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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ झारखंड का संघर्ष

इस पृष्ठ में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ झारखंड का संघर्ष की जानकारी है I

कोल विद्रोह

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड की जनजातियों का अप्रतिम योगदान रहा है। 1857 के प्रथम संग्राम के करीब 26 साल पहलेकोल विद्रोह ही झारखंड की जनजातियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह किया था। झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का राजनीतिक अर्थ भी पहली बार 1831 के कोल विद्रोह से उजागर हुआ था। उसमें मुंडा, हो, उरांव, भुइयां आदि जनजातियां शामिल हुईं। इस विद्रोह के केंद्र थे रांची, सिंहभूम और पलामू। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यह संभवत: पहला विराट आदिवासी आंदोलन था। इतिहासकार इस विद्रोह को झारखंड क्षेत्रा का विकराल अध्याय मानते हैं। हालांकि इसके पूर्व 1783 में तिलका मांझी का विद्रोह और 1795-1800 में चेरो आंदोलन पूरे झारखंड क्षेत्र में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सुलगती-फैलती 'जंगल की आग' का संकेत दे चुके थे। तिलका मांझी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की चेतना फैलाने वाले 'आदिविद्रोही' थे। उन्होंने 1772 में जमीन व फसल पर परम्परागत अधिकार के लिए संघर्ष छेड़ा। उनके नेतृत्व में संघर्ष का संदेश गांव-गांव में सखुआ का पत्ता घुमाकर किया जाता था। तिलका मांझी ने सुलतानगंज की पहाड़ियों से छापामार युद्ध का नेतृत्व किया था। तिलका के तीरों से अंग्रेज सेना का नायक अगस्टीन क्लीवलैंड घायल हुआ। 1785 में तिलका मांझी को भागलपुर में फांसी दी गयी। वह स्थान आज भागलपुर में तिलका मांझी चौक के नाम से जाना जाता है।

कोल विद्रोह के पहले ही 1795-1800 तक तमाड़ विद्रोह, 1797 में विष्णु मानकी के नेतृत्व में बुंडू में मुंडा विद्रोह, 1798 में चुआड़ विद्रोह, 1798-99 में मानभूम में भूमिज विद्रोह और 1800 में पलामू में चेरो विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की अटूट  शृंखला कायम कर दी थी।

यह स्मरण रखना चाहिए कि छोटानागपुर का क्षेत्र 1765 ई. में अंग्रेजी राज में सम्मिलित हो चुका था लेकिन इस क्षेत्र पर कई-कई साल तक अंग्रेजों का पूर्ण आधिपत्य स्थापित नहीं हो सका। 1816-17 में छोटानागपुर के राजा की दंड-शक्ति पूरी तरह से छीन ली गयी। निरंतर जारी विद्रोहों की वजह से मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के अधीन यहां प्रत्यक्ष शासन की स्थापना हुई। प्रत्यक्ष शासन के साथ शुरू हुई 'रेगुलेशन' की परिपाटी (बिहार में अंग्रेजी राज के विरुद्ध अशांति(1831-1859, संपादक: डा. कालीकिंकर दत्ता)।

छोटानागपुर क्षेत्र में हुए कोल विद्रोह के नायक थे सिंदराय और बिंदराय मानकी। यह विद्रोह 11 दिसम्बर, 1831 को फूट पड़ा। 19 मार्च 1832 को कैप्टन विल्किंसन के नेतृत्व में सेना की टुकड़ियों ने इस विद्रोह को दबा दिया।

