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स्वतंत्रता समर के अप्रतिम नायक शेख भिखारी

इस पृष्ठ में झारखण्ड के शहीद अमर शहीद शेख भिखारी के विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायी गयी है।

परिचय

भारत माता की बलिबेदी पर अपने आपको उत्सर्ग करने वालों में छोटानागपुर की वीर प्रश्विनी धरा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस धरती की कोख ने अमर शहीद शेख भिखारी को जन्म दिया जिसने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अंग्रेजों की अनके बर्बर यातनाएं सही और हंसते – हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया किन्तु शेख भिखरी जैसे अमर सेनानी अल्प चर्चित हैं और विस्मृति के गहन अंधकार में विलीन हो गये हैं।

छोटानागपुर की वीर भोग्या धरती के अमर लाल शहीद शेख भिखारी के पिता का नाम शेख बूलंदू (बल्दू) था जो अपने समय के एक नामी बहादूर थे। उस समय अनगड़ा थाने के अंतर्गत औरगढ़ नामक एक राज था जिसके राजकुमार ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि उसे हिरण का दूध चाहिए। शेख बूलन्दू ने (बलदू) जंगल से दूध देने वाली एक हिरन को पकड़कर कंधे पर उठाकर राजकुमार के सामने पेश कर दिया था। महारानी ने प्रसन्न होकर एक शाही तलवार और पगड़ी के साथ – साथ बारह गांवों की जमीन्दारी इन्हें जागीर स्वरुप प्रदान की थी। वे बारह गाँव हैं – खूदिया (खौदिया) लूटवा, बोनी लूटवा, कूटे, सांडी (संडिहा), भूसौर, रोल, मूटा, हेन्दा, बेली, चारू, बैठ, नगड़ू। कहा जाता है कि वह तलवार अभी भी जरिया गढ़ (गोबिंदपुर) में उपलब्ध है तथा प्रत्येक वर्ष विजयदशमी के अवसर पर एक जुलूस की शकल में उसे निकाला जाता है  तथा उसके प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया जाता है।

नायक शेख भिखारी की जीवनी

शेख भिखारी का जन्म 1819 ई. में ओरमांझी थाना के ग्राम खूदिआ (खोदया) में हुआ था। खुदीआ, लूटवा गाँव और मांझी से 9 किलोमीटर दूर सिकिदरी जाने वाले मार्ग पर स्थित है। 1857  ई. में शेख भिखारी की उम्र 38 साल थी, बचपन से ही सैन्य संचालन में दक्षता के साथ जमीन्दारी के कामों का भी उन्हें अच्छा खासा अनुभव था और मांझी खटंगा के राजा टिकैत उमराव सिंह न उनकी वीरता एवं बुद्धिमता से प्रभावित होकर ही उन्हें अपना दीवान नियुक्त किया था। इसके अतिरिक्त ठाकुर विश्वनाथ शाही (बड़कागढ़ – हटिया) ने शेख भिखारी को मुक्तिवाहिनी का सक्रिय सदस्य बनाया था जिसमें ठाकुर विश्वनाथ शाही, पाण्डेय गणपत राय (भौनरो) जयमंगल पाण्डेय, नादिर अली खां, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी, बृज भूषण सिंह, चमा सिंह, शिव सिंह, रामलाल सिंह, बृज राम सिंह आदि थी। शेख भिखारी टिकैत उपरव सिंह के दीवान थे। 1857 की क्रांति में राजा उमराव सिंह, उनके छोटे भाई घांसी सिंह और उनके दीवान शेख भिखारी ने जिस शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन किया था उनकी अनुगूंज आज भी ओरमांझी और उसके निकटवर्ती इलाकों में सुनाई पड़ती है।

रांची जिला में डोरंडा की सेना ने 31 जुलाई 1857 ई. को जो विद्रोह किया तह उसका नेतृत्व जमादार माधव सिंह और सूबेदार नादिर अली खां ने किया था जिसका केंद्र चुटूपालू घाटी तथा ओरमांझी था। शेख भिखारी इस संग्राम में सम्मिलित थे। रणकुशल एवं दूरदर्शी शेख भिखारी ने सूबेदार नादिर अली, जमादार माधव सिंह को हर संभव सहयोग का विश्वास दिलाया, अंग्रेज कप्तान ग्राहम तथा तीन अन्य अंग्रेज हजारीबाग भाग गये। दो तोपों को रांची की तरफ मोड़ दिया गया, शेख भिखारी ने सैन्य सामग्रियों को ढोने के अतिरिक्त क्रांतिकारियों को अनके प्रकार से सहायता प्रदान की।

