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फैसले

इस भाग में बाल सुरक्षा और किशोर न्याय व्यवस्था के अंतर्गत अलग-अलग जगह से सरकारें विभिन्न फैसले लिए जिसके बारे में जानकारी दी गई है।

संजय सूरी एवं अन्य बनाम दिल्ली प्रशासन

1988 एसयूपीपी  एससीसी  160; 1988 एससीसी (सीआरआई ) 148; एआरआई  1988 एससीसी 414; 1988  (सीआरआईएलजे) 705 (एससी)

यह मामला तिहाड़ जेल में बच्चों को रखें जाने का था, और फलस्वरूप किशोरों को रखने के लिए अगल ढाँचा खड़ा किया गया, किशोरों को रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने तिहाड़ जेल में किशोरों के बोर्ड में जाँच के लिए जिला न्यायालय को नियुक्त किया उस जांच से यह निष्कर्ष निकलता की ज्यादातर किशोर कैदी, वयस्क कैदियों द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार बनाए जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने खानापूर्ति की, हम यह सुनिश्चित करने के लिए आतुर हैं कि बाल कानूनों के अंतर्गत कोई भी बच्चा जेल न भेजा जाए क्योंकि अन्यथा बाल कानूनों का बचों को जेल की जिन्दगी के बुरे प्रभाव से बचाने का ध्येय पूरा नहीं होगा। इस फैसले ने सिखाया कि हर मजिस्ट्रेट या पेशी न्यायाधीश द्वारा जारी वारंट पर कैद किए जाने वाले व्यक्ति की आयु साफ साफ लिखी है। ऐसे मामले जिनमें आयु के मामले में कोई संदेह हो सिर्फ पेशी के दौरान ही नहीं और हर वारंट पर कैद किए जाने वाले व्यक्ति की आयु लिखी होनी चाहिए। इसके आगे जाने जेल अधिकारीयों को भी निर्देश दिया, हम देश भर की जेल प्राधिकरणों का आह्वान करते हैं कि ऐसा कोई भी वारंट स्वीकार न किया जाए जिसपर अपराध करने वाले की आयु लिखी हो। हमारे इस फैसले के जरिए हम इस बात को साफ करते हैं कि जेल अधिकारीयों को यह खुली छूट है कि वे किसी वारंट को स्वीकार करें से इंकार कर दें जाने पर हिरासत में रखे जाने वाले व्यक्ति की आयु न लिखी हो।

सनत कुमार सिन्हा बनाम बिहार सरकार एवं अन्य

1991 (2) क्राइम 241

यह जनहित याचिका किशोर मामलों के लम्बी अवधि तक रुके रहें के सम्बंध में दायर की गई थी।

4. विभिन्न न्यायालयों से प्राप्त रिपोर्टों से निकाले गए तथ्यों के अनुसार यह लगता हैं कि कुछ मामलों में जाँच रुकी हुई है पर पेशियाँ एक ऐसी अवधि से जारी हैं जो 5 वर्षों तक खिंच गई है, और काफी बड़ी संख्या में मामलों में किशोर अब भी जेल में हैं। मामलों में यह स्थिति सभी सम्बंधित विभागों में एक लापरवाही है। हम इसलिए, सभी अपराधी पेशियों में जो 3 सालों या अधिक अवधि से रुके हुए हैं, ऐसे किशोरों के मामलों को खत्म करने और हिरासत में बंद किशोरों को बरी करने का निर्देश देते हैं। इसके बाद उन्हें मामले के अनुसार हिरासत या कैद से, मामले के अनुसार मुक्त किया जाएगा। आगे, जिन पेशियों के मामले 3 वर्ष से कम अवधि से चल रहे हैं उस पर किशोर न्याय अधिनियम के अनुसार न्यायालय को मामले का निपटारा करना चाहिए और सात वर्ष से अधिक सजा के मामलों में शिला बरसे के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार मामले का निपटारा कर देना चाहिए, अन्य मामलों में न्यायालय को आरोप पक्ष व बचाव पत्र को सबूत पेश करने का आखरी मौका देगा, मामले को बंद कर देना चाहिए और कानून के अनुसार उन्हें निपटाने की और बढ़ना चाहिए। पटना उच्च न्यायालय ने यह निर्देश भी दिए कि किशोरों को पेशी चलते वक्त जमानत पर रिहा किया जाए, इसके आगे, उच्च न्यायालय ने सरकार व समाज को यह भी याद दिलाया कि यह उनकी जिम्मेदारी है कि इस प्रकार छूटे किशोरों को अपराधी अपने काम के लिए इस्तेमाल न करें, जिसे उनके लिए बोर्डिंग स्कूलों द्वारा सही शिक्षा सुनिश्चित करके किया जा सकता है, ताकि वे आम परिवेश में बड़े हों।

कर्नाटक राज्य बनाम हर्षद

2005 (सीआरआईएलजे ) 2357  (कर्नाटका)

उच्च न्यायालय के समक्ष यह सवाल थाई कि क्या स्तर न्यायालय या फ़ास्ट ट्रैक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में किशोर मामलों को निपटा सकते हैं या नहीं। न्यायालय ने यह खासतौर पर खा कि किशोर न्याय अधिनियम 2000 की धारा 6 (1) के अनुसार सिर्फ किशोर न्याय बोर्ड को यह अधिकार है कि कानून का उल्लंघन करने वाले किशोरों से निपटे और यहाँ तक कि सत्र न्यायालय या फ़ास्ट ट्रेक न्यायालय सहित किसी भी अन्य न्यायालय का हस्तक्षेप रोका जाना चाहिए।

इसके आगे, सरकारी वकील द्वारा यह बताए जाने पर कि पूरे राज्य में सिर्फ पांच किशोर न्याय बोर्ड स्थापित किए गए हैं। और हर किशोर न्याय बोर्ड एक जिले के समूह में आने वाले मामलों को देखता है, उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार को हर जिले में एक किशोर न्याय बोर्ड स्थापित करने की जरूरत के बारे में सोचना चाहिए।

