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  • अवस्था समीक्षा के लिए प्रतीक्षा

बाल श्रम

इस भाग में बालश्रम की उत्पत्ति, उससे जुड़ीं चुनौतियों के साथ संविधान द्वारा प्रदत्त सुरक्षा की जानकारी के साथ इस विषय से जुड़े अनेक पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है।

अपने देश के समक्ष बालश्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम भी उठाये हैं। समस्या के विस्तार और गंभीरता को देखते हुए इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानी जा रही है जो चेतना की कमी, गरीबी और निरक्षरता से जुड़ी हुई है। इस समस्या के समाधान हेतु समाज के सभी वर्गों द्वारा सामूहिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

वर्ष 1979 में भारत सरकार ने बाल-मज़दूरी की समस्या और उससे निज़ात दिलाने हेतु उपाय सुझाने के लिए 'गुरुपाद स्वामी समिति' का गठन किया था। समिति ने समस्या का विस्तार से अध्ययन किया और अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की। उन्होंने देखा कि जब तक गरीबी बनी रहेगी तब तक बाल-मजदूरी को हटाना संभव नहीं होगा। इसलिए कानूनन इस मुद्दे को प्रतिबंधित करना व्यावहारिक रूप से समाधान नहीं होगा। ऐसी स्थिति में समिति ने सुझाव दिया कि खतरनाक क्षेत्रों में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जाए तथा अन्य क्षेत्रों में कार्य के स्तर में सुधार लाया जाए। समिति ने यह भी सिफारिश की कि कार्यरत बच्चों की समस्याओं को निपटाने के लिए बहुआयामी नीति बनाये जाने की जरूरत है।

'गुरुपाद स्वामी समिति' की सिफारिशों के आधार पर बाल-मजदूरी (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम को 1986 में लागू किया गया था। इस अधिनियम के द्वारा कुछ विशिष्टिकृत खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार पर रोक लगाई गई है और अन्य वर्ग के लिए कार्य की शर्त्तों का निर्धारण किया गया। इस कानून के अंतर्गत बाल श्रम तकनीकी सलाहगार समिति के आधार पर जोखिम भरे व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं की सूची का विस्तार किया जा रहा है।

उपरोक्त दृष्टिकोण की सामंजस्यता के संदर्भ में वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बाल-मजदूरी नीति तैयार की गई। इस नीति के तहत जोखिम भरे व्यवसाय और प्रक्रियाओं में कार्यरत बच्चों के पुनर्वास कार्य पर ध्यान केन्द्रित किये जाने की जरूरत बताई गई।

संयोजन पाठ्यक्रम

बाल मज़दूरी की समस्या के समाधान के क्षेत्र में 'एम.वी. फाउंडेशन द्वारा एक अलग दृष्टिकोण विकसित किया गया है। यह संस्थान स्कूल छोड़े हुए, नामांकन से वंचित तथा अन्य कार्यरत बच्चों के लिए संयोजन पाठ्यक्रम (ब्रिज कोर्स) चला रहा है तथा उनकी उम्र के अनुरूप औपचारिक शिक्षा पद्धति के अंतर्गत स्कूल में नामांकन करा रहा है। यह पद्धति काम करने वाले बच्चों को स्कूल की ओर लाने में काफी हद तक सफल रहा है और इसे आँध्र प्रदेश सरकार के साथ प्रथम, सिनी - आशा,लोक जुम्बिश जैसी गैर सरकारी संस्थाओं ने भी अपनाया है।

ज्यादा जानकारी के लिए देखें श्रम और रोजगार मंत्रालय

बाल मजदूरी के कारण

यूनीसेफ के अनुसार बच्चों का नियोजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम जिन कारणों से करते हैं, उनमें आम तौर पर गरीबी पहला है। लेकिन इसके बावजूद जनसंख्या विस्फोट, सस्ता श्रम, उपलब्ध कानूनों का लागू नहीं होना, बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक माता-पिता (वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय काम पर भेजने के इच्छुक होते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़ सके) जैसे अन्य कारण भी हैं। और यदि एक परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र आधार ही बाल श्रम हो, तो कोई कर भी क्या सकता है।

बाल मजदूरी उन्मूलन हेतु किये जा रहे प्रयास

बाल श्रम उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना कार्यक्रम के तहत 1.50 लाख बच्चों को शामिल करने हेतु 76 बाल श्रम परियोजनाएं स्वीकृत की गयी हैं। करीब 1.05 लाख बच्चों को विशेष स्कूलों में नामांकित किया जा चुका है। श्रम मंत्रालय ने योजना आयोग से वर्तमान में 250 जिलों की बजाय देश के सभी 600 जिलों को राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना में शामिल करने के लिए 1500 करोड़ रुपये देने को कहा है। 57 खतरनाक उद्योगों, ढाबा और घरों में काम करनेवाले बच्चों (9-14 साल की उम्र के) को इस परियोजना के तहत लाया जायेगा। सर्व शिक्षा अभियान जैसी सरकारी योजनाएं भी लागू की जा रही हैं।

राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत शामिल नीति

सातवीं पंचवर्षीय योजनावधि के दौरान 14 अगस्त, 1987 को राष्ट्रीय बाल श्रम नीति को मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर किया गया। इस नीति का उद्देश्य बच्चों को रोजगार से हटाकर उन्हें समुचित रूप से पुनर्वास कराना था। इस तरह जिन क्षेत्रों में बाल श्रम अधिक है उन क्षेत्रों में इसके प्रभाव को कम करना है।

इस नीति के तीन मुख्य घटक हैं

कानूनी कार्य योजना – विभिन्न श्रम कानूनों के अंतर्गत बाल श्रम से संबंधित कानूनी प्रावधानों को कठोरतापूर्वक एवं प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना

सामान्य विकास कार्यक्रम पर ध्यान देना – जहाँ तक संभव हो विभिन्न मंत्रालयों/विभागों द्वारा बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाए जा रहे विकास कार्यक्रमों का उपयोग करना।

परियोजना आधारित कार्य योजना – जिन क्षेत्रों में बाल-श्रमिकों का प्रभाव अधिक है उन क्षेत्रों में कार्यरत बच्चों के लिए योजनाएँ बनाना।

10वीं योजनावधि के दौरान श्रम नीति के अंतर्गत व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया जाएगा।

उद्देश्य

1991 की जनगणना के अनुसार देश में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग 1.1 करोड़ थी। संसाधनों की कमी और सामाजिक चेतना और जागरूकता के वर्तमान स्तर को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 10वीं पंचवर्षीय योजनावधि के अंत तक देश से बाल-श्रम समाप्त करने की समय-सीमा निर्धारित की है।

लक्षित समूह

इस योजना के अंतर्गत उन सभी बच्चों को शामिल किया है जिनकी उम्र 14 से कम है और जो काम कर रहे हैं –

  • बालकों से संबंधित अनुसूची में सूचिबद्ध व्यवसाय एवं प्रक्रिया
  1. श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 और/या
  2. व्यवसाय एवं प्रक्रिया, जो उनके स्वास्थ्य और मनोविज्ञान को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता हो।

अंतिम सूची में बच्चों से संबंधित रोजगार के जोखिम को समुचित रूप से स्थापित किया जाना चाहिए।

रणनीति

1991 की जनगणना के अनुसार देश में बाल-मजदूरी करने वाले बच्चों की कुल संख्या 11.28 मिलियन थी। जबकि एनएसएसओ के 1999-2000 सर्वेक्षण प्रतिवेदन के अनुसार यह संख्या 10.40 मिलियन थी। इसके अंतर्गत यह प्रस्तावित है कि जोखिम भरे उद्योग में कार्यरत बच्चों का क्रमिक रूप पुनर्वास कार्य प्रारंभ हो। जोखिम भरे व्यवसायों में काम करने वाले बच्चों का सर्वेक्षण कर, उन्हें वहाँ से हटाकर विशेष स्कूलों (पुनर्वास-सह-कल्याण केन्द्र) में दाखिला दिलाया जाए ताकि सरकारी स्कूली व्यवस्था की मुख्यधारा से उन्हें जोड़ा जा सके। 10 वीं योजनावधि की रणनीति के अंतर्गत उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने की भी योजना है।

बाल मजदूरी के बारे में और अधिक जानने हेतु निम्न लिंक पर क्लिक करें
1.श्रम और रोजगार मंत्रालय

मजदूरी से शिक्षा की ओर

बाल-मजदूरी रोकने के लिए आप क्या कर सकते हैं?

  • जब किसी बच्चे को शोषित होते हुए देखें, तो उसकी व्यक्तिगत मदद करें।
  • बच्चों की सुरक्षा के लिए कार्यरत संगठनों के लिए स्वेच्छा से समय निकालें।
  • व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कहें कि यदि वे बच्चों का शोषण बन्द नहीं करते हैं तो उनसे कुछ भी नहीं खरीदेंगे।
  • बाल-श्रम से मुक्त हुए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा के लिए कोष जमा करने में मदद करें।
  • आपके किसी रिश्तेदारों या परिजनों के यहां बाल-श्रमिक है, तो आप सहजता पूर्वक चाय-पानी ग्रहण करने से मना करें और इसका सामाजिक बहिष्कार करें।
  • अपने कर्मचारियों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करके बाल-श्रम की समस्या के बारे में सूचित करें और उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे अपने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजें।
  • अपनी कम्पनी पर दबाव डालें कि बच्चों के स्थान पर व्यस्कों की नियुक्त करें।
  • 10 अक्तूबर 2006 से घरों और ढाबों में बच्चों से मजदूरी कराना दण्डनीय अपराध है।

भारत में बाल श्रम के खिलाफ राष्ट्रीय कानून और नीतियां

कानून

भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है-

  • 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा (धारा 24)।
  • राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)।
  • बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जायेगा (धारा 39-एफ)।
  • संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।

बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। दोनों स्तरों पर कई कानून बनाये भी गये हैं।

प्रमुख राष्ट्रीय कानूनी विकास में निम्नलिखित शामिल हैं

  • बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 13 पेशा और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशाओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है।
  • फैक्टरी कानून 1948 - यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गयी है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करनेवाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाये, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करनेवाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो। भारत निम्नलिखित संधियों पर हस्ताक्षर कर चुका है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन (संख्या 29)
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन का उन्मूलन (संख्या 105)
बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीआरसी)

सरकारी नीतियां और कार्यक्रम

भारत के विकास लक्ष्यों और रणनीतियों को जारी रखते हुए 1987 में एक राष्ट्रीय बाल श्रम नीति को अंगीकार किया गया। राष्ट्रीय नीति भारत के संविधान में राज्य के नीति -निर्देशक नीतियों को दोहराती है। इसका संकल्प बच्चों के लाभ के लिए हरसंभव विकास कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना और उन इलाकों में, जहां वेतन या अर्द्ध वेतन के लिए बाल श्रमिकों की संख्या अधिक हो, परियोजना आधारित कार्य योजना बनाने की है। राष्ट्रीय बाल श्रम नीति (एनसीएलपी) को बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून, 1986 के लागू होने के बाद अंगीकार किया गया।

श्रम एवं नियोजन मंत्रालय बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए 1988 से ही राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजनाओं के माध्यम से ही एनसीएलपी को कार्यान्वित कर रहा है। आरंभ में ये परियोजनाएं उद्योग विशेष पर केंद्रित थीं और इनका उद्देश्य बाल श्रमिकों के नियोजन के लिए पारंपरिक रूप से ख्यात उद्योगों में काम करनेवाले बच्चों का पुनर्वास था।

संवैधानिक व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए नवीकृत संकल्प का परिणाम यह हुआ कि बाल श्रम के लिए ख्यात जिलों में खतरनाक काम में लगे बच्चों का पुनर्वास करने के लिए 1994 में एनसीएलपी का दायरा बढ़ाया गया।

एनसीएलपी की रणनीति में अनौपचारिक शिक्षा तथा प्राक-व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के लिए विशेष विद्यालय स्थापित करने, अतिरिक्त आमदनी और रोजगार सृजन के अवसर पैदा करने, लोगों में जागरूकता पैदा करने और बाल श्रम के बारे में सर्वेक्षण तथा मूल्यांकन करने का काम शामिल है।

कई वर्षों तक एनसीएलपी को चालू रखने से सरकार को मिले अनुभवों का परिणाम यह हुआ कि नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में परियोजनाओं को जारी रखते हुए उनका विस्तारीकरण किया गया। कांच, चूड़ी, पीतल, ताला, कालीन, स्लेट टाइल, माचिस, आतिशबाजी और रत्न उद्योग जैसे खतरनाक उद्योगों में काम करने वाले बच्चों के पुनर्वास के लिए पूरे देश में करीब एक सौ एनसीएलपी शुरू किये गये। केंद्र सरकार ने नौवीं पंचवर्षीय योजना में इन परियोजनाओं के लिए करीब 25 करोड़ रुपये का बजटीय उपबंध किया। भारत सरकार ने 10वीं पंचवर्षीय योजना (2003-07) में एनसीएलपी का विस्तार अतिरिक्त 150 जिलों में करने तथा 60 करोड़ रुपये का बजटीय उपबंध करने का संकल्प व्यक्त किया है।

राष्ट्रीय संस्थानों का अंशदान

कई राष्ट्रीय संस्थानों, जैसे वीवी गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान (वीवीजीएनएलआइ) और राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एन.आइ.आर.डी) तथा कुछ राज्य स्तरीय संस्थानों ने सरकारी कर्मियों, कारखाना निरीक्षकों, पंचायती राज संस्थाओं के अधिकारियों, एनसीएलपी के परियोजना निदेशकों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रमुखों के क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इन संस्थानों ने शोध और सर्वेक्षणों के साथ जागरूकता बढ़ाने व संवेदनशील बनाने के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे इस मुद्दे पर बहस पूरी तरह सामने आ सकी।

क्या बच्चों को काम पर रखना क़ानूनी है?

नहीं, १४ साल से कम उम्र के बच्चों को काम देना गैर-क़ानूनी है; हालाँकि इस नियम के कुछ अपवाद हैं जैसे की पारिवारिक व्यवसायों में बच्चे स्कूल से वापस आकर या गर्मी की छुट्टियों में काम कर सकते हैं l इसी तरह फिल्मों में बाल कलाकारों को काम करने की अनुमति है, खेल से जुड़ी गतिविधियों में भी वह भाग ले सकते हैं l

14-18 वर्ष की आयु के बच्चों को काम पर रखा जा सकता है (जो किशोर/किशोरी की श्रेणी में आते हैं) यदि कार्यस्थल सूची में शामिल खतरनाक व्यवसाय या प्रक्रिया से न जुड़ा हो l

यदि कोई व्यक्ति मेरे आस-पड़ोस में बच्चों से काम करवाता है, तो इस बारे में मैं क्या कर सकती हूँ ?

यदि आपने इस क़ानून का उल्लंघन होते हुए देखा है तो आप इसकी शिकायत पुलिस या मजिस्ट्रेट से कर सकती हैं l आप बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं की नज़र में भी यह ला सकती हैं जो मुद्दे को आगे तक ले जा सकते हैंl एक पुलिस अधिकारी या बाल मज़दूर इंस्पेक्टर भी शिकायत कर सकते हैं l

यह अपराध संज्ञेय अपराधों की श्रेणी में आता है, यानिकी/अर्थात इस कानून का उल्लंघन करते हुए पकड़े जाने पर वारंट की गैर-मौजूदगी में भी गिरफ़्तारी या जाँच की जा सकती है l

इस क़ानून का उल्लंघन करते हुए बच्चों को काम पर रखने पर क्या सज़ा दी जा सकती है ?

कोई भी व्यक्ति जो १४ साल से कम उम्र के बच्चे से काम करवाता है अथवा १४-१८ वर्ष के बच्चे को किसी खतरनाक व्यवसाय या प्रक्रिया में काम देता है, उसे ६ महीने – २ साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है और साथ ही २०,००० -५०,००० रूपए तक का जुर्माना भी हो सकता है l

रजिस्टर न रखना, काम करवाने की समय-सीमा न तय करना और स्वास्थ्य व सुरक्षा सम्बन्धी अन्य उल्लंघनों के लिए भी इस कानून के तहत १ महीने तक की जेल और साथ ही १०,००० रूपए तक का जुर्माना भरने की सज़ा हो सकती है l यदि आरोपी ने पहली बार इस कानून के तहत कोई अपराध किया है तो केस का समाधान तय किया गया जुर्माना अदा करने से भी किया जा सकता है l

इस क़ानून के अलावा और भी ऐसे अधिनियम हैं (जैसे की फैक्ट्रीज अधिनियमखान अधिनियम, शिपिंग अधिनियम , मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम इत्यादि ) जिनके तहत बच्चों को काम पर रखने के लिए सज़ा का प्रावधान है, पर बाल मज़दूरी करवाने के अपराध के लिए अभियोजन बाल मज़दूर कानून के तहत ही होगा l

इस कानून के तहत संरक्षित किये गए बच्चों के साथ क्या होता है ?

इस क़ानून का उल्लंघन करने वाली परिस्थितियों से जिन बच्चों को बचाया जाता है उनका नए कानून के तहत पुनर्वास किया जाना चाहिए l ऐसे बच्चे जिन्हें देख-भाल और सुरक्षा की आवश्यकता है, उन पर किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं सुरक्षा) अधिनियम २०१५ लागू होता है l

क्या बच्चों का पारिवारिक व्यवसाय में काम करना क़ानूनी है ?

हाँ, १४ वर्ष से कम आयु के बच्चों को पारिवारिक व्यवसाय में नियोजित किया जा सकता हैl ऐसे व्यापार जिनका संचालन किसी करीबी रिश्तेदार (माता, पिता, भाई या बहन) या दूर के रिश्तेदार (पिता की बहन और भाई, या माँ के बहन और भाई) द्वारा किया जाता है, वह इस परिभाषा में शामिल हैं l

यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि पारिवारिक व्यापार इस क़ानून के तहत परिभाषित खतरनाक प्रक्रिया या पदार्थ से जुड़ा न हो l ऊर्जा/बिजली उत्पादन से जुड़े उद्योग, खान, विस्फोटक पदार्थों से जुड़े उद्योग इस परिभाषा में शामिल हैं l खतरनाक व्यवसाय एवं प्रक्रिया की परिभाषा में सभी शामिल व्यवसायों की सूची यहाँ पढ़ें l

हालाँकि बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में सहयोग दे सकते हैं, यह सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इससे उनकी पढ़ाई पर कोई असर न पड़े, इस हेतु उन्हें स्कूल से आने के बाद या छुट्टियों में ही काम करना चाहिए l

क्या माता-पिता/अभिभावकों को अपने बच्चों को काम करने की अनुमति देने के लिए दंडित किया जा सकता है?

सामान्यतः बच्चों के माता-पिता /अभिभावकों को अपने बच्चों को इस कानून के विरुद्ध काम करने की अनुमति देने के लिए सज़ा नहीं दी जा सकती है परन्तु यदि किसी १४ वर्ष से कम आयु के बच्चे को व्यावसायिक उद्देश्य से काम करवाया जाता है या फिर किसी १४-१८ वर्ष की आयु के बच्चे को किसी खतरनाक व्यवसाय या प्रक्रिया में काम करवाया जाता है तो यह प्रतिरक्षा लागू नहीं होती और उन्हें सज़ा दी जा सकती है l क़ानून उन्हें अपनी भूल सुधारने का एक अवसर देता है, यदि वह ऐसा करते हुए पहली बार पकड़े जाते हैं तो वह इसे समाधान/समझौते की प्रक्रिया से निपटा सकते हैं, पर यदि वह फिर से अपने बच्चे को इस क़ानून का उल्लंघन करते हुए काम करवाते हैं तो उन्हें १०,००० रूपए तक का जुर्माना हो सकता है l


स्रोत: न्याय

बाल मजदूरी के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में बाल मजदूरी का मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है ?

उत्तर- दुनिया में जितने बाल श्रमिक हैं, उनमें सबसे ज्यादा बाल श्रमिक भारत में हैं। अनुमान है कि दुनिया के बाल श्रमिकों का एक तिहाई हिस्सा भारत में है। इस स्थिति का परिणाम बहुत व्यापक है। इसका मतलब यह है कि इस देश के करीब 50 प्रतिशत बच्चे बचपन के अधिकारों से वंचित हैं और वे अनपढ़ कामगार ही बने रहेंगे और उन्हें अपनी सच्ची क्षमताएँ हासिल करने का कोई मौका नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में कोई भी देश कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकता।

भारत में अनुमानत: कितने बाल मजदूर हैं ?

उत्तर- यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप बाल श्रम को किस प्रकार परिभाषित करते हैं। ऐसा अनुमान है कि करीब 2 करोड़ बच्चे खतरनाक कहे जाने वाले उद्योगों में काम कर रहे हैं। यदि हम बाल श्रम को सिर्फ मजदूरी कमाने वाले काम के रूप में परिभाषित करें तो सरकारी अनुमान के अनुसार भारत में बाल श्रमिकों की संख्या 1 करोड़ 70 लाख है। स्वतंत्र रूप से किये गये अनुमान, जो मोटे तौर पर यही परिभाषा स्वीकार करते हैं, मानते हैं कि यह संख्या 4 करोड़ है। लेकिन यदि स्कूल से बाहर के सभी बच्चों को बाल श्रमिक माना जाये तो यह संख्या करीब 10 करोड़ होगी।

बाल मजदूरी पहलू की उपेक्षा क्यों हुई है ?

उत्तर- इसके कई कारण है। मुख्य कारण यह है कि जब ‘गरीब’ माता-पिता के बच्चों की बात आती है तब नीति बनाने वालों की सोच यह होती है कि बच्चों द्वारा काम किया जाना तो अनिवार्य है। उनका मानना है कि बच्चा इसलिये काम कर रहा है कि परिवार की जीविका उसकी आमदनी पर ही निर्भर है। उनका मानना है कि अगर बच्चे को काम से हटा दिया जायेगा तो परिवार भूखा मर जायेगा। उनके मत के अनुसार बाल श्रम एक‘कठोर सच्चाई’ है। यह मान्यता कि बाल श्रम अपरिहार्य है और उसके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता, भारत में बाल श्रम की नीति के सभी पहलुओं को प्रभावित करती है। यह बात ही मुख्य रूप से इस दृष्टिकोण के लिये जिम्मेदार है कि सबसे अच्छा तरीका यह है कि बाल श्रम के सबसे ज्यादा शोषक तरीकों पर पहले आघात किया जाये। विभिन्न ‘खतरनाक’ उद्योगों में काम पर लगे बच्चों का ही सबसे ज्यादा शोषण होता है। वे ही बाल श्रमिक के रूप में सबसे स्पष्ट रूप से नजर आते हैं। परिणाम यह हुआ है कि इन उद्योगों के बाल श्रमिकों पर ही जोर रहा है और बाल श्रम के अन्य रूपों को छोड़ दिया गया है। कृषि क्षेत्र के बाल श्रमिकों की तो खासतौर पर उपेक्षा हुई है।

इस पहलू की उपेक्षा क्यों की गयी है, इसका अन्य कारण यह है कि नीति बनाने वाले और कार्यक्रमों को लागू करने वाले लोग संख्या के जाल में फंस जाते है। कृषि के क्षेत्र में बाल श्रमिकों की भारी तादाद से वे पूरी तरह डर जाते है। वे सोचते हैं कि “क्या होगा जब खेती के काम में लगे सभी बच्चे काम करना बन्द कर देंगे ?’’ परिणाम यह होता है कि इस क्षेत्र के बाल-श्रम को उचित बताने के लिये या तो कहा जाता है कि कृषि के क्षेत्र में बाल श्रम है ही नहीं, या फिर उसे बाल श्रम माना ही नहीं जाता, बल्कि कहा जाता है कि यह बच्चों का ऐसा काम है जो बच्चे की सेहत के लिये अच्छा होता है।

जीवन-यापन हेतु गरीब परिवार के बच्चों का काम पर जाने में गलत क्या है ?

उत्तर- यह एक बढ़िया ‘‘गरीबी दलील’’ है। इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर है कि आप सवाल को क्या रूप देते हैं। यदि सवाल यह है कि “यह सच नहीं है कि यदि परिवार बेहद गरीब है और बहुत संकट में है, तब माता-पिता को अपने बच्चे को काम पर तो भेजना ही होगा ?’’ तब उत्तर सचमुच ’हां’ में होगा। लेकिन, यदि सवाल यह है कि ’’क्या वे सभी परिवार जो अभी अपने बच्चों को काम के लिये भेजते हैं इतने गरीब हैं कि उन्हें जीवित रहने के लिये बच्चे की आय की जरूरत है ?’’ तब उत्तर निश्चय ही ‘नहीं’ होगा। इस देश में बाल श्रम की स्थिति की विडम्बना यह है कि यह मान ही लिया जाता है कि हर मजदूर इसलिये काम कर रहा है कि यह उसके परिवार के जिन्दा रहने का मामला है। लेकिन यह गरीबी की दलील का अत्यन्त कपटपूर्ण पहलू है। सचाई से इतना दूर और कुछ हो ही नहीं सकता। गरीबी को लेकर दी जाने वाली दलील तर्कपूर्ण दिखने पर भी पूरी तरह से छलावा है। रोचक बात यह है कि इसे सिद्ध करना भी आसान नहीं है। यदि इसमें सच्चाई होती तो हर गांव में सबसे पहले गरीब बच्चे को पहले स्कूल छोड़ देना चाहिये और मजदूरी के बाजार में दाखिल हो जाना चाहिये। लेकिन, ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत गरीब परिवारों के ऐसे कई बच्चे हैं जो स्कूल में हैं, जबकि उनसे कुछ बेहतर स्थिति वाले बच्चे काम कर रहे हैं। ऐसे कई तत्व है जिनका इस स्थिति के अर्थशास्त्र से कोई लेना देना नहीं है, जैसे परम्परा, अनपढ़ पालकों की अज्ञानता, विकल्पों की कमी, संवेदनहीन प्रशासन और अन्य कई तत्व ऐसे हैं जो परिवार के इस निर्णय पर प्रभाव डालते हैं कि वह बच्चे को काम के लिये भेजें या स्कूल भेजें। गरीबी की दलील इन सभी पहलुओं की उपेक्षा करती है और हर बात को आर्थिक फैसले के रूप में लेती है।

बाल मजदूरी और औपचारिक स्कूली शिक्षा के बीच क्या संबंध है ?