झारखंड के आंदोलन में सक्रियता

2 अगस्त 1857 ई. को दो बजे दिन में चुटूपालू की सेना ने रांची नगर पर अधिकार स्थापित कर लिया, उस समय छोटानागपुर का आयुक्त इ. टी. डाल्टन था। डाल्टन सहित रांची का जिलाधिकारी डेविस न्यायधीश ओकस तथा पलामू का अनुमंडलाधिकारी वृच सभी कांके, पिठोरिया के मार्ग से बगोदर भाग गए। इस विपति के समय सिख सैनिकों ने अंग्रेजों का साथ दिया। चाईबासा तथा पुरूलिया में क्रांति को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने सिख सैनिकों से सहायता ली। हजारीबाग में 2 सितम्बर से 4 सितम्बर 1857 ई. तक सिख सैनिकों ने पड़ाव डाले रखा इसी बीच शेख भिखारी हजारीबाग पहुंचे और उन्होंने ठाकुर विश्वनाथ शाही (शाहदेव) का पत्र सिख सेना के मेजर विष्णु सिंह (विशुन सिंह) को दिया तथा अपनी राजनीतिक सूझ – बूझ से मेजर विशुन सिंह को अपने पक्ष में कर लिया। परिणाम स्वरुप मेजर विशुन सिंह के सैनिकों भारतीय क्रन्तिकारियों को पक्ष में कर लिया।

शेख भिखारी ने संथाल परगना में संथाल विद्रोह के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया जिसके फलस्वरूप वहां क्रांति की गति तीव्र हो गई। 1855 में ही सिद्धु और कान्हू ने संथाल परगना में क्रांति का बिगुल बजाया था जिन्हें हजारीबाग के केन्द्रीय कारा में नजरबंद कर दिया गया था। 30 जुलाई 1857 ई. सुरेन्द्र शाही (शाहदेव) के नेतृत्व में इस जेल की दिवार को तोड़कर इन क्रांतिवीरों को आजाद करवा लिया गया तथा हजारीबाग और इसके निकटवर्ती क्षेत्रों यहाँ तक कि इसकी पंचायतों पर अधिकार कर लिया गया और उन पंचायतों पर वहां का पुराना कानून लागू कर दिया गया। शेख भिखारी का महत्वपूर्ण कारनामा रहा चुटूपालू घटी की नाकाबंदी, अब टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी की और अंग्रेजों का ध्यान गया, छोटानागपुर के आयुक्त इ. टी. डाल्टन की धमकियों की इस लोगों ने कोई परवाह नहीं की। अचानक 10 अगस्त 1857 ई. को जगदीशपुर से बाबू कुँवर सिंह के की मित्र वाहिनी के सहायतार्थ कूच करने के निर्णय लिया। मुक्ति वाहिनी  क्रन्तिकारी दस्ता ने डोरंडा से प्रस्थान किया और कुरू (कूडु) चंदवा, बालूमाथ होते हुए चरता पहुंचा, यद्यपि ये लोग डाल्टनगंज के मार्ग से रोहतास जाना चाह रहे थे किन्तु मार्ग की दुरूहता और अवरोधों के कारण बरास्ता चतरा जगदीशपुर के लिए प्रस्थान कर गये। रास्ते में चुटिया के जमींदार भोला सिंह साथ हो गये। सलंगी (बालूमाथ) के जगन्नाथ शाही जो कुँवर सिंह के भाई दयाल सिंह के दामाद थे रस्ते में मुक्ति वाहिनी के साथ हो गये। 30 सितम्बर 1857 ई. को यह दस्ता चतरा पहुंचा एवं फंसीहारी तालाब (मंगल तालाब) के पास पड़ाव डाला। इस दस्ता में उस समय करीब 3000 क्रन्तिकारी सम्मिलित थे। ब्रिटिश सेना में 53वां पैदल दस्ता के 150 सैनिक, 70वीं बंगाल पैदल दस्ता के 20 तथा रैटरी  सिख दस्ता का 150 सैनिक शामिल थे जिनके नेतृत्व मेजर इंग्लिश कर रहा था। उस समय ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी में 70वीं बंगाल दस्ता के लेफ्टिनेंट जे. सी. सी. डानट और  53वीं पैदल दस्ता के साजेग्यंत डानिन भी शामिल थे। मेजर इंग्लिश द्वारा बनाये गये नक्शे के मुताबिक ब्रिटिश सेना ने चतरा शहर में प्रवेश किया।

