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बाल विज्ञान जगत

इस लेख में प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, कहानियों,कविताओं, चुटकुलों, जीव जन्तुओं का अनोखा संसार और विज्ञान बच्चों के लिए किये गए कुछ प्रयोगों का विस्तृत उल्लेख है।

वैज्ञानिक

प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्कमीदीज

आर्कमीदीज आज तक के सबसे महान वैज्ञानिकों में से एक हुए हैं। काफी पहले अफ्रीका के उत्तरी तट पर एक बस्ती थी, जिसका नाम कार्थेज था। रोम और कार्थेज के बीच कई वर्षो तक युद्ध जारी रहा। ये लड़ाईयां ‘प्यूनिक’ युद्धों के नाम से प्रसिद्ध है। रोम और कार्थेज के बीच आर्किमीदीज का सिराक्यूज नगर पड़ता था। रोमन सेनापति का नाम था मार्सेलुस। मार्सेलुस ने सोचा, ‘‘क्यों न लगे हाथ सिराक्यूज पर भी कब्जा कर लिया जाए।” और उसने सिराक्यूज को घेर लिया। लगभग तीन वर्षो तक यह घेरा कायम रहा। बताया जाता है कि अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए आर्किमीदीज द्वारा निर्मित युद्ध मशीनों के कारण ही मार्सेलुस को सिराक्यूज में प्रवेश करने से रोका जा सका।

सूरज की किरणों को जहाज पर केन्द्रित करने के लिए बनाए- गुणाकर मुले राजा हाइरोन ने आर्किमीदीज को बुलाया और उनसे मदद मांगी। आर्किमीदीज ने कहा, ‘‘मैं रोम के जहाजी बेड़े को नष्ट कर सकता हूँ।” “किस तरह?’’ हाइरोन ने पूछा। “जलते शीशों से।” आर्किमीदीज ने उत्तर दिया। हाइरोन कुछ नहीं बोला। उसने केवल अपना सिर हिला दिया। उसे लगा कि सोचते-सोचते आर्किमीदीज का दिमाग खराब हो गया है। इसलिए तो वह ऐसी असंभव बातें करता है।

परंतु आर्किमीदीज ने अपने दावे को सिद्ध कर दिखाया। मार्सेलुस के जहाज जैसे ही सिराक्यूज बंदरगाह के निकट आए, आर्किमीदीज ने ‘जलते शीशों’ को उन जहाजों पर केंन्द्रित कर दिया। वे ‘शीशे’ धातुओं की प्लेटों से बनाए गए थे। अत: उन विशाल धातु-प्लेटों पर पड़ने वाला सूर्य-प्रकाश आगे आने वाले जहाजों पर केंन्द्रित हो जाता था, जैसा कि ‘मैग्निफाइंग ग्लास’ यानी आवर्धक लेंस से होता है। इस तरह जहाज में आग लगकर वे नष्ट हो जाते थे। बहुत से लोग इस कथा में विश्वास नहीं करते। परंतु न्यूटन ने मत प्रकट किया कि आर्किमीदीज के संबंध में जो कथा कही जाती है, वह असंभव नहीं है। मार्सेलुस ने जमीन और पानी, दोनों ओर से सिराक्यूज नगर पर आक्रमण किया था। अपने बचने का कोई उपाय न देखकर सिराक्यूज-निवासी घबरा गए थे। परंतु आर्किमीदीज ने नए यंत्र तैयार किए और उन यंत्रों की सहायता से बड़े-बड़े पत्थरों को रोमन जहाजों और सैनिकों पर फेंका गया।

मार्सेलुस के जहाजों और सैनिकों पर आक्रमण होने से उसके सैनिक चींटियों की तरह मरने लगे। मार्सेलुस पागलों की तरह दहाड़ा:

“ज्यामिति का यह दानव हमारे जहाजों को कटोरों की तरह समुद्र में डुबाता जा रहा है। इसने हमारे सभी युद्ध-साधनों को निकम्मा बना दिया है। क्या अब हमें पराजय स्वीकार करनी होगी?’’ वास्तव में आर्किमीदीज की ही बुद्धि सभी करामातें दिखा रही थी। दूसरे सभी शस्त्र निकम्मे पड़े हुए थे। अकेले आर्किमीदीज ही आक्रमण और संरक्षण, दोनों काम संभाल रहे थे। अंत में रोमन सैनिक इतने भयभीत हो उठे कि किले की दीवार से यदि उन्हें कोई रस्सी कोई खड़ी लकड़ी दिखाई देती, तो वे चिल्ला उठते :‘‘वहां देखो! आर्किमीदीज हमारे खिलाफ कोई नया इंजन खड़ा कर रहा है।” तब सभी रोमन सैनिक भाग खड़े होते। अपने सैनिकों की यह दशा देखकर मार्सेलुस ने सीधे युद्ध का तरीका त्याग दिया और लंबे समय तक दूर से सिराक्यूज का घेरा कायम रखा।

आर्कमिदीज़ का ‘‘पंजा”

Archimedesएक खास जोड़ के कारण से इस क्रेन के डंडे को ऊपर नीचे भी किया जा सकता है और दाएं-बाएं भी घुमाया जा सकता है। क्रेन के नीचे लगा पंजा (गोले में देखो) सामने आते जहाज को फंसा लेता है। बैलों की टीम इसे ऊपर उठाने के लिये पीछे की ओर हांकी जाती है। घिरनी (pulley) की व्यवस्था उनके लगाए बल को काफी बढ़ा देती है। जहाज भारी तो होता है, पर पानी पर तैरने के कारण इसे ऊपर उठाने के लिए कम जोर लगाना पड़ता है।

जब जहाज काफी ऊँचा उठ जाता है, तो अचानक रस्सियों का खिंचाव ढीला छोड़ दिया जाता है। जहाज धड़ से पानी के अंदर गिर कर डूब जाता है।

विज्ञान लेख

बेचैन धरती

आर. रामानुजम, तमिलनाडु साइंस फोरम
अनुवाद: त्यागू रंगनाथन

Restless earthजीविता थोड़ी परेशान दिख रही थी। "जरा भी हवा नहीं है। रात में भी कितनी उमस है" दादाजी ने कहा। वो जीविता को देख रह थे। उन्हें पता था कि उसका ध्यान किसी चीज में फंसा है।

हवा का नामोनिशान नहीं था। छत पर उमस थी। तारे जगमगा रहे थे। आकाश की ऊँचाई में एक हवाईजहाज उड़ता नज़र आ रहा था।
“दादाजी, ज्वालामुखी क्यों फटते हैं ?
" जीविता ने पूछा।
“उफ, मुझे पता था तुम किसी चीज के बारे में
सोच रही हो और तुमने पूछ ही लिया।

अब तुम ज्वालामुखी के बारे में क्यों जानना चाहती हो?’’ दादाजी ने पूछा।
“आपने टीवी पर नहीं देखा, दादाजी? इंडोनेशिया में वो ज्वालामुखी फटा था और सब लोग यहाँ वहाँ भाग रहे थे।”
“हूं ---- मैंने देखा था। क्या तुम्हें डर है कि ऐसा यहाँ भी हो सकता है?’’
“हाँ दादाजी। तीन साल पहले यहाँ सूनामी आई थी और मुझे पता है कि वो उस इलाके में भूकम्प आने से आई थी। तो फिर उस इलाके में ज्वालामुखी फूटने से भी यहाँ समस्या हो सकती है?’’
दादाजी को जीविता की चिंता समझ में आ गई। उन्होंने समझाया कि ज्वालामुखी का प्रभाव उस पर्वत के आसपास कुछ किलोमीटर तक ही नज़र आता है।
“क्या जो लावा पर्वत से निकलता है वो धरती के अन्दर होता है?’’
“हाँ। यह गर्म द्रव अन्दर उबलता रहता है। यह इतना गर्म होता है कि सारी धातुओं को पिघला सकता है।”
“क्या यह लावा हमारे घर के नीचे भी है?”
“हाँ, हाँ, पूरी पृथ्वी ही इस तरह की है। हम जिसे धरती कहते हैं वह एक चट्‌टान है, जो एक प्लेट की तरह है। उस प्लेट के नीचे तेजाब और वह गर्म मिश्रण भरा है।”

“क्या यह प्लेट स्थिर रहती है?’’
“हाँ, हाँ! क्या कोई भी प्लेट जो द्रव पर तैर रही हो स्थिर रह सकती है? वह डोलती रहती है। जिन महाद्वीपों पर हम रहते हैं वो सभी खिसकते रहते हैं। शहर, पहाड़ सब चलते रहते हैं।”
जीविता आश्चर्य में पड़ गई। वह कुछ समय के लिए चुप रही। थोड़ी हवा चलने लगी थी। ‘‘यह तो बहुत अजीब लगता है। यह जमीन इतनी स्थिर लगती है, यह कैसे हिल सकती है? कभी एक बार तो हिल सकती है, जब भूकम्प आता है, पर यह हमेशा कैसे हिल सकती है?’’
दादाजी बहुत खुश हुए। उनकी पोती का इस तरह से प्रश्न पूछना बहुत ही प्यारा था। उन्होंने उससे कई बार कहा था कि उसे केवल सुनी सुनाई बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिये।

“यह कोई हैरानी की बात नहीं कि तुम मेरी बात का विश्वास नहीं कर रही। वैज्ञानिकों ने भी इस मत को 50-60 साल तक नहीं माना था। उन सबने बहुत विरोध के बाद आखिर इसे स्वीकार किया।”
“ओह! तो इसके बारे में सबसे पहले किसने सोचा?’’
हवा अच्छी चलने लगी थी और दादाजी ने अपनी कहानी शुरू कर दी।
फ्रैंक देलर नाम के वैज्ञानिक ने 1908 में एक किताब लिखी। उस किताब में उसने यह मत पेश किया कि दो महाद्वीपों के आपस में भिड़ने के कारण पर्वत बनते हैं। विज्ञान की दुनिया ने देलर की बात को केवल उसकी  कल्पना कहकर हवा में उड़ा दिया।

लेकिन अगले 30 साल में उसके तर्कों के पक्ष में बहुत से सबूत मिले। यह पता लगा कि शीत युग के कई जीव जो अमरीकी महाद्वीप में मिले थे, वही यूरोप महाद्वीप में भी मिले। एक ही तरह की चट्‌टानें यूरोप और अमरीका दोनों में मिलीं। ऐसा लगता था जैसे ये दोनों महाद्वीप किसी समय आपस में जुड़े थे और बाद में अलग हो गए। लेकिन किसी को यह समझ में नहीं आता था कि ऐसा कैसे हुआ।

उस समय के वैज्ञानिक पृथ्वी को एक ‘गर्म फल’ जैसा मानते थे। एक ऐसा फल जो अन्दर से बहुत गर्म है और बाहर से जिसका छिलका सिकुड़न भरा है। उसके झुर्रीदार छिलके में ही पर्वत, धरती की दूसरी रचनाएं आदि हैं। अगर पृथ्वी की यह परिकल्पना ठीक थी, तो फिर चंद्रमा की सतह की तरह पृथ्वी पर बहुत से गड्‌ढे होने चाहिये थे और सारे पर्वतों का आकार एक जैसा होना चाहिए था।

तो  वैज्ञानिकों के पास अलग-अलग महाद्वीपों की एक जैसी चट्‌टानों और जीवों के बारे में क्या जवाब था? उनका कहना था कि किसी समय महासागरों पर विशाल भूमि पुल रहे होंगे। शोधकर्ताओं ने मानचित्रों में इन पुलों के लिये रेखाएं भी बनाईं लेकिन इस ‘पुल’ वाली व्याख्या के साथ भी समस्याएं थीं। एक जीव केवल यूरोप और कनाडा में पाया गया, जो आपस में 3000 किलोमीटर की दूरी पर थे।  लेकिन वह जीव पुल पर स्थित उत्तरी अमरीका में नहीं पाया गया, जो कनाडा से केवल 200 किलोमीटर दूर था। तो इस मत पर विश्वास कर पाना मुश्किल था।
धरती की प्लेटें किस प्रकार जुड़ी हैं और कैसे खिसकती हैं, यह 1994 में एक अँग्रेज वैज्ञानिक आर्थर होम्स ने समझाया। महाद्वीपों का खिसकना और पर्वतों का बनना जैसी सभी चीजों की उसने व्याख्या की। हांलाकि 1915 में एक जर्मन वैज्ञानिक वैगानर ने भी यही बात की थी, उस समय दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध में इतनी व्यस्त थी कि किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

धरती की ऊपरी परत पर पेट्रोलियम की खोज करने वाले इंजीनियरों को तो पहले ही पता लग चुका था कि धरती हमेशा चलती रहती है। लेकिन अफसोस कि वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के बीच में आपसी बातचीत काफी कम रहती थी।

1950 के दशक में स्थिति ज्यादा साफ समझ में आने लगी। यह साफ हुआ कि केवल महाद्वीप ही नहीं, समुद्र तल भी हमेशा खिसकते रहते हैं। पृथ्वी की सबसे बड़ी पर्वत श्रृंखलाएं समुद्र के अन्दर हैं। जो गुत्थी बहुत समय से नहीं सुलझ पाई थी, अब सुलझने लगी थी।
यह समझ में आने लगा कि नदियों द्वारा समुद्र में डाली गई मिट्‌टी का क्या होता है। उदाहरण के लिये कम से कम 50 करोड़ टन कैलशियम हर साल समुद्र तल पर नदियों द्वारा डाला जाता है। इससे समुद्र तल ऊंचा क्यों नहीं उठ जाता? असल में खिसकता हुआ समुद्र तल इस गाद को फैला देता है। पृथ्वी के अंदर का हिस्सा न्यूक्लीय ऊर्जा के कारण उबलता रहता है।

महाद्वीपों का खिसकना
प्लेटों के खिसकने के सिद्धांत से भूकम्प, शीत युग का बदलना, द्वीपों की कड़ियों का उभरना जैसी कई चीजें समझाई जा सकती हैं।

हम महाद्वीपों के खिसकने के बारे में क्या भविष्यवाणी कर सकते है? शायद एक दिन अफ्रीका महाद्वीप यूरोप से अलग हो जाएगा। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि पेरिस से कलकत्ता तक एक पर्वत श्रृंखला बन जाएगी। जहाँ तक हमें पता है, प्लेटों का खिसकना केवल धरती पर ही होता है। हमें नहीं पता कि यह क्यों होता है।

हम जिस रास्ते से आए

आर. रामानुजम           हिंदी अनुवाद- त्यागू

“नमस्ते । आपका नाम क्या है”
“जीविता।”
“नमस्ते जीविता, आप कहां से आ रही हैं”
“भोपाल से”
“आप कहां की रहने वाली हैं”
“हम जबलपुर के पास शाहपुरा से हैं। पर मैं पली बड़ी भोपाल में ही हूं।”
“अच्छा, आपके नाना-नानी सभी” “शाहपुरा से ही हैं।”
“अच्छा, आपकी मां की नानी”
जीविता ने हंसकर कहा, ‘‘वे भी उसी जगह के आसपास की होंगी।”
“अच्छा, और उनकी नानी की नानी”
एक मिनट! जरा सोचिये! आप इस क्षण इस जगह पर बैठे यह लेख कैसे पढ़ रहे हैं, मैं ‘आप’ करके जिसे कह रहा हूं, वह कैसे बना है। हजारों अरब परमाणु किसी तरह मिलकर एक रूप बनाकर, उस रूप को बिगाड़े बगैर बनाए रखने के लिये बहुत मुश्किल कोशिश में लगे हुए हैं। वे हर वक्त इस कार्य में जुटे हैं और कई साल तक इन परमाणुओं को बहुत काम हैं। बहुत कुशल तरीके से एक दूसरे की मदद से सामूहिक नृत्य करके ही ये परमाणु आपको कायम रखेंगे। एक समय आपकी सांस बंद हो जाएगी। तब ये परमाणु नया रूप लेंगे। कई नए परमाणुओं के साथ मिलकर उस नए रूप को बनाएंगे।

“चकरा रहीं हैं क्या ! नहीं, नहीं। आपको सिर्फ यह बात समझनी है कि हम सब परमाणुओं से बने हैं। सिर्फ आप और मैं नहीं, आपकी ‘इंद्रधनुष’ भी इसे लिखते वक्त मेरे हाथ में जो कलम है, वह भी, इस भी में जो की मात्रा है, यह सब परमाणुओं से बना है।

पर ये सब परमाणु इतनी मुश्किल से आपको और मुझे क्यों बनाए हुए हैं, यह एक अनबूझ पहेली है। परमाणु को आपके शरीर में या मेरे अंदर रहने में इतनी दिलचस्पी नहीं है। रासायनिक तरीके से देखा जाए तो जीवन इतनी विशेष घटना नहीं है- कार्बन, नाईट्रोजन आक्सीजन, थोड़ा कैल्शियम और थोड़े अन्य साधरण तत्व इतना ही।

ब्रह्मांड में कई जगहों पर होने के बावजूद परमाणुओं ने सिर्फ पृथ्वी पर ही; शायद इस तरह से मिलकर आपको और हमको बनाया है। यह किस तरह का चमत्कार है, यह हम अभी तक नहीं समझ सके हैं।

“पर जीवन हो या नहीं, परमाणुओं ने ही मिलकर पत्थरों की और पानी को भी बनाया है। रात में टिमटिमाते सितारों को भी बनाया है, परमाणुओं ने ही।”

अच्छा, परमाणु कहां से आया। क्या कभी ब्रह्माड बिना परमाणुओं के भी था ? इनके जवाब आसान नहीं है, पर हमें ये सवाल पूछने चाहिये क्योंकि परमाणु सभी जगह फैले हुए हैं।

अब इस दिलचस्प बात को समझने के लिये हमें सिर्फ परमाणु की ही नहीं, जीव विज्ञान की समझ भी होनी चाहिये। पृथ्वी से कई जीव लुप्त हो चुके हैं। (हमारा यह आश्चर्यजनक ग्रह कई जीवों को पैदा करने के साथ, उनके खात्मे में भी काफी सफल रहा है।)

कोई भी जीव पृथ्वी पर लगभग 40 करोड़ साल तक मजे करते हैं। अगर ‘‘आप” इससे भी ज्यादा रहना चाहते हो, तो और किसी जीव का रूप लेने पर ही यह संभव होगा।

फिर एक बार जीविता की नानी की नानी की नानी के बारे में सोचिये। वे कहां जीती थी? और उनकी नानी की नानी ?

पिछले कुछ 3800 करोड़ सालों से आपके पूर्वज अगली पीढ़ी को पैदा करने तक तो जिंदा रहे हैं। बिना पानी में डूबे, भूख से मरे ठंड से जमे बगैर, प्रकृति के अनेक खतरों से बचकर डी. एन. ए. के एक मेल से आप बने हो। जरा सोचिये, उनको पता नहीं था कि आप कभी यहां ऐसे बैठे होंगे। फिर भी यह बस उन्हीं की वजह से।

“परमाणु से लेकर आप तक। यह बहुत ही रोमांचक कहानी है। इस कहानी के बारे में हमें कैसे पता चला, यह इस ‘कहानी’ से भी ज्यादा रोमांचक है। हमारा जीवन काल सामान्यतौर पर 6 लाख घंटे ही है। इतनी दिलचस्प कहानी के लिये इतना जीवनकाल बहुत कम है।

फिर भी, चढ़ जाये। यह हवाई जहाज उड़ने वाला है, बहुत ऊंचाई से……… हम जिस रास्ते से आए हैं, उस रास्ते को देखने वाले हैं। और यह बहुत लंबा सफर है।

एक क्षण मे ब्रह्मांड

- आर. रामानुजम, तमिलनाडु साइंस फोरम,

universeदादाजी खुशी-खुशी बैठे पान खा रहे थे। जीविता उनकी
गोद में बैठकर चाव से देख रही थी। वह काफी देर से चुप
बैठी थी। दादाजी ने पूछा, "जीविता, आज तुम किस सोच में
पड़ी हो?" दोनों छत पर बैठे थे और ठंडी हवा चल रही थी।
"दादाजी, ऊपर जो तारे दिख रहे हैं, वे सब कितनी दूर हैं?";
दादाजी ने हंसकर पूछा, "क्यों, जीविता जी को वहां कहीं जाना है क्या?"

"हमारी पृथ्वी ऐसे ही एक तारे से आई है ना? मुझे मालिनी दीदी ने बताया था। तो वह कितनी दूर से आई होगी?"

"ऐसे ही किसी तारे से नहीं, बल्कि एक ऐसे तारे से जिसे हम अच्छी तरह से जानते हैं। वह तारा हमारे बहुत पास में है।"

"अगर वह हमारे बहुत पास में है तो देखने में बहुत बड़ा होगा?’’