संयुक्त कमिश्नर विल्किंसन और डेंट ने, जिनकी नियुक्ति उस विद्रोह को दबाने के लिए हुई थी, विद्रोह की वजहों को रेखांकित करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा - ' पिछले कुछ वर्षों के भीतर पूरे नागपुर भर के कोलों पर वहां के इलाकादारों, जमींदारों और ठेकेदारों ने 35 प्रतिशत लगान बढ़ा दिये हैं। परगने भर की सड़कें उन्हें (कोलों को) बिना किसी मजदूरी के बेगारी द्वारा बनानी पड़ी थीं। महाजन लोग, जो उन्हें रुपये या अनाज उधार दिया करते थे, 12 महीने के भीतर ही उनसे 70 प्रतिशत और कभी-कभी उससे भी ज्यादा वसूल कर लेते थे। उन्हें शराब पर लगाये गये कर, जिसकी दर तो चार आना प्रति घर के हिसाब से निश्चित थी लेकिन जिसकी वसूली आम तौर पर इससे कहीं अधिक की जाती थी और उसके अलावे सलामी के रूप में प्रति गांव एक रुपया और एक बकरी भी ली जाती थी, से सख्त नफरत थी।  कोलों को अफीम की खेती नापसंद थी। हाल में वहां एक ऐसी डाक प्रणाली चलायी गयी थी, जिसका पूरा खर्च गांव के कोलों को वहन करना पड़ता था। कोलों के बीच यह भी शिकायत का विषय था कि जो लोग बाहर से आकर नागपुर में बसे हैं, उनमें से बहुतों ने, जिनका कोलों पर बेतरह कर्ज लद गया है, अपने कर्ज की वसूली के लिए बहुत सख्ती की है। बहुत से कोलों को उनके नाम 'सेवक-पट्टा' लिख देना पड़ा है। यानी उनके हाथ अपनी सेवा तब तक के लिए बेच देनी पड़ी है, जब तक कर्ज अदा नहीं हो जाय। इसका मतलब है अपने आप को ऐसे बंधन में डाल देना कि उनकी पूरी कमाई का पूरा हकदार महाजन बन जाय और वे जीवन भर के लिए महाजन के दास बन जायें।'

बंगाल सरकार को 1 मार्च, 1833 को लिखे विल्किंसन का पत्र, संयुक्त कमिश्नर डेंट की ओर से बंगाल सरकार को भेजी गयी 4 अगस्त, 1833 की रिपोर्ट और 15 मार्च, 1832 को भेजी गयी रामगढ़ के मजिस्ट्रेट नीभ की रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि कोल विद्रोह में छोटानागपुर के कई जमींदार और राज परिवार शामिल थे। नागपुर के राजा और बसिया के कुंअर के बारे में अंग्रेज सरकार का ख्याल था - 'कई कारणों से राजा हमलोगों के आधिपत्य से छुटकारा पाने की इच्छा कर सकता है।' इसी तरह सिंहभूमि में वहां के राजा अचेत सिंह और उसके दीवान पर कोलों को विद्रोह के लिए उकसाने का अभियोग लगाया गया। मानभूमि में, जहां सबसे अंत में विद्रोह हुआ, भूमिज कोलों का नेतृत्व बड़ाभूमि के राजपरिवार के गंगानारायण सिंह कर रहे थे। उनके साथ उस इलाके के और भी कई कुअंर-जमींदार विद्रोह में शामिल थे। पलामू में चेरो और खरवारों ने अपने-अपने सरदारों के नेतृत्व में बगावत की।

1831 में कोल विद्रोह के फूटने की शुरुआती वजहों के बारे लिखते हुए विल्किंसन ने 12 पफरवरी, 1832 की अपनी रिपोर्ट में कहा - 'रांची जिला में ईचागुटू परगने के सिंहराय मानकी के 12 गांवों को कुछ बाहरी लोगों के हाथ ठीका दे दिया गया था। उन लोगों ने मानकी को न केवल बेदखल किया, वरन उसकी दो जवान बहनों को बहका कर उनके साथ बलात्कार भी किया था। इसी तरह एक बाहरी ठेकेदार ने सिंहभूमि जिले के बंद गांव में एक मुंडा के साथ अत्याचार किया और उसकी पत्नी को भगा कर उसकी इज्जत बिगाड़ दी थी। अत्याचार से पीड़ित लोगों को जब इन्साफ करने वालों के यहां से इन्साफ नहीं मिला, तो उन्होंने सोनपुर, तमाड़ और बंदगांव परगनों के सभी कोलों को तमाड़ में लंका नामक स्थान पर एकत्रित होने का आह्नान किया। वहां उन्होंने फैसला किया कि वे अब उन पर हो रहे अत्याचारों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे विरोध में आग लगाने, लूटने और खून करने की कार्रवाई शुरू करेंगे।' 1832 में जनवरी के मध्य तक मुंडारी और उरांव लोग पूरे उत्साह से विप्लव में शामिल हो चुके थे (हंटर: स्टैटिस्टकल एकाउंन्टस, लोहरदगा )। आंदोलन ने शीघ्र ही एक राष्ट्रीय संघर्ष का रूप धारण कर लिया, जिसका स्पष्ट उद्देश्य था - विदेशियों से छुटकारा पाना(जे. रीड: रांची सेटलमेंट रिपोर्ट, पेज 23)

