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एसिड हमले के पीड़ितों के लिए विधिक सेवा योजना

इस पृष्ठ में नालसा द्वारा एसिड हमले के पीड़ितों के लिए विधिक सेवा योजना की जानकारी दी गयी है I

पृष्ठभूमि

एसिड हमले हिंसा का सर्वाधिक घातक स्वरूप है और ये अधिकांशतः महिलाओं के ऊपर होते हैं। हालांकि एसिड हमलों की रिपोर्ट विश्व के अनेक भागों से आई हैं, परंतु भारत में एसिड हमलों की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा रखे गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में 83, 2012 में 85 और 2013 में 66 एसिड हमलों की रिपोर्ट प्राप्त हुई थी, तथापि, एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एएसएफआई) के अनुसार वर्ष 2012 में ऐसे कम-से-कम 106, 2013 में 122 और 2014 में 309 एसिड हमलों की रिपोर्ट प्राप्त हुई तथा कार्यकर्ताओं के अनुसार वर्ष 2015 में यह आंकड़ा बढ़कर 500 तक पहुँच गया। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2015 में एसिड हमलों के 222 मामलों की रिपोर्ट प्राप्त हुई थी। आंकड़ों में अंतर हो सकता है, परंतु एसिड हमलों की संख्या में वृद्धि हुई है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, एसिड हमलों के ऐसे मामले भी हुए हैं जिनकी रिपोर्ट नहीं कराई गई और ऐसी कुछ घटनाओं में तो पीड़ितों की मृत्यु भी हो गई है। अनेक घटनाओं की रिपोर्ट अपराधियों द्वारा बदला लिए जाने के डर से नहीं कराई जाती।

भारत में एसिड हमलों की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि ये आमतौर पर महिलाओं के ऊपर होते हैं। ये हमले प्रायः विवाह के प्रस्ताव अथवा यौन प्रस्तावों से इनकार करने के परिणाम स्वरूप होते हैं। दहेज से जुड़े विवादों के परिणाम स्वरूप भी एसिड हमले किए जा सकते हैं। प्रतिशोध लेने के लिए अथवा पारिवारिक अथवा जमीन के विवादों अथवा उत्तराधिकार और अन्य सम्पत्ति संबंधी मुद्दों के कारण एसिड हमलों का सहारा लिया जाता है। निर्भया मामले के बाद आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारों के संबंध में सुझाव देने हेतु, वर्ष 2013 में केंद्र सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति वर्मा कमिटी ने एसिड हमले के मुद्दे पर विचार किया और यह टिप्पणी की -

हम समझते हैं कि व्यभिचार, पुरुषों के प्रस्तावों को ठुकराने जैसे विभिन्न कारणों से और घरेलू हिंसा के रूप में भी, महिलाओं पर एसिड फेंकना महिलाओं पर हमले का सर्वाधिक जघन्य रूप है जो कई एशियाई एवं अफ्रीकी देशों में आम बात है। महिलाओं पर एसिड और अन्य संक्षारक पदार्थ फेंक दिए जाते हैं अथवा उन्हें खिला-पिला दिए जाते हैं, जिससे मृत्यु हो सकती है अथवा असीम नुकसानों के साथ शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक क्षति पहुँचती है। भारत के विधि आयोग की 226 वीं रिपोर्ट, जिसमें विशेष रूप से इस अपराध पर विचार किया गया है, यह उल्लेख है कि - यद्यपि एसिड हमला एक अपराध है जो किसी भी पुरुष अथवा महिला के प्रति किया जा सकता है, तथापि, भारत में इसका एक विशिष्ट लैंगिक आयाम है। रिपोर्ट किए गए अधिकांश एसिड हमले प्रेमियों के प्रस्तावों को ठुकराये जाने, विवाह के प्रस्तावों को अस्वीकार किए जाने, दहेज न देने आदि के कारण, महिलाओं पर, विशेष रूप से युवतियों पर, किए गए हैं। हमला करने वाला इस सच्चाई को सहन नहीं कर पाता कि उसे ठुकरा दिया गया है और वह उसका मुकाबला करने का साहस करने वाली महिला के शरीर को नष्ट कर देना चाहता है।

