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दूध की कहानी - गाय की जुबानी

इस भाग में कहानी के माध्यम से कैसे अधिक से अधिक दूध का उत्पदान किया जा सकता है इससे संबंधित विशेष जानकारी दी जा रही है।

परिचय

घर में दूध देनेवाली गाय या भैंस को रखकर दूध सहकारी समिति में देकर अपनी जिम्मदारी खत्म नहीं होती। अभी हमारा देश दूध उत्पादन में दुनिया में पहले नंबर पर पहुँच गया है। मगर बदलती हुई परिस्थिति में दूध स्वच्छ हो, जल्दी से न बिगड़े, तथा बीमारी न फैलाए, यह जरूरी हो गया है। इसी स्वच्छ दूध से अच्छी चीजें बने तो हमें और हमारी डेरी दोनों को फायदा होगा। इसके लिए हम बहुत कुछ कर सकते हैं जैसे कि,

1.  पशु को साफ सुथरा और निरोगी रखना।

2.  पशु रखने की जगह साफ – सुथरी रखना।

3.  उसे साफ पीने का पानी देना।

4.  दूध दूहने और रखने के लिए स्टेनलेस स्टील के साफ बर्तन का उपयोग करना।

5.  दूध दूहने से पहले हाथों को साबुन से धोना।

6.  थन को साफ पानी से धोकर साफ धुले हुए कपड़े से सुखाना।

7.  दूध दूहने से पहले हर थन से एक दो धार दूध निकाल कर फेंक देना।

8.  दूध दूहने वाले साफ सुथरे और निरोगी इंसान हों, जो बीड़ी, तंबाकू, पान आदि दूहने के समय न उपयोग करें।

9.  दूध देते पशु को हरा चारा खिलाना।

10. दूहने के बाद थनों को साफ पानी से धोना और फिर जीवाणुनाशक घोल में डूबोना या उन पर जीवाणुनाशक घोल छिडकना जिससे वे थनैला रोग से बचें।

11. समिति तक दूध ढककर जल्दी पहुँचाना।

12. समिति पर दूध को, अगर हो सके तो, ठंडा रखना जिससे वह न बिगड़े।

दूध की कहानी गाय की जुबानी

अगर इन सब बातों पर हम अमल करें तो हमारे द्वारा समिति को पहुँचाये हुए दूध से हम सबको बहुत फायदा हो सकता है

राजनगर गाँव में बनवारी नमक एक पशुपालक रहता था। उसके दो नन्हे – मुन्ने बच्चे और प्यारी सी घरवाली राधा थी। बनवारी का परिवार खुशहाल और सूखी था क्योंकि उसकी गाय गंगा और भैंस जमुना ढेर सारा दूध देती थी। बनवारी गंगा और जमुना का दूध अपने गाँव की सहकारी दूध समिति में देता था, जिसका वह कई बरसों से सदस्य था। समिति में दूध देने से बनवारी को अच्छी आमदनी होती थी और उसके घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। उनका खान – पान अच्छा था, बच्चे गाँव के स्कूल में पढ़ते थे और हर त्यौहार को सब उत्साह और खुशी से मनाते थे। बनवारी खुद को बहुत भाग्यवान समझता था, कि उसके पास गंगा जैसी गाय और जमुना जैसी भैंस है। राधा और बच्चे भी गंगा और जमुना से बहुत प्यार करते थे। लेकिन इस हंसते खेलते परिवार पर अचानक दुख के बादल छाने लगे। गंगा को कोई रोग लग गया और वह बीमार रहने लगी। बनवारी ने उसका इलाज घर पर ही किया परंतु कोई असर नहीं हुआ और गंगा का दूध कम और ख़राब आने लगा। बनवारी की आमदनी कम हो गयी और उसके घर में तरह – तरह की परिशानियां आने लगी। राधा के लाख मना करने पर भी इन  परेशानियों से तंग आकर बनवारी ने गंगा को बेचने का फैसला के लिया।

उन्हीं दिनों पास के गाँव में पशुओं के मेला लगा हुआ था। बनवारी ने तय किया कि वह मेले में गंगा को बेचकर एक नयी गाय ले आएगा।