कोल विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों को बड़े पैमाने पर सैनिक कार्रवाई करनी पड़ी। कलकत्ता, बनारस, संभलपुर,और नागपुर, सभी दिशाओं से अंग्रेजी पलटन भेजी गयी। कप्तान विल्किंसन छोटानागपुर पठार के उत्तरी छोर, पिथौरिया नामक स्थान पर 1832 में जनवरी के मध्य में पहुंचा। लेकिन उसका हमला फरवरी के मध्य में शुरू हुआ। पूरी सेना को तीन दलों में बांट कर पूरे प्रांत पर उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए हमला करने को कहा गया। भीषण संघर्ष हुआ। अंग्रेज सेना को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। पिथौरिया और रांची के बीच नगरी के विद्रोहियों ने तो आखिरी दम तक लड़ने की कसम खायी थी। वहां अंग्रेजों ने खास सेना भेजी। उसे स्पष्ट आदेश था कि वह हमला, कत्ल और बर्बादी करे। अंग्रेजों की उस सेना का तीन-तीन हजार विद्रोही कोल सैनिकों ने मुकाबला किया लेकिन अंग्रेज सेना की बर्बरता के सामने वे टिक नहीं सके। नगरी के बहादुर कोल विद्रोही एक-एक कर मारे गये। हंटर ने करीब 40 साल बाद 'स्टैटिस्टकल एकाउंट्स ऑफ बंगाल' नामक किताब लिखी। उसमें उसने लिखा - नगरी गांव के लोग आज भी ऐसे गीत गाते हैं, जो याद दिलाते हैं कि उनके पूर्वज 1832 में किस प्रकार वीरगति को प्राप्त हुए ।' नगरी पर कब्जा होते ही उत्तरी भाग के अधिसंख्य गांव अंग्रेजों के कब्जे में आ गये लेकिन पश्चिम के उरांव और दक्षिण-पूर्व के मुंडारी विद्रोही हथियार डालने को कतई तैयार नहीं थे। पलामू में खरवार लोगों का विद्रोह चरम पर था। यहां तक कि अंग्रेज घुड़सवार पलटन के एक जत्थे को, जो पलामू के रास्ते से छोटानागपुर में घुसने की कोशिश कर रहा था, चेतमा नामक पहाड़ी घाटी में विद्रोहियों के जबर्दस्त हमले का सामना करना पड़ा और हार कर भागना पड़ा। अंग्रेजों को लेस्लीगंज से भी हटना पड़ा और बनाथू नामक स्थान में छिपने को मजबूर होना पड़ा। अंग्रेज सेना के तीनों दलों को फिर से एक स्थान पर इकट्ठा कर हमला किया गया। तब जाकर विद्रोह दबा। विद्रोह के नायक बिंदराय मानकी ने, जो सिंहराय का भाई था, 19 मार्च, 1832 को आत्मसमर्पण किया। हालांकि कोल विद्रोह के शांत होते ही मानभूम जिले में भूमिज जनजातियों का विद्रोह शुरू हुआ। मानभूम (बड़ाभूमि, पातकुम आदि) और सिंहभूम(दालभूम) के कोलों ने बड़ाभूमि राजवंश के गंगनारायण सिंह के नेतृत्व में सशस्त्र आंदोलन शुरू किया। साल का अंत आते-आते विद्रोही नेता बिंदराय मानकी फिर से आंदोलन का नेतृत्व करने लगा, जिसे सरकार ने आत्मसमर्पण के बाद माफ करने की रणनीति अपनायी थी। 1833 के अंत में अंग्रेज सेना को उस बगावत को दबाने में सफलता मिली। गंगनारायण सिंह युद्ध करते हुए हिंदुसाही नामक स्थान पर मारा गया। उसकी वीरता से आतंकित अंग्रेजों की जान में जान तब आयी, जब उसका कटा सर कमिश्नर के सामने पेश किया गया। बिंदराय मानकी को घेर कर पकड़ने में भी अंग्रेज सेना सफल हुई। उसे हजारीबाग जेल में डाल दिया गया।