एक विशेष मामले में, हमला करने वाला यह जानता है कि महिला का स्वाभिमान और आत्म-सम्मान प्रायः उसके चेहरे से होता है, जो उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। चेहरे अथवा शरीर को विकृत कर देना मानव शरीर के प्रति न केवल एक अपराध है, अपितु यह पीड़ित के लिए स्थायी मनोवैज्ञानिक क्षति का कारण बन जाता है। क्या होता है जब एक पीड़ित को स्थायी शारीरिक और मनोवैज्ञानिक क्षति पहुँचती है, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। और कानून-निर्माताओं को यह बात समझनी होगी कि अपराध केवल शरीर के ऊपर किए गए अपराध, अर्थात् शारीरिक क्षति, के सिद्धांत पर ही सहज रूप से आधारित नहीं होते, बल्कि उन्हें अपराध को भुगतने वाले के सम्मान के साथ जीने के अधिकार के ऊपर पड़े प्रभावों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए। यह अपराधशास्त्र और समाजशास्त्र, दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है।

एसिड हमलों के कारणों के साथ-साथ एसिड हमलों के प्रभावों पर भी न्यायमूर्ति वर्मा कमिटी रिपोर्ट तथा विधि आयोग की 226 वीं रिपोर्ट, दोनों में विचार किया गया था। आजीवन शारीरिक विकृति और प्रायः आजीवन उपचार की आवश्यकता वाली शारीरिक चुनौतियों के साथ-साथ,मनोवैज्ञानिक चुनौतियां पीड़ितों और उनकी नियोजनीयता पर अधिक व्यापक और गहरा प्रभाव डालती हैं। यह भी देखा जाता है कि एसिड हमलों के पीड़ितों के लिए हमारे देश में सीमित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, स्पेशलाइज्ड बर्न अस्पातलों की संख्या सीमित है और पीड़ित के लिए, प्रायः महीनों से लेकर कई वर्षों तक चलने वाले उपचार के लिए, अस्पताल में भर्ती होना एक अत्यंत कठिन कार्य बन जाता है। उपचार में पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए बहुत अधिक लागत भी आ सकती हैं। पीड़ितों का पुनर्वास भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है।

संवैधानिक गारंटियां

भारत के संविधान अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इसकी व्याख्या में सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है और इसमें एसिड हमलों के पीड़ितों सहित सभी के सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 41 में यह निर्धारित किया गया है कि राज्य, आर्थिक क्षमता एवं विकास की सीमाओं में रहते हुए, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और निःशक्तता के मामले में और गैर-पात्रता वाली जरूरत के अन्य मामलों में, काम, शिक्षा और जन सहायता के अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी प्रावधान करे।

विधायी संरचना

  1. एसिड हमलों की घटनाओं से निपटने हेतु किन्हीं विनिर्दिष्ट उपबंधों के अभाव में, ऐसे मामलों पर सामान्यतः भारतीय दंड संहिता की धारा 326 एवं अन्य उपबंधों के अंतर्गत कार्रवाई की जाती थी। तथापि, न्यायमूर्ति वर्मा कमिटी ने सिफारिश की है कि एसिड हमलों को भारतीय दंड संहिता में एक अपराध के रूप में परिभाषित किया जाये और टिप्पणी की कि –

इस अपराध की लैंगिक विशिष्टता और विभेदकारी प्रवृत्ति को देखते हुए हम इस अपराध को महिलाओं के विरुद्ध महज एक और अपराध मानकर नजर अंदाज नहीं कर सकते। हम सिफारिश करते हैं कि एसिड हमलों को आईपीसी में एक अपराध के रूप में विशिष्ट रूप से परिभाषित किया जाए और यह भी कि पीड़ित को आरोपी द्वारा क्षतिपूर्ति की जाए। तथापि, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के संबंध में, केंद्र और राज्य सरकारों को एक क्षतिपूर्ति निधि बनाने के लिए अंशदान करके पर्याप्त अक्षय निधि बनानी चाहिए। हम देखते हैं कि मौजूदा आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2012 में एसिड हमले की एक परिभाषा शामिल है।

इस प्रकार न केवल एसिड हमलों के संबंध में एक विशिष्ट अपराध को शामिल करने के लिए, अपितु एसिड हमलों के पीड़ितों को क्षतिपूर्ति प्रदान करने के लिए भी, सिफारिश की गई थी।

