकारी’ का नाम दिया जाता ही| वन समुदायों को प्रायः रिश्वत और जुर्माने के तौर पर अदायगी करके अपनी आजीविकाएं चलानी होती हैं| कुछ राज्यों में संयुक्त वन प्रबंधन के प्रयास सफल रहे हैं| तथापि, ये फैले हुए हैं और न ही सामान्यतः वे लिंग संवेदी हैं|

बड़ी विकास परियोजनाओं ने भी, जिनमें बांध और खान शामिल हैं, वन क्षेत्रों का भारी मात्रा में अतिक्रमण किया है तथा कई हजार वन निवासी समुदायों को विस्थापित किया है जो अभी भी मानव-केन्द्रित पुनर्वास प्रयासों के अभाव में अपनी उत्तरजीविता के लिए संघर्ष कर रहे हैं| बहुत से मामलों में, भू-शीर्षकों के अभाव में, उनके अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारा जाता है|

देश में वन क्षेत्रों के प्रबंधन के प्रयासों में पारिस्थितिकीय संरक्षण के लिए मांग और साथ ही वन निवासी समुदायों की आजीविका संरक्षित रखने के लिए भी मांग के बीच संतुलन रखना होगा| इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय उपयोगी होंगे:

  1. अब तक अन निवासियों (जनजातीय और गैर-जनजातीय दोनों) के परम्परागत अधिकार क्षेत्र से सम्बन्धित अधिकारों का एक स्पष्ट विवरण, जिसमें पारंपरिक रूप से कब्जे वाली भूमि और पारपरिक रूप से प्रयुक्त संसाधन शामिल हैं|
  2. एक ऐसी स्पष्ट प्रक्रिया जिससे वैध भू-अधिकार-धारकों का पता लगाया जा सके और रिकार्ड किया जा सके तथा इसके विपरीत जिसके जरिए हाल ही के अतिक्रमणकारियों व अन्यों ला पता लगाया सके और उन्हें वंचित किया जा सके जो निहित स्वार्थों के लिए वन निवासियों का लाभ उठाते रहे हैं|
  3. संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रावधान, जिनमें वन्यजीवन/जैव-विविधिता/वन कानूनों के प्रावधानों को प्राथमिकता प्रदान करना शामिल है, जो संरक्षण सुनिश्चित  करने के लिए बनाये गए हैं तथा संरक्षित क्षेत्रों व आशंकित प्रजातियों पर विशेष बल दिया जाए|
  4. उन संस्थागत प्रणालियों में परिवर्तनों को मजबूत बनाना जिनसे निर्माण की प्रक्रिया में और अधिक भागीदारी हो सके|
  5. स्पष्ट प्रावधान जिनसे वन-निवासी समुदाय “नहीं’ कहने में अथवा “विकास” परियोजनाओं में परिवर्तन की मांग करने में समर्थ हो सकें जो उनकी भूमियों अथवा संसाधनों का अतिक्रमण करती हैं|
  6. वार्ता, परामर्श, सूचना की भागीदारी आदि की नियमित और मुक्त प्रक्रिया की व्यवस्था जिसमें समुदायों, एन जी ओ, अधिकारियों व अन्यों को शामिल किया जाए|
  7. स्पष्ट मानिटरण प्रावधान, जिनसे यह सतत रूप से चैक हो सके कि क्या अधिकारों का सम्मान हो रहा है अथवा नहीं और और साथ ही कि क्या अधिकारों का इस्तेमाल करने में संरक्षण प्रतिमानों का सम्मान किया जा रहा है|

लोगों तथा संरक्षित क्षेत्रों के बीच विवाद का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र पशुधन, फसल अथवा पशुओं द्वारा जीवन को हुई क्षति के लिए क्षतिपूर्ति की समस्या है| राज्यों द्वारा, मानव जीवन, पशुधन और फसल क्षति के लिए क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में प्रावधानों व प्रक्रियाओं की समीक्षा की जानी चाहिए| उन प्रभावित परिवारों को भी क्षतिपूर्ति की अदायगी की जानी चाहिए जो “रिजर्व’ के अंदर रहना जारी रखते हैं| “रिजर्व” के इर्द-गिर्द संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम की पुनर्संरचना की जानी चाहिए ताकि आस-पास रहने वाले लोगों को प्रबंधन निर्णयों और वनों के उत्पाद पर अधिकारों की जानकारी की जा सके| इससे संसाधनों की उत्पादकता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी|

अन्य मुद्दे इस प्रकार हैं:

  1. समुदाय को भूमि सौपना, किसानों के पास हस्तांतरण अधिकारों का अभाव और कतिपय क्षेत्रों में भूमि पर प्रभार/रेहन रखने में समस्याएं संस्थागत ऋण की उपलब्धि में बाधक हैं| कठिनाइयों पर काबू पाने में सार्थक, प्रतिस्थापन और प्रलेखन प्रक्रियाओं की नवीन पद्धतियाँ विकसित करने की जरूरत है|
  2. जनजातीय परिवारों ने समृद्ध कृषि-जैव विविधिता का संरक्षण किया है| अनेक परम्परागत फसलें अब समाप्त होती जा रही हैं| समाप्त होती जा रहीं फसलों और मरते हुए ज्ञान को संरक्षण में आर्थिक हिस्सेदारी पैदा करके बचाना होगा|

चारणिक

अनुसूचित जनजाति (वन अधिकारों को मान्यता) विधेयक 2005 के अंतर्गत ‘उपयोगों के अधिकारों और हक़दारियों की, जैसे कि, वनों में चराई और खानाबदोश अथवा चारणिक समुदायों की पारंपरिक मौसमी संसाधन सुलभता की परिकल्पना की गई है| इस विधान को अभी संसद द्वारा पारित किया जाना है| अनेक संयुक्त वन प्रबंधन समितियों का उद्देश्य गैर-इमारती वन उत्पादों की सुलभता के लिए जनजातीय परिवारों और चारणिकों को अवसर प्रदान करना है| चारणिकों की आजीविका का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित उपाय जरुरी है:

  1. वन क्षेत्रों में पारंपरिक चारागाह अधिकार और रहने के अधिकारों की बहाली, जिनमें वन्यजीवन आश्रयस्थल और राष्ट्रीय उद्यान तथा वे क्षेत्र भी शामिल हैं जो ग्राम आम भूमियों में चारागाह प्रयोजन के लिए विनिश्चित हैं|
  2. देशज पशु प्रजातियों वाले पारंपरिक चारणिकों/पशुपालकों तथा उन व्यक्तियों  की हकदारियों के औपचारीकरण की व्यवस्था (स्थायी चारागाह कार्ड जारी करने सहित) जिससे कि अधिसूचित अथवा सीमांकित चारागाह स्थलों और प्रवास मार्गों के लिए उनकी मुक्त सुलभता सुनिश्चित हो सके|
  3. जब कभी भी कोई वृक्षारोपण कार्यक्रम कार्यान्वित किया जाये, तभी सम्बन्धित प्राधिकारियों द्वारा पशुओं के लिए वैकल्पिक चारागाह भूमियों और पेय जल संसाधनों का आबंटन किया जाये| कोई वनारोपण कार्यक्रम शुरू करने से पहले कार्यान्वन एजेंसियों के लिए यह अनिवार्य बनाया जाना चाहिए कि वे वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों से, जिनमें चारणिक शामिल है, पूर्व सहमति प्राप्त करें| वन क्षेत्र को वृक्षारोपण प्रयोजनार्थ पूरी तरह से बंद करने की बजाय चराई की बारी-बारी वाली पद्धति को प्रोत्साहित किया जाये|
  4. पारंपरिक पशुधन/प्रजातियों का संरक्षण करने वाले स्थानीय समुदायों/व्यक्तियों के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को मान्यता और संरक्षण प्रदान करने के लिए देशज पधुधन प्रजातियों का सघन प्रलेखन, श्रेणीकरण किया जाना चाहिए|
  5. चारणिकों को सभी स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों प्रबंधन कार्यक्रमों में, ग्राम वन समितियों सहित, शामिल किया जाना चाहिए|
  6. वन विभागों को सौपी गई आम भूमि और प्रयुक्त अथवा अतिक्रमित भूमि को वापस लिया जाना चाहिए और चारागाह विकास हेतु ग्राम स्तरीय समुदायों अथवा तृणमूल संस्थानों के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए|

अन्य श्रेणियां

उपरोक्त दो श्रेणियों के अलावा, स्पष्ट और विशेष जरूरतों वाले अनेक छोटे समूह हैं, जैसे कि छोटे बगान किसान, द्वीपसमूह किसान तथा शहरी किसान|

बागान श्रमिक

बड़ी संख्या में छोटे किसान चाय, कॉफी, रबड़, इलायची, काली मिर्च और वनिला जैसे  फसलों की रोपण की खेती में लगे हुए हैं| कीमत उतार-चढ़ाव तथा विदेश से आयातित उत्पादों से प्रतियोगिता कुछेक उन बड़ी समस्याओं में शामिल हैं जो उन्हें पेश आ रही हैं| उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए एक कीमत स्थिरीकरण निधि से मदद मिल सकती हैं|

द्वीपसमूह किसान

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्ष्यद्वीपसमूहों में कृषि और मछुवारे परिवारों पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरुरत है| उनकी जरूरतों में प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण, तकनीकी अवस्थापना और व्यापार के क्षेत्र शामिल हैं| द्वीपसमूह कृषि में परिवहन लागतों की भी समस्या है, विशेष रूप से मीन जैसी नश्वर वस्तुओं के सम्बन्ध में, जिन्हें मुख्य भूमि में बेचना होता है| अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों में अनेक प्राचीन जन जातियां हैं जिनका एक समृद्ध पारंपरिक ज्ञान और बुद्धि है| जैव-विविधता संरक्षण और परम्परागत स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्रों में उनके देशज ज्ञान को मान्यता प्रदान करने व पुरस्कृत करने के लिए उपाय किये जाने चाहिए| द्वीपसमूह बागबानी के लिए भी, जिसमें नारयिल बागान शामिल हैं, उपयुक्त स्थल हैं| किन्तु विशेष स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ हैं| इसलिए राष्ट्रीय बागबानी मिशन और राष्ट्रीय ग्राम स्वास्थ्य मिशन, दोनों के अंतर्गत द्वीपसमूहों की किसानों और मछेरों की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए| बढ़ती वैश्विक ऊष्मा के कारण समुद्र के स्तर और सुनामी जैसी आपदाओं की स्थिति में द्वीपसमूहों में जीवन और आजीविकाओं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से मेनग्रोव व आधारित बायोशिल्डों  के निर्माण जैसे उपाय किये जाने चाहिए|

शहरी किसान

शहरी गृह उद्यान, सब्जियों और फलों की खेतों और खपत के माध्यम से पोषाहार सुरक्षा सुधारने में पर्याप्त योगदान कर सकते हैं| निम्न आय समूहों के मामले में गृह पोषाहार उद्यान इस ढंग से तैयार किये जा सकते हैं कि वे खुराक में लघु पोषकों की कमी जैसी बड़ी पोषाहार  विषमताओं के लिए बागबानी सम्बन्धी उपचार उपलब्ध करा सकें| अच्छे बीजों और रोपण सामग्री तथा सुरक्षित पादप संरक्षण तकनीकों के रूप में सहायक सेवाओं की जरुरत होगी| पोषाहार उद्यानों के माध्यम से कुपोषण का मुकाबला करने के लिए शहरी मलिन बस्तियों पर विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी|

खेती की विशेष श्रेणियां

आर्गेनिक खेती

भारत में आर्गेनिक खेती अभियान, अनुसंधान, विस्तार और विपणन के क्षेत्रों में संस्थात्मक सहायता के अभाव से पीड़ित है| आर्गेनिक खेती के लिए रसायनिक खेती की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक सहायता की जरुरत है| “कृषि विज्ञान केन्द्रों” को आर्गेनिक खेती में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए सज्जित किया जाना चाहिए| अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत प्रमाणन प्रक्रियाओं को भी सुदृढ़ किये जाने की जरूरत है और वे किसान-अनुकूल व वहनीय होनी चाहिए| आर्गेनिक खेती क्षेत्रों का विनिर्धारण किया जा सकता है जैसे कि कुछ पर्वतीय क्षेत्र और द्वीपसमूह जहाँ आजकल रसायनिक खाद का उपयोग बहुत न्यून है तथा औद्योगिक पौधों के लिए जहाँ रसायनिक कीटनाशकों और खादों को उपयोग की सलाह नहीं दी जाती| खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता मापदंड “कोडेक्स एलिमेन्टेरियस” मानकों के अनुरूप होने चाहिए क्योंकि आर्गेनिक खाद्य में भारी धातु विद्यमान रहने की प्रायः रिपोर्ट प्राप्त हुई हैं| किसानों को रसायनिक खाद/कीटनाशकों की खरीद के लिए दिए जाने वाले ऋण/सब्सिडियां, आर्गेनिक खादों के लिए भी, जैसे कि फार्म यार्ड खाद, कम्पोस्ट और जैव-उर्वरक व जैव-कीटनाशकों के लिए, उपलब्ध होनी चाहिए| आर्गेनिक खेती के कार्य में लगे किसानों को महत्वपूर्ण बाजारों से जोड़ा जाना चाहिए जहाँ प्रीमियम कीमत प्राप्त होगी जिससे कि पैदावार में होने वाली किसी क्षति की प्रतिपूर्ति हो सके| आर्गेनिक खेती के लिए कृषि-क्लिनिक व कृषि-व्यवसाय केंद्र स्थापित करने के लिए कृषि स्नातकों की मदद ली जा सकती है|