दुसरे दिन बनवारी गंगा को लेकर मेले के लिए निकलने को तैयार हुआ राधा और बच्चे गंगा को पकड़ कर रोने लगे। बनवारी की भी आँखें भर आयीं पर उसने अपना दिल कड़ा किया और घर वालों को समझा कर गंगा को लेकर मेले की ओर चल पड़ा।
आधे रास्ते में पहुँच कर बनवारी कुछ देर आराम करने के लिए एक पेड़ के नीचे रूक गया। उसका मन भी उदास था और गंगा की आंसू भरी आँखों को देखकर उसने एक आह भरी और कहा – मुझे माफ़ कर दो गंगा। बनवारी सोच में डूबा था तभी उसने एक आवास सुनी – भैया उसने पलटकर देखा तो गंगा उससे बातें कर रही थी । भैया मुझे मत बेचो, भैया। बनवारी को विश्वास नहीं हुआ और उसे लगा जैसे वह सपना देख रहा है। यही सोचकर वह गंगा से बात करें लगा उसने कहा क्या करूँ गंगा मैं मजबूर हूँ। तुम्हारे दूध के कम और खराब होने से हमारी आमदनी काफी कम हो गई है। आमदनी बढ़ाने के लिए जरूरी है की मैं तुम्हें बेचकर दूसरी गाय ले आँऊ। मुझे तुम्हें बेचने से दुख हो रहा है, पर न जाने तुम्हें कौन – सा रोग लग गया है कि तुम्हारा दूध कम तो हो ही गया है साथ ही ख़राब भी हो गया है।

लेकिन इसमें मेरा क्या दोष है? गंगा ने पूछा

गहरी साँस लेकर बनवारी ने हामी भरी,  हाँ गंगा, जैसी ऊपर वाले की मरजी।

गंगा ने कहा इसमें ऊपर वाले का कोई हाथ नहीं है। माफ़ करना भैया, पर सच तो ये है कि सारी गलती तुम्हारी और राधा भाभी की है। आप लोगों को मवेशियों का ख्याल रखना नहीं आता है।

बनवारी ने हैरानी से पूछा यह तुम क्या कह रही हो गंगा? हम तो कोई पीढ़ियों से पशुपालन का कम करते आयें हैं। गंगा ने कहा इसे समझने के लिए मैं तुम्हें दूध की कहानी सुनाती हूँ।

बनवारी कुछ समझा नहीं और उसने पूछा दूध की कहानी?

हाँ, स्वच्छ और ताजा दूध निकालने और उसकी गुणवत्ता बनाये रखने के लिए पशु की देखभाल कैसे करें यही सब है दूध की कहानी में।

ये कहानी तुम्हें किसने सुनायी? बनवारी ने हैरत से पूछा।

गंगा ने कहा एक दिन मैं और जमुना हरा चारा चरने खेतों में गई थी। वहां हमें गौरी और पारो नाम की दो गायें और चंपा नाम की भैंस मिली, जिन्हें कभी कोई बड़ी बीमारी नहीं होती थी और उनका दूध भी कभी ख़राब नहीं निकलता था।

अच्छा,

हाँ, उनका मालिक डेरी – विज्ञान की पढाई कर चुका है। गौरी, चंपा और पारो ने ही हमें अपने रहन – सहन और दूध स्वच्छ रखने की बातें बतायीं। मैं वही कहानी तुम्हें सुनाती हूँ।

अच्छा सुनाओ, बनवारी बोला

पारो  – बहनों, तुम्हारी तकलीफें देखकर मेरा मन उदास हो गया है। मैं और मेरी बहनें, गौरी और चंपा तुम को बतायेंगी कि तुम्हारी मालिक को किस तरह तुम्हारा और दूध का ख्याल रखना चाहिए।

चंपा  – हमारी बातें गौर से सुनना और अपने मालिक को बताना। अगर हमारे बताए उपायों का पालन किया गया तो तुम कभी बीमार नहीं पड़ोगी।

गौरी  – और बेहतर दूध दे सकोगी, जिससे तुम्हारे मालिक की कमाई भी पहले से ज्यादा हो जाएगी।

