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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बाल अधिकारों के संरक्षण और उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफारिश की है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

बाल अधिकार संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीपीसीआर) सार्वभौमिकता और बाल अधिकारों की पवित्रता के सिद्धांत पर जोरराष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण देता है और देश की नीतियों संबंधित सभी बच्चे में तात्कालिकता के स्वर को पहचानता है। आयोग के लिए, 0 से 18 वर्ष आयु समूह के सभी बच्चों की सुरक्षा को समान महत्व का है। आयोग के लिए, बच्चे को भी आनंद मिलता है हर सही पारस्परिक रूप से मजबूत और दूसरे पर आश्रित के रूप में देखा जाता है। इसलिए अधिकार के उन्नयन का मुद्दा ही नहीं उठता। उसे 18 साल में उसके सभी अधिकारों का आनंद ले रहे एक बच्चे को वह पैदा होता है समय से उसके सारे हकों के लिए उपयोग पर निर्भर है। इस प्रकार की नीतियों उपायों सभी चरणों में महत्व ग्रहण. आयोग के लिए, बच्चों के सभी अधिकार बराबर महत्व के हैं।

जनादेश

बाल मजदूरी उन्मूलन हेतु आयोग की रणनीति व सिफारिशें

शारीरिक दंड पर प्रतिबंध अधिनियम के अंतर्गत आयोग के निम्नलिखित दायित्व हैं :

(क) किसी विधि के अधीन बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए सुझाये गये उपायों की निगरानी व जांच करना जो उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए वर्तमान केंद्र सरकार को सुझाव देते हैं|

(ख) उन सभी कारकों की जांच करना जो आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा, दंगों, प्राकृतिक आपदा, घरेलू हिंसा, एचआईवी /एड्स, तस्करी, दुर्व्यवहार, यातना और शोषण, वेश्यावृत्ति और अश्लील साहित्य से प्रभावित बच्चों के खुशी के अधिकार व अवसर को कम करती है और उसके लिए उपचारात्मक उपायों का सुझाव देना|

(ग) ऐसे संकटग्रस्त, वंचित और हाशिये पर खड़े बच्चे जो बिना परिवार के रहते हों और कैदियों के बच्चों से संबंधित मामलों पर विचार करना और उसके लिए उपचारात्मक उपायों का सुझाव देना|

(घ) समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बाल अधिकार साक्षरता का प्रसार करना और बच्चों के लिए उपलब्ध सुरक्षोपाय के बारे में जागरूकता फैलाना|

(ङ) केन्द्र सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी सहित किसी भी संस्थान द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक संस्थान जहां बच्चों को हिरासत में या उपचार के उद्देश्य से या सुधार व संरक्षण के लिए रखा गया हो, वैसे बाल सुधार गृह या किसी अन्य स्थान पर जहाँ बच्चों का निवास हो या उससे जुड़ी संस्था का निरीक्षण करना|

(च) बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच कर ऐसे मामलों में कार्यवाही प्रारम्भ करना और निम्न मामलों में स्वतः संज्ञान लेना, जहाँ :

  • बाल अधिकारों का उल्लंघन व उपेक्षा होता हो
  • बच्चों के विकास और संरक्षण के लिए बनाये गये कानून का क्रियान्वयन नहीं किया गया हो बच्चों के कल्याण और उसे राहत प्रदान करने के लिए दिये गये नीति निर्णयों , दिशा-निर्देशों या निर्देश का अनुपालन नहीं किया जाता हो
  • जहाँ ऐसे मामले पूर्ण प्राधिकार के साथ उठाये गये हों
  • बाल अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय उपकरणों की आवधिक समीक्षा और मौजूदा नीतियों, कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों  का अध्ययन कर बच्चों के हित में उसे प्रभावी रूप से क्रियान्वित करने के लिए सिफारिश करना
  • बाल अधिकार पर बने अभिसमयों के अनुपालन का मूल्यांकन करने के लिए बाल अधिकार से जुड़े मौजूदा कानून, नीति एवं प्रचलन या व्यवहार का विश्लेषण व मूल्यांकन करना और नीति के किसी भी पहलू पर जाँच कर प्रतिवेदन देना जो बच्चों को प्रभावित कर रहा हो और उसके समाधान के लिए नये नियम बनाने का सुक्षाव देना
  • सरकारी विभागों और संस्थाओं में कार्य के दौरान व स्थल पर बच्चों के विचारों के सम्मान को बढ़ावा देना और उसे गंभीरता से लेना
  • बाल अधिकारों के बारे में सूचना उत्पन्न करना और उसका प्रचार-प्रसार करना
  • बच्चों से जुड़े आँकड़े का विश्लेषण व संकलन करना
  • बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और बच्चों की देखभाल करने वाले प्रशिक्षण कर्मियों के प्रशिक्षण पुस्तिका में बाल अधिकार को बढ़ावा देना और उसे शामिल करना

संरचना

केन्द्र सरकार द्वारा आयोग में निम्न सदस्यों को तीन वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त किया जाएगा :

  • अध्यक्ष, जिसने बाल कल्याण को बढ़ावा देने के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया हो
  • छह अन्य सदस्य जिन्हें शिक्षा, बाल स्वास्थ्य, देखभाल, कल्याण, विकास, बाल न्याय, हाशिये पर पड़े उपेक्षित, अपंग व परित्यक्त बच्चों की देखभाल या बाल श्रम उन्मूलन, बाल मनोविज्ञान और कानून के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल हो
  • सदस्य सचिव, जो संयुक्त सचिव स्तर के समकक्ष होगा या उसके नीचे स्तर का नहीं होगा

शक्तियाँ

आयोग को निम्न मामलों में सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी -
(क) देश के किसी भी हिस्से के किसी भी व्यक्ति को सुनवाई के लिए आयोग के समक्ष उपस्थित होने के लिए आदेश देना, उसे लागू करवाना और शपथ का परीक्षण करना
(ख) किसी भी दस्तावेज की खोज व प्रस्तुति के लिए आदेश देना
(ग) हलफनामा पर साक्ष्य प्राप्त करना
(घ) किसी भी अदालत के कार्यालय से सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रति प्राप्त करना
(ङ) दस्तावेज के गवाह की जाँच के लिए आयोग का गठन करना

शिकायत प्रणाली

आयोग का एक प्रमुख जनादेश बाल अधिकार के उल्लंघन संबंधी शिकायत की जाँच करना है। आयोग के लिए यह भी जरूरी है कि वह बाल अधिकारों के गंभीर उल्लंघन की स्थिति में वह स्वतः संज्ञान लेकर मामले की जांच करें कि कौन से तत्व बच्चों को उनके  अधिकारों का आनंद उठाने से रोक रही है।

(क) आयोग के समक्ष वह शिकायत संविधान की 8 वीं अनुसूची में वर्णित किसी भी भाषा में की जा सकती है
(ख) इस प्रकार की शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा
(ग) शिकायत में मामले का पूर्ण विवरण शामिल होगा
(घ) यदि आयोग जरूरी समझे तो अन्य जानकारी / हलफनामा दाखिल करने के लिए कह सकती है