हरित क्रांति

एकीकृत कीट प्रबंधन, एकीकृत पोषक आपूर्ति वैज्ञानिक जल प्रबंधन, और एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और सुधरी फसलोत्तर प्रौद्योगिकी वाली हरित क्रांति “सदैव हरित क्रान्ति” एक एक मार्ग है| आर्गेनिक खेती के विपरीत, हरित कृषि के अंतर्गत खनिज उर्वरकों और रसायनिक कीटनाशकों का सुरक्षित और न्यूनतम उपयोग व जेनेटिक संशोधन द्वारा विकसित फसल प्रजातियाँ सम्मिलित हैं| हरित कृषि उत्पादों पर भी एक विशिष्ट लेबलिंग होनी चाहिए, जैसा कि आर्गेनिक  खेती की मामले में होता है|

जेनेटिकली संशोधित फसलें

एक व्यवसायिक के नेतृत्व में राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण की स्थापना से जी एम फसलों से जुड़े जोखिमों और लाभों का एक विश्वसनीय व पारदर्शी ढंग से आकलन करने में मदद मिलेगी| यह महत्वपूर्ण है कि जेनेटिक संशोधन में ऐसे जीनों को शामिल करने को प्राथमिकता दी जाए जिनसे सूखे, लवणीय व अन्य दबावों के अवरोध में मदद मिल सके| जल उपयोग कार्यकुशलता और पोषणात्मक तथा प्रसंस्करण गुणवत्ता में सुधार को भी अनुसंधान कार्यसूची में प्राथमिकता प्रदान करनी होगी| प्रत्येक पंचायत में प्रशिक्षित किये जाने वाले ग्राम स्तरीय कृषि विज्ञान प्रबंधकों को जी एम फसल प्रजातियों के सम्बन्ध में के  कृषीय प्रबंधन प्रक्रियाओं से परिचित कराना होगा, जैसे कि पुरानी प्रजाति के आश्रय (रेफ्यूज) की खेती ताकि कीटों और रोगजनकों में परिवर्तन द्वारा उत्पादन जी एम प्रजाति में अवरोध की हानि को रोका जा सके|

संरक्षित (ग्रीनहाउस) खेती

बागबानी की तीव्र के साथ पानी और खाद उपयोग, जैसे कि उर्वरण की आर्थिक पद्धतियों की सहायता से सब्जियों, फलों और फूलों की हरित गृह खेती के अवसर विद्यमान हैं| कृषि व्यवसाय कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय बागबानी मिशन की अंतर्गत हरित गृह बागबानी शुरू करने के लिए कृषि तथा गृह विज्ञान स्नातकों को सहायता प्रदान की जा सकती है| कम लागत वाले हरित गृहों को, माइक्रो-सिंचाई व उर्वरण तकनीकों के साथ ऐसे क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाया जा सकता है जहाँ वाष्पीकरण वर्ष में अनेक महीनों के दौरान वृष्टि से अधिक होता है| ऐसी प्रौद्योगिकियों के लिए उपयुक्त सहायता प्रदान की जा सकती है जिनसे जलाभाव वाले क्षेत्रों में आय बढ़ाने में मदद मिल सके|

विशेष क्षेत्र

कठिनाईग्रस्त क्षेत्र

कृषीय कठिनाई को कम करने के लिए अनेक उपाय किये गए हैं और यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाए जहाँ न्यून जोखिम और न्यून बाह्य आदानों के प्रसार की दृष्टि से संधारणीय कृषि प्रथाएं विद्यमान हों| यह भी महत्वपूर्ण है की ऐसे क्षेत्रों में ज्ञान संयोज्यता और सामाजिक सहायता प्रणालियों को मजबूत किया जाए|

वृहद जैव-विविधता क्षेत्र

जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र पशिचमी और पूर्वी घाटों और पूर्वी हिमालयाई क्षेत्रों में विद्यमान हैं| वृहद जैव-विवधिता क्षेत्रों के संरक्षण कार्य में स्थानीय समुदायों को सम्मिलित किया जा सकता है तथा उनके योगदान को उपयुक्त रूप से मान्यता दी जानी चाहिए व पुरस्कृत किया  जाना चाहिए| ऐसे उपाय भी किये जाने चाहिए जिनसे वृहद् जैव-विविधिता वाले क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय जैव-संसाधनों को संधारणीय ढंग से आर्थिक सम्पदा में बदलने में समर्थ हो सकें| “जैव-प्रसन्नता के लिए जैव-विविधता” हेतु, स्थानीय अनुसंधान और शैक्षिक संस्थानों की मदद से एक अभियान शुरू किया जा सकता है|

द्वीपसमूह

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों और लक्ष्यद्वीप द्वीपसमूहों में किसान परिवारों की आय बढ़ाने के लिए क्षमता विद्यमान है| बागान फसलों और नारियल, वर्षाजल दोहन और कृषि प्रसंस्करण सुविधाओं पर अधिक ध्यान देंने की जरूरत है| मैन ग्रोव्ज और कोरल रीफों में समृद्ध तटीय, पारि-पद्धतियों का संरक्षण किया जाना चाहिए| ऐसे द्वीपों के युवाओं को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व संवर्धन की कला और विज्ञान में प्रशिक्षित  किया जा सकता है| ऐसे द्वीपों के लिए मिश्रित फसल पद्धति व फसल-पशु एकीकृत खेती प्रणालियाँ उपयुक्त हैं| लक्ष्यद्वीप द्वीपसमूह अपतटीय संगरोध सुविधाओं का भी केंद्र बन सकता है|