पूर्व जनरल अजित सिंह बनाम भारत सरकार

2004 (सीआरआईएलजे) 3994

याचिका दायर करने वाला एक किशोर था जिसे फ़ौज में भर्ती किया गया था और कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया में कड़ी मेहनत के साथ कारावास का दंड सात वर्षों के लिए फ़ौज अधिनियम 1950 के अंतर्गत दिया गया था। उच्च न्यायालय ने यह फैसला किया कि किशोर न्याय (बच्चों को देख रेख एवं सुरक्षा) अधिनियम 2000 फौर्ज अधिनियम 2950 को प्रावधानों के ऊपर है, इसलिए आम कोर्ट मार्शल को किशोर के मामलों को निपटाने का कोई अधिकार नहीं है।

राजिंदर चंद्रा बनाम छत्तीसगढ़ सरकार एवं अन्य

(2000) 2 एससीसी 287; 2002 एससीसी  (सीएच) 333 ; आईआरआई   2002 एससी 748; 2002  सीआरआईएलजे 1014 (एससी)

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष में सवाल उठा की 16 वर्ष की आयु पर पहुँचने वाला किशोर आरोपी कैसे निपटाया जाए, और यह तय किया गया कि उनके सात किशोरों जैसा व्यवहार ही किया जाएगा। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अर्णित दस के मामले का हवाला देते हुए यह फैसले लिया न्यायिक मत पर पुनर्दृष्टि डालते हुए यह न्यायालय आयु निर्धारण के मामले पर यह तय करती है कि किसी किशोर पर उच्च तकनीकी तरीके नहीं अपनाए जाएंगे और आरोपी द्वारा आवेदन किए जाने पर कि वह किशोर है और इसके लिए दिए गए सबूत पर यदि कोई दो राय है तो न्यायालय को किशोर लगने वाले आरोपियों को किशोर मान लेना चाहिए और इसके समर्थन में फैसला लेना चाहिए।

भोला भगत बनाम बिहार राज्य

(1997) 8 एससीसी 720; एआईआर 1998 एससी 236

अपराध  के चार वर्ष बाद दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत दर्ज किए जा रहे बयान में भोला भगत ने अपनी आयु 18 वर्ष बताई और सह आरोपियों चंद्रसेन प्रसाद व मानसेन प्रसाद ने क्रमश: 17 व 21 वर्ष, उच्च न्यायालय ने उसे किशोर कानून, यानि बिहार बाल अधिनियम 1970, की सुरक्षा नहीं दी, क्योंकि न्यायालय का मानना था कि बयान के अलावा कोई और सबूत नहीं था अपराध की तिथि को वे किशोर थे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह राय दिया की यदि उच्च न्यायालय को आवेदन कर्ताओं के बयान के अलावा कोई और सबूत नहीं था अपराध की तिथि को वे किशोर थे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह राय दिया कि यदि उच्च न्यायालय को आवेदन कर्त्ताओं के बयान व पेशी न्यायालय के आंकलन पर कि, आरोपियों की आयु क्या है, कोई संदेह था रो उसे जाँच के आदेश देने चाहिए थे, न्यायालय को उनका आवेदन ऐसी किसी जाँच के बगैर, ठुकराना नहीं चाहिए था। सर्वोच्च न्यायालय ने भोला भगत व उसके सह आरोपियों को किशोर माना, पेशी न्यायालय द्वारा दिए गए लगभग आयु के सही होने पर न तो उच्च न्यायालय ना ही इस न्यायालय द्वारा कोई संदेह या सवाल उठाया गया है। इसका अर्थ है कि इन पक्षों द्वारा इस आयु के आंकलन को स्वीकार किया गया है। इसलिए इन तीन आवेदन कर्ताओं को किसी सामाजिक रूप से प्रगतिशील विधान के प्रावधानों के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, हमारी राय है कि, चूंकि यह आवेदन पहली बार उच्च न्यायालय के समक्ष किया गया और उनकी लगभग आयु के आंकलन को झुठलाया नहीं गया है, शि यही होगा की यह माना जाए कि अपराध के दिन, इनमें से हर आवेदन कर्त्ता बच्चे की परिभाषा के अंतर्गत ही आता था। इन परिस्थितियों में यह इस बात को नजर अंदाज नहीं कर सकते कि पेशी न्यायालय के आंकलन के अलावा, आयु का कोई और भौतिक सबूत नहीं और चूंकि इस आंकलन के सही होने पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है, इसलिए तकनीकी तौर पर इस कानून के प्रावधानों को दिया जाना चाहिए।

भोला भगत चंद्रसेन प्रसाद व मानसेन को आजीवन कारावास से रिहा करते हुए और उनके अपराध को मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा।