आपराधिक कानून (संशोधन अधिनियम), 2013

आपराधिक कानून (संशोधन अधिनियम), 2013 के अनुसार, भारतीय दंड संहिता में धाराएं 326ए और 326 बी जोड़ी गई थी जिनमें उस व्यक्ति के लिए दंड का उपबंध किया गया है, जो नुकसान पहुँचाने के इरादे से अथवा यह जानते हुए कि इससे यह नुकसान होगा,किसी व्यक्ति के ऊपर एसिड फेंक कर अथवा एसिड पिला कर, अथवा किसी अन्य तरीके से उसके शरीर के किसी अंग अथवा किन्ही अंगों की स्थायी अथवा आंशिक क्षति अथवा विकृति का कारण बनता है, अथवा उन्हें जलाता अथवा स्थायी रूप से क्षति पहुँचाता अथवा विकृत करता अथवा निःशक्त करता है अथवा गंभीर रूप से घायल करता है, अथवा जो किसी व्यक्ति को स्थायी अथवा आंशिक क्षति पहुँचाने अथवा निःशक्तता अथवा गंभीर चोट पहुँचाने के इरादे से उस व्यक्ति पर एसिड फेंकता है अथवा एसिड पिलाने का प्रयास करता है अथवा कोई अन्य तरीका अपनाता है। ‘एसिड'' की परिभाषा में ऐसे किसी भी पदार्थ को शामिल किया गया है जिसकी विशेषता अम्लीय अथवा क्षारीय हो अथवा जला देने वाली हो जो शरीर को इतना नुकसान पहुंचा सकता हो कि वह घाव अथवा विकृति अथवा अस्थायी अथवा स्थायी निः शक्तता का कारण बन जाए।

एसिड हमलों का मामला

एसिड हमलों का मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष भी आया और लक्ष्मी बनाम भारत संघ, रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 129/2006 में दिनांक 18.7.2013 के अपने आदेश में, उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि एसिड की ओवर द काउंटर बिक्री पर पूर्णतः प्रतिबंध रहेगा जब तक कि विक्रेता एसिड की बिक्री दर्ज करने वाला एक लेखा-जोखा रजिस्टर न बना ले जिसमें उन व्यक्ति (व्यक्तियों) का ब्यौरा, जिन्हें एसिड बेचा/बेचे गए हों, और बेचे गए एसिड की मात्रा दर्ज होगी। इसके अलावा, एसिड केवल तभी बेचा जाएगा जब क्रेता ने सरकार द्वारा जारी कोई फोटो पहचान-पत्र दिखाया हो, जिसमें उस व्यक्ति का पता भी लिखा हो और उसने एसिड खरीदने का विशिष्ट कारण / प्रयोजन बताया हो। यह भी आदेश दिया गया था कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति को एसिड नहीं बेचा जाएगा। शैक्षिक संस्थाओं, अनुसंधान प्रयोगशालाओं, अस्पतालों, सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विभागों के लिए भी आदेश जारी किए गए थे जिन्हें एसिड रखने और भंडारण करने की जरूरत होती है। दिनांक 10.4.2015 के अंतिम आदेश में, यह दोहराया गया था कि इस आदेश की तारीख से तीन माह के भीतर एसिड की अक्रास द काउंटर बिक्री को प्रतिबंधित करने के लिए उपयुक्त अधिसूचना जारी की जाए। इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय ने परिवर्तन केंद्र और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य रिट याचिका (सिविल) 2013 की सं.867 में दिनांक 7.12.2015 को फैसला सुनाया जिसमें आदेश दिया कि उचित प्राधिकार के बिना एसिड की आपूर्ति करने के दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए और एसिड के वितरण पर नियंत्रण रखने में असफल रहने के लिए संबंधित प्राधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाए।