"हां! तुम उसकी चमक को देख न पाने के कारण रोज उसके सामने अपनी आंखें बंद कर लेती हो। वही हमारी पृथ्वी की मां है।"

"दादाजी, क्या आप सूरज की बात कर रहे हो? सूरज तो पूरा आग से भरा है।

उसमें से पृथ्वी कैसे आ सकती है?’’
“सिर्फ सूरज नहीं, सभी तारे हर वक्त जलते रहते हैं। उसी रोशनी को ही हम देखते हैं। हमारे सूर्य परिवार के सभी ग्रह सूरज से ही आए हैं।”
“चंद्रमा भी?’’
“सभी! सूरज का विस्फोट होकर ही सूर्य
कुटुंब की सब चीजें पैदा हुई हैं।”
जीविता ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘तो सूरज कहां से आया?’’
वाह बढ़िया सवाल है!” तभी नीचे से मां की आवाज आई, ‘जीविता, आओ दूध
पी लो! सोने के लिये बहुत देर हो जाएगी।’

इस दिलचस्प बातचीत के बीच में दादाजी को छोड़कर जाने का जीविता का मन बिल्कुल नहीं कर रहा था। दादाजी समझ गए। बोले ‘‘जीविता, जाके दूध पी आओ। बाकी बात बाद में करते हैं।” जीविता जल्दी से जाकर दूध पीकर आ गई।

वापस आने पर दादाजी ने कहा, ‘‘क्या हम कहानी शुरू करें? हमारा सूरज ही नहीं, सभी तारे, नक्षत्र मंडल-कहां से आए, कहां जा रहे हैं- ये सवाल मानव को बहुत सालों से परेशान करते आए हैं। अभी हमें कुछ जवाब मिल रहे हैं।

जीविता, सिर्फ नक्षत्रों का ही नहीं, ब्रह्मांड की सभी चीज़ों का एक ही जन्मदिन है। तू, मैं, यह छत, यह बादल, उनके ग्रह, तारे, सभी परमाणुओं के बने हैं। परमाणुओं के बारे में सुना है?’’

“हां दादाजी, दुनिया में सब कुछ परमाणुओं से बना है। लेकिन क्यों, यह मैं नहीं जानती।” जीविता की आवाज में उत्सुकता थी।

“अरे, अभी तो तू छोटी बच्ची है। चिन्ता न कर, बड़े होते होते यह सब जानने के लिए वैज्ञानिक बन जाएगी।” दादाजी ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारा सवाल यही है न कि परमाणु कब पैदा हुए, कहां से आए?’’

जीविता खिल गई। ‘‘हां, ये परमाणु कहां से आए?’’ ‘‘वही बता रहा हूं। सारे परमाणुओं का जन्म दिन ही नहीं, जन्म समय भी एक है।”

“सारे परमाणु? क्या वे एक बहुत बड़े तारे से आए थे?’’ ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? अब देखो, अगर मैं कहूं कि सब परमाणु एक ही तारे से आए, तो तुम पूछोगी कि वह तारा कहां से आया? इसलिये ऐसा नहीं हो सकता।

हमारे ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वो सब एक ही क्षण में पैदा हुआ। ब्रह्मांड में जो भी चीजें हैं, उन सब को अगर एक बिंदी में रखें तो वह अं के ऊपर की बिन्दी के एक लाखवें हिस्से में समा जाएगा। उस बेहद घनी बिंदी से ही ब्रह्मांड पैदा हुआ।”
“उस बिंदी को छोड़कर क्या कुछ भी और नहीं था?’’

“उस बिंदी के बाहर कुछ नहीं हो सकता क्योंकि वह बिन्दु ही ब्रह्मांड था। ब्रह्मांड ही सिकुड़कर वह बिंदी बन गया। ऐसे में उस बिन्दु के बाहर स्थान जैसा कुछ नहीं होता। जब तुम उस बिंदु की बात कर रही हो तो समय और स्थान उसपर लागू नहीं होते।

“उसमें से परमाणु कैसे आए?’’
“ओह, इसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता, न ही कल्पना की जा सकती है- एक पल में, एक भारी धमाके से यह बिंदी बड़ी होकर आकाश जैसी फैल गई और फिर अंतरिक्ष बना, ब्रह्मांड बना। पहले क्षण में जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं (gravity) वह पैदा हुआ। फिर एक मिनट के अंदर ब्रह्मांड एक लाख करोड़ किलोमीटर दूर फैल गया। यह फैलाव और भी तेजी से बढ़ता चला जा रहा है।

बहुत ज्यादा तापमान- हजार करोड़ डिग्री सेल्सियस पर बहुत सारी परमाणुवीय क्रियाएं हुई। उस समय हाइड्रोजन और हीलियम गैंसें बहुत मात्रा में थी। तुम इन सब चीजों के बारे में नहीं जानती न?’’

जीविता ने कहा, ‘‘नहीं। मुझे सिर्फ ऑक्सीजन के बारे में पता है।”

“पैदा होने के तीन मिनट के अंदर ब्रह्मांड की सारी चीजें पैदा हुई। करीब 98 प्रतिशत ब्रह्मांड तैयार हो गया!

इतना बड़ा और सुंदर ब्रह्मांड तीन ही मिनट में!

तुम अपने कुरकुरे खाने के लिये जितना समय लेती हो, उतने ही समय में यह ब्रह्मांड!’’ जीविता मुंह खोले यह सब कुछ सुन रही थी।

“दादाजी, यह सब कितने साल पहले की बात है?’’
“ठीक पूछा! मैंने कहीं पढ़ा था करीब 1370  करोड़ साल। पर इस सबके लिये एक ही जवाब  कहां है? कई वैज्ञानिक कहते हैं 2000 करोड़ साल, तो कोई 1000 करोड़ साल!’’ “ये सब बातें सिर्फ वैज्ञानिकों को ही कैसे पता चलती हैं?’’

जीविता को थोड़ी नींद आने लग गई थी।

“ऐसे पूछो न, मेरी गुड्‌डी! 1920 में बेल्जियम के एक पुरोहित ने कहा था कि ब्रह्मांड इस तरह एक धमाके से पैदा हुआ। उनका नाम जार्ज लेमेंतरी था। पर किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। 1965 में अमेरिका के दो लोगों ने फिर यही बात बताई।”

जीविता को उबासी आ रही थी। यह देखकर दादाजी ने कहा, ‘‘यह खोज ही अपने आप में एक बड़ी कहानी है। यह मैं कल सुनाता हूं। अब जाकर सो जाओ।”
उस रात सपने में जीविता को एक बड़ा प्रकाश दिखाई दिया।

दुनिया जलने लगी है!

दुनिया जलने लगी है’ या ‘गर्मी बढ़ रही है’ जैसी कुछ बातें आज दुनिया के सारे अखबार जोर-जोर से बोल रहे हैं, खासकर पिछले दो महीनों से। ऐसा पिछले दो महीनों में क्या हुआ?

असल में दो महीनों में नहीं, पर पिछले करीब ढाई सौ सालों में हुआ है- जो अब ज्यादा तेजी से होता जा रहा है- दुनिया ज्यादा से ज्यादा गर्म होती जा रही है। इसे आमतौर पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’(Global warming) का नाम दिया जाता है।

अगर दुनिया गर्म होती जा रही है तो फिर इतनी चिंता की बात क्या है? आखिर दुनिया में ठंडे इलाके भी तो हैं? और फिर गर्म इलाकों में भी सर्दियां तो आती ही हैं। गर्मी में भी अब हमारे पास गर्मी से लड़ने के तरीके हैं- पंखे, कूलर, बर्फ, एयर कंडीशनर, घड़े आदि…… तो फिर इतना हो हल्ला क्यों मचा हुआ है?

हाल ही में एक रिपोर्ट आई है, जिसमें दुनिया के 40 देशों के लगभग 25,000 वैज्ञानिकों ने बहुत गहरी छानबीन की है- बहुत सारे अध्ययन किये हैं और उन खतरों पर बहुत ज्यादा जोर दिया है, जिनकी बात पिछले कई दशकों से चल रही थी। इस रिपोर्ट का नाम है-IPCC (Inter  governmental panel on climate change)

रिपोर्ट बनाने वाले सारे लोगों का कहना है- स्थिति खतरनाक होती जा रही है, अगर पूरी दुनिया के देश और इंसान अभी नहीं चेते तो आगे भारी तबाही आने वाली है- और इसे ढाने के लिये इंसानी सभ्यता खुद ही जिम्मेवार है- यह तबाही उसी की लाई हुई है।

आओ देखें- क्या क्या चिन्ताएं दिखाई गई हैं:

  • पृथ्वी पर आज तक के सबसे गर्म 12 सालों (जबसे 1850 में मानव ने धरती का तापमान नापना शुरू किया) में से पिछले 11 साल सर्वाधिक गर्म रहे हैं।
  • उत्तरी ध्रुव पर गर्मी तेजी से बढ़ रही है। इसके पहले ध्रुव प्रदेश सवा लाख साल पहले इतने गर्म हुए थे, और वहां जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है।
  • पृथ्वी के वायुमंडल में ऐसी गैसें जो वातावरण को गर्म करती हैं- कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड खतरनाक रूप से बढ़ चुकी हैं, अगर केवल CO2 की बात करें तो जितनी यह गैस आज हवा में है वह पिछले साढ़े छ: लाख सालों से नहीं रही है। और ये गैसें सभी मानव ने बढ़ाई हैं।
  • पृथ्वी पर ऊंचे अक्षांशों (यानी ठंडे इलाकों) में वर्षा बढ़ रही है और निचले अक्षांशों यानी गर्म इलाकों (जैसे भारत) में वर्षा घट रही है।
  • दुनिया के सागर बहुत सारी गर्मी सोखकर गर्म हो रहे हैं, जिससे उनका पानी फैल रहा है और समुद्रतल ऊंचा होता जा रहा है। समुद्र तल इस वजह से भी ऊंचा हो रहा है और स्थाई रूप से जमी बर्फ के पिघलने से भी।
  • ठंडे दिन, ठंडी रातें, जाड़ा, पाला कम होते जा रहे हैं और गर्म रातें, गर्म दिन और गर्मी की लहर ज्यादा होती जा रही हैं।
  • भारत में ग्लेशियर (हिमनद) जिनकी पिघलती बर्फ से साल भर नदियों को पानी मिलता है उनके फैलाव का क्षेत्र 1962 से 2004 के बीच सिकुड़ कर कुल 32 प्रतिशत रह गया है।

जीव जन्तुओं पर तापमान का प्रभाव

Effect of temperature on the wild animalsपोर्टो रिको के वर्षा वनों मे पहली बार मेढक की टर्र-टर्र रात में सुनाई नहीं दे रही। अधिक गर्मी बढ़ने से मेंढ़कों के ऊपर एक फफूंद वाली बीमारी ने हमला कर दिया है। वहां की 17 मेंढक प्रजातियों में से 3 लुप्त हो गई हैं और 7-8 घटती जा रही है।

बढ़ते तापमान के कारण दुनिया के सागरों में बने मूंगे (coral) के द्वीपों के रंग-बिरंगे रंग गायब होते जा रहे हैं। यही नहीं, मूंगे की जीवों में बढ़ती गर्मी के कारण नए ढांचे बनाने की क्षमता घटती जा रही है। मूंगे की लाखों मील फैली खूबसूरत चट्‌टानें जिनमें हजारों जीवों की जातियां बसती हैं, बढ़ती गर्मी से खतरे में हैं।

मूंगे बहुत ठंडे इलाकों में जहां कभी भारी ठंड के कारण पिस्सू पनप नहीं सकते थे, अब पिस्सू जानवरों और इंसानों में बीमारियां फैलाते दिख रहे हैं। जनवरी के महीने में भी वहां पिस्सू नजर आ रहे हैं।

जैसे-जैसे ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही और पानी गर्म होता जा रहा है, ध्रुवी सफेद भालुओं के लिये जीवन कठिन हो रहा है। वे ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे हैं ताकि भोजन तलाश सकें। यही हाल रहा तो 2050 तक वे दुनिया से लुप्त हो जाएंगे।

सेनेगल में घटती व बदलती वर्षा और सूखे मौसम से डिंब के लाखों पेड़ मर गए हैं।

कॉड मछली जो दुनिया के बहुत सारे लोगोंके भोजन का बड़ा स्रोत है, उनकी संख्या में कमी आ रही है क्योंकि समुद्र के गर्म होने से उनकी खुराक प्लैंकटन नाम के जीव जलधराओं कॉड मछली के साथ बह कर दूसरी ओर चले जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया का तापमान यदि 2-4 डिग्री फैरनहाइट और बढ़ा तो दुनिया की एक-तिहाई जीव प्रजातियां अपने आवास से कहीं और चली जाएंगी या लुप्त हो जाएंगी। करीब 10 लाख प्रजातियों के लिए खतरा है!

बढ़ते तापमान के अन्य खतरे

Other dangers of rising temperaturesवैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के अन्य खतरे हो सकते हैं:

  • दुनिया में भारी वर्षा, बाढ़, सूखा, तूफान, चक्रवात जैसी आपात स्थितियां कही अधिक बढ़ना।
  • गर्म अक्षांशों में वर्षा घटने से सूखे जैसी स्थिति से कृषि की पैदावार घटना।
  • बर्फ के सर्दियों में तेजी से पिघलने से गर्मी में नदियों में पानी की कमी हो जाना।
  • भारत जैसे देश में 7000 किलोमीटर लंबा समुद्रतट है और भारत की चौथाई जनसंख्या तट के 50 किलोमीटर के अंदर बसती है, समुद्र का जल स्तर बढ़ने से जमीन डूबने, खेत, घर, बस्तियां व नगर नष्ट होने, खारा पानी तटों पर अंदर आने जैसे खतरनाक प्रभाव हो सकते हैं।
  • जो देश लगभग पूरे द्वीप हैं और समुद्र तट पर ही बसे हैं, जैसे बांगलादेश, मालदीव, मॉरीशस आदि, उनके लिये भारी खतरा है।
  • मलेरिया जैसे रोगों और उन्हें फैलाने वाले कीटों का दूसरे इलाकों पर हमला बोलना।
  • धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों की खेती में कमी आना।
  • इन सब प्रभावों की सबसे ज्यादा मार गरीबों पर पड़ेगी जो बाढ़ और सूखे से अपने को बचा नहीं सकते, जिन्हें पानी के लिये दूर जाना पड़ता है, जिनकी खेती केवल वर्षा पर निर्भर है, जो वनों पर बहुत निर्भर करते हैं और जो मछुआरे हैं आदि।

कौन जिम्मेदार?
यह तो साफ है कि धरती की इस हालत के लिये इंसान जिम्मेदार है। 1750 के आसपास जब से औद्योगिक युग चालू हुआ, इंसान ने भारी मात्रा में कोयला, पेट्रोल, डीजल, लकड़ी और प्राकृतिक गैस जलाकर बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन चालू कर दिया जो एक प्रमुख ग्रीन हाउस गैस है (ऐसी गैस जो गर्मी को सोख कर रखती है) जाहिर है कि ऐसा सबसे ज्यादा दुनिया के अमीर और विकसित देशों ने किया जिन्होंने अपने विकास का रास्ता बेहिसाब उद्योग लगाकर और गाड़ियों की संख्या बढ़ाने का कार्य किया। अफसोस की बात तो यह है कि गरीब या विकासशील देशों (जैसे भारत) के अमीर भी ठीक वही रास्ता चुन रहे हैं- धरती के सभी संसाधनों की अंधाधुंध, गैर जिम्मेदाराना इस्तेमाल का और धरती को हमेशा के लिये दूषित करने का। लेकिन फिर भी इसका जो कुछ भी नुकसान होगा उसे सबसे पहले गरीब ही भुगतेंगे-चाहे वो गरीब देश हों या गरीब परिवार। पानी की किल्लत हो या अनाज की, सबसे पहले भुखमरी और बदहाली की मार गरीब झेलते हैं। दुनिया के देशों में गरीब देश अभी तक अपने लोगों के लिये अनाज, ऊर्जा, बिजली, पानी, सड़कें और उद्योग जुटाने में लगे हैं- उन्हें अभी विकास के लिये बहुत से नए उद्योग धन्धे लगाने हैं-ऐसे में दुनिया के वायुमंडल की सफाई वे कैसे करेंगे? या फिर विकास के महंगे, कठिन तरीके कैसे चुनेंगे?

दुनिया को गंदा करने में अमीरों और गरीबों में कितना फर्क है, यह इसी से समझा जा सकता है कि सन्‌ 1900 के बाद के 90 सालों में एक औसत अमरीकी व्यक्ति ने एक औसत भारतीय के मुकाबले 43 गुना कार्बन डाइऑक्साइड वायु में फेंकी है। यानी एक अमरीकी इस मामले में 43 भारतीयों के बराबर है।

पूरी दुनिया में आज यही बहस छिड़ी हुई है। CO2 कम करने की जिम्मेदारी कौन उठाए-अमीर देश, जिन्होंने पहले यह तबाही लाई है और बेहद फिजूलखर्ची वाले रहन सहन के आदी हैं? या फिर विकासशील देश जो विकास के उसी रास्ते पर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, और जल्दी ही CO2 छोड़ने में अमीर देशों के बराबर पहुंच जाएंगे।

यहां यह बताना जरूरी है कि सन 1997 में क्योटो में हुई बैठक में अमरीका और आस्ट्रेलिया ने किसी भी तरह से अपने CO2 छोड़ने की मात्रा कम करने से साफ इंकार कर दिया था। अमरीका ने कहा था कि ‘अमेरिकी लोगों के जीवन के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता’- सोचने की बात यह है कि इस गैर जिम्मेदारी का नुकसान पूरी दुनिया और सारी भावी पीढ़ियां झेलेंगी।

हमारी पृथ्वी कितनी बड़ी है ?