गंगा  –  बताओ बहन, हम भी तो यही चाहती हैं।

चंपा  – दूध की यही गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पशु, पशु – घर, पशु – पालक, दूध रखें के बर्तन बगैरह की साफ - सफाई ज्यादा ध्यान देना जरूरी हैं। साथ – साथ दूहने के बाद जल्दी दूध को समिति तक पहुंचाना चाहिए। यदि इन बातों का ध्यान न रखा जाए तो दूध में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ जाती है और दूध ख़राब हो जाता है।

जमुना  – सूक्ष्म जीव? लेकिन मैं ने तो दूध में कभी सूक्ष्म – जीव नहीं देखे।

बाकी सब – हाँ, हमने भी नहीं देखे।

पारो – क्योंकि सूक्ष्म – जीव इतने छोटे होते हैं कि आँखों से नजर नहीं आते। इन्हें जीवाणु भी कहते हैं। उन्हें सिर्फ सूक्ष्मदर्शक यंत्र से ही देखा जा सकता है। यही जीवाणु दूध की गुणवत्ता को कम कर देते हैं।

गंगा – यानि जो तुमने साफ – सफाई की बातें बतायीं उनका पालन किया जाए तो दूध अच्छा रहेगा?

पारो –  ठीक कहा बहन तुमने। अगर स्वच्छ और तंदुरूस्त गाय या भैंस को साफ – सुथरा इंसान साफ बर्तन में दुहे और आस - पास की जगह साफ हो तो दूध में जीवाणु की संख्या कम होती है। उससे दूध में मिट्टी, मक्खी इत्यादि भी नहीं आते।

चंपा – और अगर ऐसे दूध को ढके हुए स्टील के बर्तन में जल्दी ही समिति तक पहुँचाया जाए तो दूध की गुणवत्ता अधिक समय तक बनी रहती हैं।

पारो  – तुम सबको यह जानकर हैरानी होती कि अगर ऊपर बतायी गई बातों का सही तरीके से पालन न करें तो डेरी तक आते – आते दूध की हर बूँद में जीवाणु की संख्या हजारों – लाखों तक हो जाती है।

जमुना – बाप रे,

गौरी  – हाँ, और ये जीवाणु हर 15 से 20 मिनट में दुगने हो जाते हैं जिससे दूध की गुणवत्ता तेजी से कम होने लगती है।

जमुना - लेकिन स्वच्छ दूध से हमारे मालिक का क्या फायदा होगा?

गौरी  –  अगर दूध साफ और ताजा रहेगा तो उसे पीने वाले सब तंदुरूस्त रहेंगे और वे हमेशा उसी डेरी का दूध खरीदेंगे।

चंपा  - ऐसे दूध से बनने वाली चीजें भी उच्च गुणवत्ता वाली और स्वादिष्ट होंगी। ऐसी चीजें जल्दी ख़राब नहीं होगी। इससे पशुपालक और डेरी दोनों की आमदनी बढ़ेगी।

गंगा  - बहन, हमें दूध साफ रखने के उपाय बताओ।

पारो –  उसके लिए सबसे पहले गाय या भैंस को तंदुरूस्त रखना होगा। उसे जहाँ रखा जाता है वह जगह साफ – सुथरी होने चाहिए। तुम्हें कहाँ रखा जाता है?

जमुना  - हमें तो घर के आगे पेड़ से बांध कर रखते हैं। लेकिन बैठने की जगह गन्दी हो जाती है क्योंकि मूत्र और गोबर बगैरह वहाँ जमा हो जाता है। वहाँ कोई सफाई भी नहीं करता है। और हम अपनी ही गंदी में पड़े रहते हैं।

चंपा  - रहने की जगह पर छत होने चाहिए और जगह हवादार और आरामदायक होनी चाहिए। साथ में साफ पीने लायक पानी का प्रबंध होना चाहिए।

गौरी  - इस जगह को और आस – पास के क्षेत्र को साफ – सुथरा रखना चाहिए। दूध दूहने की जगह पर चारा जमा नहीं करना चाहिए।