उत्तर- जैसा कि हमने पहले ही कहा है बाल श्रम को देखने के कई तरीके हैं और अलग-अलग लोगों की समझ अलग-अलग है। कुछ लोग यह मानते हैं कि बच्चों के द्वारा मजदूरी कमाने के काम को ही बाल श्रम मानना चाहिये। दूसरे, लोग खतरनाक धन्धों में लगे बाल श्रम पर जोर देते है- जैसे गलीचा बुनाई, माचिस कारखाने, कांच कारखानें आदि और वे दूसरे कामगार बच्चों की चिन्ता नहीं करते। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसबात पर जोर देते हैं कि बच्चों के लिये कुछ किस्म के काम करना सिर्फ बुरा ही नहीं होता, बल्कि वह तब निश्चित तौर पर अच्छा होता है जब ऐसा काम पारिवारिक वातावरण में किया जाता है। इसे बाल श्रम न कहकर, बच्चों के लिए अच्छा काम कहा जाता है। बच्चों का काम, बाल श्रम और खतरनाक काम आदि में फर्क करने से मुद्दा धुंधला ही बनता है। क्या हस्तकरघे पर काम करना, किसी भूस्वामी के अन्तर्गत बंधुआ मजदूरी से कम खतरनाक होता है ? यदि बच्चा मवेशी चराता है तो अपने खुद के परिवार के लिये ऐसा करने पर उसे क्या बच्चों का काम कहा जायेगा ? किन्तु मजदूरी करने पर उसे क्या बाल श्रम कहा जायेगा? मान लीजिये मजदूरी की दर ज्यादा है और काम की स्थितियां अच्छी हैं तो यह कौन तय करेगा कि कौन सा काम बेहतर है।

घरेलू काम, जैसे पानी भरना, शिशुओं की देखभाल करना आदि को किस वर्ग में रखा जायेगा? क्या इसे काम कहा भी जायेगा या नहीं? कई लोग तो इस काम को बाल श्रम के अन्तर्गत ही नहीं मानते। परिणाम यह होता है कि वे यह मान बैठते हैं कि बच्चों का ऐसा वर्ग भी है जो न तो काम पर हैं और न स्कूल में। कभी-कभी इन्हें ‘कहीं के नहीं’ वर्ग के बच्चें कह दिया जाता है। एम.वी.एफ मॉडल यह मानता है कि बच्चे द्वारा किये गये काम का वर्गीकरण करना पूरी तरह बनावटी है और यह हल प्रस्तुत न करके ज्यादा जटिलताएं पैदा करता है। यह इस पर भी जोर देता है कि ग्रामीण भारत के संदर्भ में ऐसा कहीं नहीं है कि स्कूल न जाने वाला बच्चा कुछ नहीं करता। जो भी बच्चा स्कूल में नहीं है कभी न कभी, काम में लगा ही दिया जाता है। इस मॉडल में बच्चों के सिर्फ दो ही वर्ग होते हैं, वे जो काम पर जाते हैं, जैसे बाल मजदूर और वे जो दिन भर लगने वाले औपचारिक स्कूल में पूरे समय के लिये जाते है। डटथ् की ‘समझौता न होने योग्य’ ; यह मूल मंत्र है कि हर बच्चा जो स्कूल के बाहर है, बाल श्रमिक है।

डटथ् का यह विश्वास है कि हर बच्चे को बचपन का और अपनी क्षमता तक विकसित होने का अधिकार है और बच्चे के द्वारा किया जा रहा हर काम उसके इस अधिकार में हस्तक्षेप करता है। उसका यह भी मानना है कि जो बच्चे पूरे समय छात्र हैं वे ही काम से दूर रखे जा सकते हैं और यह भी उसका विश्वास है कि बच्चे का बचपन वाला अधिकार तभी पूरा होगा जब वह पूरे समय के लिये छात्र बनेगा। इसलिये डटथ् मॉडल में बच्चे का बचपन का अधिकार सुरक्षित करना, बाल श्रम खत्म करना और शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना, ये सभी एक ही प्रक्रिया के हिस्से हैं। यदि अन्य बातों का ध्यान रखे बिना किसी एक पर ध्यान दिया जाता है तो दूसरी बात जरूर असफल होगी।

बाल मजदूरी के विरुद्ध अभियान को अभिभावकों नें कैसे स्वीकार किया ?

उत्तर- एम.वी.एफ का अनुभव यह रहा है कि करीब-करीब सभी माता-पिता, यहां तक कि सबसे गरीब कहे जाने वाले वर्ग के भी पालक न सिर्फ अपने बच्चे को काम से हटाकर स्कूल भेजना चाहते हैं, बल्कि इसके कारण जरूरी धन और समय के रूप में जो भी त्याग चाहिये वह भी करने के लिये तैयार है। एक बार बच्चा स्कूल में दाखिल हो गया और उसने कुछ प्रगति की, तो पालकों ने तो अपने मवेशी और भेड़ें भी बेच डालीं, जिनकी देखभाल बच्चा करता था, और उन्होंने बच्चे के स्कूल में बनाये रखा। पालकों ने और परिवार के अन्य सदस्यों ने वे सभी काम अपने पर ले लिये जो बच्चा करता था और जिन्हें करना बहुत जरूरी था। इस बात के भी प्रमाण हैं कि माताओं के हिस्से काम का सबसे भाग आता है। लेकिन इसके प्रति शायद ही कोई नाराजगी प्रकट की जाती है।

एम.वी.एफ शिविरों में, काम के माहौल से स्कूल के माहौल में आसानी से बच्चे को ले जाने के लिये एक प्रकार के स्थानान्तरण शिविर है, यह स्पष्टतौर पर देखा जा सकता है कि किस प्रकार पालकों का नजरिया बदला है। एक बार यदि पालक को यह महसूस हो गया कि बच्चा पढ़ाई में गति पकड़ लेगा और यदि उसकी योग्यताओं पर उन्हें विश्वास हो गया तो वे बच्चे को काम पर भेजने के बारे में नहीं सोचते। जब वे शिविर में आते हैं तो वे छोट-मोटे उपहार देकर बच्चे को फुसलाते भी हैं, उसके साथ फोटो भी खिचवाते हैं और सामान्यतौर पर हर तरह से उसके साथ जुड़ना पसन्द करते हैं। बच्चे से होने वाली आय के नुकसान के बारे में वे बिलकुल नहीं सोचते और बच्चे पर कुछ ज्यादा ही खर्च कर देते हैं।

सभी बच्चे का स्कूल जाना क्यों नहीं संभव है ?

उत्तर- इस मुद्दे के कुछ पहलू ही सरल है। पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिये तैयार हैं और उनमें इसकी क्षमता भी है। यह तो सरल पक्ष हो गया, लेकिन इसके अलावा और भी कई जटिल मुद्दे हैं। सबसे पहले, गरीब पालकों के लिये खासकर उनके लिये जो पारम्परिक रूप से खेतिहर मजदूरी करने वाले समुदायों के हैं और आमतौर पर अनपढ़ हैं, अपने बच्चे को काम के लिए न भेजकर स्कूल भेजने का काम ही एक बड़ा क्रान्तिकारी कदम है। पीढ़ियों से उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता रहा है कि उनके लिये यही सबसे अच्छी बात है कि वे अपने बच्चे को जल्दी से जल्दी काम पर भेजें और शिक्षा उनके आर्थिक एजेण्डा का कभी हिस्सा नहीं रहा। यह शहरी मध्यम वर्ग के पालक के सोच के एकदम विपरीत है। जैसा कि, शहरी मध्यम वर्ग के पालकों के दिमाग में यह बात कभी नहीं आती कि वे अपने बच्चे को काम पर भेजें, उसी प्रकार ग्रामीण इलाके के पालक के लिये जो खेतिहर मजदूर ही होता है और एकदम अनपढ़ होता है, बच्चे को काम पर भेजना दुनिया की सबसे स्वाभाविक बात होती है।

पालक यह एकदम सटीक तरीके से जानते हैं कि यदि उनके बच्चे को काम पर भेजा गया तो उन्हें अपने बच्चे से क्या अपेक्षा करना चाहिये। इसकी तुलना उस जटिल स्थिति से कीजिये जिसका सामना पालकों को अपने बच्चे को स्कूल में भरती कराते समय करना पड़ता है। उसे जन्म प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, स्कूल की किताबें, पोषाक आदि प्राप्त करना पड़ता है। अकसर बच्चे को इसलिये प्रवेश नहीं दिया जाता क्योंकि प्रवेश जुलाई में बन्द हो गया है और उसका प्रवेश अगस्त में मांगा जा रहा है। और यदि किसी कारण से बच्चे ने 5-7 वर्ष की सामान्य स्कूली आयु पार कर ली है तो उसे किसी तीव्र गति के कार्यक्रम के अन्तर्गत ऊँची कक्षा में बैठने का कोई प्रावधान नहीं होता और उसे पहली कक्षा में अपने से काफी छोटे बच्चों के साथ बैठना पड़ता है जो उसका मजाक उड़ाते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन पालकों के लिये स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिलाने की तुलना में यह ज्यादा सरल होता है कि वे अपने बच्चे को किसी भूमिपति के पास बंधुआ मजदूर के रूप में रख दें।

एक बार बच्चा स्कूल में आ जाता है तो शिक्षक का पूरा रुख ही पालकों के लिये रहस्यमय हो जाता है। उन्हें यह बात पक्के तौर से पता नहीं होता कि बच्चे के गृहकार्य और शिक्षकों की अन्य मांगों से कैसे निपटे। शिक्षक खुद ही अजनबी होते हैं और अकसर अविवेकपूर्ण तरीके से व्यवहार करते हैं। एम.वी.एफ का यह अनुभव रहा है कि जितने बच्चों ने स्कूल छोड़ा है उससे कहीं ज्यदा बच्चों को स्कूल से बाहर निकाल दिया गया है। शिक्षक अपनी कक्षा में बच्चों की संख्या कम रखने के लिये कई तरीके अपनाते हैं। हाजिरी के समय बच्चे का नाम न पुकारे जाने जैसी साधारण बात बच्चे और पालकों को उलझन में डालने के लिये काफी होती है। इसके साथ ही और भी बातें हैं, जैसे बच्चे से नयी किताब लाने को कहना या घर में कविता याद करने को कहना या साल के अंत में सिर्फ यह कह देना कि बच्चा ठीक से पढ़ाई नहीं कर रहा है। ये सब बातें बच्चे को स्कूल से निकालने के लिये काफी होती है। एम.वी.एफ की शिक्षकों की एक कार्यशाला में शिक्षकों ने उन तरीकों की एक सूची ही तैयार कर दी जिनका इस्तेमाल वे अपनी कक्षा में बच्चों की संख्या कम रखने के लिये करते हैं।

यदि पालक और बच्चे इस आक्रमण को शुरू में झेल लेते हैं तो भी उनमें एक दबी-छुपी भावना रहती है और जिसे दूसरे लोग और मजबूत बना देते हैं, कि उन्हें वही करते रहना चाहिये जो वे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं अर्थात उन्हें अपने बच्चों को काम पर भेजना चाहिये। जो माहौल गांव में होता है उसे देखते हुए बच्चे को शिक्षा दिलाने की इच्छा ही उसे हकीकत में बदलने के लिये काफी नहीं है। इसके विपरीत, इस इच्छा की उपेक्षा करना भी विनाशकारी होगा।

क्या गरीबी का बाल मजदूरी या निरक्षरता से कोई संबंध नहीं है ?

उत्तर- हां, गरीबी और बाल-श्रम का आपस में संबध है लेकिन आमतौर पर गरीबी से जोड़ी जाने वाली किसी आर्थिक मजबूरी से शायद ही इसका कोई लेना-देना है। यह एक सामान्य सा मुद्दा है। बाल-श्रम और निरक्षरता इस बात का एक और उदाहरण है कि गरीबों की इसलिए नहीं सुनी जाती कि वे पर्याप्त महत्व के नहीं है। यह इसलिए है कि गरीब उचित जगह तक नहीं पहुच पाते और अपनी मांग को प्रभावी ढंग से नहीं रख पाते और इसका संबंध आय की कमी या कम हैसियत से नहीं है। यह ऐसा हक है जो गरीबों को नहीं मिल पाया है।

बाल मजदूरी रोकने हेतु एम.वी.एफ का क्या मॉडल है ?

उत्तर- एम.वी.एफ बुनियादी बातों से शुरू करता है। वह मानता है कि बाल श्रम से निपटने का एक मात्र रास्ता यह है कि पालकों के मन में शिक्षा के जरिये अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने की जो इच्छा है उसका उपयोग किया जाये। उसका विश्वास है कि किसी बच्चे/बच्ची को काम से हटाने और स्कूल में प्रवेश दिलाने के किसी भी कार्यक्रम का शुरुआती कदम यह होना चाहिये कि समुदाय के भीतर यह भावना भर दी जाये कि किसी भी बच्चे को काम नहीं करना चाहिये। समुदाय से जूझने का मतलब सिर्फ पालकों से निपटना नहीं है बल्कि इसका संबंध सभी प्रकार के लोगों से है, जिनमें नियोक्ता, मत बनाने वाले, स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि, समुदाय के बुजुर्ग, स्थानीय युवा, शिक्षक आदि भी आते हैं। इसमें समुदाय के इन सभी सदस्यों को बाल श्रम के मुद्दे के बारे में संवेदनशील बनाया जाता है और यह बताया जाता है कि वे किस तरह बाल श्रम को बनाये रखने में योगदान देते हैं। इसमें समुदाय को इस बात के प्रति भी संवेदनशील बनाया जाता है कि बाल श्रम खत्म होने से सिर्फ पालकों या खुद बच्चों को ही फायदा नहीं होता बल्कि समुदाय को भी फायदा होता है।

एक बार यदि यह मान लिया जाता है कि बच्चे को काम पर भेजना न तो जरूरी है और न बच्चे के लिये अच्छा है, तो स्कूलों में प्रवश तो खुद-ब-खुद हो जाता है। इससे समुदाय की रुचि स्कूल में बढ़ती है, जिससे समुदाय स्कूल के मामलों में ज्यादा जुड़ जाता है। एक बार यह हो जाने पर पढ़ाई की गुणवत्ता और बच्चों की जरूरत के प्रति स्कूल की प्रतिक्रिया में नाटकीय सुधार होता है जिससे समुदाय का जुड़ाव बढ़ता है और अन्त में यह खुद चलने वाली प्रक्रिया बन जाता है। इसलिए एम.वी.एफ मॉडल में शिक्षा के सार्वभौमीकरण को इस प्रकार नहीं देखा जाता कि पहले स्कूल स्थापित किये जायें और फिर बच्चों से कहा जाये कि वे उनमें प्रवश लें। रणनीति यह है कि पहले मांग पैदा की जाये और फिर स्कूल में प्रवेश दिया जाये। इस रणनीति में मांग का मूल आधार है बाल श्रम को खत्म करने की इच्छा।
एम.वी.एफ मॉडल का अन्तिम उद्देश्य यह है कि समुदाय बाल श्रम को ठुकराये और फिर स्कूल का ऐसी संस्था के रूप में विकास किया जाये जो बच्चों के विकास के सभी पहलुओं की फिक्र करे। उसके सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य इस रणनीति को अमल में लाना है।

औपचारिक स्कूलों में दी जा रही शिक्षा, ग्रामीण बच्चों के लिए कितनी प्रासंगिक ?

इतने सारे लोगों की बेरोजगारी देखते हुए क्या हमें बच्चों को इन स्कूलों में जाने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये ? क्या यह ज्यादा बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं होगा कि कुछ किस्म को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाये ताकि बच्चे और समाज को बेरोजगारी की समस्या का सामना न करना पड़े ?

उत्तर- शिक्षा की प्रासंगिकता के मुद्दे के कई पहलू हैं। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह पहलू यह है कि ऐसा क्यों है कि प्रासंगिकता का मापदण्ड पहले कामगार बच्चों पर और स्कूल के बाहर के बच्चों पर लागू किया जाता है। स्कूल और पूरी शिक्षा प्रणाली लम्बे समय से सभी को अप्रासंगिक शिक्षा देते आ रहे हैं। कौन कह सकता है कि प्रसिद्ध दून स्कूल सबसे ज्यादा प्रासंगिक शिक्षा प्रदान कर रहा है ? फिर भी, जो पालक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के आदी हैं उनके लिये अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिये यह कभी एक कारण नहीं रहा है। उनके लिये तो यह विकल्प कभी नहीं रहा है कि बच्चे को ऐसे स्कूल में भेजें जो प्रासंगिक शिक्षा देता हो, या फिर उसे काम करने के लिये भेज दिया जाये। वे अपने बच्चे को तो ऐसे स्कूल में भेजते हैं जिसके बारे में उनका ख्याल है कि वह उनके द्वारा दी जा रही कीमत पर सबसे अच्छी शिक्षा देता है। इसीलिये इतने सारे किस्म के स्कूल मौजद हैं। इसलिये ऐसा क्यों है कि जब कामगार बच्चों की बात आती है तभी शिक्षा की प्रासंगिकता की बात की जाती है। प्रासंगिकता की समस्या से तो पूरी शिक्षा प्रणाली ग्रस्त है और इसे काम करने वाले बच्चों को स्कूल से परे रहने का बहाना नहीं माना जा सकता। इसे एकदम दूसरे स्तर पर निपटाने की जरूरत है।

मुद्दे का दूसरा पहलू यह है कि स्कूल को ऐसी संस्था के रूप में देखा जाना चाहिये जो बच्चे को काम से परे रखकर उसके बचपन के अधिकार को लागू करती है। यही वह स्थिति है जहां दिन के औपचारिक स्कूल का सच्चा स्वरूप उभरकर सामने आता है। औपचारिक स्कूलों पर, खासकर ग्रामीण संदर्भ में, हमेशा यह दोषारोपण किया जाता है कि वे ऐसी प्रासंगिक शिक्षा नहीं देते जो बच्चे को एक उत्पादक इकाई बना सके। उनका मजाक उड़ाया जाता है कि वे इस प्रकार काम करते हैं जिससे परिवार उस समय बच्चे की कमाई से वंचित रह जाता है, जब इसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इसलिये, यह सुझाया जाता है कि स्कूलों को ‘पढ़ाई करते समय कमाओ’ योजना की तर्ज पर ‘व्यावसायिक’ शिक्षा देना चाहिये और स्कूलों को खेती के काम के चरम मौसम में, जैसे फसल कटाई के समय, बन्द कर दिया जाना चाहिये ताकि बच्चा परिवार की आय में योगदान दे सकें। औपचारिक स्कूलों की प्रणाली के इन तथाकथित ‘दोषों’ को बारीकी से देखने पर पता चलता है कि इन तथाकथित ‘दोषों’ के कारण ही इन स्कूलों का समर्थन किया जाना चाहिये। बच्चे कम उम्र में ही श्रम बाजार में आ जायें इसे जारी रखने के लिये अकसर व्यावसायिक शिक्षा सिर्फ एक सुभाषित है। जहां तक स्कूल के सत्रों के समय का सवाल है, एक संस्था के रूप में जो बच्चे को काम से परे रखती है, यह वास्तव में जरूरी है कि स्कूल, खेती के चरम मौसम में पूरे जोर-शोर के साथ चलना चाहिये। यह तो स्पष्ट है कि एक बात के लिये औपचारिक स्कूलों को किसी भी दशा में यह नहीं कहा जा सकता कि वे बाल श्रम को सहयोग दे रहे हैं। यही वह बात है जो इस संस्था को बाल श्रम को खत्म करने वाले किसी भी कार्यक्रम के लिये अमूल्य बनाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि औपचारिक स्कूल इसलिए महत्व के हैं क्योंकि यही एक सरकारी संस्था है जो सिर्फ बच्चों से संबधित हैं। अंतिम विश्लेषण में जब बाल श्रम को खत्म करने की बात आती है, तो न तो शिक्षा के प्रासंगिकता का मुद्दा और न स्कूलों का स्वरूप ही, बहुत महत्व का रह जाता है। दिमाग में यही पहलू रखा जाना चाहिये कि बच्चा काम से बाहर रखा जा रहा है या नहीं।

सच कहा जाए तो जो लोग शिक्षा की प्रासंगिकता के सबसे श्रेष्ठ निर्णायक हैं, वे पहली पीढ़ी के साक्षर हैं जिन्होंने सांचे को तोड़ा है और इस प्रतिष्ठा को पाने के लिये कईं बाधाओं को पार किया है। ऐसा शायद ही हुआ है कि ऐसा कोई साक्षर मिले, चाहे वह बेरोजगार ही क्यों न हो, जिसने निरक्षर रहना पसन्द किया हो। शिक्षा प्रणाली रोजगार के अवसर के रूप में जो नहीं दे पाती, वह व्यक्ति के आत्म गौरव को उठाकर कहीं ज्यादा भरपाई कर देती है।

परिवार की पारंपरिक पेशा संबंधी कौशल, बच्चों में पैदा करना बेहतर होगा ?

उत्तर- पारम्परिक शिल्प के मुद्दे को रूमानी बनाने की कुछ प्रवृत्ति सी हो गयी है। जो मत अकसर प्रकट किया जाता है, वह यह है कि पारम्परिक शिल्प ने सदियों से ग्रामीण अर्थव्यवथा को कुशलता से बनाये रखा है, जो आधुनिक प्रणाली नहीं कर सकती। परिणामस्वरूप ऐसा माना जाता है कि बच्चे को परिवार के धंधे में जल्दी से जल्दी लगाना बच्चे के लिये लाभप्रद होगा क्योंकि उसे अंत में वही काम करना है जिसमें वह श्रेष्ठ सिद्ध हों सकेगा, अर्थात् परिवार का धंधा। इस प्रकार बच्चे को न सिर्फ अप्रासंगिक शिक्षा में समय बरबाद करना पड़ेगा बल्कि वह एक उत्पादक नागरिक बन सकेगा और रोजी-रोटी कमायेगा।

इस नजरिये को यदि तार्किक रूप से देखा जाये तो इसमें यह बात निहित है कि बच्चे के लिये यही सबसे अच्छा है कि वह अपने परिवार का धंधा जारी रखें। यह उस पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से ज्यादा अलग नहीं है जिसमें कुछ धंधों को कुछ खास समुदायों के लिये तय कर दिया गया था। ऐसी व्यवस्था अन्त में ऐसी स्थिति पैदा करेगी जहां कुम्हार का बच्चा कुम्हार रहेगा और बुनकर का बच्चा बुनकर रहेगा।

वास्तव में यही वह व्यवस्था है जिसने तय कर रखा है कि खेतिहर मजदूर का बच्चा खेतिहर मजदूर होगा। इस तरीके से सोचने पर भविष्य तय करने का विकल्प बच्चे से बहुत शुरुआती चरण में ही पूरी तरह छीन लिया जाता है। इस धारणा की विडम्बना यह है कि यह इस सच्चाई की उपेक्षा कर देती है कि ग्रामीण समाज में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें कारीगर परिवार के लोग अपने परिवार के धंधे के बाहर बहुत ऊँचाई तक पहुचे हैं और बहुत संभव है कि यदि उन्होंने अपना पारिवारिक धंधा नहीं छोड़ा होता तो वे अच्छा नहीं कर पाते। शिक्षा का सच्चा स्वरूप यह है कि वह व्यक्ति को इस प्रकार तैयार करें कि वह ठीक समय पर संतुलित निर्णय ले सके। अपने खुद का भविष्य तय करने की बच्चे की इसी क्षमता को हम बच्चों से छीन लेते हैं, जब हम सुरक्षित रोजगार देने के नाम पर बच्चे को शिक्षा से वंचित रखते हैं। यह दलील भी सच नहीं है कि यदि बच्चे को एक पारिवारिक शिल्प में बचपन में ही डाल दिया जाये तो वह तेजी से कुशलता हासिल कर लेता है। वास्तव में ऐसे सबूत हैं कि बच्चे जब पढ़ाई में कुछ दक्षता हासिल कर लेते हैं या जब 12-14 साल के हो जाते हैं तब वे बेहतर करते है।

कम उम्र में बच्चों को परिवार के धंधे में डाल दिया जाये इस सोच में, बच्चों के प्रति पूरा नजरिया ही यह है कि किसी प्रकार उन्हें किसी तरह के कुशल कारीगर में बदल दिया जाये। यह एक ऐसा धारणा है जिसमें बचपन को ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है जिसमें बच्चे को एक कारीगर में बदल दिया जाता है और समाज को दो मोटे वर्गों में बांट दिया जाता है। एक तो वह जिसमें वे लोग आते हैं जो इसकी प्रतीक्षा कर सकते हैं कि उनके बच्चे वयस्कता की चुनौतियों का सामना करने के लिये तैयार हो जायें और दूसरे वे लोग जिन्हें अपने बच्चों को जल्दी से जल्दी काम पर लगाने की जरूरत है ताकि वे समाज पर भार न बन सकें। यह सोचने का ऐसा तरीका है जिसकी वकालत वे लोग करते हैं जो अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बारे में कभी दो बार नहीं सोचते और अपने पारिवारिक धंधे में लौटने की जिनकी कोई मंशा नहीं है।

शिक्षा के सार्वभौमीकरण के सरकारी कार्यक्रमों का क्या स्वरूप रहा है ?