एसिड हमले के पीड़ितों के उचित उपचार

परवर्ती देखभाल एवं पुनर्वास के संबंध में, दिनांक 1 0.4.2015 के आदेश द्वारा राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्रों को निदेश दिया गया था कि वे इस मामले को सभी प्राइवेट अस्पतालों के साथ उठाएं और बताएं कि प्राइवेट अस्पताल एसिड हमले के पीड़ितों का उपचार करने से इनकार न करें और यह भी कि ऐसे पीड़ितों को दवाइयां, भोजन, बिस्तर और रिकंस्ट्रेक्टिव सर्जरी सहित पूरा उपचार प्रदान किया जाए। यह भी टिप्पणी की गई कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357सी के उपबंधों का उल्लंघन करके, एसिड हमलों तथा अन्य अपराधों के पीड़ितों का उपचार करने से मना करने वाले अस्पताल / क्लिनिक के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। एक यह निदेश भी जारी किया गया था कि एसिड हमले के पीड़ित का जिस अस्पवताल में सबसे पहले उपचार किया गया था, वह एक प्रमाण-पत्र देगा जिसका उपयोग पीड़ित द्वारा उपचार अथवा रिकंस्ट्रक्टिव सर्जियों के लिए अथवा राज्य सरकार अथवा संघ राज्य क्षेत्र, जैसी भी स्थिति हो, की अन्य योजना, जिसके लिए वह पात्र है, के लिए किया जा सकता है।

सुधारात्मक उपचार

इस तथ्य के मद्देनजर कि एसिड हमले के पीड़ितों को कई प्लास्टिक सर्जरियां और अन्य सुधारात्मक उपचार करवाने की आवश्यकता होती है, उच्चतम न्यायालय ने दिनांक 18.7. 2013 के अपने आदेश में यह निदेश दिया था कि एसिड हमलों के पीड़ितों को संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्य क्षेत्र द्वारा परवर्ती देखभाल एवं पुनर्वास लागत के रूप में कम-से-कम 3 लाख रु. की क्षतिपूर्ति का भुगतान किया जाए जिसमें से 1 लाख रु. की राशि का भुगतान पीड़ित को घटना होने (अथवा राज्य सरकार / संघ राज्य क्षेत्र के ध्यान में लाए जाने) के 15 दिन के भीतर किया जाएगा ताकि इस संबंध में तत्काल चिकित्सा सुविधा प्राप्त हो सके और खर्चे वहन किए जा सकें । दिनांक 10.4.2015 को उक्त रिट याचिका का निपटान करते हुए, यह निदेश दिया गया था कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का सदस्य सचिव मामले को राज्य सरकार के साथ उठाए ताकि न्यायालय द्वारा पारित आदेशों का अनुपालन हो सके और एसिड हमले के प्रत्येक पीड़ित को कम-से-कम 3,00,000/- रु. उपलब्ध करा दिए जाएं। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिवों को यह भी निदेश दिया गया था कि वे पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना का राज्य/संघ राज्य क्षेत्र में व्यापक एवं पर्याप्त प्रचार करें ताकि एसिड हमले के प्रत्येक पीड़ित को पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना का लाभ मिल सके। यह भी निदेश दिया गया था कि किसी एसिड हमले के पीड़ित द्वारा कोई क्षतिपूर्ति का दावा किए जाने पर, मामले को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा उठाया जाएगा जिसमें जिला न्यायाधीश और वे सहयोजित व्यक्ति, जिन्हें जिला न्यायाधीश उपयोगी समझे, विशेष रूप से जिला मजिस्ट्रेट, उस जिले का पुलिस अधीक्षक और सिविल सर्जन अथवा मुख्य चिकित्सा अधिकारी अथवा उनके नामिती, शामिल होंगे और उक्तनिकाय सभी प्रयोजनों के लिए आपराधिक क्षति क्षतिपूर्ति बोर्ड के रूप में कार्य करेगा। यह मामला 7.12.2015 को निर्णीत परिवर्तन केंद्र और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य रिट याचिका (सिविल) 2013 की सं.867 में भी उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया जिसमें यह टिप्पणी की गई कि संबंधित राज्य और संघ राज्य क्षेत्र लक्ष्मी के मामले में यथानिर्देशित 3,00,000/- रु. की क्षतिपूर्ति राशि से अधिक भी दे सकते हैं। इस मामले में दिया गया एक महत्वपूर्ण निदेश यह था कि सभी राज्य और संघ राज्य क्षेत्र ऐसे पीड़ितों की दुरवस्था को समझें और उनके नाम को निःशक्तता सूची के तहत शामिल करने के संबंध में उपयुक्त कदम उठाएं।

