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सिद्धू - कान्हू: संथाल विद्रोह के प्रणेता

इस पृष्ठ में झारखण्ड के स्वतंत्रता सेनानी सिद्धू - कान्हू: संथाल विद्रोह के प्रणेता के विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायी गयी है।

परिचय

झारखण्ड का इतिहास साक्षी है कि अपनी देशज – जन चेतना की रक्षा के लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहता है। बिहार के जनजातीय समाज में अब तक जितने भी संघर्ष हुए हैं, उनका एक प्रधान पहलु सामुदायिक पहचान बचाना रहा है जोत जमीन के रक्षा के लिए जमीन से जुड़े आदिवासियों के आंदोलन के एक लंबा इतिहास है। अपने भूमि व्यवस्था के शत – विशत होने और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव के फलस्वरूप आदिवासी द्वारा अपनी संस्कृति को पुनर्जीवन देने के लिए भी आंदोलन हुए हैं, सामाजिक आंदोलन की पृष्ठभूमि में सामाजिक संरचना में बदलाव लाने या बदलाव का विरोध करने के लिए संगठित प्रयास ही रहा है।

भारतीय स्वतंत्रता – संग्राम में भी बिहार की जनजातियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1857 का सिपाही विद्रोह वस्तुतः राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी शासन के विरूद्ध स्वतंत्रता की पहली लड़ाई मानी जाती है, किन्तु इसके पूर्व भी स्थानीय या क्षेत्रीय आधार पर आंदोलन हुए हैं। बिहार की जनजातियों ने अपनी समस्याओं, शोषण – उत्पीडन व जुल्म से विवश और व्यथित होकर अंग्रेजी शासन और उसके समर्थन तत्वों, जैसे जमींदार, महाजन अमला, पुलिस आदि के विरूद्ध विद्रोह किया है। 1789  से 1831 – 32 के बीच अनेक जनजातीय आन्दोलन हुए हैं जिनके लिए खूँटी – कट्टी व्यवस्था के विघटन के प्रति प्रतिशोध की भावना मुख्य रूप से उत्तरदायी रही है। 1831 में कोल विद्रोह हुआ। मुंडा, ही उराँव आदि सभी विद्रोह के केंद्र रहे। मानसून में भी भूमिजों का विद्रोह हुआ। इस विद्रोह के दौरान गाँव लुटे गए, जलाये गए तथा पुलिस, सैनिक और नागरिक मारे गये।

ब्रिटिश राज के शुरू के सौ सालों में नागरिक विद्रोहों का सिलसिला किसी खास मुद्दे व स्थानीय असंतोष के कारण चलता रहा। 1763 से 1856 के बीच देश भर में अंग्रेजों के विरूद्ध 40 से ज्यादा बड़े विद्रोह तो हुए। छोटे पैमाने पर तो इनकी संख्या बेशुमार है। धार्मिक नेताओं ने भी विद्रोह के झंडे लहराए। ऐसे ही कुछ विद्रोह बिहार की जनजातियों द्वारा हुए। दरअसल अधिकांश जनजातीय विद्रोहों में उनके जातीय हित की बुनियादी कारण रहे हैं। जनजातियों में संथालों का विद्रोह सबसे जबरजस्त था। भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए यह प्रथम जनक्रांति थी जो संथाल हूल के नाम से प्रसिद्ध हुई।

बिहार की जनजातियों में संथालों की संख्या सबसे अधिक है। इनका मुख्य निवास – स्थल संथाल परगना है जो छोटानागपुर के उत्तरी - पूर्वी छोर पर स्थित है। इनकी बहूलता  के कारण ही संथाल परगना नाम दिया गया है। छोटानागपुर के उत्तरी – पूर्वी छोर पर स्थित है। इनकी बहूलता के कारण ही संथाल परगना नाम दिया गया है। छोटानागपुर में प्रवेश के बाद संथालों ने इसी क्षेत्र को अपना आवास स्थल बनाया। संथाल परगना तब भागलपुर कमिश्नरी का अंग था। हजारीबाग और वीरभूम जिले में संथाल बहुत पहले आ बसे थे। इन्हीं इलाकों से आकर ये संथाल परगना में आ बसे थे। यहाँ के मूल निवासी भोले – भाले पहाड़िया की ओर से कोई खास विरोध नहीं हुआ। जंगल को साफ कर खेती के लायक जमीन तैयार करते गए, गांव बसाते गये। ओ, मैले के विचारानुसार से सर्वप्रथम 1790 – 1810 के बीच यहाँ बसे। इनकी आवा जाही जारी रही। 1836 तक 427 गाँव से कम नहीं बसाये गये। 1851 तक यहाँ संथाली के 1473 गांव बस चुके थे। जिनकी आबादी लगभग 82,795 हो गयी थी।