शिकायत करते समय यह सुनिश्चित कर लें कि उसमें निम्न चीजें स्पष्ट हों :
(क) शिकायत स्पष्ट और सुपाठ्य हो तथा किसी छद्म नाम से दाखिल नहीं किया गया हो
(ख) वैसे शिकायत के लिए कोई शुल्क नहीं लिया गया हो
(ग) जो मुद्दा उठाया हो वह संपत्ति के अधिकार व संविदा दायित्वों जैसे सिविल विवाद से जुड़ा हुआ नहीं हो
(घ) उठाया गया मुद्दा सेवा मुद्दों से संबंधित नहीं हों
(ङ) वह मामला संविधान के अंतर्गत गठित किसी आयोग या उसके अधीन कार्यरत किसी प्राधिकार के समक्ष लम्बित नहीं हो
(च) मामले का किसी आयोग द्वारा पहले ही निष्पादन नहीं कर दिया गया हो
(छ) किसी अन्य आधार पर आयोग के क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं हो

सभी शिकायतें व्यक्तिगत रूप से, डाक से या किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से निम्न पते पर भेजा जा सकता है-

सम्पर्क

नाम व पदनाम

फोन नंबर

ई-मेल पता

श्रीमती कुशल सिंह, अध्यक्ष

011 - 23478203 , 23731583

Cp.ncpcr@nic.in

श्री अशीम श्रीवास्तव, सदस्य सचिव

23724020

ms.ncpcr@nic.in

श्री अनुपम मिश्रा, निदेशक

23724023 , 23478214

director.ncpcr@nic.in


ई.पी.बी.एक्स

23731583



 


 

बाल श्रम उन्मूलन हेतु न्यायपालिका

बच्चों के हित में बाल गृहों के स्वरूप में परिवर्तन

Judiciary to eradicate child laborवर्तमान में हमारे देश में कई बाल गृह बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के सामान्य मानक पूरे करने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। लेकिन उचित हस्तक्षेप द्वारा, इन गृहों के बच्चों और स्टाफ का जीवन बदल सकता है और इसका उचित तरीके से प्रदर्शन झारखण्ड में रांची के पास हटिया में किया गया। बच्चों के लिए निर्मित इस गृह में खोये हुए बच्चों के अलावा, शारीरिक तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित युवा महिलाओं, कानून का उल्लंघन करने वाली लड़कियों तथा अपने प्रेमियों के साथ भाग जाने वाली नाबालिग लड़कियों को इकट्ठा करने की जगह बन गयी थी।

इस ‘गृह’ में, जो कि सन 1981 से एक कारागृह का विस्तारित हिस्सा था, उन्हें जीवित रखने मात्र के लिए आवश्यक न्यूनतम वस्तुएं ही दी जाती थी। इनमें से कई बच्चियां इन्हीं कोठरियों में बड़ी हो गयीं। प्रति वर्ष और अधिक बच्चियां आती गयीं और वे पूर्व की तरह दयनीय अवस्था में ही रहीं।

लेकिन, स्वयंसेवकों के प्रशंसनीय प्रयासों के चलते और न्यायपालिका के हस्तक्षेप से, छः महीनों में उनके जीवन में चमत्कारिक बदलाव आया। न्यूनतम मानक लागू किये गये और देखभाल की सुविधा से विहीन इस बाल सुधर गृह में देखते ही देखते 60 मुस्कुराती हुई महिलाओं और बच्चों के समूह में परिवर्तित हो गये, जिन्हें महसूस हुआ कि कहीं लोग थे जो उनकी चिंता करते थे।

यह सब 2005 में स्वयंसेवकों के एक हस्तक्षेप से आरम्भ हुआ जिन्होंने पाया कि भौतिक ढाँचा दयनीय अवस्था में था। कोठरीनुमा कमरों में हवा आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी तथा बच्चों को अधिकांश समय ताले में बन्द कर रखा जाता था। नियमित जल प्रदाय की कोई व्यवस्था नहीं थी, भोजन घटिया और अपर्याप्त था। शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण की कोई सुविधा नहीं थी और बच्चों का उनके परिवारों से मिलन कराने के कोई प्रयास नहीं किये गये थे। स्वास्थ्य देखभाल घटिया थी और असामान्य-समर्थताओं वाले बच्चों के लिए देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं थी।

यहाँ का स्टाफ बाल न्याय कानून और नियमों की जानकारी से अनभिज्ञ था और बच्चों की देखभाल के लिए कोई योजना नहीं थी। यह भी पाया गया था कि स्टाफ को समय पर वेतन नहीं मिलता था और वे अपना काम, रहने वालों को न्यूनतम वस्तुएं देकर चलाते थे। ये स्थितियां झारखंड उच्च न्यायालय की जानकारी में लायी गयीं और प्रणाली में शामिल लोगो को नियमों के लागूकरण के तरीकों की जानकारी देने के लिए एक सेमिनार आयोजित किया गया। न्यायपालिका की मदद से, इस विषय पर बैठकें आयोजित की गईं कि, ‘झारखंड के गृहों की स्थिति कैसे सुधारी जाये’? मुख्यमंत्री से सम्पर्क किया गया और उन्हें बच्चों की आवश्यकता से अवगत कराया गया।

बच्चों को हटिया स्थित संस्थान से रांची के नामकुम में महिला हॉस्टल में उसके जीर्णोद्धार के बाद स्थानांतरित किया गया। न्यायपालिका के साथ-साथ स्वयंसेवकों ने यह सुनिश्चित किया कि न्यूनतम मानक लागू किये जाएं। कार्यपालिका, ज़िला न्यायपालिका और उच्च न्यायालय के सहयोग से कई बच्चों का उनके माता-पिता से मिलन कराया गया। औपचारिक शिक्षा आरम्भ की गयी और बच्चों को नियमित स्कूल में डालने से पहले एक सेतु-पाठ्यक्रम कराया गया। विशेष बच्चों को एक गैर सरकारी संगठन, दीपशिखा द्वारा चलाये जा रहे एक विशेष स्कूल में भर्ती कराया गया। उन्हें स्वास्थ्य देखभाल प्रदान की गयी और व्यावसायिक प्रशिक्षण नियमित किया गया। अब इस गृह को नामकुम महिला परख गृह कहा जाता है और यहां रहने वाले अब सिर्फ अस्तित्व में होने की बजाय ‘जीवन जीते’ हैं।

सहयोग के उच्चतर स्तर के साथ स्टाफ ने अपने आपको एक ध्यान रखने वाले समूह में परिवर्तित कर लिया है, जिसे कभी-कभी और पुनः प्रोत्साहन और प्रेरणा की आवश्यकता होती है। कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों के लिये पूछताछ की प्रक्रिया को तीव्रतर करने में कानूनी मदद प्रदान करने और बाल अदालतों के आयोजन के लिये झारखंड कानूनी सेवा प्राधिकरण ने बहुत मदद की।

हटिया की यह गाथा इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करती है कि बच्चों के अधिकारों के लिये स्थानीय समुदाय के साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका किस तरह साथ मिलकर काम कर सकती हैं।

* रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश बनाने हेतु बाल-अधिकारों की रक्षा के क्षेत्र में सक्रिय लोगों तथा विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के साथ कई बैठकें की हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) सदस्य संध्या बजाज की अध्यक्षता में हुई बैठकों में इन बच्चों की विभिन्न समस्याओं पर विचार-विमर्श किया गया, जैसे नशीली दवाओं का सेवन, रेलवे पुलिस फोर्स (RPF) द्वारा शारीरिक दुर्व्यवहार, आश्रय का अभाव, पहचान तथा पुनर्वास की समस्याएं, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं का अभाव तथा एड्स का खतरा।