दंड का प्रावधान

इस प्रकार यह देखा गया है कि एसिड हमलों को भारतीय दंड संहिता के तहत ऐसे अपराधों के रूप में माना गया है जिनके लिए दंड का प्रावधान है। धारा 357ए के अलावा, आपराधिक प्रक्रिया संहिता में पीड़ित को क्षतिपूर्ति करने के प्रयोजनार्थ निधियां प्रदान करने हेतु केंद्र सरकार के साथ समन्वतय से राज्य सरकार द्वारा योजना बनाए जाने का प्रावधान है और ऐसी योजनाएं अधिकांश राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में तैयार कर ली गई हैं जिनमें एसिड हमलों के पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति का प्रावधान भी है। केंद्र सरकार ने केंद्रीय पीड़ित क्षतिपूर्ति निधि दिशा-निर्देश जारी किए हैं जिनका उद्देश्य राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों की पीड़ित क्षतिपूर्ति योजनाओं को सहायता प्रदान करना और उनका सम्पूरक बनना है। इस प्रयोजनार्थ 200 करोड़ रु. की एक अक्षय निधि बनाई गई है। ‘‘एसिड हमले के पीड़ित को उपचार के खर्चे को वहन करने के लिए, राज्य/संघ राज्य क्षेत्र द्वारा भुगतान की गई क्षतिपूर्ति के अतिरिक्त विशेष वित्तीय सहायता को 5 लाख रु. तक बढ़ाना' केंद्रीय पीड़ित क्षतिपूर्ति निधि के तहत स्वीकार्य कार्यकलापों में से एक है। तथापि, एसिड हमलों के पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति की उपलब्धता के बारे में अधिक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है। एसिड हमले के पीड़ितों को उपचार प्रदान करने के बारे में अस्पतालों को विशिष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद, उनके लिए उपचार प्राप्त करना अब भी आसान नहीं है। एसिड की ओवर द काउंटर बिक्री अब भी धड़ल्ले से हो रही है। इस प्रकार, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण यह महसूस करता है कि विधिक सेवा संस्थाओं को इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी और वे एसिड हमले के पीड़ितों को पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना के लाभों तथा चिकित्सा एवं अन्य सुविधाओं को प्राप्त करना सुनिश्चित करने में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं।

विधिक सेवा संस्थाओं की भूमिका

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की प्रस्तावना में इस बात पर बल दिया गया है कि विधिक सेवा प्राधिकरण समाज के कमजोर वर्गों से सरोकार रखते हैं और इसमें उनका यह कर्तव्य बताया गया है कि वे ऐसे अवसर सुनिश्चित करें कि किसी भी आर्थिक अथवा अन्य निःशक्तता के कारण कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न रहे। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 4(ख) के तहत, “केंद्रीय प्राधिकरण' अर्थात् राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत विधिक सेवाएं उपलब्ध कराने के प्रयोजनार्थ सर्वाधिक प्रभावशाली एवं मितव्यीयतापूर्ण योजनाएं बनाने का कार्य सौंपा गया है। इसके अलावा, धारा 4(1) के तहत केंद्रीय प्राधिकरण” को जनता के बीच विधिक साक्षरता एवं विधिक जागरूकता फैलाने हेतु उपयुक्त उपाय करने, और विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों को समाज कल्याण कानूनों एवं अन्य अधिनियमों के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यक्रमों और उपायों द्वारा प्रतिभूत अधिकारों, लाभों और विशेषाधिकारों के बारे में शिक्षित करने के कार्य से भी जोड़ा गया है। इसी प्रकार, धारा 7(ग) के अंतर्गत, रोकथाम तथा कार्यनीतिगत विधिक सहायता कार्यक्रम संचालित करना राज्य प्राधिकरण अर्थात् राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का कार्य है। इस प्रकार यह अधिनियम विधिक सेवा प्राधिकरणों को कानूनों एवं विभिन्न प्रशासनिक उपायों एवं कार्यक्रमों के बारे में विधिक जागरूकता फैलाने और रोकथाम एवं कार्य नीतिगत कार्यक्रम संचालित करने का कर्तव्य स्वतः ही सौंपता है। इसके साथ ही, इस अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत, सभी महिलाएं तथा निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2 के खंड (प) में यथापरिभाषित निःशक्त भी विधिक सेवाएं प्राप्त, करने के हकदार हैं।

योजना का नाम

यह योजना “राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एसिड हमले के पीड़ितों के लिए विधिक सेवा) योजना, 2016'' कहलाएगी।