गाय या भैंस रखने की जगह पर कम से कम मिट्टी की साफ – सुथरी फर्श तो होनी चाहिए। अगर पक्की फर्श बन जाए तो और अच्छा होगा।

गंगा  - और क्या करना चाहिए।

गौरी  -  जहाँ पशुओं को बाँध कर रखा जाता है वह स्थान ऐसा हो कि पानी या मूत्र बहकर नाली से निकल जाए और सूखने के लिए गड्ढे में पहुँच जाए।

पारो  - गोबर को पशुओं से दूर खाद के गड्ढे या गोबर गैस प्लांट में देना चाहिए| इतनी कहानी सुनकर गंगा चुप हो गयी। बनवारी उसकी बातें ध्यान से सुन रहा था। और आगे कहानी सुनने को बेचैन था। उसने गंगा से पुछा, मुझे पूरी कहानी सुनाओ। और क्या समझाया तुम्हें पारो, गौरी और चंपा ने?

गंगा बोली, उन्होंने मुझे सी बातें बतायीं, लेकिन हमे यहीं बैठे रहे तो शाम हो जाएगी। घर में राधा भाभी और बच्चे परेशानी हो रहे होंगे। चलो घर चलते हैं। बाकी कहानी मैं तुम्हें रास्ते में सुनाऊँगी। बनवारी को भी बात सही लगी और वह गंगा की रस्सी खोलकर, उसे लेकर घर की ओर चल पड़ा। कुछ देर चलते ही उसे याद आया और वह अचानक रूक गया और बोला लेकिन हम तो मेले में जा रहे थे।

गंगा का मन जो फिर खुशी से झूम उठा और उसने कहानी आगे बढ़ायी, इसके बाद चंपा और पारो ने दूध दूहने वाले के बारे में बताया।

पारो  - अगर दूध दूहने वाला बीमार है, तो उसके बीमारी का असर दूध पर भी होता है।

चंपा  - इसलिए अगर किसी को सर्दी, खाँसी, दस्त, क्षयरोग, चमड़ी का रोग या छूट की बीमारी हो या उसके लक्षण हों तो उसे दूध नहीं दुहना चाहिए।

पारो  - घाव, फुंसी, फोड़े खुले हों या हाथ कहीं कट गया हो तो सही ढंग से मरहम – पट्टी किए बगैर भी दूध नहीं दुहना चाहिए।

चंपा  - दूध दुहने वाला साफ – सूथरा होना चाहिए। उसके कपड़े धुले और साफ होने चाहिए। दूध दुहते समय दुहने वाले को और आस - पास के लोगों को खांसना या छींकना नहीं चाहिए। इस दौरान वहां पान, तंबाकू, बीड़ी, पान – मसाला इत्यादी का सेवन भी नहीं करना चाहिए।

यह सब सुनकर बनवारी बोला, सच गंगा, हम सभी ये गलतियाँ करते हैं। आगे से दूध दुहते समय इन सब बातों का ध्यान रखेंगे।

इतनी कहानी सुनते – सुनाते बरवारी और गंगा घर पहुँच गए। गंगा को वापस घर आया देखा राधा और बच्चे बहुत खुश हुए। राधा ने चौंककर पुछा – अरे। गंगा को वापस ले आये? रात को खा – पीकर जब सारा परिवार सोने लगा तो बनवारी ने राधा को गंगा द्वारा बतायी दूध की कहानी सुनाई। तुम फ़िक्र मत  करो, हम अब तुम्हारा वैसे ही ख्याल रखेंगे जैसा तुम्हारी सखियों ने बताया।

गंगा की आँखों में खुशी के आंसू भर आए। वह बोली, भाभी मैं तो पूरी जिन्दगी आप लोगों की सेवा करना चाहती हूँ, लेकिन और भी बटन हैं जिनका ख्याल रखना होगा, ताकि मैं और जमुना स्वस्थ रहकर स्वच्छ, पौष्टिक और ज्यादा दूध के पायें।

राधा ने कहा - गंगा, हमें और किन – किन बातों का ख्याल रखना चाहिए? गंगा ने बताया, घर की मक्खी हमारी दुश्मन है। मक्खियों के शरीर पर लाखों की संख्या में जीवाणु पाये जाते हैं। ये कई बीमारियाँ पैदा करते हैं और दूध को ख़राब करती हैं।

राधा ने पुछा - अच्छा, इसका मतलब हुआ कि मक्खियों से दूध को बचाने से भी दूध साफ रहेगा?