उत्तर- ‘‘गरीबी की दलील’’ और शिक्षा की अप्रासंगिकता की अवधारणा ने बाल श्रम और
शिक्षा से संबधित सरकारी कार्यक्रम बनने में मुख्य भूमिका अदा की है। जहां तक बाल श्रम का संबंध है, सरकार का सोच बाल श्रम की कठोर सच्चाई के आसपास घूमता है और इसीलिये इस संबंध में जो कानून बना है वह तथाकथित खतरनाक उद्योगों से बाल श्रम को खत्म करने की और अन्य जगहों पर औपचारिक सेक्टरों में उसके नियमन की ही बात करता है। यह कानून परिवार के माहौल में बाल श्रम को अपनी नजर से ओझल कर देता है। इस प्रकार सरकारी आंकड़ें 1 करोड़ 70 लाख कामगार बच्चों में से खतरनाक उद्योगों के सिर्फ 20 लाख बच्चों को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं। ये कार्यक्रम भी बच्चों के श्रम से आय को होने वाले नुकसान का मुआवजा देने जैसे उपायों पर भरोसा करते हैं, जो पूरी तरह यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक मुद्दे को समझा ही नहीं गया है।

सरकार की शिक्षा नीति गरीबी की दलील के आगे, और उससे भी ज्यादा बाल श्रम की कठोर सच्चाई के आगे घुटने टेक देती है। हाल के समय में, सबसे बड़ा कार्यक्रम अनौपचारिक शिक्षा, छद्म कार्यक्रम सिर्फ यह मान लेता है कि बच्चों को काम करना पड़ता है और इसलिये इसमें अनौपचारिक शिक्षा के ऐसे केन्द्र चलाने की वकालत की गयी है जो बच्चों के काम करने के रूप में हस्तक्षेप न करें। इसके आगे, खाली शब्दाडाम्बर के अलावा शायद ही कुछ हासिल हुआ है। इसलिये, यदि संक्षेप में कहा जाये तो सरकार काम करने वाले बच्चों के लिये गरीबी की दलील और शिक्षा की अप्रासंगिकता की धारणा को बिना किसी संशय के स्वीकार करती है। जैसा कि हमने पहले देखा है, ये दोनों अवधारणाएं छलावा हैं और इन्हें गंभीर चुनौती देने की जरूरत है।

कार्यक्रम के रूप में सरकारी धारणा में वास्तव में क्या कमियां हैं ?

उत्तर- बाल श्रम और शिक्षा के बारे में सरकारी नीतियों और कार्यकमों में मुश्किल यह है कि वे पूरी तरह नकारात्मक आधार पर चलाये जाते हैं। वे यह मान लेते हैं कि गरीब पालक अपने बच्चों को काम से नहीं हटा सकते या नहीं हटायेगे और स्कूल नहीं भेजेंगे। वे यह मान लेते हैं कि पालक यह अनुभव करते हैं कि शिक्षा प्रणाली अप्रासंगिक है और यह एक अन्य बड़ा कारण है कि वे क्यों अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। और अन्त में वे यह मानते हैं कि औपचारिक स्कूल प्रणाली गरीब पालकों के बच्चों के लिये उपयुक्त नहीं है। सोचने का यह तरीका इस सच्चाई की पूरी तरह उपेक्षा कर देता है कि आज भी बहुत से तथाकथित गरीब पालक अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे है। वे गरीब पालकों की इस दबी छुपी इच्छा को नहीं समझते कि वे शिक्षा के जरिये अपने बच्चों के लिये बेहतर भविष्य चाहते हैं और अपनी इस इच्छा को पूरी करने के लिये वे धन और समय के रूप में त्याग के लिये तैयार हैं और इसकी उनमें क्षमता भी है। यह कुछ वैसा ही है कि कोई खाता-पीता व्यक्ति यह समझने में असमर्थ रहे कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी नहीं जुटा सकता वह उन चीजों को प्राप्त करने की कोशिश क्यों करता है जिन्हें वह चाहता है। ऐसी स्थिति में बाल श्रम की समस्या को उसकी सम्पूर्णता में न देखकर सरकार टुकड़े-टुकड़े वाला तरीका अपनाती है। यह तो शुरू होते ही असफल होने वाला है क्योंकि चाहे कार्यक्रम कुछ बच्चों को कामगारों की फौज से हटा लें, लेकिन उनकी जगह लेने के लिये दूसरे बच्चे तो हमेशा उपलब्ध रहेंगे। कार्यक्रम को लागू करने के तरीके की बात करें तो सरकार की पहुँच शायद ही कभी उस अन्तिम बिन्दु के पार जाती है, जिस बिन्दु पर संस्था मौजद है। इस प्रकार उसके सभी कार्यक्रम अनिवार्य रूप से स्कूल स्तर पर रूक जाते हैं और जो प्रक्रियाएं व मुद्दे स्कूल के पार समुदाय और घर तक जाते हैं वे तो अनिवार्य रूप से उसकी पहुँच के बाहर होते हैं। परिणाम यह होता है कि सरकार के सबसे अच्छे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल के बच्चों को ही प्रभावित करते हैं तथा स्कूल के बाहर जो बच्चे काम पर होते हैं, उन तक ये कार्यक्रम नहीं पहुँच पाते। चूंकि ज्यादातर समस्याएं इस क्षेत्र में है, इसलिए बेहतर तरीके से लागू होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में भी बाल श्रम और शिक्षा से संबंधित मौजूदा हालात को बदलने की बहुत सीमित क्षमता है।

बाल श्रमिकों की स्थिति और समस्याएँ

भूमिका

बच्चे किसी देश या समाज की महत्वपूर्ण सम्पति होते हैं, जिनकी समुचित सुरक्षा, पालन-पोषण, शिक्षा एवं विकास का दायित्व भी राष्ट्र और समुदाय का होता हैं क्योंकि कालान्तर में यही बच्चे दिश के निर्माण और राष्ट्र के उत्थान के आधार स्तम्भ बनते हैं । बाल कल्याण को प्रमुखता देने के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस (14 नवंबर) को प्रति वर्ष बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है । जहाँ एक ओर बाल कल्याण से संबन्धित अनेक विषयों पर विश्व जनमत गंभीरता से सोच रहा है, वहीं दूसरी ओर बाल श्रमिकों की समस्या भी तेजी से पनप रही है – विशेषकर विकासशील दिशों में यह समस्या अधिक विकराल रूप में दृष्टिगत हो रही है । आज विश्व में लगभग 25 करोड़ बाल श्रमिक हैं ।

संयुक्त राष्ट्र संघ को रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाल मजदूरों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है । भारत में अनूमानत: बाल श्रमिकों की संख्या 440 लाख से 1000 लाख तक है, किन्तु अधिकृत रूप से इनकी संख्या 17.5 लाख बताई गई है । कूल बाल श्रमिकों का 30 प्रतिशत खेतिहर मजदूर तथा 30-35 प्रतिशत कल कारखानों में कार्यरत हैं । शेष भाग पत्थर खदानों, चाय की दूकानों, ढाबों तथा रेस्टोरेंट एवं घरेलू कार्यों में लगे हुए हैं एवं गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं ।

योजनाओं, कल्याण कार्यक्रमों, कानून तथा प्रशासनिक गतिविधियों के होते भी विगत चार दर्शकों में अधिसंख्यक भारतीय बच्चे संकट तथा कष्ट के दौर से गुजर रहे हैं । अनेक अभिभावक उपेक्षित करते हैं, उनके संरक्षक उन्हें शोषित करते हैं तथा रोजगार देने वाले उनका लैंगिक शोषण करते हैं । यद्यपि भारत में बच्चों के भावनात्मक, शारीरिक तथा लैंगिक, शोषण की समस्या बढती जा रही है लेकिन यह मनोवैज्ञानिकों तथा समाज वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट कराने में असफल रही है ।

जनता तथा सरकार दोनों को ही इस स्थिति को एक गंभीर समस्या के रूप में स्वीकार करना होगा तभी इसका समाधान संभव हो सकेगा ।

बाल श्रम की अवधारणा

बाल श्रम बाल उत्पीड़न का एक प्रकार है । परिवार की सीमित आमदनी, निम्न जीवन स्तर, परिवार का वृहत आकार तथा पारिवारिक उपेक्षा और उत्पीड़न के परिणाम स्वरुप एक कम आयु का बालक श्रमिक की स्थिति में पहुँच जाता है अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के निदेशक ने बाल श्रम मजदूरों को परिभाषित करते हुए कहा है की – “ ये वे किशोर नहीं हैं जो दिन के कुछ घंटे खेल और अध्ययन सी निकाल कर जेब खर्च के लिए काम करते हैं । ये वे बच्चे भी नहीं हैं जो वयस्कों को जिन्दगी – व्यतीत करने को मजबूर हैं । दस से अठारह घंटे काम करके, कम वेतन पर अधिक श्रम बेचते, बुनियादी शिक्षा और खेल से वंचित और कभी- कभी परिवार से अलग अलग होकर रहते हुए ..........।”

अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में 30 करोड़ बच्चों में से 4.44 करोड़ बाल श्रमिक के रूप में विभिन्न उद्योगों में काम करते हैं । देश का प्रत्येक सातवां बच्चा बाल श्रमिक के रूप में जन्म लेता है । एक दुखद पहलू यह है की हमारे देश में दुनिया के सबसे अधिक बच्चे अनाथ हैं । प्रतिवर्ष लगभग 11.5 लाख ‘अमान्य बच्चे’ जन्म लेते हैं, जिनमें से अधिकांश 5-6 वर्षों के पश्चात् बाल- श्रमिक बना दिए जाते हैं ।

बाल श्रमिक शोषित, जोखिमपूर्ण कार्य परिस्थितियों में असुरक्षित तथा कम वेतन में अधिक कार्य का जीवन व्यतीत करते हैं । ये वे बच्चे हैं जो बाल्यावस्था को नहीं जानते । हमारे संविधान में कहा गया है की :-

- कोई बालक जिसकी आयु 14 वर्ष से कम है, उसे कारखानों या जोखिमपूर्ण कार्यों में नहीं रखा जायेगा, (अनूच्छेद-24)

- बाल्यावस्था तथा यूवावस्था को शोषण तथा नैतिक व भौतिक दुर्व्यसनों से सुरक्षित रखा जाएगा (अनुच्छेद- 39 एफ)

- राज्यों को यह प्रयत्न करना होगा की 14 वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाए ।

भारत जैसे देश में जहाँ 40 प्रतिशत आबादी अत्याधिक निर्धन हैं, वहाँ बाल श्रम एक जटिल मुद्दा हैं । बच्चों में अपराध – बोध की भावना को दबाने का तर्क देते हैं । उनका कहना है की बच्चों को रोजगार परक बनाने से भुखमरी की स्थिति को दूर किया जा सकता है नौकरशाहों का विचार है की बाल श्रम का पूर्णत: उन्मूलन अव्यावहारिक है क्योंकि सरकार ने उनके लिए कोई ठोस विकल्प नहीं बनाए हैं समाज बैज्ञानिकों का मत है की बाल श्रम को मुख्य कारण गरीबी है । ऐसी स्थिति में बच्चे पारिवारिक आय में वृद्धि करते हैं या वे अपने परिवार में आय का एकमात्र स्रोत होते हैं । बाल श्रम का एक अन्य कारण सस्ते श्रम की उपलब्धता है । बाल श्रम का एक अस्तित्व इसलिए भी है की इनसे उद्योगों को लाभ मिलता है । उदाहरणार्थ उत्तरप्रदेश के कालीन उद्योग में 1990 में 75000 बच्चे बाल मजदूर के रूप में संलग्न थे जिन्होंने 300 करोड़ की बिदेशी मुद्रा अर्जित की ।

बाल उत्पीड़न

सरकार तथा जनता की अरूचि की कारण बाल उत्पीड़न की समस्या संबंधी आंकड़े संकलित नहीं किए जाते । भारत में गरीबी – अशिक्षा तथा परिवार बृहद आकार आदि मुख्य कारणों से बच्चे अभिभावकों/संरक्षकों तथा रोजगार देने वालों द्वारा उत्पीड़ित किये जाते हैं । मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण के अनुसार अंत: वैयक्तिक असामान्यता, मानसिक रूग्णता तथा वैयक्तिक विकार बाल उत्पीड़न के मुख्य कारण हैं । एक अभिभावक द्वारा अपने बच्चे को उत्पीड़ित करना उसकी भावात्मक आवश्यकताओं की अतृप्ति से संबंधित है । बच्चों की आवश्यकता एवं स्वयं की प्रत्याशाओं की बीच संतुलन क्षमता का अभाव, स्वयं की उत्पीड़ित या वंचित पारिवारिक पृष्ठभूमि से प्राप्त भावात्मक चिन्ह अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के संरक्षण को प्रभावित करते हैं ।

सामाजिक – सांस्कृतिक स्पष्टीकरण के अनुसार संरचनात्मक तनाव तथा सांस्कृतिक प्रतिमान उत्पीड़न तथा हिंसा के मुख्य कारण हैं । निम्न आय, बेरोजगारी, पृथक्कता, अनिच्छित गर्भधारण तथा दाम्पत्य संबंधी में तनाव आदि संरचनात्मक तनाव के कारण हैं, जो घर में बच्चों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार हैं ।

बाल श्रमिकों पर अत्याचार : नई सुबह का इन्तजार

आज की दुनिया में मजदूरों की बहुत – सी सुविधाएँ प्राप्त हैं । उनके कार्य के घंटे निर्धारित हैं, उनकी कार्य – दशाएँ काफी हद तक संतोषजनक हैं । यह सब अचानक नही हूआ, बल्कि इसके पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी हैं । इस स्थिती को प्राप्त करने, अमनिविय स्थितियों से निजात पाने के लिए मजदूरों ने एक लम्बा संघर्ष किया और एक मई अर्थात मजदूर दिवस इस संघर्ष यात्रा का प्रतिक है । मई दिवस का आयोजन दुनिया में मजदूरों की एकता और शक्ति के प्रदर्शन के निमित्त किया जाता है । इसमें कोई संदेह नहीं है की आज के मजदूर को उस शोषण का सामना नहीं करना पड़ रहा है जो आज से पहले मजदूरों का एक वर्ग आज भी उन्हीं हालत में जी रहा हैं, जिन हालत में वह एक सदी पहले या दो सदी पहले जीता था । मजदूरों के इस वर्ग का नाम हैं ‘बाल मजदूर’

वे बच्चे, जो शिवकाशी के आतिशबाजी के उद्योग में काम करते हैं या फिरोजाबाद के कांच के कारखानों में काम करने वाले बाल मजदूर, हमारे सभ्य होने की सार्थकता पर प्रश्न – चिन्ह लगाते हैं ? चाय बागानों में पत्तियाँ तोड़ती बालिकाएँ, होटलों और ढाबों पर जूठे बर्तन मांजते बच्चे, मिर्जापुर के कालीन उद्योग में अपनी आँखों की रोशनी खोते हुए बच्चे, हमारी समस्त प्रगति पर एक बड़ा सवाल लगाते हैं । उनके शोषण को रोकने के लिए अनेक समितियाँ भी हैं , बहुत- सी रिपोर्टे प्रस्तुत की गई, नतीजा वही ढाक के तीन पात ।

अमानवीय परिस्थितयों में काम करें को विवश ये बच्चे जहाँ एक ओर हमारी आर्थिक स्थिति का परिणाम है, वहीं इससे जुड़ी है हमारी वह स्वार्थी मनोवृति, जो काम दाम में अधिक श्रम chahti चाहती है । कई बार यह प्रश्न उठता है की अनेक कानूनी प्रावधानों के बावजूद बाल श्रमिकों की कार्यदशाओं में सुधार क्यों नहीं हूआ ? हर बार इसके लिए कारणों की लम्बी सूची प्रस्तुत कर दी जाती है । जबकि असलियत यह है की समाज ने इस समस्या को कभी भी गम्भीरता के साथ नहीं लिया । इस समस्या के समाधान को सामाजिक और कानूनी दायित्व मन ही नहीं गया, जिसके कारण हम के प्रति उदासीनता रहते हैं । इतना ही नहीं, अक्सर किसी न किसी तरीके से उनके शोषण में शामिल हो जाते हैं । प्रश्न उठता है की आखिर इस समस्या से निजात कैसे पाई जाए ?

बाल श्रमिक भयावह रूप

  • समस्त विश्व के 25 करोड़ बाल श्रमिकों में से मात्र भारत में ही इसके एक तिहाई बाल श्रमिक हैं ।
  • तेजी से हो रहे नगरीकरण की वजह काम करते हैं ।
  • लाखों बच्चे जोखिम वाले उद्योगों में हैं अथवा बन्धूआ मजदूर हैं ।
  • बाल श्रमिक औसतन 12 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हैं ।
  • बाल श्रमिक भारत के कूल राष्ट्रीय उत्पाद का 20 प्रतिशत बनाते हैं । इस समस्या को यदि हम आर्थिक समस्या के साथ-साथ सामाजिक समस्या भी मानें तो इसके देखने के नजरिये में बुनियादी परिवर्तन आ जाता है और समाज इसके प्रति अपना सरोकार महसूस करने लगता है । समाज को लगता है की यदि वह पढने – लिखने की उम्र में बच्चों के हाथों में माँजने के लिय जूठे बर्त्तन थमा देता है, यह जवाबदेही समाज की ही है, किसी और की भी । इस तथ्य से समाज को परिचित करा कर ही हम अधिक गंभीरता के साथ मजदूरों के उस तबके के हालात को बदल सकते हैं, जिसके प्रति हम सिर्फ सहानुभूति जताते हैं और उससे आगे नहीं बढ़ते ।

बच्चे राष्ट्र की अमूल्य निधि हैं तथा इस निधि को सम्पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना एवं इनके मनोसामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक मूल्यों के विकास का दायित्व केवल उन परिवारों का ही नहीं, जहाँ ये बच्चे जन्म लेते हैं वरन उस समाज तथा देश का भी है जहाँ ये बड़े होते हैं और जहाँ रहते हैं । बाल श्रमिकों को शोषण की यह परम्परा अनादि काल से चली आ रही है तथा अभी भी समाज में एक मानवीय कलंक के रूप में व्याप्त है ।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार अपने शारीरिक एवं मानसिक विकास को क्षति पहुँच कर 14 वर्ष या इससे कम आयु में ही वयस्कों के अनुरूप कार्य करने तथा वयस्कों के सामान जिन्दगी गुजर बसर करने वालों को बाल श्रमिक कहा जाता है ।

वस्तुत: बाल श्रम दो प्रकार का होता है एक बच्चा घर पर अथवा बाहर अपने अभिभावक के साथ उसके धंधों में हाथ बंटाता हूआ काम सीखता है और ऐसा करते समय उसकी पढाई-लिखाई, मनोरंजन, खेल कूद आदि में कोई बाधा नहीं होती है दो पारिवारिक धनोपार्जन हेतु बच्चों के मजबूरी में ऐसे कामों में लगाया जाता है, जहाँ उनके शारीरिक, मानसिक विकास, स्वास्थ्य, मनोरंजन आदि का ख्याल नहीं रखते हुए उनसे कार्य करवाया जाता है । प्रथम प्रकार के श्रम में बच्चों के कार्य का उद्देश्य धनोपार्जन नहीं, बल्कि काम सीखना होता है और दुसरे प्रकार के श्रम का उद्देश्य परिवार की तात्कालिक आय बढ़ाना होता है जिससे वे भविष्य के लिए बेहतर अवसर तथा शिक्षण – प्रशिक्षण से वंचित रह जाते हैं। वास्तविक बाल श्रमिक ये ही हैं ।

बाल श्रमिकों की अधिक संख्या असंगठित क्षेत्रों में हैं जो घरेलू नौकरों, होटल, दर्जी, संस्थानों में पेपर बाँटना, जूता पोलिश, सफाई, सामान, उठाई- धराई निर्माण आदि कार्यों में सहायक के रूप में काम करते हैं । आज कृषि, बागन, खदान एवं खनन, बीड़ी, उद्योग, कांच, चूड़ी उद्योग, हथकरघा एवं कालीन, जरी और काशीदारी, रत्न कटाई, दियासलाई एवं पटाखा उद्योग, मशीन औजार बनाने के उद्योग, पेट्रोल पंप, काजू पकाई बनाई और जूट उद्योग, कैंटीन, होटल, ढाबा, दुकान, कूड़ा बिनाई, घरेलू कामगार, भवन निर्माण, हॉकर, फेरीवाले, अखबार बेचने वाले, कुलीगीरी आदि क्षेत्रों में बाल श्रमिक बहुतायत में कार्य कर रहे हैं । बाल श्रम के परिप्रेक्ष्य में यह एक महत्वपूर्ण एवं चिंता का विषय है कि अधिकांश बाल मजदूर बन्धूआ मजदूरों जैसा जीवन यापन कर रहे हैं । श्रम के दौरान शारीरिक और मानसिक यातना इनकी जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया है ।

सामाजिक पर्यावरण व्याख्या के अनुसार पर्यावरण का स्तर जिसमें व्यक्ति तथा परिवार रहते हैं या पर्यावरण में पारिवारिक समर्थन पर बच्चों के उत्पीड़न की प्रकृति निर्भर करती हैं । पारिवारिक समर्थन के कम होने से दुर्व्यवहार की सम्भावना बढ़ जाती है ।

सामाजिक नियन्त्रण संबंधी व्याख्या के अनुसार पारिवारिक संबंधों में सामाजिक नियंत्रण की कमी से उत्पीड़न की सम्भवना बढ़ जाती है । बच्चों मारने – पीटने की घटनाएँ समान्यता: पाई जाती है । विकलांग. कुरूप आदि बच्चों में परिवारजनों द्वारा उत्पीड़न व उपेक्षा की भावना पाई जाती है ।

संसाधन संबंधी व्याख्या के अनुसार सामाजिक, वैयक्तिक तथा आर्थिक संसाधनों पर अधिकार एक व्यक्ति पर शक्ति के प्रयोग को निर्धारित करता है । जैसे एक पिता जो परिवार का प्रभूत्वाशाली व्यक्ति बनना चाहता है लेकिन उसके पास निम्न शैक्षिक स्तर, निम्न स्तरीय हो तो वह अपने बच्चों पर शक्ति प्रर्दशन कर अपनी प्रभूत्वाशाली स्थिति को बनाए रखता हैं ।

सामाजिक संज्ञानात्मक व्याख्या के अनुसार अनके अभिभावकों के पास बच्चो के पालन- पोषण के सम्बन्ध में अपर्याप्त कौशल तथा जानकारी होती है, जिस कारण वे इस एक जटिल कार्य समझते हैं । इस असफलता के कारण वे अपने बच्चों को उत्पीड़ित करते हैं ।

बाल उत्पीड़न के दुष्प्रभाव

बाल उत्पीड़न के अनेक दुष्प्रभाव परिलक्षित होते हैं । यथा, आत्म – अवमूल्यन, पराधीनता या निर्भरता, आलगाव, अविश्वास, अंत व्वैयक्तिक समस्याएँ, विचलित व्यवाहर, मानिसिक आघात आदि । उत्पीड़ित बालक स्वयं के विषय में नकारात्मक विचार विकसित कर लेता हैं । पराश्रयता के कारण उसके पास अपने अभिभावकों, संरक्षकों तथा रोजगार प्रदान करने वाले के उत्पीड़न को स्वीकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं होता । पराश्रयता तब परिलक्षित होती है तब, बच्चा अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए अन्य लोगों पर निर्भर होता है । यह निर्भरता शारीरिक आवश्यताओं (भोजन, वस्त्र, चिकित्सा), भावात्मक एवं सामाजिक समर्थन तथा धनोपार्जन के लिए कहीं कार्य करने की आवश्यकता के रूप में देखी जा सकती है । अध्ययनों में पाया गया की उत्पीड़न का मुख्य प्रभाव एक बच्चे की सामाजिक संस्कृतिक प्रत्याशाओं से अनूरूपता तथा बड़ी संख्या में उत्पीड़ित बच्चे ऐसे क्रियाकलापों में भागी होने के लिए बाध्य किये जाते हैं जो सामाजिक मापदंडो का उल्लंघन करता है, पर पड़ता है । स्कूल में पलायन, कार्य से पलायन, नशाखोरी, चोरी एवं अन्य अपराधों के रूप में विचलित व्यवहार परिलक्षित होती है ।

विभिन्न उद्योगों में कार्यरत बाल श्रमिकों का वितरण

भारत की कूल जनसंख्या में 38.4 प्रतिशत बच्चे 15 वर्ष से कम आयु के हैं । 1991 की जनगणना अनुसार 0-4 वर्ष के आयु समूह में 35.7 प्रतिशत, 5-9 वर्ष के आयु समूह में 34.3 प्रतिशत तथा 10-14 वर्ष के आयु समूह में 30 प्रतिशत बच्चे हैं कुल जनसंख्या में ये 3080 लाख हैं । अधिसंख्यक बच्चे निर्धन परिवार से सम्बन्धित हैं, जो आर्थिक मजबूरी के कारण श्रम शक्ति में भागीदारी बनते हैं योजना आयोग के मूल्यांकन के अनुसार 1981 -1990 के बीच कार्यरत बच्चों की संख्या में 800 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो 135 लाख से बढ़कर 1160 लाख हो गई है । भारत सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है की भारत में अनूमनत: 1023 लाख परिवार निवास करते हैं । जिनके पास 34.7 प्रतिशत कार्यरत बच्चे हैं । 79 प्रतिशत कार्यरत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं । कार्यरत बच्चों का 2/3 भाग 12-15 वर्ष के आयु समूह के अंतर्गत है ।