गत वर्ष अक्तूबर एवं नवम्बर में 25 से अधिक गैर सरकारी संस्थाओं तथा स्वयं रेलवे के बच्चों के साथ बैठकें की गईं। गैर सरकारी संस्थाओं में साथी, अनुभव, प्रोजेक्ट कंसर्न इन्टरनेशनल, डेल्ही ब्रदरहुड सोसायटी, चेतना, सलाम बालक ट्रस्ट, एक्शन एड, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, चाइल्ड इंडिया फ़ाउण्डेशन तथा चाइल्ड राइट्स फोरम शामिल थे।

इन बैठकों से कई सुझाव उभर कर सामने आए। बजाज के अनुसार, रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चों के अधिकारों के रक्षा पर, आयोजित होने वाले राष्ट्रीय कार्यशाला में बताया जाएगा। उसके बाद, रेलवे अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।

सुझाव:

  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर सफेद द्रव की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाया जाए क्योंकि बच्चों में इस पदार्थ का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है।
  • रेलवे अधिकारियों को रेलवे प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी स्वीकार करना चाहिए।
  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर शारीरिक तथा सेक्स दुर्व्यवहार के शिकार बच्चों को त्वरित रूप से मेडिकल उपचार की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए।
  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर बच्चों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा जाना चाहिए।
  • कचरा बीनने वाले बच्चों के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए क्योंकि वे रेलवे स्टेशन से प्लास्टिक हटाकर पर्यावरण की रक्षा करते हैं।
  • रेलवे सुरक्षा बल द्वारा रेलवे प्लेटफॉर्म पर बच्चों की रक्षा कर रहे गैर सरकारी संस्थाओं को पहचान पत्र जारी किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा रेलवे सुरक्षा बल को परिपत्र जारी कर इन बच्चों के अधिकार के बारे में सूचित करना चाहिए।
  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर विस्थापित एवं गुमशुदा बच्चों संबंधी जानकारी प्रदान करने के लिए एक केंद्रीय शिकायत प्रणाली होनी चाहिए।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा इससे संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक केंद्रीकृत डाटाबेस तैयार किया जाना चाहिए।
  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर विस्थापित, गुमशुदा तथा दुर्व्यवहार के शिकार बच्चों के लिए 10 मिनट के भीतर तेज़ तथा त्वरित प्रोटोकोल होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा त्वरित हस्तक्षेप प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
  • रेलवे स्टेशन के नज़दीक एक बाल कल्याण समिति (CWC) स्थित होनी चाहिए।
  • बाल आश्रय गृह, जेल के सामान नहीं होने चाहिए, उनमें पुनर्वासित बच्चों के लिए स्वस्थ वातावरण एवं उपचार का घरेलू वातावरण होना चाहिए।
  • बाल आश्रय गृहों की कार्यप्रणाली का पुनरावलोकन किया जाना चाहिए तथा एक सामाजिक लेखा परीक्षण किया जाना चाहिए।
  • रेलवे प्लेटफॉर्म पर विस्थापित, गुमशुदा तथा शारीरिक दुर्व्यवहार के शिकार बच्चों के लिए पुनर्वास केन्द्रों तथा आश्रय गृहों के लिए कार्य कर रहे गैर सरकारी संस्थाओं के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा एक सामाजिक लेखा परीक्षण प्रक्रिया बनाना चाहिए।

* बाल मजदूरी उन्मूलन हेतु आयोग की रणनीति व सिफारिशें

instructions for the elimination of child labor

१. बच्चों के अधिकार पत्र

वह सभी व्यक्ति एक बच्चा है जो 18 वर्ष से कम आयु का है। अभिभावकों की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के पोषण और विकास कार्य पर ध्यान दें। राज्य बच्चों के अधिकार का सम्मान करेगी और उसे सुनिश्चित कराएगी।

प्रतिष्ठा व अभिव्यक्ति

  • मुझे अपने अधिकार के बारे में जानने का अधिकार है। (अनुच्छेद-42)
  • मुझे एक बच्चा होने का अधिकार है। इसके लिए यह बात मायने नहीं रखता कि मैं कौन हूँ, कहाँ रहता हूँ, मेरे माता-पिता क्या करते हैं, मैं कौन सी भाषा बोलता हूँ, मैं किस धर्म का पालन करता हूँ, मैं एक लड़का हूँ या एक लड़की, मैं किस संस्कृति का पालन करता हूँ, चाहे मैं अपंग हूँ और मैं एक अमीर या गरीब बच्चा हूँ। इन आधारों पर मेरे साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।  प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह इसे जानें। (अनुच्छेद- 2)
  • मुझे अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करने का अधिकार है जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए, और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह दूसरे व्यक्ति को ध्यान से सुनें। (अनुच्छेद- 12 व 13)
  • मुझे गलती करने का अधिकार है और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि उसे स्वीकार करें। हमलोग अपनी गलतियों से सीख सकते हैं। (अनुच्छेद- 28)
  • मुझे अधिकार है कि मेरी क्षमता कुछ भी होने के बावजूद मुझे शामिल किया जाए और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि वह दूसरे व्यक्ति (भले ही उसकी क्षमता उसके समान नहीं हो) उसका सम्मान करें। (अनुच्छेद- 23)

विकास

  • मुझे अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है और सबकी जिम्मेदारी है कि वह बच्चे को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करें। (अनुच्छेद- 23, 28 व 29)
  • मुझे स्वस्थ रहने का अधिकार है और सभी की जिम्मेदारी है कि वह दूसरों को आधारभूत स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने व स्वच्छ जल प्राप्त करने में मदद करें। (अनुच्छेद- 24)
  • मुझे भरपेट भोजन पाने का अधिकार है और सभी की जिम्मेदारी है कि वे लोगों की भूख से रक्षा करें। (अनुच्छेद- 24)
  • मुझे पर्यावरण को स्वच्छ रखने का अधिकार है और सबकी जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण को दूषित नहीं करें। (अनुच्छेद- 29)
  • मुझे खेलने और आराम करने का अधिकार है (अनुच्छेद 31)

देखभाल और संरक्षण

  • मुझे प्यार या स्नेह पाने और खतरों व शोषण से सुरक्षा पाने का अधिकार है और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि वह दूसरों को प्यार दें व उसकी देखभाल करें। (अनुच्छेद-19)
  • मुझे अपने परिवार में रहने और सुरक्षित व आरामदायक घर पाने का अधिकार है और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी बच्चों को का अपना परिवार और एक घर हो। (अनुच्छेद- 9 व 27)
  • मुझे अपने विरासत और विश्वासों पर गर्व करने का अधिकार है और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह दूसरे की विरासत व विश्वास का सम्मान करें। (अनुच्छेद- 29 व 30)
  • मुझे बिना हिंसा और शारीरिक दंड (मौखिक, शारीरिक व भावनात्मक) के रहने का अधिकार है और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि वह दूसरों के साथ हिंसात्मक व्यवहार न करें। (अनुच्छेद- 2, 28, 37 व 39)
  • मुझे यौन और आर्थिक शोषण से सुरक्षा पाने का अधिकार है और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करें कि किसी बच्चे को बाल मजदूरी नहीं करनी पड़े और उसे एक स्वतंत्र और सुरक्षित माहौल उपलब्ध हों। (अनुच्छेद- 32 व 34)
  • मुझे सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा पाने का अधिकार है और सभी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि मेरा उपयोग किसी लाभ के लिए नहीं किया जाए। (अनुच्छेद-36)