1.8 इस फैसले को पूरा करने से पहले हम इस बात पर फिर से जोर देना चाहेंगे कि जब कोई आवेदन आता है कि अपराध के वक्त आरोपी इस कानून में दी गई बच्चे की परिभाषा के भीतर आता था तो न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि यदि उसे आरोपी द्वारा बताई गई आयु पर संदेह है तो खुद उसकी आयु के सम्बन्ध में जाँच करे या जाँच के आदेश दे व इसकी रिपोर्ट प्राप्त करे और अगर जरूरत हो तो पक्षों को इस सम्बन्ध में सबूत पेश करने के लिए कहे। इस सामाजिक नजरिये वाले कानून के लाभकारी प्रावधानों को देखते हुए यह न्यायालय के लिए अनिवार्य है कि जब भी किसी न्यायालय के समक्ष ऐसी कोई अर्जी आती है तो वह ऐसे मामले की जाँच करे और बिना किसी सकारात्मक परिणाम को दिए न्यायालय आरोपी को इस कानून के प्रावधानों के लाभ से वंचित नहीं कर सकती। किसी भी प्रकार न्यायालयों को जाँच करनी है और आयु के संदर्भ में एक परिणाम बताना ही है। हम यह उम्मीद करते हैं कि उच्च न्यायालय और इसके नीचे के निपटेंगे अन्यथा इस कानून के ध्येय व विधान व्यवस्था का यह ध्येय कि अपराधी बच्चे का सुधार कर उसे समाज के उपयोगी सदस्य की तरह विकसित करना ही पाएगा।  उच्च न्यायालय अपने अधीन न्यायालयों को यह प्रशासनिक निर्देश दे सकते हैं कि उनके समक्ष जब भी कोई ऐसा आवेदन आए और इस आवेदन समक्ष जब भी कोई ऐसा आवेदन से संबंधित कोई भी संदेह पैदा हो तो, एक नियम की तरह उन्हें एक जाँच करनी है जिसमें वे पक्षों को इससे सम्बन्धित साक्ष्य पेश करने को कहेंगे और आरोपी की आयु के संदर्भ में एक परिणाम को पेश करेंगे और फिर कानून के अनुसार इस मामले निपटेंगे।

भूप राम बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(1989) 3 एससीसी 1; 1989 एससीसी (सीआरआईएल) 486; एआईआर 1989  एससी 1329; (1989) 2 क्राइम्स 294.

इस नियम मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एकमात्र प्रश्न यह था कि आवेदन कर्ता मो कि आरोपी है, अपराध के दिन किशोर था या नहीं और इसलिए उसे उत्तर प्रेदश बाल अधिनियम 1951 के प्रावधानों के अंतर्गत उससे निपटा जाए या नहीं। विद्यालय प्रमाणपत्र और चिकित्सकीय जाँच के परिणामों में अंतर था। विद्यालय प्रमाणपत्र के अनुसार आवेदन अपराध की तिथि पर किशोर था जबकि चिकित्सकीय जाँच रिपोर्ट यह बताते थे कि वह किशोर होने की आयु पार कर चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरोप व बचाव पक्ष के वकीलों की दलीलों को सुने के बाद यह तय किया भूप राम अपराध के दिन किशोर था।

यह राय लेने के पीछे तीन कारण है। पहला यह कि आवेदक ने एक विद्यालय प्रमाणपत्र पेश किया जिसमें उसकी जन्म तिथि 24 जून 1960 है। हमारे पास कोई आधार नहीं है यह मानने के लिए कि पेश किया गया विद्यालय प्रमाणपत्र उसका नहीं है या उसमें दी गई जानकारी सही नहीं हैं .. दूसरा यह कि सत्र न्यायाधीश यह माने पाने में असमर्थ रहे हैं कि पेशी न्यायाधीश ने भी इस आधार पर कि आवेदक 17 वर्ष का बालक ता, 12 सितंबर 1977 में दिए अपने फैसले में उसे मृत्यूदंड के बजाय अजीवन कारावास का दंड दिया है। पेशी न्यायाधीश के निरीक्षण यह बताते हैं कि अपराध के दिन यानि 3 अक्टूबर 1975 को किशोर 16 वर्ष से कम आयु का था। और तीसरा कारण यह कि हालाँकि, चिकित्सक ने प्रमाणित किया है कि 30 अप्रैल 1987 को उनका मत सिर्फ एक आंकलन है और इसमें गलती होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

आवेदन के अपराधी होने को सही माना गया पर आजीवन कारावास के दंड को खत्म करते हुए उसे तुरंत रिहा कर दिया गया।

जय माला बनाम गृह सचिव, जम्मू व कश्मीर सरकार

(1982) 2 एससीसी 538; 1982 एससीसी (सीआरआईएल)  502;एआईआर 1982 एससी 1297; सीआरआईएलजे 1777 (एससी)

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह ध्यान दिलाया की न्यायिक रूप से रेडियो लाजिकल परिक्षण के अनुसार आयु निर्धारण में गलती की सीमा दोनों और से दो वर्षों तक की है।

मास्टर राजीव शंकरलाल परमार बना, जिम्मेदार अफसर, मलाड पुलिस थाना एवं अन्य 2003 सीआरआईएलजे 4522 (बीओएम)

आरोपी को किशोर घोषित किया गया था पर न तो उसे निगरानी गृह भेजा गया और न ही उसका मामला किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया, उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही, किशोर घोषित किए जाने के तीन महीने बाद, राजीव को निगरानी गृह में भेजा गया। इसलिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के निर्णय को अमल में लेन में तीन महीने का अन्तराल था। 7 मार्च 2003 को पारित इस आदेश को 13 जून 2003 को अमल में लाया गया।

न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को न मानने का तर्क जेलर ने यह दिया कि कोई ले जानेवाले नहीं था। राजीव को 15,000 रूपयों का मुआवजा देने का आदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया। राज्य ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी पर इसका कोई परिणाम नहीं निकला।

मास्टर सलीम इकरामुद्दीन अंसारी एवं अन्य बनाम थाना प्रभारी, बोरीवली पुलिस थाना, मुम्बई एवं अन्य

2005 सीआरआईएलजे (बीओएम)

इस मामले में आरोपी को निगरानी गृह न भेजे जाने का तर्क जेलर द्वारा दिया गया कि हालाँकि उसे स्तर न्यायालय के रजिस्ट्रार की और से सलिम को किशोर घोषित करने वाले आदेश जेल में भेजा गया था। पर वह खो गया। उच्च न्यायालय के अदेशानुसार सलीम को 9 जुलाई 2004 यानी सत्र न्यायालय के आदेश के 7 महीने बाद निगरानी गृह भेजा गया। सलीम को 1,00,000/- रूपये मुआवजा के बतौर दिए गए।