बाल श्रमिकों के वर्त्तमान आंकड़े यह प्रदर्शित करते हैं कि कृषि क्षेत्र में 1 करोड़ 22 लाख, जम्मू कश्मीर के कालीन उद्योग में 1 लाख शिवकासी के आतिशबाजी और माचिस उद्योग में 1 लाख बच्चे, फिरोजाबाद के कांच उद्योग में 1 लाख बच्चे आगरा और कानपुर के चर्म उद्योग में 30000 बच्चे, लखनऊ में चिकन के काम में 50000, बच्चे, भदोही के कालीन उद्योग में 1 लाख 25 हजार बच्चे, सहारनपुर के लकड़ी के उद्योग में 10 हजार बच्चे तथा मिर्जापुर में 8 हजार बच्चे एवं वाराणसी के रेशम उद्योग में 5000 बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं । उत्तर प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं पर विकास के प्रभाव से सम्बन्धित एक अध्ययन में पाया गया कि 6-11 वर्ष के आयु समूह में 35.5 प्रतिशत बालिकाएँ तथा 11-18 वर्ष के आयु समूह में 52 प्रतिशत बालिकाएँ विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में संलग्न थीं

बाल श्रमिक बंधुआ मजदूरों से भी संबंधित हैं । आन्ध्र प्रदेश में 21 प्रतिशत, कर्नाटक में 10.3 प्रतिशत, तमिलनाडू में 8.7 प्रतिशत बच्चे बन्धूआ मजदूर हैं जो 16 वर्ष से कम आयु के हैं । उड़ीसा में 8-10 वर्ष की बालिकाओं की बिक्री का व्यवसाय भी प्रकाश आया है जिन्हें घरेलू नौकरानियों के तौर पर लेनदारों द्वारा क्रय किया जाता है । देश के की हिस्सों में बन्धूआ श्रमिक जो 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं अनेक कारणों से अपने बच्चों को अपनी जगह काम पर लगा देते हैं ।

बाल श्रमिकों की कार्यदशा एवं समस्याएँ

इस समस्या के मूल कारणों में गरीबी से इंकार नहीं किया जा सकता है किन्तु इस विषय पर हुए अनेक अनुसंधानों द्वारा यह प्रकाश में आया है की इसके केंद्र में गरीबी कम और उत्पादकों व नियोजकों के निजहत स्वार्थ अधिक है । बाल श्रम सस्ता पड़ता है तथा उनसे किसी प्रकार के विरोध (आंदोलन, धरना, हड़ताल) की आशा कम होती है । इनका शोषण वयस्कों की अपेक्षा सहज है । एक अनुमान के अनुसार यदि किसी कारखाने में सारे श्रमिक बच्चे हों तो लाभ में 25 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है । विभिन्न खदानों में 56 प्रतिशत बाल मजदूर हैं जो 15 वर्ष से कम आयु के हैं । इसका कारण यह है कि उनका कद और वजन उस परिस्थिति के अनुकूल होने से उन्हें गहराई में आसानी से भेजा जा सकता है ।

भारतीय बाल कल्याण परिषद के अनुसार 7-14 वर्ष की आयु के बाल श्रमिकों को 10 -15 घंटे तक कारखानों, दूकानों व अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में काम के बदले मात्र एक – दो रूपए मजदूरी मिलती है । सामजिक सदभाव प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा बाल श्रमिकों पर किये गए सर्वक्षण के अनुसार दिल्ली में लगभग 3 लाख बच्चे प्रतिदिन 12-15 घंटे तक मेहनत करके कठिनाई से दो- तीन रूपए कमाते हैं । यूनिसेफ के अनुसार दिल्ली में चार लाख बच्चे श्रमिकों की श्रेणी में नहीं गिने जाते, किन्तु परिवार की जीविका के उपार्जन में वे हाथ बांटते हैं । हजारों बच्चों को रात में सोने के लिए झोपड़ी भी नसीब नहीं होती । दिल्ली में ऐसे भटकने वाले बच्चों की संख्या लगभग एक लाख है । ऐसे हजारों बच्चे रेलवे स्टेशनों, बस स्टॉप, पार्क, सार्वजनिक भवनों तथा ऐतिहासिक भवनों के खण्डहरों में रात गुजारते हैं । राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार मुम्बई में बाल श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है जिन्हें 12-16 घंटे काम करने पर प्रति माह 50-150 रू. मजदूरी मिलती है । कलकत्ता में 20.5 प्रतिशत ऐसे बाल श्रमिक हैं जिन्हें औसतन 50 से 100 रू. प्रतिमाह मजदूरी मिलती है जबकि 20.6 प्रतिशत को मजदूरी भी नहीं मिलती ।

विभिन्न उद्योगों में काम करने वाले बाल श्रमिक 20 – 25 वर्ष की उम्र में ही किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त हो चुके होते हैं निरंतर काम करने, कुपोषण, पत्थर, धूल, कांच आदि के कणों के फेफड़े में जम जाने, अधिक तापक्रम में घंटों काम करने, खतरनाक रसायनों के सम्पर्क में रहने से तीन – चार वर्षो में ही उन्हें विभिन्न बिमारियां अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं । तपेदिक, अस्थमा, त्वचा रोग, नेत्र रोग, स्नायविक रोग, विकलांगता आदि के कारण 20 वर्ष की आयु तक कई बच्चे अकार्यरत हो जाते हैं ।

बाल श्रमिकों की दशाओं तथा समस्याओं से संबंधित विभिन्न अध्ययनों में कुछ चौंकने वाले तथ्य सामने आए हैं –

  1. बाल श्रम समस्या के मूल में निर्धनता कम वरन मालिकों या नियोजकों का निहित स्वार्थ अधिक है ।
  2. कम वेतन में अधिकाधिक घंटे तक काम लेकर उनका शोषण किया जाता है । उन्हें न तो अवकाश मिलता है और न ही अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त वेतन दिया जाता है ।
  3. स्वास्थ्य की उचित देखभाल की सुविधा न होने से कठिन और विपरीत परिस्थितियों में काम करने के कारण समय से पहले ही बच्चे विभिन्न तरह के गंभीर रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं ।
  4. बाल श्रमिक प्राय: असंगठित और निजी उद्योगों में ही कार्यरत हैं जहाँ वे निषेधात्मक क़ानून की पहुँच से बाहर है अत: उनका श्रम संगठन भी नहीं होता है अत: इन क्षेत्रों में उनका शोषण सरलता से किया जाता है ।

बाल श्रमिक – कानून और नीतियाँ

बाल श्रम को नियंत्रण करने तथा उनके कार्य के घंटों को निश्चित करने के लिए सर्वप्रथम कारखाना अधिनियम 1881 में बनाया गया । 1929 में कार्यरत बच्चों की आयु सीमा के निर्धारण के लिए एक आयोग का गठन किया गया जिसके सुझावों के आधार पर 1933 में बाल श्रम अधिनियम बनाया गया जिसमें 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को श्रम कार्यों में लगाने पर रोक लगाई गई । 1048 के कारखाना अधिनियम में बाल मजदूरों के लिए सुरक्षा प्रदन की गई । भारत सरकार की नीति कारखानों तथा जोखिमपूर्ण कार्यों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चो के रोजगार पर संविधान के उपबंधों के अनुसार प्रतिबंधों के अनुसार प्रतिबंध लगाना हैं तथा कार्यरत बच्चों के कार्य की दशाओं को नियमित करना है । 1986 के बाल मजदूर अधिनियम में इस उद्येश्य को प्राप्त करने की व्यवस्था है । धारा – 18 (1) के अधीन बनाए गए नियमों को 1988 में अधिसूचित किया गया । इस अनुसूची में 6 व्यवसाय हैं जिसमे बच्चों को रोजगार पर लगाना प्रतिबंधित है । इसके अतिरिक्त सरकार ने एक राष्ट्रीय नीति तैयार की है, जिसका उद्देश्य है - जिन क्षेत्रों में बाल मजदूरों की संख्या अधिक है वहाँ उनके कल्याण की विभिन्न आवश्यकता के लिए परियोजनाएँ शुरू करना, जैसे व्यवसायिक प्रशिक्षण, गैर- औपचारिक शिक्षा, पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य की देखभाल आदि । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वयंसेवी संगठनों को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है ।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने दस वर्षो तक तैयारी के बाद 20 नवम्बर, 1989 को बच्चों के अधिकार संबंधी समझौते को स्वीकार किया । इस समझौते का प्रावधान 18 वर्ष से पहले कानूनी वयस्कता पाने वाले देशों के बच्चों को छोड़ कर इस उम्र के शेष सभी बच्चों पर लागू होगा । 20 देशों का समर्थन होने पर यह समझौते अस्तित्व में आएगा । अभी इसमें 7 देश हैं – घाना, वियतनाम, वेटिकन, बेलिज, ग्वाटेमाला, इक्वेडोर और फ़्रांस ।

बच्चों के समस्याओं में विचार करने हेतु एक महत्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय प्रयास उस समय हूआ जब अक्टूबर 1990 में न्यूयार्क में इस विषय पर एक विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 151 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा गरीबी, कुपोषण व भूखमरी के शिकार दुनिया भर के करोड़ों बच्चों की समस्याओं पर विचार - विमर्श किया गया है ।

इतने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के बाद भी बाल श्रमिकों की संख्या तथा समस्या उत्तरोतर बढ़ती जा रही है । श्रम कानूनों की विफलता का सबसे बड़ा कारण यह है की उनका प्रभाव क्षेत्र केवल संगठित क्षेत्रों में ही सीमित है । जबकि अधिसंख्यक बाल श्रमिक (70 प्रतिशत) असंगठित क्षेत्रों से ही संबध हैं जहाँ हमारे कानूनों की पहुँच नहीं होती ।

हमारे संविधान में 14 वर्ष तक नि: शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान हैं । यदि इस कानून को सख्ती से लागू किया जाए तो बाल श्रमिकों की बढ़ती हुई संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है । प्रसिद्ध न्यायवेता डॉ. एल. एम्. सिंघवी का कहना है की बाल श्रमिक समस्या को जो प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, वह नहीं प्रदान की गई । उनकी स्थिति को सुधरने हेतु बनाई जाने वाली योजनाएँ राजनैतिक इच्छा के अभाव में कागज पर ही रह जाती हैं । इनका सुझाव था की इस कार्य के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाना चाहिए जिससे वह प्रभावी रूप से कार्य कर सके ।

बाल श्रमिकों की नियुक्ति पर यद्यपि प्रतिबंधों की मांग की जाती है तथापि ऐसा प्रतिबंध संभव नहीं हो सका है । वर्त्तमान आर्थिक- सामाजिक संरचना में ऐसा प्रतिबंध संभव भी नहीं समझा जाता है, फिर भी इस समस्या को कम करने में शिक्षा का प्रसार उद्योगों के संगठित क्षेत्र को प्रोत्साहन, सार्वजनिक दबाव तथा प्रभावकारी कानूनों को दृढ़ता से लागू करने की आवश्यकता है । तभी हम अधिसंख्यक बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं ।

स्रोत- समाज कल्याण/मई 1999

बाल मजदूरी की समस्या में स्वैछिक संस्थाओं की भूमिका

हमारे समाज में चली आ रही शोषण परम्परा का बाल मजदूरी एक अभिन्न अंग बनता है, यह ऑद्योगिकरण की प्रक्रिया से उभरे मालिक – मजदूर समीकरण का विस्तार है । वैसे तो दुनिया के अन्य देशों में भी यह एक विकट समस्या का रूप ले चुका है । लिकिन भारत में इसका रूप कुछ और ही भयावह है । क्योंकि इसके चलते भावी भारत की तस्वीर सचमुच उस समय धुंधली दिखने लगती है जब हम यहाँ के लगभग पांच- छ: करोड़ बच्चों को मजदूरी के बोझ से दबा रहने को बाध्य पाते हैं । आज जहाँ उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाने की ओर आगे कदम बढ़ाना चाहिए था, वहीं वे खेतों तथा कल – कारखानों में पसीने पोंछते दिखलाई देते हैं ।

बाल मजदूरी की समस्या कहीं- कहीं गरीबी के मूल में दिखती है तो कहीं स्वयं गरीबी ही इसकी जड़ में समायी हुई है । कहीं बाल मजदूरों के माता पिता उनके शोषण के जिम्मेदार लगते हैं तो कहीं उत्पादक व ललक । कहीं समाज सुधारकों की टोलियाँ इस समस्या के निदान को लेकर जूझ रही हैं तो कहीं समाज के विचारक अलग- अलग समूहों में इसके कारणों का पता लगाने के लिए सिर खपा रहे हैं । यहाँ तक की विदेशी सहायता के लोभ में फंसकर कहीं गैर सरकारी संस्थाओं के लोगों की इजारेदारी दिखती है तो कहीं तथाकथित नेता इन बच्चों की मेहनत- मशक्कत की आंच में अपनी राजनीति की रोटी सेंकते रहते है ।

वर्ष 1991 की जनगणना रिपोर्ट आ चुकी है । उसमे बाल मजदूरों का कहीं जिक्र नहीं है । सरकारी प्रवक्ता भी अपनी अक्षमता स्वीकार करते हैं । वैसे राष्ट्रीय श्रम संस्थान के मुताबिक चालू दशक के प्रारंभ में लगभग छ: करोड़ बच्चे मजदूरी कर रहे थे, जबकि उत्तर प्रदेश में उनकी संख्या लगभग 25 प्रतिशत मानी जाती है । सामन्यात: पूर्वाचल के कालीन उद्योग के अतिरिक्त, मुरादाबाद का पीतल उद्योग, खुर्जा का चीनी – मिट्टी, अलीगढ़ का ताला, फिरोजाबाद का कांच (चूड़ी) के उद्योगों उनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक बतलाई गयी है । विचारणीय विषय है की सन 1981 की जनगणना के बाद के वर्षों में राष्ट्रीय श्रम संस्थान द्वारा उत्तर प्रदेश के प्रमुख उद्योगों में बाल मजदूरी में लगे बच्चों की संख्या को लेकर विभिन्न स्तरों से अनेक सम्स्य का स्वरूप, जहाँ-तहाँ उनको शोषण से मुक्ति दिलाने का प्रयास अथवा उन्हें जीवन में पूनर्स्थापित कराने से सम्बन्धित मुद्दों को लेकर जो बाते उभरी हैं उनमे भी सभी लोग एक मत नहीं लगते। सरकार ने भी इस ओर अभी तक कुछ अधिकृत व ठोस प्रयास प्रारंभ नहीं किये हैं । विभिन्न स्वैछिक प्रयासों के अर्न्तगत लोगों ने छिटपूट तरीके से जहाँ तहाँ जो आंकड़े तैयार किये हैं, उनमें एकरूपता नहीं दिखती । फलस्वरूप इस समस्या की सघनता के मापदंड (स्टैंडर्ड), उससे जूझने के प्रतिमान (पैरामीटर्स), तथा इसके निराकरण हेतु कहीं कोई संकेतक (इंडीकेटरस) निर्धारित नहीं किये जा सके । कूल मिलकर इस समस्या के प्रति हमारी नियति पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली यह कमियाँ वास्तूत: चिंतनीय हैं, जिनकी अवहेलना करना घातक होगा। इस प्रकार सरकार, स्वैछिक संगठन, सामाजिक विचारक तथा नियोजकों व प्रशासकों के बीच इस समस्या को लेकर जानकारी में जब एकरूपता में जब एकरूपता का अभाव है तो हम कैसे आशा कर सकते हैं की हम सबकी अपनी एक सही सोच (विचार शैली), राय और उपाय के प्रति कोई उपयुक्त दिशा हो सकेगी ।

इस प्रकार की वैचारिक सोच की कमी तथा कार्यप्रणाली से सम्बन्धित भ्रांतियाँ के चलते “उपवन” जो बुनियादी तौर पर प्रदेश की स्वैछिक संस्थाओं का एक नेटवर्क संगठन है, का दायित्व हो जाता है की वह इस मुद्दे विभिन्न समस्याओं पर सही दृष्टिकोण तैयार करने की लिए सचेष्ट है । इस परिप्रेक्ष्य में इसके द्वारा राज्य स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।

बाल मजदूरी के 4 आयाम

  1. बाल मजदूरी की परिभाषा और उसकी आवधारणा पहला विवादग्रस्त मुद्दा है । सचमुच इस सवाल की अहमियत है की बाल माधुरी की श्रेणी में किन्हें रख जाए । जाहिर है की बच्चे द्वारा किया जाने वाला हर शारीरिक व मानसिक श्रम उस बाल बाल मजदूर नहीं बनाता । किन्तु साथ ही बच्चे द्वारा की जाने वाली कड़ी मेहनत को उसकी स्वभाविक इच्छा का परिणाम बता कर उसे इस श्रेणी से बाहर रखने की वकालत भी नहीं की जा सकती । बाल मजदूर की हिमायती कहते हैं की जो बात मजदूरी की मुखालिफत करते हैं वे बच्चे को नाकारा बनाना चाहते हैं । उनका कहना है की यदि बचपन से ही कोई बच्चा हस्तशिल्प में महारथ हासिल कर ले, या होटलों में कड़ी मेहनत कर विभिन्न कार्यों की तकनीकी जानकारी कर ले अथवा अपने पैरों पर खड़े हो जाए और किसी के सहारे का मोहताज न रहे हो इसमें हर्ज क्या है ।
  2. माना की बच्चों को नाकारा बनाने की शिक्षा दी जानी चाहिए और उन्हें श्रमोन्मूख बनाने का प्रयास आवश्यक करना चाहिए, लेकिन समाज का यह दायित्व है कि वह उन्हें श्रम के बोझ तले दबने से बचाएं । बाल मजदूर कम से कम इस मानवीय व्यवहार के हकदार तो है ही, जो सामान्य मजदूरों की तुलना में अधिक सुविधा दी जानी चाहिए । जबकि यहाँ हमारे स्थिति ठीक इसके विपरीत है की एक ओर उन्हें 12-16 घंटे रोज काम करना पड़ता है । उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती है, यातनाओं को झेलना उनकी मजबूरी बन जाती है आये दिन अखबार की सुर्खियों में खबरें दिखायी देती हैं, की पेड़ों पर उल्टा लटकाकर गर्म सलाखों से बच्चे दागे जाते हैं यह शर्मनाक स्थिति है । बच्चों को मजदूरी करने की नसीहत देने वालों का इन सवालों पर क्या उत्तर होगा, मालूम नहीं लेकिन आज के हमारे लोकतंत्र ने इस सवालों को अनुत्तरित छोड़ रखा हैं । आखिर कोई मालिक बच्चों की जगह बड़ों को काम पर क्यों नहीं रखता, जाहिर है की इसकी एवज में उसे ज्यादा खर्च करना पड़ेगा और काम के घंटे कम करने पड़ेंगे, उसे घाटा होगा । लिहाजा जो है उसे जारी रखने में वे पूरी ताकत लगा देते हैं । यह दलील की “ छोटे बच्चों में वह हुनर है झो हस्तशिल्प की बारीकियों को पूरा करने के लिए आवश्यक है”, महज अपने द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों की ढक रखने की कुटिल चाल है।
  3. इस सिलसिले में दूसरा विवादास्पद मुद्दा गरीबी और बेकारी सी जूडा है । कहा जाता है की जब तक की इस समस्या को जड़ से समाप्त नहीं किया जाता है तब तक इस बाल मजदूरी बरकरार रहेगी । बाल मजदूरी और गरीबी के बीच बताया जाने वाला यह रिश्ता सामान्य तर्क की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता, इसके विपरीत भी तर्क दिया जा सकता है कि, “बाल मजदूरी के चलते ही गरीबी और बेकारी है” । हमारे देश में करीब 5.50 करोड़ बाल मह्दूर हैं लौर इतनी ही संख्या में लगभग बेरोजगार भी हैं । अगर इन बच्चों की जगह नौजवान बेरोजगारों को काम के दिया जाए तो बेरोजगारी खत्म होगी और बच्चे मजदूरी से मुक्त हो सकेंगी । किन्तु पूँजी के जरिये मुनाफा कमाने को ही अपना सर्वोपरि लक्ष्य मानने वाले इस सामाजिक तंत्र में इन नसीहतों का कोई खास महत्व नहीं ।
  4. आज हमारे देश में अर्थव्यवस्था की उदारीकरण का जमाना हैं । इसमें विदेशी पूँजी प्राप्त करना सर्वोच्च प्राथमिकता है । इसी परिप्रेक्ष्य में कहा जाता है की हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों में भारत को पर्याप्त विदेशी पूँजी प्राप्त होती है, इसलिए इन उद्योगों को जिंदा रखना जरूरी होगा । इन उद्योगों में सबसे अधिक बाल मजदूर हैं इसलिए उन पर रोक नहीं लगायी जानी चाहिए । इस तर्क का जवाब तो अभी तक के वे आंकड़े बताते है की हमारे देश में मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार में हस्तशिल्प के निर्यात से मिली पूँजी में विदेशी पूँजी का योगदान नहीं के बराबर रहा है । हमने इस “हॉट मनी” से विदेशी मुद्राभंडार बनाये रखने का काम किया है जो बेवक्त हमारे हाथ से फिसल सकती है। फ़िलहाल, भारत सरकार इस बात की गारंटी ही दे सके कि, “इन उद्योगों में लगे बाल मजदूरों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, इन उद्योगों में लगे बाल मजदूरों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, उन्हें बंधक न बनाया जाए उनके काम के घंटे कम किए जाए, उचित मजदूरी की जाए, उनकी न्यूनतम शिक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी हो” तो काफी राहत मिल सकती हैं ।
  5. यह भी विवादास्पद मुद्दा है की वास्तव में बाल मजदूरी के खिलाफ लगी स्वंयसेवी संस्थाएँ उन्हें बाल मजदूरी से मुक्त कराने के अभियान में लगी हुई हैं । इन संस्थाओं में अधिकतर को विदेशों से पैसे मिलते हैं और ये संस्थाएँ विदेशों में भारत की इस मुद्दे को अपने निहित स्वार्थवश भुनाती रहती हैं ।

बच्चों के लिए प्राणघातक उद्योग

ऐसी औद्योगिक इकाई में जहाँ बच्चे काम कर रहे हैं, पेन्सिल बनाने, स्लेट तैयार, बारूदी माचिस व विस्फोटक पदार्थ निर्मित करने, कांच की चूड़ियाँ, सीसा तथा पत्थर व धातु में चमक लाने वाले काम ऐसे हैं । जिससे इन बच्चों की कोमल उंगलियाँ सड़-गल जाती हैं । इन उद्योगों में कुछ ऐसे द्रव पदार्थ का उपयोग होता है जिनसे बच्चों के शरीर की चमड़ी झुलस जाती है । किन्हीं - किन्हीं उद्योगों में साँस के जरिये जहरीली तथा प्राणशक्ति नाशक गैसें शरीर में जाकर जीवनी शक्ति को कम कर देती हैं । सीमेंट, चूना, कटाई उद्योगों में रेशे से बच्चों में दमा, दाद – खाज उत्पन्न हो जाते हैं, जिनके चलते वे अपने जीवन की शुरूवात में ही कितनी गंभीर बिमारियों से ग्रस्त व त्रस्त हो उठते हैं । इसी भांति ग्रैंडर पर काम कर रहे लाखों मासूम बच्चे अनेक खतरनाक बिमारियों के बायस हो जाते हैं । मुरादाबाद में नियति के मारे इन बच्चों की संख्या बहुत अदिक है । फिरोजाबाद में तो 1400 सेंटीग्रेट के ताप में लगातार काम करने वाले कोमल त्वचा वाले इन बच्चों का शारीर जीवन की शूरूआत में ही झुलस जाता है । इसके अतिरिक्त भट्टा, बीड़ी, ट्रांसपोर्ट, कृषि, खदान तथा सफाई उद्योग में अपनी मजदूरी बेचने वाले इन मासूमम बच्चों को कई बार खतरनाक स्थितियों से गुजरना पड़ता है । सरकार विभाग के स्थानीय अधिकारी व कर्मचारियों से उद्योग मालिकों के तरल तालमेल के तहत न तो किसी औद्योगिक इकाई में स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों का पालन होता है और न ही अपनी जीवन रक्षा के लिए इन बच्चों को मास्क अथवा अन्य उपकरण दिए जाते हैं । यदि वह व्यवस्था की जाए, अधिक आय व बचत करने की लालसा इकाई धारकों को रोके रहती है । वैसे तो बाल मजदूरी का मुद्दा औद्योगिक सभ्यता की प्रगति के साथ जूडा हूआ है । भारत में तो बड़े उद्योगों व कुटीर उद्योगों के फैलाव के साथ बाल मजदूर अब बाकायदा वयस्क श्रमिक की कोटि में आ चुके हैं ।

कानून व नीति का सहारा

सरकार ने इसके लिए कई कानून अपनाये किन्तु ये भी अपने उपस्थिति व्यापक रूप से दर्ज नहीं कर पाए । उन पर कड़ाई से अमल न हो सका । आज जरूरत है की समाज जागरूक होकर इस निंदनीय प्रणाली का सही ढूंढें एवं जैसे bhiभी हो इसका उन्मूलन तो करना ही पड़ेगा । लगभग डेढ़ सदी पहले सन 1848 में काम के घंटे निर्धारित करने हेतु हमारे यहाँ पहला संघर्ष प्रारंभ हूआ था । इसके परिणामस्वरूप पुरूषों को 12 घंटे तथा महिलाओं और बच्चों को 10 घंटे रोज काम करना जरूरी था । बाद में चलकर वयस्क पुरूषों और महिलाओं के काम के घंटों में कमी की गई, किन्तु बच्चों के काम के घंटे अब भी वैसे ही बने हूए है ।