आर. रामानुजम, तमिलनाडु साइंस फोरम

अनुवाद: त्यागू रंगनाथन

मेरी गेंद बड़ी है।’ राहुल और जीविता में बहस हो रही थी। दोनों के पास एक-एक गेंद थी। बहस इस बात पर थी कि किसकी गेंद बड़ी है। पहली नज़र में दोनों एक जितनी दिखती थी। तो वो दोनों यह भी तय कर सकते थे कि दोनों गेंदे बराबर हैं। तुम राहुल और जीविता को जानते हो न? कई बार एक ही बात दोहराने के बाद दोनों ने महसूस किया कि बहस कहीं आगे नहीं बढ़ रही थी। लेकिन दोनों में से कोई हार नहीं मानना चाहता था। चलो नाप कर देखते हैं’ राहुल ने कहा। जीविता घर में गई और एक डोरी ले कर आई। राहुल उसकी मंशा समझ गया। बहुत ध्यान से जीविता ने धागे का एक सिरा गेंद के एक बिंदु पर रख दिया। उसे गेंद के चारों ओर ले जाकर, उसने धागे की पूरी लम्बाई नापी। यही उसने राहुल की गेंद के साथ भी किया। राहुल की गेंद ज्यादा बड़ी थी। वह जीविता की गेंद से परिधि से 1.5 सेमी ज्यादा थी। यानि त्रिज्या में अंतर 1.5/2’’ होगा। चाहे जीविता की ही हार हुई हो, वह खुश थी कि उसने कुछ नया सीखा। अब बहस आगे चली गई। यह कैसे तय किया जाए कि धागा नापते समय गेंद को ठीक दो हिस्सों में बांट रहा है (क्या तुम बता सकते हो?) कितने बड़े गोले को धागे से नापा जा सकता है? क्या धागा टूट नहीं जाएगा? धागे को पकड़ेगा कौन? जीविता ने इस समय एक मजेदार शंका जाहिर की ‘हमारी धरती भी तो एक गोला है। हम उसकी परिधि कैसे नाप सकते हैं?’ राहुल हंसने लगा। वह एक हाथ में धागा पकड़े जीविता को धरती के चारो ओर जाते कल्पना कर रहा था। जीविता भी राहुल की कल्पना सुन हंसने लगी। हंस लेने के बाद उन्हें अपने सवाल की याद आई। दोनों एक साथ उछल कर चिल्लाए ‘चलो दादाजी से पूछते हैं।’ तो तुम दोनों धरती को नापना चाहते हो? वाह, वाह।’दादाजी बोले। तुम्हें कैसे पता कि धरती गोल है?’ यह उनकी आदत है। तुम उनसे सवाल पूछो तो वो जबाव देने के बजाय, पलट कर तुमसे दूसरा सवाल पूछ लेते हैं। राहुल और जीविता ने उनके सवाल का जबाव दिया। समन्दर में क्षितिज से आते समय जहाज का अगला हिस्सा पहले दिखता है, फिर मस्तूल और तब पूरा जहाज नजर आता है। सूर्योदय और सूर्यास्त भी पृथ्वी के गोल होने के सबूत हैं। दादा ने जीविता से चित्र बनाकर समझाने को कहा, उसने कुछ चित्र बनाकर दिखाए। दादाजी, पूछते रहे, ‘यह ऐसा क्यों होना चाहिए? क्या यह इस तरह नहीं हो सकता?’ राहुल और जीविता दोनों चुप रहे। उनकी दुविधा देखकर दादाजी ने समझाना शुरू किया। ‘हम चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी की छाया चांद पर देख सकते हैं। छाया का आकार देखकर हम कह सकते हैं कि पृथ्वी गोल है। इसी प्रकार, रात में तारों की बदलती स्थिति देखकर यह भी समझा जा सकता है कि पृथ्वी घूमती है। ‘अच्छा इसे छोड़ो। तुमने धरती की परिधि के बारे में पूछा था ना? इसका पता बहुत पहले यूनानी युग में ही वैज्ञानिक ईरोदस्थेनेस ने भी लगाया था।’ ‘पर आधुनिक युग में इसे ज्यादा शुद्धता से मापना भी काफी कठिन रहा है। यह भी एक लम्बी कहानी है।’ राहुल और जीविता अब यह कहानी सुनने के लिये उत्सुक थे। ‘न्यूटन के सिद्धान्तों ने और गुरुत्व के सिद्धान्त ने विज्ञान की दुनिया में बड़े दरवाजे खोल दिये थे। बहुत सारी नई चीजें पता लगीं। इनमें से सबसे पहले पता लगने वाली चीजों में पृथ्वी की आकृति थी। जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force) के कारण ध्रुवों की अपेक्षा पृथ्वी के बीच का हिस्सा थोड़ा ज्यादा फैल जाता है। ध्रुवों पर पृथ्वी चपटी है। उस समय व्यापार के लिये पृथ्वी का नक्शा बहुत महत्वपूर्ण था। न्यूटन के अनुसार धरती को विशुद्ध गोल मानकर बने हुए नक्शे सही नहीं थे। सन्‌ 1735 में फ्रांस से एक दल पृथ्वी की परिधि नापने के लिये रवाना हुआ। तरीका यह था कि एक डिग्री देशान्तर (Longitude) द्वारा पूरी की गई दूरी मापी जाए और फिर उसे 360 डिग्री से गुणा कर दिया जाए। यह दल दक्षिण अमरीका के ‘पेरू’ नामक देश गया। वे लोग इस दूरी को पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर नापना चाहते थे। इस यात्रा में बहुत कठिनाइयां आई। दो मुख्य वैज्ञानिक कोन्डामीन और फ्यूजर हमेशा आपस में लड़ते रहते थे। वे जब पहुंचे तो एक स्थान में आदिवासियों ने उन्हें पत्थर मारकर भगा दिया। उनका जैव वैज्ञानिक विशेषज्ञ पागल हो गया। टीम का एक सदस्य एक जलप्रपात में गिरकर मर गया और दूसरा तेज बुखार से मर गया। उन्हें ‘लीमा’ शहर पहुंचने के लिए स्वीकृति मिलते मिलते ही आठ महीने लग गए। इन वैज्ञानिकों ने इस दूरी को मापने में 10 साल लगाए। इसी साल एक दल स्वीडन गया ताकि उत्तरी ध्रुव के नज़दीक 1 डिग्री की दूरी को नापा जा सके। इन दोनों दूरियों में 43 किलोमीटर का अंतर निकला। न्यूटन का अनुमान कि पृथ्वी बीच में ज्यादा फैली है, सच निकला। ‘दस साल, उन्हें इतनी कठिनाई हुई?’ जीविता ने कहा। ‘हां, पूरी यात्रा के अन्त तक वैज्ञानिक कोंजमीन और फ्यूजर आपस में नहीं बोले। जब काम खत्म हो गया, तो दोनों अलग अलग जहाजों में वापस आए। अजीब लोग थे।’दादा ने कहा। राहुल ने, जो अभी तक चुपचाप सारी बात सुन रहा था, पूछा, ‘दादाजी आपने परिधि नापने के बारे में तो बताया, पर पृथ्वी का भार कैसे निकलेगा?’ ‘न्यूटन के सिद्धान्त के अनुसार दो पिंड एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। अगर तुम एक पहाड़ की चोटी से एक पत्थर लटकाओ तो पत्थर पर केवल पृथ्वी का गुरुत्व ही नहीं काम करेगा, पहाड़ भी पत्थर पर बल लगाएगा। इसके कारण धागा सीधा होने के बजाय जितना कोण बनाएगा उसे नापा जा सकता है। अब अगर हमें पहाड़ का द्रव्यमान (Mass) भी पता हो तो पृथ्वी के द्रव्यमान का पता लगाया जा सकता है। इसके लिये दो पिंडों के बीच गुरुत्व बल का यह फार्मूला इस्तेमाल किया जाता है। F= GM1M2/r2 ‘लेकिन पहाड़ का द्रव्यमान कैसे पता लगे? ‘दादाजी ने पूछा। ‘नेस्कालीन नाम के वैज्ञानिक  ने पहले और फिर उसकी खोज से चार्ल्स हटन ने पहाड़ के द्रव्यमान का पता लगाया। इससे पृथ्वी का द्रव्यमान निकला 5 करोड़ टन। जीविता और राहुल यह संख्या सुनकर दंग रह गए। वे धरती के बारे में और कई प्रश्न पूछना चाहते थे। ‘दादा जी, क्या धरती मेरी गेंद जैसे दिखती है, या फिर मूंगफली जैसी या फिर लड्‌डू जैसी? जीविता ने पूछा।

ईश्वर की आँख या नेब्युला

nebulaकहा जाता है कि न, हम किसी चीज़ को जिस नज़र से देखते हैं वह हमें वैसी ही दिखती है? यहाँ इस बात का एक बढ़िया उदाहरण है।  यह चित्र अंतरिक्ष में दिखने वाली एक आकृति का है जो शक्तिशाली दूरदर्शी से नज़र आती है। यह देखने में आँख जैसी दिखती है न? यही देखकर आजकल इंटरनेट पर कुछ लोगों ने रिंग नेब्युला के बारे में ऐसे दावे करने शुरू कर दिये हैं कि यह ईश्वर की आँख’हैं, जो अंतरिक्ष से हमें देख रही है। यही नहीं, वो तो यह भी कहने लगे हैं कि क्योंकि यह ‘आँख’नीली है इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर गोरी चमड़ी के हैं। (क्योंकि गोरे लोगों में ही नीली आँखें होती हैं)। यह सबूत है किस प्रकार एक साधरण सी चीज़ को केवल गुमराह करने के लिये ही नहीं बल्कि ऊँच नीच को बढ़ावा देने के लिये भी इस्तेमाल किया जाता है। अब चित्र की असलियत पर आते हैं। यह चित्र एक नीहारिका या नेब्युला      का है। इसका नाम हैलिक्स नैब्यूलाहै। यह हमसे 700 प्रकाश वर्ष दूर पर स्थित है। इसकी खोज 1824 में कार्ल लुडविग हार्डिग ने की थी। दूरदर्शी से देखने में नेब्युला ज्यूपिटर और नैप्च्यून जैसे गैस से बने ग्रहों जैसी लगती है। पर असल में नेब्युला का ग्रहों से कोई संबंध नहीं। ये ‘बूढ़े’या ‘मरणासन्न’तारे हैं। एक तारे के जीवन चक्र में जब सारा परमाणु ईंधन (जो उसे चमकता रखता है) खत्म होने लगता है, तो तारा एक बड़े विस्फोट के साथ मृत हो जाता है। यह फटता हुआ तारा ही नेब्युला या नीहारिका है।

कैट्‌स आई नैब्यूला

तारे अरबों साल तक जीवित रहते हैं। जबकि नेब्युला केवल दस हजार साल तक जिंदा रहते हैं। विस्फोट के समय सारा पदार्थ एक गैस के बादल के समान फैल जाता है, जिसका कोई आकार नहीं होता। इसमें तरह-तरह के आकार और रंग दिखते हैं। अंतरिक्ष में अनेकों आकार की नेब्युला दिखती हैं। इनमें कुछ गोलाकार भी हैं। गोलाकार नेब्युला ग्रहीय नेब्युला कहलाती है। हैलिक्स भी ऐसी ही नेब्युला है। यह संयोग की बात है कि हैलिक्स का रंग रूप एक आँख जैसा है। हमारी आकाश गंगा में कई ऐसी सुंदर नेब्युला हैं- इंबबेल, रिंग, कैट्‌स आई, ऐस्किमों, इनमें से कुछ के नाम है।

प्रयोग करके समझो

डोरी के जरिये सुनना

शायद तुमने सुना होगा कि ध्वनि तरंगें ठोस चीजों के जरिये आसानी से चल सकती हैं। इसे खुद महसूस करने के लिये यह प्रयोग करके देखो।

दो प्लास्टिक या कागज के कप (जैसे आइसक्रीम वाले) या माचिस की डब्बी के अंदर वाला हिस्सा लो। हर कप के चपटे बंद सिरे में एक छेद करो। इस छेद के जरिये एक डोरी पिरोकर उसमें एक गाँठ लगा दो।

अब एक कप को तुम पकड़ो और दूसरे को एक दोस्त को पकड़ा दो। डोरी किसी और चीज को न छुए।

अब तुम दोनों में से एक अपने कप को मुंह से लगाकर धीमे-धीमे बोले और उसे अपने कान से लगाकर सुने। क्या तुम्हें एक दूसरे की आवाज सुनाई देती है?

क्या हुआ? तुम्हें अपने दोस्त की आवाज इसलिये सुनाई देती है क्योंकि ध्वनि तरंगें डोरी के जरिये दूसरे तक पहुंच रही हैं। ध्वनि हवा के बजाय ठोस वस्तुओं के जरिए बेहतर आगे जाती है। अगर इसका सबूत चाहिए तो किसी मेज पर धीरे से अपनी उंगली से टकटका कर उसकी आवाज हवा के जरिये सुनो। अब उसी मेज पर अपना कान लगा कर टकटकाओ और देखो आवाज कैसी सुनाई देती है।

ठंडी उंगलियाँ

एक बर्तन में कुछ बर्फ के टुकड़े डालो। बर्तन के बगल में कुछ चावल के दाने बिखरा दो। अब अपना एक हाथ इस बर्तन में डालो और धीरे से 30 तक गिनती गिनो। अब अपने हाथ को सुखाकर इन्हीं ठंडी उंगलियों से चावल के दानों को उठाने की कोशिश करो क्या हुआ?

Experiment 2

तुम देखोगे कि चावल को उठाना कठिन होगा क्योंकि जब तुम्हारी चमड़ी ठंडी हो जाती है तो तुम्हारी छूने की क्षमता इतना अच्छा काम नहीं करती।

आवाज से मोमबत्ती बुझाना

आमतौर पर हम ध्वनि को आगे चलते देख नहीं सकते। लेकिन इस प्रयोग से तुम यह देख सकते हो कि ध्वनि हवा के जरिये कंपन की तरह आगे बढ़ती है। एक प्लास्टिक की बोतल का तला काट दो। अब एक पतले प्लास्टिक के लिफाफे का टुकड़ा काटकर उसे बोतल के इस खुले सिरे पर कस कर तान दो। रबड़ बैंड से इसे अच्छी तरह कस दो।

Experiment 3

अब एक मोमबत्ती जलाओ। अब बोतल के मुंह को मोमबत्ती से करीब एक इंच दूरी पर रखो। अब प्लास्टिक की परत पर अपनी उंगलियों से जोर से थपथपाओ। मोमबत्ती की लौ को क्या हुआ?
क्या हुआ? मोमबत्ती की लौ क्यों बुझ गई?
वह इसलिए कि जब तुमने प्लास्टिक पर ठोका तो उसके नजदीक की हवा में कंपन पैदा हुआ, जो आगे तक के हवा के कणों तक बढ़ता गया। बोतल के जरिये यह कंपन चल कर लौ तक पहुंचा और उसे बुझा दिया।

क्या तुम जानते हो? बाहरी अंतरिक्ष में बिल्कुल सन्नाटा है।
क्योंकि वहां हवा (या गैस) नहीं है, तो ध्वनि उसके जरिये गुजर नहीं सकती।

कितनी पेंसिलें ?

अपनी आँखें बन्द कर लो। अब अपने किसी दोस्त से कहो कि वह तुम्हें धीरे से पेंसिल की नोक से छुए, कभी एक पेंसिल से, कभी दो पेंसिलों से, दोनों पेंसिलें बहुत पास-पास पकड़ी जानी चाहिए। तुम्हारा दोस्त जब तुम्हें शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर छुए तो तुम्हें बताना है कि उसने एक पेंसिल से छुआ या दो से। वह तुम्हें इन जगहों पर छू सकता है- होंठ, पीठ, बाजू, उंगलियां, पैर, लातें।

Experiment 4

क्या हुआ? क्या तुम हर बार सही-सही बता पाते हो कि पेंसिल एक थी या दो? तुम पाओगे कि तुम कई बार गलत बताते हो। तुम सही तभी बता पाओगे जब तुम्हें उन स्थानों पर छुआ जायेगा जहां पर तुम्हारी स्नायु तंत्रिकाएं (Nerve endings जो स्पर्श का संदेश मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं) ज्यादा घनी होती हैं- जैसे होंठ, हथेली आदि। बाकी जगहों पर जहाँ स्नायु दूर-दूर फैले होते हैं, अगर दो पेंसिल भी छुएंगी, तो भी तुम्हें एक ही पता लगेगी क्योंकि पास में दूसरा स्नायु होगा ही नहीं।

पानी पर तैरती सुई

हमारी आम धरणा यह है कि लोहे जैसी धातुएं पानी में हमेशा डूब जाती हैं, लोहे के जहाज का पानी में तैरने का कारण उसका विशेष आकार है। लेकिन क्या जिसमें हवा उसे तैराने में अपनी भूमिका निभाती है। लेकिन क्या एक सुई पानी पर तैरेगी? डालकर देखो, वह फौरन डूब जाएगी, क्योंकि आर्कमिडीज़ के सिद्धान्त के अनुसार सुई का वजन उसके द्वारा हटाए गए पानी के वजन से ज्यादा है।

Experiment 5

लेकिन एक तरीका है, जिससे सुई को (और लोहे की छोटी-छोटी अन्य चीजों को) पानी पर तैराया भी जा सकता है।

एक सोख्ता कागज (ब्लाटिंग पेपर) का टुकड़ा लो। अगर यह कागज नहीं मिले तो बहुत खुरदूरे अखबार के टुकड़े को भी आजमा सकते हो (ऐसा अखबार जिस पर लिखने से स्याही फेलने लगती है)। अब इस छोटी, हल्की चीज़ रखो। इस कागज को बहुत धीरे से पानी पर तैराना है, पानी की सतह को बहुत हिलाए बिना। जैसा चित्र में दिखाया है, एक कांटे या चपटी सतह वाली चम्मच या प्लेट की मदद से ऐसा किया जा सकता है। तैरता हुआ सोख्ता कागज थोड़ी देर में पानी सोख कर भारी हो जाएगा और नीचे डूब जाएगा, पर सुई तैरती रहेगी।

ऐसा कैसे हुआ? जो सुई अपने भार के कारण तुरंत पानी में डूब जाती थी, अब कैसें तैर रही है। इसका कारण पानी की सतह है, तो एक महीन खिंची हुई झिल्ली की तरह है, यह झिल्ली एक गुब्बारे की तरह फैल और सिकुड़ सकती है, अगर इसे छेड़ कर तोड़ा न जाए। यह तनी हुई झिल्ली अपने ऊपर छोटी हल्की चीजों को उठा भी सकती है, इसीलिये इसने सुई को उठा लिया।

पानी की सतह के इस तनाव को पृष्ठ तनाव या Surface tension कहते हैं। यह तनाव पानी में साबुन डालकर खत्म किया जा सकता है।

स्ट्रॉ से संगीत

पुराने जमाने की बांसुरियां कैसे बनीं? लोगों ने बांसों से खाली नलियां तोड़ कर उनपर फूकने की कोशिश की होगी।

एक कोल्ड ड्रिंक पीने वाली स्ट्रॉ लो। इसका एक सिरा दबा कर चपटा कर दो (करीब आधा इंच से तीन-चौथाई इंच तक)। अब चपटे सिरे के कोने थोड़े से काटकर उसे चित्र जैसा आकार दे दो।

अब कटे हुए सिरे को मुंह के अंदर रखो। तुम्हारे होंठ कटे कोनों को नहीं छुएं। साथ ही होठों को जोर से दबाओ नहीं। जोर से फूंक मारो। क्या तुम्हें कोई ध्वनि सुनाई देती है?

अगर तुम ध्वनि को बदलना भी चाहते हो, तो अपनी स्ट्रॉ में तीन छोटी काट लगाओ। इन काटों को थोड़ा सा चौड़ा करो ताकि गोल जैसे छेद बन जाएं।
अब उंगलियों से एक छेद को, दो छेदों को और तीनों छेदों को बंद करके बजाकर देखो। तुम्हें अलग-अलग ध्वनियां सुनाई देंगी।

ऐसा क्यों होता है?
स्ट्रॉ के कटे हुए सिरे हवा की तेज धार के साथ खुलते बंद होते रहते हैं। वे हवा को स्ट्रॉ के अंदर जाने देते हैं, फिर रोक देते हैं। स्ट्रॉ के अंदर हवा कंपन करती है, और उसी से ध्वनि निकलती है। जब तुम छेदों पर उंगली रखते हो, तो कंपन करती हवा की नली की लम्बाई बदल देते हो। जितनी छोटी यह नली होगी, कंपन उतना ही तेज होगा और उतना ही ऊंचा सुर निकलेगा।

रिचर्ड चर्चिल, लोशनिंग और म्यूरियल मैंडल की किताब ‘365 सिंपल साईंस एक्सपेरिमेंन्टस’से प्राप्त सामग्री पर आधारित।

स्ट्रॉ का ड्रॉपर

तुम्हें कुछ बूंद दवा के डालने हैं और तुम्हारे पास ड्रॉपर नहीं है। कोई बात नहीं, एक साधारण कोल्ड ड्रिंक पीने की स्ट्रॉ भी वही काम मजे से कर सकती है।

Experiment 7

एक स्ट्रॉ लो। उसमें थोड़ा सा पानी (या दवा) चूस लो। फिर अपनी उंगली स्ट्रॉ के ऊपर रख दो। अब स्ट्रॉ को पानी से बाहर निकालो। अब जब भी तुम अपनी उंगली हटाओगे, स्ट्रॉ के अंदर का पानी या दवा नीचे टपक जाएगा।

ऐसा क्यों होता है?