गंगा  - हाँ, मक्खियों और गंदगी दोनों से दूध को बचाना जरूरी है। अगर गाय या भैंस के शरीर पर गंदगी है तो उस करोड़ों जीवाणु पाये जाते हैं। इसलिए दूहने से पहले उन्हें माफ़ जरूरी है। गर्मी के दिनों में पशुओं को पानी से साफ़ करें और सर्दियों में नर्म ब्रश से घिस कर साफ रखें ताकि बालों और शरीर से जीवाणु दूर हो जाएँ।

राधा  - अच्छा, इस बात का ध्यान रखूंगी।

गंगा  -  साफ दूध के लिए बर्तन भी साफ होना चाहिए। दूध के बर्तन को साबुन से धो लेना चाहिए। बर्तन में मिट्टी न रहे, इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए। उसे धोने के बाद तुरंत सुखाने के लिए साफ – सुथरे जगह पर उल्टा रखना चाहिए।

राधा  - ठीक है।

गंगा  -  गाय और भैंस के थन को साफ पानी से धोकर साफ धुले हुए कपड़े से सुखाना चाहिए।

राधा  - लेकिन मैं तो वैसे ही करती हूँ।

गंगा  - तुम अपनी साड़ी के पल्लु से हमारे थन को पोंछती हो, जो गंदा हो सकता है जबकि साफ – सुथरे कपड़े का उपयोग जरूरी है। दूध दूहने से पहले हर थन से एक – दो धार को निकाल कर फेंक देना चाहिए। इससे थन में जमा हुए जीवाणु निकल जाते हैं। दूध दूहने से पहले हाथों को साबुन से धो लेना चाहिए। दूहने वाले को अपनी उँगलियों को दूध में कभी भी डुबोना नहीं चाहिए और पशु के थन पर तेल नहीं लगाना चाहिए।

दूध दुहते समय अपने शरीर का कोई अंग या कपड़ा दूध व दूध के बर्तन से नहीं  लगने देना चाहिए।

बनवारी  - अच्छा।

गंगा   - इसका ध्यान रखना चाहिए कि थनों में जरा भी दूध न बचा रहे क्योंकि उससे थन में जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं।

इससे पशु को रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। दूहने के बाद थनों को साफ पानी से धोना चाहिए और जीवाणुनाशक (आयडोफोर) घोल में डुबोना या उन पर घोल छिडकना चाहिए।

बनवारी  - चलो, इस बात का भी ध्यान रखेंगे।

गंगा  -  जिस बर्तन में दूध निकाला और समिति पर पहुँचाया जाए वह स्टेनलेस स्टील का ही होना चाहिए। उसका ढक्कन ठीक से बंद होना चाहिए, जिससे इसमें मक्खी, गंदगी आदि न गिर जाए। दूध को समिति पर जल्दी ही पहुँचाया जाए तभी दूध ठीक रहेगा।

दूध की इस कहानी को सुनने के बाद बनवारी और राधा ने गंगा के बताए रास्ते पर चलना शुरू कर दिया।  पहले तो गंगा का इलाज,  डेरी के पशुओं का इलाज करने वाले डॉक्टर से कराया। सही इलाज होने से गंगा जल्दी स्वस्थ हो गयी। राधा ने गंगा की बतायी सारी बातों का अच्छी तरह पालन किया। गंगा और जमुना के रहने की जगह और आस - पास के माहौल को राधा और बच्चों ने साफ – सुथरा किया। इससे गंगा का दूध स्वच्छ और ज्यादा निकलने लगा। बनवारी के परिवार की आमदनी बढ़ गई और वह पहले की तरह खुशहाल हो गया। अब बनवारी एवं राधा और दुधारू पशु घर लाने की सोचने लगे।

स्त्रोत: राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड

2.85714285714

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