कोल विद्रोह दबा और तब छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजों का आधिपत्य हुआ। हालांकि उस विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि 1833 में उस साल के 13वें अधिनियम के जरिये उस क्षेत्र से बंगाल सरकार के प्रचलित कानून हटा लिये गये। अंग्रेजों ने छोटानागपुर पर अपनी सत्ता की पकड़ मजबूत रखने के लिए दक्षिण पूर्व सीमा प्रांतीय एजेंसी नामक नन रेगुलेशन प्रांत का निर्माण किया। रांची को इसकी राजधानी बनाया गया। अंग्रेज प्रशासकों ने दालभूम को मिदनापुर से हटाकर मानभूम में मिला दिया। 1838 में जिला का मुख्यालय पुरुलिया को बनाया गया। 1837 में अंग्रेजों ने हो जनजाति को हराकर समझौता किया। कोल्हान क्षेत्र को दक्षिण पश्चिम प्रफंटियर एजेंसी में मिलाया गया। हो बहुल इलाके को कैप्टन थॉमस विल्किंसन ने आरक्षित जनजातीय क्षेत्र (कोल्हान गवर्नमेंट इस्टेट) का दर्जा दिया और प्रशासन के लिए परम्परागत मानकी-मुंडा पद्धति को वित्तीय व न्यायिक अधिकार प्रदान किये। उसे ही 'विल्किंसन रूल' कहा जाता है। इस रूल को आधार बना कर कोल्हान में आज भी स्वायत्तता के संघर्ष को जिंदा रखा गया है। हालांकि 1978-80 में उस संघर्ष का सूत्रपात करने वाले नेता के. सी. हेम्ब्रम पर आज भी राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चल रहा है। वह भूमिगत जिंदगी जी रहे हैं। (इस अधयाय के अंत में इसकी विस्तार से चर्चा की गयी है)।

संताल विद्रोह

कोल विद्रोह के करीब 22 साल बाद 1855-56 में संताल जनजाति के नेतृत्व में संताल परगना की पूरी जनता उठी और उसने विद्रोह की आवाज बुलंद की। लार्ड कार्नवालिस द्वारा लादी गयी 'स्थायी जमींदारी प्रथा' के खिलाफ हुए उस संघर्ष को संताल विद्रोह कहा जाता है। उस विद्रोह की लपटें संताल परगना और भागलपुर से लेकर बंगाल की सीमा और छोटानागपुर के हजारीबाग जिले तक फैलीं। उस वक्त के अंग्रेज अधिकारियों के अनुसार 'वीरभूम जिले में विद्रोह अत्यंत उग्र रूप धरण कर चुका था। वीरभूम के दक्षिण-पूर्व में ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित तालडंगा से लेकर उत्तर-पूर्व में गंगा नदी के तट पर भागलपुर और राजमहल तक विद्रोह की भीषण आग फैली हुई थी। यहां तक कि दामोदर नदी और ग्रैंड ट्रंक सड़क से दक्षिण की ओर संतालों का बढ़ाव रोकने के लिए अंग्रेज गवर्नर जनरल की अंगरक्षक सेना और रामगढ़ घुड़सवार पलटन के साथ भारी फौज तैनात करनी पड़ी थी। उस फौज का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब विद्रोह की आग बुझ रही थी, तब उस क्षेत्र में तीस हजार से अधिक विद्रोही हथियारबंद थे (बंगाल अंडर लेफ्रिटनेंट गवर्नर्स: सी. ई. बकलैंड)। विद्रोहियों को खुले क्षेत्रों से निकालने में अंग्रेजों की जो फौज लगी, उसमें करीब 14-15 हजार सैनिक थे।

संताल लोग वर्तमान छोटानागपुर डिविजन एवं बांकुड़ा, पुरलिया और मेदिनीपुर जिलों की ओर से आकर 18वीं सदी के उत्तरार्ध( और 19वीं सदी के पूर्वार्ध में बिहार के पूर्वी क्षेत्र में बसे थे, जिसे आज झारखंड राज्य का संताल परगना क्षेत्र (पांच जिले - गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़, दुमका और देवघर)। कहा जाता है। 1832-33 में वह दामिन-ई-कोह शासन क्षेत्र के नाम से विख्यात हुआ था। 1837 से यह क्षेत्र शासन संबंधी कार्यों के दीवानी मामलों में जेम्स पौटेंट नामक एक सुपरिन्टेंडेंट के मातहत था और फौजदारी मामलों में भागलपुर के मजिस्ट्रेट के अधीन था। पूरे क्षेत्र के लिए केवल एक मजिस्ट्रेट देवघर में रहता था। न्याय पाने के लिए संतालों को अक्सर बहुत दूर अवस्थित भागलपुर, वीरभूम या ब्रह्मपुर की कचहरियों में जाना पड़ता था।