बच्चों को प्रभावित करने वाले सभी गतिविधियों में बच्चों के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी जाएगी ।

  • ये सभी बाल अधिकार और जिम्मेदारियाँ, संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार पर 1989 में हुए सम्मेलन में स्वीकार किये गये थे।
  • इसमें दुनियाभर के सभी बच्चों के लिए स्वीकृत अधिकार को शामिल किया गया है और भारत सरकार ने इस दस्तावेज पर 1992 में हस्ताक्षर किए।

बाल अधिकारों के महत्वपूर्ण संरक्षक के रूप में पंचायत

Panchayat as important patron of Child Rightsजब चिन्नासोलिपेट गांव के नरसिंह राव ने आंध्रप्रदेश के रंगारेड्डी जिले के शब्द मंडल के सरपंच का कार्यभार संभाला, तो सबसे पहली बात जो उन्होंने महसूस की, वो यह कि विद्यालयों का इस्तेमाल शादियों, समारोहों तथा शिक्षा के अलावा अन्यान्य कार्यों हेतु किया जा रहा है। राव ने विद्यालयों की सफाई करवाई, विद्यालय परिसर में पेयजल तथा स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध करवाई और यह सुनिश्चित करवाया कि इन सुविधाओं का उपयोग केवल बच्चों की शिक्षा तथा उनके पाठ्येतर क्रियाकलापों हेतु किया जाए। इसके बाद, हर महीने बैठक करने वाली एक शिक्षा समिति का गठन गांव के युवाओं तथा ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों को मिलाकर किया गया ताकि, अपने क्षेत्र में वे बच्चों की शिक्षा का ध्यान रख सकें।

एनसीपीसीआर तथा पंचायती राज मंत्रालय द्वारा पंचायती राज संस्थाओं तथा बाल अधिकार के एक अधिवेशन में कुछ पंचायतों के बेहतरीन कार्यों का उल्लेख किया गया। बाल अधिकारों की निगरानी और उनके संरक्षण में पंचायतों की भूमिका के महत्व को, वर्तमान में बच्चों द्वारा सामना की जा रही भारी चुनौतियों के संदर्भ में रेखांकित किया गया।

पंचायती राज मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव राजवंत संधु द्वारा भारत जैसे देश में जहां बच्चों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की भारी कमी है, ग्रामीण क्षेत्रों के 30 करोड़ बच्चों की स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए, इस चुनौती की व्यापकता को रेखांकित किया गया। उनके अनुसार, साथ ही गुणवत्तायुक्त शिक्षा तक पहुंच कठिन है, बड़ी संख्या में लोग रोजाना दो वक्त भरपेट भोजन से भी वंचित हैं।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हाल में जारी की गई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार भारत में 47% बच्चे कुपोषित हैं।

अधिवेशन से यह तथ्य उजागर हुआ कि जहां कहीं भी पंचायती राज संस्थाओं ने बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु कदम उठाए वहां शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बच्चों के अवैध व्यापार जैसे विकास सूचकांकों में जोरदार सुधार देखने को मिला। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए पूर्व केन्द्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने अधिवेशन के उदघाटन भाषण में कहा था कि बाल अधिकारों के संदर्भ में सरकार द्वारा अब ठोस पहल करने हेतु पंचायतों का सशक्तिकरण करने की आवश्यकता है। “पंचायती राज संस्थाओं तथा अन्य निर्वाचित संस्थाओं में बाल अधिकारों को संस्थागत रूप देने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा पंचायतों को कार्यभार, वित्त तथा कार्यकर्ता उपलब्ध कराए जाने चाहिए, उन्होंने कहा था।

बाल अधिकारों के संरक्षण के रूप में पंचायतों की प्रभावी भूमिका का वर्णन करते हुए शब्द मंडल ग्राम पंचायत ने एक स्वास्थ्य समिति की स्थापना भी की है जो आंगनबाड़ियों, बच्चों की पोषकीय स्थिति, एएनएम के कार्य, प्रतिरक्षण प्रदान करने तथा विटामिन पूरक के साथ-साथ संबद्ध विषयों का पर्यवेक्षण करेगी।

राव गर्व से कहते हैं कि बाल अधिकारों का पंचायत का एक मुख्य कार्य बन जाने से शब्द मंडल में बाल श्रम पूरी तरह समाप्त हो गया है।

मेघालय में पंचायती राज संस्थाओं द्वारा उनके गाँवों से बच्चों के गुम होने की 132 घटनाएं प्रकाश में लाई गई हैं जबकि इसकी सूचना न पुलिस को थी न अदालत को। इन घटनाओं की अब मादक पदार्थ और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र संगठन की मानव व्यापार विरोधी शाखा द्वारा जांच की जा रही है।

राव देश भर के उन 600 ग्राम पंचायतों के एक प्रतिनिधि सदस्य हैं जिनके बाल अधिकारों के कार्य पर एनसीपीसीआर द्वारा विशेष बल दिया गया है। वास्तव में, एनसीपीसीआर के अध्यक्ष ने यह कहा कि बाल अधिकारों की समझ रखने वाली ये 600 ग्राम पंचायत, जिन्होंने अपने सरोकार प्रदर्शित करने हेतु तथा बाल अधिकारों से संबंधित संस्थाओं के कार्य की निगरानी हेतु तंत्रों की स्थापना की है, देश के अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के लिए संसाधन स्रोत की भूमिका निभा सकते हैं।

बाल अधिकारों के विभिन्न मुद्दों को अंगीकृत करने में पंचायती राज संस्थाओं की मदद करने हेतु, बैंगलोर के बाल अधिकार ट्रस्ट ने, उदाहरण स्वरूप, ग्रामीण विकास तथा पंचायती राज विभाग की मदद से विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया। ट्रस्ट के वासुदेव शर्मा कहते हैं कि कर्नाटक का पंचायत अधिनियम ग्राम पंचायत, कुपोषण तथा अन्य बाल मुद्दों पर बेहतर कार्यों के लिए पीआरआइ को प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानता है। उनका मानना है कि स्पष्ट रूप से बाल कल्याण के लिए स्थानीय स्वशासन ही जिम्मेदार हैं। 350 पंचायतों में काम रहे एसईडीटी, पुणे के सूर्यकांत कुलकर्णी का कहना है, “ग्राम पंचायतों ने पहले ही ग्रामीण समितियां गठित कर रखी हैं, जिनको स्पष्ट वैधानिक अधिकार दिए गए हैं, अतः बाल अधिकार के कार्य को इन निकायों के जरिए प्रस्तुत करना हमारे लिए आसान हो जाता है।”