भविष्य के किसान

गैर-कृषि क्षेत्रक में कार्य अवसरों में धीमी वृद्धि के करण छोटे और आर्थिक रूप से अव्यवहार्य जोतों में वृद्धि हुई है| छोटे फार्मों की उत्पादकता में वृद्धि करना तथा फसल-पशु एकीकृत खेती प्रणालियों के जरिए अनेक आजीविका अवसर सृजित करना तथा साथ ही कृषि-प्रसंस्करण भी किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक तात्कालिक आवश्यकता है| छोटे किसानों के लिए कार्य के अवसरों की व्यवस्था करने की विधियाँ विकसित करनी होंगी तथा पैदावार व आय बढ़ाने के लिए उन्हें सभी सम्बंधितों के लिए लाभप्रद आधार पर लोकप्रिय बनाना होगा| ऐसे समूह कार्यकलापों में महिलाएं केवल तभी भाग ले सकती हैं यदि उन्हें मालिक और किसानों के रूप में मान्यता की प्रतिष्ठा प्रदान की जाए| नीचे कुछ विधियों का उल्लेख किया गया है जिन्हें छोटे औए सीमांत किसान कार्यकुशलता वव अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने के लिए अपनाने पर विचार कर सकते हैं

  1. सहकारी खेती और सेवा सहकारिताएं: पिछली पांच-वर्षीय योजना अवधियों में, सहकारी खेती पर काफी बल दिया गया| यह समाजाजिक, सांस्कृतिक और नीतिगत दोनों प्रकार की बाधाओं के कारण सफल नहीं हो स्की| यह स्पष्ट है कि छोटे किसान परिवार सहयोग से लाभान्वित होंगे, यदि वे सहकारी सोसायटियों का निर्माण न भी भी करें| सहकारिताएं डेयरी उद्योग के मामले में सफल रही हैं| विपणन सहकारिताएं सामान्यतः सफल रही हैं क्योंकि सदस्यगण समझी-बुझी आत्म-रूचि के आधार पर सहयोग करती हैं| सेवा सहकारिताओं के अन्य रूप धीरे-धीरे उभर रहे हैं, किन्तु उनकी गति को तेज किये जाने की जरुरत है| उदाहरण के लिए, सिंचाई जल सहकारिताओं की गुंजाइश है जो सामुदायिक टयूबैलों और लिफ्ट सिंचाई का संचालन कर सकती हैं| छोटे और सीमांत किसानों के लिए सहकारी खेती उपयुक्त  हो सकती है क्योंकि सहकारिताएं छोटे पैमाने पर विकेंद्रीकृत उत्पादन में सहायता प्रदान करने के लिए ट्रेक्टर व अन्य फार्म उपस्कर और साथ ही थ्रेशिंग व ड्राइंग मशीनें उपलब्ध करा सकती हैं| इससे उत्पादन की लागत में कमी आएगी और उत्पाद की कोटि में सुधार होगा तथा उससे आय में वृद्धि होगी छोटे किसानों को सहकारिताओं द्वारा प्रदत्त अनेक अवसरों से दूर रखने की बजाए, उपयुक्त सुधार लागू करने पर बल दिया जाना चाहिए जिससे सहकारिताएं छोटे किसानों के लिए अनुकूल औए सक्षम बन सकें|
  2. स्वंय-सेवी समूहों द्वारा सामूहिक खेती: अभी तक, एस एच जी का आयोजन  मुख्य रूप से लघु ऋण की मदद से महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे लधु उद्यमों को समर्थन प्रदान करने के लिए किया गया| प्रचालन जोतों की आकार में कमी होने से, समूहों को खेती की भूमि पट्टे पर देने को प्रोत्साहित करके खेती उद्यम के उत्पादन छोर पर एस एच जी को प्रोत्साहित करना उपयोगी होगा| यह, “हरित कृषि” के मामले में विशेष रो में सहायक होगा| किन्तु एस एच जी केवल तभी संधारणीय  हो सकते हैं यदि उनका प्रौद्योगिकी और ऋण के साथ पृष्ठ संयोजन और प्रसंस्करण व विपणन संगठनों के साथ अग्र संयोजन हो| इसके साथ ही एस एच जी द्वारा संचालित माइक्रोऋण बैंकों को उन्हें संधारणीय आजीविका बैंक बनने में मदद की जानी चाहिए|
  3. लघु जोत सम्पदाएँ : लघु जोत सम्पदाओं के निर्माण से, जैसे की, कपास, बागबानी, औषधीय पौधों, कुक्कट व मत्स्यपालन में, गाँव में, वाटरशेड  में अथवा एक सिंचाई परियोजना के कमान क्षेत्र में रहने वाले किसानों के बीच सामूहिक सहयोग को बढ़ाने में मदद मिलेगी| उत्पादकता में सुधार, उत्पादन की लागत में कमी और कपड़ा मिलों के साथ, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों, औषधिनिर्माण कम्पनियों के साथ और मत्स्य विपणन एंजेसियों के साथ विपणन संविदाएं निष्पादित करना कुछेक लाभ होंगे| ऐसी लघु  कृषक सम्पदाएँ ब्रांड नाम के तहत उत्पादों का विनिर्माण कर सकती हैं और आय सुरक्षा में वृद्धि कर सकती हैं जिससे समूह बीमा व्यवहार्य बन सकता है| कृषि-क्लिनिकों और कृषि व्यवसाय केन्द्रों को ऐसी सम्पदाओं से सम्बन्ध किया जा सकता है|
  4. संविदा कृषि: सहजीवी संविदाएं, जिनसे उत्पादकों और क्रेता को लाभ होगा, आश्वस्त और लाभप्रद विपणन अवसरों के सुनिश्चित हेतु उपयुक्त होंगी| इस समय, केन्द्रीय और राज्य सरकारें, भारतीय खाद्य निगम (एफ सी आई), भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन परिसंघ (नैफेड) आदि जैसे संगठनों के माध्यम से, सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन कीमत (एम एस पी) का प्रचालन सुनिश्चित करती हैं| एक सुनिश्चित आचरण संहिता के आधार पर संविदा कृषि छोटे उत्पादकों के लिए उनके उत्पाद के लिए उत्तम कोटि के आदान, उचित कीमत और तुरंत अदायगी प्राप्त करने में सहायक होगी| कृषि जिन्सों के एक बड़े समूह के लिए, जैसे कि सब्जियों, फलों, फूलों, औषधीय पौधों, कंद फसलों, तिलहनों, ईख, अनाज और कपास के सम्बन्ध में संविदा कृषि के लिए एक आचरण संहिता तैयार करनी होगी| किसान को किसी भी परिस्थिति में उसकी भूमि से वंचित नहीं किया जाना चाहिए| उपलब्ध साक्ष्य से पता