संताल विद्रोह का मुख्य कारण था - पछाहीं महाजनों और साहूकारों के शोषण और अत्याचारों के खिलाफ संतालों का आर्थिक असंतोष। ये महाजन और साहूकार दामिन-ई-कोह में अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ी संख्या में बस गये थे। उन्होंने संतालों का शोषण कर बहुत थोड़े दिनों में बहुत सम्पत्ति जमा कर ली थी। वे बरसात के कुछ महीनों में संतालों को कुछ रुपये, कुछ चावल या कुछ अन्य सामान उधार देते थे और बड़ी चालाकी से कुछ ही दिनों में जीवन भर के लिए उनके भाग्य-विधता बन जाते थे (द संताल इन्सरेक्शन: डा. के. के. दत्ता, पाकुड़ के सरकारी अभिलेख)। कर्ज चुकाने में संतालों को अपनी जमीन से हाथ धेना पड़ता था और कई को कर्ज के बदले गुलामी स्वीकार करनी पड़ती थी - उन्हें अपने आप को साहूकारों का बंधुआ बनना पड़ता था। गुलामी की उस प्रथा को कानूनी अदालतों में स्वीकृति दी जाती थी।

उस दौर में संतालों के असंतोष की चिनगारी को विद्रोह की ज्वाला में बदला संताल परगना में भगनाडीह गांव के सिद्धू और उसके तीन भाई कान्हू, चांद और भैरव ने। 13 जून से 17 अगस्त, 1855 तक चंद दिनों में ही उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व और पराक्रम से जनता में मुक्ति का ऐसा जज्बा पैदा किया कि अंग्रेजों को संतालों के खिलाफ फौजी कानून की घोषणा करनी पड़ी थी। विद्रोह की भीषण आग बुझाने के लिए लागू सैनिक कानून को 3 जनवरी, 1956 में वापस लिया गया । बागी सरदारों की गिरफ्तारी के लिए बड़े-बड़े इनामों की घोषणा की गयी। मुख्य सरदार के लिए दस हजार, दीवानों में से प्रत्येक के लिए पांच हजार और परगना-सरदारों के लिए एक-एक हजार । यहां तक कि विद्रोह को कुचलने के लिए दानापुर से अतिरिक्त सेना बुलायी गयी और मेजर जनरल लायड ने सैन्य संचालन का पूरा भार अपने हाथ में लिया।

हजारीबाग में उस विप्लव का नेतृत्व लुबिया मांझी, बैस मांझी और अर्जुन मांझी ने संभाला था। गोला, चास, कुजू, बगोदर आदि इलाकों में जनता ने खुल कर विद्रोहियों का साथ दिया। विद्रोहियों ने हजारीबाग जेल तक में आग लगा दी थी। विद्रोह में संताल और अन्य जातियों के हजारों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी। उस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज सेना को एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ा। संताल विद्रोह के बाद ही संताल बहुल क्षेत्रा को भागलपुर और वीरभूम से अलग किया गया और उसे 'संताल परगना' नाम से वैधानिक जिला बनाया गया।

संताल विद्रोह की आग शांत हुई भी नहीं कि भारत की आजादी का पहला महासंग्राम 12 जून, 1857 को झारखंड क्षेत्र के रोहिणी नामक गांव से शुरू हुआ। उस गांव में मेजर मेकडोनल्ड के कमान में थलसेना की 32वीं रेजिमेंट थी। उस कमान के तीन सैनिकों ने विद्रोह कर लेपिफ्टनेंट नार्मन लेस्ली की हत्या कर दी। उस विद्रोह के परिणाम स्वरूप 16 जून को मेजर ने तीनों सैनिकों को फांसी पर लटका दिया। साथ ही रेजिमेंट को रोहिणाी से हटाकर भागलपुर ले जाया गया। इधार छोटानागपुर में उस महासंग्राम में बलिदानियों की कुर्बानी का यह आलम था कि दर्जनों विद्रोही नायकों को फांसी पर लटकाने के बावजूद अंग्रेज शासकों के पांव इस क्षेत्र से उखड़ गये। करीब एक साल तक छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजों का शासन ठप रहा। उस विद्रोह में रांची के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पांडेय गणपत राय, रामगढ़ बटालियन के जमादार माधे सिंह, डोरंडा बटालियन के जयमंगल पांडेय, पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह, विश्रामपुर के चेरो सरदार भवानी राय, टिकैत उमराव सिंह, पलामू के नीलाम्बर एवं पीताम्बर और शेख भिखारी, ब्रजभूषण सिंह आदि कई नेताओं ने बलिदानी भूमिका निभाई। 1858 में अंग्रेजी सेना ने उस विद्रोह को दबाया। 16 अप्रैल, 1858 को कर्नल डाल्टन ने रांची जिला स्कूल के पास ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को एक नीम के पेड़ से फांसी पर लटका दिया। 21 अप्रैल, 1858 को पांडेय गणपत राय को पफांसी दी गयी। इसी तरह टिकैत उमराव सिंह सहित दर्जनों नायक फांसी पर चढ़ गये।