निर्वाचित प्रतिनिधियों के बाल अधिकारों के प्रशिक्षण से पहले उनमें स्थानीय स्तर के बाल-आंकड़ों को इकट्ठा करने तथा उनके विश्लेषण के महत्व की जागरूकता लाने से शुरुआत होती है, जैसे जन्म रजिस्ट्रेशन, विवाह की उम्र, स्कूल जाने तथा बीच में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के विवरण, रोग प्रतिरक्षा तथा हेल्थ रिपोर्ट कार्ड आदि। स्कूल में बच्चों की उपस्थिति, स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग, यह सुनिश्चित करने में कि नरेगा जैसी योजनाओं में बच्चे शामिल नहीं है तथा मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए स्कूल की आहार संबंधी जरूरतों की पूर्ति की निगरानी में ग्राम पंचायतें अहम भूमिका निभा सकती हैं।

सम्मेलन में मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ ब्लॉक के हीरा गांव के सरपंच मिंथराम यादव का कहना था, “जब मैं सरपंच बना था, मैंने बच्चों की सुरक्षा की शपथ ली। मेरे गांव का भविष्य बाल कल्याण पर निर्भर करता है।” ग्रामीण भारत के 30 करोड़ बच्चों की बेहतर जिंदगी के लिए उनकी पंचायतें सर्वोत्तम योगदान दे सकती हैं।

पुनर्वास पैकेजों में बाल अधिकारों को शामिल किया जाएगा

Relocation packages will include child rightsएनसीपीसीआर ने प्रोजेक्ट प्रभावित परिवारों के पुनर्व्यवस्थापन एवं पुनर्वास की राष्ट्रीय नीति - २००३ तथा राष्ट्रीय पुनर्वास नीति - २००६ में बच्चों की आवश्यकताओं तथा अधिकारों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बदलाव के सुझाव दिए हैं | ग्रामीण विकास मंत्री श्री रघुवंश प्रसाद को दिए एक प्रत्र में एनसीपीसीआर की अध्यक्ष शांता सिंहा ने यह उल्लेख किया कि विकास कार्यक्रमों के साथ आपदा तथा संघर्षों से प्रभावित क्षेत्र में बच्चों के स्थानान्तरण की स्थिति की समीक्षा से यह पता चलता है कि अधिकतर पुनर्वास कार्यक्रम ऐसी बड़ी हानियों से बच्चों पर होने वाले प्रभाव को ध्यान में नहीं रखते।

प्रायः बच्चों को भूखा, कुपोषित, भोजन तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के बिना ही छोड़ दिया जाता है। उनके पुनःस्थापन वाले क्षेत्र के नए स्कूलों में दाखिला लेने के लिए उन्हें अपने स्कूलों से बिना किसी व्यवस्था के बाहर निकाल दिया जाता है। उनकी पहचान, दाखिला प्रक्रिया तथा स्थानांतरण प्रमाण पत्र की स्वीकृति की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं, विशेषकर तब जब उनके परिवार बगल के राज्यों में जा बसते हैं। अपने संबंधियों से बिछड़कर कई बच्चे बिना देखभाल तथा सुरक्षा के रह जाते हैं। आयोग यह भी चाहता है कि पुनर्वास के लिए संसदीय समिति के समक्ष एक प्रस्तुतिकरण रखा जाए जिसमें बाल अधिकार के महत्व को रेखांकित किया जाए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पुनर्वास नीति की प्रस्तावना में “विस्थापन से पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, तथा सुविधाओं की उपलब्धता के संदर्भ में बाल अधिकारों का उल्लंघन होता है”, शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नीति में ‘बच्चों पर पड़े प्रभाव का आकलन तथा उनके सभी अधिकारों की उपलब्धता के लिए सक्रिय प्रयास किया जाए। यह उम्र तथा लैंगिक आधार पर किया जाए।’

नीति के तहत अ.जा/अ.जजा समुदाय से संबंध रखने वाले बच्चों का खास ख्याल रखा जाना चाहिए तथा उनका नियमित स्कूल जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। आश्रम पाठशाला, हॉस्टल, आइसीडीएस, छात्रवृत्ति तथा बच्चों की अन्य अधिकारिता के कार्य अनिवार्य होने चाहिए। आयोग ने कहा कि सभी अधिकारों में अविवाहित बेटी को बेटे के समान दर्जा मिलना चाहिए, तथा स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्रों एवं आवश्यक हॉस्टलों की स्थापना के लिए पर्याप्त भूमि का अधिग्रहण किया जाना चाहिए। आयोग ने आगे कहा कि इन सेवाओं के संचालन के लिए नियुक्त कर्मचारी को भी सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।

आयोग का मानना है कि एनआरपी (राष्ट्रीय पुनर्वास नीति) की देख-रेख के लिए महिला तथा बाल विभाग, सामाजिक न्याय, श्रम तथा मानव संसाधन विकास विभाग को शामिल किया जाना चाहिए। एनआरपी में एक नई धारा का समावेश किया जा सकता है, जिससे प्रत्येक प्रभावित परिवार के बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण तथा शिक्षा की सूची (उम्र तथा लैंगिक आधार पर) तैयार करने के लिए एक सर्वे सपन्न करवाना अनिवार्य हो जाए। सर्वे में स्कूली शिक्षा के विवरण, खास कर बच्चा जिस कक्षा में पढ़ रहा है उसका विवरण भी शामिल किया जाए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उनके शैक्षिक सत्र में कोई रुकावट न हो।

यह जिम्मेदारी पुनर्व्यवस्था के प्रशासक की होगी कि वह योजना में स्कूल, हॉस्टल, आइसीडीएस केंद्रों, सेतु-स्कूल की स्थापना को सुनिश्चित करे और इन निकायों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए।

आयोग ने कहा कि विस्थापन तथा पुनर्व्यवस्था वाले संक्रमण काल में जिन बच्चों को स्वास्थ्य, पोषण तथा शिक्षा का अधिकार प्राप्त न हो, उनके लिए स्कूल तथा आएसीडीएस की तात्कालिक व्यवस्था की जानी चाहिए। बाल अधिकार के सभी उल्लंघन तथा उनकी पूर्ति के लिए उठाए गए कदमों की समय–समय पर एनसीपीसीआर को रिपोर्ट सौंपी जाए।

बाल श्रम के उन्मूलन के लिए निशा-निर्देश

• बाल श्रम (निषेध तथा नियमन अधिनियम), 1986, बच्चों को 15 पेशों तथा 57 (अनुसूचित भाग- A तथा B) प्रक्रियाओं में काम करने से रोकता है। श्रम विभाग को नियोक्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज करना चाहिए तथा सभी संभावित नियोक्ताओं को कड़ी चेतावनी जारी करना चाहिए। यह चलंत श्रम अदालत के जरिए क्षेत्रवार किया जाना चाहिए तथा मामले दर्ज होने वाले नियोक्ताओं पर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए।
• देखभाल, सुरक्षा, विकास तथा वंचित बच्चों के पुनर्वास के लिए एक कल्याण कानून- किशोर न्याय अधिनियम, 2006 को लागू किया गया है, इसके अंतर्गत बाल श्रम भी शामिल है।