पैरा लीगल वॉलंटियर्स, विधिक सेवा क्लिनिक एवं पैनल वकील शब्दों का आशय वही होगा जो राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवा) विनियम, 2010 तथा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (विधिक सेवा क्लिनिक) विनियम, 2011 और पैरा लीगल वॉलंटियर्स हेतु राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण योजना (संशोधित) के तहत यथापरिभाषित है।

योजना के उद्देश्य

योजना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:-

1)एसिड हमलों के पीड़ितों को राष्ट्रीय, राज्य, जिला और तालुका स्तरों पर क्षतिपूर्ति हेतु विभिन्न मौजूदा विधिक प्रावधानों एवं योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए विधिक सहायता एवं प्रतिनिधित्व प्रदान करना;

2)एसिड हमलों के पीड़ितों को चिकित्सा सुविधाएं एवं पुनर्वास सुविधाएं प्राप्त करने में सक्षम बनाना;

3)एसिड हमलों के पीड़ितों की हकदारियों के बारे में जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों, तालुका विधिक सेवा समितियों, पैनल वकीलों, पैरालीगल वालंटियरों और विधिक सेवा क्लिनिकों के माध्यम से जागरूकता पैदा करना और फैलाना;

4)प्रशिक्षण, प्रबोधन और संवेदीकरण कार्यक्रमों का आयोजन करके सभी स्तरों के पैनल वकीलों, पैरा लीगल वालंटियरों, विधिक सेवा क्लिनिकों के स्वयंसेवकों, सरकारी अधिकारियों, जिन्हें विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन का कार्य सौंपा गया है, सेवा प्रदाताओं, पुलिस कार्मिकों, गैर-सरकारी संगठनों की क्षमताओं में वृद्धि करना; और

5)अंतरालों, आवश्यकताओं का पता लगाने के लिए और उपयुक्त प्राधिकारियों को सुझाव देने हेतु विभिन्न योजनाओं, कानूनों आदि का अध्ययन करने के लिए शोध एवं प्रलेखन संचालित करना।

इस योजना का चरम उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एसिड हमले के पीड़ितों का समाज में उचित रूप से पुनर्वास हो और वे सम्मान के साथ जीवन जिएं।

कार्रवाई योजना

विधिक प्रतिनिधित्व

  1. एसिड हमलों के सभी पीड़ितों को प्राथमिकता के आधार पर कानूनी सहायता प्रदान की जाएगी ताकि वे पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना के लाभों को प्राप्त करने में सक्षम हो सकें।
  2. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेंगे कि एसिड हमलों के सभी पीड़ितों को प्रक्रियागत झगड़ों में विलंब की किसी कठिनाई का सामना न करना पड़े और अंतरिम क्षतिपूर्ति यथाशीघ्र प्रदान कर दी जाए।
  3. एसिड हमलों के पीड़ितों को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत उनके बयान दर्ज करने, साक्ष्य प्रस्तुत करने आदि के समय सहायता करने वाला व्यक्ति और कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाएगा।
  4. प्रत्येक जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और तालुका विधिक सेवा समिति इस योजना के प्रयोजनार्थ कम-से-कम एक पैनल वकील को विधिक सेवा अधिकारी के रूप में पदनामित करेंगी।
  5. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण इस योजना के कार्यान्वयन हेतु पर्याप्त संख्या में पैरा लीगल वालंटियर्स भी प्रतिनियुक्त करेगा।
  6. पैरा लीगल व लंटियर्स एसिड हमलों के पीड़ितों और विधिक सेवा संस्थाओं के बीच इंटरफेस के रूप में कार्य करेंगे। एसिड हमलों के पीड़ितों तक पहुँचने के लिए सर्वसंभव प्रयास किया जाएगा।

विधिक सेवा क्लिनिक

क )राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण अस्पतालों में विधिक सेवा क्लिनिक स्थापित करेंगे जिनमें जलने के उपचार की विशेष सुविधाएं उपलब्ध हों और जहां एसिड हमलों के पीड़ितों को उपचार के लिए भेजा जा सके। ऐसे विधिक सेवा क्लिानिकों के लिए प्रतिनियुक्त पैरा लीगल वॉलंटियर्स और पैनल वकील एसिड हमलों के पीड़ितों और उनके संबंधियों के साथ नियमित रूप से संपर्क में रहेंगे और उपयुक्त चिकित्सा सहायता एवं उपचार प्रदान करने के लिए उनकी सभी प्रकार से सहायता करना सुनिश्चित करेंगे।