1855-56 के संताल विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने झारखंड क्षेत्र में आतंक के साथ-साथ प्रलोभन का साम्राज्य विकसित किया। इसकी वजह से 1857 के महासंग्राम के बाद पूरे झारखंड क्षेत्र में विद्रोह के स्वर कई सालों तक मंद रहे। स्थायी बंदोबस्ती कानून के जरिये नव जमींदारों को संरक्षण और धर्म परिवर्तन - इन दो हथियारों से अंग्रेज हुकूमत ने झारखंड क्षेत्र में अपने शासन को स्थायित्व प्रदान करने का प्रयास किया। जैसे-जैसे यह प्रयास बढ़ा, असंतोष भी बढ़ने लगा। लेकिन असंतोष को विस्पफोट में ढलने में करीब 26 साल लगे। जमींदारों को संरक्षण और धर्मातंतरण के खिलाफ 1881 में अंग्रेजों को सरदार विद्रोह के रूप में बड़ी चुनौती मिली। परम्परागत स्थानीय स्वशासन की प्रणाली के तहत चुने जाने वाले सरदारों ने मुंडा-उरांवों का एक राजा और राज्य स्थापित करने की घोषणा के साथ विद्रोह का बिगुल फूंका। स्वाधीन राज्य के समर्थन में विद्रोह की आग फैली। आदिवासियों ने जमींदारों को कर देना बंद कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने सैनिक कार्रवाई के जरिये सरदार विद्रोह को दबाया। 19वीं शताब्दी का अंत आते-आते अंग्रेजों को यह एहसास होने लगा था कि झारखंड का आदिवासी जनजीवन संस्कृति की जिस अवधारणा से बंध है, वह सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रणालियों के रूप में विकसित है। आदिवासियों की संस्कृति उनके स्वशासन की सामाजिक-राजनीतिक प्रणालियों में रूपबद्ध है। उन प्रणालियों को तोड़े बिना संस्कृति का वह 'जीवन रस' खत्म होने वाला नहीं, जो आदिवासियों को समाज के लिए कुर्बान होने, सामूहिकता और संघर्ष के लिए फिर- फिर उठ खड़े होने की ताकत देता है। यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि 1891 में रांची में आर्य समाज की स्थापना हुई, जिसने आदिवासियों के शुद्धिकरण का अभियान चलाया।

टाना 1895 में बिरसा आंदोलन शुरू हुआ तो ब्रिटिश हुकूमत को मालूम हो गया कि झारखंड में संस्कृति, धर्म और राजनीति के सूत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और उन सूत्रों से आदिवासी समाज में सामूहिक स्वशासन की लोकतांत्रिक प्रणालियां सदियों पहले विकसित हो चुकी हैं। उन प्रणालियों पर चोट किये बिना लोकतंत्र की आड़ में साम्राज्यवाद के विस्तार का अंग्रेज हुकूमत का सपना कभी साकार नहीं होगा।

बिरसा आंदोलन पूर्ण राजनीतिक स्वाधीनता के आंदोलन के रूप में प्रगट हुआ। अंग्रेज हुकूमत बिरसा आंदोलन को सरदार विद्रोह की कड़ी के रूप में देखती थी। लेकिन बिरसा के नेतृत्व में वह सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए पूर्ण स्वायत्तता और राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन बन गया था। बिरसा मुंडा ने 'अंग्रेजों अपनो देश वापस जाओ' का नारा देकर महान मुंडा उलगुलान का नेतृत्व किया। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता को अस्वीकार करते हुए सरकार को लगान नहीं देने का फैसला किया। सामाजिक विषमता, आर्थिक शोषण और विदेशी सत्ता के खिलाफ बिरसा मुंडा ने ऐसे विराट आंदोलन का सूत्रपात किया कि पूरा झारखंड क्षेत्र उनके नेतृत्व में मुक्ति के लिए जैसे अंगड़ाई लेकर अचानक उठ खड़ा हुआ। आदिवासी समुदाय आदर्श समाज की कल्पना से प्रेरित होकर उनके लिए हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार होने लगा। उनकी लोकप्रियता से ब्रिटिश हुकूमत पहले चिंतित हुई और फिर तो कांपने लगी। 24 अगस्त, 1895 को बिरसा को अचानक गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला कर उन्हें कैद की सजा दी गयी। अंग्रेज हुकूमत ने महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में बिरसा को 1898 में मुक्त किया। उनके बाहर निकलते ही आंदोलन में और तेजी आ गयी। उनके नेतृत्व में हजारों क्रांतिकारी डोम्बारी पहाड़ी पर 8 जनवरी, 1900 को अंग्रेज हुकूमत की गोलियों के शिकार हुए। 3 पफरवरी, 1900 को बिरसा मुंडा पकड़ लिये गये। उन्हें रांची जेल लाया गया। 9 जून, 1900 को उनकी जेल में मृत्यु हुई।