अनुच्छेद 2 (डी), (आइए) में ‘कामगार बच्चे’ शामिल हैं, जिसे ‘देखभाल तथा सुरक्षा की आवश्यकता वाला बालक’ माना गया है। किशोर न्याय अधिनियम २००६ के अनुच्छेद 2 (के) में ‘बच्चे’ को 18 साल से कम बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है। परिणामतः यह अधिनियम बाल श्रम अधिनियम से अधिक विस्तृत है, क्योंकि इस सभी 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सुरक्षा देता है तथा उसकी देखभाल करता है। जबकि बाल श्रम अधिनियम के अंतर्गत केवल 14 साल तक के बच्चों को ही शामिल किया गया है। दूसरे शब्दों में किशोर न्याय अधिनियम ऐसे बाल श्रम प्रावधानों को शामिल करता है जो बाल श्रम अधिनियम में शामिल नहीं है।

• बंधुआ मजदूरी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1976 को बच्चों से काम करवाने वाले नियोक्ताओं पर मामला दायर करने के लिए एक औजार के रूप में प्रयोग करना चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि अधिकतर बच्चे परिवार द्वारा लिए गए अग्रिम के एवज में काम करते हैं। ऐसे बच्चे प्रवासी बच्चों के रूप में भी काम करते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत निगरानी समिति को सक्रिय करना होगा तथा राजस्व तथा श्रम विभाग द्वारा कानून सख्ती से लागू करना होगा। यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इस अधिनियम के तहत मामला दायर करने के लिए उम्र का बंधन नही हैं, और इस बात के साक्ष्य को जुटाने की जिम्मेदारी और किसी प्रकार की अग्रिम राशि नहीं दी गई है, संबंधित नियोक्ता की है।

• इसके अलावा अनुबंधित श्रम (नियमन तथा उन्मूलन) अधिनियम 1970 को भी लागू किया जा सकता है ताकि ठेकेदारों द्वारा करवाए बाल श्रम के मामले में प्रमुख नियोक्ता पर मामला दर्ज किया जा सके। कई कंपनियों द्वारा जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसे कार्य किये जाते हैं। यह अधिनियम ‘प्रतिनियुक्त श्रम’ के सिद्धांत पर आधारित है तथा इसे कंपनियों तथा ठेकदारों को बाल श्रम करवाने से रोकने के लिए प्रभावशाली रूप से लागू किया जा सकता है।
उपरोक्त सभी अधिनियम साथ मिलकर बाल श्रम में शामिल अधिकतर बच्चों को समाहित करेंगे, जिनमें कृषि तथा सहायक कार्य भी शामिल हैं। सरकार या साझेदारों द्वारा संबंधित नियोक्ताओं पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए इनका प्रयोग एकल या सामूहिक रूप में किया जा सकता है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कानून के क्रियान्वयन द्वारा ही नियोक्ताओं पर बाल श्रम के मामले में रोक लगाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त बच्चे काम में इसलिए भी शामिल होते हैं कि वे सस्ते श्रम के स्रोत होते हैं तथा लंबे घंटों तक काम पर लगाए जा सकते हैं। ऐसे में बच्चों के हित में कुछ भी नहीं किया जाता बल्कि लागत कम करने के लिए नियोक्ता उनसे काम लेते हैं। वहीं सभी सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान, सरकारी उपक्रमों , सरकार द्वारा वित्तप्रदत्त संस्थान तथा सरकारी कर्मचारियों को एक आचार संहिता की घोषणा करनी चाहिए, ताकि नियोक्ता बच्चों को घरेलू कामों या अपने कार्य स्थलों पर किसी भी रूप में काम पर नहीं रख सकें। जिलाधिकारियों को एनसीपीसीआर द्वारा निर्देश दिए जाएं कि वे उपरोक्त सभी कार्यों को संपन्न करने के लिए विशेष कार्य योजना बनाएं।

* टीवी स्पॉटलाइट के अंतर्गत बच्चों की सुरक्षा

safety of children under TV Spotlight एनसीपीसीआर ने एक कार्यकारी समूह बनाया है जो टीवी कार्यक्रमों तथा विज्ञापनों में काम करने वाले बच्चों की जांच-पड़ताल करता है। इस समूह में पूर्व बाल कलाकार सचिन पिल्गांवकर तथा विज्ञापन निर्माता प्रह्लाद कक्कर के साथ प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है।

सदस्यों ने टीवी शो, रियलिटी शो तथा विज्ञापनों में चल रहे बाल श्रम उल्लंघन के नियमन की आवश्यकता पर विचार किया। एनसीपीसीआर की सदस्य संध्या बजाज ने बच्चों की कार्य दशाओं के नियमन के लिए एक दिशानिर्देश जारी करने का सुझाव दिया। सभी रियलिटी शो, जिनमें बच्चे भाग लेते हैं, उनके दैनिक कार्य तथा सालाना कार्य के घंटों को सुनिश्चित किया जाए।

बच्चों तथा उनके परिवारों द्वारा की गई शिकायतों की सुनवाई के लिए एक प्रणाली तैयार करने, बाल अधिकार के उल्लंघन के मामले में टीवी चैनल/निर्माता कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने; बाल अधिकारियों की सुरक्षा हेतु शो आयोजकों तथा माता-पिता की जिम्मेदारियों को परिभाषित करने; बच्चों के लिए भुगतान प्रणाली, जैसे शैक्षिक बॉन्ड/प्रमाणपत्र तथा दिशानिर्देशों की समीक्षा के लिए एक समीक्षा प्रणाली की स्थापना का निर्णय लिया गया।

यह कार्यकारी समूह अगली कार्रवाई के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों से मिलेगा।

शारीरिक दंड पर प्रतिबंध

* शारीरिक दंड पर प्रतिबंध

Ban on corporal punishmentमुट्ठी बंद करवाकर ऊपर से देर तक मारना, स्‍कूल के मैदान में दौड़ाना, घंटों तक घुटनों के बल बैठाए रखना, रूलर से मारना और चिकोटी काटना और थप्‍पड़ मारने को अक्‍सर शिक्षक ऐसे दंड के रूप में स्‍वीकार करते रहे हैं जिससे बच्‍चों को अनुशासित किया जा सकता है।

लेकिन क्‍या अनुशासन का यह रूप स्‍वीकार्य है। अभी हाल ही में गठित हुआ राष्‍ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग कहता है, नहीं। बच्‍चों के लिए शारीरिक दंड पर प्रतिबंध के सिलसिले में सन् 2000 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला राज्‍यों को स्‍वतंत्रता, सम्‍मान और भयमुक्‍त वातावरण में शिक्षा प्रदान करने की सुनिश्चितता का निर्देश देता है।

लेकिन बच्‍चों के अधिकार अनुशासन के नाम पर लगातार भंग किए जा रहे हैं। राजस्‍थान में एक शिक्षक द्वारा एक विद्यार्थी की पिटाई किए जाने के दो दिन बाद उसकी मौत हो गई। आंध्र प्रदेश में एक शिक्षक द्वारा स्‍कूल के प्रधानाचार्या के सहयोग से एक बच्‍चे को बिजली के करंट लगाने की बात सामने आई। आयोग महसूस करता है कि ये महज अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि बच्‍चों और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनहीनता और हिंसा की संस्‍कृति का प्रचार है।