मुम्बई उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम 2000 की धारा 12 के अंतर्गत जमानत की स्वीकृति पर विचार करते हुए, इस धारा के अनुसार प्रथम याचक को मुचलके के साथ या बिना जमानत पर छोड़ा जा सकता है, विचित्र तथ्यों व परिवेश को देखते हुए हम किशोर न्याय बोर्ड को निर्देश देते हैं कि वह प्रथम याचक को सिर्फ बांड भरने पर ही रिहा कर दे।

गोपीनाथ घोष बनाम पश्चिम बंगाल

1984 एसयूयूपी एससीसी 228; 1984 एसयूयूपी एससीसी 228; 1984 एससीसी (सीआरआईएल) 478; एआईआर  1948 एससी237; 1984 सीआरआईएलजे 168 (एससी)

आरोपी ने पहले बार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह दावा किया कि अपराध के दिन वह 18 वर्ष से कम आयु का था और इसलिए पश्चिम बंगाल बाल अधिनियम 1959 के फायदे मिलाना चाहिए, और इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत उसे दिए गए आजीवन कारावास के दंड को कम किया जाए, सर्वोच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय की राय के लिए निम्नलिखित मुद्दे दिए: आरोपी गोपीनाथ घोष (आवेदक) की आयु उस अपराध के दिन क्या थी जिसके लिए उसे दोषी माना गया है? सत्र न्यायाधीश ने एक विस्तृत जाँच की; आरोपी के चिकित्सकीय जाँच के लिए भेजा गया, आरोपी की माँ और उसके लिए विद्यालय के प्रधानाध्यापक से न्यायालय द्वारा पूछ ताछ की गई और उसे किशोर घोषित किया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में देर से किए जाने वाले कैशोर्य के दावे पर भी गौर किया, हम यह मानते हैं कि तकनीकी बात पर ध्यान नहीं देंगे कि वह दावा इस न्यायालय के समक्ष ही पहली बार उठाया गया इस वजह से उन प्रावधानों के लाभ से आवेदक को वंचित रखा जाए जिन पर अन्यथा उसका अधिकार बनता है। दोष व सजा को सही न मानते हुए ख़ारिज कर दिया गया, गोपीनाथ घोष को जमानत देते हुए उसके मामले को किशोरों पर लागू होने वाले कानून के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए सम्बंधित प्राधिकरण के समक्ष भेज दिया गया। गोपीनाथ घोष 10 सालों से जेल में था फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने उसे बरी नहीं किया क्योंकि न तो उसके सामाजिक और न ही पारिवारिक पृष्ठभूमि हमारे सामने है। इसलिए हम नहीं जानते कि किशोर न्यायालय उससे कैसा व्यवहार करता। इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह नजरिया लिया है हाल के महीनों में एक परिस्थिति के विकास से यह न्यायालय के संज्ञान में आया है कि किसी अभियुक्त की आयु, जिससे वह किसी खास अधिनियम के फायदों का दावा कर सकता है जो कि अपराध किशोरों से निपटता है ऐसे मामलों को कई बार इस न्यायालय के समक्ष ही पहली बार उठाया जाता है और यह इस न्यायालय की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे मामलों पर नए सिरे से जाँच करवाए इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को एक हाल सुझाने की जरूरत महसूस हुई।

हमारी राय यह है कि जब भी किसी मामले माँ मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया गया व्यक्ति 21 वर्ष या उससे कम आयु का प्रतीत हो तो मामले की जाँच या प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले अपराध के दिन आरोपी के आयु की जाँच करवायी जानी चाहिए। ऐसा वहाँ पर जरूर ही किया जाना चाहिए जहाँ पर किशोर अपराधियों के लिए खास कानून लागू हो। यदि आवश्यकता हो तो मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी की भी आयु के संबंध में साक्ष्य पेश करने के लिए कहा जा सकता है। इसके बाद जानकर मजिस्ट्रेट कानून के अनुसार प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते है। यदि इस प्रक्रिया को ठीक ढंग से माना गया तो निचली अदालतों में सर्वोच्च न्यायालय व वापसी की मात्रा की टाला जा सकता है, यदि जरूरी पाया गया तो उच्च न्यायालय द्वारा प्रशासकीय निर्देश जारी करके इस मामले से निपटा जा सकता है।

रविन्द्र सिंह गोरखी उत्तर प्रदेश सरकार

(2006) 5 एससीसी 584; 2006  सीआरआईएलजे 279 (एससी)

गोपीनाथ घोष के मामले की तरह इस मामले में भी किशोर होने का दावा पहली बार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ही पेश किया गया। रविन्द्र सिंह गोरखी ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह दावा किया कि वह अपराध के दिन अर्थात 15 मई 1979 को उस वक्त लागू उत्तर प्रदेश बाल अधिनियम 1951 के अनुसार किशोर था। आरोपी के आयु के संबंध में उठा प्रश्न सज्ञ न्यायाधीश को भेजा गया। आवेदक ने अपने विद्यालय प्रमाण पत्र को प्रस्तुत किया था जिसमें उसकी जन्मतिथि 1 जून 1963 थी और इसलिए सत्र न्यायाधीश ने उसे किशोर घोषित किया था। रवीन्द्र गोरखी अपराध के दिन 16 वर्ष से कम आयु का था और इसलिए उत्तर प्रेदश अधिनियम के अनुसार किशोर था।

सर्वोच्च न्यायालय ने सत्र न्यायाधीश की खोज को ख़ारिज करते हुए, आवेदन को ठुकरा दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, विद्यालय प्रमाण पत्र की जानकारी सिर्फ मामले के लिए बनाई गई हो। विद्यालय प्रमाण पत्र कि सिर्फ दूसरी प्रति न्यायालय में पेश की गई थी न कि वास्तविक प्रति इसके अतिरिक्त विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने, जिसने साक्ष्य दिया था, दाखिला रजिस्टर पेश नहीं किया था, यह मान्यन्हीं है। फिर से वास्तविक रजिस्टर पेश नहीं किया गया। ऐसे रजिस्टर की सत्यता पर गौर किया जा सकता था यदि उसे पेश किया जाता।