जब तुम स्ट्रॉ से मुंह लगा कर हवा खींचते हो, तो स्ट्रॉ के अंदर हवा कम हो जाती है, बाहरी हवा का दबाव पानी को उसके अंदर ठेल देता है। अब जब तुम स्ट्रॉ के ऊपर उंगली लगा लेते हो, अंदर हवा का दबाव अभी भी कम है और बाहरी दबाव पानी को नीचे गिरने नहीं देता, जैसे ही उंगली ऊपर से हटाई जाती है, ऊपर से भी हवा का वायुमंडलीय दबाव काम करने लगता है और पानी (या दवा) गुरुत्व के कारण नीचे गिरने लगता है।

स्ट्रॉ से स्प्रे

एक साधारण स्ट्रॉ को स्प्रे के लिये इस्तेमाल करना चाहते हो? आओ वही तरीका इस्तेमाल करें जिससे खुशबू देने वाले या साबुन आदि के स्प्रे काम करते हैं। एक स्ट्रॉ लेकर उसकी करीब एक तिहाई लम्बाई पर एक काट लगाओ,पर पूरा अलग मत करो। छोटे सिरे को पानी के गिलास में डुबा दो। तुम्हारा कटा हिस्सा पानी से जरा सा ऊपर होना चाहिये, करीब चौथाई इंच। अब स्ट्रॉ के लम्बे सिरे से जोर से फूंको। स्ट्रॉ से पानी एक बौछार के रूप में बाहर आएगा।

Experiment 8

क्यों? बरनॉली का सिद्धांत कहता है कि जब कोई गैस तेज गति से बहती है, तो उसका दबाव कम हो जाता है। जब तुम स्ट्रॉ से तेजी से फूंकते हो, कटे हुए स्थान पर हवा का दबाव कम हो जाता है। गिलास की सतह पर वायुमंडलीय दबाव तब पानी पर दबाव डालकर उसे स्ट्रॉ में ऊपर चढ़ने पर मजबूर करता है। कटे स्थान पर तेज बहती हवा उसे बौछार में बदल देती है।

साबुन के बड़े बुलबुले

ट्रे या परात में गुनगुना पानी डालो। इसमें तरल डिटर्जेंट मिला लो। बुलबुले बनाने के लिए हैंगर, प्लास्टिक स्ट्रॉ या बेलनाकार डिब्बों को एक तरफ से काटकर और दूसरी ओर छेद करके फूंकने की नली बनाई जा सकती हैं। नली के खुले सिरे को साबुन के घोल में डुबो दो।

Experiment 9

आवश्यक सामान

  • ट्रे या परात
  • पानी
  • बर्तन धोने वाला तरल डिटर्जेंट
  • तार के हैंगर
  • अगरबत्ती के गोल डिब्बे
  • टेप

सबसे बड़े और अच्छे बुलबुले बनाने के लिए तुम्हें ग्लिसरीन और साबुन के घोल के अलावा प्लास्टिक स्ट्रॉ और डोरी का एक फ्रेम चाहिए होगा। इन विशालकाय बुलबुलों को बनाने में बच्चों और बड़ों सभी को बहुत मज़ा आता है। दो तीन बेलनाकार डिब्बों को टेप से आपस में जोड़ो। फिर ट्रे या परात में फूंक मारकर गुम्बदनुमा बुलबुला बनाओ।

विशालकाय बुलबुलों का Use

तुम चाहो तो बाहर मैदान में साबुन का सबसे बड़ा बुलबुला बनाने की प्रतियोगिता आयोजित कर सकते हो।

  • आवश्यक सामान
  • दो प्लास्टिक स्ट्रॉ
  • धागा
  • ग्लिसरीन (इसमें साबुन के बुलबुले अधिक लचीले और चमकीले बनते हैं। ग्लिसरीन की एक छोटी शीशी तुम किसी दवाई विक्रेता से खरीद सकते हो।)

1. तीन फुट लम्बे धागे को चित्र में दिखाए अनुसार दो प्लास्टिक स्ट्रॉ में पिरो लो। धागों के सिरों में गांठ बांध दो।
2.  परात में रखे साबुन के घोल में 2-3 चम्मच ग्लिसरीन डालो। स्ट्रॉ और धागे के Use को इस घोल में डुबो दो।

दोनों स्ट्रॉ को पकड़ो और साबुन की एक झिल्ली को सावधनी से ऊपर उठाओ। दोनों हाथों को दूर ले जाकर झिल्ली को फैलाओ। झिल्ली में हवा भरने के लिए Use को थोड़ा और ऊपर उठाओ। अंत में Use को ढीला छोड़ते हुए इस तरह झटको  कि बुलबुला Use से अलग हो जाए। इस तरह तुम इन्द्रधनुष के रंगों के एकदम गोल विशालकाय बुलबुलों को हवा में तैरते हुए देख पाओगे।

- एन.सायर वाइज़मैन की पुस्तक कुछ कुछ बनानासे साभार

नाक से चखना!

तुम्हें यह जानकर हैरान होगी कि खाने के स्वाद में उसकी महक का काफी बड़ा योगदान होता है। बिना महक या सिंअवनत के बहुत सी खाने की चीजें बिल्कुल बेस्वाद लगेंगी। एक तरह से हम अपनी नाक से भी चखते हैं।

करके देखो : एक छिले आलू को कद्दूकस करके उसे एक चम्मच में रखो। इतनी ही मात्रा में एक छिले हुए सेब को कद्दूकस करके दूसरी चम्मच में रखो।

अब अपनी आँखें बंद करके दोनों चम्मचों को मिला दो, ताकि तुम्हें पता न हो कि किसमे क्या है। अब अपनी नाक को कस कर बंद करो (ताकि तुम सूंघ न सको) और फिर इन्हें चखो। गजब! तुम बता नहीं पाओगे कि कौन सा सेब है और कौन सा आलू।

क्यों? क्योंकि हमारी नाक और मुंह का रास्ता आपस में जुड़ा है। इसलिये हम भोजन को एक साथ ही सूंघते व चखते हैं। केवल नमकीन, मीठा, कड़वा और खट्‌टा चार अलग-अलग शुद्ध स्वाद होते हैं। बाकी ‘स्वाद’इन स्वादों और महक का मिश्रण होते हैं। अगर तुम्हारे पास नाक न होती, तुम नहीं बता पाती कि तुम क्या अलग-अलग चीज़ें खा रही हो।

खराब महक वाली सब्जी

कुछ सब्जियों की महक ही हमें उन्हें खाने से रोकती है, चाहे वो सेहत के लिये कितनी ही अच्छी क्यों न हो।

आओ करके देखें : एक शलजम लेकर उसे छीलो और फिर दो टुकड़े कर दो। एक आधे हिस्से को और छोटे छोटे टुकड़ों में काट दो। दूसरे आधे हिस्से को पूरा रहने दो। अब इन्हें एक बर्तन में खौलते पानी में डालकर पकाने रख दो। चम्मच से करीब 10-15 मिनट में देखो कि नर्म हो गया या नहीं। तब तक पकाओ जब तक सारा शलजम नर्म हो जाए (पर अपना आकार बनाए रहे और भुर्ता न हो)

Experiment 12

क्या हुआ : छोटे टुकड़े किया शलजम जल्दी गल जाता है। दूसरा बड़ा आधा टुकड़ा ज्यादा देर तक पकता रहता है और करीब आधे घंटे के बाद बदबू देने लगता है। क्यों? शलजम में हाडड्रोजन सल्फाइड होता है। जब हम इसे पकाते हैं तो यह बुरी महक वाली गैस बाहर निकलती है। जितना ज्यादा हम पकाएंगे, उतनी ज्यादा खराब महक और तीखा स्वाद होता जाएगा। कम पकाने से न केवल महक ठीक रहती है, सब्जी के विटामिन और खनिज भी बचे रहते हैं।

नमक का कमाल

तुम जानते हो न कि नमक रासायनिक रूप में सोडियम क्लोराइड है? इसके अंदर के दोनों खनिज यानी सोडियम और क्लोराइड की हमारे शरीर को जरूरत होती है। लेकिन अगर जरूरत से ज्यादा नमक खाया जाए तो वह बहुत नुकसान करता है। आओ देखें कैसे। खीरे के दो तीन टुकड़े काटो, या फिर हरे पत्ते वाली कोई सब्जी ले लो। उनके ऊपर नमक छिड़को और थोड़ी देर छोड़ दो।

Experiment 11

क्या हुआ? वे मुरझा गए।

क्यों? नमक सब्जियों की कोशिकाओं से पानी बाहर खींच देता है।

तुमने देखा होगा, नर्म त्वचा वाले जीव जैसे घोंघे, जोंक या केंचुए आदि पर नमक छिड़कने से उनके शरीर का पानी बाहर खिंच आता है और वे मर जाते हैं। अगर हम भी बहुत ज्यादा नमक खाएं तो हमारे शरीर की कोशिकाओं के साथ भी ऐसा ही होता है। कोशिकाओं के चारों तरफ भरे द्रव में नमक की मात्रा बढ़ जाती है। इससे कोशिकाओं से अधिक पानी और पोटाशियम बाहर खिंच आता है। ऐसी मुरझाई कोशिकाएं ठीक से काम नहीं करती। ज्यादा नमक से उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) या यकृत क्षय (Kidney Damage) जैसे समस्याएं हो सकती है।

आलू में अंकुर उगाना

यदि किसी आलू को ध्यान से देखें तो उसके दबे हुए भागों में हमें ‘आंख’दिखाई देगी। यदि हम आलू को साधारण तापमान में, अनेक दिनों तक वैसे ही रख दें तो वह सिकुड़ जायेगा व उसकी ‘आंखों’से अंकुर आना प्रारंभ हो जाएंगे। यदि इन अंकुरों को पर्याप्त मात्रा में नमी मिल जाए, तो आलू के नए पौधे उग आएंगे व उन्हें मिट्‌टी में रोपने पर बड़े आलू के पौधे विकसित हो जायेंगे।

Experiment 13

अंकुरों को और अच्छी तरह उगाने हेतु हम निम्न क्रियाएं कर सकते हैं :
1. आलू को ठंडे व छायादार स्थान में गीली मिट्‌टी पर रखें तथा उसे एक मोटी पॉलीथिन की काली चादर से ढक दें। उस स्थान में नमी बनाए रखें व समय-समय पर चादर उठाकर देखते रहें। कुछ ही दिनों में अंकुर फूटने लगेंगे। पॉलिथिन की चादर को हटा दीजिए व आलू के आस-पास मिट्‌टी इस प्रकार रखें कि आधा आलू ढक जाए। शीघ्र ही आलू का कन्द सड़ने लगेगा तथा नए पौधे जमीन में जड़ जमाने लगेंगे। यदि आप इनकी ठीक से देखभाल करें तो आपको इन पौधों से आलू प्राप्त हो सकते हैं।
2. केवल अंकुरण को देखने के लिए आलू को 2 सेमी X 2 सेमी के टुकड़ों में काट लें। इन टुकड़ों को किसी कम गहरे बर्तन की तली में रूई बिछाकर उसे गीला कर इस प्रकार रखें जिससे उनकी त्वचा ऊपर की ओर हो। बर्तन को ढककर किसी अंधेरे व ठंडे स्थान पर रख दें। कुछ ही दिनों में आपको अंकुर उगते हुए दिखेंगे।

कंदों के पौधे 
हम सब भली-भांति जानते हैं कि प्याज एक कंद होता है। कभी-कभी हम यह देखते हैं कि प्याज को यदि कई दिनों तक वैसे ही रहने दिया जाए तो उसमें जड़ें व अंकुर फूट आते हैं। प्याज के अच्छे अंकुर पाने के लिए उसे एक ऐसी बोतल के मुंह पर रख दें, जिस पर वह फिट बैठ जाए। बोतल में इतना पानी भरिए जिससे वह प्याज की पेंदी को छूने लगे। बोतल को किसी ठंडे स्थान पर रख दीजिए। यदि बोतल पारदर्शी है, तो कुछ ही दिनों बाद आपको कन्द के पेंदी से जड़ें निकलती दिखेंगी। अंकुर भी ऊपर की ओर बढ़ते दिखेंगे।

घर का चोर पकड़ा जाये

Experiment 14

आवश्यक सामान:

  • टिंचर आयोडीन,
  • टीन के डिब्बे का ढक्कन,
  • सफेद कागज की शीट।

शुरू करो :

सफेद कागज के टुकड़े पर अपनी साफ सुथरी उंगलियों को रखकर दबाओ, ठीक इस तरह मानों तुम इनकी छाप कागज पर उतार रहे हो। फिर थोड़ी-सी (लगभग दो चम्मच) टिंचर आयोडीन को टीन के ढक्कन में रखकर इसे हल्की आंच पर गर्म करने को रख दो। जब यह आयोडीन उबलनी शुरू हो जाये, तो उंगलियों के छाप वाले कागज को इससे उठती हुई भाप के ऊपर लाकर कागज को वहीं थोड़ी देर पकड़े रखो। ध्यान रखना कि उंगलियों की छाप वाली साइड नीचे की तरफ हो और हां, कागज ढक्कन के बहुत पास भी नहीं रखना है, तुम्हें। जानते हो इससे क्या होगा? उंगलियों की छाप जो अभी तक अदृश्य थीं, अब तुम्हें भूरे से रंग में साफ दिखाई देने लगेगी। अपने घर के अन्य सदस्यों की उंगलियों के निशान भी तुम इसी तरह सफेद कागज पर लेकर इनके अंतर को स्पष्ट रूप से देख सकते हो। कमाल की बात है न कि सबके निशान अलग-अलग है। चोरी का पता लगाने में उंगलियों के इन्हीं निशानों से पुलिस को बड़ी सहायता मिलती है। वास्तव में होता क्या है कि उंगलियों की त्वचा में मौजूद बहुत बारीक रोमकूपों (पोर्स) द्वारा शरीर के अंदर से निकलते रहने वाली वसा (फैट्‌स), वसीय अम्ल (फैटी एसिड) और लवण (साल्ट) कागज जैसी तमाम वस्तुओं पर अपनी एक छाप छोड़ देते हैं, जो साधारणतौर पर तो नजर नहीं आते पर इतने छिपे हुये भी नहीं होते कि इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को इनकी जांच करने में कहीं कोई कठिनाई हो। अब तुम्हारी अलमारी के कागजों से जब तुम्हारा कोई छोटा भाई-बहन छेड़छाड़ करेगा, तो तुम्हारी इस असाधरण जानकारी द्वारा वह तुम्हारी निगाह से अपने को छिपा नहीं पायेगा।

टूटी पेन्सिल

Experiment 15एक गिलास को आधा नमक के गाढ़े घोल से भर दो । इसके ऊपर धीरे से सादा पानी भरो। इन्हें आपस में मिलने नहीं देने के लिये ध्यान रखना पड़ेगा कि नीचे वाला हिस्सा ज्यादा छेड़ा न जाए । इसके लिए सादे पानी को पहले चम्मच में भरने दो (जैसा चित्र में दिखाया है) और फिर चम्मच से नीचे बह कर भरने दो। ये दोनों पानी की तहें आपस में ज्यादा नहीं मिलेंगी क्योंकि गाढ़ा घोल भारी होने की वजह से नीचे बैठा रहेगा और सादा पानी हल्का होने की वजह से ऊपर तैरेगा । अब अगर एक पेन्सिल इस गिलास में किनारे की ओर खड़ी करो तो तुम्हें वह तीन जगह से टूटी हुई नजर आएगी। ऊपर की ओर पेन्सिल इसलिये टूटी दिखती है क्योंकि पेन्सिल से आने वाली प्रकाश की किरणें पानी से हवा में आकर मुड़ जाती हैं । इसी तरह दूसरी बार टूटी इसलिये दिखती है क्योंकि नमक के घोल और सादे पानी का घनत्व अलग अलग है। नमक के घोल से सादे पानी में जाने पर प्रकाश की किरणें एक बार और मुड़ेंगी।

कैसे बनाएं चेहरे

अगर सामने का पूरा चेहरा बनाना हो तो एक गोले या अंडाकार से चालू करो। आंखे ऊपर से आधी दूरी पर बनेंगी। कानों का ऊपरी सिरा आंखों के स्तर पर ही होगा। जो मुख्य चीजें भाव दिखाती हैं वह है- मुंह, भौंहे और सलवटें।

Experiment 16.1

भाव दिखाने का सबसे सरल तरीका है - खुशी के लिए ऊपर की ओर एक चन्द्राकार मुंह और दुख के लिऐ नीचे की ओर। आगे हम भावों के बारे में और ज्यादा बताएंगे।

अगर किनारे से दिखाना हो, तो सिर गर्दन के ऊपर एक आम की तरह रखा होता है। आंख आधे रास्ते होती है, माथा हमेशा जितना सोचा जाता है उससे बड़ा होता है। इसी तरह कान और आंख के बीच की दूरी भी काफी होती है। मुंह और नाक के साथ जो मर्जी आए करो।

Experiment 16.2

एक बच्चे की आंखें चेहरे पर ऊपर से दो तिहाई दूरी पर होती हैं। गाल बड़ों से मोटे और ठोड़ी छोटी होती है।

पत्तों से छपाई

लेखकः साक्षी खन्ना

तुम पत्तों से बेहद खूबसूरत चित्र बना सकते हो- जिसमें पत्तों की अजीबोगरीब पर सुन्दर बारीकियां उभर कर आती हैं।

Experiment 17

तुम्हें चाहिए : तरह तरह के पत्ते, रंग, ब्रश, कागज।

पहले अलग-अलग आकार के छोटे-बड़े पत्ते इकट्ठे कर लो। इनकी निचली सतह पर थोड़ा रंग ब्रश की सहायता से बराबर से फैला दो। यह वह सतह होनी चाहिये जिस पर पत्ती की शिराएं उभरी हुई होती हैं। अब इस रंग वाली सतह को कागज पर दबाओ। जब धीरे से हटाओगे तो तुम्हें कागज पर इसकी छाप नजर आएगी। तुम इस तरह कई पत्तों को मिलाकर अलग-अलग रंगों का मिला जुला चित्र भी बना सकते हो। साथ ही एक पत्ते के अन्दर छिपे रहस्य को कागज पर उतार सकते हो।

बल्ब का खरगोश

लेखकः साक्षी खन्ना

अगर घर पर एक सुन्दर खरगोश बनाना चाहते हो तो यह आजमाओ।

Experiment 18

तुम्हें चाहिए : फ्यूज बल्ब, रुई, गोंद, काली मिर्च के दाने, कैंची, कुछ बिन्दियां। एक बल्ब लेकर उस पर पूरी तरह रूई चिपकाओ। उसका कोई हिस्सा खुला नहीं रहना चाहिये। खरगोश के मुंह की ओर थोड़ी ज्यादा रुई चिपकाओ। इसके बाद रूई के दो टुकड़ों को कैंची की मदद से खरगोश के कानों के आकार में काटो। इन कानों को खरगोश के सिर पर चिपका दो। इसके बाद खरगोश के पैरों की जगह पर चार रुई के गोले चिपकाओ। एक गोला पूंछ की जगह भी चिपकाओ।

अगर खरगोश की मूंछे बनानी हैं, तो मुंह के आगे झाड़ू की पतली सींके या रेशे चिपका दो। आंखों के लिये दो काली मिर्च के दाने चिपकाने होंगे। मुंह की जगह काले या लाल कागज से या फिर एक बड़ी बिन्दी से चन्द्र का आकार काट कर चिपका दो। तुम्हारा खूबसूरत, प्यारा सा खरगोश तैयार है।

आओ खेलें!

डॉ.आर.रामानुजम

अपने दोस्त को बुलाओ, एक माचिस की डिब्बी लो, और अब तुम यह खेल खेलने को तैयार हो। माचिस की तीलियों को तीन लाइनों में सजा लो- पहली लाइन में 3, दूसरी में 5 और तीसरी में 7 खेल दो लोगों में खेला जाएगा, जो एक-एक करके अपनी बारी चलेंगे। तुममें से कोई भी शुरू कर सकता है। जब, तुम्हारी बारी है तो तुम्हें कुछ तीलियां तीनों में से किसी एक लाइन से उठानी हैं। लेकिन एक शर्त है। तुम्हें कम से कम एक तीली उठानी है, और तुम्हारे उठाने के बाद उस लाइन में कम से कम एक तीली जरूर बचनी चाहिये। यही नहीं, तुम एक बार में केवल एक लाइन से उठा सकते हो। उदाहरण के लिये, अगर तुम शुरू कर रहे हो और सबसे ऊपर की लाइन से चालू करना चाहते हो तो तुम या एक तीली उठा सकते हो या दो।

Experiment 19

तुम दोनों में से जो भी आखिर में तीली उठाएगा वह हार जाएगा।

मान लो तुमने ऊपरी लाइन से दो तीली उठाकर शुरूआत की। अब तुम्हारी दोस्त ऊपरी लाइन से नहीं उठा सकती। मान लो वह बीच वाली लाइन से 4 तीलियां उठाती है। अब तुम्हारी बारी है। अब तुम केवल निचली लाइन से उठा सकते हो। तुम्हें कितनी उठानी चाहिए ताकि हर हालत में तुम ही जीतो? अब तक तुम्हें अन्दाजा लग गया होगा। यह खेल रणनीति का खेल है। तुम्हें यह अन्दाजा लगाके कि तुम्हारा प्रतिद्वन्दी क्या चाल चलेगा अपनी योजना बनानी पड़ती है।

सोचो : क्या कोई तरीका है जिससे शुरूआत करने वाला हमेशा जीते ?

अब आगे सोचने वाला प्रश्न है- क्या तीलियों की संख्या से कोई फर्क पड़ता है? अभी हमने विषम (odd) संख्या की तीलियां और लाइनें इस्तेमाल कीं। क्या हम सम (even) संख्या की तीलियां लेकर यह खेल खेल सकते हैं? क्या किसी में सम किसी में विषम संख्याएं हो सकती हैं? क्या लाइनों की संख्या में अंतर होना जरूरी है? क्या हम 3, 7, और 11 तीलियों से खेल सकते हैं? या फिर 3, 5 और 11 से?