चतरा का निर्णायक युद्ध 2 अक्टूबर 1857 को लड़ा गया। मुक्ति वाहिनी जगदीशपुर ने पहुँच सकी और उनका मुकाबला ब्रिटिश सेना से हो गया। इस युद्ध का नायकत्व सूबेदार जयमंगल पाण्डेय और सूबेदार नादिर अली खां कर रहे थे। शेख भिखर इस युद्ध में सम्मिलित थे। एक घंटे तक यह संघर्ष चला जिसमें अंग्रेज विजयी रहे। 150 देशी सैनिकों को 03 अक्टूबर को फांसी दे दी गई। 77 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी देने के बाद एक गड्ढे में दफन कर दिया गया। जय मंगल पाण्डेय एवं नादिर अली खां दोनों सूबेदारों को 04 अक्टूबर 1857 ई.को फांसी दी गई। ठाकुर विश्वनाथ शाही, पाण्डेय गणपत राय एवं जमादार माधव सिंह चतरा युद्ध से बच निकले तथा शेख भिखारी चुट्टूपालु घाटू की ओर प्रस्थान कर गए। शेख भिखारी ने अपनी मुहिम जारी रखी। संथाल विद्रोह को कुचलने के बाद मद्रास फौज के कप्तान मेजर मेकडोनाल्ड को बंगाल के गवर्नर ने आदेश दिया कि वह चट्टूपालु घाटी की तरफ बढ़े और शेख भिखारी की फौज का मुकाबला करे। शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह चुट्टूपालु पहुँच गए तथा अंग्रेजों का रास्ता रोका। उन्होंने घाटी की तरफ वाली सड़क के पुल को तोड़ डाला, पेड़ों को काटकर सड़क पर डाल दिया और स्वयं ऊपर से अंग्रेजों पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया, जब गोलियां समाप्त हो गई तब ऊपर से पत्थर लुढकाना शुरू किया किन्तु अंग्रेज उनके पास गुप्त मार्ग से पहुँच गए। गोलियां तो पहले ही समाप्त हो चुकी थी। अंग्रेज सैनिकों ने शेख भिखारी तथा टिकैत उमराव सिंह को कैद कर लिया, यह घटना 6 जनवरी 1858 ई. की है। दुसरे दिन 07 जनवरी को नाममात्र के लिए एक अदालत बैठी और शेख भिखारी तथा उनके साथियों को मृत्यु दंड सुना दिया गया।

स्वतंत्रता संग्राम के पुजारियों को भयभीत करने के लिए टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी को दृष्टान्त योग्य सजा की गई। जब चुट्टूपालु की घाटी में भीड़ बढ़ती गई, परिजनों का करुण क्रंदन बढ़ता गया अपार भीड़ के उमड़ते हुए आवेग से भयभीत होकर मेकडोनाल्ड ने रांची – ओरमांझी रास्ते में मोराबादी टैगोरहिल के निकट एक पेड़ (बरगद) की दो टहनियों पर लटका कर, एक झटके में बंधन काट डाला तथा शेख भिखारी और टिकैत उमराव का शरीर फट कर दो टूकड़े हो गया, इतनी दर्दनाक मौत को इन वीर बांकूड़ों ने गले लगा लिया और उनके लाशों को चुटूपालू लाकर कर एक बरगद के पेड़ पर लटका दिया गया। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि चुटूपालू घाटी में ही इन्हें फांसी दी गई जिसके कारण उस बरगद के पेड़ को फंसियारी बरगद कहा जाता है – जबकि दूसरी ओर मोराबादी के इस ऐतिहासिक स्थल को आज भी लोग फांसी टोंगरी कहते हैं। चुटूपालू की घाटी में लटकाई इन दोनों शूरमाओं की लाशों को चील कौओं ने नोच – नोच कर अपना पेट भरा। 8 जनवरी 1858 ई. को इन अमर शहीदों ने स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने को न्योछावर कर दिया। किन्तु इस ऐतिहासिक अन्य का घाव अब भी हरा है,  अमर शहीद शेख भिखारी, नादर अली खां को लोग तेजी से भूलते जा रहें है। रांची नगर के चौराहों पर लगाये जाने वाली प्रतिमाओं में इन शहीदों को लोग ढूंढते हैं जो कहीं नहीं दिखाई पड़ते। गुमनामी के गहरे अंधेरें में ये खो गये हैं।

स्त्रोत: जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, झारखण्ड सरकार

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