सुनील राठी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(2006) 9 एससीसी 603; (2006) 3 एससीसी (सीआरआईएल)

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि अपराध के दिन आवेदन किशोर है या नहीं। उच्च न्यायालय ने कागजी साक्ष्यों की जाँच के बात तय किया था कि इससे यह साबित नहीं होता कि सुनील राठी किशोर था। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को न मानते हुए यह निर्देश दिया की आवेदन को जाँच चिकित्सकीय बोर्ड द्वारा की जाए ताकि आयु का निर्धारण किया जा सके।

हमने उच्च न्यायालय का आदेश पढ़ा है उच्च न्यायालय पेश किये गए प्रमाण पत्रों के आधार पर इस नतीजे पर पंहुचा कि इससे यह पूरी तरह साबित नहीं होता कि वह एक किशोर था। हालाँकि जब यह बात उठायी गई तो आवेदक को जाँच चिकित्सकीय बोर्ड द्वारा की जाए ताकि आयु का निर्धारण किया जा सके।

हमने उच्च न्यायालय का आदेश पढ़ा है उच्च न्यायालय पेश किए गए प्रमाण पत्रों के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचा कि इससे यह पूरी तरह साबित नहीं होता कि वह एक किशोर था। हालांकि जब यह बात उठायी गई तो आवेदक को चिकित्सकीय बोर्ड के पास आयु निर्धारण की जाँच के लिए नहीं भेजा गया। आमतौर पर जब कोई साक्ष्य साफ या मानने लायक नहीं होता तो चिकित्सकीय बोर्ड की रिपोर्ट कुछ हद तक उपयोगी होती है।

रईसूल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(1976) 4 एससीसी  301;1976 एससीसी (सीआरआईएल) 613; एआईआर 1977 एससी 1822; 1977 सीआरआईएलजे 1555 (एससी)

सर्वोच्च न्यायालय नई इस मामले में यह निर्णय दिया कि किसी आरोपी की आयु न्यायालयों के आकलन के अनुसार नहीं यह की जा सकती और यह बेहतर होगा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के बयान में अपनी आयु 18 वर्ष होने का दावा किया जो कि अपराध के लगभग एक साल बड दर्ज की गई थी। हालाँकि उत्तर प्रदेश बाल अधिनियम 1951 के अनुसार रईसुल किशोर नहीं था फिर भी उसकी उम्र कम होने के कारण उसके मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।

यह सच है कि जानकार सत्र न्यायाधीश ने आवेदक को देखकर यह तय किया कि वह 24 वर्ष से कम आयु का नहीं हो सकता और उच्च न्यायालय ने भी उसे देखकर यही तय किया की सत्र न्यायाधीश सही थे, पर हमें यह नहीं लगता की सत्र न्यायाधीश और उच्च न्यायालय आवेदक को आयु के बारे में अपने आकलन में सही थे जिसे आवेदक द्वारा दिए गए बयां को न मानते हुए तय किया गया था। महज दिखने भर से धोखा हो सकता है।

जयेंद्र एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(1981) 4 एससीसी 149; एससीसी (सीआरआईएल) 809; एआईआर 1982 एससी 685

इस अपील में यह मुद्दा उठाया गया था कि आवेदक बच्चा था और इसलिए उसको निपटारा उर्र्ट प्रदेश बाल अधिनियम 1951 के अनुसार होना चाहिए था। सर्वोच्च न्यायालय ने जयेंद्र की चिकित्सकीय जाँच करवाई और चिकित्सकीय जाँच रिपोर्ट के आधार पर अपराध के दिन उसे बच्चा घोषित किया इस अपील के निर्णय के समय सर्वोच्च न्यायालय ने उसके अपराधी होने को सही मानते हुए भी उसे छोड़ने का आदेश दिया क्यों कि वह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के दिन तक बच्चा नहीं रह गया था।

में यह प्रावधान है कि जहाँ तक बात जरूरी है कि जब कोई बच्चा कैद की सजा के लायक अपराध करता है तो न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि उसे किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में किसी ऐसी अवधि के लिए भेजा जा सकता है जबा तक वह 18 वर्ष की आयु तक न पहुंचे। आमतौर पर हमने जयेन्द्र को किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में भेजा होता पर इस तथ्य की रोशनी में वह अब 23 साल हो चुका हो, हम ऐसा नहीं कर सकते।

प्रदीप कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

1995 एसयूपीपी (4) एससीसी 419; 1995 एससीसी (सीआरआईएल) 399 एआईआर 1994 एससी 104.

सभी तीन आवेदक उत्तर प्रदेश बाल अधिनियम 1951 के अनुसार बच्चे की परिभाषा के अंतर्गत आते थे, उस तारीख पर जब अपराध हुआ, आवेदनकर्त्ता, प्रदीप कुमार, कृष्णकांत एवं जगदीश ने अपने आवेदन के समर्थन में चिकित्सकीय जाँच रिपोर्ट, कूंडली व विद्यालय प्रमाणपत्र पेश किए किए थे। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, उन्हें मान्यता प्राप्त विद्यालयों में, उत्तर प्रदेश अधिनियम के अंतर्गत, भेजने का कोई सवाल नहीं पैदा होता, अत: उनके अपराधी होने को मानते हुए हम उनकी सजा समाप्त करते हैं और उन्हें छोड़े जाने का देश देते हैं।

उमेश सिंह एवं बनाम बिहार सरकार

(2000)  एससीसी 89; 2000 एससी (सीआरआईएल) 1026; एआईआर 2000 एससी 2111; 2000 सीआरआईएलजे 3167 (एससी)