ये अलग अलग मेल आजमा कर देखो।

हथेली में छेद

हाथ में एक लम्बा कागज लेकर उसे रोल करके नली सी बना लो और अपने दाहिने हाथ से पकड़ कर दाईं आंख से इसके अंदर देखो। दोनों आंखें खुली रखो। अपना बायां हाथ खोल कर नली के साथ सटा लो । तुम हैरान होगे कि तुम्हें हथेली के बीच में एक छेद नजर आएगा।

क्या तुम इसका कारण सोच सकते हो?

असल में दाईं आंख नली के छेद को देख रही है। बाईं आंख हथेली को देख रही है। जैसा हमेशा होता है, दोनों आंखें जो कुछ देखती हैं, वह दिमाग के अंदर मिला कर एक छवि (image) बनती है। तो इस प्रयोग में दिमाग एक आंख से देखें छेद और दूसरी आंख से देखी हथेली को आपस में मिला देता है और इसलिये दिखता है- हथेली में छेद।

फिर से जलती लौ

एक मोमबत्ती को थोड़ी देर जलने दो, फिर फूंक मारकर बुझा दो। उसकी बत्ती से सफेद धुआं निकलता रहेगा। ऐसे में अगर तुम एक जलती हुई माचिस की तीली मोमबत्ती के धुएं के पास लाओ तो तीली से लपट तुरंत मोमबत्ती की ओर झपट कर उसे वापस जला देती है।

Experiment 21

ऐसा क्यों होता है? जब मोमबत्ती को बुझा दिया जाता है उसके बाद भी मोम का कुछ हिस्सा तेज गर्म होने के कारण गैस के रूप में बदल रहा होता है । यही हमें धुएं के रूप में नजर आता है। यह गैस बना मोम ज्वलनशील है और आसानी से एक लौ या चिंगारी से जलाया जा सकता है। असल में जो हमें धुएं के रूप में दिख रहा है वह गैस बना मोम है जो पहले ठोस से पिघल कर तरल बना, फिर बत्ती के सहारे ऊपर चढ़ा और गरम हो कर गैस में बदल गया। जिसे हम लौ के रूप में देखते हें वह यह जलती हुई गैस है ।

कागज की जंजीरें

तुम्हें चाहिए : कोई भी रंगीन सुन्दर कागज, कैंची, गोंद।

पहले कागज का एक चौकोर टुकड़ा लो। 9 इंच लम्बा और 9 इंच चौड़ा ठीक रहेगा। पर इससे छोटा बड़ा भी हो सकता है। इसको चित्र में दिखाई लाइनों पर दो बार मोड़ो। तुम्हारे पास एक तिकोना आकार बन जाएगा। चाहे तो इसे बीच से एक बार फिर मोड़ सकते हो। एक पतला तिकोन तैयार है।

अब इस पर कैंची से काट लगाओ। तुम्हें ध्यान रखना पड़ेगा कि:
तुम्हारी काट कागज के एक किनारे से शुरू होनी चाहिये पर दूसरे किनारे तक नहीं कटनी चाहिये। काटें बारी-बारी से आमने-सामने लगानी हैं।

अब इस कागज के मोड़ों को धीरे से खोल दो। इसके बीचों बीच में एक धागा पिरोकर अगर तुम इसे खींचोगे तो एक बहुत सुन्दर जंजीर नजर आएगी। तुम ऐसी दो जंजीरें भी बनाकर उन्हें आपस में चिपका सकते हो। अब इस लड़ी को जहां मर्जी सजाओ। त्योहारों पर सजाने के लिये तो यह बहुत ही बढ़िया है।

आकाश दर्शन

अरविंद सी. रानाडे

यह नक्शा शिमला शहर (अक्षांश: 31-060 उत्तर, देशातंर : 77-13 पूर्व) को मध्य स्थान पर रखते हुए बनाया गया है। इस नक्शे को उत्तर भारतीय प्रदेश थोड़े बहुत समय के अंतर से उपयोग कर सकते है। इस नक्शे को 1 दिसम्बर रात 10 बजे , 15 दिसम्बर को रात 9 बजे तथा 31 दिसम्बर को रात 8बजे उपयोग किया जा सकता है।

Experiment 24
नोट: रात में आकाश को निहारने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें।

  • शहर की रोशनियों से दूर कोई स्थान चुनें।
  • चित्रों को पढ़ने के लिए पेंसिल टार्च का उपयोग करें।
  • आपको पांच चित्र (उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम तथा एक मध्य आकाश) दिये गये हैं। उत्तर दिशा के चित्रा को उत्तर की तरफ मुंह करके अपने आखों के सामने रखकर चित्र में दिखाएँ गये तारामंडलों को, आकाश में स्थित तारामंडलों से मिला कर पहचानने की कोशिश करें। और ऐसे ही अलग-अलग दिशा के चित्रों को उसी दिशा की तरफ मुंह करके उपयोग कर सकते हैं।
  • नक्शे मे ज्यादा चमकीले तारे बड़े डॉट तथा कम चमकीले तारे तुलना में छोटे डॉट में दिखाए गये हैं।
  • तारामंडल को बड़े अक्षरों में तथा तारों को छोटे अक्षरों में लिखा गया है।

बिजली का स्वाद

अगर आप दो ऐसे तार जिनके एक सिरे किसी नींबू में धंसे हो अपनी जीभ से लगाऐं तो आप बिजली का स्वाद ले पायेंगे और उसे महसूस कर पायेंगे। आप को अपनी जीभ पर कुछ धातु जैसा स्वाद और झनझनाहट सी महसूस होगी।

Experiment 23

नींबू से बिजली बनाओ

जरूरी सामान- दो कड़े तांबे के तार, बड़ी पेपर क्लिप, नींबू, कैंची, गैलवनोमीटर कैसे करें- तार के ऊपर से रबड़ का कवर छील कर उतार दें। पेपर क्लिप को खोल लें और उसको तार के एक सिरे पर बाँध दे। नींबू के भीतर के गूदे को मुलायम करने के लिये चारों ओर से दबायें। नींबू के ऊपर लगभग 1 इंच के दो छोटे निशान लगाएँ। खाली तार और पेपर क्लिप को नींबू के छिलके से उसके गूदे में धंसाएं। दोनों तार एक दूसरे के करीब हों किन्तु छुएं नहीं। दो तारों के मुक्त सिरे को किसी मीटर के सिरे से जोडें।

क्या होगा- मीटर चलेगा। क्यों- दो अलग-अलग धातुओं तांबे के तार और लोहे की क्लिप का नींबू के रस (एसिड) से रासायनिक क्रिया होने पर एक तार से दूसरे की ओर इलेक्ट्रॉन बहने लगते हैं। वह नींबू से एक तार के माध्यम से बाहर निकल कर मीटर मे आते है और वहां से फिर दूसरे तार से नींबू मे जाते है।

कागज के छल्ले और झूमर

आवश्यक सामानः कार्डशीट, कैंची, पेंसिल या कील स्टेप्लर।

Experiment 25

कार्ड शीट की पट्टियाँ काटो- छोटी-लम्बी, चौड़ी-सँकरी सभी तरह की पट्टियाँ।

किसी पेंसिल या कील पर लपेटकर पट्टियों के छल्ले बनाओ।

बड़े और छोटे छल्लों को आपस में स्टेप्लर से जोड़ो। तुम इनसे अलग-अलग तरह की लुभावनी चीज़े बना पाओगे। तितली भी बनाकर देखना!

ऑक्सीजन पत्ते

आवश्यक सामग्री- 1 साफ चौड़े मुंह का जार, पानी, एक पत्ता, एक बड़ा करके दिखाने वाला शीशा।

Experiment 26

क्या करना होगा - जार को पानी से भर दें और इसमे एक पत्ती डाल दें। किसी धूप वाली जगह पर इसको रख दें। वहां पर इसको कम से कम एक घण्टा रखें जब तक कि जार का बाहरी हिस्सा गरम महसूस न होने लगे। मैग्नीफांइग ग्लास की मदद से देखें जार में क्या हो रहा है ?

क्या होता है - हजारों छोटे-छोटे बुलबुले जार के भीतर की पत्ती पर दिखाई देंगे।

क्यों- पत्ती जो ऑक्सीजन छोड़ती है वह बुलबुले के रूप में परिवर्तित हो जाती है।

तुम जानते हो कि सूरज के प्रकाश के साथ पौधे पानी व हवा से कार्बन डायऑक्साइड लेकर खुद अपना भोजन बनाते हैं। यह एक प्रकार की शक्कर-ग्लूकोज होती है। यह बनाते समय ऑक्सीजन एक अतिरिक्त पदार्थ के रूप में तैयार होती है। और यही ऑक्सीजन हम इस प्रयोग में देख रहें हैं। अगर तुम इस जार को अंधेरे में रखो तो ये बुलबुले नहीं दिखेंगे।

पौधे इस प्रकाश संश्लेषण से सभी जीवों के लिये भोजन यानी ग्लूकोज़ भी तैयार करते हैं और प्राणवायु यानी ऑक्सीजन भी। प्राणी जगत में ऐसा करने की क्षमता केवल हरे पौधों में है।

हँसगुल्ले

ये ….. आईं हंसी !!!!!

टीचर (बच्चे से): तुम्हारे पापा की उम्र कितनी है?
बच्चा: मेरे जितनी।
टीचर: ऐसा कैसे हो सकता है?
बच्चा: क्यो? जब से मैं पैदा हुआ तभी से तो वो मेरे पापा बने।

एक दिन रावण को अपने किये पर बहुत अफसोस हुआ और उसने सोचा उसे राम से माफी मांगनी चाहिए। वह राम के घर पहुंचा और दरवाजा खटखटाया। राम ने दरवाजा खोला और रावण को देखकर हैरान हो गए। पर रावण चुप खड़ा सोचता रहा और कुछ बोला नहीं। बताओ वह क्या सोच रहा था?
उत्तर: किस मुंह से माफी माँगू?

एक बार पाँच छिपकलियां- फुलवा, रामप्यारी, राम दुलारी, रामपुरी और रामचुरी दीवार पर रेंग रही थी कि तभी फुलवा ने एक गीत गाना “शुरू कर दिया। जैसे ही फुलवा ने गाना बंद किया रामप्यारी, रामदुलारी, रामपुरी और रामचुरी दीवार से नीचे टपक गई। बताओ क्यों?
उत्तर- क्योंकि वो सब ताली बजाने लगी थीं।

एक बार कई वैज्ञानिक स्वर्ग में आइस-पाइस खेल रहे थे। आइंसटीन ने गिनती शुरू की। बाकी सब छिपने भागे। न्यूटन कहीं छुपे नहीं सिर्फ जमीन पर एक मीटर लम्बा और एक मीटर चौकोर बनाया और उसमें खड़े हो गये। आइंसटीन ढूंढ़ने निकले और तुरंत चीखने लगे - पकड़ लिया, न्यूटन को पकड़ लिया। लेकिन न्यूटन हिले नहीं। बोले- मैं न्यूटन हूं ही नहीं।
आइंसटीन हैरान! बोले- तुम ऐसा झूठ क्यों बोल रहे हो? तुम्हें तो सब जानते हैं।
न्यूटन बोले- देखो मैं न्यूटन प्रति वर्ग मीटर हूं- अर्थात पासकल हूं । समझे?

प्रश्न : शादी में दूल्हे को घोड़े पर क्यों बैठाया जाता है?
उत्तर : उसे भागने का आखिरी मौका दिया जाता है।

जब मैं तुम्हें फोन करता हूं-----------
एक घंटी का अर्थ होता है मैं तुम्हें याद कर रहा हू।
दो घंटी का मतलब है मैं तुम्हें पसंद करता हूं
तीन घंटी का मतलब है मुझे तुम्हारी बहुत याद सता रही है
चार का मतलब है…… अरे बेवकूफ, फोन उठाओ

मुस्कान….. प्रेम की भाषा है।
मुस्कान….. दिलों को जीतने का रास्ता है।
मुस्कान ….. तुम्हे ऊंचा उठाती है
और इसलिये……
आज से अपने दाँत ब्रश करने चालू कर दो!

इतिहास के टीचर : मुगलों ने कहाँ से कहाँ तक राज किया?
छात्र : सर, मुझे पक्का नहीं है पर मेरे ख्याल से पेज 15 से पेज 26 तक।

लड़का : मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। तुम्हारे लिये जान भी दे सकता हूँ।
लड़की : अच्छा? कितनी जल्दी?

दूर सड़क पर किसी को जाते हुए देखकर एक युवक ने आवाज देकर उसे रूकने को कहा।
“क्या आप मुझसे कुछ कह रहे हैं?’’ जाने वाले ने रूककर पूछा।
“हां, भाई सुरेश, मैंने तुम्हीं को पुकारा था। तुम तो बिलकुल बदल गए- पहले तुम काफी मोटे थे, अब दुबले नजर आते हो, रंग भी पहले से काफी साफ हो गया है, आवाज भी काफी बदल गई है। बात क्या है?’’
“लेकिन जनाब, आपने पहचानने में भूल की, मैं सुरेश नहीं हूं।”
“ओ हो, तो नाम भी बदल लिया तुमने!’’

एक लड़के को इंजेक्शन लगवाए जा रहे थे। दो इंजेक्शन लगने के बाद जब तीसरे की बारी आई, तो डॉक्टर ने उससे पूछा, ‘‘यह किस बांह में लगाऊं?’’
लड़के ने जबाव दिया, ‘‘मेरे पिता जी की बांह में।”

“आपने यह कैसे जान लिया कि मेरा बेटा बड़ा होकर नेता बनेगा?’’
“ओह, बात यह है कि वह जो बात करता है सुनने में बड़ी अच्छी लगती है, लेकिन मतलब कुछ नहीं निकलता!’’

ग्राहक: ‘‘निहायत वाहियात खाना है तुम्हारे होटल का: मैं तो खा ही नहीं सकता। जाओ, होटल के मैनेजर को मेरे पास भेज दो।”
बैरा: ‘‘मैनेजर को बुलाने से कोई फायदा नहीं है, साहब, यह खाना तो वह भी नहीं खाते हैं!’’

नन्हा टिंगू एक दिन प्रार्थना कर रहा था- ‘‘हे भगवान्‌, तुम डैडी की रक्षा करना, मम्मी की रक्षा करना….और अपनी भी रक्षा करना……वरना हम सबकी रक्षा कौन करेगा?’’

टुन्नू (मां से) ‘‘मां, तुम्हारे ख्याल से मेरी कितनी कीमत होगी?’’
मां, ‘‘बेटा, तू लाखों रुपये का है।”
टुन्नू ‘‘तो, मां, क्या तुम मुझे चार रुपए की पेशगी नहीं दे सकतीं?’’

स्कूल से वापस आने पर, काफी आवाजें देने पर भी जब घर का दरवाजा नहीं खुला, तो लड़का जोर से बोला- ‘‘मां, मैं हूं चुन्नू-आपका तीसरा बेटा, दूध वाला, भाजीवाला, इनकम टैक्स वाला या तकादा करने वाला नहीं!’’

पोस्ट ऑफिस में रखा हुआ कलम काफी पुराना और खराब हो गया था। एक छात्र उस कलम को पोस्ट मास्टर के पास ले जाकर बोला, ‘‘क्या यह वही कलम है जिससे कवि कालिदास ने ‘मेघदूत’लिखा था?’’
पोस्ट मास्टर ने छात्रा की बात पर ध्यान न देते हुए उत्तर दिया, ‘‘पूछताछ की खिड़की पर जाकर मालूम करो।”

बीजिंग की पशुशाला में एक पिंजड़े में शेर और मेमने को साथ देखकर एक विदेशी पर्यटक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने चीनी गाइड से पूछा, ‘‘यह तो मेल-जोल का कमाल का नमूना है! लेकिन यह सम्भव कैसे हुआ?’’
“प्रतिदिन एक नया मेमना इस पिंजड़े में बंद करके!’’ चीनी गाइड ने उत्तर दिया।

स्कूल के कुछ छात्रों ने मिलकर पिकनिक का कार्यक्रम बनाया और तय किया कि किसी एक पर सारा भार न पड़े, इसलिए हर छात्र अपने साथ कुछ न कुछ लेकर जरूर आए।
बंगाली छात्र: ‘‘मैं रसगुल्ले लेकर आऊंगा।”
मद्रासी छात्र: ‘‘मैं इडली-डोसा।”
गुजराती छात्र: ‘‘खमन-ढोकला।”
मराठी छात्र: ‘‘श्रीखंड-पूरी।”
पंजाबी छात्र: ‘‘तंदूरी रोटियां।”
एक छात्र आखिर तक चुप बैठा रहा। अंत में उससे सब छात्रों ने पूछा- ‘‘भई, तुम क्या लेकर आओगे?’’
उसने उत्तर दिया, ‘‘मैं सब भाई बहनों को लेकर आऊंगा!’’

माध्यमिक शाला के छात्रों की टोली को दिल्ली में राष्ट्रपति भवन की सैर कराई गई। वापस लौटने पर अध्यापिका ने बच्चों से ‘राष्ट्रपति भवन’के बारे में अपने अपने विचार लिखने को कहा। एक छात्र ने लिखा- ‘‘मुझे इस बात की खासतौर से खुशी है कि मुझे अपना वह निवास-स्थान देखने को मिला जिसमें मुझे चालीस साल बाद रहने का मौका मिलेगा!’’

कविता

  • अमरूद बन गये--डा. श्रीप्रसाद
    आमों के अमरूद बन गए
    अमरूदों के केले
    मैंने यह सब कुछ देखा है
    आज गया था मेले
    बकरी थी बिल्कुल छोटी सी
    हाथी की थी बोली
    मगर जुखाम नहीं सह पाई
    खाई उसने गोली
    छत पर होती थी खों खों खों
    मगर नहीं था बंदर
    बिल्ली ही यों बोल रही थी
    परसों मेरी छत पर
    गाय नहीं करती थी बां बां
    बोली वह अंगरेजी
    कहा बैल से भूसा खा लो
    देखा भालो एजी

    मुझको हुआ बड़ा ही अचरज
    मुरगा म्याऊ करता
    हाथ जोड़कर बैठा
    चूहे से था डरता
    पर जब उगा रात में सूरज
    चंदा दिन में आया
    क्या होने को है दुनिया में
    मैं काफी घबड़ाया
    तुरंत मूंद ली मैंने ऑखें
    और न फिर कुछ देखा
    तभी लगा ज्यों जगा रही हैं
    आकर मुझको रेखा
    सपना देखा था अजीब सा
    बिल्कुल गड़बड़ झाला
    सपनों की दुनिया में होता
    सबकुछ बड़ा निराला।
  • खिचड़ी
    बत्तख था, साही भी, (व्याकरण को गोली मार)
    बन गए बत्ताही जी, कौन जाने कैसे यार!

    बगुला कहे कछुए से, "बल्ले-बल्ले मस्ती
    कैसी बढ़िया चले रे, बगुछुआ दोस्ती!"

    तोता मुँही छिपकली, बड़ी मुसीबत यार
    कीड़े छोड़ माँग न बैठे, मिर्ची का आहार!

    छुपी रुस्तम बकरी, चाल चली आखिर
    बिच्छू की गर्दन जा चढ़ी, धड़ से मिला सिर!

    जिराफ कहे साफ, न घूमूँ मैदानों में
    टिड्डा लगे भला उसे, खोया है उड़ानों में!

    गाय सोचे - ले ली ये कैसी बीमारी
    पीछे पड़ गई मेरे कैसे मुर्गे की सवारी!

    हाथील का हाल देखो, ह्वेल माँगे बहती धार
    हाथी कहे - "जंगल का टेम है यार!"

    बब्बर शेर बेचारा, सींग नहीं थे उसके
    मिल गया जो हिरण, सींग आए सिर पे!