टाना भगत आंदोलन

1912 में बंगाल प्रोविंस से अलग कर बिहार राज्य की स्थापना हुई। उसके बाद झारखंड क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन कीरफ्तार फिर तेज हो गयी। उसमें टाना भगत आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह आंदोलन 1913-14 में शुरू हुआ। आंदोलन गुमला जिला के विशुनपुर थाना, चरपी नावा टोली के जतरा उरांव के नेतृत्व में शुरू हुआ। वह पिछले जनजातीय विद्रोहों से कुछ अलग था। वह धार्मिक सुधार आंदोलन के रूप में पनपा और विकसित हुआ लेकिन जल्द ही उसका राजनीतिक स्वरूप सामने आ गया। उसके तीन मुद्दे स्पष्ट थे –

1 स्वशासन का अधिकार

2 सारी जमीन ईश्वर की है, इसलिए उस पर लगान का विरोध

3 आदर्श समाज की स्थापना के लिए मनुष्य-मनुष्य के बीच गैरबराबरी का खात्मा।

धार्मिक पुनरुत्थान और जातीय परिष्कार के दौर से गुजरते हुए आंदोलन जब शोषण मुक्ति के संकल्प के रूप में व्यक्त हो रहा था, तो ठीक उसी वक्त देश में राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व की बागडोर सत्याग्रही गांधी के हाथ में आ चुकी थी। टाना भगत आंदोलन में शामिल नेता और कार्यकर्त्ता गांधी के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रभावित हुए। स्थानीय माना जाने वाला आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण अंग बन गया। इस बीच झारखंड क्षेत्र कांग्रेस की राष्ट्रीय गतिविधियों का एक जरूरी केंद्र बना। 1915 में मौलाना अबुल कलाम आजाद को रांची के अपर बाजार स्थित वर्तमान आजाद उच्च विद्यालय में महीनों नजरबंद रखा गया। जून, 1917 में चम्पारण सत्याग्रह के सिलसिले में महात्मा गांधी जब बिहार के गवर्नर से मिलने रांची आये तो यहां उनका भव्य स्वागत किया गया। रांची में रौलट एक्ट और जलियांवालाबाग हत्याकांड के खिलाफ गुलाब तिवारी के नेतृत्व में लगातार आंदोलन चला। 1920 में रांची जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना हुई। 10 अक्टूबर, 1920 को दीनबंधु एन्ड्रूज की अधयक्षता में डालटनगंज में बिहार छात्र सम्मेलन हुआ। 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में टाना भगतों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वे रामगढ़, नागपुर और लाहौर के कांग्रेस अधिवेशनों में भी शामिल हुए। टाना भगतों के स्थानीय आंदोलन ने उनके पारम्परिक जीवन में आमूल परिवर्त्तन कर दिया था। आंदोलन के क्रम में टाना भगतों ने रहन-सहन, खान-पान और निजी व सामाजिक रीति-रिवाजों में परिवर्त्तन कर एक नया पंथ ही कायम कर लिया था। उनके लिए शराब और मांस का सेवन वर्जित था। रंगीन कपड़े और गहने धारण करना वर्जित था। शरीर को गोदना से सजाना मना था। शिकार खेलना, अखाड़ा में नाचना और जतरा में भाग लेने पर प्रतिबंध था। आजादी के संघर्ष के लिए भी सादा जीवन और उच्च विचार की राह की तलाश में टाना भगत जब गांधी विचारों के सम्पर्क में आये तो उनको महसूस हुआ कि उनके और गांधी के विचारों में साम्य है। सो टाना भगतों ने अपने जिस आंदोलन को आर्थिक और धार्मिक आधारों पर शुरू किया, उसे देश की आजादी के राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा बनाने के क्रम में चरखा चलाना और खादी के सफेद कपड़े पहनना सहजता से स्वीकार किया। ऐतिहासिक घटनाओं की उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार 1925 में महात्मा गांधी रांची आये तो उन्होंने टाना भगतों के क्षेत्रा का भी दौरा किया था। टाना भगतों ने महात्मा गांधी को अपना नेता माना और उनके नेतृत्व में आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का संकल्प किया। ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी जमीनें छीन लीं। उन पर हर तरह के जुल्म ढाये लेकिन टाना भगत समाज अपने लक्ष्य और दिशा से विचलित नहीं हुआ।