इस मामले में किशोर होने के दावे को पेशी न्यायालय या उच्च न्यायालय के सामने नहीं उठाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अरविन्द सिंह को विशेषज्ञों की रिपोर्ट की आधार पर किशोर घोषित किया जिसमें यह लिखा था कि अरविन्द अपराध के दिन मुश्किल से 13 वर्ष का था। इस विशेषज्ञों की रिपोर्ट को समर्थन देने के लिए विद्यालय प्रमाणपत्र पेश किए गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने अरविन्द सिंह को दोषी माना पर उसकी सजा माफ़ करते हुए उसे रिहा कर दिया।

उपेन्द्र कुमार बनाम बिहार सरकार

(2005) 3 एससीसी 562; 2005 एससीसी (सीआरआईएल) 778

इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपराधी मानते हुए सजा माफ़ कर दी फलस्वरूप आवेदक को रिहा करने का आदेश दिया जाता है उसे इसके आगे किसी मामले में पेश होने की आवश्यकता नहीं है।

सत्यमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(2005) 11 एससीसी 395

पेशी न्यायालय ने आवेदक को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 व 307 के अंतर्गत अपराध करने के कारण आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस सजा को उच्च न्यायालय ने सही माना था। किशोर होने का कोई दावा पेशी न्यायालय के समक्ष नहीं उठाया गया था, पर जब सजा देने की बात सोची गई तो आवेदक की और से यह बात चिन्हित कि गई कि दिसंबर 1980 में वह 15 वर्ष की आयु का या जब पेशी न्यायालय ने अपना निर्णय दिया था। पेशी न्यायालय ने दिसंबर 1980 आवेदक की आयु 16 से 17 वर्ष के बीच मानी थी। अपराध 1979 में हुआ था। इसलिए पेशी न्यायालय के आकलन के अनुसार के भी अपराध के समय आवेदक की की आयु 15 या 16 थी। पेशी न्यायालय का यह निरीक्षण साफ तौर पर बताता है की कानून की धारा  2 (4) के अनुसार अपराध के वक्त आवेदक के वक्त आवेदक बच्चा था। यह बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय आवेदक को बच्चा घोषित किया जिसका अर्थ है कि वह उत्तर प्रदेश बाल अधिनियम के अनुसार 16 वर्ष से कम आयु का था। न्यायालय ने उसे अपराधी मानते हुए उसकी सजा खत्म कर दी।

शहाबुद्दीन उर्फ़ शाबू बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

2002 सीआरआईएल 4579 (इलाहाबाद)

यह मानते हुए कि किशोर को कैद किया जाना उसकी भलाई के विरूद्ध है। इस किशोर लड़के को जमानत पर उसके पिता द्वारा पुत्र के अच्छे व्यवहार से संबंधित अनुबंध भरवाते हुए छोड़ दिया गया।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी किशोर को कैद में रखना उसे छोड़े जाने से ज्यादा खतरनाक है। उसके जाने-माने अपराधियों के संपर्क में आना अधिक संभावित है ऐसी स्थिति मर उसे पिता द्वारा किए गए अनुबंध द्वारा उसके बेहतर ढंग से रहने और समाज के प्रति अच्छा व्यवहार रखने की शर्त पर उसे छोड़ा जा सकता है।

विजेंद्र कुमार माली इत्यादि बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

2003 सीआरआईएल 4619 (इलाहाबाद)

उच्च न्यायालय ने अधीन न्यायालय द्वारा किसी किशोर को अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत देने से इंकार कने के मामले को निपटाते हुए कहा; इस न्यायालय ने अपने कई आदेशों में खासतौर हुए कहा है कि किसी किशोर के जमानत की अर्जी को सिर्फ मौजूद आधारों पर ख़ारिज कर सकता है। जहाँ तक अपराध की गंभीरता का आधार है. उसे इस अधिनियम के प्रावधानों में नहीं रखा गया है। यदि किसी किशोर के जमानत के आवेदन को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत ही जांचा गया तो फिर इस कानून की कोई आवश्यकता ही नहीं राह जाती। अधिनियम की धारा 12 खुद ही यह कहती है कि दंड प्रक्रिया संहिता 1973, (1974 का 2) या किसी अन्य कानून में दिए गए किसी भी प्रावधान को न मानते हुए किशोर को रिहा कर दिया जाएगा।

दत्तात्रय जी. संखे बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य

2003 एलएलएलएमआर (सीआरआईएल) 1693 (मुम्बई)

इस फैसले द्वारा एक किशोर को इस शर्त पर जमानत दी थी कि वह हर हफ्ते किशोर न्याय बोर्डे के समक्ष एक बार पेश होगा जब तक चार्जशीट दायर न हो, मुम्बई उच्च न्यायालय नई यह निर्णय देते हुए जमानत की स्वीकृति के मामले को किशोर अधिनियम के अंतर्गत निपटाया। दिए गए धारा के पाठ पर यह स्पष्ट था कि यदि किशोर की किसी अपराधिक गतिविधि में लिप्त पाया जाता है, तो आमतौर पर उसे जमानत दिया जाता है और बोर्ड के पास यह अधिकार है कि वह उसे जमानत पर रिहा कर दे, और सिर्फ उन मामलों में जमानत रोकी जा सकती है उब यह लगे कि ऐसी रिहाई से किशोर जाने माने अपराधियों की संगत में आ सकता है या उसे कोई खतरा हो सकता है। यह खास प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए दिया गया है ताकि अपराधी अपने परिवार या जान पहचान वालों के संपर्क में रहे और जाने माने अपराधियों के संपर्क में न आयें जिससे माने अपराधियों के संपर्क में न आयें जिससे वे उनका प्रयोग अपने हित में न कर सकें।

अभय कुमार सिंह बनाम झारखण्ड सरकार

2004 सीआरआईएलजे 4533 (झारखण्ड)