    - सुकुमार राय
    ('आबोल ताबोल' की बीस कविताओं का अनुवाद
    'अगड़म बगड़म' संभावना प्रकाशन, १९८९)
    तस्वीरें सुकुमार राय की खुद की बनाई हैं।
  • छोटे रूसी बच्चों की लिखी
  • सूरजमुखी-कात्या
  • सूरज उगा। चिड़ियां जागीं। भरत पंछी आसमान में उड़ने लगा। सूरजमुखी भी जागा। उसने अंगड़ाई ली और अपनी पंखुड़ियों से ओस छिटक दी। फिर वह सूरज की ओर मुड़ा : ‘नमस्ते, सूरज। मैं बड़ी देर से तेरा इंतजार कर रहा था। देखा, मेरी पीली पंखुड़िया तेरी गर्मी में बिना पानी के कुम्हला गई थीं। अब फिर उनमें जान आ गई है।
    बलूत का फल-ज़ीना
    हवा चली और बलूत का फल नीचे गिर पड़ा। लाल-पीला फल तांबे से बना लगता था। वह गिरा और सोचने लगा : ‘‘हाय, जब मैं टहनी पर लटक रहा था, तो कितना अच्छा था। अब मैं ज़मीन पर पड़ा हुआ हूं। यहां से न नदी दिखती है, न जंगल।” बलूत का फल उदास हो गया। वह गिड़गिड़ाने लगा : ‘‘बलूत, बलूत, फिर से टहनी मुझे फिर से टहनी से लगा ले।” बलूत ने जवाब दिया : ‘‘तू तो निरा बुध्दू है। देख तो, मैं भी ज़मीन में से उगा हूं। जल्दी-जल्दी जड़ें छोड़ और आगे बढ़। फिर तू भी ऊंचा पेड़ बन जाएगा।”

मनोरंजक दुनिया

लुप्त हुआ बंदर-राम कुमार स्वामी थूपल

पश्चिमी अफ्रीका में पाया जाने वाली एक बंदर की प्रजाति धरती से लुप्त हो गयी है, जैसा कभी डोडो पक्षी के साथ हुआ था। यह बंदर, जिसका नाम मिस वाल्डरन्स रेड कोलोबस मंकी था, वैज्ञानिकों द्वारा छ: साल तक खोजे जाने पर भी नहीं मिला। वैज्ञानिक अफ्रीका के घाना और आइवरी कोस्ट में बहुत मेहनत से ढूंढते रहे पर वैसा एक बंदर भी ढूंढ पाने में असफल रहे। आखिरी बार 20 साल पहले घाना के वर्षावनों में इस वानर नस्ल को देखा गया था।

इसके बाद इन बंदरों को लुप्तप्राय घोषित कर दिया गया। कोलोबस बंदरों की 5 और प्रजातियां हैं जिनमें से एक और लुप्त होने के खतरे में हैं। कोलोबस बंदरों के अंगूठे बहुत छोटे होते हैं या होते ही नहीं। ये हल्के नारंगी रंग से लेकर चटख नारंगी लाल रंग के होते हैं। ये अपना सारा समय जंगल की ऊपरी शाखाओं से झूलते हुए बिताते हैं और वहीं पर अपना भोजन खोजते हैं। अपने समूह के साथ दोस्ती दर्शाने के लिये ये मुंह से अपने समूह के बंदरों के शरीर से जुएं आदि निकाल कर खाते रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि अजनबी बंदरों के सामने ये ऐसा बर्ताव और ज्यादा करते हैं ताकि उन्हें अपने समूह की मजबूती दिखा सकें। इन बंदरों के खत्म होने का एक कारण अवैध शिकार है क्योंकि इनका मांस विशेष रूप से स्वादिष्ट माना जाता है। दूसरी ओर इनके रहने के लिए जंगल खत्म होते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया की 608 वानर प्रजातियों में से 10 प्रतिशत आज लुप्त होने के खतरे में हैं।

गर्मी से चोर पकड़ना

तुम जानते ही हो कि सदियों से चोरों को पकड़ने का एक तरीका रहा है उनके उंगलियों के निशान ढूंढना। दुनिया के हर इंसान के उंगलियों के निशान अलग होते हैं। ऐसे में पुलिस चोर के द्वारा छोड़े निशान ढूंढ कर उनकी छाप ले लेती है, फिर इन छापों को उन सभी लोगों की छाप से मिलाया जाता है जिनपर शक है, और चोर पकड़ा जाता है। लेकिन ज्यादातर चोर यह बात जानते हैं। इसलिए वो दूसरे तरीके आजमाते हैं - जैसे दस्तानों का इस्तेमाल करके अपराध करना या फिर अपराध करने के बाद सारी छुई हुई चीजों को कपड़े से रगड़ कर निशान मिटा देना। ऐसे में पुलिस के लिए सुराग नहीं बचता।

catch thieves

तो अब अपराध पकड़ने वालों ने एक नया तरीका निकाला है। चोर को उसके शरीर की गर्मी से पकड़ना। हम सबके शरीर में रक्त वाहिनियों का जाल बिछा है। हमारी कुल एक वर्ग इंच चमड़ी में ही करीब 15 फुट लम्बी रक्त शिराएं होती हैं, (पूरे शरीर की रक्त शिराएं तो करीब 1 लाख 60 हजार किलोमीटर लंबी होती है।) ये सभी खून की नाड़ियां गर्मी छोड़ती है जो अवरक्त (इन्फ्रारेड) किरणों के रूप में शरीर से निकलती रहती है। हमारे शरीर का इन्फ्रारेड चित्र लिया जाए तो गर्म ठंडे हिस्से अलग-अलग दिखते हैं और हमारे शरीर का एक भिन्न चित्र बनता है। पुलिस अपने पास अपराधियों के इन्फ्रारेड चित्र रखती है। फिर अगर अपराधी भीड़ में घूम रहा है, पूरी भीड़ का विशेष कैमरों से चित्र लेकर उसे कम्प्यूटर में डाला जाए तो उसमें से अपराधी का चित्र तुरंत पकड़ा जाता है।

एक आदमी का इन्फ्रारेड चित्र जिसने हाथ में जलती माचिस की तीली पकड़ रखी है।
राम कुमार स्वामी थूपल के लेख पर आधारित www.pitara.com से साभार

घटती बर्फ और ध्रुवी भालू

छ: महीने के लंबे अंधेरे ध्रुवी जाड़े में, माँ ध्रुवी भालू अपनी मांद में बैठी हुई थी। उसने वहां बच्चों को जन्म दिया था और इंतजार कर रही थी कि कब वे इतने मजबूत हो जाएं कि उसके पीछे-पीछे भोजन की तलाश में निकल सकें। उनका भोजन ‘आइस पैक’में मिलता है। उत्तरी ध्रुव के ऊपर एक तैरता हुआ बर्फ का बड़ा टोपा या कैप है जो धरती की गति के साथ घूमता रहता है। इस विशाल बर्फ कैप के किनारों पर चिटकी बर्फ के नीचे ध्रुवी भालू को अपना भोजन मिलता है- सील मछलियां और व्हेल, वालरस जैसे दूसरे जंतु।

polar bears

जब मां भालू अपने बच्चों के साथ महीनों बाद बाहर निकलती है, वह कमजोर और भूखी होती है, उसे जल्दी से जल्दी, ज्यादा से ज्यादा भोजन चाहिए। उसका भोजन सील मछलियां आइस कैप के किनारों पर तैर रही हैं और उसे बर्फीले पानी में तैर कर अपने बच्चों के साथ जाना है। वह अच्छी तैराक है लेकिन भूखी कमजोर होने के कारण बहुत दूर तक नहीं तैर सकती।

मां भालू जमीन पर दौड़ती समुद्र तट पर पहुंचकर पानी में छलांग लगा देती है। कई मील तैरकर वह आइस पैक तक पहुंचती है। अब चिटकी, तैरती बर्फ की चट्टानों के बीच वह सूंघती रहती है अचानक उसे पानी में एक हलचल महसूस होती है। बिजली की तेजी से उसका विशाल पंजा झपटता है और अगले ही क्षण तड़पती हुई सील उसके मुंह में है। वह उसे घसीट कर दूर ले जाती है और जल्दी जल्दी खाती है। बर्फीली ठंड से जिन्दा रहने के लिये उसे बहुत चर्बी चाहिये। ध्रुवी भालू या पोलर बीयर पूरे साल शिकार करते हैं। लेकिन उनके लिये बसंत का मौसम सबसे अच्छा है क्योंकि सील मछलियों ने बड़े संख्या में बच्चे दिये हैं। ये भालू सारे वक्त खाने की तलाश में यहां वहां घूमते रहते हैं और अपना ज्यादातर समय तैरती बर्फ पर बिताते है। ये आराम से तैरती बर्फ पर सो भी जाते हैं, क्योंकि इन्हें मारने वाला कोई नहीं है (सिवाय आदमियों के जो इन्हें खाल के लिये मारते आए हैं।) ये सिर्फ बच्चे देने के लिये मैदान पर आते है और मां भालू हर दो-तीन साल में बच्चे जनती है। गर्म होती पृथ्वी या वैश्विक तापमान का ध्रुवी भालुओं पर बुरा प्रभाव पड़ा है। यहां पर हम अशोक वैश नामक वैज्ञानिक ने हाल ही में बर्फीले ध्रुवी प्रदेश की यात्रा की और उसने हमें बताया कि मैं पहली बार ग्लोबल वार्मिंग का असर उत्तरी ध्रुव के नज़दीक आर्कटिक क्षेत्र में देखा। हम एक जहाज पर नार्वे के स्पिट्सबर्गन नामक द्वीप पर ध्रुवीय आइसकैप के नज़दीक थे। (लगभग 81 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर)। हम वहां के वन्य जीवन के चित्र उतारने गए थे- ध्रुवीय भालू, वालरस, सील और पक्षी जो इस सुनसान और नाज़ुक क्षेत्र में बसते हैं। मार्च में जब ध्रुवीय भालू मां और बच्चे बाहर निकलते हैं, वे बहुत लंबे समय से भूखे होते है और उन्हें जिंदा रहने के लिये तुरंत भोजन चाहिए। वे जमीन पर शिकार नहीं कर सकते, उन्हें एक ही शिकार आता है- खुले समुद्र में तैरती बर्फ के बीच से कैसे सील मछलियां पकड़ी जाएं। तो वे द्वीप की जमीन से तैर कर ध्रुवी आइस कैंप तक जाते हैं ताकि वे शिकार कर सकें। आमतौर पर यह यात्रा छोटी ही होती है और भालू बच्चे भी अच्छे तैराक होते हैं। मार्च में ध्रुवी बर्फ कैप जमीन से काफी नज़दीक होती है।

लेकिन हमने पिछले देखा कि ध्रुवीय आइस कैंप पिघल कर बहुत सिकुड़ गई थी- ग्लोबल वार्मिंग के कारण। अब भालुओं को द्वीप से आइस कैप तक सैंकड़ों मील तैर कर जाना पड़ रहा था, ताकि उन्हें तैरती बर्फ मिले और वे भोजन तलाश सकें। सैकड़ों मील तैरना जब वो कमजोर हों और पीछे भूखे बच्चे हों, बहुत कठिन है और बहुत से भालू बीच में ही डूब कर या भूख से मर गए। स्पिट्सबर्गन के ध्रुवी भालू एक समय शिकारियों के मारे जाने से खत्म होते जा रहे थे और केवल कुछ सौ ही बचे थे। 1970 में इनके शिकार पर रोक लगने के बाद से इनकी संख्या बढ़ कर 2000-3000 तक हो गई थी। यह एक बड़ी सफलता थी, लेकिन ग्लोबल वार्मिग के कारण आज ये फिर खतरे में है और अगर हमने धरती पर तेजी से बढ़ती कार्बनडाइआक्साइड और गर्मी को न रोका तो ये सुंदर जीव सदा के लिये लुप्त हो जाएंगे।” केवल ध्रुवीय भालू ही नहीं, पृथ्वी पर सारे जीवन को ही खतरा है, अगर आदमी की ऊर्जा की जरूरतें केवल कोयला या पेट्रोल जला कर ही पूरी होती रहीं। हमें अपने तरीके बदलने पड़ेंगे ताकि कम कार्बन डायआक्साइड निकले। हमें सूर्य, हवा और पानी का इस्तेमाल करके बिजली बनानी होगी, ताकि हम कम से कम ईंधन जलाएं। हमें पेट्रोल की बचत करनी होगी और जंगल बचाने भी होंगे, लगाने भी।

दुनिया के सबसे छोटे बंदर

पिग्मी (जिसका अर्थ है बौना) मार्मोसेट दुनिया के सबसे नन्हे बंदर हैं। पूरा बड़े होने पर भी इनका सिर और शरीर करीब 11 से 15 सेमी का हो पाता है। लगभग इतनी ही लंबी पूंछ होती है और वजन करीब 120 से 190 ग्राम तक होता है। ये ब्राजील, इक्वेडोर और पेरू जैसे देशों के घने वर्षा वनों में पाये जाते हैं।

smallest monkey

ये पेड़ों का गोंद या रस पीते हैं जिसके लिए यह पंजों से छाल में छेद कर देते हैं और फिर टपकते रस को पीने के लिए लौट कर आते रहते हैं। इसके अलावा फल, फूलों का रस या छोटे जंतुओं को भी खाते रहते हैं। चित्र में स्वीडन के चिड़ियाघर में पैदा हुए दो नवजात पिगमी बंदर नजर आ रहे हैं जो एक कर्मचारी की उंगली पर चिपके हुए हैं। अफसोस, कि इनमें से एक बाद में मर गया!

मुझे बचाओ

आलेखः अभिषेक सिंह

यह एक इन्टरव्यू है। इस इन्टरव्यू को लेने के लिए हमारे रिपोर्टर को चंबल नदी के किनारे बने, ‘केन घड़ियाल अभ्यारण’ में जाना पड़ा। आपको जानकर आश्चर्य होगा की ये घड़ियाल, बड़ी मिन्नतों के बाद अपने बारे में बोलने को तैयार हुआ था और वो भी तब जब कि इसे बताया गया कि इंटरव्यू बच्चों के लिए छपेगा।

save me
घड़ियाल (अपनी पूंछ से पानी झटकते हुए) : क्या पूछना है, जल्दी-जल्दी बोलते जाओ।
रिपोर्टर: जी। पहले तो ये बताइये कि क्या आप लोग आजकल किसी मुसीबत में फंसे हैं?
घड़ियाल: मुसीबत की वजह तुम लोग हो, तुम लोग!
रिपोर्टर: जी! कैसे?
घड़ियाल: वो ऐसे कि पिछले कुछ महीनों में हमारी जाति के सवा सौ लोग मारे जा चुके हैं। किसी के बदन पर कहीं कोई घाव का निशान नहीं मिलता। सब खाते पीते स्वस्थ थे। रोज़ नदी की ताजी मछलियां खाते थे। बेचारे अब नहीं रहे – (रिपोर्टर को घूरते हुए अपनी थूथन काफी के पास ले आता है) तुम लोगों ने मार डाला सबको..... कल को हम अगर दुनिया से गायब हो गये तो तुम मनुष्य जिम्मेदार होंगे। तुम सब!
रिपोर्टर: (डरते हुए) सर, हमारा प्रयास सिर्फ इतना है कि आम जनता को आपके बारे में पता लगे। लोग जानेंगे तभी तो आपको बचाना आसान होगा।
घड़ियाल: हाँ। ठीक है-बोलो क्या जानना चाहते हो?
रिपोर्टर: कृपया, अपनी जाति के बारे में कुछ बताइये।
घड़ियाल: (अपना मुँह खोल के आसमान को देखता है, जैसे कुछ सोच रहा हो)-लिखो। हम लोग धरती के सबसे बड़े मगरमच्छ हैं। कुछ घड़ियाल तो 20 फीट लंबे भी होते हैं। वजन होता है 1000 किलो तक। देखने में भयानक लगते ज़रूर हैं पर हम लोग सिर्फ मछली खाते हैं। ये जो लम्बी थूथन देख रहे हो ना, ये मछली पकड़ने और फाँसने में काम आती है। कोई घड़ियाल आदमी नहीं खाता और इसलिए अपने लोगों से कह देना, हमें परेशान न किया करें। हाँ-अगर मारे न गये तो हम लोग 60 साल तक जी सकते हैं। ज़मीन और पानी दोनों में मज़े से रहते हैं।
रिपोर्टर: घड़ियाल जी, भारत और दूसरे देशों में आजकल क्या हालत है आपकी, और पहले क्या हालत थी?
घड़ियाल: ना पूछ भाई। (आवाज रुंध जाती है) 1940 के दशक में पूरी दुनिया में हम लोग 10,000 के आसपास थे। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भूटान में सिंधु, ब्रह्मपुत्रा, गंगा और महानदी के किनारे हमारे इलाके हुआ करते थे। (फिर आसमान को देखता है) पर अब....... आजकल बड़े बुरे दिन हैं दोस्त। कोई नहीं जानता, घड़ियाल धरती पर कितने दिन के मेहमान हैं। रोज़ ही किसी ना किसी के मरने की खबर आती रहती है। लोग तो बताते हैं कि अभी भी 1300 घड़ियाल बचे हुए हैं, और सारे के सारे भारत में हैं बस। कहाँ पहले हर नदी में घड़ियाल मिल जाता था और कहाँ अब चंबल और गंगा की एक 200 किलोमीटर लंबी पट्‌टी को घेर के “चंबल वन अभ्यारण” बना दिया गया है। वहीं कौन सा हम लोग बचे हुए हैं?
रिपोर्टर: पर आखिर घड़ियाल मर क्यों रहे हैं.....?
घड़ियाल: कैसे न मरें? कहाँ रहें, बोलो? कोई जगह बची है, घड़ियाल के रहने के लिए? नदियों पर बाँध बना दिये गये, किनारे के जंगल काट दिये गये-जहाँ घड़ियाल दिख जाते हैं, वहाँ इंसान जाल डालकर फांस लेते हैं और हमारी चमड़ी निकाल लेते हैं। हज़ार हजार रुपये की चमड़ी के लिए हम लोग मारे जा रहे हैं, बरखुरदार। सुना है हमारी चमड़ी से बना बेल्ट लोग मज़े से पहनते हैं। हाय रे दुनिया।
रिपोर्टर: मैं आपकी भावना समझता हूँ। पर कोई तो आपको बचाने की कोशिश भी कर रहा होगा.....
घड़ियाल: हाँ, हैं कुछ लोग। सरकार ने हम लोगों को बचाने के लिए एक प्रोग्राम चलाया है – “घड़ियाल मुक्ति टास्क फोर्स”। उससे ही कुछ आशा है हम लोगों को। बस (एक लंबी आह लेता हुआ अपनी टांगे सिकोड़ने लगता है - पानी में जाने के संकेत देता है) और कुछ पूछना बाकी है?
रिपोर्टर: हाँ, एक आखिरी सवाल बस। घड़ियाल नाम कैसे पड़ा आपका?
घड़ियाल: (मुस्कराने लगता है) हमारा मुँह घड़े या कहो, सुराही जैसा लगता है ना? इसलिए हमारा नाम पड़ा घड़ियाल। वैज्ञानिक नाम -गैवियलिस गैंगेटीसस - भी घड़ियाल नाम से ही लिया गया है।

पानी से जमीन पर-डॉ. इरफाना बेगम

एक साधरण सी बात है कि जीवन की उत्पत्ति एवं विकास पानी में हुआ। लेकिन पानी से जीव भूमि पर कैसे आ गया, अभी भी एक सवाल ही है। पैरों का विकास कब और कैसे हुआ इस सवाल का वैज्ञानिक अभी भी जवाब तलाश कर रहे हैं। क्योंकि पानी में पैरों की जरूरत ही नहीं होती है। इसी सवाल के जवाब के लिये वैज्ञानिक जीवाश्मों का अध्ययन करते रहते हैं और नई खोज के साथ अपनी सफलता के लिये खुशी मनाते हैं।

Water to ground

इन खोजों में जीवाश्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जीवाश्म पृथ्वी में दबे उन जीवित वस्तुओं के अवशेष हैं जो कभी पृथ्वी पर जीवित रहे होंगे। यह जीवाश्म ही हैं जिन्होंने वैज्ञानिकों को बड़े-बड़े रहस्य सुलझाने में मदद की है, जैसे इंसान का विकास चिम्पैंजी से मिलते जुलते प्राणी से हुआ या विकास का क्रम क्या रहा होगा या कौन पहले आया। इसके लिये भूमि की खुदाई से कई जगहों पर अलग-अलग समय के जीवाश्म मिले, जिन्होंने खोई हुई कड़ियों को जोड़ने में मदद की। इसी क्रम में 3650 लाख साल पहले के जीव वेन्टेस्टेगा क्योरोनिका ने एक उम्मीद दिखाई है। इसका जीवाश्म आधुनिक लैटविया से मिला जहाँ पर कभी उथले पानी वाले जलाशय रहे होगें। इस जीवाश्म से पता चला कि विकास के क्रम में हमें पैर कितने पहले मिल गये थे। लेकिन फिर भी यह एक रहस्य ही है कि अंगुलियां और टखने पैरों के साथ हमेशा से थे या नहीं। वेन्टेस्टेगा संभावित रूप से तालों या मीठे पानी वाली झीलों में रहते होंगे। ये अधिकतर पानी में लेकिन कभी कभी जमीन पर रहते होंगे। स्वीडन के वैज्ञानिक अहेलबर्ग के अनुसार वेन्टेस्टेगा के जीवाश्म की खोपड़ी, पेडू के चौथाई हिस्से व कंधे के चिन्ह मिले हैं। लेकिन इसके अगले पैरों के कुछ हिस्से ही मिले हैं। प्राप्त अवशेषों से अनुमान लगाया गया कि यह एक प्राप्त जीवाश्मों के आधार पर वेन्टेस्टेगा के काल्पनिक चित्र छोटे घड़ियाल जैसा दिखता होगा। इसके पैरों में 4-10 तक अंगुलियां भी हो सकती हैं। किन्तु पास से देखने से पता चलता है कि सिर के किनारे पर गलफड़े के (Gill Flap) के अवशेष हैं, जिससे बाद में अन्य स्थलीय जन्तुओं का विकास हुआ होगा।

वेन्टेस्टेगा क्योरोनिका के जीवाश्म को 1994 में पहली बार देखा गया था किन्तु इसे पश्चिम लैटाविया की एक 3650 लाख साल पुरानी चट्‌टान मान कर इसके अवशेषों को निकालने के प्रयास नहीं किये गये। लेकिन अब जीवाश्म वैज्ञानिकों ने बाद की खुदाई के दौरान इस अमूल्य खजाने को निकाला और इसे दुबारा से फिर संयोजित करने का प्रयास किया और माना गया कि यह 1-1.3 मीटर तक की लम्बाई वाला जीव रहा होगा। ऐसा अनुमान है कि यह चौपाया सबसे प्राचीन स्थलीय प्राणियों में से एक होगा जो पृथ्वी पर पहली बार चला होगा। प्रो. अहेलबर्ग की टीम ने इसके जबड़ों के आधार पर इसे प्रारम्भिक स्थलीय प्राणियों में किन्तु विषैले दॉतो के आधार पर इसे मछलियों के बीच का प्राणी माना जो कि जलीय और स्थलीय प्राणियों के बीच की खोई हुई कड़ी हो सकती है। उन्होने यह भी माना कि इस प्राणी के पैर अंगुलियों पर खत्म होते थे न कि पंखों पर। इसका शरीर तो पानी में किन्तु मुंह की आकृति इसे स्थल पर रहने के अनुकूल दर्शाती है। प्राप्त जीवाश्मों के आधार पर विकास क्रम एवं काल्पनिक चित्र इस आधार पर देखे तो यह जीवाश्म विकास की कड़ियों को जोड़ता है साथ ही नये सवालों के साथ नई खोज को दिशा देता है।

बेचारे फूल!