राष्‍ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस समस्‍या से तुरंत निजात पाने के लिए सभी राज्‍यों के मुख्‍य सचिवों को उनके राज्‍यों में बच्‍चों पर हिंसा न होने देने को सुनिश्चित करने के लिए उनके शिक्षा विभागों को जल्‍द से जल्‍द कदम उठाने की बात लिखी है।

शारीरिक दंड के सभी रूप मानवाधिकार का बुनियादी उल्‍लंघन हैं। एक थप्‍पड़ सिर्फ थप्‍पड़ नहीं, वह बाल अधिकारों पर एक गंभीर चोट है। वास्‍तव में दंड की श्रेणियां नहीं बनाई जा सकती हैं क्‍योंकि जिन्‍हें मामूली दंड कहा जाता है, वे ही अक्‍सर भयानक उल्‍लंघन की श्रेणी में आ जाते हैं। यह कानूनन वर्जित भी होते हैं।

डर के चलते बच्‍चे शांत रहते हैं और अक्‍सर वे हिंसा का शिकार हो जाते हैं। अक्‍सर वे अपने व्‍यवहार के माध्‍यम से बुरी तरह आहत होने के संकेत देते हैं, लेकिन उन पर ध्‍यान नहीं दिया जाता जिससे वे भविष्‍य में भी हिंसा का शिकार होते रहते हैं। लेकिन, यदि हर स्‍कूल में एक पेटी हो, जिसमें बच्‍चे अपनी शिकायतें बिना नाम के दे सकें, तो यह रुक सकता है। इसलिए आयोग की सिफारिशों की प्राथमिकता में सभी स्‍कूलों में शिकायत पेटी लगवाना है।

आयोग बच्‍चों से मुट्ठी बंद करवाकर ऊपर से मारने, स्‍कूल के मैदान में दौड़ाने, घंटों तक घुटनों के बल बैठाए रखने, कई घंटों तक खड़े रखने, कुर्सी की तरह बैठाने, रूलर से मारने और चिकोटी काटने और थप्‍पड़ मारने को शारीरिक दंड में शामिल करता है। कक्षा में बच्‍चे को अकेले बंद करना और बिजली के करंट देना प्रताडि़त करने का मामला है। बाल यौन शोषण और भला-बुरा कहने, अपमानित करने और शारीरिक और मानसिक आघात पहुंचाने वाली सभी अन्‍य गतिविधियों की आयोग द्वारा निंदा की गई है। आयोग कहता है कि बच्‍चों को दंड से सुरक्षित करने की जिम्‍मेदारी शिक्षक और स्‍कूल प्रशासन पर है। आयोग शिक्षा विभागों को निर्देश देता है:

  • अभियानों के जरिए बच्‍चों को शारीरिक दंड के खिलाफ बोलने के अधिकार के बारे में बताना, इसे अधिकारियों के संज्ञान में लाने के प्रति जागरूकता पैदा करना।
  • स्‍कूल, हॉस्‍टल, किशोर न्‍याय गृह, शरण स्‍थल और अन्‍य सार्वजनिक संस्‍थानों में एक फोरम गठित करना जहां बच्‍चे अपने विचार रख सकें।
  • सभी स्‍कूलों में एक शिकायत पेटी लगाना।
  • हर माह में शिकायतों की समीक्षा और की गई कार्रवाई के लिए ग्रामीण शिक्षा समिति, स्‍कूल शिक्षा समिति और अभिभावक-शिक्षक संघ की बैठक।
  • पीटीए को बच्‍चों द्वारा की गई शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई के लिए प्रोत्‍साहित किया जाएगा, इससे पहले कि बच्‍चे फिर हिंसा का शिकार बनें।
  • अभिभावकों और बच्‍चों को शारीरिक दंड के खिलाफ बिना किसी डर के बोलने के लिए प्रेरित किया जाएगा क्‍योंकि यह स्‍कूल में बच्‍चों की भागीदारी को भी प्रभावित करता है।
  • बच्‍चों द्वारा की गई शिकायतों की प्रतिक्रिया और उन पर की गई कार्रवाई तथा समीक्षा के लिए ब्‍लॉक, जिला और राज्‍य स्‍तर के शिक्षा विभागों को एक प्रक्रिया स्‍थापित करनी होगी। यदि ये सभी कदम उठाए जाते हैं: तो स्‍कूल जाना आनन्‍ददायक अनुभव हो सकता है। इसके लिए शिक्षकों को डंडे का सहारा छोड़ कर बच्‍चों को इससे बक्श देना चाहिए।

* अपने अधिकार का भयमुक्‍त आनन्‍द लेने के लिए हरेक बच्‍चा सुरक्षित है

संस्‍थानों की बजाय बच्‍चों के संरक्षण पर ज्‍यादा जोर देने के लिए बहुत सी सिफारिशें दी गई हैं। लेकिन, हरेक बच्‍चा अपने अधिकारों के भयमुक्‍त प्रयोग के लिए सुरक्षित है, इसे सुनिश्चित करने के लिए अभिभावक, शिक्षक और स्‍कूल के अधिकारियों के बीच सहयोगात्‍मक साझेदारी जरूरी है।

सिफारिशें-

  • संस्‍थान(स्‍कूल/हॉस्‍टल/बच्‍चों के घर) अपने यहां पंजीकृत बच्‍चों के कल्‍याण के लिए जिम्‍मेदार होंगे। किसी चोट/बीमारी/प्रताड़ना/मौत के मामले में संस्‍थान उसके लिए जिम्‍मेदार होंगे, वैसे ही जैसे पुलिस स्‍टेशन/जेल आदि में कैदियों के लिए पुलिस जिम्‍मेदार होती है।
  • यदि संस्‍थान में हुई किसी घटना के चलते बच्‍चे की मृत्‍यु/चोट या अस्‍पताल में भर्ती होता है, तो संस्‍थान के प्रबंधन को ऐसे मामले में क्षतिपूर्ति देनी होगी।
  • बच्‍चें के खिलाफ हिंसा के हरेक मामले में सम्‍बन्धित शिक्षा विभाग/बोर्ड को समानान्‍तर जांच करनी होगी। पीटीए को भी इस तरह की जांच में शामिल होना होगा।
  • बाल यौन शोषण के मामले में यदि कोई अभिभावक मामले से पीछे हट जाते हैं, तो सरकार को अपराध को संज्ञान में जरूर लेना चाहिए और बच्‍चे को कोई नुकसान पहुंचाए बिना प्रक्रिया को जारी रखना चाहिए तथा दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
  • जब कभी कोई बच्‍चा भेदभाव का वक्‍तव्‍य देता है, तो अनुसूचित जाति/जनजाति (पीओए) अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
  • शारीरिक दंड के मामले में शिक्षा विभाग/बोर्ड बच्‍चों के साथ शारीरिक दंड पर सामाजिक लेखा परीक्षण का आयोजन करेगा।
  • हरेक जिले में बाल कल्‍याण समिति को बच्‍चों के कल्‍याण की रक्षा करने में सक्षम बनाने हेतु सहयोग दिया जाना चाहिए और उन्‍हें मजबूत किया जाना होगा। बच्‍चे की मौत या आत्‍महत्‍या या अस्‍पताल में भर्ती होने के मामले में:
  • आत्‍महत्या के हरेक मामले को 'आत्‍महत्‍या के लिए उकसाने' के तौर पर लिया जाएगा और संस्‍थान के प्रबंधन उसके लिए जिम्‍मेदार होंगे।
  • य‍ह नोट किया जाना चाहिए कि कानून के अंतर्गत एक बच्‍चे द्वारा 'आत्‍महत्‍या की कोशिश' को 'आत्‍महत्‍या के प्रयास' के तहत दर्ज नहीं किया जा सकता क्‍योंकि इससे बच्‍चा दोगुना शिकार बन जाएगा।
  • शिक्षक की किसी कार्रवाई के परिणामस्‍वरूप आत्‍महत्‍या/यौन शोषण/अस्‍पताल में भर्ती के मामले में दोषी की जांच पूरी हाने तक वह निलंबित रहेगा।
  • जब कभी कोई बच्‍चा चोट/बीमारी के कारण अस्‍पताल में भर्ती करवाया जाता है, तो अस्‍पताल को उसे चिकित्‍सा-विधिक मामले के तौर पर लेनी चाहिए और बच्‍चे का बयान भी रिकॉर्ड करना चाहिए।
  • जब कभी कोई बच्‍चा हॉस्‍टल में बीमार होता है, तो ऐसी स्थिति के लिए शिक्षा विभाग या एसडब्‍ल्‍यूजेडी को तो निम्‍न प्रोटोकॉल बनाने होंगे- जैसे बच्‍चे को अस्‍पताल में कैसे ले जाया जाएगा (बजट के प्रावधान बनाना): क्‍या अभिभावकों को स्‍कूल तक और बच्‍चे को घर वापस ले जाने के लिए वित्‍तीय सहायता उपलब्‍ध कराई जाएगी आदि।
  • निजी संस्‍थान
    • सरकार को निजी बाल गृह/शैक्षणिक संस्‍थानों की लाइसेंस प्रक्रिया की समीक्षा और संस्‍थानों के नियमन के लिए एक समिति गठित करनी चाहिए।