आवेदक, जो कि किशोर था, 3 वर्ष व 8 महीने कैद में बिता चुका था। उसे बिना किसी अनुबंध या मुचलके के बिना जमानत पर रिहा कर दिया गया, इसके बाद यह निर्देश भी दिया गया की यदि अभय कुमार सिंह की जाँच किशोर न्याय अधिनियम 1986 के अंतर्गत 3 महीने के भीतर पूरी नहीं होती तो उसके विरूद्ध सभी अपराधी प्रक्रियाएं खत्म कर दी जाएंगी।

रंजीत सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार

2005 सीआरआईएल  972 (हिमाचल प्रदेश)

किशोर को उच्च न्यायालय द्वारा इस आधार पर जमानत पर छोड़ दिया गया कि, आरोप पक्ष द्वारा दायर जवाब में या पुलिस की फ़ाइल में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि छोड़े जाने पर किशोर किसी अपराधिक या नैतिक खतरे पर पड़ सकते है या उसका छोड़ जाना न्याय के लिए खतरा हो सकता है।

कल्याण चन्द्र सरकार बनाम राजेश रंजन

(2005) 2 एससीसी 42; 2000 एससीसी (सीआरआईएल) 489; एआईआर 2005 एससी 921 2005 सीआरआईएलजे 944 (एससी)

यह फैसला आरोपी द्वारा एक जमानत की अर्जी के उच्च न्यायालय या उसके अधीन न्यायालयों द्वारा ख़ारिज किए जाने के बाद दोबारा जमानत की अर्जी के मुद्दों को देखता हैं। पर यदि आरोपी कोई गैर जमानती अपराध करता है तो भी उसे जमानत दी जा सकती है अगर न्यायालय को यह लगता है यदि उसके विरूद्ध कोई मामला पहली बार में नहीं बनता है पर ऐसे मामलों में भी दिया जा सकता है जब ऐसा मामला बन रहा हो पर परिस्थितियों और तथ्यों के अनुसार ऐसा करने की जरूरत पड़ रही हो। इस प्रक्रिया में यही किसी की जमानत पर छूटने की अरजी एक बार ख़ारिज हो चुकी है तो उसे जमानत की अर्जी दोबारा देने से रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं हैं यदि तथ्यात्मक स्थितियों में कोई फर्क आया है तो ऐसी स्थिति में यदि जमानत देने की जरूरत हो तो पहले ख़ारिज किए गए जमानत को नजर अंदाज करते हुए न्यायालय उसे जमानत दे सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कई जमानत के आवेदन दिए जा सकते हैं यदि तथ्यों की स्थिति या लागू कानून में बदलाव आया हो जिसकी वजह से पहले का नजरिया बदला या पहले के खोज नहीं माने जाने लायक हो गए हों।

प्रताप सिंह बनाम झारखण्ड सरकार व अन्य

(2005) एससीसी 551; एससीसी (सीआरआईएल) 742; एआईआर 2005 एससी 2731; 2005 सीआरआईएलजे 3091 (एससी)

जाँच न्यायाधीशों के सर्वोच्च न्यायालय के पीठ के समक्ष सवालों में से एक था, अपराध की तिथि को आरोपी के आयु निर्धारण की तिथि मानी जाए या फिर उस तिथि को जब उसे न्यायालय सम्बन्धित प्राधिकरण के समक्ष पेश किया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपराध की तिथि को आरोपी के आयु निर्धारण की तिथि मानते हुए कहा, कानून में यह तय किया गया है कि फायदेमंद विधानों को लागू करने का महत्व यह है कि उनके लिए वह कानून बना है उन्हें उसका लाभ मिले न कि कानून के लक्ष्य को खराब किया जाए।

एक समय पर किशोर कानूनों के अनुसार किशोरों को उसका फायदा देने वाले न्यायालय अब धीरे धीरे अपना रवैया बदल रहा है। यदि किशोर होने का दावा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहली बार पेश किया जाता है तो उसे संदेह की नजरों से देखा जाता है अपराधी के किशोर होने की बात यदि स्पष्ट ना हो तो भी मृत्युदंड दिए जाते हैं। बैंक अकाउंट का खोला जाना अब किसी व्यक्ति की आयु निर्धारित करने के लिए है और न ही उनके बयानों पर अब भरोसा नहीं किया जाता।

सुरेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

(2003) 10 एसएससीसी 26; 2004 एससीसी (सीआरआईएल) 717; एआईआर 2003 एससी 3811

आरोपी की आयु संबंधित न्यायिक मुद्दों पर विचार की जरूरत पहले आरोपी की आयु से संबंधित प्रश्न कभी भी न्यायालयों के समक्ष नहीं पेश किए जाते थे जिससे इस संबंध में एक फैसला लेने की जरूरत महसूस हुई......... इसके आगे पेशी या उच्च न्यायालय के समक्ष किसी भी समय पर यह सवाल नहीं उठाया जाता था। इसके अलावा आरोपी की आयु जाँच का मुद्दा तभी आता है जब आरोपी की आयु जाँच का मुद्दा तभी आता है जब आरोपी आवेदन देता है और न्यायालय इसे संदेह पर गौर करता है। यहाँ आरोपी द्वारा कोई सवाल नहीं उठाया गया इसलिए मुद्दे को ध्यान से देखने की जरूरत न्यायालय द्वारा नहीं महसूस की गई........ ऊपर दिए गए पृष्ठभूमि में आयु से संबंधित आवेदन की अर्जी का कोई अर्थ नहीं बनता और उसे ख़ारिज किया जाता है।

ओम प्रकाश बनाम उत्तरांचल राज्य

(2003) 1 एससीसी 648

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत दर्ज किए गए बयान में दी गई आयु के अनुसार ओम प्रकाश अपराध के दिन किशोर था। किशोर होने के दावे को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा द्वारा ख़ारिज कर दिया गया वह भी सिर्फ इस आधार पर की अपराध के कुछ महीनों पहले आवेदक ने बैंक में खाता खुलवाया था; आवेदक अपना खाता खुलवाने की स्थिति में नहीं होता यदि वह वयस्क नहीं होता और उसने अपने आप नको वयस्क साबित नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय ने पेशी न्यायालय द्वारा उसे दिए गए मृत्युदंड को, जिसे उच्च न्यायालय ने भी माना था, जारी रखा।