हमारे देश में बाल मजदूरों की दयनीय अवस्था को लेकर पहली बार वर्ष 1881 में कारखाना अधिनियम के अंतर्गत चर्चा देखने को मिलती है । सन 1933 में बाल श्रम आधिनियम (अनुबंध)बनते ही बच्चे को गिरवी/बंधुवा रखा जाना अवैध घोषित किया गया था । वर्ष 1935 में इन्हें रोजगार में लगाए जाने पर रोक लगायी गयी । तदनूपरांत 1952 में खदानों के अंदर काम करने के लिए इन बच्चों को लगाया जाना प्रतिबंधित कर दिया गया । ऐसे ही नियम अन्य खतरनाक उद्योगों के लिए भी बनाये गये । खेती बागवानी से संबंधित उद्योगों के लिए भी इनकी आयु सीमा घटायी गयी । वर्ष 1938 में बाल रोजगार अधिनियम भी बनाये गये । देश, काल या परिस्थिति के अनुसार नियम व कानूनों में संशोधन एक स्वभाविक प्रक्रिया बन जाती है, सो इन कानूनों में भी संशोधन हुए । वर्ष 1948 में फैक्ट्री एक्ट भारतीय श्रम की इतिहास की एक उल्लेखनीय घटना है । इसी से प्रेरित होकर 1938 के अधिनियम को वर्ष 1985 में पुन: संशोधित किया गया जिसके अनुसार उसका उल्लंघन करने वाली दंड के प्रावधान में वृद्धि कर दी गयी । इस कानून ने 1986 के अंत में बाल श्रमिक (संशोधन) निषेध व विनियमन अधिनियम का रूप लिया और फिर कुछ संशोधन के साथ बाल श्रम से संबंधित राष्ट्रीय नीति घोषित कर दी गयी, जिसके चलते पहली बार सरकार ने यह माना कि बाल मजदूरों के लिए शिक्षा, मनोरंजन और बाल श्रमिकों की निरंतर होती जा रही वृद्धि के लिए निम्न कारणों को उत्तरदायी माना जा सकता है -

  • बाल श्रम की संवृति मूलस्वरूप में गरीबी के साथ जुड़ी हुई है । तमाम विकास कार्यों के बावजूद हमारी करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा जनता आज भी गरीबी की रेखा से नीचे जीने को मजबूर है । निर्धनता के कारण ऐसे परिवार अपने बच्चों से भी धनोपार्जन करवाने को मजबूर होते हैं, क्योंकि उनके लिए रोटी का प्रश्न बच्चों के विकास या खेल कूद से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ।
  • समाज में वयस्क के लिए सामान्य स्तर पर भी पारिवारिक जीवन – यापन हेतु पर्याप्त रोजगार की कमी बल श्रम को बढ़ावा देती है । यदि सभी वयस्क पुरूष एवं महिला कामगारों को न्यूनतम निर्धारित मजदूरी के आधार पर आय हो तो कोई भी संवदनशील माता - पिता अपने मासूम बच्चों को कठोर श्रम करने न भेजकर विद्यालय भेजना पसंद करेंगे ।
  • बाल श्रम निरोधक कानूनों को पारित करवाने में सरकारें जितना उत्साह दिखाती हैं, उतना ही वे दृढ़ता पूर्वक उनका पालन करवाने में असफल रही हैं । फलत: उद्योगों एवं व्यवसायों के संचालक बच्चों को कम मजदूरी देकर अधिक काम लेने तथा बोनस आदि से वंचित रख कर अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से बिना किसी भय के बच्चों को काम पर लगा देते हैं ।
  • कामगारों – परिवारों की ‘जितनी हाथ – उतने काम’ की परम्परागत मनोवृति ने भी कुछ हद तक बाल श्रम को बढ़ावा दिया है ।

समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं हैं जहाँ बच्चों से काम नहीं लिया जाता हो और न ही कोई ऐसा कोई धंधा है, जहाँ मालिक बच्चों का शोषण न करता हो । आज भयंकर महंगाई के जमाने में भी इन्हें इतनी कम मजदूरी मिलती हैं की इनके लिए ठीक तरह से जीवन-यापन भी कठिन होता है ।

बाल श्रमिकों से जोखिमपूर्ण एवं आपराधिक कार्य कराया जाना भी उनके शोषण का एक और बदतर पक्ष हैं । शिवकाशी का आतिशबाजी उद्योग, दिल्ली का इस्पात-बर्तन उद्योग, फिरोजाबाद का कांच उद्योग, मंदसौर का स्लेट उद्योग आदि बच्चों के क्रूर शोषण के जीते – जागते उदाहरण हैं । यहाँ एक तो असुरक्षित वातावरण होता है और दूसरे काम की प्रकृति के अनुरूप जरूरी उपकरण या सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती । ऐसे वातावरण में काम करने के बावजूद बाल श्रमिकों को मालिकों एवं ठेकेदारों के अमानवीय अत्याचारों जैसे- मारपीट, रात पालियों में काम आदि का शिकार होना पड़ता है । बच्चों से शराब की भट्टियों पर काम कराना, भीख मांगना जैसे अनैतिक एवं आपराधिक कार्य करवाया जाना भी तो आम बात हो गई है । यदि बीमारी अथवा ऐसे ही किसी कारणवश बाल श्रमिक दो चार दिन काम पर नहीं आए तो उनकी मजदूरी भी काट ली जाती है और निकाल देने का भय भी बताया जाता है बीमार अथवा दुर्घटना होने पर उपचार तथा मुआवजा देना तो दूर, उन्हें काम से ही निकाल दिया जाता है । इतने शोषण के बाद भी मालिक ऐसे पेश आता है, मानो वह बच्चों को काम पर लगा कर उन पर कोई एहसान कर रहा है । आर्थिक अभाव और कठोर परिश्रम के कारण लगभग एक- तिहाई बाल मजदूर कुपोषण का शिकार हो जाते है उनको गरीबी के कारण मेहनत के बाद भी समुचित मात्रा में पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है । फलत: कालान्तर में उनका शारीरिक और मानसिक विकास आवरूध हो जाता है । ऐसे में वे अनेक बिमारियों से ग्रसित हो जाते हैं । धुल, धूँआ, धुप तथा शोर आदि के कारण बाल श्रमिक स्थाई तौर पर अस्वस्थ रहने लगते हैं । जैसे – वर्तन उद्योग, माचिस उद्योग तथा खान उद्योग आदि में काम करने वाले बाल श्रमिकों को आँखों, फेफड़ों तथा चर्म आदि से संबंधित रोगों का सामना करना पड़ता है ।

ऐसा नहीं है कि हमारे संविधान, कानूनों तथा सरकारी नियमों में बाल श्रमिकों को शोषण एवं उन पर किए जा रहे अत्याचारों को रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं है । हकीकत तो यह है की इस विषय में समय - समय पर अनेक कानून बनाए गए हैं। भारतीय संविधान, राज्य के नीति निदेशक तत्व और मौलिक अधिकार दोनों में यह निर्देश दिया गया है की राज्य अपनी नीतियों को इस प्रकार लक्षित करे कि कामगारों, आदमी व औरतों के स्वास्थ्य और बच्चों की उम्र पर कोई आंच न आए । साथ ही आर्थिक परिस्थितियों से मजबूर होकर नागरिकों को उनकी आयु या शक्ति के प्रतिकूल कार्यों में न लगना पड़े तथा विशेषकर बच्चों को स्वस्थ तरीकों से स्वतंत्रता और सम्मान के वातावरण में पलने का मौका मिले ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद – 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से कारखानों, फैक्ट्रियों व खानों में जोखिम भरे कार्य कराना अपराध है बाल कल्याण के लिए बनाए गए कानून कुछ इस प्रकार हैं – बाल अधिनियम, 1933; बाल रोजगार अधिनियम, 1938; भारतीय कारखाना अधिनियम, 1948; औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947; बागान श्रम अधिनियम, 1951’ खान अधिनियम, 1952; मोटर यातायात अधिनियम, 1961 दुकान एवं वाणिज्य प्रतिष्ठान आधिनियम, बाल श्रम गिरवीकरण अधिनियम तथा बाल श्रमिक प्रतिबंध एवं नियमन अधिनियम, 1986 । ये अधिनियम बाल कल्याण के लिए बाल मजदूरों को सेवाओं, कार्यदशाओं, कार्य के घंटे, मजदूरी दर आदि को नियमित करते हैं । 1986 का बाल श्रमिक कानून अधिक प्रभावी कानून है । इसके अंतर्गत बाल मजदूरों का शोषण करने वालों के विरूद्ध कठोर दंड की व्यवस्था है इस कानून के अनुसार बीड़ी, कालीन, सीमेंट, माचिस, कपड़ा, बुनाई और रंगाई, उनकी सफाई तथा भवन निर्माण आदि उद्योगों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को श्रम पर नहीं लागाया जा सकता । बच्चों के सब प्रकार के विकास के लिए तथा उनकी स्थिति सुधारने के लिए अंतराष्ट्रीय श्रम आयोग ने अनेक नियम बनाए वहीं संयूक्त राष्ट्र संघ ने बच्चों के अधिकार, पोषण, स्वास्थ्य तथा बौद्धिक विकास के लिए 1979 को अंतराष्ट्रीय बाल वर्ष के रूप में घोषित किया था । उसी के प्रभाव से आज भी देश में बच्चों के उत्थान के लिए आंगनबाड़ी जैसी अच्छी संस्थाएँ संचालित की जा रही है ।

वर्तमान परिस्थिति के रहते बाल श्रम का देश में से पूर्णतया उन्मूलन न तो संभव है और न वांछनीय ही । संभव इसलिए नहीं है की इनकी मजदूरी ही लाखों गरीब परिवारों की आय का मुख्य जरिया है । अत: व्यक्ति जब तक निर्धन रहने को मजूबर है, तब तक वह इस विषय में किसी भी कार्यवाही अथवा नियम – कानून को नहीं मानेगा । वांछनीय इसलिए नहीं कि यदि शासन उपलब्ध कानूनों एवं नियमों कड़ाई से पालन कर यह कार्य बंद करवा देता है तो बाल अपराधों की संख्या में वृद्धि होगी । अत: बाल श्रमिकों की सुरक्षा एवं कल्याण का विचार करते हुए तदनुकूल कानून बनाना ही उपयुक्त होगा । इस दृष्टि से निम्न कुछ सुझाव विचारनार्थ प्रस्तुत है –

  • समाज में व्याप्त अंतर्वर्गीय विषमता को जो गरीबी का मुख्य कारण है – समाप्त करने के लिए विकेन्द्रित ओद्योगिक एवं उसके लिए आधारभूत विकास कार्यों को अधिकाधिक प्रश्रय दिया जाए ।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार कर बाल श्रमिकों में शिक्षा के समुचित विकास हेतु विद्यालय में उनके लिए अलग से सुबह – शाम कक्षाएं चलाई जाएँ अथवा उनके कार्य – स्थलों के क्षेत्रों में अलग से विद्यालय खोले जाएँ ।
  • विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा, पौष्टिक आहार, वस्त्र आदि के साथ-साथ समुचित प्रोत्साहित राशि भी दी जाए ताकि गरीब परिवारों के लोग बच्चों को विद्यालय में भेजने को स्वयं उत्सुक हों ।
  • बाल श्रमिकों से नशीली वस्तुयें तथा बीड़ी – सिगरेट, गांजा , भांग, शराब इत्यादी नहीं मंगवाई जाए । आवश्यकता तो यह है की बाल श्रमिकों से सबन्ध उद्योगों एवं कारखानों में प्रौढ़ श्रमिकों द्वारा भी ऐसा कोई व्यसन करने पर पाबन्दी लगा दी जाए, ताकि उन्हें देख कर बच्चे भी वैसा करना नहीं सीख लें ।
  • बाल श्रमिकों से सबंध कानूनों को लागू करने वाले सरकारी तत्रं को चुस्त बनाया जाए तथा न्यूनतम मजदूरी जैसे कानून को कड़ाई से लागू करवाया जाए । निस्संदेह यदि मालिकों को वयस्कों को ही काम पर रखेंगे ।
  • संचार माध्यमों, संगेष्टियों पोस्टर प्रदर्शनियों के माध्यम से बाल श्रम से सम्बन्ध कानूनों का प्रचार- प्रसार किया जाना इस समस्या के समाधान में काफी हद तक उपयोगी होगा ।

इसलिए आज की दुनिया और इसके रहनुमा, जो एक बेहतर सुखद और शांत भविष्य की कल्पना करते हैं, उन सब की यह नैतिक जिम्मेदारी है की वे किसी एक को इसके लिए जिम्मेदार न माने । अगर वे सब महसूस करें की ये बच्चे उनके पास भविष्य की धरोहर है, तो संदेह नहीं की ये बच्चे उन तमाम औजारों के साथ आगे बढ़ेंगे, जो उनके समुचित और समग्र विकास के लिए अनिवार्य है ।

स्रोत – समाज कल्याण/ मई, 1999

उपाय

समाज क भावी तबके को इस विभीषिका से छूटकारा दिलाने वाले उपायों में सामाजिक ढांचे व आर्थिक विकास की संरचना में बुनियादी बदलाहट जरूरी लगती है । इसके लिए संबंधित कानून कड़ाई लगे । सम्पूर्ण बचपन के लिए शिक्षा अनीवार्य कर दी जाए । गरीबी दूर करने वाले सभी व्यवहारिक उपाय उपयोग में लाए जाए । इन्हीं बातों के परिप्रेक्ष्य में बचपन की आँखों में चमक लाने डी के उद्देश्य से आज की दुनियाँ के एक “अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन” ने वर्ष 1919 में ऐलान किया की बाल मजदूरी नाम की चीज खत्म होनी चाहिए ।

कार्यक्रम व उपाय चाहे आई.एल.ओ. के हों या यूनिसेफ के अथवा योजनाएँ भारत सरकार की हो या राज्य सरकार की, देखने में यही आ रहा है की इन सब की धज्जियाँ उड़ाने वाले मजदूर बच्चों के दलालों की जमात बढ़ती ही जा रही है यहाँ तक कि आज हमारे बीच समक का एक ऐसा वर्ग है जो अपनी सुविधा के लिहाज से ही जायज ठहराता है । कभी- कभी ऐसा लगता है कि हमारी सरकार भी इन सबके आगे घुटने टेक चुकी है । यदि ऐसा न होता तो लगभग तीन दशकों से चली आ रही इस समस्या का उल्लेख अंतिम जनगणना रिपोर्ट (1991) में बाल मजदूरों का अध्याय नदारद न होता । आज इन हालातों में हमें यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या मजदूर बच्चों की सही संख्या, उनकी जीवन दशा और भावी दिशा का लेखा- जोखा सामने रखने की जरूरत नहीं रही ? यद्यपी इस समस्या की बढ़ती हुई विकराल स्थिति ने वर्ष 1994 की 15 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री ने बाध्य होकर इस मुद्दे पर अपना लगभग तीन मिनट का वक्तव्य दिया और रूपए 850 करोड़ की योजना बनाने की बात भी कही । किन्तु आज आई. एल. ओ. यूनिसेफ और भारत सरकार द्वारा करोड़ों रूपए खर्च किए जाने के बाद भी अब तक केवल पांच से दस प्रतिशत बच्चों को पुनर्वास की सुविधा दी जा सकी । समस्या यह है की उन्हें मुक्त कराकर कहाँ ले जाए । इस कमी के चलते विमुक्त मजदूर बच्चे या तो सड़क पर आ जाते हैं अथवा कहीं दूसरी जगह फिर पुरानी शर्तों पर काम करने के अलावा उनके ओआस कोई दूसरा चारा नहीं रहता है । इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के जरिये कुछ बाल मजदूरों को तो शोषण से मुक्त कराया जा सकता है लेकिन इस दिशा में किसी सार्थक परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती । बल्कि इस प्रयासों के द्वारा जितने बालकों तक पहुंचा जाता है, उसी दौरान उनसे अधिक बच्चे बाजार में मजदूरी करने पहुँच जाते है अत: इस समस्या के वास्तविक समाधान के लिए समष्टिगत (मैक्रोलेब्ल) प्रयास करने होंगे । दरअसल, इस समय उनकी तत्कालिक बाधाओं को लेकर सोंच विचार हो रहे हैं, लेकिन उनकी रोकथाम पर कुछ भी प्रयास नहीं दिखता ।

अत: बाल मजदूरों को मुक्ति दिलाने, इस समस्या से छूटकारा पाने या समाधान की दिशा में सोचना जरूरी हो रहा है । मोटे तौर पर इसके उन्मूलन के लिए की प्रमुख बिंदूओं पर गौर किया जाना चाहिए । पहला बिन्दु इसके संदर्भ में राष्ट्र जागरण का होगा । सरकारी हो या स्वैच्छिक संगठन, सामान्य लोग हों या मीडिया से जुड़े लोग जब तक हर कोई यह महसूस नहीं करता की यह एक सामाजिक बुराई है तब तक इस मामले में कुछ होने वाला नहीं । दुसरे शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रयास जरूरी है । शिक्षित अथवा साक्षर करने से अलग हटकर ऐसी शैक्षणिक प्रणाली के बारे में सोचना होगा जो ऐसे बच्चों के व्यवहार वातावरण और आर्थिक स्थिति से जुड़े हुए हों । तीसरे पायदान पर कानून की दिशा में सरकार को सार्थक प्रयास करने ही होगें । कानूनों को लागू करने में कड़ाई बरतना जरूरी है किन्तु उसे ईमानदारी से दण्डोन्मूख के बजाय निंयत्रणन्मूख रखना पड़ेगा । वस्तुत: आज इन कानूनों के पालन हेतु एक वातावरण भी बनाने की आवश्यकता है ।

चिकित्सा की सुविधा होनी चाहिए । साथ ही उनके लिए उपहार की व्यवस्था भी जरूरी मानी गयी । किन्तु औद्योगिक इकाइयाँ ऐसी जगह हैं । कि यहाँ कानून व नियमों की अवहेलना का सिलसिला बंद होता नजर नहीं आता । उनमें बहुत बड़ी संख्या में बाल मजदूर काम करते रहते हैं, उनकी वास्तविक संख्या का पता ही नहीं लग पाता । जबकि वास्तविक यह है की प्रशासनिक तंत्र के साथ इकाई धारकों का तरल तालमेल और साठ- गांठ के तरह इनमें बाल मजदूर जाँच के समय छिपा दिये जाते हैं ।

“यूनिसेफ’ की रिपोर्ट के अनुसार वैसे तो दुनिया भर में लगभग 40 करोड़ बाल मजदूर हैं किन्तु अन्य देशों से अलग हमारे यहाँ करोड़ों लगाकर बड़े व आकर्षक विज्ञापनों के जरिये इस शर्मनाक समस्या के करने वाली बात बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर है । घातक, नुकसान पहूँचाने वाले खतरनाक उद्योगों से बाल मजदूरी प्रथा समाप्त करने के उद्देश्य से हाल ही में (10 दिसम्बर,1996) भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में ऐसे बाल मजदूर 4.40 करोड़ से लेकर 10.0 करोड़ तक माने गए हैं । न्यायालय के मंशा है कि इन बच्चों को 21 वीं सदी के अंत तक मुक्ति सुख कि साँस मिल सकेगी । किन्तु यह न्यायसंगत, अति मानवीय चाह पूरी होती नजर नहीं आती । वैसे तो यकीनी तौर पर जानलेवा उद्योगों में काम कर रहे इन बचपन के लिए उम्मीद के सपने जागे हैं । “उपवन” भी बचपन बचाने के इस संकल्प का स्वागत करता है । व्याहारिक समाधान की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी इस अदालत ने कुछ उपाय भी सुझाये हैं किन्तु आज के इस माहौल में जहाँ घोटालों व घपलों के रोज के सिलसिले जारी हैं, नौकरशाही मनमाने तौर- तरीकों से काम कर रही है, और इन समस्याओं से जूझने वाले सक्षम तथा संस्थाएँ और विभाग पैसे कमाने की उपजाऊ जमीन बन गये हों वहाँ संकल्प, सुझाव, कानून और उपाय के कारगार होने में शक पैदा होना स्वाभाविक है ।

बाल मजदूर और स्वैच्छिक संगठन

हाल के वर्षों में बाल मजदूरों को लेकर नेताओं, ट्रेड यूनियनों, अध्ययनकर्ताओं, स्वैच्छिक संगठनों और मीडिया की बीच अच्छी खासी रुचि उत्पन्न हुई है । भारत में स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका इस क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण है । वैसे तो इसे लेकर ये संगठन की स्तरों पर सक्रिय हैं । इस समय देश में लगभग 124 स्वैच्छिक संगठन इस मुद्दे को लेकर क्षेत्र में सक्रिय हैं । इनमें से देश के पांच प्रमुख – संगठन इस क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं । लेकिन इन संगठनों को सरकारी अथवा अंतराष्ट्रीय सगंठनों से प्राप्त अनुदान राशि पर निर्भर रहना पड़ता है लगाए गए एक अनुमान के अनुसार इन 124 संगठनों का कूल बजट रूपए 23 करोड़, 26 लाख है । जिन कार्य योजनाओं में सक्रिय हैं उनके माध्यम से 31,596 परिवारों प्रति परिवार रू. 736 लाख के एक लाख सात हजार दो सौ छब्बीस बाल मजदूरों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है । मोटे तौर पर देखा जाय तो प्रति बाल मजदूर रूपए 2,15,925 खर्च हो जाने बावजूद भी उन्हें अपने जीवन कोई दिशा नहीं मिल पायी । मजे की बात है की इन संगठनों के कूल प्रोजेक्ट की संख्या 163 है, जिनके द्वारा 748 प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जा चुके हैं और 30,318 प्रशिक्षुओं (ओप्रेटिसेज) को भी प्रशिक्षित भी किया गया है । उल्लेखनीय है की इन संगठनों की पहुँच मात्र 5 सौ बालकों तक ही है और 2 प्रतिशत की पहुँच एक हजार से पांच हजार बच्चों तक है । इस प्रकार कूल मिलाकर ये संगठन देश के कूल बाल मजदूरों के एक प्रतिशत से भी कम आबादी तक पहुँच पाये हैं । यहीं नहीं, इन संगठनों में एक महत्वपूर्ण कमी यह भी है की इनकी गतिविधियाँ मात्र बड़े-बड़े शहरों तक ही सीमित हैं ।

इन्हीं संस्थाओं में कुछ सक्रिय और संवेदनशील संगठन हैं जिन्हें भारत सरकार के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय संगठनों से भी वित्तीय पोषण प्राप्त होता है । कुछ संस्थायें बच्चों को सीधे वित्त पोषित करती रहती हैं । इस बात की जरूरत है की स्थानीय स्वैच्छिक व अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं सरकार के बीच आपसी समझदारी का रिश्ता कायम हो ।

वस्तुतः हमारे सामने आज का प्रमुख मुद्दा समाज की बनी – बनायी सोंच से मुक्ति दिलाने का है । यदि हम देश के 5-6 करोड़ बच्चों की आँखों की चमक देखना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले सुविधा परस्ती का दामन छोड़ना होगा । ऐसे में पूँजी के द्वारा केवल मुनाफाखोरी की ललक वाले तंत्र की कैद से बचपन को आजाद कराने का ख्याल आज के हमारे लोकतंत्र की प्राथमिकताओं के सबसे ऊपरी पायदान पर होना चाहिए ।

स्रोत – उपवन

बाल मजदूरी : समाज का कलंक

भारत की आधे से ज्यादा आबादी पसीना पोंछते हुए बाल मजदूरों की है । बालक कल के भविष्य हैं । उन्हें पनपने के लिए, खिलने के लिए सही अवसर देना होगा । बाल मजदूरों को इस अपराध से रोकना होगा । उनका शिक्षा की ओर झुकाव कराना होगा ।

बाल मजदूरी के मूल में हमारे समाज की आर्थिक तंगी से जितनी जल्दी हम निपटेंगे उतनी ही जल्दी इस गलत प्रथा का अंत होगा । पेट की ज्वाला उन्हें कल कारख़ानों में झोंकने पर लाचार करती है इसलिए व बाल मजदूर बन जाते हैं ।

यह भी कडुवा सच है की बहूत से बच्चे पढ़ना चाहते हैं । पर स्कूल कहाँ हैं ? कितने हैं ? कहने को तो चारों इसके विरोध के बोल फूट रहे हैं । पर जो हिसाब में जनसंख्या वृद्धि हो रही है उस हिसाब में स्कूलों की स्थापना नहीं की जा रही है और जहाँ स्कूल हैं भी वहाँ पढ़ने वाले गायब ।

बच्चों को रोटी और कपड़ा जितना जरूरी हैं । उतना ही उनके लिए स्कूल भी जरूरी है खासकर उन जगह में तो स्कूल की जरूरत और ज्यादा है जहाँ बच्चों को शिक्षा नहीं कारखानें अपनी ओर खींचते है । अभिभावकों में जागृति लानी होगी । बच्चों को उनकी रुचि के अमूसर अवसर देना होगा । विनोवा भावे ने कहा था की वही शिक्षा उत्तम है जो जीवनपयोगी हो । अत: बालकों को यह आवश्यक नहीं की ऊँची शिक्षा की जाए । बल्कि उनके खानदानी पेशे की ही शिक्षा सही रूप से दी जाए जिससे वे अपनी छिपी प्रतिभावों का सदुपयोग कर सकेंगे ।