छोटानागपुर में अंग्रेजों का अधिपत्य 1756 से ही हो चुका था, किन्तु यहाँ की जनजातियों पर नहीं। धीरे – धीरे शोषण और अत्याचार का शिकंजा कसता गया। 1850 तक यहाँ तक के चप्पे – चप्पे में शोषण छा चुका था। संथाल भी इसके शिकार हो गये। ऐसे तो संथाल भोले – भाले शांतिप्रिय और थोड़े से ही संतुष्ट होने वाले होते हैं किन्तु जब उनका शोषण बढ़ने लगा। साहबों की उपेक्षा, महाजनों का शोषण, अमला के भ्रष्टाचार अत्याचार बढ़ते गये। संथाल स्त्रियां भी इस अत्याचार से अछूती नहीं रही। बंगाली – बिहारी महाजन ऋण देकर भारी सूद वसूलते, छोटे बटखरे से इन्हें सामान बेचते और बड़े बटखरे से इनका उत्पादन को खरीदते। इन्हें ठगते भी और ऋण की वसूली बड़ी क्रूरता – कठोरता से करते। न्यायालय दूर, पुलिस संवेदना शून्य। इन्हें कोई इंसाफ नहीं मिलता था। धीरे – धीरे इनकी जमीन भी महाजन हड़पने लगे। अंग्रेजों ने मालगुजारी बढ़ा दी कर लगान नहीं देने पर इनकी संपति को कुर्की जब्ती व नीलामी होने लगी। स्वदेशी महाजन जमींदारी और विदेशी हुक्मरान दोनों ओर से दोहरी मार। इनकी नजर में दोनों दिकू थे जिसके लिए इनके मन में भयंकर आक्रोश पनप चुका था। अतंत: इनका धैर्य टूट गया। संथाल हूल इसी शोषण की देन है।

सिद्धू – कान्हू की जीवनी

संथाल हूल का नेतृत्व भोगनाडीह निवासी चुन्नी मांझी के चार पुत्रों ने किया। ये थे सिद्धू कान्हू, चाँद और भैरव। हूल के समय कान्हू की उम्र 35 वर्ष, चाँद की आयु 30 वर्ष और भैरव की उम्र 20 वर्ष बतायी जाती हैं। सिद्धू सबसे बड़ा था किन्तु उसकी जन्मतिथि 1825  के आस – पास मानी गई है। जब सिद्धू  - कान्हू ने शोषण के विरूद्ध विद्रोह करने का संकल्प ले लिया तो जन समूह को एकजुट करने तथा एकत्रित करने के लिए परंपरागत ढंग से अपनाया। दूगडूगी पिटवा दी और साल टहनी का संदेशा गाँव – गाँव भेजवाया। साल टहनी क्रांति संदेश का प्रतीक है। 30 जून, 1855 की तिथि भगनाडीहा में विशाल सभा रैली के लिए निर्धारित की गई। तीर धनुष के साथ लोगों को सभा में लाने की जिम्मेवारी मांझी/परगनाओं को सौंपी गई। संदेश चारों ओर फ़ैल गया। दूरदराज के गांवों से पद - यात्रा करते लोग चल पड़े तीर – धनुष और पारंपरिक हथियारों से लैस कोई बीस हजार संथाल 30 जून को भगनाडीह पहुँच गये। इस विशाल सभा में सिद्धू कान्हू के अंग्रेज हमारी भूमि छोड़ के नारे गूँज उठे। कभी तिलक ने कहा था। स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था – तुम हमें खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा और गाँधी ने नारा दिया था – करो या मरो। इनसे पहले ही उसी तर्ज पर सिद्धू ने ललकारा था – करो या मरो, अंग्रेजों हमारी पार्टी छोड़ दो।

सिद्धू का लोकतंत्र में विश्वास था। उसने समझ लिया था कि केवल संथालों द्वारा जन – आंदोलन संभव नहीं है। इसलिए औरों का भी सहयोग लिया। इस विद्रोह में अन्य लोग भी जैसे कुम्हार, चमार, ग्वाला, तेली, लोहार, डोम और मुस्लिम भी शामिल हो गये।

सिद्धू  - कान्हू ने हूल को सजीव और सफल बनाने के लिए धर्म का भी सहारा लिया। मरांग बूरू (मुख्य देवता) और जाहेर – एस (मुख्य देवी) के दर्शन और उनके आदेश (अबुआ राज स्थापित करने के लिए) की बात को प्रचारित कर लोगों की भावना को उभारा। सखुआ  डाली घर – घर भेजवा का लोगों तक निमंत्रण पहूंचाया कि मुख्य देवी – देवता का आशीर्वाद लेने के लिए 30 जून को भगनाडीह में जमा होना है। फलस्वरूप 30 जून को भगनाडीह में कोई 30 हजार लोग सशस्त्र इकट्ठे हो गये। उस सभा में सिद्धू को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को प्रशासक और भैरव को सेनापति मनोनीत कर नये संथाल राज्य के गठन की घोषणा कर दी गई। महाजन, पुलिस, जमींदार, तेल अमला, सरकारी कर्मचारी के साथ ही नीलहे गोरों को मार भगाने का संकल्प लिया गया तथा लगान नहीं देने व सरकारी  आदेश हिन् मानने का निश्चय किया गया। नीलहे गोरों ने नील खेतों के लिए संथाली को उत्साहित किया था पर शीघ्र ही उनका शोषण शुरू हो गया था जो बढ़ता ही गया। संथाल उनसे भी क्रोधित थे।