क्या आप जानते हैं ?

विश्व के प्रत्येक तीन कुपोषित बच्चों में एक बच्चा भारत में रहता है अर्थात् दुनिया के एक-तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में रहते हैं

  • दुनियाभर के कुल कुपोषित बच्चें की आधी जनसंख्या भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में है।
  • उप सहारा अफ्रीका की तुलना में भारत और पाकिस्तान में औसत रूप कुपोषित बच्चे का दर अधिक है।
  • भारत में जन्म लेनेवाले 30 प्रतिशत शिशुओं का जन्म के समय वजन औसत कम होता है। भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 47 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम होता है। भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 45 प्रतिशत बच्चे का उचित विकास नहीं होता या उनका विकास अवरुद्ध होता है।
  • भारत में 6 वर्ष की आयु तक के 66 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं (जिला स्तरीय त्वरित गृहवार सर्वेक्षण, (डी.एल.एच.एस 2002-05)
  • भारत के 90 प्रतिशत से अधिक स्कूल जाने से पूर्व उम्र के बच्चे, किशोर बालिकाएँ एवं गर्भवती महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित होती हैं (डी.एल.एच.एस- 2002 – 05)
  • वर्ष 2002 से 2003 के दौरान बच्चों के खिलाफ अपराध में 11.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 6-14 वर्ष की उम्र आयु के 1.26 करोड़ बाल श्रमिक थे।
  • भारत में 6-14 वर्ष उम्र आयु के 6.94 प्रतिशत या 1.34 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर थे। मानव संसाधन विकास विभाग के प्रतिवेदन के अनुसार भारत में कक्षा 1 से 10 के बीच बच्चों का स्कूल छोड़ने (ड्रॉप आउट) का दर 62.68 प्रतिशत था। 2001 की जनसंख्या के अनुसार देश की 15 वर्ष से कम आयु की लगभग 30 लाख लड़कियों ने एक बच्चे को जन्म दे दिया था।
  • (लोकसभा अतारांकित प्रश्न संख्या- 2506, 14 मार्च 2006, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग- भारत में अपराध, गृह मंत्रालय)

भारत में जन्म लेने वाले हर तीसरे बच्चे औसत से कम वजन के होते हैं और उनके मस्तिष्क विकास और स्वास्थ्य को खतरा रहता है।

  • 0-6 वर्ष की उम्र आयु वर्ग के बच्चों के बीच लिंग अनुपात 1000: 927 था।
  • आयोडीन की कमी से देश के 66 लाख बच्चों का मस्तिष्क क्षतिग्रस्त था।
  • एन.एफ.एच.एस के अनुसार देश के अधिकतर राज्यों के 70 प्रतिशत से अधिक बच्चे लौह पदार्थ की कमी से पीड़ित हैं।
  • दुनियाभर के 4 करोड़ बच्चों की तुलना भारत में 1.5 करोड़ बच्चें विटामिन ए की कमी से पीड़ित हैं।
  • देश के 4.7 करोड़ बच्चे, कच्चे घरों में रहते हैं।
  • देश के 7.7 करोड़ बच्चे पीने के पानी के लिए नल का प्रयोग नहीं करते हैं।
  • देश के 8.5 करोड़ बच्चों का टीकाकरण नहीं किया गया है और 2.7 करोड़ बच्चों का वजन औसत से कम है।
  • देश के 3.3 करोड़ बच्चे कभी स्कूल नहीं गये हैं।
  • देश में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों की जनसंख्या 42.07 करोड़ है।

स्रोत : दुनियाभर के बच्चों की स्थिति पर असुरक्षित बचपन शीर्षक के यूनीसेफ की रिपोर्ट 2005।

बच्चों के साथ सावधानी से पेश आयें

2.97183098592

अनुराग झा Sep 02, 2017 12:41 AM

रांची का मोराबादी म दून पब्लिक स्कूल है जहा बच्चो को बहुत बुरी तरह सा पीटा जाता है और मैंटल हर्षमेंत क्या जाता है. बोलने पैर प्रिंसिपल बोलती है मेरा कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता क्योकि मेरा हस्बैंड आर्मी मै है.जहा कम्प्लेन करना है केर ले. हम जैसा बहुत सारे लाचार पेरेंट्स का कोई सुनवाई नहीं हो पाती. प्लीज कुछ किजये. हम सब बच्चों को पढ़ने वेज तय है शारीरिक शोषण का लय तो नहीं वेज ता आज कल पेरेंट्स सब वि एक या दो बच्चा रखता है अगर कुछ हो गया तब हम सब का जीवन अंधकार मई हो जायगा

Surenda Mar 20, 2017 07:48 PM

Pahla parichay sarni ma ho ma chahiya... Wikipe ki tarah

रमेश चंद्र yadav Nov 20, 2016 06:25 PM

भारत में केवल योजनाए निर्देश तक ही सिमित रह जाती है उस पर अमल पूरी तरह से नहीं हो pata इस पर दृढ इच्छा सकती एयर लोगो को अधिक से adhik जागरूक मारने की जरूरत है.

amar gaikwad Nov 15, 2016 10:06 AM

sir.. railway madhe lahan mule khel karun dakhavtat ani he kaydya ne ghunhaa ahe tar tumhi ya goshti var neet laksh ka det nahi

Anonymous Sep 09, 2016 09:13 AM

बाल मज़दूर के खिलाफ शिकायत है

Anonymous Feb 18, 2016 02:02 PM

Ko

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