हम प्राथमिक स्कूल की बातें उठाते हैं । प्राथमिक स्कूल अथार्त पहली से पाँचवीं कक्षा तक के लिए स्कूल । जनसंख्या की बढ़ोतरी के अनुसार हरेक वर्ष हमें जितने स्कूल चाहिए उतने हैं नहीं । सरकार कहे कुछ भी पर यह सच है की आवश्यक संख्या में स्कूल रखने से ही उसकी पूर्ति तो नहीं हो जाती । सरकार को चाहिए ऐसे क्षेत्र में जहाँ अशिक्षा, भूखमरी का बोलबाला है । बच्चों को भरपेट खाना और पढ़ाई की सुविधा व्यावाहारिक रूप में दें । तभी अपने देश से बाल मजदूरों की संख्या खत्म होगी ।

भारत सरकार के श्रम मंत्रालय की ओर से दूरदर्शन पर भी बाल मजदूरी प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रचार प्रसार किया जा रहा है फिर भी बाल मजदूरों की संख्या में लगातार वृद्धि ही होती जा रही है ।

साक्षरता – बच्चों में साक्षरता की कमी उन्हें मजदूर बनाती है । सरकार की कोशिशें के बाद भी सभी बच्चों को साक्षरता के दायरे में नहीं लाया जा सका है ।

सेहत – इससे बाल मजदूरों की सेहत ओर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है । वे पनपने से पहले ही मुरझा रहे हैं । कल कारखानों में धुओं से उनके फेफड़े बेकार हो रहे हैं उम्र से पहले वह ढल जाते हैं ।

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सही फैसला दिया है । पर क्या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बाल मजदूरों की संख्या में कमी ला सका है इमारतें बाल मजदूरों को बुला रहे हैं पेट की ज्वाला उन्हें विवश कर रही है । अत: बाल मजदूरी की प्रथा का अंत करना आवश्यक ही नहीं जरूरी भी है ।

स्रोत – जागो और जगाओ

अशिक्षा और बाल मजदूर

धारा – 45 में कहा गया है संविधान लागू होने के वर्षों के भीतर, राज्य 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगा ।’ निश्चय ही एक ऐसा श्रेष्ट आदर्श है जिस दिशा में राज्य को आगे बढ़ना चाहिए है । संविधान निर्माताओं को इसकी उम्मीद थी कि सातवें दशक के आरम्भिक वर्षों में राज्य के लिए संभव होगा कि वह सभी बच्चों के लिए स्कूलों की व्यवस्था कर दे । इस दशक के अंत तक कोई भी बच्चा ऐसा नहीं रह जायेगा जिसको शिक्षा न मिली हो । लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसको मूलाधिकारों की कोटि में नहीं रखा था । यदि ऐसा होता तो वे राज्य को विवश करते । संविधान निर्माताओं को इस बात का अंदाजा लगाना संभव नहीं था कि राज्यों का विकास किस गति से होगा ।

गाँव

शहर

कुल

शिक्षा स्तर

बालक

बालिका

कुल

बालक

बालिका

कुल

बालक

बालिका

कुल

1

निरक्षर

79.75

88.93

82.90

63.47

77.25

66.98

78.13

88.14

81.49

2

साक्षर

10.28

5.58

8.67

15.31

10.92

14.19

10.78

5.94

9.16

बिना साक्षर

3

प्राथमिक शिक्षा

8.58

4.81

7.28

17.28

9.99

15.43

9.44

5.16

8.01

4

माध्यम शिक्षा

1.28

0.65

1.06

3.48

1.64

3.01

1.50

0.72

1.23

5

मैट्रिक/ सेकेंडरी

0.10

0.03

0.08

0.43

0.19

0.37

0.17

0.04

0.10

6

इंटर/ हायर सैकेंडरी

0.01

-

0.01

0.43

0.01

0.02

0.01

-

0.01

7

प्री. यूनिवर्सिटी

-

-

-

-

-

-

-

-

-

योग

100.00

100.00

100.00

100.00

100.00

100.00

100.00

100.00

100.00

संख्या (दस लाख में )

8.70

3.50

10.20

0.74

0.25

0.99

7.44

3.76

11.20

स्रोत : रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया, 1981,सेंसस

यदि राज्य शिक्षिका को 300, नान मैट्रिक शिक्षक को 250 रू. प्रदान किये जा रहे हैं । परंतु इन प्रयासों के बावजूद 6 से 14 वर्ष के आयु समूह के भारत में 16 करोड़ बच्चे निरक्षर हैं जो भारत की कूल निरक्षरता (48 प्रतिशत) का 40 प्रतिशत है इनमें से लगभग 50 प्रतिशत ( 6.50 करोड़ ) बच्चे पहली कक्षा से पाँचवी कक्षा तक पहुँचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं । जो बच्चे पाँचवी कक्षा पूरी करते हैं उनका प्रतिशत 38 हैं, इसकी तुलना में चीन में 70, श्रीलंका में 91, सिंगापूर में 90 प्रतिशत है । यह बीमारी के देश के 4 हिंदी भाषी क्षेत्रों में विशेष है जिसे प्रो. आशीष बोस ने ‘बीमारू क्षेत्र’ का नाम दिया है ये राज्य हैं – बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश । जब 1 से 5वीं कक्षाओं में लड़कियों के दाखिला दर 1991-92 में पूरे देश में 88 प्रतिशत थी, तो इस बीमारू क्षेत्र में यह 50 प्रतिशत या इन बीमार क्षेत्र के गाँवों में साक्षरता की स्थिती और भी ख़राब है । जब पूरे देश की ग्रामीण जनसंख्या का 38 प्रतिशत बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में मिलता है, यहाँ के गांवों में महिला साक्षरता दर 10 प्रतिशत में भी कम है । वहीं यूनिसेफ के बिहार प्रदेश के प्रतिनिधि ‘गोपीनाथ टी. मेनन’ ने दिसम्बर 1997 में बताया कि अकेले बिहार में एक करोड़ बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं और इनमें से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य कर देता तो उसे प्राथमिक या संभवत: मैट्रिक स्तर तक शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य करने के लिए कानून बनाने पड़ते जो निश्चित रूप से राज्यों की क्षमता से परे है । शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े राज्य आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, कश्मीर, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बंगाल में 4365 प्राथमिक बाल शिक्षा केन्द्रों के मध्यम से जो 180 स्वैच्छिक संगठन द्वारा संचालित 1 लाख से ऊपर बच्चों में शिक्षा का प्रसार दिया किया जा रहा है । इसका मुख्य उद्देश्य है ‘ड्राप आउट’ दर को कम करना । प्रत्येक इकाई को प्रति वर्ष लगभग 8 हजार रूपए दिए जाते हैं, जहाँ 1987-88 में 4365 इ.सी.ई. केंद्र को 246 लाख रूपयों की आर्थिक सहायता दी जाती थी वो 1995 – 96 में बढ़ कर 353 लाख रूपया हो गई । इसमें प्रतिमाह प्रति केंद्र 665 रू. मैट्रिकुलेट अधिकतर बच्चे बाल श्रमिक बनने की नियति के शिकार हैं । दुसरे इनका विचार था कि समाज के 90 प्रतिशत लोग बच्चों की स्थिति के बारे में नहीं जानते हैं । तीसरे यहाँ हर रोज लगभग 9000 बच्चे अत्यंत छोटे - छोटे कारणों से मौत के मुंह में जाने को अभिशप्त हैं, चौथे लगभग 92 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, पांचवें बच्चों को महज चंद किताबें पढ़ा देने से उनका सही बौद्धिक विकास नहीं होगा वे उन्हें रोजगारोन्मूखी शिक्षा देनी होगी, छठे बच्चों के सही विकास के लिए हमें उनके ऊपर अपनी महत्वकांक्षा और लक्ष्यों को नहीं थोपना होगा । समस्या की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. यशपाल ने तो यहाँ तक सुझाव दे डाला की विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को 1 वर्ष के लिए बंद कर दिया जाए, अध्यापकों और विद्यार्थियों को साक्षरता अभियान में लगा दिया जाना चाहिए ।

इसका यह अर्थ नहीं की हमारी कोई उपलब्धि नहीं है । स्वतंत्रता दिवस से लेकर आज की तिथि तक हमने कुछ कार्य अवश्य किए हैं, किन्तु वे सीमित हैं, अभी हमें बहुत कुछ करण है जहाँ कक्षा 1 से 5 तक में 6-11 वर्ष के आयु वाले विद्यार्थियों की संख्या 1950- 51 में 192 लाख थी, वो 1987 -88 में 930 लाख, तथा कक्षा 6 से 8 तक में 11-14 वर्ष के आयु वाले विद्यार्थियों की संख्या 1950 -51 में 31 लाख थी, वो 1987-88 में 300 लाख हो गई, साथ ही साथ प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापकों की संख्या 1950-51 में 5 लाख 38 हजार की जगह 1987- 88 में 16 लाख 17 हजार हो गई है, तथा 1991-92 में 16 लाख 37 हजार हो गई मिडिल स्कूलों में अध्यापकों की संख्या 86 हजार की जगह 1987-88 में 10 लाख 15 हजार हो गई, इसके अतिरिक्त 15 राज्यों एवं 6 केंद्र शासित प्रदेशों में निम्न माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 10) तक की शिक्षा नि:शुल्क है । इसके अलावा मणिपुर, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में लड़कियों के लिए दूसरी कक्षा तक नि:शुल्क शिक्षा है जबकि अनूसूचित जातियों और जनजातियों के बच्चों के लिये सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में इस स्तर तक शिक्षा नि:शुल्क है । इसके अतिरिक्त हमारे यहाँ प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं का नामांकन 1951 में 1 करोड़ 92 लाख से बढ़ कर 1991 में 9 करोड़ 91 लाख हो गया । जहाँ 1950 -51 में सकल राष्ट्रिया उत्पादन का 1.2 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय किया गया, अब 4 प्रतिशत हो गया है । किन्तु यह अन्य देशों की तुलना में अब भी कम क्योंकि वार्षिक बजट का 20 प्रतिशत अमेरिका एवं जापान में, 17 प्रतिशत कनाडा में, 14 प्रतिशत इंग्लैंड में, 4 प्रतिशत श्रीलंका में, 10 प्रतिशत जर्मनी में शिक्षा पर व्यय किया जाता है । आंकड़े बताते हैं की शिक्षकों की संख्या में वृद्धि हुई व्यय किया जाता है । किन्तु शिक्षक एवं शिक्षार्थी अनुपात में कमी आई है जहाँ शिक्षक - शिक्षार्थी अनुपात 1950-51 में 1:36 था, वो 1990 - 95 में बिगड़कर 1:61 हो गई हैं । इसके अलावा यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है की 1990 -95 के दौरान केंद्र सरकार के पूरे खर्च का मात्र 2 प्रतिशत स्वास्थ्य एवं मात्र 2 प्रतिशत शिक्षा पर किया गया, जबकि दूसरी ओर सेना पर 15 प्रतिशत ।

तालिका 2 : भारत के विभिन्न राज्यों में गाँव/शहर क्षेत्र अनुसार बाल श्रमिक की संख्या एवं जनसंख्या अनुपात (1991)

क्रम सं राज्य बाल श्रमिकों की संख्या कुमल में बाल श्रमिकों की प्रतिशत

गाँव शहर कुल जनसंख्या श्रमिक बाल

1

आन्ध्र प्रदेश

1810448

140864

1951312

3.28

7.75

8.50

 

2

मध्य प्रदेश

1631129

67468

1698597

0.63

6.85

6.38

3

महाराष्ट्र

1447674

110082

1557756

2.01

5.20

5.25

4

उत्तर प्रदेश

1308034

126641

1434675

1.14

3.90

2.74

5

बिहार

1053645

48119

1101764

1.28

4.31

3.07

6

कर्नाटक

1007125

124405

1131530

2.60

7.08

6.58

7

तमिलनाडू

823251

151804

975055

1.80

4.58

5.14

8

राजस्थान

775475

44130

819605

1.72

5.97

4.06

9

उड़ीसा

672213

30080

702293

1.95

5.97

4.93

10

गुजरात

567359

49554

616913

1.36

4.31

3.07

11

पश्चिम बंगाल

531421

73842

605263

0.96

3.39

2.47

12649869 991003 13640872 1.68 5.03 4.26

स्रोत: सेन्सस ऑफ इंडिया, 1991, वार्षिक रिपोर्ट 1995-96, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार

भारत सरकार द्वारा 1994 में ‘राष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन प्राधिकरण’ का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष केन्द्रीय श्रम मंत्री, भारत सरकार हैं । केंद्र सरकार द्वारा उन क्षेत्रों में, जहाँ बाल मजदूर किसी खास व्यवसाय में ज्यादा संख्या में है, उनके लिए ‘विशेष विद्यालय’ खोले गए हैं । वर्ष 1989 – 90 में 5800 बच्चों के लिए 102 विशेष विद्यालय स्वीकृत किए गए जिसके लिए 93 लाख रूपए की राशि आवंटित की गई । जिसमें शिवकाशी में 24, मंदसौर में 8, जयपुर में 20, मरमापूर में 20, मिर्जापुर – भदोही में 10, फिरोजाबाद में 10, अलीगढ़ में 10 विशेष विद्यालय खोले गए । आठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने बाल श्रमिक बहुल जिलों में ‘राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना’ के तहत विशेष विद्यालयों को चलाने की बड़े पैमाने पर स्वीकृति दी थी । राष्ट्रीय बल मजदूर परियोजना के तहत विभिन्न राज्यों के 133 जिलों का चयन हूआ जिसमें आन्ध्र प्रदेश के 23 जिले, बिहार के 15 जिले, दिल्ली, गुजरात में 2, कश्मीर में 4, कर्नाटका में 13, मध्य प्रदेश में 12, महाराष्ट्र में 17, उड़ीसा में 17, राजस्थान में 2, तमिलनाडू में 11, उत्तर प्रदेश में 9, पश्चिम बंगाल में 7 जिले शामिल हैं । ये बाल श्रमिक बहुल जिले हैं जिनमें से 76 जिलों में विशेष विद्यालय खोले जा चुके हैं जिनमें 65 करोड़ 43 लाख रूपए, कूल डेढ़ लाख बाल श्रमिकों के पढ़ने हेतु आवंटित किये गए । इन जिलों को प्रथम चरण में सर्वेक्षण एवं मूल्यांकन, बाल श्रम कानूनों का त्वरित कार्यान्वयन, बाल श्रमिकों के माँ – बाप को रोजगार मुहैया कराने, अनौपचारिक शिक्षा का प्रचार, छात्रवृति, पोषाहार, जनजागरण आदि की करिवाई की गई । लेकिन इसके बावजूद देश के विभिन्न राज्यों के बालकों में साक्षरता की दर को हम संतोषजनक नहीं कह सकते राजस्थान में 24 प्रतिशत, बिहार में 26 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 27 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 28 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश में 30 प्रतिशत है जबकि केरल में 70 प्रतिशत बच्चे साक्षर हैं, महाराष्ट्र में 47 प्रतिशत, तमिलनाडू में 46.8 प्रतिशत, गुजरात में 44 प्रतिशत, पंजाब में 44 प्रतिशत है ।

सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री पी. एन. भगवती द्वारा दिए गए एक फैसले में टिप्पणी में उन्होंने कहा था – बाल श्रमिक नितांत अमानवीय स्थितियों से गुजर रहे हैं मानो सभ्यता से बहिस्कृत है उनका जीवन पशूओं से भी बदतर है । पशु कहीं भी घूम- फिर सकते हैं, लेकिन बाल श्रमिक समाज में बन्धूआ हैं । दरिद्रता और भूख के चलते वे बचपन में ही दुखद और अभिशप्त जीवन व्यतीत करने वाले युवा बन जाते है उन्हें खुले आकाश तले कड़ाके की ठंड में सोना पड़ता है । वे भारतीय समाज व्यवस्था पर लगा हूआ एक स्याह धब्बा है, हमारी सामाजिक आर्थिक सरंचना से उत्पन्न एक भयावह समस्या है – एक ऐसी समस्या जिसका निदान नहीं हो रहा है, जो आसध्य हो गई है, न्यायमूर्ति भगवती के इस वक्तव्य से असहमति की गूंजाइश नहीं ।

स्रोत – समाज कल्याण, जून 1999

बाल श्रम उन्मूलन और श्रम संघों की भूमिका

विगत वर्षों में बढ़ते औद्योगिकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में सभी राष्ट्रों में बाल श्रम नियोजन विकराल रूप का चुका है और भारत भी इससे अछूता नहीं है । इस स्थिति ने हमारे समाज बैज्ञानिकों, मनीषियों एवं मानव संसाधन विकास विशेषज्ञों के सम्मुख एक गहन प्रश्न खड़ा किया है की औद्योगिक विकास और आय अर्जन के नाम पर बाल श्रम नियोजन की परिपाटी को हमारा वर्तमान परिवेश कब तक अंगीकार करता रहेगा ? क्या इसके सामाजिक अभिशाप की आत्मश्लाघा में अभिशप्त रहेंगे ? अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में दुनिया के सर्वाधिक बाल श्रमिक हैं । 1991 में जनगणना के अनुसार देश में 165 लाख बाल श्रमिक थे जो कि बालजनसंख्या के 5.5 प्रतिशत थे । वर्तमान में यह संख्या 200 लाख से भी अधिक हो गई है । जबकि एक ओर हमारे संविधान की धारा 24 में प्रावधान है की “14 वर्ष से कम आयु का कोई भी बच्चा किसी खतरनाक नियोजन फैक्ट्री, खान और किसी उपक्रम में कार्य के लिए नियोजित नहीं किया जा सकेगा ।” तथा अनूच्छेद 45 यह कहता है कि “नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा चौदह वर्ष से कम आयु तक के बच्चों के लिए उपलब्ध होगी” क्या यह सैधांतिक एवं व्यवहारिक परिणति के ज्वलंत विरोधाभास और संवैधानिक प्रावधानों की खुली अवज्ञा नहीं है ?

प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों एवं कवि पाब्लो नेरूदा ने अपनी कविता में लिखा है कि “जिस देश के बच्चों का कोई भविष्य नहीं होता उस देश भी अपना कोई भविष्य नहीं होता ।” वास्तव में हमारे देश में व्याप्त निर्धनता और अशिक्षा बल श्रम को सेवायोजकों की तरफ धकेलती है । परिवार के भरण – पोषण की विवशता बाल श्रम नियोजन का एक बहूत बड़ा कारण है । बाल श्रमिकों के बढ़ते सेवा योजन की प्रवृति असंगठित उद्योगों में तेजी से बढ़ी है क्योंकि कि एक सामाजिक रिसर्च के अनुसार बाल श्रम की सौदेबाजी क्षमता शून्य है एवं यह सस्ता उपलब्ध हो जाता है। बाल श्रम आज मुख्यतया माचिस उद्योग, बागानों, बेकरी उद्योग, होटल, चाय की थडियों, बीड़ी निर्माण उद्योग, काष्टकला उद्योग, शू/लिशिंग कृषि, हॉकिंग, लोडिंग,, रिक्शा चलन, चुना उद्योग, कालीन उद्योग ग्लास एवं चूड़ी उद्योग, स्लेट उद्योग, ताला एवं पीतल बर्तन आदि में बहुतायत से देखने में मिलता है । जनसंख्या का ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन की बढ़ती प्रावृति ने बाल श्रम नियोजन को प्रोत्साहित किया है । कई जातियाँ और प्रजातियाँ स्कूली शिक्षा के अभाव, कृषि कार्य और घुमक्कड़ प्रवृति के कारण श्रम से ग्रसित है । भारतीय परिवारों की ऋण ग्रस्तता ने भी बाल श्रम प्रथा को उजागर किया है जिसने बाल श्रम शोषण को जन्म दिया जो की दास प्रथा का अमानवीय रूप है । राष्ट्रीय श्रम संस्थान की रिपोर्ट में दिग्दर्शित कुछ आंकड़े निम्न हैं -

प्रमुख उद्योग एवं बाल मजदूर

उद्योग का नाम

स्थान

बाल श्रमिकों की संख्या

कालीन

मिर्जापुर, भदोही,उत्तर प्रदेश, जयपुर, राजस्थान

50,000

दियासलाई, आतिशबाजी

शिवकाशी, तमिलनाडू

30,000

रत्न पोलिश एवं जवाहरात

जयपुर, राजस्थान

1,50,000

पीतल एवं कांच

फिरोजाबाद

50,000

पीतल के बर्तन

मुरादाबाद

45,000

बीड़ी उद्योग

संभलपूर, त्रिचूर, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, बिहार

3,00,000

हस्त शिल्प

जम्मू कश्मीर

92,221

सूती होजरी

त्रिचूर, तमिलनाडू

8,000

पावरलूम

भिवंडी, महाराष्ट्र

25,000

नारियल रेशा

केरल

20,000

सिल्क बुनाई, कशीदा, एवं कढ़ाई

वाराणसी

15,000

हैंडलूम

वाराणसी, त्रिवेन्द्रम, त्रिपुरा. भिवंडी

33,000

जरी की कड़ाई

लखनऊ

45,000

लकड़ी की नक्काशी

सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

12,000

फिश फ्रीजिंग

क्यूलोन, केरल

27, 000

स्लेट पेंसिल

मंदसोर, मध्य प्रदेश

2,000

पत्थर की खुदाई

मरकापुर, आंध्र प्रदेश

2,000

चाय बागन पौधारोपण

असम, पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा

72,341

बाल वेश्यावृत्ति

सम्पूर्ण भारत

2,00,000

श्रम संघ की भूमिका

भारतीय श्रमसंघों का सामाजिक न्याय के प्रति जिहाद का एक लंबा इतिहास रहा है और वर्तमान में 19वीं शताब्दी के मध्य में ही बाल श्रम के खिलाफ उनका सक्रिय रचनात्मक आंदोलन चल रहा है । अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन भी भारतीय श्रम संघ आंदोलन को बाल श्रम उन्मूलन के लिए प्रभावी योगदान दे रहा है जब से ही इसने इपेक इंटरनेशनल प्रोग्राम ओन द एलिमेनिशन ऑफ चाइल्ड लेबर प्रारंभ किया तब से ही श्रम संघों ने कार्य योजना (एक्शन प्लान) बना कर श्रम उन्मूलन की दिशा में कमर कस ली है । इस संबन्ध में भारत के प्रमुख श्रम संघों के प्रयास एवं योगदान उल्लेखनीय है

1. आल इंडिया ट्रेड युनियन कांग्रेस (एटक)

सुश्री अमरजीत कौर के नेतृत्व में एटक 1994 से ही अपने मुख्य एजंडे में बाल श्रम उन्मूलन को सम्मिलित कर निरंतर सक्रिय है । इसमें एटक के गैर सरकारी संगठनों, सरकार और नियोक्ताओं को सम्मिलित कर उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद में कार्यरत बाल श्रमिकों राजस्थान में जयपुर, आन्ध्र प्रदेश में माकार्पूर, कलकत्ता और चेन्नई जैसे महानगरों में कार्यरत बल श्रमिक एटक की निगाह में आए हैं जिनके विरूद्ध एक प्रचार अभियान शुरू किया गया है । पोस्टर्स, दिवार लेखन, नुक्कड़ नाटक आदि आदि के माध्यम से चेतना जागृत करने का कार्य बखूबी किया जा रहा है। एटक के प्रयासों से हाल ही में सरकार ने मुरादाबाद की 400 ब्रास वेयर्स बनाने वाली इकाइयों से जवाब – तलब किए हैं । मार्च 1997 में अमरजीत कौर ने आन्ध्र प्रदेश के मार्कापूर की स्लेट खनिज इकाइयों पर धावा बोला जहाँ बहुसंख्या में बाल श्रम कार्यरत पाए गए । वहाँ एक कार्यशाला आयोजित की गई तथा स्थानीय शासन और जनता – जनार्दन में चेतना उत्पन्न करने का कार्य किया । मार्कापुर की स्लेट की खाने 50 फूट गहरी हैं और 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे वहाँ काम करते हैं । जिला कलक्टर का सहयोग लेकर उन खदानों में कार्यरत बच्चों के अभिभावक को ऋण सहायता एवं अनुदान मंजूर कराया तथा बच्चों के लिए छात्रावास एवं विद्यालय में दाखिला का कार्य सम्पन्न कराया । यही हाल उत्तर प्रदेश दे मुरादाबाद का है । जहाँ ब्रास वेयर्स उद्योग में बाल श्रमिकों की भरमार है । जेड. एम. नकवी और नेमसिंह वहाँ श्रमिक नेता के रूप में सक्रिय है और बाल श्रम उन्मूलन के सार्थक प्रयास कर रहे हैं ।

2. भारतीय मजदूर संघ (भामस)

भामस के कार्यकारी अध्यक्ष वेणुगोपाल बाल श्रम उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्धता से सक्रिय हैं । इस हेतु पुणे में ठेकेदार कामगार संघ और हैदराबाद में आन्ध्र प्रदेश कंस्ट्रक्शन मजदूर संघ कार्यरत हैं जो सक्रिय भूमिका, अंतराष्ट्रीय बाल श्रम उन्मूलन कार्यक्रम से संबद्ध होकर ऐडा कर रहे हैं । गैर औपचारिक शिक्षा कार्यक्रम इस संघ द्वारा प्रारंभ किया गया है । आन्ध्र प्रदेश के 500 बाल श्रमिक श्रम से मुक्त होकर 20 विशिष्ट विद्यालयों में पढाई करने लगे हैं । श्री नरसिंह लाल और रंगानाथ के नेतृत्व में विद्यालयों का प्रबंध संचालन और मोनिटरिंग कार्य किया जा रहा है । वहाँ के बच्चों के लिए डॉक्टर भी आता है स्वास्थ्य की देखभाल के लिए ।

3. सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू)

श्रमिकों के शोषण के खिलाफ सदैव प्रखर का स्वर गूंजाने वाला सीटू बाल श्रम के प्रति भी 14 राज्यों एवं 9 औद्योगिक क्षेत्रों में चेतना जागृत करने का कार्य कर रहा है । पेम्पलेट, पोस्टर्स, विडीयो आदि के माध्यम से सीटू जागरूकता अभियान चला रहा है और बाल श्रम उन्मूलन के प्रति बचनबद्ध है । पी. के गांगुली की राय में श्रमिक संघों का भावी कार्यक्रम में बाल श्रम प्रभावी मुद्दा होगा । महिला श्रमिकों का शोषण के विरूद्ध भी सीटू सदैव आवाज उठाता है । शिक्षा और महिलाओं की स्थिति में सुधार द्वारा ही बाल श्रम उन्मूलन संभव है । कर्नाटका में बीड़ी और अगरबत्ती उद्योग में मंगलोर में 23000 बाल श्रमिक कार्य करते हैं । वहाँ सुश्री वारालक्ष्मी उनकी दशा सुधारने में श्रम से मुक्ति की दिशा में सक्रियता से कार्य कर रही हैं । यहाँ संगठित श्रम की बाहुल्यता है । वहाँ एक नया श्रम संघ सीटू का बना है जो मैसूर जिला कर्मकार संघ के रूप करता है । जिसका प्रतिपादन मोहन कुमार 45 वर्ष नी किया जो स्वयं एक बाल श्रमिक रहे हैं ।

4. हिन्द मजदूर सभा (हिमस)

हिन्द मजदूर सभा ने 1992 के राँची अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया बाल श्रम के विरूद्ध । इपेक की सहायता से वेस्ट बंगाल चाय मजदूर सभा और डी इंस्टीट्यूट फॉर प्लान्टेशन एग्रीकल्चर एंड कम्पनी (इपेक) स्थापित किया गया जो देश के उत्तरी पूर्वी राज्यों के चाय बगान में कार्यरत बाल श्रमिकों के विरूद्ध सक्रियता से कार्य कर रहा है ।न नई दिल्ली मुख्यालय पर एक बाल श्रम प्रकोष्ट की स्थापना की है । एक बाल श्रम निधि की भी स्थापना की है । एक बाल श्रम निधि की भी स्थापना की गई है जिसमें स्वैच्छिक योगदान को प्रेरित किया जाता है । संजीव रेड्डी, लाल बहादूर सिंह और रामलाल ठक्कर इंटक के पदाधिकारी सक्रियता से जुटे हुए हैं । उड़ीसा में प्रनोता मिश्रा और दिल्ली में योगेश शर्मा बाल श्रम पुनर्वास कार्यो से पूर्णतया जुड़े हैं । अनौपचारिक शिक्षा केंद्र इनके द्वारा चलाए जा रहे हैं । उड़ीसा में कृषि एवं निर्माण क्षेत्रों (कंस्ट्रक्शन) में कार्यरत बाल श्रमिकों की दशा सुधारने में प्रनोता मिश्रा सक्रिय हैं । दिल्ली के योगेश शर्मा सक्रिय हैं जो कहते हैं की श्रमिकों को पुनर्वासित किया है । अनौपचारिक शिक्षा केंद्र इंटक द्वारा चलाए जा रहे हैं ।

बाल श्रम उन्मूलन एवं कल्याण कार्यक्रम

बल श्रम की बहूआयामी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने समय- समय पर अनेक अधिनियम बनाए हैं जिनमें बाल श्रम अनुबंधन अधिनियम, 1933; मोटर परिवहन कामगार अधिनियम, 1951 बाल रोजगार अधिनियम, 1938; बागान श्रम अधिनियम, 1951; कारखाना अधिनियम, 1938; बागान श्रम अधिनियम, 1951; कारखाना अधिनियम, 1948; खनन अधिनियम, 1952; मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 1958, बीड़ी एवं सिगार श्रमिक (दशाएँ) अधिनियम, 1966; ठेका मजदूर नियमन अधिनियम, 1966 अंतर्राज्य श्रमिक पलायन(नियमन एवं सेवा शर्त नियोजन) अधिनियम, 1979 तथा बाल श्रमिक निषेध एवं नियमन अधिनियम, 1986 प्रमुख रूप से सम्मिलित किये जाते हैं । लेकिन व्यावहारिकता के कसौटी में बाल श्रम नियमन अधिनियमों का प्रभावी क्रियान्वयन नगण्य है इसका कारण यह है की कार्यरत अधिकांश बाल फलस्वरूप श्रम एवं संघ गतिविधियां भी शिथिल है तथा सेवा नियोजक भी झूठे आधारों पर स्वयं को विभिन्न श्रम अधिनियमों की परिधि से बाहर बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं । उपलब्ध सरकारी तंत्र भी सीमित साधनों एवं कर्तव्यहीनता से प्रभावहीन है । बालक निर्धनतावश कुपोषण, अमानवीय कार्य दशाओं, बिमारियों, शारीरिक, एवं आर्थिक शोषण, देर रात तक नियोजन और अधिक कार्य के घंटे जैसे आमानवीय कृत्यों से अभिशिप्त हैं वहीं अनेक घातक रोगों के शिकार होकर असमय ही काल के ग्रास में समा जाते हैं ।

नेशनल पालिसी फॉर चिल्ड्रेन रेग्यूलेशन 1971 और गूरूपदस्वामी कमेटी की रिपोर्ट 1979 दो मुख्य सरकारी प्रयास और हैं जो बाल श्रम उन्मूलन के प्रति सजग हैं तथा सरकार ने एक राष्ट्रीय

प्राधिकारण की स्थापना की है तथा बाल श्रम खत्म करने के लिए उनके पुनर्वास एवं कल्याण के लिए 850 करोड़ की राशि से एक कोष की स्थापना की है ताकि इस शताब्दी के अंत तक युद्ध स्तर पर प्रयास करके बाल श्रम का जड़मूल से उन्मूलन किया जा सके । विगत 10 दिसम्बर 1976 को उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक जनहित याचिका में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए जो कहा गया है वह मानवीय धरातल एवं सामाजिक सरोकार की दृष्टी से एक स्वागत योग्य कदम है ।

विभागाध्यक्ष, व्यवसाय प्रशासन विभाग

से. मु. मा. कन्या महाविद्यालय,

स्रोत – मार्गदर्शिका

बाल मजदूरी ओर कुछ आंकड़े

  • भारत में बाल मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा है ।
  • भारत में अनगिनत बच्चे में ही काम करना शुरू कर देते हैं ।
  • भारतीय बाल मजदूर औसतन 12 घंटे प्रतिदिन काम करते हैं ।
  • भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद ( जि. एन. पी. ) का 20% योगदान बाल मजदूरों द्वारा होता है ।
  • बाल मजदूर का औसतन वेतन मात्र 90 रू. मासिक है ।
  • बंगलौर, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, हैदराबाद, कानपुर और मद्रास में 50 करोड़ बच्चे सड़कों पर हैं ।
  • तमिलनाडू में शिवकाशी दे माचिस फैक्ट्री में 45,000 बच्चे काम करते हैं जिसमें से नब्बे प्रतिशत (90%) काम करने वाले 14 वर्ष से कम उम्र की लडकीयाँ हैं ।
  • दिल्ली के 18% बच्चे बाल मजदूरी करके अपना जीविकापार्जन करते हैं ।
  • भारत में लगभग 20 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी में लगे हुए हैं ।

पेशा

स्वास्थय बाधाएँ एवं खतरा

बीड़ी उद्योग

टी. बी. श्वासनली – शोथ

हस्तकरघा उद्योग

दमा, टी. बी. श्वासनली – शोथ, रीढ़ की हड्डी की बीमारी

जरी एवं कढ़ाई

आँखों में त्रुटि एवं खराबी

रून एवं हिरा कटिंग

आँखों में त्रुटि एवं खराबी

फटा – पुराना समान एवं

चर्म- रोग, संक्रमण रोग, टेटनस, दमा, श्वासनली- शोथ, तपेदिक

कागज के टुकड़े को बटोरना

सिलिकोसिस, सर्दी एवं खाँसी

कुम्हार एवं मिट्टी के बर्तन

दमा, श्वासनली – शोथ, टी.बी., सिलिकोसिस, सर्दी एवं खाँसी

पत्थर एवं स्लेट खनन

सिलिकोसिस

चूड़ी उद्योग

ताप आघात (प्रहार), चर्म-रोग, श्वासदोष, कंजंकटीवाइटिस

स्लेट उद्योग

सिलिकोसिस

कृषि उद्योग

चर्म- रोग, कीटनाशक दवाईयों एवं मशीनों का दु:प्रभाव, स्नायु संबंधी जटिलता एवं अत्यधिक उत्तेजना, ऐठन

ईंट भट्टी

सिलिकोसिस, ऐठन

पीतल उद्योग

अंग बिहीनता, तपेदिक, जलन, उलटी, खून, श्वसनीय अनिमियतता, जल्द मृत्यु

बैलून उद्योग

न्यूमोनिय, साँस न ले सकना, दिल का दौरा

माचिस उद्योग

आग से दुर्घटना, तुरंत मृत्यु

शीशा एवं पावरफुल उद्योग

दमा, श्वासनली- शोथ, तपेदिक, आँखों में खराबी, जलना इत्यादि


बाल मजदूरी अधिनियम

बचपन हमारे जीवन का सबसे सुनहरा समय होता है, जब न किसी बात की चिंता होती है न कोई परेशानी । लेकिन कई बच्चों को छोटी – सी नादान उम्र में ही काम करने के लिए धकेल दिया जाता है । मकान बनाने की काम पर, गलीचे बुनने वाले करघे पर या चाय की दूकान में जूठे बर्तन मांजते हुए बच्चों का दिखाई देना आम बात है । लालची ठेकेदार और दूकानों के मालिक सस्ते में काम करवाने के लिए बच्चों की जिन्दगी से खिलवाड़ करने से चूकते नहीं हैं । माता पिता कहते हैं “यह हमारी मजबूरी है” पर क्या आप जानते हैं कि बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध है ? बच्चों से काम करवाने वालों को सजा हो सकती है ।

बच्चों का शरीर कमजोर और बढ़ता हूआ होता है । उनसे ज्यादा शारीरिक काम लेने से उनका रूक जाता है काम की जगह पर उन्हें खरतनाक मशीनों व रसायनों से काम करवाया जाता है । बच्चा आगे चलकर या तो हेमशा बीमार रहेगा या इनता कमजोर की सामान्य जीवन ही जी पायेगा । वह अपनी रोजी भी नहीं कमा सकेगा । साथ ही वह अपनी सामान्य उम्र से कम जियेगा । यह कारण है की बच्चों से उस उम्र में काम लेने वालों को ऐसा करने से रोकना चाहिए ।

बच्चों से कुछ तरह के काम करवाने पर कानून पूरी पाबन्दी लगाता है । कानून यह भी बताता है की बच्चों से क्या और कहाँ काम करवाया जा सकता है । इन कामों के अलावा अगर कहीं काम लिया जाए तो कानून काम लेने वालों को सजा देगा । बच्चों से यानी 14 साल से कम उम्र के तहत व्यक्तियों से काम करवाने से संबंधित कानून है । बाल मजदूरी (प्रतिबंध एवं नियंत्रण अधिनियम 1986)

इस कानून 14 साल से कम उम्र के बच्चों को नीचे लिखे कामों के लिए नहीं रखा जा सकता है:

  1. रेलगाड़ी से यात्री, सामन या डाक ले जाने के लिए,
  2. रेलगाड़ी के इंजिन में आधे जले कोयले उठाने, में जले कोयले की राख साफ करने या रेल स्टेशन की सीमा में कोई भवन बनाने के लिए,
  3. रेलवे स्टेशन में चाय व खाने पीने के सामान की दूकान पर, जहाँ एक से दुसरे प्लेटफार्म पर बार-बार आना – जाना पड़ता हो ।
  4. रेलवे स्टेशन या रेल लाईन बनाने के काम के लिए,
  5. बंदरगाहों पर किसी भी तरह के काम के लिए,
  6. अल्पकालीन (टेम्परेरी) लाईसेंस वाली पटाखों की दूकानों में पटाखे बेचने का काम

कुछ कामों के कारख़ानों और कारखानों के परिसरों में बच्चों को लगाना मना है । ये काम हैं :

  1. बीड़ी बनाना,
  2. गलीचे बुनना,
  3. सीमेंट कारखाने में, सीमेंट बनाना या थैलों में भरना,
  4. कपड़ा बुनाई, छपाई व रंगाई,
  5. माचिस, पटाखे या बारूद बनाना,
  6. अबरक (अभ्रक या माईका) काटना या तोड़ना
  7. चमड़ा या लाख बनाना
  8. साबुन बुनाई, छपाई व रंगाई,
  9. माचिस, पटाखे या बारूद बनाना
  10. ऊन की सफाई,
  11. मकान, सड़क, बांध, आदि बनाना,
  12. स्लेट पेंसिलें बनानी व पैकबंद करनी,
  13. गोमेद की वस्तूएं बनाना
  14. कोई ऐसा काम जिसमें लैंड, पारा मैंगनीज, क्रोमियम, अरगजी, बेंजीन, कीड़े- नाशक दवाएँ और एस्बेस्टस जैसे जहरीले धातु और पदार्थ उपयोग में लाये जाते हों ।

कानून बच्चों को ऐसे कामों से क्यों रोकता है ?

ऊपर बताए कामों में से अधिकांश काम ऐसे हैं जिनसे फेफड़ों की बीमारी होने का डर होता है । इन कामों में, हवा के साथ-साथ फेफड़ों में तम्बाकू, धुल, ऊन, रसायन आदि के छोटे- छोटे कण भी जाते है ये फेफड़ों को कमजोर बनाते हैं इससे तपेदिक (टी. बी.) जैसी बीमारी भी होती है जिसका अगर समय से और ठीक इलाज न कराया जाए तो बच्चे की जान भी जा सकती है अगर टी. बी. ना भी हो तब भी बच्चों के फेफड़े और बाकी शरीर इतने कमजोर हो जाते हैं की वे जब बड़े हो जाते हैं तब भी मेहनत का कोई काम नहीं कर पाते हैं । उनके शरीर में जो कमजोरी आ जाती है वह इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो पाती है।

ऐसे बच्चों की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है । बच्चों के इस भयानक और परेशान करने वाली हालत से बचाने के लिए ही कानून उन लोगों को दंड देता है जो बच्चों से काम लेते हैं । परंतु कानून ऐसी जगहों पर कोई दुसरे हल्के – फूल्के काम करने के लिए रोक नहीं लगाता ।

रामनाथ पवार का एक छोटा सा सीमेंट का कारखाना है । उसे पता है की बच्चों को वहाँ सीमेंट बनाने जे जान पर या थैलों में सीमेंट भरने के काम पर नहीं लगाया जा सकता है इसलिए वह बच्चों से कारखाने के बाहर की सफाई का काम लेता हैं । ये बच्चे जब सफाई करते हैं तब भी साँस में सीमेंट के छोटे-छोटे कणों से नहीं बच पाते हैं । ये सीमेंट के कण उनके फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं ।

मतलब यह है की अगर कानूनन ऐसे काम में कोई रोक नहीं भी है तब भी बच्चों को बीमारी और कमजोर से बचाने के लिए ऐसी जगहों पर न भेजें । फिर काम पर रखने वाले बच्चों से क्या करवाते हैं और क्या नहीं, इसकी निगरानी तो आप रख नहीं पायेगें । बेहतर यही होगा की ऐसी खरतनाक जगहों पर बच्चों को न भेजें ।

बच्चे काफी नाजुक होते हैं इसलिए उनके लिए किसी भी तरह का काम ठीक नहीं होता है । आपको चाहिए कि बच्चों को काम पर भेजने की बजाय उन्हें बालवाड़ी या स्कूलों में भेजें । अगर बच्चा 4थी, 5वीं तक पढ़ ले तो उसमें इतनी समझ तो आ ही जाएगी की कौन सा काम स्वास्थ के लिए खराब है । साथ ही वह लिख सकेगा और अपनी मेहनत के सही दाम मांग सकेगा।

रानी की माँ बिमला एक कारखाने में बीड़ी बनाने का काम करती थी । एक दिन रानी के बापू रामू ने बिमला से कहा कि रानी को भी आपने साथ ले जाया करो । थोड़ा काम करेगी तो पैसा मिलेगा । कारखाने का मालिक जानता था की अगर रानी को बीड़ी बनाने के लिए कारखाने में रखा तो उसे जेल हो सकती है । इसलिए उसने बिमला को बीड़ी का सामान देकर कहा की रानी को घर पर ही बीड़ीयां बनाने दो । उस काम के हिसाब से पैसा दूँगा । परंतु बिमला शुरू से ही रानी से बनवाने के खिलाफ थी । उसने रामू को साफ कह दिया की रानी से काम न कारखाने में न ही घर पर बीड़ियाँ बनवाएगी । उसने रानी को पास के स्कूल में दाखिल करवा दिया । पढ़ – लिख कर रानी बड़ी होकर एक अच्छी नौकरी पर लग गई और ज्यादा पैसे भी कमाने लगी ।

यदि रानी कहीं भी बीड़ियाँ बनाती तो उसे तपेदिक (टी.बी.) हो सकती थी । क्या थोड़े से पैसों के लिए बच्चों के माँ-बाप को उन्हें मौत के मूँह में धकेल देना चाहिये ?

कानून की मनाही के बावजूद काम करवाने वाले ठेकेदार या मालिक को तीन महीने से एक साल तक की कैद हो सकती है । साथ ही उसे रूपये 10,000/- से लेकर रूपये 20,000/- तक का जुर्माना भी हो सकता है । अगर उसने जुर्म दुबारा किया तो सजा बढ़कर छ: महीने से दो साल की भी हो सकती है ।

लाला बेलीराम ने अपने साबुन बनाने के कारखाने में 14 साल से छोटे की बच्चों को काम पर लगा रखा था । वह उनको 200/- रूपये महीने की पगार देता था और दिन में 10-12 घंटे काम करवाता था । ग्यारह वर्ष का श्यामू भी वहाँ काम करता था । एक दिन बहुत दु:खी होकर श्यामू ने उस इलाके के एक सामाजिक कार्यकर्त्ता आकाश को अपनी बात बताई । आकाश ने लाला की शिकायत की । लाला बेलीराम के खिलाफ बच्चों से ऐसा काम करवाने के लिए मुकदमा शुरू हो गया । लाला ने कोर्ट में कहा की बच्चों ने अपनी उम्र 15-16 साल बतायी थी, पर कोर्ट ने लाला को ही दोषी ठहराया । बच्चों को काम पर लगाने से पहले उनकी सही उम्र का पता लगाना लाला की जिम्मेदारी थी ।

बच्चों को नीचे लिखी शर्तों पर काम करने के लिए कानून इजाजत देता है :-

  • बच्चों से 6 घंटे से अधिक समय तक नहीं करवाया जा सकता है । काम के लिए इन्तजार करने का समय भी इसमें शामिल है,
  • एक साथ तीन घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता । तीन घंटों के बाद कम से कम एक घंटे का आराम दिया जाना चाहिए ।
  • रात के 7 बजे लेकर सुबह 8 बजे में कोई भी काम नहीं लिया जा सकता ।
  • सप्ताह में कम-से-कम एक दिन की छुट्टी दी जानी चाहिये ।

बच्चों का गिरवीकरण

कई गरीब माँ-बाप पैसों की खातिर अपने बच्चों की मजदूरी बेच देते हैं । ऐसे लोग माता – पिता या बच्चों के पालक साल, दो साल की तनख्वाह पेशगी ले लेते हैं । बच्चा बिना कोई पैसे के लिए काम करता रहता है । उन्हें इस तरह मालिक के पास गिरवी रख दिया जाता है यह गैर कानूनी है ।

जो लोग बच्चों को गिरवी रख देते हैं एक जुर्म करते हैं जिसके लिए उन्हें सजा हो सकती है । जो लोग बच्चों को बिना पैसे दिए कोई भी काम लेते हैं वे भी इस जुर्म में अपराधी हैं और उन्हें भी सजा हो सकती है । बालक (श्रम गिरवीकरण) अधिनियम 1933 के तहत बाप या माँ या रखवाला हो भी बच्चों को गिरवी रखता है उसे भी सजा दी जाती है ।

रामलाल बिहार के एक गाँव में खेतों पर मजदूरी करता है । पटना आते समय उसने अपने भतीजे बिट्टू को भी साथ ले लिया । पटना आकर उसने बिट्टू को लकड़ी काटने की एक आरा मशीन पर सफाई के लिए रख दिया । उसने मालिक से 500 रूपये ले लिए । मालिक बिट्टू को बिना पैसे दिए कम करवाने लगा । किसी जानकार व्यक्ति ने सरकार को इस घटना की शिकायत कर दी । बच्चे को “गिरवी” में देने के लिए रामलाल को सजा हुई । रामलाल को पैसे देकर बिट्टू से काम लेने के लिए मालिक को भी सजा हुई ।

फैक्ट्रियों का काम

14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी फैक्ट्री में काम की इजाजत नहीं है । यानी 15वाँ साल लगने से पहले बच्चों को काम पर नहीं रखा जा सकता है । फैक्ट्री अधिनियम 1948 ने फैक्ट्रीयों में बच्चों से काम लेने पर रोक लगाई है । फैक्ट्री मालिक की यह जिम्मेदारी है की किसी को भी काम पर लगाने से पहले वह उसकी सही उम्र का पता लगाए । कोई अगर बच्चों से काम लेने के जुर्म में दोषी ठहराया जाता है तो वह यह कहकर नहीं छूट सकेगा की भरती करते समय बच्चे ने अपनी उम्र 14 साल से अधिक बताई थी ।

14 से 18 वर्ष के बीच की उम्र के “अवयस्क बच्चों” को फैक्ट्रियों में काम करने दिया जा सकता है । परन्तु उसके लिए मालिक को किसी डाक्टर से यह लिखवाना जरूरी है की बालक की उम्र 14 वर्ष से अधिक है और वह शारीरिक रूप से काम करने के लिए तंदुरूस्त और स्वस्थ है ।

अवयस्क बच्चों से फैक्ट्रियों में इन शर्त्तों पर काम लिया जा सकता है ।

  1. दिन में 4 ½ घंटे से ज्यादा काम न लिया जाए ।
  2. रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच काम न लिया जाए ।
  3. ज्यादा से ज्यादा दो पालियों (शिफ्ट) में ही काम लिया जाए ।
  4. एक दिन में केवल एक ही फैक्ट्री में काम करवाया जाए ।
  5. सप्ताह में एक दिन की छुट्टी दी जाए । अगर उनसे छुट्टी वाले दिन कामम लिया जाता है तो उन्हें छुट्टी के दिन से तीन दिन पहले या बाद में एक छुट्टी दी जाती चाहिए ।

सभी माता-पिता को चाहिए की अपने बच्चों पर काम का ज्यादा बोझ न डालें । कानून भी उसकी इजाजत नहीं देता है ।

बच्चों के अनुसार मशीनों पर भी काम करने की पाबंदी है । कानून के अनुसार :

  1. 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को इंजिन, मोटर या इस प्रकार के चलने वाले यंत्रों (मशीनरी) में तेल डालने, सफाई करने या दूसरे किसी काम को करने की मनाही है ।
  2. 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति किसी खतरनाक मशीन पर तभी काम कर सकता है अगर उसे अच्छी तरह से मशीन चलाना सिखाया गया हो, या वह मशीन के किसी जानकर के साथ मशीन चलाना सिख रहा हो ।

राजकुमार ने अपनी छपाई की प्रेस में दूसरी मशीनों के अलावा कागज काटने की मशीन भी लगाई हुई थी । उसने प्रेस में एक 14 साल के लड़के सलीम को “हैल्पर” की नौकरी पर रखा । दिन में सलीम कागज के बंडल इधर से उधर रखता था । एक दिन राजकुमार ने सलीम से कहा की रात में प्रेस बंद होने पर कागज काटने वाली मशीन की सफाई कर रहा था तो धारा वाली छूरी अचानक गिर पड़ी और सलीम की पूरी अंगुलियाँ कट गई । सलीम के चिल्लाने पर पड़ोसी कारखाने के लोगों ने उसे अस्पताल पहूँचाया । वहाँ किसी ने प्रेस के मालिक राजकुमार की शिकायत कर दी ।

राजकुमार को छ: महीने कैद की सजा हुई क्योंकि उसने 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को खतरनाक मशीन के काम पर लगाया था ।

आज की मशीनरी युग में की तरह की नई-नई फैक्ट्रियाँ खुल रही है । यहाँ कई ऐसी मशीने होती हैं जिनमें थोड़ी भी लापरवाही से गंभीर दुर्घटना हो सकती है । अपने बच्चों को किसी ऐसी जगह काम पर न भेजें जहाँ ऐसी दुर्घटना होने की सम्भावना हो । अगर किसी भी गलती से कोई दुर्घटना घटी तो आपका बच्चा सारी जिन्दगी की लिए हाथ, पैर या शरीर का कोई दूसरा अंग खो बैठेगा । उसे दूसरों की भरोसे जीवन काटना पड़ेगा । कानून भी बच्चों से इस तरह के काम करवाने की अनुमति नहीं देता है । दोषी व्यक्तियों को कड़ी सजा दी जाती है ।