इसी समय एक घटना घटी। रेल निर्माण कार्य से जुड़े एक अंग्रेज ठीकेदार ने तीन संथाली मजदूरिनों  का अपरहण कर लिया। यह आग में घी का काम किया। क्रांति की शुरूआत हो गई। कुछ संथालों ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया। तीन अंग्रेज मारे गये। और अपहृत स्त्रियाँ मुक्त कर ली गई। हूल यात्रा शुरू हुई तो कलकत्ता की ओर बढ़ती गई। गाँव के गाँव लुटे गए, जलाये गये और लोग मारे जाने लगे। कोई 20 हजार संथाली युवकों ने अंबर परगना के राजभवन पर धावा बोल दिया और 2 जूलाई को उस पर कब्जा का लिया। फूदनीपुर, कदमसर और प्यालापुर के अंग्रेजों को मार गिराया गया। निलहा साहबों की विशाल कोठियों पर अधिकार पर अधिकार कर लिया गया। 7 जुलाई को दिघी थाना के दारोगा और अंग्रेजों के पिट्टू, महेशलाल दत्त की हत्या कर दी गई। तब तक 19 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। सुरक्षा के लिए बनाये गये मारटेल टाबर से अंधाधुंध गोलियां चलाकर संथाल सैनिकों को भारी  क्षति पहुँचायी गई। फिर भी बन्दूक का मुकाबला तीर – धनुष करता रहा। संथालों ने वीरभूमि क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और वहां से अंग्रेजों को भगा दिया। वीरपाईति में अंग्रेज सैनिकों की करारी हारी हुई। रघुनाथपुर और संग्रामपुर की लड़ाई में संथाली की सबसे बड़ी जीत हुई। इस संघर्ष में एक यूरोपियन सेनानायक, कुछ स्वदेशी अफसर और 25 सिपाही मार दिए गये। अंग्रेज बौखला गये। भागलपुर कमिश्नरी के सभी जिलों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। विद्रोहियों की गिरफ्तारी के लिए पुरस्कार की घोषणा कर दी गई। उनसे मुकाबला के लिए भी जबरदस्त बंदोबस्त हुआ। बडहैत की लड़ाई में चाँद भैरव कमजोर पड़ गये और जब अंग्रेजों की गोलियों के शिकार हो गए। अब अंग्रेजों ने सिद्धू – कान्हू  के कुछ साथी लालच में आकर अंग्रेजों से मिल गये। गद्दारों के सहयोग से आखिर उपरबंदा गाँव के पास कान्हू को गिरफ्तार कर लिया गया। बड़हैत में 19 अगस्त को सिद्धू को भी पकड़ा गया। मेहर शकवार्ग ने उसे बंदी बनाकर भागलपुर जेल ले गया। दोनों भाईयों को खुलेआम फांसी दे दी गई। सिद्धू को बड़हैत में जिस स्थान पर दरोगा मारा गाया था और कान्हू को भगनाडीह  में ही फांसी पर चढ़ा दिया गया। इसके साथ ही संथाल विद्रोह का सशक्त नेतृत्व समाप्त हो गया। धीरे – धीरे विद्रोह को कुचल दिया गया। 30 नवंबर को कानूनन संथाल परगना जिला की स्थापना हुई और इसके प्रथम जिलाधीश के एशली इडेन बनाये गये। पूरे देश से भिन्न कानून से संथाल परगना का शासन शुरू हुआ।

संथाल हूल का तो अंत हो गया। किन्तु दो वर्ष के बाद ही 1857 में होने वाले सिपाही विद्रोह – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम  - की पीठिका तैयार कर दी गई। आज भी इन चारों भाईयों पर छोटानागपुर को गर्व है और संथाली गीतों में आज भी सिद्धू – कान्हू याद किये जाते हैं। इन शहीदों की जयंती संथाल हूल दिवस के रूप में मनायी जाती है।

स्त्रोत: जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, झारखण्ड सरकार

3.08695652174

राज मुखी Jul 06, 2019 12:10 PM

इन चारो भाईओ के साथ सभी वीर शहीद जवानों को मेरा सलाम. 🙏

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