ख) पैरा लीगल वॉलंटियर्स एसिड हमलों के पीड़ितों के परिवारों को सहायता और समर्थन प्रदान करेंगे तथा जब उनके लिए परामर्श की आवश्यकता हो तब उनके लिए व्यवस्था करेंगे ताकि वे एसिड हमले की घटना से लगे सदमे से बाहर आ सकें।

ग) पैरा लीगल वॉलंटियर्स एसिड हमलों के पीड़ितों को उस अस्पताल से, जहां उनका पहली बार उपचार किया गया था, इस आशय का एक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में भी सहायता करेंगे कि वह व्यक्ति एसिड हमले का पीड़ित है। उस प्रमाण-पत्र का उपयोग पीड़ित द्वारा उपचार और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी करवाने अथवा दिनांक उच्चतम न्यायालय द्वारा 10.4. 20 1 5 के आदेश में दिए गए निर्देश के अनुसार, राज्य सरकार अथवा संघ राज्य क्षेत्र की अन्य योजनाओं के लिए किया जा सकता है।

घ) पैरा लीगल वॉलंटियर्स यह सुनिश्चित करेंगे कि एसिड हमलों के पीड़ित उनके लिए उपलब्ध विभिन्न पुनर्वास सेवाएं प्राप्त करने में समर्थ हों।

ङ) विधिक सेवा क्लिनिक यह सुनिश्चित करेंगे कि एसिड हमलों के पीड़ितों को सतही कारणों से उपचार से वंचित करने वाले अस्पचतालों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए।

च) विधिक सेवा क्लिनिक खोले जाने की सूचना सभी सरकारी निकायों और विभागों सहित पुलिस, गैर-सरकारी संगठनों को दी जाएगी।

छ) इस प्रकार स्थापित विधिक सेवा क्लिनिक अपने कार्यकरण, अवसंरचनात्मक सुविधाओं, रिकार्डों और रजिस्टरों के रखरखाव, पैरा लीगल वॉलंटियरों की प्रतिनियुक्ति करने और ऐसे क्लिनिकों पर नियंत्रण के मामले में, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (विधिक सेवा क्लिनिक) विनियम, 2011 के द्वारा अभिशासित होंगे।

सरकारी विभागों के साथ समन्वय

क) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण संबंधित पीड़ित क्षतिपूर्ति योजनाओं को संशोधित कर उन्हें उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी किए गए निदेशों के अनुरूप बनाने के लिए राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के साथ समन्वय करेंगे।

ख) राज्यों विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करने के लिए संबंधित सरकारी एजेंसियों के संपर्क में रहेंगे कि एसिड हमलों के पीड़ितों को क्षतिपूर्ति के रूप में वितरण हेतु पर्याप्त निधियां उपलब्ध रहें।

ग) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण एसिड हमलों के पीड़ितों के नामों को निःशक्तता सूची में शामिल करने के संबंध में उपयुक्त कदम उठाने के लिए इस मामले को संबंधित राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के साथ उठाएंगे और तत्पश्चात् यह सुनिश्चित करेंगे कि उन्हें निःशक्तजनों के लिए उपलब्ध सभी योजनाओं का लाभ प्राप्त हो।

डाटाबेस

क) सभी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण एसिड हमलों के पीड़ितों से जुड़ी मौजूदा केंद्रीय अथवा राज्य योजनाओं, नीतियों, विनियमों, नीति-निर्देशों का एक डाटाबेस बनाएंगे और उस जानकारी का प्रसार करने तथा जागरूकता पैदा करने के लिए पैम्फलेटों अथवा बुकलेटों के रूप में प्रकाशित कर सकते है।

ख) सभी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण अस्पतालों का डाटाबेस बनाएंगे जहां जले हुए पीड़ितों के उपचार हेतु विशेष सुविधाएं उपलब्ध हों।

ग) बनाई गई सूचियों को वार्षिक रूप से सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को परिचालित किया जाएगा जो उन्हें आगे तालुका विधिक सेवा समितियों, ग्राम पंचायतों,विधिक सेवा क्लिनिकों और पैरा लीगल वालंटियरों को परिचालित करेंगे।