चलता है कि उत्पादक और क्रेता के बीच तथा किसी विधिक विवाद की स्थिति में हस्तक्षेप हेतु तीसरे पक्षकार के रूप में सरकार के साथ सीधा करार, छोटे किसान के लिए, मध्यवर्ती एजेंसी के माध्यम से अप्रत्यक्ष करार के मुकाबले, अधिक लाभप्रद होता है| राज्य स्तर पर एक समीक्षा समिति स्थापित की जा सकती है जिसमें किसान व उपयुक्त अधिकारीगण सम्मिलित हों, जो संविदा कृषि गैर-शोषणात्मक पद्धति का प्रसार सुनिश्चित करेगी|

  1. किसान कम्पनियां: कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2002 के अंतर्गत पंजीकृत प्राइवेट लिमिटेड कम्पनियों को अब बीज उत्पादन और जैव-उर्वरकों, जैव-कीटनाशकों व संधारणीय खेती के लिए अनिवार्य जैवकीय सोफ्टवेयर के नया रूपों के उत्पदन के क्षेत्र में पंजीकृत की जा रही हैं| छोटे किसानों और एस एच जी को ऐसी कम्पनियों में पणधारियों के रूप में, न की मात्र शेयरधारकों के रूप में, सम्बन्ध किया जाना चाहिए|
  2. राज्य फार्म: 1950 के दशक में पूर्व सोवियत संघ द्वारा प्रोत्साहित फार्मों की तरह, बड़े राज्य फार्मों के विकास पर काफी बल दिया गया था| इनमें से अधिकाशं फार्मों का उपयोग अब खाद्य फसलों के उत्पादन से इतर प्रयोजनों के लिए किया जा रहा है| राज्य फार्मों के पास उपलब्ध भूमि को फसलों और चारे से पौधों, सब्जियों, फलों और फूलों के संकर किस्म के और सुधरे बीज का उत्पादन करने के लिए, महिला एस एच जी को उपलब्ध कराया जा सकता है| इसके साथ ही, राज्यों फार्मों का उपयोग, स्थानीय प्रजातियों के पशुओं, भेड़ व कुक्कट के जर्मप्लाज्म के सजीव दाय जीन बैंकों का विकास करने के लिए किया जा सकता है जिससे कि हमारी पशु जेनेटिक सम्पदा परिरक्षित रह सके|

युवाओं को आकर्षित करना

युवाओ को एक व्यवसाय के रूप में कृषि को अपनाने के लिए तभी आकर्षित किया जा सकता है जब खेती आर्थिक रूप से लाभप्रद और बौद्धिक रूप से प्रेरणादायक बन जाए| इस दिशा में जैव-प्रौद्योगिकी, सूचना और प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय उर्जा प्रौद्योगिकियां, अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी आदि जैसे नई प्रौद्योगिकियां मदद कर सकती हैं|  कम ब्याज वाले ऋणों के साथ एक उद्यम पूंजी निधि के गठन और देश के अन्दर व बाहर से रोजगारों की आउटसोर्सिंग करने के लिए कृषि क्लिनिक व उत्पादन-सह-प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करने के लिए परती भूमि के आबंटन के जरिए शिक्षित युवाओं की सहायता की जानी चाहिए जिससे कि भारत एक प्रमुख कृषि आउटसोर्सिंग हब के रूप  में उभर सके| पारि-कृषि एक ज्ञान गहन पद्धति है, इसलिए यह सुनिश्चित करने की जरुरत है कि बड़ी संख्या में शिक्षित युवा पुरुष और महिलाएं अपने व्यवसाय के रूप में खेती और कृषि सम्बद्ध उद्यमों को अपनाएँ| यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ युवा उद्यमियों और प्राइवेट सेक्टर के बीच सहयोगात्मक भागीदारी लाभप्रद होगी|

संधारणीय आजीविकाओं के लिए सरकारी नीतियाँ

निम्मलिखित नीतियों से “किसानों”की श्रेणी के अंतर्गत सम्मिलित सभी श्रेणियों का कल्याण और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित ही सकती है:

  1. एक राष्ट्रीय भू-उपयोग सलाहकार सेवा तत्काल स्थापित की जानी चाहिए और उसे एक हब बी स्पोस्क्स माडल के आधार पर राज्य तथा ब्लॉक स्तर भू-उपयोग सलाहकार सेवाओं से सम्बद्ध किया जाना चाहिए| ये वर्चुअल संगठन हो सकते हैं जिनके पास स्थान और मौसम विशिष्ट आधार पर भू-उपयोग निर्णयों को पारिस्थितिकीय, मौसमविज्ञानीय, और विपणन कारकों के साथ सम्बद्ध करे की शक्ति हो| उन्हें भू-उपयोग के सम्बन्ध में किसानों को सक्रिय रूप से सलाह प्रदान करनी चाहिए| भू-उपयोग निर्णय जल उपयोग निर्णय भी होते है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि सक्रिय रूप से प्रदान की जाने वाली सेवा, जल की सम्भावित उपलब्धता और जल के प्रति यूनिट से आय बढ़ाने के लिए उपलब्ध अवसरों पर आधारित हो|
  2. न्यूनतम समर्थन कीमत (एम एस पी) कार्यक्रम का कार्यक्षेत्र बढ़ाया जाना चाहिए ताकि छोटे किसानों के लिए खाद और आय सुरक्षा के महत्व की सभी फसलों को कवर किया जा सके| सही समय पर और सही स्थान पर, विशेष रूप से राष्ट्रीय वर्षापोषित क्षेत्र प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार के अंदर आने वाले क्षेत्रों में, एम एस पी सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए| इसके साथ ही फसल विविधिकरण के सम्बन्ध में किसानों को परामर्श एम एस पी के आश्वासन के साथ जोड़ा जाना चाहिए| छोटे किसान परिवारों को प्रशासनिक और शैक्षिक प्रयोगों तथा बाजार में जुए से बचाया जाना चाहिए|
  3. कीमतों में अत्यधिक घट-बढ़ की अवधियों के दौरान किसानों को बचाने के लिए केन्द्रीय और राज्य सरकारों तथा वित्तीय संस्थानों द्वारा एक बाजार कीमत स्थिरीकरण निधि कायम की जानी चाहिए, उदाहरण के लिए प्याज, आलू, टमाटर जैसे नश्वर जिन्सों के सम्बन्ध में|
  4. बार-बार पड़ने वाले सूखे व अन्य मौसमी अनियमितताओं के फलस्वरूप उत्पन्न जोखिमों से किसानों को बचाने के लिए एक कृषि जोखिम निधि कायम की जानी चाहिए|
  5. कृषि बीमा नीतियों का कार्यक्षेत्र बढ़ाया जाना चाहिए औए इसके अतर्गत स्वास्थ्य बीमा को भी शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि परिवार बीमा निति के अंतर्गत  परिकल्पित है| जी एम फसलों के मामले में बीज कम्पनियों को बीमा की व्यवस्था करनी चाहिए|
  6. एक खाद्य गारंटी अधिनियम तैयार और अधिनियमित किया जाना चाहिए| किसान, जो सबसे बड़ा उपभोक्ता समूह भी हैं, अधिक पैदा करेगा यदि खपत अधिक है और परिणामतः फार्म उत्पाद और उत्पादों की मांग अधिक है| ऐसे अधिनियम से, जिसमें काम के बदले अनाज कार्यक्रम और राष्ट्रीय रोजगार गांरटी कार्यक्रम की खास-खास बातें शामिल है, खाद्य को करेन्सी की भूमिका निभाने में मदद मिलेगी| ऐसी प्रक्रिया से परिवार की पोषण सुरक्षा और साथ ही किसानों की आय सुधारने में मदद मिलेगी|
  7. एक सुपरिभाषित, किसान-अनुकूल और संसाधनविहीन उपभोक्ता-उन्मुख खाद्य सुरक्षा निति एक तात्कालिक आवश्यकता है| घरेलू रूप से उठाए गए खाद्यानों के साथ खाद्य सुरक्षा से ही व्यापक रूप से फैली ग्रामीण गरीबी और कुपोषण दूर हो सकता है क्योंकि खेती ग्रामीण भारत में आजीविका सुरक्षा पद्धति का मूलाधार है| इससे सरकार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पद्धति को अधिकाधिक शिखर पर बने रहने में मदद मिलेगी| एक खाद्य सुरक्षा पद्धति का निर्माण करना तथा आयातित खाद्यानों से कीमत वृद्धि पर नियंत्रण करना कभी-कभी एक अल्पकालिक आवश्यकता हो सकती है किन्तु वह हमारे किसानों और खेती के लिए एक दीर्घावधिक संकट होगा|
  8. समय आ गया है कि सरकार को एक बहु-पणधारी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा तथा प्रभुसत्तासपन्न बोर्ड की स्थापना करनी चाहिए जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री मंत्री हों तथा इसके सदस्यों में कृषि और खाद्य मत्री व भारत सरकार के अन्य सम्बद्ध मंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और खाद्य अधिशेष व घाटे वाले राज्यों के मुख्य मंत्री, सभी राष्ट्रीय राजनितिक दलों के नेता, कुछेक विशेषज्ञ, कृषि और खाद्य सुरक्षा के लैंगिक आयाम में विशेषज्ञों सहित, और जन संचार साधनों की प्रतिनिधि शामिल हों| हमें उपजाऊ खेती भूमि को संरक्षित रखने तथा संसाधनविहीन किसानों व संसाधनहीन उपभोक्ताओं दोनों की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता है| ऐसे संसाधनविहीन गरीब उपभोक्ताओं में से अधिकांश असिंचित क्षेत्रों में छोटे और सीमांत किसान व भूमिहीन कृषि मजदूर हैं| इन संयोजनों को समझने की जरुरत है और इनपर ध्यान दिया जाना चाहिए| प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और प्रभुसत्तासम्पन्न बोर्ड इन जटिल संयोजनों पर एक वृहद रूप में ध्यान दे सकता है तथा एक सामाजिक व अथिक रूप से संधारणीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम तैयार और कार्यान्वित करने के लिए नीतिगत मार्गनिर्देश प्रदान कर सकता है जो देश से सभी क्षेत्रों और हमारी आबादी के सभी वर्गों के हितों की पूर्ति करे|
  9. किसान परिवारों को एच आई वी/एड्स और तपेदिक (टी.बी.) का शिकार होने से भी बचाया जाना चाहिए| रिट्रोवाइरल-रोधी दवाइयाँ गांवों में मुफ्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए| इसके साथ ही, गाँवों  में एच आई वी/एड्स और टी.बी. के प्रति दृष्टिकोण खाद्य-सह-दवाई आधारित होना चाहिए| एच आई वी/एड्स और टी.बी., मलेरिया और  कुष्ठरोग से प्रभावित ग्रामीण परिवारों के लिए पोषाहार सहायता की जरुरत है ताकि उनके ठीक नोने उनका उत्पादक जीवन फिर से बहाल होने में मदद मिल सके| यह सुझाने के लिए साक्ष्य है कि आर्थिक रूप से अल्पसुविधाप्राप्त ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों के लिए बीमारियों से मुक्त होने में मदद देने देने के लिए, जिनमें लम्बे उपचार की जरूरत है, मात्र विशुद्ध औषधि आधारित दृष्टिकोण पर्याप्त  नहीं हैं| ऐसे कार्यक्रम के लिए आबंटित खाद्यानों को उपयुक्त सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी खाद्य कूपन प्रस्तुत करने पर सामान्य चैनलों के माध्यम से वितरित किया जा सकता है| उदाहरण के लिए एच आई वी/एड्स के मामले में, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको). इस दुर्बलीकरण और खतरनाक बीमारी से प्रभावित बच्चों, महिलाओं और पुरुषों को खाद्य कूपन जारी करने के लिए उपयुक्त एजेंसी होगी| स्वास्थ्य देखरेख के सम्बन्ध में खाद्य-सह-औषधि आधारित दृष्टिकोण  को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का एक अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए|