1920 से ही झारखंड क्षेत्र में आजादी के आंदोलन में संघर्ष और रचना के नये-नये आयाम विकसित होने लगे। यहां तक कि कई इलाकों में कांग्रेस के नेतृत्व में 'वन सत्याग्रह' भी चलाये गये। आदिवासी समाज को जंगल पर पुन: वैसा अधिकार प्राप्त हो, जैसा कि अंग्रेजों के आने के पहले था, यही उन सत्याग्रहों का मुख्य उद्देश्य था। 1930 में ये सत्याग्रह खरवार आंदोलन के नाम से चर्चित हुए। 1928-29 में छोटानागपुर उन्नति समाज का गठन हुआ, तो झारखंड क्षेत्र में 'आजादी' के वास्तविक अर्थ को उद्धाटित करने वाले राजनीतिक चिंतन की नयी प्रक्रिया शुरू हुई, जो ठीक आजादी के बाद झारखंड अलग राज्य की अवधरणा के रूप में स्पष्ट रूप से सामने आयी। छोटानागपुर उन्नति समाज ही आगे चलकर आदिवासी महासभा बना और देश आजाद होते ही झारखंड क्षेत्र में झारखंड पार्टी का उदय हुआ, जहां से झारखंड के इतिहास की नयी यात्रा शुरू हुई।

इतिहास कालक्रम

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ शुरू हुए झारखंड आंदोलन के झारखंड अलग राज्य आंदोलन में तब्दील होने तक के इतिहास को इस कालक्रम में बांट कर आसानी से समझा जा सकता है-

कालक्रम

झारखंड आंदोलन

1772-1783

1795-1800

1819-1820

1832-1833

1834

1834

1855-1856

1857

1857

1859

1860-1885

1874

1878

1895-1900

1908

1912

1912

1920

1938

1950

तिलका मांझी आंदोलन।

चेरो आंदोलन।

तमाड़ विद्रोह।

कोल विद्रोह।

विल्किंसन कानून लागू।

भूमिज विद्रोह।

संताल विद्रोह।

संतालपरगना टेनेंसी कानून लागू।

सिपाही विद्रोह।

बिक्री कर कानून लागू।

सरदार आंदोलन।

झारखंड अधिसूचित क्षेत्र की घोषणा।

भारतीय वन अधिनियम पारित।

बिरसा आंदोलन।

छोटानागपुर टेनेंसी कानून लागू।

बंगाल से अलग कर बिहार (उड़ीसा सहित) राज्य का गठन।

टाना भगत आंदोलन।

छोटानागपुर उन्नति समाज।

आदिवासी महासभा।

झारखंड पार्टी।

बहरहाल, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1771 से लेकर 1947 तक जो विद्रोह और आंदोलन हुए, उनके दो सिरे थे। एक सिरा जंगल-जमीन जैसे जीवन यापन के मुद्दों की वजह से स्थानीय और प्रजाति विशेष के नेतृत्व से जुड़ा था और दूसरा सिरा सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों की वजह से आजादी के सार्वदेशिक आंदोलन का अनिवार्य हिस्सा बना। इसीलिए किसी भी आंदोलन में विशेष प्रजाति का बाहुल्य होने के बावजूद अन्य तमाम समुदायों ने उसमें भाग लिया और स्थानीय नेतृत्व होते हुए भी हर आंदोलन ने अपनी सार्वदेशिक छवि पेश करने की कोशिश की। झारखंड क्षेत्र में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 150 साल में हुए विभिन्न आंदोलनों एवं विद्रोहों की एक-दूसरे से जुड़ी कड़ियों को देखे-समझे बिना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की व्याख्या संभव नहीं है।

इतिहास के इस पूरे परिदृश्य के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय संदर्भ को और उनके बीच के सम्बंधों को गहराई से समझने के लिए तीन आंदोलनों का विशेष उल्लेख जरूरी है। एक संताल हूल, दूसरा बिरसा उलगुलान और तीसरा टाना भगत आंदोलन।

 

स्रोत व सामग्रीदाता: संवाद, झारखण्ड

3.09677419355

Binay kumar Feb 12, 2019 01:19 PM

Jharkhand history ki vistrit jankari apdet kare

बबलू कुमार Dec 16, 2017 11:34 AM

पूरा इतिहास अपडेट करते तो अच्छा होता ये तो अधूरा है

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