घ) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण सूची को अपनी वेबसाइट पर भी अपलोड करेंगे।

विभिन्न योजनाओं का कार्यान्वयन

क) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण एसिड हमलों के पीड़ितों के लिए मौजूदा नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों के संबंध में जानकारी का प्रसार करने के लिए सभी कदम उठाएंगे।

ख) प्रदान की जाने वाली विधिक सेवाओं में लाभार्थियों को उन अलग-अलग सरकारी योजनाओं और उनके तहत लाभों के बारे में जानकारी देना; लाभार्थियों को योजनाओं के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु अपेक्षित दस्तावेज प्राप्त करने में सहायता करना; लाभार्थियों को उस पदनामित प्राधिकारी अथवा अधिकारी का नाम और पता बताना जिनसे उन योजनाओं का लाभ प्राप्त करने हेतु संपर्क किया जा सके; लाभार्थियों के साथ किन्हीं योजनाओं के तहत संबंधित पदनामित प्राधिकारी अथवा अधिकारी के कार्यालय में पैरा लीगल वालंटियर को भेजना शामिल होंगे।

ग) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण सभी सरकारी निकायों अथवा कार्यकर्ताओं, गैर-सरकारी संगठनों और एसिड हमलों के पीड़ितों के कल्याण से सरोकार रखने वाले अन्य संबंधित संगठनों के साथ प्रभावी समन्वय एवं इंटरफेस विकसित करेंगे ताकि उनके लिए विभिन्न योजनाओं, विशेष रूप से उनके पुनर्वास संबंधी योजनाओं, के लाभ सुनिश्चित हो सकें।

जागरूकता

क) विधिक सेवा संस्थाएं लोगों को एसिड हमलों के पीड़ितों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करेंगी ताकि समुदाय उन्हें उनके पुनर्वास हेतु आवश्यक सहायता प्रदान कर सके।

ख) जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ-साथ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना एवं उसके तहत पात्रताओं और विभिन्न कानूनों एवं सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम संचालित करेंगे।

ग) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और तालुका विधिक सेवा समितियां एसिड हमलों के पीड़ितों को उनकी पात्रताओं के अनुसार विधिक सेवाओं की उपलब्धता के बारे में जागरूकता भी पैदा करेंगे।

घ) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और तालुका विधिक सेवा समितियां इस बात पर प्रकाश डालने के लिए जागरूकता अभियान चलाएंगे कि एसिड की ओवर द काउंटर बिक्री प्रतिबंधित है। पैरा लीगल वालंटियर को एसिडों की बिक्री की किन्हीं घटनाओं की जानकारी मिलने पर वे इसकी सूचना संबंधित विभाग अथवा जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को दे सकते हैं ताकि तत्काल उपयुक्त कार्रवाई की जा सके।

ङ) जागरूकता फैलाने के सभी प्रकार के तरीके अपनाए जाने चाहिए, जैसे दूरदर्शन, आकाशवाणी, पैम्फलेट, पर्चे बांटना।

प्रशिक्षण एवं प्रबोधन कार्यक्रम

क) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पैनल वकीलों और पैरा लीगल वालंटियरों के लिए प्रशिक्षण और प्रबोधन कार्यक्रम संचालित करेंगे ताकि उन्हें एसिड हमलों के पीड़ितों के मामलों पर कार्रवाई करने के तरीकों की जानकारी दी जा सके और उनकी क्षमता, ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि की जा सके। सरकारी कार्यकर्ताओं, पुलिस कार्मिकों, चिकित्सा अधिकारियों और गैर-सरकारी संगठनों जैसे अन्य पणधारियों के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने चाहिए।

ख) राज्य न्यायिक अकादमियों के समन्वय से राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण त्वरित एवं पर्याप्त क्षतिपूर्ति के भुगतान, जिसमें अंतरिम क्षतिपूर्ति और मामलों पर विचार किए जाने के दौरान एसिड हमलों के पीड़ितों के साथ उचित एवं सम्मान जनक व्यवहार शामिल है, सुनिश्चित करने की दृष्टि से न्यायिक अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण/ संवेदीकरण कार्यक्रमों की योजना बनाएंगे और संचालित करेंगे।

स्रोत: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नालसा, भारत सरकार

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