10.  ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक ग्रामीण गैर-कृषि आजीविका पहल की जरूरत है| इस पहल के अंतर्गत इसके कोर के रूप में एक और अधिक बाजार-उन्मुख तथा व्यवसायीकृत के वी आई सी और एक पुनर्रचित व वित्तीय रूप से सुदृढ़ एस एफ ए सी हो सकता है तथा सभी ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार कार्यक्रमों को इकट्ठा किया जाना चाहिए ताकि उनके बीच अभिसरण व तालमेल कायम किया जा सके| इस पहल को, चीन के टाउनशिप और ग्राम उद्यम (टी वी ई) कार्यक्रम की तरह “ग्रामीण व्यवसाय हब” स्थापित करने के लिए एक अखिल भारत कर्यक्रम के माध्यम से फार्म पर रोजगार सृजन के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए| सम्बन्धित विभिन्न एजेसियों को मिलाकर एक संघीय दृष्टिकोण अपनाए जाने की जरूरत है|

11.  सरकार को एक आजीविका सुरक्षा वर्ग संचालित करने तथा विश्व नीतियों को किसानों के लिए लाभप्रद ढंग से स्थानीय कार्रवाई के साथ जोड़ने में सहायता प्रदान करने के लिए एक भारतीय व्यापार संगठन (आई टी ओ) कायम करना चाहिए|

12.  क्योंकि कृषि एक राज्य विषय है, इसलिए प्रत्येक राज्य सरकार को एक राज्य किसान आयोग स्थापित करना चाहिये जिसका अध्यक्ष एक प्रख्यात किसान हो| आयोग के सदस्यों के रूप में खेती उद्यम में सभी प्रमुख पणधारियों को शामिल किया जाना चाहिए| ऐसे आयोग को एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए जिसे चर्चा करने व निर्णय लेने के लिए सम्बंधित राज्य विधानमंडल के सम्मुख प्रस्तुत किया जाए|

13.  कृषि प्रगति को कृषि परिवारों की वास्तविक आय में वृद्धि द्वारा मापा जाना चाहिए| उत्पादन वृद्धि दर के साथ-साथ, आय में वृद्धि दर को भी मापा जाना चाहिए और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आर्थिक और सांख्यकी निदेशालय द्वारा उसे प्रकाशित किया जाना चाहिए|

14.  संविधान (73वां संसोधन) अधिनियम, 1992 की ग्यारहवीं अनुसूची के अनुच्छेद 243जी में पंचायतों को कृषि विस्तार सहित कृषि के सम्बन्ध में जिम्मेदारी सौपी गई है| यह दायित्व निभाने के लिए उन्हें आवश्यक जानकारी, प्रशिक्षण व साधनों से सम्पन्न करना होगा| इस समय देश में लगभग 2,25,000 पंचायतें हैं| भारतीय किसानों को पेश आने वाली समस्याओं पर सामान्यतः कुल मिलाकर विचार किया जाता है, अर्थात कुल मिलाकर 100 मिलियन से अधिक कृषक परिवारों की समस्याओं के ध्यान में रखते हुए| तथापि, यदि ऐसी समस्याओं को अलग-अलग कर दिया जाय और उनपर ग्राम सभाओं तथा पंचायतों द्वारा विचार किया जाए तो स्थान-विशिष्ट समस्याओं पर शीघ्रतापूर्वक और प्रभावी ढंग से विचार किया जा सकता है| इसलिए,समय है की अनुच्छेद 243जी के प्रावधानों पर सही रूप से तथा सच्ची भावना से अमल किया जाये|

15.  देशभर में पचायतों में लगभग 1.2 मिलियन चुनी हुई महिला सदस्य हैं| वे गाँवों में जीवन स्तर सुधारने और स्वच्छता, पेय जल, बाल देख-रेख, शिशु प्रारंभिक शिक्षा और पोषाहार सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं| उन्हें, उपयुक्त प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण अवसरों के जरिए ग्रामीण परिवर्तन में ऐसी  नेतृत्व भूमिकाएं निभाने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए| लिंग विशिष्ट जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें एक विनिश्चित ग्राम पंचायत महिला निधि उपलब्ध कराई जानी चाहिए|

16.  जनसंचार साधन (परम्परागत, इलेक्ट्रोनिक और इंटरनेट) शासन की हमारी प्रजातांत्रिक पद्धति के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं| स्वतंत्र जन संचार माध्यम वाले देशों में गम्भीर अकाल नहीं पड़ते| संचार माध्यमों की, विशेष रूप से रेडियो और भाषा समाचार-पत्रों की उत्साहपूर्ण सहायता के बिना 1960 के दशक की हरित क्रांति नहीं होती, जिसने न केवल उम्मीद जगाई बल्कि नई प्रौद्योगिकियों के सम्बन्ध में जानकारी गाँवों तक पहुंचाई| इससे किसानों के बीच अपार उत्साह पैदा हुआ जिसके फलस्वरूप एक छोटा सा सरकारी कार्यक्रम एक जन अभियान बन गया| देश में कृषि सम्बन्धी अच्छी सम्भावनाओं के बारे में अब उम्मीद और जानकारी का प्रसार करने की जरुरत है| जन संचार साधनों को कृषि, खाद्य सुरक्षा और किसान कल्याण से सम्बन्धित मुद्दों के बारे में समय और और वैज्ञानिक रूप से सही जानकारी प्रदान करके, सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से कुछ क्षेत्रीय मिडिया संसाधन केंद्र स्थापित करना उपयोगी होगा जिनके प्रबंधन में किसान, मिडिया प्रतिनिधि और वैज्ञानिक को, जिनमें विस्तार कार्मिक सम्मिलित हैं, महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए|

17.  कृषि मत्रालय और विभागों का नाम, केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर कृषि और कृषक कल्याण मंत्रालय/विभाग के रूप में बदला जा सकता है जिससे की भारत की जनसंख्या के 600 मिलियन से अधिक सदस्यों की आय और सुरक्षा सुनिश्चित करने में इन सरकारी विभागों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला जा सके| नाम बदलने के साथ-साथ संरचनात्मक परिवर्तन भी  किये जाने चाहिए जिनके अनुसार सरकार में वरिष्ठ पदों पर आसीन सक्रिय महिलाओं और पुरषों में उन उनमें शामिल करने की छुट प्राप्त हो|