रामदेव चौहान असम सरकार

(2001) 5 एससीसी 714; एआईआर 2001 एससीसी 2231

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मृत्युदंड को आजीवन कारावास में नहीं बदला, एक न्यायाधीश के मतभेद के बावजूद बचाव पक्ष ने पेशी न्यायालय के समक्ष रामदेव की अपराध के वक्त किशोर साबित करने के लिए सबूत पेश किए। आवेदक के

पिता से पूछताछ हुई और विद्यालय के प्राध्यापक ने दाखिले का रजिस्टर भी दिखाया जिसमें अपराध के वक्त आरोपी के 16 वर्ष से कम आयु के होने को बात साफ थी। फॉरनसिक चिकित्सा के एक सहयोगी प्राध्यापक को न्यायालय ने गवाह के रूप में बुलाया गया, डॉक्टर की की राय में भी रामदेव संबंधित तिथि को 15 से 16 के बीच आयु का था। यह साक्ष्य भी बहुमत का रवैया बदल पाने में असमर्थ थे, इसके बचाव उन्होंने इस तथ्य को महत्व दिया की (1) रामदेव के आयु पिता के पूछताछ में आरोप पक्ष ने आवेदक की आयु अपराध के दिन 26 वर्ष होने का आंकलन किया था। (2) उसके पूर्व मालिक ने आरोप पक्ष के गवाह के रूप में यह बताया कि घटना से पहले आरोपी ने उसे अपनी आयु 20 वर्ष बतायी थी। (3) आवेदक ने अपराध के दिन दर्ज हुए अपने बयान में अपनी आयु 20 वर्ष बता थी। (4) आरोपी को पेशी न्यायालय द्वारा घटना के के 6 साल बाद दर्ज बयान में 25 वर्ष और 6 महीने का बताया गया है।

ऊपर दिए गए फैसले में सके पर्याप्त कारण मिलते है की क्यों आरोप पक्ष के नजरिए को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

हम आरोप पक्ष द्वारा पेश किए गए किसी भी सामग्री से इस नतीजे पर नहीं पर नहीं पहुंचा पा रहे है कि अपराध के दिन आवेदक की आयु क्या थी। जन्म के वर्ष का पता लगाने के अभ्यास में आवेदक की आयु क्या थी। जन्म के वर्ष का पता लगाने के अभ्यास में आवेदक के पिता द्वारा दिए गए जवाब काफी कमजोर हैं। किसी भी तरह ऐसी प्रक्रिया को संबंधित व्यक्ति को और परेशान करने के लिए नहीं माना जा सकता है और ना ही मैं पी डब्ल्यू – 4 के बयां पर भरोसा कर सकता हूँ जो यह कहता है की 1991 में आरोपी ने उससे यह कहा था की वह 20 वर्ष का है। ऐसे बयानों को किसी व्यक्ति की आयु निर्धारण के लिए सत्य नहीं माना जा सकता। संहिता  की धारा 161 के अंतर्गत दर्ज बयान को बयान देने वाले के सवाल जवाब के अलावा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता इस लिए यह मान्य नहीं है कि इस दस्तावेज पर भी गौर किया जाए। संहिता की धारा 235 में आरोपी के दर्ज बयान के कागज पर कुछ जिससे होते है जिनमें से एक उसकी आयु से संबंधित है आरोपी का बयान इन हिस्सों को भरने के बाद ही शुरू होता है। और जब तक पता न चल जाये कि यह सारी जानकारियाँ कहाँ से आई है तब तक उन्हें कानूनों सबूतों के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। और किसी भी मामले में हम इस पूर्वाग्रह के साथ नहीं चल सकते की इन हिस्सों में दर्ज जानकारी आरोपी द्वारा खुद दी गई है।

गति विरोध दर्ज करने वाले न्यायाधीश ने मृत्युदंड कि आजीवन कारावास में बदलने को मांग करते हुए हालाँकि यह मानते हुए कि आरोपी अपराध के दिन अपनी आयु 16 वर्ष से कम साबित करने में असफल रह कहा है। पर मैं इस प्रश्न को एक दुसरे नजरिए से देखने के लिए बाध्य हूँ। क्या ऐसे किसी व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए जिसकी आयु अपराध के दिन 16 वर्ष से ज्यादा साबित करने में आरोप पक्ष असफल रहा है। यदि आरोप पक्ष द्वारा यह बात साबित नहीं हुई है तो क्या किसी अपराधी को किशोर अधिनियम की धारा 22 (1) में दिए प्रावधानों की नजरअंदाज करते हुए फांसी की सजा दे देनी चाहिए।

हरियाणा सरकार बनाम बलवंत सिंह

1993 (1) एससीसी  एसयूपीपी 409

राज्य ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय को इस खोज को चुनौती दी की अपराध के दिन बलवंत सिंह किशोर था। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य की अपील को माना, जब पेशी न्यायालय ने यह नहीं माना की आरोपी बच्चा था, वह बहुत आश्चर्यजनक है की उच्च न्यायालय ने धारा 313 के अंतर्गत दर्ज बयान में आरोपी द्वारा अपनी आयु 17 वर्ष बताए जाने के आधार पर उसे हरियाणा बाल अधिनियम 1974 के अंतर्गत अपराध के दिन आरोपी को बच्चा मान लिया हालाँकि और कोई सबूत मौजूद नहीं था। इस मामले में यह तथ्य कि आरोपी आयु 17 वर्ष बतायी जिसमें से एक चार्जशीट बनाते हुए और दूसरा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 में दर्ज बयान के समय उसके खिलाफ चले गए।

स्रोत : चाइल्ड लाइन इंडिया, फाउन्डेशन

2.96202531646

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