सभी जानते हैं कि फूल जिन्दगी और दुनिया की सबसे सुंदर चीजों में से एक है। इन खूबसूरत चीजों के पास रहना भी एक बड़े नसीब की बात है। खैर, बदलती दुनिया और बढ़ती भीड़ भाड़ के ज़माने में अब किसी के पास ना फूल देखने का वक्त है ना उन्हें सूंघ पाने का।

Poor flower

एक और नयी बात जो पता लगी है वो ये है कि, हमारे द्वारा जलाये जाने वाले पेट्रोल पदार्थ और उनसे निकलने वाले काला धुआँ फूलों की सुगंध और फल पैदा कर पाने की शक्ति को कम कर देता है। लगभग सभी सभ्यताओं को इस बात का अंदाजा लंबे समय से था पर किसी के पास भी कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं था।

वर्जीनिया विश्वविद्यालय के कुछ पाठकों ने इस बाबत एक कम्प्यूटर प्रोग्राम तैयार किया, जो असल जिन्दगी में होने वाले प्रदूषण को अप्राकृतिक तरीके से पैदा करके, उसका फूल और उनकी प्रजनन शक्ति पर असर देखने के काम आए। काफी मशक्कत के बाद एक ऐसा प्रोग्राम तैयार कर लिया गया। मौसम, फूलों और पनपने की अलग- अलग परिस्थिति के लंबे चौड़े जायजे के बाद प्रोग्राम को, जितना हो सके उतना, असली जैसा बनाने की कोशिश की गयी। इस दौरान एक और पहलू निकलकर बाहर आया। ये तो आप भी जानते होंगे कि फूल के प्रजनन में मधुमक्खी, चमगादड़, तितली और दूसरे कीड़े मकोड़ों की जरूरत होती है। जरूरत क्या, अगर ये छोटे प्राणी, एक फूल का पराग (फूल के ऊपर का पीला, पाउडर जैसा पदार्थ) दूसरे फूल में न डालें तो प्रजनन होगा ही नहीं। आप ये भी जानते होंगे कि तितली वगैरह जैसे कीड़े फूल का रस चूसने के चक्कर में, असल में पराग का आदान प्रदान करते हैं। कहा जाये तो फूलों के आकर्षण दिखने का मकसद ही होता है कीड़ों को लुभाना ताकि वो आयें और उनका पराग दूसरे फूल तक पहुंचायें।

अंततः शोध शुरू हुआ। बंद कमरे में फूल रखे गये। तितलियाँ छोड़ी गयीं और कमरे के प्रदूषण को कम्प्यूटर प्रोग्राम से नियंत्रित किया गया। देखा गया कि बिना किसी प्रदूषण के फूल की सुगंध एक-एक किलोमीटर तक जा सकती थी (किसी-किसी फूल की) पर वही सुगंध, प्रदूषण हल्के से बढ़ा देने पर 200 मीटर तक नष्ट हो जाती है। 200 मीटर के पार रखी तितलियों को उस फूल के होने का पता ही नहीं लगता और जब पता ही नहीं लगेगा तो तितलियाँ और भंवरे उसके पास आएँगे कैसे, और बेचारे फूल का प्रजनन होगा कैसे? वैसे सुगंध का दायरा घट जाने से मधुमक्खियों को कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि वो फूल तक पहुंचने के लिए उनकी सुगंध पर निर्भर नहीं करती हैं। खैर, जो भी हो, प्रदूषण की वजह से प्यारे फूलों को कुछ घाटा तो हो ही रहा है और वो असल में कितना होता है, वो किसी और बड़े स्तर के परीक्षण से ही पता लग पाएगा। शोध जारी है। लॉरी एडम्स नाम के वैज्ञानिक का ‘पालिनेटर पर्टनरशिप’ नामका एक संस्थान शोध कार्य में लगा हुआ है।

बच्चों का अपना अखबार

शहीद भगतसिंह पुस्तकालय, पिपरिया, मध्यप्रदेश में रविवार वाले दिन बच्चों का काफी जमघट इकट्ठा था। उस दिन एक भूरे कागज़ को दीवार पर चिपका दिया गया था। कागज़ पर लिखा था ‘बच्चों का अखबार’। बच्चों से कहा गया कि वह अपनी मर्जी से जो चाहें लिखें, या चित्र बनायें और उन्हें भूरे कागज़ पर चिपका दें। पहले तो बच्चों ने अपनी किताबों के कुछ अंशों को लिखकर चिपकाया या फिर चित्रों की नकल उतारी। काफी चर्चा के बाद ही बच्चों को यह समझ में आया कि उन्हें कुछ अपने आप लिखना है। पहली लिखी गई खबर थी। ‘कुएं में गिरी बकरी’ दूसरी थी ‘नाले में गिरा कुत्ता’।

Childrens newspaper

एक शाम स्थानीय सिनेमा-घर में कुछ लड़ाई-झगड़ा हुआ। एक घंटे बाद जब बच्चे पुस्तकालय आए और उन्होंने भूरे अखबार पर लड़ाई की खबर पढ़ी तब उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसके बाद से तो बच्चे सभी विषयों के बारे में लिखने लगे - खेल-कूद, छुटिटयां, सपने, समस्यायें आदि। जल्द ही बच्चों द्वारा लिखा यह अखबार ‘बाल चिरइया’ के नाम से साइक्लोस्टाइल होकर छपने लगा। 1989-90 में इस अखबार की 1000 प्रतियां छपती थीं, जिन्हें बच्चे 25 पैसे में खरीदते थे। बच्चे अपने स्कूल की असलियत को अखबार के माध्यम से उजागर करने लगे। एक मास्टर गैरहाज़िर रहते थे, दूसरे क्लास में सोते रहते थे। हेड-मास्टर साहब बच्चों से मुफ्त में सब्ज़ी मंगवाते थे। इन खबरों से कभी-कभी बच्चों की पिटाई भी सहनी पड़ती, परंतु अखबार की लोकप्रियता बढ़ती रही। कई बच्चे खबरों को अपनी स्थानीय भाषा बुंदेली में लिखते और अपने माता-पिता को पढ़कर सुनाते। आप भी आसानी से अपने स्कूल में एक भूरा कागज़ चिपका कर अपने साथी बच्चों को लिखने, चित्रा बनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। जब बच्चे अपने खुद के अनुभवों को लिखेंगे, तभी उनकी मौलिक लेखन की क्षमता बढ़ेगी। वे लिखने से पहले अपने आस-पास की घटनाओं का बारीकी से अध्ययन करेंगे। यह कम-लागत का अखबार बहुत से बच्चों की सुप्त प्रतिभा को उजागर करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

सदाबहार कपड़े-रामकुमार स्वामी थूपल

वाह, बारिश में भीगने में कितना आनंद है, पर कपड़े गीले हो जाते हैं और छीटों से गंदे भी। अब एक मजेदार खबर है, ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कपड़ा बनाया है जो न गीला होगा न गंदा। अगर उसे पहन कर क्रिकेट खेलो तो कमीज न पसीने से गीली होगी, न गंदी। इस कपड़े को एक विशेष, न चिपकने वाले रसायन में डुबोया जाता है, जिसपर पानी या चिकनाई नहीं चिपकती। इसके कारण कपड़े साफ सुथरे बने रहते है। हालांकि इस चमत्कारी कपड़े का राज अभी तक दुनिया के सामने उजागर नहीं किया गया है।

Evergreen Fabric

दूसरी ओर एक फाँसीसी कंपनी एक नई तरह की जैकेट ले कर आई है। इन जैकेटों पर टेफ्रलॉन की पर्त है। टेफ्रलॉन एक तरह का प्लास्टिक है। इसकी परत आजकल बाजार में मिलने वाले नॉन-स्टिक यानी न चिपकने वाले बरतनों पर लगाई जाती है। इस पदार्थ का विशेष गुण है - यह किसी भी चीज के साथ क्रिया नहीं करता। यह चिकनाई और पानी के अणुओं के साथ किसी प्रकार के रासायनिक गठजोड़ नहीं बनाता। इसलिये टेफलॉन की पर्त वाले बर्तन पर कुछ चिपकता नहीं। ऐसी पर्त वाले कपड़े से भी धूल और पानी फिसल जाते हैं। अमरीकी वैज्ञानिक एक कदम और आगे चले गए हैं। उन्होंने एक कपड़े के धागों को कीटनाशक दवा में डुबो दिया है। इस पर बैठते ही मच्छर मर जाते हैं। अब तो सारे मच्छरदानी बनाने वाले दौड़ लगा रहे है ताकि ऐसी जाली बने जो छूते ही मच्छरों का काम तमाम कर दे।

सूक्ष्म संसार-आर. रामानुजम, तमिलनाडु साइंस फोरम

जीविता के हाथ में एक नया खिलौना था। अभी हाल ही में उसके जन्मदिन पर उसके चाचा ने उसे यह तोहफा देकर चकित कर दिया था। उन्होंने जीविता से कहा था कि यह खिलौना उसे दूसरों के साथ ही इस्तेमाल करना चाहिये। जीविता बहुत खुश हुई थी और उसने कहा था कि यह उपहार उसके बाल क्लब के लिये है। असल में यह तोहफा था - एक माइक्रोस्कोप। जब से उसके हाथ में यह सूक्ष्मदर्शी आया था, वह हर चीज़ को इसके जरिये ही देखने लगी थी। एक पानी की बूंद में उसने एक पूरा संसार देखा। उसमें बहुत से बारीक सूक्ष्म जीव इधर उधर तैर रहे थे। ऐसा लगता था जैसे कि उस बूंद में एक पूरा बड़ा शहर हो।

Micro World

आजकल जीविता, राहुल और उनके सारे दोस्त हर चीज माइक्रोस्कोप के जरिये देखते रहते हैं, लेकिन जब उन्होंने दाल के अंदर भी इसके जरिये सूक्ष्म जीव खोजने चाहे तो उसकी मां भड़क गई। लेकिन दादाजी बहुत खुश हुए। वो मानते हैं कि माइक्रोस्कोप और टेलीस्कोप को हाथ में लिये बिना आप विज्ञान नहीं सीख सकते। एक ओर इतने नज़दीक बसने वाला लेकिन अदृश्य सूक्ष्म संसार और दूसरी ओर नक्षरों क सुदूर विशाल संसार को खुद देखने को एक सीधे वैज्ञानिक अनुभव के लिये वो बहुत जरूरी मानते हैं।

जीविता और राहुल तो इतने हैरान हैं जैसे कि उन्होंने एक नई दुनिया में कदम रखा हो। वो इस बात से भी बहुत चकित हैं कि हमारे आसपास की दुनिया में कितनी ज्यादा संख्या में सूक्ष्म जीव विराजमान है। उन्होंने यह बात बहुत उत्साह से दादाजी को बताई पर इस पर दादाजी बोले कि वो जो कह रहे हैं वह उल्टी बात है।

उल्टी बात, कैसे?”

और क्या? तुम ऐसे कह रहे हो जैसे कि सूक्ष्म जीव हमारे संसार में रह रहे हैं। यह सही नहीं है। असल में हम उनके संसार का एक छोटा सा हिस्सा है। यह पूरी दुनिया उन्हीं की है।“

राहुल व जीविता इस बात से बहुत आश्वस्त नहीं दिख रहे थे इसलिये दादा जी ने बात साफ की। हमारी शरीर की चमड़ी के कुल एक वर्ग सेंटीमीटर पर ही एक लाख से ज्यादा सूक्ष्म जीव रहते हैं। वे वहां खुशी खुशी बसेरा करते हैं। जो थोड़ी थोड़ी मृत त्वचा निकली है उसे खाते हैं और जो खनिज हमारे रोम छिद्रों और दरारों से बाहर निकलते रहते हैं उनका स्वाद लेते रहते हैं। एक साथ दस लाख करोड़ सूक्ष्म जीव हमारे शरीर पर सुख से रहते हैं। यही नहीं, यह भूमि उनका ग्रह है। 100 करोड़ साल तक वे इन्सानों के बिना यहां रहते थे, लेकिन हम उनके बिना एक दिन भी नहीं रह सकते। वे हमारे पानी को साफ करते हैं, मिट्टी को खेती के लिए तैयार करते हैं और भोजन पचाने में हमारी मदद करते हैं। वे रात दिन काम करते रहते हैं।”

हां दादाजी, मैंने भी पढ़ा है कि केवल बैक्टीरिया ही हवा की नाइट्रोजन को खींचकर उपयोगी बना पाते हैं।“ जीविता बोली।

राहुल बीच में टपक पड़ा - कुदरत में यह सच हो सकता है लेकिन वैज्ञानिक नाइट्रोजन को हवा से निकालने का कोई न कोई तरीका ढूंढ ही लेंगे।”

दादाजी हंसे, हां राहुल, अगर हमें नाइट्रोजन का व्यावसायिक उत्पादन करना है तो हमें 500 डिग्री तापमान और 300 गुना वायुमण्डलीय दबाव पैदा करना पड़ेगा, जो बहुत कठिन है। बैक्टीरिया यह काम बिना चूं चपड़ किये कर देते हैं।“

अब जीविता ने पूछा, क्या बैक्टीरिया केवल वायुमंडल में ही होते हैं?” नहीं, नहीं, प्रशान्त महासागर के अन्दर 11 किलोमीटर गहराई पर भी बैक्टीरिया पाए जाते हैं।

जरा सोचो वहां किस तरह का दबाव होता होगा? यह ऐसा होगा जैसे 50 वायुयान तुम्हें दबा रहे हैं।“ बाप रे!”

केवल यही नहीं, आणविक विद्युत कारखानों में लोगों ने ऐसे बैक्टीरिया पाए हैं जो प्लूटोनियम और यूरेनियम को भी खाते है। और तो और, जो कैमरा दो साल के लिये चंद्रमा पर छोड़ दिया गया, उसपर भी बैक्टीरिया जीवित रह गए।”

दादाजी ने आगे बताया बैक्टीरिया इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि वे अपनी नई पीढ़ी सिर्फ दस मिनट में पैदा कर देते हैं। जितनी देर से इंसानी कोशिकाएं दोगुनी होती हैं, बैक्टीरिया उतने समय में कई करोड़ गुना हो जाते हैं। इसलिये पृथ्वी पर जीवन का रूप केवल पशु-पक्षी-वनस्पति जैसा ही नहीं है, बल्कि बहुत बारीक, अजीबो-गरीब शक्ल वाला, तरह तरह के आकारों का है। जीवों में सबसे अधिक विविधिता सूक्ष्म जीवों में ही पाई जाती है। अगर तुम पृथ्वी पर सारे प्राणियों का वजन जोड़ दो तो उसमें से 80 प्रतिशत वजन सूक्ष्म जीवों का है। असल में यह धरती उन्हीं की है।”

पत्तियों के कपड़े ? - आर. वी. वन्दना

बहुत समय पहले हमारे पूर्वज अपने तन को ढकने के लिये जानवरों की खालें, पेड़ों की पत्तियां और छालों का इस्तेमाल करते थे। विकास के साथ-साथ हम फैशन में चल रहे कपड़ों को पहनने लगे।

लेकिन सोचिये क्या फैशन सचमुच बार-बार वापस आता है? क्या हम भी आने वाले दिनों में बांस के बने कुर्ते, मक्के के बने मोज़े या मुर्गी के पंख के बने हुये जैकेट पहनना चाहेंगे। हां------- आने वाले दिनों में हमारी बाजारों में कुछ इस तरह के कपड़े मिलेगें जो वास्तव में एसी चीजों से बने होंगे जिन्हें हम आज खराब कह कर फेंक देते हैं। आज के दिनों में हम लदजीमजपब धागे जैसे नायलॉन या सूती धागों के बने कपड़े पहनते हैं। जूते और जैकेट चमड़े के बने होते हैं। लदजीमजपब और नायलॉन के कपड़े बनाने के लिये हमें बहुत अधिक ऊर्जा चाहिये होती है। साथ ही हमारी सीमित भौतिक सम्पदा जैसे पेट्रोलियम पदार्थ भी नष्ट होते हैं। जानवरों के खालों से चमड़ा बनाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले खतरनाक रसायन पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह की चीजे जैसे चमड़ा नॉयलान या इस तरह के धागे भविष्य में पर्यावरण के लिये बहुत मुश्किल खड़ी कर देगें। अब सवाल यह है कि इस समस्या से कैसे मुक्ति पायें? वैज्ञानिक इस समस्या का समाधान हम लोगों के द्वारा फेकें गये खराब पदार्थो से कपड़ा बना कर ढूंढ रहे है। इससे बेहतर क्या होगा अगर हमारा कूड़ा हमारा धन बन जाये? हम चावल खाते हैं इसकी चूनी फेंक देते हैं। मक्का (भुट्टा) खाकर इसका छिलका फेंकते हैं। (चिकन) मुर्गा खाते है लेकिन इसके पंख कूड़े में डाल देते है। वैज्ञानिकों ने इस कूडे से कपड़ा बनाने के प्रयोग शुरू कर दिये हैं। यह बहुत आसान तरीका नहीं है। पहले इन कच्चे माल को रेशों में बांटा जाता है फिर इन्हें साफ करके कपड़ा बिना जाता है। यह सभी तरीके न तो आसान हैं, न ही अधिक जानकारी में है। यह सभी चीजों प्राकृतिक हैं और वातावरण के लिये भी नुकसानदेह नहीं है। चावल की चूनी से बने कपड़े सूती कपड़ों की तरह होते हैं जबकि मुर्गे के पर के बने कपड़े गर्म ऊनी कपड़ों की तरह होते हैं। अभी दुकानों तक इन कपड़ों को आने में कुछ समय है। लेकिन यह कपड़े न सिर्फ फैशन के निशान होगें, बल्कि पर्यावरण के लिये भी अच्छे होगें।