18.  हमारा केन्द्रीय और राज्य सरकारों से अनुरोध है कि वे कृषि को संविधान के अनुच्छेद 246 की अनुसूची VII समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल करने के प्रश्न पर गम्भीरता से विचार करें| कीमतों, ऋण और व्यापार सम्बन्धी मुद्दों पर महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय भारत सरकार द्वारा लिए जाते हैं| इसके साथ ही, अनेक विधानों को, जिनमें पादप प्रजाति और किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम, जैव-विविधता अधिनियम, खाद्य विधेयक आदि शामिल हैं, भारत सरकार द्वारा प्रशासित किया जाता है| ग्रामीण ढांचे के विकास ले लिए, जिसमें सिचाई, ग्रामीण सड़कें और बाजार शामिल हैं, भारत सरकार द्वारा पर्याप्त निधियां उपलब्ध कराई जाती हैं| कृषि को समवर्ती सूची में शामिल करने से किसानों की सेवा और कृषि सुरक्षा केन्द्र तथा राज्यों की साझी जिम्मेदारी बन जारी है, जो हमारे किसान महिलाओं और पुरुषों के मनोबल, प्रतिष्ठा और आर्थिक कल्याण को ऊँचा उठाने में एक सच्चा राष्ट्रीय प्रयास होगा|

स्थानीय विविधता के साथ तुलनीय राष्ट्रीय नीति

भारतीय कृषि, मृदा, जलवायु, कृषि पद्धतियों तथा संसाधन सम्पन्नता की विविधता में समृद्ध है| इसलिए, विभिन्न कृषि-जलवायु, समाजार्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के लिए उपयुक्त एक व्यापक राष्ट्रीय निति तैयार करनी होगी| इस रिपोर्ट में प्रस्तुत राष्ट्रीय किसान निति के सम्बन्ध में प्रयुक्त रुपरेखा को, देश के विभिन्न भागों में, विशेष रूप में कार्रवाई मुद्दों में प्राथमिकताओं के सन्दर्भ में, स्थानीय वास्तविकताओं के लिए उपयुक्त दृष्टि से अनुकूल और व्यापक बनाना होगा| राज्य स्तरीय नीतियों का उद्देश्य राष्ट्रीय लक्ष्यों को स्थानीय कार्रवाई में बदलना होगा| राज्य किसान आयोगों को, स्थान-विशिष्ट आधार पर, राष्ट्रीय किसान निति को कार्यान्वित करने के लिए एक प्रचालनात्मक योजना तैयार करने का काम सौपा जा सकता है|

जय किसान

वर्ष 1927 में बंगलौर में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान की दर्शक (विजिटर) पुस्तिका में  हस्ताक्षर करते समय महात्मा गाँधी ने अपने आपको एक किसान कहना पसंद किया| हमें उनके विश्वास पर खरा उतरना चाहिए कि भारत अपने किसानों की देखभाल करेगा|

राष्ट्रीय किसान आयोग, माननीय केन्द्रीय कृषि, खाद्य, सार्वजानिक वितरण और उपभोक्ता मामले मंत्री श्री शरद पवार के प्रति अपना आभार व्यक्त करता है जिन्होंने आयोग के कार्य में और इसके कार्यकलापों के सम्बन्ध में समग्र रूप से मार्गदर्शन प्रदान करने में गहरी रूचि दिखाई| हम योजना आयोग और वित्त, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रियों के प्रति भी उनके बहुमूल्य सुझावों के लिए धन्यवाद व्यक्त करते हैं|

राष्ट्रीय किसान आयोग, विभिन्न राज्यों के मुख्य मंत्रियों और उनके मंत्रियों के प्रति भी अपना धन्यवाद व्यक्त करता है जिन्होंने अपने बहुमूल्य सुझाव दिए| राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारीगण भी उनके द्वारा राष्ट्रीय किसान आयोग दलों के प्रति बरते गए शिष्टाचार और राज्यों में किसानों व अन्य पणधारियों के साथ विचार-विमर्श आयोजित करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं|

राष्ट्रीय किसान आयोग, राष्टीय सलाहकार परिषद की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी व अन्य सदस्यों का भी आभारी है जिन्होंने राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया|

आयोग, विशेष रूप से श्रीमती राधा सिंह, सचिव, कृषि और सहकारिता विभाग, भारत सरकार के प्रति भी सभी स्तरों पर आयोग की सहायता करने और इसे आबंटित समयाविधि के अंदर ही अपना कार्य पूरा करने के लिए हरसम्भव सहायता के प्रदान करने के लिए भी धन्यवाद देना चाहता है| उनके वरिष्ठ अधिकारीयों से प्राप्त सहायता के लिए भी हम आभारी हैं जिनमें कृषि और सहकारिता विभाग में संयुक्त सचिव (नीति) शामिल हैं| भारत सरकार के विभिन्न मत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग भी उनके बहुमूल्य सुझावों के लिए धन्यवाद के पात्र हैं|

सम्पूर्ण राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने आयोग की विचार-विमर्श में सक्रिय रूप से योगदान दिया और इसके कार्य के कोटि को समृद्ध बनाया| कृषि, पशुपालन और मात्स्यिकी विश्वविद्यालयों की कुलपति, अपनी सहायता के लिए प्रसंशा के पात्र हैं| निजी क्षेत्र के अनुसंधान संस्थानों ने भी उत्तम आदान उपलब्ध कराए जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं| राष्ट्रीय किसान आयोग बड़ी संख्या में किसानों, किसान संगठनों, राजनितिक दलों के नेताओं, गैर-सरकारी संगठनों और अलग-अलग व्यक्तियों का भी ऋणी है जिन्होनें मौखिक रूप से और लिखित रूप में अपनी सलाह और सुझाव दिए| आयोग, आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एन ए ए एस ) के प्रति भी धन्यवाद व्यक्त करता है|

राष्ट्रीय किसान आयोग, श्री एस. एस. प्रसाद, और श्री जी.सी. पति, पूर्व और वर्तमान संयुक्त सचिव, सुश्री ममता शंकर, निदेशक, सुश्री आर.वी. भवानी, अध्यक्ष की विशेष कार्य अधिकारी और अनुसंधान अधिकारी डॉ. प्रभु दयाल चौधरी और आयोग के अनुसचिवीय  कर्मचारियों द्वारा राष्ट्रीय किसान निति का संशोधित मसौदा तैयार करने में उनके द्वारा किए गए निष्ठापूर्वक कार्य के प्रति आभार व्यक्त करता है|

स्रोत:- कृषि विभाग, झारखण्ड विकास/ जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची|

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मरस. जानने Aug 25, 2015 03:16 PM

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