इन सभी मामलों में कोई भी व्यक्ति शिकायत कर सकता है । यह जरूरी नहीं की कोई श्रम अधिकारी या बच्चों का रिश्तेदार ही शिकायत लिखवाये । ऐसी शिकायत का कोई निर्धारित रूप (फार्म) नहीं है । यह किसी कागज पर सारी जानकारी लिखकर या मूँह जबानी भी की जा सकती है । यह शिकायत अपने इलाके के मेट्रोपोलिटन या पहले दर्जे के मजिस्ट्रेट के कोर्ट में की जा सकती है ।

स्रोत : हमारे कानून

(मल्टीपल एक्शन रिसर्च ग्रुप)

मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार।

बाल मजदूरी : समस्या एवं विकल्प

बचपन हर व्यक्ति के जीवन की अनमोल धरोहर होती है। उम्र के किसी भी मोड़ पर जब उस उन्मुक्त और निश्चिन्त बचपन की याद आती है तो एक मधुर और स्निग्ध मुस्कान हमारे होठों पर छा जाती है । लेकिन जब हे अपने समाज में ही सड़क पर आते जाते, रेलवे प्लेटफार्म पर या गलियों में नजर फेंकते हैं तो अनगिनत बच्चे कूड़ा कर्कट और गंदगी की ढेर में कागज के टुकड़े बटोरते या सामान ढोते या किसी सेठ- साहूकार के यहाँ काम करते दिख पड़ेगें । उसी गंदगी की ढेर में जिधर नजर पड़ते ही हम अपनी आंखे फेर लेते हैं, ये बच्चे जिन्हें ये भी नहीं मालूम है कि वे बाल मजदूर की श्रेणी में आते हैं, आज उनकी समस्या हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ी है ।

भारत में अनेक बच्चे 4 वर्ष की नाजुक उम्र से ही काम में लग जाते हैं । भारत में बाल मजदूरों की संख्या विश्व भर में सबसे अधिक है । इसका प्रमुख कारण माता-पिता में बच्चे के पालन- पोषण एवं भविष्य के प्रति लापरवाही, जागरूकता की कमी, बच्चों को सही मार्गदर्शन का अभाव, अत्यधिक गरीबी, विस्थापन, प्यार, संरक्षण एवं देखभाल की कमी, खाना, कपड़ा एवं शिक्षा की कमी इत्यादि है । अगर देखा जाए तो ये बच्चे जो कमा कर लाते हैं वह नहीं के बराबर होता है । लेकिन गरीब माँ-बाप को ये संतुष्टि रहती है की उसका बच्चा कोई काम, हुनर या पेशा सीख रहा है जो उसके जीविकापार्जन के लिए काम आएगा । शुरू–शुरू में तो इन बाल मजदूरों को को कुछ वेतन नहीं मिलता है । कितने ही बाल मजदूर कालीन बुनाई, दस्तकारी एवं शिल्पकला एवं माचिस उद्योग में बस एक वक्त खाना पाकर ही काम करते हैं । मालिक यह कहकर काम लेते है की काम में पारंगत होने पर उन्हें वेतन मिलेगा और इस तरह से शुरू होती है इनके अत्याचार एवं शोषण की कहानी ।

1981 के जनगणना के अनुसार भारत में बाल मजदूरों की संख्या 13.6 करोड़ थी जबकि 1983 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में इनकी संख्या बढ़कर 17.6 करोड़ हो गई । ऑपरेशनल रीसर्च ग्रुप ने अपना आंकड़ा 44 करोड़ बतलाया है । श्रम मंत्री ने भारत में बाल मजदूरों की संख्या 20 करोड़ बताया है (अगस्त 1994) । ये सब आंकड़े समस्या की गंभीरता के सूचक हैं । सस्ते दर में बाल मजदूरों की उपलब्धता एवं कानून की ढील से बेरोजगारी की समस्या भी विकराल रूप धारण कर रही है । ऐसे देश में जहाँ 36 करोड़ युवक-युवतियों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हैं वहीं 44 करोड़ बाल मजदूरों के लिए साधन कहाँ से जुट पड़ते हैं । सेठ-साहूकार और ठेकेदार इनका शोषण कर भरपूर फायदा उठा रहे हैं । उनका दावा है कि बहूत सारे उद्योग धंधे ऐसे हैं जहाँ बच्चे अपने कोमल एवं नाजुक हाथों से ज्यादा कुशलता से काम कर सकते हैं । जैसे माचिस के तिल्ली में मसाला लगाना, बीड़ी में तम्बाकू भरना, कालीन बुनना इत्यादि । लेकिन इन्हीं पेशों एवं उद्योगों धंधो में काम करते करते वे कई प्रकार के बीमरियों के शिकार हो जाते हैं जैसे तपेदिक, श्वासनली शोथ, दमा, रीढ़ की हड्डी की बीमारी, दुर्घटना के शिकार होकर अपनी जान भी गवां बैठते हैं । बच्चों को ऐसे धंधों में लगाने के अन्य कारण हैं कम वेतन एवं मुआवजा, बच्चों के कानूनी संरक्षण का अभाव, बच्चों में प्रतिरोध की कम क्षमता, अनुशासन इत्यादि, और यदि बाल मजदूरी पर पूर्ण रोक लगा दी जाए तो सबसे अधिक हानि ऐसे ठेकेदारों को ही होगी ।

इन बाल मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय अमानवीय एवं अप्राकृतिक है । उन्हें दिन भर में औसतन 12 घंटे तक काम करना पड़ता है जबकि उनका मासिक वेतन 90-100 रू. मासिक है । अत: उनके काम की स्थिति में सुधार लाना अपरिहार्य है तभी हम उन्हें जैविक एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं । यह सुधार दो तरह से हो सकते हैं । पहला ऐसे बाल मजदूर जो जोखिम भरे काम में लगे हुए हैं, उन्हें मुक्त कराना एवं उनके पुनर्वास की व्यवस्था करना । इसके लिए हमें समाज में नैतिक एवं सामाजिक जागरूकता लानी होगी । हमें ये देखना होगा की क्यों ये बच्चे विस्थापित होकर सड़कों पर पहुँच गए हैं । उसके पीछे असली कारण क्या हैं । गरीबी एवं विस्थापन को दूर करने के लिए हमे भूमि सुधार, रोजगार के साधन उपलब्ध कराना जिनके पास भूमि नहीं है उन्हें न्यूनतम मजदूरी उपलब्ध कराना, बच्चों के शिक्षा का उचित प्रबंध करना, बच्चों को सम्पूर्ण सामाजिक सुरक्षा एवं देखभाल देना, माता-पिता एवं समाज में बच्चों के अधिकार के प्रति सामाजिक चेतना एवं जागरूकता लाना शामिल है ।

दूसरी श्रेणी में ऐसे बाल मजदूर हैं जो किसी उद्योग धंधे में लगकर कुशलता हासिल कर रहे हैं और अपने परिवार एवं भाई बहनों के लिए आर्थिक अवलंब एवं सहारा हैं । ऐसे बाल मजदूर जो किसी ऐसे धंधे में लगे हैं जो खतरनाक नहीं है एवं उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँच रहा हो, उनके कार्य की परिस्थिति एवं शर्तों में सुधार लाना । ऐसे बच्चे जो पहले से ही काम में लगे हुए हैं उनके व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर मिलना चाहिए । कार्य में कुशलता के साथ-साथ शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था हो । जहाँ काम के बाद बच्चा 2-3 घंटे कुछ पढ़ना लिखना सीख सके । बाल मजदूरों को शिक्षा के अलावा चिकित्सा एवं डाक्टरी सहायता की सुविधा प्राप्त हो । उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए खेलकूद, मनोरंजन के साधन एवं अवकाश एवं फुर्सत के क्षण पर्याय हों । इस प्रकार काम के साथ- साथ कौशल, शिक्षा एवं तकनीकी ज्ञान को समग्रित करना है । नियोक्ता ठेकेदारों एवं मालिकों में इन बच्चों के प्रति उनकी से उन्हें अवगत कराना जरूरी है । ऐसे नियोक्ता जो अपने बाल-मजदूरों के प्रति जिम्मेवारी हैं उन्हें सरकार उत्पादन शुल्क एवं टैक्स में छूट देकर उत्साहित कर सकती है । नियोक्ताओं द्वारा बाल मजदूरों के लिए अतिरिक्त पोषाहार की व्यवस्था हो । उभरती हुए पंचायती राज संस्थाएँ भी बाल मजदूरों के सुरक्षा पर कड़ी नजर रख सकती है ।

इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में स्वरोजगार कार्यक्रम, लघु उद्योग धंधे, कृषि हस्तकला एवं पुराने घरेलू उद्योग धंधो को पुनर्जीवित करना, एवं उन्हें नवीन एवं आधुनिक तकनीक से जोड़ना इसके दूरगामी उपाय हो सकते हैं । प्राथमिक एवं व्यावसायिक शिक्षा की सर्वव्यापकता बाल मजदूरी की समस्या को सुलझाने में और कारगार सिद्ध हो सकता है ।

इस प्रकार हम देखते हैं की बाल मजदूरी की समस्या का निदान मात्र कानून बनाने से ही नहीं हो सकता बल्कि लोगों, समाज, गैर – सरकारी एवं सरकारी संस्थाओं के मिले जुले प्रयास सी ही हो सकता है । अत: सम्पूर्ण समाज को गंभीरतापूर्वक इसके निराकरण एवं रोकथाम के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ना है जिससे सड़कों एवं गलियों में ऐसे बच्चों की बढ़ोतरी को कम किया जा सके ।

आभा श्रीवास्तव

पी.ओ., जे.स.से.सं.

खानों में कार्यरत बाल मजदूर

भारतीय खान अधिनियम 1923, तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम पर लगानें से मना करता है हालाकिं कुछ गलत व्याख्याओं की वजह से तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चे तक काम करते रहे । अत: यह अधिनियम 1926 से कार्य रूप में प्रभावी हो सका । स्वतंत्रता के बाद 1952 में आया खान अधिनियम यह बताता है की पन्द्रह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति खान के बाहर से काम पर नहीं लगाया जा सकता है । और 16 साल से कम आयु का व्यक्ति खान के अंदर काम पर नहीं जा सकता हैं ।

संशोधन अधिनियम 1983 के बावजूद, जहाँ पर काम की आयु 18 वर्ष और अप्रेंटिस की आयु 16 वर्ष से अधिक निर्धारित की गई है, वहाँ पर आज भी 14 साल से छोटी आयु के बच्चे काम पर लगाए जा रहें है । सन 1971 और 1981 जनगणना से प्राप्त अधिकृत जानकारी, अक्सर चौंकाने वाली रही है ।

कार्य चौदह वर्ष से कम आयु के बाल श्रमिक

खान एवं उत्खनन प्रति श्रम शक्ति प्रति श्रम शक्ति

100 में का 100 में का प्रतिशत

(1971 (1981

जनगणना) जनगणना)

24 0.22 27 0.23

 

यहाँ पर यह आश्चर्य की बात है की खानों के बाहर एवं भीतर काम करने वालों के संख्यात्मक आंकड़े उपलब्ध नहीं है ।

हालाँकि, हम दावे से यह कह सकते हैं की बाल श्रमिक माइक एवं कोयला खानों में सबसे ज्यादा कार्यरत हैं और इसके बाद चूना खनन आदि में संलग्न हैं ।

हजारों बच्चों की दुर्दशा पर प्रकाश डालते हुए हम स्लेट उद्योग को एक उदाहरण के रूप में ले रहे हैं ।

मौत की घाटी : मंदसौर का स्लेट उद्योग

स्लेट पेंसिल बनाने के लिए स्लेटी पत्थर की पर्त् को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किया जाता में है इस नरम पत्थर को बिजली चालित आरी के द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों काटा जाता है । इस प्रक्रिया के दौरान महीन एवं हल्के रंग की धुल के गुबार उठते हैं जो लगातार कामगारों के अंदर साँस द्वारा पहुंचते रहते हैं । जिसके परिणाम स्वरुप सिलिकोसिस और निमोनिया तथा अन्य फेफड़े की बीमारियाँ लग जाती है जो की तपेदिक से कहीं ज्यादा जान लेवा है । इसमें सूखी खाँसी और दम घुटने से 6 हफ्ते से पहले भी मौत हो सकती है ।

यहाँ जीवन छोटा, कठोर और नाउम्मीदींपूर्ण है ................. मंदसौर स्लेट उद्योग एवं खनन के कामगारों के लिए संघर्ष करना मुश्किल हाँ । क्योंकि इन गरीब ग्रामीणों के पास न तो जमीन है और न ही कृषि आधारित मजदूरी । भूखमरी, गरीबी, अकाल तथा मूंशियों का शोषण इन असहाय लोगों के जीवन का सतत अंग है । संघर्ष इन लोगों के जीवन के लिए अलंघनीय हिस्से के रूप ढल चूका है इसी कारण ये लोग कोई विरोध नहीं कर सकते, यहाँ तक की बाहरी मदद के लिए रो भी नहीं सकते । यह एक क्रूरता पूर्ण अन्याय तथा इस आयु के लिए अविश्वसनीय स्वरुप है ।

बारह साल या इससे भी छोटी आयु के बच्चों को इस जानलेवा काम पर बलपूर्वक लगाया जाता है जिस तरह से उनके माता-पिता, भाई - बहन मर हैं । वे केवल यही सीख सकते हैं की धुल, थकावट और अमनिवियता के कारण उन्हें भी जल्दी ही मरना है । यह कहानी पिछले पांच दशकों से बार-बार अब तक दोहराई जा रही है कोई भी निश्चित तौर पर यह कह सकने वाला नहीं है की इतने सालों में कितने लोग मौत में गए । बहूत से कहते हैं 2000 लोग तो कुछ इससे भी ज्यादा बताते हैं । लेकिन सच तो यह है की कुछ श्रमिक ही बूढ़े है जो इसके गवाह हैं या फिर पिछले 50 सालों की दु:ख भरी दास्तान को जानते है ।

मुल्तान पूरा – मंदसौर जिले 9 कि. मी. दूर स्थित धुल में चुप भूरे पत्थरों की खानों का गाँव है । यहाँ पर स्लेट उद्योग का काम जिले भर से सर्वाधिक है । यहाँ के लगभग ढाई हजार पीढ़ी दर पीढ़ी मुस्लिम समुदाय से श्रमिक या मालिक हैं । यह धुल भरा गाँव, दासता, आमानवीय, बीमारी तथा मौत की कहानी से पूर्ण है । यहाँ मामले के पीछे मामले छिपे हैं, संक्षेप में, यहाँ त्रासदी (दु:खों का भंडार) ही है ।

मुन्ना खां के पिता अल्लाह नूर पेंसिल के कारखाने में काम करते हुए चार साल पहले खुदा को प्यारे हो गए अब वह अपनी 45 वर्षीय माँ उस काम करती है । तीस साल की उम्र वाली चिट्टी भागरिया बहूत कमजोर है और वह अच्छी तरह से साँस नहीं ले पाती है । उसके माता- पिता, दोनों ही पेंसिल कारखानें में काम करते हुए पहले ही मर चुके हैं ।” पिछले दो तीन दिन से मुंशी मेरी उपेक्षा कर रहा है की मै ठीक से काम नहीं कर सकती हूँ’ मोहब्बत अली 34 साल की उम्र में आज से पांच साल पहले ही मर चुका है । उसकी बेवा और बच्चे अपने माँ बाप के पास रहते हैं । मांगीलाल और जलूरामजी दो भाई “कटर” थे । 45 और 40 की उम्र में मौत को प्यारे हो गए । यह दु:ख भरी कहानी लगातार बिना खत्म हुए चलती रहती है ।

अब्दूल ड्रीम (20) हर रोज चार घंटे बल की यात्रा करके स्ट्रोप्तोमाइसिन का इंजेक्शन लेने इंदौर आता है, उसे मालूम है कि यह भी उसे ठीक नहीं कर पाएगा । “ मैंने दस साल की उम्र से काम शूरू किया था, तब मेरे पिता भी जिंदा थे । वे पेंसिल को तेज करते थे आठ साल तक काम करने के बाद उन्हें सूखी खाँसी हो गई और सांसे भारी हो गई । 50 साल की उम्र होने पर अभी पांच महीने पहले ही उनके मौत हो गई । मै ही रोटी खिलाने वाला बचा हूँ पूरे परिवार में, लेकिन अब मै भी बीमार हूँ । मेरी माँ 50 की होने वाली हैं । क्योंकि मै कभी काम नहीं कर सकूंगा ।”

मंदसौर जिला अस्पताल में सिलिकोसिस की मरीजों को विशेष उपचार किया जाता है और इसके लिए अलग से रजीस्टर बनाया हूआ है ।

अस्पताल की सिविल सर्जन डॉ. जे. एन. नारोलिया की नेतृत्व में एक सीमित ने अस्पताल में भर्ती हुए 600 मरीजों का अध्ययन साल भर पहले शुरू किया था, और उसके निष्कर्षों की रपट को संसद में भेजा जा चुका है । राय स्पष्ट है की सीलिकोसिस का कोई भी उपचार नहीं है । लेकिन फिर भी बिमारियों के लक्षणानुसार उनपर नियन्त्रण रखा जा सकता है ।

“यहाँ पर इस समस्या का कोई चिकित्सीय हल नहीं है जब तक की धूल के कणों को फेफ़ड़े में जाने से नहीं रोका जाएगा” डॉ. नारोलिया बताते हैं “मै खुद स्वास्थ्य मंत्री के साथ कारखानों में गया था और उन्हें बताया की सिलिकोन की धुल किस तरह सिलकोसिस के लिए खरतनाक है” वे बोले यह बहूत ही हल्की होती है और कोयले की खान की धुल की तरह उड़ती है जो इसकी अपेक्षा भरी एवं जमीन पर गिर जाती है जबकि सिलिकोन की धुल उड़कर फेफड़ों तक पहुँच जाती है और सिलिका के धब्बे बनती है । इससे फेफड़ों की लोच का कम करती है और इसके, कारण तन्तूशोध का निर्माण हो जाती है मरीज को पूरी मात्रा में प्राण वायु नहीं मिलती, इस तरह छाती के रोगों का विकास होने लगता है । जैसे – तपेदिक आदि । यदि सिलकोन धब्बे ज्यादा बड़े होते हैं ( जो कि एक्सरे में स्पष्ट दीखते हैं ) तो व्यक्ति की दम घुटकर मृत्यु जो सकती है सिलिकोसिस का कोई उपचार नहीं है लेकिन उसके द्वितीयक संक्रमणों जैसे निमोनिया आकी जांचे जा सकते हैं ।

निष्कर्षत: एक बात कही जा सकती है कि बाल श्रम का महापाप अपने आप में खतरे का सूचक हो गया है और इसके साथ ही कार्यरत बच्चों के महाशोषण के भरे घड़े का प्रकटाव है । उस देश में, जहाँ करोड़ों व्यस्क लोग बेरोजगार हैं ( जो कोई भी काम करने को तैयार हैं ) वहाँ बच्चों को काम पर क्यों लगाया जाता है या उन्हें प्राथमिकता दी जाती है ?

इस तथ्य की वास्तविकता यह है की दो आयु समूहों के बीच में कदा मुकाबला है । जो की सीमित एवं रोजगार बाजार में सरकते रोजगार अवसरों की कृपा का फल है । जो की उन बच्चों या उनके माता- पिताओं को लम्बे समयों के लिए श्रम करने को बाध्य करता है । यह परस्पर विरोधी तथ्य, जहाँ एक ओर उनकी मजदूरी दर को घटाता है, वहीं वयस्कों के लिए रोजगार के अवसरों को भी कम करता है ।

विद्यमान बाल श्रम के चाहे कुछ भी परिणाम हो पर यह मुद्दा न केवल बच्चों के स्वंय के लिए व्यापक ध्यान देने योग्य है ; बल्कि माता-पिता, समाज तथा देश के लिए भी संवेदनशील मुद्दा है ।

सभी तरह के सर्वेक्षण से यही बात निकलकर आती है कि ज्यादातर कार्यरत बच्चे गरीब परिवारों से होते हैं और उनकी कमाई परिवार के लिए सम्पूरक सिद्ध होती है । बच्चों के रोजगार पर काम करने वाले समूह ने सालों पहले कहा था, “ ख़राब आर्थिक दशाएं व्यापक रूप से भरी जनसंख्या का एक भाग है और परिवारों की भरी मात्रा में निर्भरता एक अनिवर्यता है जो जीवन यापन का शुद्ध कारण है खासकर उन सदस्यों की कमाई पर जो जिन्दगी की शूरूआत में कर सकते हैं ।

किसी भी काम धंधे में, चाहे वह समय का या आधे समय का, एक बच्चे के श्रम को प्रयोग करने का सीधा अर्थ है कि बच्चे के बचपन का पूरा या आधा हनन । उसे अपनी खुशीयों एवं उन्मुक्त जिन्दगी से जुदा नहीं किया जाना चाहिये, बल्कि शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए भी अवसर दिए जाने चाहिए । बचपन में शुरू हूआ यह अन्याय बच्चे के सारे जीवन को न केवल सीमित कर देता है; बल्कि व्यस्क होने तक झंझोड़ते रहता है । क्या हम सब केवल एक दर्शक ही बने रहेंगे ?

स्रोत : हमराही, वारंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया ।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत सरकार को चेतावनी अधिसूचना

सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार तथा दिल्ली, राजस्थान, बिहार एवं मध्य प्रदेश की सरकारों को जनहित में दायर याचिकाओं के हित में यह नोटिस जारी किया है कि बच्चों से दिन में यदि जबरन 18-20 घंटे काम कराया जाए तो वह बन्धूआ मजदूर मन जाएगा ।

डिविजन बेंच दे न्यायाधीश कुलदीप सिंह तथा न्यायाधीश के. एस. परिपूर्णनन ने श्रम, गृह तथा मानव संसाधन मंत्रालयों के मंत्रियों का नोटिस जारी किया ।

याचिका दायरकर्ता अमन हिंगोरानी उसी न्यायलय के कार्यरत एक वकील हैं, जिन्होंने पिछले वर्ष 5 दिसम्बर के इन्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित आलेख के आधार पर याचिका दायर की । उन्होंने यह बताया की दिल्ली (राजधानी) क्षेत्र में लघु उद्योग के अंतर्गत हजारों बाल श्रमिक बन्धूआ मजदूरों के रूप में काम कर रहे हैं । श्री हिंगोरानी ने अख़बार के आलेख के आधार पर बताया कि यह बच्चे बिहार, मद्य प्रदेश व राजस्थान के निम्न मध्य तबके से दो से तीन हजार रूपए में उनके माता- पिता से खरीद लाए जाते हैं । उन्होंने आगे यह भी बताया की ये बच्चे रोजाना बीसियों घंटों तक काम के लिए मजबूर किए जाते हैं । जिन्हें इस बदले में सप्ताह में केवल 10 रूपए तथा दिन में दो बार सादे चावल का भोजन दिया जाता है ।

याचिका दयारकर्ता ने बताया कि ये ज्यादातर बच्चे कढ़ाई गीरी (कसीदाकारी) एवं धातु के कामों में लगाया जाते हैं, जो कि निर्यात बाजार के द्वारा करोड़ो रूपए कमाते हैं । लेकिन उन्हें स्वंय इस चमक-दमक के व्यापार में रत्तीभर भी हाथ नहीं लगती है ।

श्री हिंगोरानी ने बताया कि बच्चों का शोषण उनके माता-पिता की आर्थिक बदहाली के कारण है और शिक्षा से बंचना तथा संविधान प्रदत्त मूलभूत अधिकारों के पाने से वंचित होते हैं । इससे बन्धूआ मजदूर अधिनियम 1976 का उल्लंघन भी होता है।

याचिका दयारकर्ता न्यायलय से यह प्रार्थना करता है कि बच्चों को बन्धूआ मजदूरी से मुक्त किए जाने दे निर्देश जारी करें साथ ही संबंधित राज्य सरकारों को निर्देश दें कि वे गरीब बच्चे के पुर्नस्थापन के जरूरी कदम उठाएं व योजनाएँ चलाकर उन्हें कार्यान्वित करें । याचिकाकर्ता ने मजदूर दलालों एवं लघु कारखाना मालिकों पर भी उचित कार्यवाही की मांग की जो इन बच्चों से काम कराते हैं । उन्होंने यह भी मांग रखी कि केंद्र सरकार सभी राज्यों में यह सर्वेक्षण कराएँ की कितने बच्चे बन्धूआ श्रमिकों के रूप में कार्यरत हैं और वे उनके पुर्नवास के लिए एक योजना भी शामिल करें ।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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Rajiv May 10, 2017 08:24 PM

Kis ki kya majburi h, ye kaanun banane wale kya jane.. . Sacchai dekhni h toh aao mere pass, dikhata hu ki kyu Maa-बाप Bacche se kaam krwate h.. ..

अवधेश chauhan Apr 10, 2017 03:22 AM

बालमजदूरी अभिशाप नहीं बरदान साबित हो सकती है यदि सरकार इन दिशाहीन बच्चो को स्तरीय रोजगार प्रश्चिण की १८ वर्ष तक पूरा कराया तो वास्तव में बालमजदूरी को घटाया जा सकता है .

नवरन्गी यादव Jan 29, 2017 10:17 AM

बाल श्रम किसी भी क्षेत्र में गलत है

किमी Jan 12, 2017 06:10 PM

मुझे इस का उत्तर नाह मिला की बाल मज़दूरी को रोने के लिए कई गए सरकारी और गैरसरकारी प्रयास

क्या करोगे जानकर Dec 11, 2016 03:55 PM

बिलकुल बकवास है ये मत खोलो ये साइट पछताओगे तुम I

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