डाइऐटम

Daiaetmक्या इस नाम का और ऊपर वाले चित्रों का डायमंड (हीरे) या एटम से वास्ता है? नहीं। ये बहुत ही नन्हें जीव हैं जो एक कोशिका से बने हैं और पृथ्वी पर उस समय से बसते हैं जिस समय डायनासोर यहां आए थे। यानि लगभग 20 करोड़ साल पहले से। इनकी कोशिका की दीवार लगभग कांच के घर जैसी होती है, और सिलिका (पसपबं) की बनी होती है। (क्या तुम जानते हो कि सिलिका से ही कांच बनता है?) डाइऐटम ज्यादातर नंगी आंखों से नहीं दिखते पर कोई कोई 2 मिलीमीटर तक बड़े हो जाते हैं। इनकी कोशिका दीवार दो हिस्सों में बंटी होती है जो आपस में एक बक्से की तरह एक दूसरे में फंस जाते हैं। मजे की बात यह है कि डायऐटम का रंग पीला-भूरा होता है तब भी ये प्रकाश संश्लेषण द्वारा धूप से भोजन बनाते हैं। ये हर कहीं पाए जाते है - सागर में, ताजे पानी में और मिट्टी या गीली सतहों पर भी - वो भी करीब एक लाख किस्मों में। ऐसा माना जाता है कि समुद्री जीवों द्वारा खाए जाने वाले कुल भोजन का 45 प्रतिशत हिस्सा ये नन्हें जीव ही बनाते हैं। ये आमतौर पर अपने आप हिल नहीं सकते और कणों की तरह पानी की तरंगों के साथ बहते रहते हैं। जब ये मर जाते हैं तो डूब कर समुद्र तल पर कीचड़ की तरह जमा हो जाते है। समुद्र तल पर नमी परत बहुत कुछ इनसे भी बनी है।

जीव जन्तुओं का अद्भुत संसार

चूहे के सामने के दांत कभी भी बढ़ना बंद नहीं करते । इसलिये चूहों को लगातार सख्त चीजों को कुतरना पड़ता है ताकि ये दांत लगातार घिसते रहें । अगर वे नहीं कुतरें तो उनके दांत इतने बड़े हो जाएंगे कि वे अपना मुंह भी बन्द नहीं कर सकेंगे ।
उआं ! मेंरे दांत इतने लम्बे हो गए हैं कि मैं कुछ नहीं खा सकता।

world of wild animals
जब कोई चूहा किसी चीज को कुतरता है तो उसके ऊपरी दांत चीज में घुस कर कस के नीचे दबाते हैं। नीचे के दांत ऊपर की ओर धक्का देते हैं और साथ ही खाने का कुछ हिस्सा छील भी लेते हैं।
चूहों के दांत इतने ज्यादा मजबूत होते हैं कि वे सीमेंट और धातु जैसी चीजों को भी कुतर सकते हैं। इसलिये चूहों को सीमेंट के जरिये सुरंग बनाने से रोकने के लिये सीमेंट में कांच के तीखे टूटे हुए टुकड़े मिलाए जाते हैं।
चूहे रस्सियों पर चल सकते हैं। संतुलन बनाने के लिये वे अपनी लम्बी पूंछ का इस्तेमाल करते हैं।
चूहे संकरी से संकरी जगह में से रेंग कर जा सकते हैं । अगर वे किसी तरह अपना सिर घुसा लें, बाकी शरीर अंदर पहुंच ही जाता है। जब वे अपने पिछले पैरों पर खड़े होते हैं, वे अपने शरीर को पूंछ की मदद से सहारा देते हैं।
चूहों की आंखें कमजोर होती हैं। वे ढूंढने के लिये दीवार या जमीन को अपनी लम्बी मूंछों से छू कर महसूस करते रहते हैं।
चूहे सड़ा हुआ खाना खाने पर भी बीमार नहीं पड़ते। चूहों को ठंड से भी कोई फर्क नहीं पड़ता।
खरगोश और गिलहरियां भी दो ऐसे जीव (rodents) हैं जिनके दांत हमेशा बढ़ते रहते हैं। इसीलिये ये भी चूहों की तरह हमेशा कुतरते रहते हैं ताकि इनके दांत छोटे रहें।
जंगल में चूहों को कम ताकतवर खाना मिलता रहता है इसलिये वे लगातार कुछ न कुछ खाते रहते हैं।
जब चूहे इन्सानों के आसपास होते हैं तो उनका भोजन बेहतर होता है इसलिये वे कम खाते हैं।
अगर वे लगातार अन्य चीजें कुतरे नहीं तो उनके दांत बहुत बढ़ जाएंगे। इसलिये उन्हें जो कुछ भी मिलता है चाहे टीन, प्लास्टिक या सीमेंट, वे कुतरते रहते हैं।

पेड़ जो समुद्र को पीछे धकेल देते है !

गरान या सुन्दरी के पेड़ गर्म इलाकों में नदियों के मुहानों के किनारे या रेतीले समुद्री तटों पर उगते हैं। ऐसी जगहों में समुद्र में आने वाले ज्वार से कोई और पौधे तो अंकुर बनते वक्त ही मर जाते हैं। लेकिन ये मजबूत होते हैं। और इनमें एक और खासियत भी है- ये नमक को सहन कर सकते हैं। समुद्र का पानी बेहद नमकीन होता है- एक बूंद भी मुंह में जाए तो मुंह का स्वाद खराब हो जाता है। लेकिन ये पेड़ इसे कैसे सहन करते हैं ? वे समुद्री पानी अंदर लेते हैं, अपने अंदर विशेष ग्रंथियों से उसे खींच कर पानी से अलग करते हैं और फिर पत्तों के छेदों से बाहर निकाल देते हैं। कइयों के पास ऐसी विशेष जड़ें होती हैं जो पानी के पौधे में अंदर घुसने से पहले ही नमक को छान देती हैं। बचे हुए नमक को पेड़ अपने पुराने पत्तों में जमा कर देता है। ये पत्ते झड़ जाते हैं और इनके साथ नमक भी।


तटीय इलाकों में एक और समस्या है। बालू यहां वहां लहरों के साथ खिसकती रहती है। इसलिए पेड़ों को जड़ें जमाना बहुत कठिन होता है। ऐसे में जमीन की कमी पड़ती है तो ये पेड़ अपने लिए खुद जमीन बना लेते हैं। अक्सर वे टेक देने वाली जड़ों का पूरा जंगल उगा लेते हैं जो पेड़ को हवा में टिकाए रखती हैं, जिससे ऊंची ज्वार के उफान के अलावा ये पेड़ पानी के ऊपर सुरक्षित रहते हैं। जबकि नीचे ये उलझी हुई जड़ें अपने बीच बालू, तैरता मलबा और पेड़ की खुद की गिरी पत्तियों को फंसा लेती हैं। इस मलबे से पेड़ को भोजन भी मिलता है और इसी पर इसकी नई पौध उग आती है। इनकी जड़ें धीरे-धीरे इस टापू को और बड़ा और मजबूत करती जाती है।
सुन्दरी के पेड़ों के बच्चे भी इतने ही चतुर होते हैं। पेड़ों के बीज पेड़ों पर ही उगना चालू कर देते हैं, जिसमें करीब एक फुट तना और छोटी पत्तियां व जड़ें होती हैं। जब समुद्र में पानी कम होता है तो ये तने नीचे कीचड़ में घुस जाते हैं और जड़ पकड़ने को तैयार रहते हैं। या फिर कुछ समुद्र की लहरों के साथ बहकर ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां थोड़ी बालू होती है। ऐसे में फिर अपनी जड़ों की मदद से ये एक नया टापू धीरे-धीरे बना लेते हैं। हमारे देश में सुन्दरी पेड़ सबसे ज्यादा कहां हैं ? ये हैं गंगा के विशाल फैले हुए डेल्टा में और इन घने जंगलों को सुन्दरवन के नाम से जाना जाता है।

लोहार की ठका-ठक

ढाई हजार साल पहले की बात है। पाइथागोरस नाम का एक यूनानी गणितज्ञ दक्षिणी इटली के क्रोटन शहर में घूम रहा था। वह एक लोहार की दुकान के बगल से गुजरा। वहां खड़ा होकर वह देखने लगा कि लोहार कैसे अलग-अलग आकार के घोड़ों की नालें अलग अलग निहाई (ऐहरन) पर बना रहा था। हर बार जब हथौड़ा लोहे पर बजता, एक जोर की आवाज हवा में गूंज उठती।

शुरू में तो यह ठका-ठक साधारण ही लग रही थी। लेकिन पाइथागोरस की तीक्ष्ण बुद्धि का ध्यान कुछ और ही चीज पर गया। जब भी लोहार निहाई (एहरन) बदलता था, ध्वनि बदल जाती थी। पाइथागोरस इसके बारे में सोचता-सोचता आगे बढ़ गया। घर पहुंच कर उसने एक तख्ते के दोनों तरफ लकड़ी की दो खूंटियां लगा कर उनके बीच एक तार खींचकर बांधा। जब उसने तार को छेड़ा तो उसमें से एक संगीत का स्वर निकला। जब उसने ज्यादा लम्बा तार लगाया, ज्यादा गहरा और नीचा स्वर निकला। इन तारों की लम्बाई बदलकर पाइथागोरस ने एक दिलचस्प बात खोजी। जितनी लम्बी तार होगी स्वर की ध्वनि उतनी ही नीची होगी। जबकि छोटी तार से ऊंचा स्वर निकलेगा।

लेकिन अभी तो पाइथागोरस ने शुरुआत ही की थी। उसने एक तार को खींचकर तख्ते की खूंटियों पर बांधा। उसी के बगल में उसने दुगुनी लम्बाई का एक तार बांधा। जब उसने दोनों तारों को एक साथ छेड़ा तो उसने पाया कि उनसे स्वरों का एक मधुर मेल उत्पन्न हो रहा है। इन तारों का अनुपात आपस में 2:1 था। जब पाइथागोरस ने पहली वाली तार से डेढ़ गुणा लम्बी तार ली तो उसने ध्वनियों का एक और सुन्दर मेल पाया। इस बार तारों की लम्बाई का अनुपात 3:2 का था। इस प्रकार तारों की लम्बाई बदल-बदल कर पाइथागोरस ने बहुत से स्वरों को जांचा। उसने पाया कि सबसे मधुर स्वर तब निकलते हैं जब लम्बाइयां आपस में छोटे या सरल अनुपातों में होती है। 2:1, 3:2, 4:3 आदि । जब उसने ज्यादा उलझे हुए अनुपात लिए जैसे 19:9 या 23:13 तब जो ध्वनियां निकलीं, वे अप्रिय थीं। इस प्रकार पाइथागोरस ने यह खोजा था कि सबसे सुन्दर मधुर ध्वनियों के पीछे संख्याओं का एक निश्चित स्वरूप होता है। ऐसी संख्याओं का इस्तेमाल करके उसने बहुत सारे सुन्दर स्वर निकाले। सदियों से ऐसा माना जाता है कि संगीत और गणित का आपसी सम्बन्ध रहा है। अलग अलग सभ्यताओं ने, संसार के अलग-अलग हिस्सों में, मधुर संगीत निकालने वाले जो भी वाद्य यन्त्र बनाए, चाहे वे तारों वाले हों (जैसे सितार, गिटार, वीणा आदि), हवा वाले (बांसुरी, तुरही, शंख, भोंपू आदि) या झिल्ली वाले (तबला, ढोलक, मृदंग आदि) सभी उन्हीं सरल गणितीय अनुपातों का प्रयोग करते हैं जिनकी पाइथागोरस ने सदियों पहले खोज की थी।
लैरी वर्सट्रेट की पुस्तक ‘ एक्सिडेंटल डिस्कवरीज़’ से साभार

महंगाई कैसे बढ़ती है ?

मान लो कि पुराने समय में एक बकरी 20 किलो गेहूं के बदले खरीदी जाती थी। मतलब 20 किलो गेहूं की कीमत एक बकरी है। धीरे-धीरे इस लेन-देन के लिए पैसा या मुद्रा आ गई। अब मान लो कि एक बकरी 1000 रुपये में खरीदी गई। इसका मतलब आज एक बकरी की कीमत हजार रुपए है और हजार रुपयों का मूल्य एक बकरी के बराबर है। अब अगर माने कि बकरी की कीमत बढ़ गई और 1500 रुपए हो गई। इसके मायने यह नहीं है कि बकरी का मूल्य बढ़ गया। बल्कि यह है कि रुपयों का मूल्य घट गया। अब हजार रुपयों का मूल्य एक बकरी के बराबर नहीं रहा बल्कि डेढ़ हजार रुपयों का मूल्य एक बकरी के बराबर हो गया। यानी रुपये से अब पहले के मुकाबले कम सामान आता है। इसे रुपये का ‘अवमूल्यन’ कहते हैं- जब चीजें महंगी होती हैं तो लोग क्यों परेशान होते हैं? क्योंकि उनके पास खर्चने को रुपये उतने ही होते हैं (या थोड़े ही बढ़ते हैं) लेकिन उन रुपयों से खरीदी जाने वाली चीजें कम हो जाती हैं।


अब देखते हैं कि कीमतें बढ़ती क्यों हैं ? इसके कई कारण हो सकते हैं :
कोई सरकार अगर ज्यादा नोट छापती है और बाजार में नोट बढ़ जाते हैं पर चीजें व उत्पादन उतना का उतना ही रहता है तो जाहिर है कि देश में नोटों का मूल्य घट जाएगा। मान लो बाजार में कोई चीज उपलब्ध ही कम है, तो वह चीज महंगी हो जाएगी। जब दूध का उत्पादन घट जाता है तो दूध महंगा हो जाता है। दूसरे अगर किसी चीज के उत्पादन की लागत बढ़ जाए तो वह महंगी हो जाती है। पेट्रोल या डीजल के दाम बढ़ेंगे तो बसों और ट्रेनों के किराए बढ़ जाएंगे।
कीमतों के तय होने का एक और बड़ा कारण है। वह है उस देश और समाज की व्यवस्था। कोई चीज कम है तो पहले किसको मिलेगी, इसके अलग-अलग नियम है। तानाशाही व्यवस्था में ज्यादा ताकतवर लोगों को चीजें पहले मिलती हैं। जहां व्यवस्था सामाजिक कल्याण की भावना पर हो वहां उसे दी जाएगी जिसे सबसे ज्यादा जरूरत हो। अगर अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी है तो सबसे पहले उस मरीज को दी जाएगी जिसकी हालत सबसे ज्यादा खराब है।
आज की व्यवस्था मुक्त बाजार व्यवस्था है। इसमें चीजें उनको ही मिलेंगी जिनके पास पैसा देने की ताकत है। इस व्यवस्था में जरूरतें पूरी करने के लिए इन्सानियत की कोई जगह नहीं। एक इंसान अगर मर भी रहा है तो भी डॉक्टरी सेवा या दवाई या तरजीह उसे ही मिलेगी जो ज्यादा फीस दे सकता है।

जब महंगाई आकाश को भी पार कर गई
यह 1920 के दशक की बात है। जर्मनी में बर्लिन में एक आदमी होटल में गया और उसने एक कप कॉफीAmazing-4.jpg मांगी। दाम बताया गया 5000 मार्क (जर्मनी की पुरानी मुद्रा। अब यूरोप के ज्यादातर देशों की मुद्रा यूरो है।) लेकिन कॉफी पी कर जब तक वह बाहर निकला, एक कप कॉफी का दाम बढ़कर 8000 मार्क हो गया था। उन दिनों जर्मनी में चीजों के दाम एक घंटे में 60 प्रतिशत तक बढ़ रहे थे। यह सब पहले विश्व युद्ध के बाद हुआ था जब जर्मनी की मुद्रा पूरी तरह ढह गई थी। मार्क के नोट की कीमत उतनी भी नहीं थी जितनी उसके कागज की कीमत थी। सारे सिक्के बाजार से गायब हो गए थे। लोगों ने इन्हें जमा करके रख लिया था क्योंकि सिक्के में लगी धातु की कीमत इन सिक्कों की कीमत से कहीं ज्यादा थी। सरकार ने सस्ते चीनी मिट्‌टी के और हर सस्ती चीज के सिक्के चला दिये- जूते का चमड़ा, कपड़ा, गत्ता, यहां तक कि पुराना अखबार का कागज भी। महंगाई इतनी भयानक होने से सारी समस्याएं हो गई थी। मजदूरों को बड़े बड़े बंडलों में तनख्वाह मिलती थी। जो तुरन्त खर्चनी पड़ती थी वरना वह बेकार हो जाती थी। ग्राहक पहियों वाले ठेलों में ढेर सारे नोट ले जाते हुए दिखते थे। बे-हिसाब मंहगाई के दौरान छोटी दुकानों को भी टोकरे में नोट रखने पड़ते थे।

युद्ध के बाद महंगाई क्यों बढ़ जाती है ?
क्योंकि युद्ध में चीजों की बहुत बरबादी होती है, देश में जरूरी चीजें कम पड़ जाती हैं। बहुत सारी जरूरी चीजें व सेवाएं सेना के लिए लगाई जाती हैं जैसे- डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, पेट्रोल, लोहा, हथियार, ट्रेनें, ट्रक आदि। यही नहीं अकसर चीजों की कमी होने पर कई व्यापारी चीजों को छिपा कर भविष्य में ज्यादा लाभ कमाना चाहते हैं। जैसे-जैसे दाम और बढ़ते हैं, मुनाफा बढ़ता जाता है। इससे भी चीजों की कमी और महंगाई बढ़ जाती है।

डॉ. एच.एस. परमार सह-आचार्य, अर्थशास्त्रा, हिमाचल प्रदेश विश्वव़िद्यालय

टेढ़ी-मेढ़ी, गांठ-गठीली अदरक

अदरक : मसाला या दवा??
अदरक : फल, जड़ या तना??
शक्ल इतनी टेढ़ी-मेढ़ी, बदसूरत जैसे, जैसे...... हिरन के सींग!
मजाक की बात नहीं है - यह सच है कि ज्यादातर भाषाओं में अदरक का नाम प्राकृत भाषा के सिंगावेरा या संस्कृत के श्रृंगावेरा से निकला है जिसका मतलब है- हिरन के सींग जैसा!
ग्रीक में जिंगीवेरिस, लैटिन में जिंजिवर, और अंग्रेजी में जिंजर.....
क्या तुम्हें इन सब नामों में कोई समानता नहीं दिखती?


क्या तुम्हें अदरक पसंद है? अगर न भी हो तो भी इसका लोहा मानना पड़ेगा ही क्योंकि दुनिया में लोग इसे करीब साढ़े चार हजार साल से खाते आ रहे हैं। यह दुनिया के सबसे प्राचीन मसालों में से एक है और पुराने कई ग्रंथों में इसका वर्णन है।
अदरक जमीन के नीचे होता है पर न जड़ है, न फल, बल्कि यह तना ही है। और इसी तने का हम अचार बनाते हैं, कूट कर खाते हैं, चाय में डालते हैं। या सुखाकर सोंठ बनाते हैं । मजे की बात यह है कि यह जितना ज्यादा जमीन में रहेगा, उतना ही तीखा होता जाएगा और उसे घरेलू इलाज के लिये उतना ही अच्छा माना जायेगा। (और सी, सी, सी- उतनी ही जीभ जलेगी!!)
हां- अदरक सचमुच दवा भी है। सुबह-सुबह इसकी चाय पियो तो आलस्य भाग जाता है। इसके अन्दर का एक पदार्थ ज्यादा प्रोटीन वाले खाने को पचाने में मदद करता है। इसके गर्म काढ़े से सर्दी, जुकाम और बुखार में आराम मिलता है और इसे चबाओ तो दांत का दर्द दूर होता है (अगर जीभ जले भी तो क्या हुआ?!) और कोलेस्ट्राल जो दिल का दौरा लाता है, घटता है।
क्या तुम जानते हो कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा अदरक पैदा करता है? दुनिया का आधा अदरक हमारे देश में होता है और उसका भी 70 प्रतिशत केवल केरल में। दुनिया में अदरक की उत्पत्ति भी भारत और चीन में ही हुई थी, लेकिन अब सबसे बढ़िया अदरक जमैका का माना जाता है और भारत का दूसरे नम्बर पर।


लेखक : डॉ टी.वी. वैंकटेश्वरन

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सचिन कुमार Feb 06, 2018 08:00 AM

पानी से भरा गुब्बारा जलती मोमबत्ती से नहीं फटता

Devesh Jun 29, 2017 04:49 PM

Comment upon Aspergillus

vivek Nov 29, 2016 08:07 PM

good

vineetkushwaha2030 Nov 05, 2016 07:55 PM

सडक से बिजली बनाना

आसमान का कलर नीला केयो देखइ देता है May 02, 2016 05:58 AM

आसमान का कलर नीला केयो देखइ देता है

Jasraj Kumawat Feb 08, 2015 07:28 PM

चूहों को पकड़ना हो तो चूहा बनना पड़ता है कुतों को पकड़ना हो तो कुता बनना पड़ता है और अगर शेर को पकड़ना हो तब शेर बनना पड़ता है उसी तरह विकास्XेडिXा की कड़ियाँ भी हमारे देश के नौजवानों को शेर बनती है।

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